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28 जनवरी 2025

हिन्दुओं की आस्था पर फिर आघात

एक तरफ बहुसंख्यक देशवासी प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ की पावनता का एहसास कर रहे हैं वहीं कुछ राजनैतिक पक्ष इसको मलिन बनाने में लगे हैं. महाकुम्भ की पावनता को राजनैतिक रंग देने से राजनैतिक दल, व्यक्तित्व चूक नहीं रहे हैं. इसके आरम्भ होने के पहले से ही भाजपा-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी मानसिकता वालों द्वारा अनर्गल प्रलाप किया जा रहा है. इसी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान ने विवाद पैदा कर दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी नेताओं के बीच गंगा स्नान की होड़ लगी हुई है, हालांकि इससे कोई गरीबी दूर होने वाली नहीं है. कांग्रेस पार्टी धर्म के नाम पर शोषण को कभी बर्दाश्त नहीं करने वाली. कांग्रेस अध्यक्ष को संभवतः जानकारी नहीं रही होगी कि कांग्रेस के पुराने नेता, जिसमें कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी भी शामिल हैं, कुम्भ में स्नान कर चुके हैं. देखा जाये तो यह बयान राजनैतिक विरोध के साथ-साथ धार्मिक आस्था के विरोध का भी है.  

 



विगत कुछ वर्षों से अनेक राजनैतिक दलों, व्यक्तियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक विरोध के नाम पर हिंदुत्व पर, हिन्दुओं की आस्था पर चोट करना है. अवसर मिलते ही उनके द्वारा ऐसा कर लिया जाता है. कांग्रेस अध्यक्ष को यदि भाजपा नेताओं के स्नान करने से आपत्ति थी तो उनको किसी अन्य विषय के सन्दर्भ सहित भाजपा की, उनके नेताओं की आलोचना करनी चाहिए थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. दरअसल गैर-भाजपाई दलों की दृष्टि में महाकुम्भ हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केन्द्र होने से ज्यादा भाजपा की राजनीति को सशक्त करने वाला मंच बनता जा रहा है. महाकुम्भ में जिस तरह से हिन्दू आस्था का सैलाब उमड़ रहा है उससे इन दलों को अपने राजनैतिक अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता समझ आ रहा है. यही कारण है कि अनेक दलों द्वारा लगातार किसी न किसी रूप में महाकुम्भ की आलोचना का अवसर खोजा जा रहा है. यह अवसर खड़गे को भाजपा नेताओं के गंगा स्नान करने के रूप में हाथ लगा.

 

धर्म, गंगा स्नान, महाकुम्भ आदि किसी व्यक्ति की आस्था से जुड़े विषय हैं. पिछले कुछ समय से व्यक्ति की धार्मिक आस्था को, विशेष रूप से हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को रोजगार, आजीविका, अमीरी-गरीबी आदि से जोड़ कर देखा जाने लगा है. इसका जीता-जागता उदाहरण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर रहा है. उसे लेकर अनर्गल प्रलाप बराबर बना रहता था. मंदिर के स्थान पर कोई अस्पताल बनवाने की बात करता था, कोई विद्यालय बनाये जाने की वकालत करता था. मंदिर निर्माण को रोजगार से, आजीविका से जोड़कर भी लगातार सवाल उठाये गए. यहाँ सवाल उठाये जाने वालों की नीयत में किसी व्यक्ति का भला करना नहीं, किसी वर्ग-विशेष को लाभ पहुँचाना नहीं वरन हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करना रहा है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हिन्दुओं की आस्था पर, उनके धार्मिक स्थलों पर, उनके धार्मिक कृत्यों पर प्रश्न खड़े करते लोगों द्वारा कभी भी किसी अन्य धर्म, मजहब के लिए ऐसे प्रश्न नहीं किये गए. कभी इस पर बयान नहीं दिए गए कि किसी दरगाह, मजार पर चादर चढ़ाने से किसी गरीब के नंगे बदन को वस्त्र नहीं मिल जाता. कभी सवाल नहीं उठाया गया कि मोमबत्तियाँ जलाकर प्रार्थना करने से किसी गरीब के घर रौशनी हो जाती. ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलाप ही संचालित होते हों, अन्य धर्मों के क्रिया-कलाप भी यहाँ पूरे उत्साह के साथ संचालित होते हैं, अन्य धर्मों के स्थल यहाँ अपनी पूरी आभा के साथ स्थापित हैं. ऐसी स्थिति होने के बाद भी हिन्दुओं की आस्था पर सवाल उठाना ऐसे लोगों की कुत्सित मानसिकता का परिचायक है.

 



ये बात राजनैतिक लोगों को समझ में नहीं आती है कि धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी होता है. वर्तमान में राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं.

 

जहाँ तक सवाल हिन्दुओं का है तो इस देश में सदैव से ही हिन्दुओं को साम्प्रदायिक घोषित करने का काम किया जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम पर बार-बार समाज में हिन्दुओं को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है. हिन्दुओं को बदनाम करने की आड़ में भारत देश में भगवा आतंकवादहिन्दू आतंकवाद का प्रचार किया जाता रहा है. कुछ इसी तरह की हरकत खड़गे के बयान को कहा जायेगा. ये सोचने-समझने वाली बात है कि धार्मिक कृत्य मनोभावों को, संस्कारों को, पारिवारिक मूल्यों को सहेजने का, पल्लवित-पुष्पित करने का कार्य करते हैं. आस्था में, धार्मिक विश्वास में, कृत्य में कभी भी आर्थिक दृष्टिकोण को हावी नहीं होने दिया गया है. पता नहीं राजनैतिक रूप से खुद को सशक्त समझने वाले लोग धार्मिक, सामाजिक रूप से इतने कंगाल क्यों हो जाते हैं कि वे व्यक्तियों की आस्था, भावना से खेलने का काम करने लगते हैं?  


05 सितंबर 2023

साम्प्रदायिक राजनीति का बढ़ता चलन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन उन्मूलन सम्बन्धी बयान को महज मानसिकता समझ कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है. असल में धर्म और राजनीति का आपस में जिस तरह से घालमेल कर दिया गया है, उसके बाद से ऐसे बयान आश्चर्य नहीं. इसके पहले भी अनेकानेक बार इस तरह के बयान सामने आये जहाँ कि राजनीति को धर्म के द्वारा चमकाने का काम किया गया. आज भले ही प्रत्येक राजनैतिक दल अपने हित साधने हेतु धर्म का सहारा लेते दिख रहे हों किन्तु यह कार्य स्वतंत्रता के पहले से होता आया है. अंग्रेजों ने धर्म का सहारा लेकर ही 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को प्रभावित किया था. उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धर्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों के बीच अनेक दंगे हुए और अंततः सन 1947 में देश को धार्मिक आधार पर विभाजित कर दिया गया.


साम्प्रदायिकता की इस आग ने देश को आज तक अपने कब्जे में ले रखा है. यह विचारणीय है कि ऐसा तब हो रहा है जबकि वर्ष 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को अंकित कर भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया. प्रस्तावना में इसके बाद स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि ‘हम, भारत के लोगभारत को एक संप्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को सुरक्षित करने का गंभीरता से संकल्प लेते हैं.’ यहाँ धर्मनिरपेक्ष का सीधा सा अर्थ है कि सरकार और धार्मिक समूहों के बीच सम्बन्ध संविधान और कानून के अनुसार निर्धारित हैं. यह राज्य और धर्म की शक्ति को अलग करता है.




धर्म और राजनीति का समाज पर गहरा प्रभाव रहता है. इनके द्वारा राष्ट्र के, मानव के विकास को नयी दिशा प्राप्त होती है. ऐसे में धर्म और राजनीति को समझने की आवश्यकता है. शास्त्रसम्मत विचार से जिसे धारण किया जा सके वह धर्म है. यह वो क्रिया है जो मानव को जीने का रास्ता दिखाती है. यदि विस्तीर्ण रूप में देखें तो हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि धर्म नहीं बल्कि सम्प्रदाय हैं. इसी तरह योजनाबद्ध नीति एवं कार्यक्रमों का सञ्चालन करना ही राजनीति है. जनता के सामाजिक, मानसिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर आदि को विकास की राह पर ले जाना ही इसका लक्ष्य होता है. धर्म में राजनीति को शामिल नहीं किया जा सकता किन्तु राजनीति बिना धार्मिकता के साथ नहीं हो सकती है. बिना धर्म के राजनीति मूल उद्देश्य से भटक जायेगी, मानव-कल्याण की भावना से परे हो जाएगी. मानव-कल्याणयुक्त धर्म से की गयी राजनीति ही धर्मनिरपेक्षता को प्रतिपादित करती है.


धर्म और राजनीति के इस विवेचन के मूल में छिपा है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता है. वह सभी धर्मों का सम्मान करते हुए उनको एकसमान दृष्टि से देखता है. यह किसी भी शासन की राज्य की प्रमुखता में शामिल है कि वह किसी धर्म विशेष के विकास हेतु कार्य नहीं करेगा और न ही किसी तरह के धार्मिक हस्तक्षेप हेतु स्वयं को अग्रणी भूमिका में लायेगा. धर्मनिरपेक्षता का यही वास्तविक स्वरूप है. इसके बाद भी न केवल राजनैतिक व्यक्तित्व, राजनैतिक दल धर्म के द्वारा अपनी-अपनी राजनीति को चमकाने में लगे हैं बल्कि राज्य भी इसी तरह की गतिविधियों में लिप्त होने लगे हैं. ऐसी गतिविधियाँ चुनावों के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती हैं. पूर्व में हुए चुनावों में शाही इमाम द्वारा एक दल विशेष को मतदान करने की अपील राजनैतिक मंच से की गई तो एक प्रतिष्ठित पत्रिका के पत्रकार ने टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘समाजवाद और गणतंत्र की बात करने वाले लोग अगर इमाम के नाम से वोट पाना चाहेंगे तो हो सकता है कि कुछ लोग शंकराचार्य के नाम पर वोट माँगने लगें. फिर क्या, इस देश को शंकराचार्य और इमाम के बीच चुनाव करना होगा.’ यह सामान्य टिप्पणी नहीं है. आज बहुत तेजी के साथ यही हो रहा है. अब धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग खुलकर राजनैतिक दलों के लिए, राजनेताओं के लिए वोट माँगते हैं.


धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय होता है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी मानता है. इतिहास में भी किसी समय शासन का आधार धर्म हुआ करता था. तब धर्म के आधार पर व्यक्तियों के, जनता के क्रियाकलापों को संचालित किया जाता था, नियंत्रित किया जाता था. वर्तमान में संवैधानिक रूप से ऐसा न होने के बाद भी राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, अनुच्छेद 26 के द्वारा धार्मिक संस्थानों की स्थापना का अधिकार मिला है, अनुच्छेद 29 और 30 नागरिकों, विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों को मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं. इन संवैधानिक अधिकारों को राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं. पंजाब, जम्मू-कश्मीर, दक्षिण भारत के राज्य इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. यहाँ धर्म के नाम पर ही अलगाव की स्थिति एक पल में ही हिंसक रूप धारण कर लेती है. इसी अलगाववाद का लाभ उठाकर राजनैतिक दलों द्वारा मतदान को प्रभावित कर लिया जाता है. धार्मिकता के आधार पर प्रत्याशियों का चयन, धर्म के आधार पर मतदान, उसी आधार पर मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व के द्वारा नागरिकों की धार्मिक भावनाओं से खेला जाता है.


देखा जाये तो ये राजनैतिक दल राजनीति में धर्म का समावेश नहीं कर रहे हैं बल्कि धर्म में राजनीति का घालमेल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं. इसका खामियाजा समाज को, नागरिकों को भुगतना पड़ता है. जरा सी बात को हिन्दू, मुस्लिम अथवा किसी अन्य सम्प्रदाय से संदर्भित करके नागरिकों की भावनाओं को भड़का दिया जाता है. ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जबकि देश इस कारण से हिंसा की आग में जला. देश में वर्तमान दौर में अनेक धार्मिक, मजहबी प्रवृत्तियाँ राजनीति पर प्रभावी रूप से हावी हैं. इनका अराजक राजनैतिक रूप भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है. साम्प्रदायिकता के बढ़ते प्रभाव से देश की धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खतरा है. इस समस्या का समाधान देश के लिए आवश्यक है और इसे हम सभी नागरिकों को, राजनैतिक दलों को मिलकर ही निकालना होगा. इसके लिए सर्वोपरि एक काम हो और वो है राजनीति से धार्मिक उन्माद का समाप्त होना. 





 

26 अक्टूबर 2021

इंडोनेशिया के पूर्व राष्‍ट्रपति सुकर्णो की बेटी सुकमावती ने इस्‍लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपनाया

इंडोनेशिया के पूर्व राष्‍ट्रपति सुकर्णो की बेटी सुकमावती सुकर्णोपुत्री एक बड़े घटनाक्रम में इस्‍लाम धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म अपनाने जा रही हैं. बताया जा रहा है कि आज यानि मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021 को सुकमावती हिंदू धर्म अपनाएंगी. इसके लिए बाली में सुकर्णो सेंटर हेरिटेज एरिया में एक पारंपरिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. बाली में हिंदू धर्म से जुड़े कई मंदिर हैं और दुनियाभर से लोग इसे देखने आते हैं. इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर बड़ी संख्‍या में हिन्दू भी रहते हैं. यहाँ कई मंदिर बने हैं और रामायण का मंचन होता है. सुकमावती सुकर्णोपुत्री सुकर्णो की तीसरी बेटी हैं और पूर्व राष्ट्रपति मेगावती सुकर्णोपुत्री की छोटी बहन हैं. वह इंडोनेशियाई नेशनल पार्टी की संस्थापक रह चुकी हैं.


सीएनएन इंडोनेशिया की रिपोर्ट के मुताबिक सुकमावती के हिन्दू धर्म ग्रहण करने के पीछे  उनकी दादी इदा अयू नयोमान राई श्रीमबेन काफी हद तक वजह बनी हैं. मीडिया को सुकर्णोपुत्री के फैसले के बारे में बताते हुए उनके वकील ने कहा कि सुकर्णोपुत्री को हिन्दू धर्म का काफी ज्ञान है. वह हिंदू धर्मशास्त्र के सभी सिद्धांतों और अनुष्ठानों से भी अवगत हैं. सुकमावती अभी 70 साल की हैं और सुकर्णो की तीसरी बेटी हैं।


उनके हिन्दू धर्म ग्रहण करने की चर्चा इसलिए भी और है क्योंकि इंडोनेशिया में इस्‍लाम सबसे बड़ा धर्म है. यही नहीं दक्षिणपूर्वी एशियाई देश में दुनिया की सबसे ज्‍यादा मुस्लिम आबादी रहती है. सुकर्णोपुत्री बाली की यात्रा के दौरान अकसर हिंदू धार्मिक समारोहों में शामिल होती रही हैं. वह हिंदू धार्मिक हस्तियों से भी बातचीत करती हैं. अब शुद्धि वदानी नाम के कार्यक्रम में वह अपना धर्म परिवर्तन करेंगी. उनके रिश्तेदारों को भी इस फैसले से कोई आपत्ति नहीं है. रिश्तेदारों का कहना है कि सुकर्णोपुत्री काफी समय से हिंदू धर्म अपनाना चाह रही थीं.




13 सितंबर 2020

शिवलिंग को गुप्तांग बताना कुत्सित मानसिकता का परिचायक है

शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा क्यों?


अब सनातन संस्कृति के लोग खुद ही शिवलिंग को शिव भगवान का गुप्तांग समझने लगे हैं और दूसरे हिन्दुओं को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। ऐसी भ्रामक स्थिति में सही तथ्यों को जानना बहुत जरूरी है।

कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को बताया जाता है कि हिन्दू लोग लिंग और योनि की पूजा करते हैं। उन मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है और अपने छोटे-छोटे बच्चों को सनातन संस्कृति के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है, इसे देववाणी भी कहा जाता है। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है जबकी जननेंद्रिय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है। इस दृष्टि से शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। इसे ऐसे भी और सहज रूप में समझा जा सकता है कि पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते हैं वे बतायें कि क्या स्त्री लिंग के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए?

शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।


शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनि नहीं है। दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों यवनों  के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में मुगलों और षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम हिन्दी के एक शब्द सूत्र को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा, गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र इत्यादि। उसी प्रकार अर्थ शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब, आशय, अभिप्राय (मीनिंग) भी। बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है तथा इसे कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)

ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं, ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। विज्ञान का भी यही सिद्धांत है e=mc2

इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं। ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है। शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है। यह पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि दोनों समान हैं।

अब बात करते है योनि शब्द पर। मनुष्य योनि, पशु योनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतु योनि आदि। योनि शब्द का संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण अर्थ होता है। जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। कुछ धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है, इसीलिए वे योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकि हिन्दू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती हैं यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट, जानवर, मनुष्य आदि) हैं।

पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है, शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक, दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई। बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। इसका कुछ विकृत, गंदी मानसिकता वाले गोरे अंग्रेजों के गंदे दिमागों ने इसमें गुप्तांग की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली। इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण बहुत सारे अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया। आज भी बहुतायत हिन्दू इस दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ हैं।

हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित हैं जोकि हमारे पूर्वजों, संतों, ऋषियों-मुनियों तपस्वियों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अद्भुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर शोध कर रहा है।

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(एक सन्देश के रूप में प्राप्त इस जानकारी के वास्तविक लेखक की जानकारी नहीं है. इसे जानकारी की दृष्टि से भ्रमित लोगों के बीच प्रसारित किया जाए.)

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 मार्च 2019

कालखंड के विधान न मानना ही कष्ट का कारण

आसपास नजर दौड़ाओ तो परेशान लोगों की बहुतायत संख्या दिखाई पड़ती है. कोई अपनी बीमारी से परेशान है. कोई अपने परिजनों की बीमारी से परेशान है. कोई नौकरी न मिलने से परेशान हो रहा है. कोई अपने व्यवसाय में लाभ न होने को लेकर परेशान है. कोई बच्चों के विवाह के लिए परेशान है. कोई संतान न होने के कारण परेशान है. कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में परेशान लोग दिखाई दे ही जायेंगे. ऐसे परेशान लोगों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया जाये तो जानकारी मिलेगी कि ऐसे लोग ज्यादा परेशान हैं जो सात्विक प्रवृत्ति के हैं, जिनका ईश्वर पर, ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास है. जिनके दिन का एक बहुत बड़ा भाग भगवान की भक्ति में बीतता है. जिनके घूमने-फिरने का बहुत बड़ा समय धार्मिक स्थलों की यात्राओं में व्यतीत होता है. जिनकी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक कृत्यों को संपन्न करने में व्यय होता है. ऐसे परेशान लोगों का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि ऐसे लोगों ने अपने जीवन में शायद ही किसी के लिए बुरा सोचा हो. शायद ही इन्होने अपने कृत्यों में कभी कुकृत्य जैसा कोई आचरण किया हो. इसके बाद भी सर्वाधिक कष्ट ऐसे लोगों के हिस्से में ही आते हैं. आखिर क्या कारण है इसका? क्या कारण हो सकता है, ऐसा होने के पीछे? 



संभव है कि इसे हँसी में निकाल दिया जाये क्योंकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं. संभव है कि इसे नास्तिकता भरा कदम बताया जाये क्योंकि इसके पीछे किसी तरह की धार्मिकता का आधार काम नहीं करता है. इसके बाद भी हमारा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों के पीछे, उसके सफल-असफल होने के पीछे, उसकी ख़ुशी-दुःख के पीछे सम्बंधित कालखंड, समय, परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ होता है. बिना इसके किसी भी व्यक्ति का विकास-गति प्राप्त करना संभव नहीं दिखता है. यदि एक पल को इसे सत्य मान लिया जाये तो साफ़ है कि इस कलियुग में उसी व्यक्ति को कष्ट अधिक मिलने हैं जो कलियुग के अनुसार अपने कृत्यों का सञ्चालन नहीं करेगा. जो भी व्यक्ति कलियुग के नियमों-कानूनों का अनुपालन नहीं करेगा उसे कष्ट भोगने होंगे. भगवान जैसी शक्ति यदि वाकई है तो वह हमेशा उसी को दंड देने का काम करती है जो उसके बने-बनाये विधानों का अनुपालन नहीं करता है. ऐसे में सुखी रहने के लिए व्यक्ति को कलियुग के विधानों का अनुपालन करना अनिवार्य है. यदि वह ऐसा नहीं करता है तो कष्ट का भागी बनता है.

इसे महज मजाक का विषय न माना जाये वरन अपने आसपास भी देखा जाये तो बहुत हद तक सत्यता दिखाई पड़ने लगेगी. ऐसे लोगों को बहुत कम कष्ट में देखा होगा जो किसी न किसी तरह के दंद-फंद का काम करते हैं. झूठ बोलने वालों को, भ्रष्टाचार करने वालों को, रिश्वतखोरी करने वालों को कष्ट से ज्यादा सुख भोगते देखा जाता है. आये दिन सड़क दुर्घटना की खबरें पढ़ते हैं, तमाम निर्दोषों के , मासूमों के मारे जाने की खबरें सामने आती हैं मगर शायद ही कभी एक-दो दुर्घटनाएं ऐसी सामने आती हों जिनमें कोई अत्याचारी मारा गया हो, कोई दुर्दांत मारा गया हो. ऐसे में क्या ये माना जाये कि सभी को अत्याचार करना चाहिए? सभी को भ्रष्ट हो जाना चाहिए? सभी को कुकृत्य करने शुरू कर देने चाहिए? एक पल को इसके बारे में हाँ कहना अवश्य ही अचंभित करेगा किन्तु यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक संतृप्तता की स्थिति नहीं आती तब तक सम्बंधित विषय में प्रक्रिया चलती रहती है. कुछ ऐसा ही समाज में अपराधों को लेकर हो रहा है. जब तक समाज में कुछ बुरे लोग होंगे, कुछ भले लोग होंगे तब तक अपराध की प्रक्रिया चलती रहेगी. या तो समाज में सभी लोग भले बन जाएँ या फिर सभी लोग बुरे बन जाएँ तो संतृप्तता की स्थिति आने से सुधार दिखाई देने लगेगा. ऐसा भी नहीं कि बिना हत्या किये किसी के काम न बनेंगे. ऐसा भी नहीं कि यदि रिश्वत नहीं ली जाएगी तो काम नहीं बनेगा. यह भी नहीं कि अपराध नहीं किया जायेगा तो समाज नहीं चलेगा. यह सब होगा मगर जब शक्ति-संतुलन की स्थिति समाज में बनती है तो अपराध कम होते हैं या कहें कि न के बराबर होते हैं. इसी शक्ति-संतुलन की आज आवश्यकता है और वह तभी हो सकेगा जब कि इन्सान खुद को भगवान भक्ति से बाहर निकाले. ईश्वरीय शक्ति यदि एक तरफ इन्सान को ताकत देती है तो उसे कमजोर भी बनाती है. यही कमजोरी किसी भी भले इन्सान को हमेशा परेशानी में रखती है, दुखी रखती है.

ऐसा कहने का अर्थ कदापि यह नहीं कि इन्सान सिर्फ और सिर्फ अत्याचार करने पे उतर आये, पूरी तरह से कुकृत्य करने लगे. ऐसा कहने का आशय महज इतना है कि इंसानों को अपने समय, शक्ति, ऊर्जा को अनावश्यक रूप से कथित भगवन-भक्ति में खर्च करके सार्थक कार्यों की तरफ लगाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि ईश्वर भी इन्सान की बनाई कृति है जो उसने अपने गुण-दोषों के विवेचन के लिए स्थापित की है. यहाँ ईश्वर के सम्बन्ध में एक बात ध्यान रखना चाहिए कि भगवान की भक्ति करने के द्वारा इन्सान सिर्फ वही चीजें माँगता है जिनको पूरा करना कहीं न कहीं उसी इन्सान के हाथों में होता है. कोई भी इन्सान अपनी परेशानियाँ का निस्तारण चाहता है. वह परीक्षा में पास होना चाहता है, नौकरी चाहता है, संतान चाहता है, बीमारी से मुक्ति चाहता है, व्यापार में लाभ चाहता है, विवाह चाहता है, तरक्की चाहता है. इनके लिए वह प्रयास भी करता रहता है और भगवान की भक्ति भी करता रहता है. ऐसे में उसकी कामना पूरी होने का श्रेय वह भगवान को देता हुआ उसके प्रति कृतज्ञ रहता है. क्या कभी किसी इन्सान ने अपने चार हाथ हो जाने की कामना भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने भरी दोपहरी में रात हो जाने की माँग भगवान से की है? क्या किसी इन्सान ने गर्मी के मौसम में सर्दी की आकांक्षा भगवान से की है? सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई नहीं दिखता, पर एक पल को ऐसा माँगा भी जाये भगवान से तो क्या वह पूरा हो जायेगा? कितनी भी कठिन तपस्या हो, यज्ञ-हवन किये जाएँ मगर ऐसा हो पाना संभव नहीं क्योंकि यह एक तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया है. इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया से भटकने के कारण इन्सान दुखों का अनुभव करता है. ऐसे में इन्सान को अपने कृत्यों पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ने कि आवश्यकता है. भगवान भक्ति कलियुग में इन्सान को राक्षस बनाएगी, दुष्ट साबित करेगी, अत्याचारी साबित करेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करते रहने के कारण इन्सान अपने कार्यों के प्रति सजग-सचेत-सक्रिय नहीं रहता है.
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(यह आलेख पूर्वाग्रही, आँख बंद करके भगवान भक्ति करने वाले न पढ़ें.)

15 सितंबर 2018

झाँसी रानी का विवाह-स्थल


बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कण-कण में ऐतिहासिकता, सांस्कृतिकता, पौराणिकता, दिव्यता, भव्यता समाहित है. झाँसी के गणेश बाजार स्थित महाराष्ट्र गणेश मंदिर में भी इनका समावेश देखने को मिलता है. भगवान गणेश को समर्पित इस मंदिर का अपना ही ऐतिहासिक महत्त्व है. इसी मंदिर में सन 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव का विवाह रानी लक्ष्मीबाई के साथ संपन्न हुआ था. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को मणिकर्णिका के नाम से जाना जाता था. विवाह पश्चात् औपचारिक रूप से उन्हें लक्ष्मीबाई नाम दिया गया. यह मंदिर झाँसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित है. इस कारण इसे किले का, निवासियों का, शहर का रक्षक माना जाता है.


इस मंदिर की वास्तुकला के आधार पर लगाया जाता है कि इसका निर्माण सन 1764 के आसपास हुआ होगा. सन 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई से बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने इस मंदिर को भी ध्वस्त करने का प्रयास किया किन्तु वे इसमें पूरी तरह से सफल न हो सके. इसके बाद भी उन्होंने मंदिर के एक बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया था. ऐसा बताया जाता है कि कतिपय आर्थिक कारणों से मंदिर को गिरवी रखना पड़ा था. बाद में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर गोविन्द आत्माराव ढवले के प्रयासों से सन 1917 में इस मंदिर को मुक्त करवाया गया. उसी के बाद इसकी देखरेख के लिए महाराष्ट्र गणेश मंदिर समिति की स्थापना 22 नवम्बर 1917 को की गई. सार्वजनिक प्रयासों और सहायता से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया और इसकी अनाधिकृत रूप से कब्जाई संपत्ति को वापस लिए गया. दस साल बाद 05 अगस्त 1927 को महाराष्ट्र गणेश समिति को नियमानुसार पंजीकृत करवाया गया. इस सम्बन्ध में एक शिलालेख वहाँ स्थित है.


इस मंदिर के प्रांगण में भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के साथ-साथ रिद्धि एवं सिद्धि की भी प्रतिमाएँ स्थापित हैं. मराठी समुदाय के अलावा आमजनमानस में भी इस मंदिर के प्रति आस्था है. राजा और रानी दोनों के मराठी होने के कारण इस मंदिर को महाराष्ट्र गणेश मंदिर के नाम से जाना गया, आज भी यह मंदिर इसी नाम से आम नागरिकों में जाना जाता है.


मंदिर का अंदरूनी हिस्सा 



रिद्धि, सिद्धि संग विराजे श्रीगणेश 

मंदिर प्रांगण 

प्रवेश द्वार 
एक प्रवेश द्वार ये भी 


04 जुलाई 2018

साइक्लॉनिक हिन्दू को समझना शेष है अभी


आज, 4 जुलाई, स्वामी विवेकानन्द की पुण्यतिथि. वे अपने ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्द हैं. उन्होंने अपने अल्प जीवन में जिस तरह का विराट स्वरूप प्राप्त कर लिया था, वैसा विरले ही कर पाते हैं. उनका आत्मविश्वास, उनकी संयमित जीवनशैली के कारण ही यह सब संभव हो सका था. यही कारण है कि उन्होंने अंतिम दिन भी अपनी दिनचर्या को बदला नहीं. उनके शिष्यों के अनुसार उन्होंने अन्तिम दिन (4 जुलाई 1902) को भी प्रात: ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली. बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनको मुखाग्नि दी गई. इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का भी अन्तिम संस्कार किया गया था. स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. नरेंद्र पर अपने माता-पिता के धार्मिक, प्रगतिशील तथा तर्कसंगत व्यक्तित्व का प्रभाव रहा, जिसने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार प्रदान किया.


वे 25 वर्ष की अवस्था में ही संन्यास धारण करके पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा पर निकल गए. सन 1893 में शिकागो (अमरीका) में हो रही विश्व धर्म परिषद् में वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे. यूरोप-अमेरिका के लोग पराधीन भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते थे. उन लोगों ने प्रयास किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का अवसर न मिले. बाद में एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें बहुत कम समय दिया गया और इसी अल्प समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी विद्वानों को चकित कर दिया. इसके बाद तो पूरा अमेरिका उनका जबरदस्त प्रशंसक बन गया और वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया. उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया था. स्वामी विवेकानन्द का भारतीय दर्शन की शक्ति पर दृढ़ विश्वास था. उनका मानना था कि आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा. स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं को गरीबों का सेवक माना और देश के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का सदा प्रयत्न किया.

महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं. 

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - शिव!यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.

उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी.


आज उनकी पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन के अन्तिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय उनके द्वारा उच्चारित कथन स्मरण हो आता है कि एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है. यह कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है क्योंकि उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था. उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, में इसकी प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई भी देती है.

30 अप्रैल 2018

बौद्ध धर्म के वर्तमान परिदृश्य में उसके समर्थक पुनर्मूल्यांकन करें


            गौतम बुद्ध का आविर्भाव भारतीय इतिहास की एक विशिष्ट घटना समझी जा सकती है। वे अपने समय के महापुरुष अथवा तीर्थंकर माने जाते हैं न कि अलौकिक अवतार, जैसा कि उनकी भक्ति में लीन बौद्धों ने उन्हें समझा और समाज को समझाया। गौतम बुद्ध को कालान्तर में महिमामंडित करने की दृष्टि से उनके उपदेशों को, संदेशों को प्रमुखता देने के अतिरिक्त स्वयं गौतम बुद्ध को भी अलौकिक तत्त्व के रूप में प्रतिस्थापित करने के प्रयास किये जाने लगे। बौद्ध मतावलम्बियों द्वारा किये गये हैं जिनमें बुद्ध को अलौकिक रूप में दर्शाने का प्रयास किया गया है। बुद्ध की अलौकिकता को दर्शाते हुए बताया गया है कि सुजाता नामक कुलीन युवती द्वारा प्रदान उत्तम अन्न की भिक्षा ग्रहण करके बोधिसत्त्व पीपल के पेड़ (जिसे बोधिवृक्ष कहा गया) के नीचे जा बैठे। यहाँ रात्रि के प्रथम याम में उन्होंने अपने पूर्वजन्मों की स्मृतिरूपी विद्या प्राप्त की। रात्रि के मध्य याम में उन्होंने दिव्यचक्षु प्राप्त किये और इसके द्वारा समस्त लोक को अपने कर्मों का फल अनुभव करते देखा। बौद्ध परम्परा के अनुसार बुद्ध के अनौत्सुक को देखकर ब्रह्मा उनके सम्मुख प्रकट हुए और कहा-धर्ममय प्रासाद से शोकावतीर्ण जनता को देखिये और धर्म का उपदेश कीजिये, जानने-समझने वाले भी होंगे। ब्रह्मा की याचना से बुद्ध ने जीवों पर करुणा कर बुद्ध-चक्षु से लोक का देखा और पाया कि जैसा सरसी (तलैया) में कुछ कमल जल से अनुद्गत, कुछ समोदक और कुछ जल से अभ्युद्गत होते हैं, ऐसे ही जीव भी संसार में आध्यात्मिक विकास की नाना अवस्थाओं में है। बौद्ध धर्मावलम्बी भी इस घटना की व्याख्या अलग-अलग मतानुसार करते दिखते हैं। एक मत के अनुसार बुद्ध को देवता (ब्रह्मा) ने संसारियों का उत्पल सादृश्य दिखाया और आध्यात्मिक विकास के धर्म प्रचार को प्रेरित किया। एक अन्य मत मानता है कि बुद्ध ने निश्चय किया कि वे अतक्र्य निर्वाण के विषय में मौन धारण करेंगे और केवल मार्ग की देशना करेंगे।


            अब यदि उक्त चन्द घटनाओं के आलोक में बुद्ध और बौद्ध धर्म के आविर्भाव के मूल को जानने का प्रयास किया जाये तो कहीं न कहीं विभ्रम की स्थिति पैदा होती है। ज़रा-रोगी-मृत्यु को देखकर सांसारिक मायामोह से विरक्ति का अनुभव कर ज्ञान की खोज में निकले राजुकमार गौतम को सम्बोधि स्वतः ही बिना गुरु के प्राप्त होती है। ब्राह्मणीय कर्मकाण्डों, पुरोहितों के दुष्चक्र में फँसे समाज को अपने ज्ञान, वचनों के द्वारा मार्ग दिखाने वाले गौतम बुद्ध के संशय को भी किसी लौकिक प्राणी ने नहीं अपितु स्वयं ब्रह्मा ने दूर करते हुए उनसे समाज को धर्म सम्बन्धी उपदेश देने की याचना की थी। बुद्ध के प्रवचनों, विचारों, उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के आधार पर यह तो आसानी से कहा जा सकता है कि गौतम बुद्ध पूर्णतः बुद्धिवादी थे। वे किसी भी तथ्य को विश्वास की कच्ची नींव पर रखना नहीं चाहते थे, प्रत्युत तर्क-बुद्धि की कसौटी पर सब तत्त्वों को कसना उनकी शिक्षा का प्रधान उद्देश्य था। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ऐसे पूर्ण बुद्धिवादी व्यक्ति को मात्र तपस्या के आधार पर-बिना किसी गुरु के द्वारा-एक रात्रि में बोधज्ञान प्राप्त होना; संसार को उपदेश देने, न देने की संशयात्मक स्थिति से बाहर लाने का कार्य ब्रह्मा जैसी अलौकिक शक्ति द्वारा करना कितना तर्कसंगत प्रतीत होता है?

            कहा जाता है कि जागतिक दुःखों से व्यथित होकर गौतम बुद्ध ने अभिनिष्क्रमण करके प्रव्रज्या ग्रहण की थी। गया के बोधि-वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने प्रातिभज्ञानमय अभिचिन्तन से अज्ञान, वेदना, तृष्णा, उपादान, जन्म, ज़रा, मरण, शोक आदि के रहस्य को जानकर उन्हें निष्प्रभावी करने की पद्धति का आविष्कार किया था। यदि इस पद्धति और इसकी क्रियाविधि पर विचार किया जाये तो बुद्ध ने न तो जनम-मरण के चक्र से छुटकारा पाने का कोई उपाय स्थापित किया था, न ही ज़रा, शोक, रोग से मुक्ति का कोई सूत्र निर्मित किया था और न ही अपने उपदेशों, धर्म सम्बन्धी बौद्धिक विचारों के द्वारा भी ऐसी किसी पद्धति की ओर रेखांकित किया था। उन्होंने शील अर्थात् सदाचार को जीवन में उतारने पर बल दिया था। आज हम जिन पंचशील सिद्धान्तों की वैश्विक स्तर पर चर्चा करते हैं, उन पंचशील सिद्धान्तों को महात्मा बुद्ध ने सर्वसाधारण के लिए सुनिश्चित किया था। ये पंचशील सिद्धान्त हैं- (1) अहिंसा, (2) अस्तेय (चोरी न करना), (3) ब्रह्मचर्य (यौन दुराचार से दूर रहना), (4) सत्य (झूठ न बोलना), (5) नशीली वस्तुओं का सेवन न करना। महात्मा बुद्ध द्वारा वैचारिक एवं व्यावहारिक धरातल पर मानव-कल्याण को समर्पित ये पंचशील कहीं न कहीं उस सनातन संस्कृति, हिन्दू-धर्म का ही भाग रहे जिसकी एक शाखा के रूप में एक नई धार्मिक शाखा, एक नये धर्म बौद्ध का सूत्रपात भारतभूमि पर हो रहा था।

            वर्ण-व्यवस्था के कारण छुआछूत का दंश सह रहे लोगों को अपना सा लगने वाला धर्म प्राप्त हो चुका था। सामाजिक परिवर्तनों के प्रति सचेत लोगों को भी कर्मकाण्ड, ब्राह्मणवाद, पुरोहित कर्म से इतर नवीन संकल्पना इस धर्म में दिखलाई दे रही थी। इसके बाद भी जो स्वरूप बौद्ध धर्म का निखरकर आना चाहिए था कदाचित् वैसा नहीं हुआ। वर्तमान में यह अपनी जन्मभूमि से लगभग विलुप्त सा होकर दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के कुछ देशों में ही जीवित है। बौद्ध धर्म की परिणति और उसके हृास के लिए एक ओर आक्रांता शासक जिम्मेवार रहे तो दूसरी ओर स्वयं बौद्ध समर्थकों, भिक्षुओं को भी इसका उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। महात्मा बुद्ध द्वारा अपने श्रोताओं की स्थिति के अनुसार जो भेद हीनयान एवं महायान के रूप में किये गये, कालान्तर में यही भेद बौद्ध धर्म के पराभव का कारक भी बने।

            हीनयान और महायान का यह विभेद धार्मिक क्रियाकलापों, भाषा, सम्प्रदाय, दर्शन आदि में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा। शनैः-शनैः यह विभेद अपना विस्तारक रूप धारण करता रहा जो अन्ततः बौद्ध धर्म के हृास का एक कारक समझा जा सकता है। इस विभेद ने इतना विस्तार ले लिया कि हीनयान और महायान महात्मा बुद्ध को भी अलग-अलग रूपों में देखने लगे। हीनयान सम्प्रदाय के लोग बुद्ध को केवल एक महान व्यक्ति के रूप में स्वीकारते हैं जबकि महायान के लोग बुद्ध की उपासना देवतुल्य रूप में करने लगे। इसके अतिरिक्त हीनयान सम्प्रदाय के लोग बोधिसत्त्व में विश्वास न करने वाले, मूर्ति पूजा न करने वाले, केवल अपने निर्वाण की चिन्ता करने वाले, निर्वाण प्राप्ति के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता वाले माने गये। इसके विपरीत महायान बोधिसत्त्व को स्वीकारते हैं, बुद्ध की मूर्ति की उपासना करना, अपने साथ-साथ अपने साथियों के निर्वाण की भी चिन्ता करना, निर्वाण के लिए भिक्षु बनने की अनिवार्यता न मानने वाले रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध जिस दर्शन, जिन विचारों, जिस जीवनशैली, आचार-विचार के द्वारा बौद्ध धर्म को सम्पूर्ण समाज पर प्रकीर्णित करना चाहते थे, वह बौद्ध धर्म अनुयायियों के आपसी विभेद के चलते सम्भव नहीं हो सका।

            यदि धार्मिक संकल्पना को देखें तो बौद्ध दर्शन ने कहीं न कहीं उस विचारधारा को एक नये सिरे से प्रचारित-प्रसारित करना शुरू किया जो किसी रूप में हिन्दू-धर्म का अंग हुआ करती थी। बुद्ध के पंचशील तो हिन्दू धर्म-दर्शन का ही भाग कहे जा सकते हैं, यदि बौद्ध धर्म और हिन्दू-धर्म में कोई विशेष अन्तर दिख रहा था तो वह था मूर्ति पूजा का विरोध, कर्मकाण्डों का विरोध, ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद का विरोध, वर्ण-व्यवस्था का विरोध। जैसा कि बहुलता में होता आया है कि किसी भी धर्म के विकास की अनन्तर यात्रा में उसमें कर्मकाण्ड सम्बन्धी दोष, सामाजिक बुराइयाँ परिलक्षित होने लगती हैं, कुछ ऐसा ही बौद्ध धर्म के साथ भी हुआ। कर्मकाण्डों की शुरुआत होने लगी, संघ में प्रवेश के त्रिरत्नों (बुद्ध, धर्म, संघ) के सुनियोजन में कमी आने लगी (यद्यपि यह व्यवस्था आज भी अपनी महत्ता स्थापित किये है) संघ व्याभिचार का केन्द्र बनने लगे, आमजन की भाषा, पालि के स्थान पर विद्वानों की संस्कृत भाषा को अपनाया जाने लगा, तान्त्रिक क्रियाओं का समावेश होने लगा। तत्कालीन समाज ब्राह्मणवाद, वर्णव्यवस्था आदि से त्रस्त होकर ही व्यक्तित्व की स्वतन्त्रता हेतु, वैचारिक स्वतन्त्रता हेतु, मध्यम मार्ग अपनाने हेतु ही बौद्ध धर्म की शरण में आया था और प्रकारान्त में उसे वही बुराइयाँ संघ में, बौद्ध धर्म-दर्शन में दिखाई दी तो वह इससे छिटक कर अलग हो गया।

            इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-धर्म की पुनस्र्थापना, राजकीय प्रश्रय में कमी आना, मूल सिद्धान्तों में परिवर्तन होना, राजपूतों का उत्कर्ष, विदेशियों के आक्रमण भी बौद्ध धर्म के हृास का कारण बने। यह स्थिति विचार करने योग्य है कि जिस तेजी से बौद्ध धर्म का विकास हुआ वह उसी तेजी से समाप्ति की ओर भी गया। सैद्धान्तिक कारण कुछ भी रहे हों पर व्यावहारिकता में देखा जाये तो कालान्तर में बौद्ध धर्म अपनी विकासात्मक प्रक्रिया से इतर हिन्दू-धर्म के, उसके क्रियाकलापों, उसके दर्शन के विरोधात्मक रूप में कार्य करने लगा। बौद्ध धर्म चिन्तकों का निशाना ब्राह्मण वर्ग या कहें कि हिन्दू सवर्ण वर्ग बनने लगा। दया, करुणा, मानव-कल्याण का विचार देते-देते बौद्ध धर्मावलम्बी हिन्दू उच्च वर्ग को कोसने का कार्य करने लगे, इसके मूल में वे वर्ण-व्यवस्था विरोधी लोग थे जो हिन्दू-धर्म में निम्न वर्ण से आते थे। इस वर्ग ने बौद्ध धर्म में स्वयं को वर्ण-व्यवस्था से मुक्त पाकर स्वविकास, बौद्धिक विकास, वैचारिक विकास करने के स्थान पर हिन्दू उच्च वर्ग पर, ब्राह्मण वर्ग पर दोषारोपण करने का कार्य किया। इससे वह उच्च वर्ग बौद्ध धर्म से जुड़ने में असहज महसूस करने लगा हो जो बौद्ध धर्म को, दर्शन को मानव-कल्याण हेतु स्वीकारता था; वे बौद्ध मतावलम्बी पुनः हिन्दू धर्मोन्मुख हुए जो ब्राह्मण कर्मकाण्ड, पुरोहिती के चलते बौद्ध धर्म में आये।

            वर्तमान स्थिति यह है कि स्वयं बौद्ध धर्मावलम्बियों में इसको लेकर विवाद बना हुआ है कि महात्मा बुद्ध की असली विरासत किसके पास है? हीनयान और महायान में विभक्त हुई विभ्रम की स्थिति ने बौद्ध धर्म को, दर्शन को एक विचारधारा बना दिया। इस विचारधारा को जो जैसा चाहे वैसा तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है। गौतम बुद्ध के पंचशील सिद्धान्त को सार्वभौम समझकर बौद्ध धर्म को सर्वोच्च धार्मिक सत्ता पर प्रतिस्थापित करने के प्रयास में अवसरवादी नजरिया भी सामने आने लगा। इससे लाभान्वित लोगों ने स्वार्थपरक सोच को अपना कर बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि की प्रार्थना को भुला दिया। वहीं दूसरी ओर बौद्ध धर्म से विचलित, अलाभकारी लोगों ने बौद्ध दर्शन की बौद्धिकता को अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता से छिन्न-भिन्न करना प्रारम्भ कर दिया। किसी ने सिद्धार्थ के गृह-त्याग को ज्ञान की खोज बताया तो किसी ने उनकी पलायनवादी प्रकृति; किसी ने बुद्ध को शान्ति, अहिंसा का प्रचारक बताया तो किसी ने धार्मिक आन्दोलन का सूत्रधार बताया; कोई आज भी बुद्ध का नाम लेकर शान्ति, अहिंसा, प्रेम का सपना देखता है तो कोई बुद्ध को मनुवादी व्यवस्था को कोसने का हथियार बनाता है; किसी के लिए बुद्ध निर्वाण प्राप्ति का मार्ग हैं तो किसी के लिए सत्ता पाने का माध्यम। इस तरह नहीं लगता कि लगभग मृतप्राय हो चुके बौद्ध धर्म को पुनर्जीवन प्राप्त हो सकेगा। बौद्ध धर्म के आविर्भाव का उद्देश्य कदापि किसी धर्म का विरोध करना नहीं था, किसी व्यवस्था का विरोध करना नहीं था। महात्मा बुद्ध ने एक महापुरुष के रूप में समाज को दिशा देने का कार्य किया था, अपने उपदेशों, वचनों के द्वारा वे समाज में फैली विषमताओं को, विसंगतियों को, भेदभाव को मिटाना चाहते थे। ऐसा कर पाने में वे कितने सफल रहे यह एक अलग विषय हो सकता है किन्तु बौद्ध धर्म के आविर्भाव से लेकर वर्तमान तक की यात्रा से यह तो स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध के उपदेशों को, विचारों को स्वयं उन्हीं के अनुयायियों द्वारा सकारात्मक रूप से आत्मसात् नहीं किया गया। देखा जाये तो वर्तमान संदर्भों में समाज को शान्ति, प्रेम, अहिंसा की आवश्यकता है, वह चाहे किसी भी धर्म के द्वारा प्राप्त हो। यदि बौद्ध धर्मावलम्बियों को ऐसा लगता है कि आज भी समाज को, विश्व को प्रेम, अहिंसा, दया, करुणा का संदेश देने के लिए बौद्ध धर्म ही एकमात्र विकल्प है तो इन धर्मानुयायियों को बौद्ध धर्म में व्याप्त हो चुकी उन बुराइयों को दूर करना होगा जिनके कारण बौद्ध धर्म रसातल की ओर गया। महात्मा बुद्ध को भगवान से इतर महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर उनके उपदेशों, विचारों को समाज के बीच प्रतिस्थापित करना होगा क्योंकि समाज का आदर्श कोई महापुरुष तो हो सकता है, ईश्वर कदापि नहीं। यदि बौद्ध धर्मावलम्बी इस धर्म को पुनर्जीवन प्रदान करना चाहते हैं; उसके दर्शन का प्रचार-प्रसार चाहते हैं; समाज में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता स्थापित करना चाहते हैं तो समाज में पुनः बुद्ध और बौद्ध दर्शन को, उसके ज्ञान को, उसकी शिक्षाओं को केन्द्रबिन्दु बनाना होगा किन्तु उससे पूर्व उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

30 जनवरी 2016

धार्मिक समानता का नाटक


एक बार फिर स्त्री और मंदिर विवादों के केन्द्र में है. अबकी शनि देव पर तेल चढ़ाने को लेकर बवाल मचा हुआ है. ये समझ से परे है कि आखिर ऐसी जागरूक महिलाएँ धर्म के नाम पर ऐसी आज़ादी की माँग किसके लिए और क्यों कर रही हैं? एक तरफ यही जागरूक और प्रगतिशील महिलाएँ धर्म को महिलाओं के लिए बंधन, उनको गुलाम बनाने वाला बताती हैं और दूसरी तरफ यही महिलाएँ सड़कों पर आन्दोलन करने में लगी हुई हैं. समूचे परिदृश्य को देखकर बहुत कुछ स्पष्ट होता है कि ऐसी महिलाओं का उद्देश्य समाज की अन्य स्त्रियों को शनिदेव की पूजा करने, उन पर तेल चढ़ाने की आज़ादी दिलवाना नहीं है वरन किसी न किसी रूप में अपने आपको मीडिया में स्थापित किये रहना ही है. यही वे महिलाएं हैं जो कुछ समय पूर्व किस ऑफ़ लव का आन्दोलन छेड़े हुए थीं, फिर उसके बाद यही महिलाएं हैप्पी टू ब्लीड के समर्थन में उतरी और अब धर्म के नाम पर झंडा उठाये घूम रही हैं.
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सड़क पर आंदोलित इन महिलाओं के हिसाब से औरत को पूरी आज़ादी चाहिए है. सच भी है, किसी भी इन्सान को महज इस कारण आज़ादी से वंचित नहीं किया जा सकता है कि वो स्त्री है अथवा पुरुष है. यदि महिलाओं की वास्तविक आज़ादी शनिदेव को तेल चढ़ाने से ही होती है तो फिर धार्मिकता के नाम पर महिलाओं को गुलाम बनाये जाने का आरोप इस समाज पर क्यों गढ़ा जाता है? दरअसल ये विरोध न तो धर्म के लिए है, न महिलाओं की आज़ादी के लिए है वरन ये विरोध केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध है, हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. यहाँ एक बात विशेष रूप से समझने वाली है कि जिन महिलाओं द्वारा समाज में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की माँग की जाती हो, ट्रेन में अलग महिला कोच की माँग की जाती हो, स्कूल, बैंक, बाज़ार आदि की अलग माँग रखी जाती हो वे धर्म के नाम पर ही समानता क्यों चाहती हैं? समानता की माँग के बाद भी देह की विशिष्टता को बनाये रखकर ऐसी प्रगतिशेल महिलाएं खुद को ही आरोपी बना रही हैं, अपने आन्दोलन को, अपनी माँग को कटघरे में खड़ा कर रही हैं.
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देह को विशिष्ट बनाकर उसको भेदभाव का अंग बनाकर पुरुषों को आरोपी बना देना सहज है और फिर इसी के उलट समानता की बात करना एक तरह का छद्म दिखाता है. परीक्षाओं के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा किसी छात्रा की तलाशी महज उसके स्त्री होने के कारण नहीं हो सकती; सड़क चलते किसी स्त्री की देह का अनायास स्पर्श हो जाना भी पुरुष को बलात्कारी बना देता है; राह चलते किसी स्त्री को देख लेना भी कानूनी जुर्म हो गया है, तब समानता के लिए एकमात्र स्थान मंदिर ही बचता है. ऐसी जागरूक महिलाओं को धर्म के साथ-साथ अन्य स्थानों पर जागरूकता, समानता लाने का काम करना चाहिए. ऐसा नहीं कि महिलाओं का प्रवेश मंदिर में नहीं होना चाहिए; ऐसा भी नहीं कि महिलाओं द्वारा किसी देव विशेष के पूजन कर लेने से समाज में प्रलय आ जाएगी किन्तु महज प्रचार की, आत्ममुग्धता की दृष्टि से किये ऐसा जाने की मंशा को अवश्य निषेध किया जाना चाहिए. एक तरफ मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलित होना दूसरी तरफ विरोध के लिए खुद को दैहिक रूप से स्वतंत्र बना देना कहीं न कहीं आंदोलनरत महिलाओं के दोहरेपन के रवैये को रेखांकित करता है.
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समाज में किसी भी गलत कार्य का विरोध होना चाहिए, किसी भी अमान्य स्थिति के विरोध में आन्दोलन होना चाहिए मगर महज विरोध की राजनीति के लिए विरोध नितांत भ्रम की स्थिति है, सर्वथा गलत है. इन्हीं जागरूक महिलाओं द्वारा उन महिलाओं के पक्ष में अभियान क्यों नहीं छेड़ा जाता जो आज भी खुले में शौच को मजबूर हैं; जो असमय अपनी शिक्षा को छोड़ दिए जाने को बाध्य कर दी जाती हैं; जो कम उम्र में कई-कई बच्चों की माँ बना दी जाती हैं; जो आज भी दहेज़ के नाम पर आये दिन प्रताड़ित की जा रही हैं; जो आज भी कार्यक्षेत्रों में अपने सहकर्मियों द्वारा शोषित की जा रही हैं; जो आज भी लोकतान्त्रिक रूप से प्रतिनिधि बनने के बाद भी पारिवारिक पुरुषों की गुलाम बनी हुई हैं; जो समान कार्य करने के बाद भी पुरुषों के समान अवसरों से वंचित रह जा रही हैं.

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