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21 जून 2019

एक दिनी योग की औपचारिकता से क्या लाभ


बड़े ही जोर-शोर से योग दिवस मनाया गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की ये व्यक्तिगत सफलता कही जाएगी कि उन्होंने अपने प्रयासों से भारतीय योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करवा दिया. संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से इस सम्बन्ध में प्रतिवर्ष 21 जून को योग दिवस मनाये जाने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित किया गया. इसके बाद देश में सरकारी, गैर-सरकारी रूप से योग दिवस मनाये जाने के कदम जोर-शोर से उठाये जाने लगे. ऐसे लोग योग दिवस के लिए तत्पर रहने लगे जो पूरे साल एक पल को भी योग से अपना सम्बन्ध नहीं रखते रहे हैं. ऐसे योग से क्या फायदा? 


इस वर्ष भी सरकारी स्तर पर आदेश जारी किये गए जिसमें सभी को योग के लिए अपने-अपने संस्थानों में एकत्र होना था. क्या एक जगह एकत्र होने के बाद किये गए योग से वाकई योग को प्रोत्साहन मिलेगा? जिस व्यक्ति का पूरे साल योग से कोई लेना-देना न रहता हो वो एक दिन योग की कोई गतिविधि करके योग का क्या लाभ ले सकेगा? बेहतर हो कि योग से सम्बंधित नौटंकी करने के उन्हीं को योग के लिए आमंत्रित किया जाया करे जो वाकई योग के प्रति सचेत रहते हैं.

03 जनवरी 2018

योग निरोग के लिए न कि भोग के लिए

इधर बहुत सालों से देश में योगा–योगा की धूम मची हुई है. ऐसी धूम तो उस समय धूम फिल्मों की भी नहीं मची थी. जिसे देखो वो योगा-योगा करते घूम रहा है. आश्चर्य तो तब होता है जबकि हमारे देश का योग विदेश की यात्रा के बाद जब इसी देश में योगा बनकर लौटा तो प्रसिद्द हो गया. इसी योग को योगा बनाने के बाद न जाने कितने दाढ़ी वाले, न जाने कितने बिना दाढ़ी वाले लोग बाबा बन गए, योगाचार्य बन गए. इन्हीं के बीच एक दाढ़ी वाले बाबा ने आकर योगा को फिर से योग में बदला और जन-जन में प्रतिष्ठित किया. ये और बात है कि आज के पार्टी-विरोध के चलते, व्यक्ति-विरोध के चलते वे बाबा जी भी विरोध का शिकार हो गए. इस विरोध के बीच उनके उत्पाद भले ही विवादित रहे हों मगर उनका योग बिलकुल भी विवादित नहीं हुआ.


नगर-नगर, शहर-शहर, गाँव-गाँव, मोहल्ले-मोहल्ले, गली-गली योग की कक्षाएँ खुल गईं, योगाचार्य पैदा हो गए. सुबह-शाम, दोपहर-रात योग की कक्षाएँ चलने लगीं. जो लोग कक्षाओं में न जा सके उनके लिए शिविर लगाये जाने लगे. योग आतुर लोगों के लिए उनकी मनोच्छा को देखकर कभी सुबह में तो कभी शाम में योग के शिविर, योग की कक्षाएँ लगाई जाने लगीं. ऐसे-ऐसे लोग योग को सिखाने को सामने आने लगे जिनका योग के आसनों से तो सम्बन्ध रहा मगर वे सब योग के आहार-विहार से कोसों दूर रहे. आश्चर्य हुआ न आपको? होना भी चाहिए क्योंकि हमें भी आश्चर्य हुआ था उस समय जबकि पाता चला था कि योग का सम्बन्ध सिर्फ योग से सम्बंधित आसनों से नहीं है बल्कि योग से जुड़े हुए आचार-विचार, खान-पान से भी है. अब आपको शायद कुछ समझ आया हो. आपने भी देखा होगा कि योग से बहुत गहराई से जुड़े होने के बाद भी बहुत से लोगों को उन्हीं परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जिनसे योग से बहुत दूर रहने वालों को सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में न सिर्फ वे व्यक्ति आलोचना का शिकार बनते हैं बल्कि हमारा समृद्ध योग भी आलोचना का शिकार बनता है.

यहाँ आकर एक बात विशेष रूप से आप सबको ध्यान रखने की आवश्यकता है कि न तो किसी बाबा ने हमारे योग को समृद्ध बनाया है, न किसी व्यक्ति ने, न किसी शिविर ने. हमारा योग सदैव से उन्नत, समृद्ध रहा है बस हमने ही उसका गलत उपयोग करना शुरू कर दिया था. असल में हम सबने मान लिया है कि योग करने के बाद सभी बीमारियाँ, सभी दैहिक बुराइयाँ दूर हो जाती हैं. होता है ऐसा ही मगर उसके लिए योग से जुडी हुई बातों का पूरा ख्याल भी रखना होता है. योग एक शारीरिक क्रिया मात्र नहीं वरन एक प्रक्रिया है. इस प्रकिया में न केवल शारीरिक व्यायाम बल्कि खान-पान का भी महत्त्व है. ये अपने आपमें एक विशेष बात होगी कि किसी व्यक्ति को योग के आसनों में, उसकी निरंतरता में कितनी विशेषज्ञता हासिल है, इसके उलट उससे भी कहीं महत्त्वपूर्ण ये है कि उसी व्यक्ति को योग के आसनों के सापेक्ष उसके खान-पान, आहार-विहार आदि को लेकर कितनी विशेषज्ञता हासिल है. देखने में आया है कि योग के आसनों, क्रियाओं आदि में समर्थ व्यक्ति खान-पान में, आहार-विहार में, संयम में कमजोर हो जाता है. ऐसे व्यक्तियों के लिए योग निरोग का नहीं वरन भोग का माध्यम होता है. असल में वे लोग योग के माध्यम से अपनी उन्हीं इन्द्रियों को सक्षम करना चाहते हैं, समर्थ करना चाहते हैं जो शिथिल होने लगती हैं. ऐसे लोगों के लिए योग सिर्फ भोग का माध्यम बनता है. आज योग की कक्षाओं में ऐसे ही लोगों की बहुतायत है जो किसी न किसी रूप में अपनी किसी न किसी इन्द्रिय समस्या से दो-चार हो रहे हैं.


हम सभी को आज समझने की आवश्यकता है कि आज हमारे लिए योग निरोग होने का माध्यम बनना चाहिए न कि भोग का. जब तक हम योग को सिर्फ इसलिए अपनाते रहेंगे कि उसके द्वारा हम अपनी उन शिथिल हो चुकी इन्द्रियों को सशक्त बनायें जिनके माध्यम से हमें जीवन में भोग करना है तो योग ऐसे लोगों के लिए निष्फल है, निष्प्रयोज्य है. ऐसे लोग ही योग को गलत सिद्ध करने में लगे हैं. हम सभी को ध्यान रखना होगा कि योग भोग को पाने की सीढ़ी नहीं बल्कि निरोग रहने का माध्यम है. ऐसे में हमारे लिए योग महज शारीरिक क्रियाओं को करना भर नहीं बल्कि उसकी वैचारिकी को मानना भी है. योग के साथ-साथ उसके आहार-विहार, उसके विचार को आत्मसात करना ही योग की सफलता है. यदि योग की शारीरिक क्रियाओं के साथ उसकी मानसिक अवस्था को हम आत्मसात नहीं कर पाते हैं तो योग हमारे लिए सकारात्मक स्थिति उत्पन्न नहीं कर सकेगा.

22 जून 2016

योग और राजनीति

भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में 27 सितम्बर 2014 को अपने भाषण के दौरान 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने की अपील की गई थी. संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनकी अपील को गंभीरता से लेते हुए अपने इतिहास के सबसे कम समय (90 दिन) में प्रस्ताव को पूर्ण बहुमत से पारित करके 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाये जाने की अनुमति प्रदान की. सैकड़ों देशों के द्वारा इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों में 40 से अधिक मुस्लिम देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था. इनमेंअफगानिस्तान, ईरान, ईराक, बांग्लादेश, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, सीरिया आदि जैसे देश शामिल थे. संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पास हो जाने के बाद 21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया. इस अवसर पर 192 देशों और 47 मुस्लिम देशों में योग दिवस का आयोजन किया गया. दिल्ली में एक साथ 35985 लोगों ने योग का प्रदर्शन किया, इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बना 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में अपना नाम दर्ज करा लिया. पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के योग करने का बना, तो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का. अनुमान तो नहीं था मगर देश में कई जगह इसका विरोध किया गया. कई मुस्लिम संगठनों द्वारा विरोध किया गया तो कई भाजपा-विरोधियों, मोदी-विरोधियों द्वारा इस दिवस का विरोध किया गया था. विरोध के बाद भी देशभर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखा था. विरोध और समर्थन के बीच दूसरा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस इस वर्ष भी मनाया गया. 



योग का विरोध करने वालों को जानना-समझना होगा कि योग किसी धर्म विशेष का धार्मिक क्रियाकलाप नहीं है जिसे जबरन किसी दूसरे धर्म, सम्प्रदाय आदि पर थोपा जा रहा हो. योग तो अनादिकाल से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, जिसके द्वारा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की  प्रवृत्तियों का पालन किया जाता रहा है. योग शब्द युज समाधौआत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में घञ्प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है. इस प्रकार योग शब्द का अर्थ हुआ समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध. वैसे योग शब्द युजिर योगतथा युज संयमनेधातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा. योग को विभिन्न दर्शनों में अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है.

(1) पातंजल योग दर्शन के अनुसार योगश्चित्तवृत्त निरोधः अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है.
(2) सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है.
(3) विष्णु पुराण के अनुसार योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है.
(4) भगवदगीता के अनुसार सिद्दध्यसिद्दध्यो समोभूत्वा समत्वंयोग उच्चते अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है.
(5) भगवदगीता में ऐसा भी कहा गया है कि तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है.
(6) बौद्ध धर्म के अनुसार कुशल चितैकग्गता योगः अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है.

स्पष्ट है कि योग आधुनिक समाज की संकल्पना नहीं है वरन भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से इसका अंग बना हुआ है. इसके बाद भी जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है उससे ऐसा लगता है जैसे योग केंद्र सरकार अथवा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एजेंडा है और वे इसे जबरन लागू करवाना चाह रहे हैं. अनेक राजनैतिक संगठनों और अनेक मुस्लिम संगठनों द्वारा मोदी के नाम पर मुस्लिम समाज में एक तरह का भय पैदा किया जा रहा है. वे इस बात को स्थापित करना चाहते हैं कि योग के द्वारा भाजपा अथवा मोदी सम्पूर्ण राष्ट्र को भगवामय कर देना चाहते हैं. ये समझने का विषय है कि यदि योग के द्वारा भगवाकरण का प्रचार-प्रसार किया जाता तो फिर उसको संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनुमति कैसे मिलती? कैसे मुस्लिम राष्ट्रों की तरफ से प्रस्ताव को समर्थन मिलता? समझना होगा कि योग एक तरह का विज्ञान है जो वर्तमान समय में व्यस्तजीवन शैली में संतोष प्रदान करता है. योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है. योग दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ताकत पहुँचाने के साथ-साथ आत्‍मा को भी शुद्ध करता है. 



यहाँ हास्यास्पद स्थिति ये है कि देश में वेलेंटाइन डे के नाम पर अथवा अन्य पश्चिमी दिवसों पर भव्य आयोजन बिना किसी विवाद के सहजता से संपन्न कर लिए जाते हैं. लाखों-करोड़ों रुपयों का अपव्यय कर दिया जाता है. आयोजन-संस्कृति के नाम पर शराब, शबाब, कबाब आदि का खेल हो जाता है. ऐसे-ऐसे आयोजनों के बाद भी न तो स्वास्थ्य की चिंता जैसी स्थिति सामने आती है न ही ऐसे आयोजनों में मजहबी भावनाओं का आहत होना दिखाई देता है. ये सबकुछ विगत वर्ष से योग के नाम पर ही सामने आने लगा है. विरोध करने वालों को इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विविध तरीकों से लगभग 180 से अधिक दिवसों का आयोजन वैश्विक स्तर पर किया जाता है. इनमें से कितने दिवसों का विरोध देश में होता है. सोचने वाली बात ये है कि कहीं विरोध का कारण ये तो नहीं कि भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे योग के वैश्विक आयोजन करवाने का सेहरा भाजपानीत केंद्र सरकार अथवा देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सिर बंध गया? यदि ऐसा है तो विरोध करने वाले किसी भी रूप में देशहित जैसी संकल्पना के पक्षधर नहीं.


14 जून 2015

योग पर दुर्योग

जैसे-जैसे 21 जून नजदीक आ रही है वैसे-वैसे उसके विरोध में तेजी आती जा रही है. देखा जाये तो योग दिवस का विरोध पूरी तरह से अतार्किक, निराधार है. योग किसी धर्म विशेष का धार्मिक क्रियाकलाप नहीं है जिसे जबरन किसी दूसरे धर्म, सम्प्रदाय आदि पर थोपा जा रहा हो. योग तो अनादिकाल से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, जिसके द्वारा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की  प्रवृत्तियों का पालन किया जाता रहा है. मगर जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है उससे ऐसा लगता है जैसे केंद्र सरकार अथवा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसे जबरन लागू करवाना चाह रहे हैं. विरोध करते भारतीय मुसलमानों को जानकर आश्चर्य होगा कि 40 से अधिक मुस्लिम देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया जिनमें अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, बांग्लादेश, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, सीरिया आदि जैसे देश शामिल हैं. वास्तविकता ये है कि 27 सितम्बर 2014 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने भाषण के दौरान 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने की अपील की और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनकी अपील को गंभीरता से लेते हुए अपने इतिहास के सबसे कम समय (90 दिन) में प्रस्ताव को पूर्ण बहुमत से पारित करके 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाये जाने की अनुमति प्रदान की.
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योग दिवस का विरोध का एक कारण साथ में होने वाला सूर्य नमस्कार भी है. यदि ओबैसी अथवा किसी अन्य धार्मिक नेता की मानें तो न केवल सूर्य वरन प्रकृति के कण-कण को हिन्दू धर्म में देवतुल्य स्थान प्राप्त है. ऐसे में मुसलमान किस-किस के प्रति अपना विरोध प्रदर्शित करेंगे? क्या वे उस चाँद की इबादत करना बंद कर देंगे जिसे हिन्दू धर्म में पूज्य स्थान प्राप्त है? क्या वे खुली हवा में साँस लेना बंद कर देंगे जिसे वरुण देवता के रूप में हिन्दुओं ने सदैव पूजा है? क्या उस अग्नि से अपना किनारा कर लेंगे जो हिन्दुओं के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक पवित्र रही है? क्या मुसलमान उन वृक्षों की खाद्य सामग्री को नकारने का काम करेंगे जिन्हें हिन्दू धर्म में भगवान मानकर पूजा जाता है? महज सूर्य-चन्द्र के नाम पर नहीं वरन योग दिवस का विरोध मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर किया जा रहा है. चूँकि इस आयोजन में स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा रुचि दिखाई जा रही है इस कारण यही ऐसा बिंदु है जो सम्पूर्ण विरोध को जन्म देता है. कांग्रेस अथवा अनेक मुस्लिम संगठन मोदी के नाम पर मुस्लिम समाज में एक तरह का भय पैदा करना चाहते हैं. वे इस बात को स्थापित करना चाहते हैं कि योग के द्वारा भाजपा अथवा मोदी सम्पूर्ण राष्ट्र को भगवामय कर देना चाहते हैं. ये समझने का विषय है कि यदि योग के द्वारा भगवाकरण का प्रचार-प्रसार किया जाता तो फिर उसको संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनुमति कैसे मिलती? कैसे मुस्लिम राष्ट्रों की तरफ से प्रस्ताव को समर्थन मिलता?
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विरोधी मुसलमानों की तरह कांग्रेस, राहुल गाँधी को भी समझना होगा कि महज विरोध के लिए विरोध करते रहने से राजनीति में वापसी नहीं की जा सकती है. योग को हिंदुत्व से जोड़कर उसका विरोध करने से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भले ही की जा सकती हो पर इसके दीर्घकालिक परिणाम उनके विरुद्ध ही रहेंगे. किसी भी आयोजन को अतार्किक रूप से हिंदुत्व से जोड़ देने की कवायद करना, केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के किसी भी निर्णय को भगवाकरण के लिए उठाया जाने वाला कदम बता देना कांग्रेस की घटिया राजनीति को ही प्रदर्शित करता है. विपक्ष में होने के नाते सरकार के निर्णयों का विरोध करना कांग्रेस की, राहुल गाँधी की राजनीति हो सकती है, उनकी राजनैतिक सक्रियता हो सकती है किन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्धारित कार्यक्रम का विरोध करना वैश्विक स्तर पर उनका अपनी खिल्ली उड़वाने जैसा ही है. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का बेवजह का विरोध और उस पर होने वाली राजनीति से कांग्रेस का, मुसलमानों का किसी भी रूप में भला नहीं होने वाला, हाँ, अंतर्राष्ट्रीय फलक पर अवश्य ही वे अपनी नकारात्मक छवि का निर्माण कर रहे हैं.

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