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13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


15 अगस्त 2024

स्वतंत्रता का सिर्फ जश्न न मनाएँ अपनी जिम्मेवारी भी निभाएँ

आज़ादी का जश्न मनाने वाला एक और दिन हम सबके बीच उपस्थित है. देश में स्वाधीनता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, इन दोनों दिनों में नागरिकों में, बच्चों-बड़ों में जबरदस्त उत्साह रहता है. आखिर इन दोनों दिनों में स्वतः ही गौरव की भावना की अनुभूति होती है. ऐसी अनुभूति के चलते सारा दिन उमंग में, उल्लास में गुजर जाता है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हुए अक्सर मन में सवाल उठता है कि हम सब जितना प्रसन्न, जितने उल्लासित इन दो दिनों में रहते हैं उतना शेष दिनों में क्यों नहीं रहते हैं?

 

यह सवाल कतई आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा सवाल एक अकेले हमारे मन में नहीं उठता है बल्कि उन सभी नागरिकों के मन में उठता है जो किसी न किसी रूप में देश के विकास में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं. यदि पूरी निष्पक्षता से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें, इन दो दिनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इन दो दिनों के उल्लास के समाप्त होने के बाद अगले दिन से दिल-दिमाग तिकड़म में व्यस्त हो जाता है. भ्रष्टाचार करने के उपाय किये जाने लगते हैं, काम निकालने को रिश्वत देने-लेने की चर्चा की जाने लगती है, स्वार्थ-लिप्सा में लिप्त कदम उठाये जाने लगते हैं.

 



सोचिए एक पल को कि क्या देश का वास्तविक विकास इसी तरह से हो सकेगा? क्या दो दिनों में अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाने से ही देश की वास्तविक आज़ादी का मंतव्य पूरा होता है? सच्चाई तो ये है कि अब हम सभी आज़ाद हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न किसी एक दिन नहीं, किसी विशेष दिन नहीं बल्कि प्रत्येक दिन मनाया जाना चाहिए. आखिर हम सभी अपनी ही आज़ादी का, अपनी ही स्वतंत्रता का एहसास स्वयं नहीं करेंगे तो कैसे अपेक्षा करेंगे कि विदेशी हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे? इसके लिए सबसे पहले हम सभी को अपने-अपने दायित्वों, कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की आवश्यकता है. देश के विकास के लिए किसी दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर हम सबका प्रयास यही होना चाहिए कि स्वतः ही अपना सकारात्मक योगदान दे सकें. जब तक इस तरफ की भावना एक-एक नागरिक में नहीं होती है तो अपनी आज़ादी का हम सब सिर्फ जश्न ही मनाते रहेंगे, उसकी वास्तविकता का लाभ नहीं उठा सकेंगे.

 

13 अगस्त 2023

सम्मान बचा रहे वीर-वीरांगनाओं का

राष्ट्रीय पर्व हमेशा से जन-जन में राष्ट्रभक्ति का उफान लाते रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, नागरिकों का जोश, उत्साह, उमंग देखने लायक होता है. देशभक्ति के रंग में सराबोर होकर उनके द्वारा अपने आसपास के वातावरण को भी देशभक्तिमय बनाने का प्रयास होता है. इसमें भी तिरंगा सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान होता है. इसके प्रति सम्मान प्रदर्शित करने में आम आदमी किसी भी तरह की कंजूसी नहीं करता है, किसी भी तरह का संकोच नहीं करता है. खुद को, अपने घर को, कार्यालय को, वाहन को या कोई भी सामान को वह तिरंगे में रँगे देखना चाहता है. रंगीन झालरों से, कपड़ों से, रंगों से वह अपने आसपास का वातावरण तिरंगा जैसा बना देता है. 




इस तरह के प्रदर्शन में प्रशासन भी पीछे नहीं रहता है. उसके स्तर पर जहाँ भी, जैसे भी होता है माहौल को देशभक्ति से भरपूर करने के प्रयास किये जाते हैं. शहर भर को तीन रंगों में सजाने का अभियान सा चल पड़ता है. चौराहों को, सरकारी भवनों को, कार्यालयों को, सड़कों पर लगे बिजली के खम्बों को, जगह-जगह लगी लाइट को उसके द्वारा तीन रंग में चमकाने के कदम उठाये जाने लगते हैं. देशभक्ति के इस जोश में अक्सर कुछ बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. तिरंगे के प्रति सम्मान, देशभक्ति का जूनून इस कदर हावी होता है कि छोटी-मोटी गलती को न देखा जाता है और न ही उस पर ध्यान दिया जाता है. 




उरई शहर के एक चौराहे को, जहाँ कि रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा लगी हुई है, प्रशासन द्वारा तीन रंगों में सजाने का काम किया गया. सम्बंधित कार्यालय के कर्मी दत्तचित्त होकर चौराहे को सजाने में लगे रहे. तीन रंग के कपड़ों से चौराहे को सजाया गया, इसके अलावा बिजली वाली झालर को भी तीन रंग में संयोजित करके रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को चमकाने-सजाने का काम किया गया. एक तरफ काम पूरा करने का दबाव और दूसरी तरफ देशभक्ति का जोश, कर्मचारियों ने इसका ध्यान ही नहीं दिया कि बिजली की जिन तीन रंगों की झालरों से रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को सजाने का काम किया जा रहा, उन झालरों को उनके हाथ का सहारा देकर ही चारों तरफ फैलाया गया है.




निश्चित ही किसी भी कर्मचारी द्वारा ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया होगा मगर उनको कम से कम इसका ध्यान रखना चाहिए था कि देशभक्ति के जोश में जिन वीर-वीरांगनाओं के नाम की जय-जयकार की जा रही है, उनके प्रति तो सम्मान बनाये रखा जाये. बिजली की उन झालरों को फ़ैलाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के हाथ का सहारा लेने के स्थान पर उसके आसपास कोई खम्बा अथवा कोई सहारा लगा दिया जाता. 


(चित्र लेखक द्वारा स्वयं निकाले गए हैं. @13-08-2023)



 

16 अगस्त 2022

आज़ादी का बदलाव भरा सफ़र

जिस देश का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है, उसी देश की महज 75 वर्ष की यात्रा का जश्न बड़े जोर-शोर से मनाया जाना अपने आपमें अजब लगता है. इसके बाद भी इस अजब से लगने वाली यात्रा की कहानी को याद रखना भी आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि गौरवशाली परम्परा, संस्कृति, सभ्यता होने के बाद भी देश सैकड़ों वर्षों तक गुलामी में रहने का कलंक आज तक ढो रहा है. वर्तमान समय वाकई गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम सारी चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे ही बढ़ रही है.

 

वर्तमान में हम सभी आज़ादी के अमृत महोत्सव आयोजन के द्वारा अपनी आज़ादी के 75 वर्षों की यात्रा का स्मरण कर रहे हैं. वर्तमान के सापेक्ष जब इसी कालखंड पर दृष्टि डालते हैं तो बहुत सारा सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे तमाम लोगों के विचारों को जानने-सुनने के बाद सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने पिछले 75 वर्षों में कुछ पाया नहीं है? क्या देश ने इस यात्रा के किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है? क्या इन 75 वर्षों में हमने जो पाया है वह अंग्रेजी शासन की अपेक्षा कमतर है?



 

विगत 75 वर्षों की उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि समग्र रूप में देखा जाये तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. जिस समय देश आज़ाद हुआ, उस समय देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी और इसकी हिस्सेदारी 53.7 प्रतिशत थी. आज यह महज 18.8 प्रतिशत रह गई हो मगर इसके सापेक्ष अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी 26.9 प्रतिशत, सर्विस सेक्टर का भाग 54.3 प्रतिशत है.

 

शिक्षा किसी भी समाज के विकास हेतु अत्यावश्यक अंग है. इसके बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. आज यदि मेडिकल कॉलेज की संख्या निकाली जाये तो पूरे देश में 612 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 322 सरकारी और 290 निजी हैं. इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. अनेक नए-नए क्षेत्रों का उदय हुआ. तकनीक के मामले में जबरदस्त बदलाव देखने को मिले. किसी एक समय में दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. हमारे समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं.

 

कतिपय राजनैतिक मूल्यों की गिरावट के कारण उनको अंग्रेजी शासन ज्यादा सुखद लगता है मगर वे भूल जाते हैं कि ये हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति है कि यहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. संवैधानिक खूबसूरती ये है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत 75 वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.

 




 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया थातब हवा हमारी थीपानी हमारा थाजमीं हमारी थीआसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गयापरिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहाहर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्रचारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारीबेबसीहताशाभयआतंकअविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेवतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रताखुलकर घूमने की आजादीअपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया हैदरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लियाजिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति हैशहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह हैआजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दताउच्शृंखलता आदि बना हुआ हैआजादी के गीतराष्ट्रगीतवन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैंकभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमाउनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं कीदुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरणउपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकेंपेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉलजगमगाते शहरमैट्रोमल्टीस्टोरीजशॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा हैएक भी बच्चा अशिक्षित हैएक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगाजब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगेजब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगाजब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगेजब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगाजब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगीजब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगाजब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या काइन सबका हल हैमगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज काअपने परिवार का विकास कैसे करेगाबच्चे हमारे भविष्य का आधार हैंयदि वे ही अशिक्षितभूखेअस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैंनागरिक किसी भी धर्म के होंकिसी भी जाति के होंकिसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश केइस सोच के द्वारा हम विकास कीएकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगादृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगेजयहिन्दवन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

15 अगस्त 2021

राष्ट्रगान न गा सकने वाले भारतीय नागरिक

स्वतंत्रता दिवस का आयोजन हर्षोल्लास के साथ पूरा देश मना रहा है. हर तरफ से फोटो, वीडियो दिखाई दे रहे हैं, जिनमें लोगों की ख़ुशी झलक रही है. इन्हीं वीडियो में से एक ऐसा वीडियो देखने को मिला जिसे देखकर एकबारगी ये विश्वास ही नहीं हो रहा है ये ध्वज फहराने वाले इसी देश के नागरिक हैं. किसी तरह का कोई आपत्तिजनक वीडियो नहीं देखने को मिला. कहीं कुछ ऐसा नहीं मिला कि स्वतंत्रता दिवस पर किसी और देश का ध्वज फहरा दिया गया हो. ऐसा भी नहीं हुआ कि अपने राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा फहरा दिया गया हो, जैसा कि अक्सर कई जगहों पर होने की खबरें विगत वर्षों में मिलती रही हैं. ऐसा वीडियो भी नहीं था जिसमें राष्ट्रगान का विरोध किया गया हो अथवा उसके गायन से इनकार किया हो, ऐसा भी विगत वर्षों में बहुत सी जगहों पर होता रहा है.


इस बार एक वीडियो देखने को मिला जिसमें एक राजनैतिक दल के द्वारा ध्वजारोहण किया गया. इसके पश्चात् उनके नेताओं द्वारा पूरे जोश के साथ राष्ट्रगान का गायन शुरू हुआ. आरंभिक दो-तीन पंक्तियों के बाद किसी के मुँह से राष्ट्रगान की पंक्तियाँ न उभरीं. सब के सब दो-तीन-चार गलत-गलत शब्द गाते हुए खामोश हो गए. बाद में सभी के द्वारा अजब-अजब सी आवाजों को निकाला जाता रहा और राष्ट्रगान का अंत जय हे, जय हे के साथ कर दिया गया. ऐसा नहीं कि ध्वजारोहण के समय वहां दो-तीन लोग ही उपस्थित थे और उनको पूरा राष्ट्रगान नहीं आया. उस अवसर पर वहाँ अच्छी-खासी भीड़ जमा थी और यह आश्चर्य का विषय है कि उस भीड़ में किसी को पूरा राष्ट्रगान याद नहीं था. यह शर्म की बात है.


फिलहाल, ऐसे बहुत से वीडियो आते रहते हैं जहाँ प्रेंक के नाम पर अजीब-अजीब सी हरकतें करते युवा दिखते हैं, उन्हीं अजीब हरकतों के बीच कई बार इस तरह के मौके भी दिख जाते हैं जबकि उन युवाओं को देश से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी नहीं होती है. कुछ ऐसा ही ध्वजारोहण के अवसर पर दिखाई पड़ना दुखद भी है, शर्मनाक भी है.


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16 अगस्त 2019

स्वतंत्रता और सुरक्षा का संयोग

स्वतंत्रता दिवस की और पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

इस वर्ष का सावन माह अपने आपमें अभूतपूर्व घटनाओं का गवाह रहा है. इस अभूतपूर्व स्थिति में इए सुखद और पावन संयोग ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता का महोत्सव और भाई-बहिनों के स्नेह का पर्व एक दिन ही मनाया जा रहा है. इसी को किसी न किसी रूप में हम सभी संयोग कहते हैं, सितारों की चाल कहते हैं, सौभाग्य कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम सावन माह की गतिविधियों को देखें तो देशहित में कई सारे निर्णय संपन्न हुए.


देश के वैज्ञानिकों की सफल यात्रा चंद्रयान के रूप में आरम्भ हुई. इस यात्रा की कमान देश की मातृशक्ति के हाथ में थी, यह भी अपने आपमें गौरवशाली क्षण था. इस अभियान के द्वारा जो कदम अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकता रखने जा रही है, वैसा आज तक किसी भी देश द्वारा उठाया नहीं गया है.


चंद्रयान से शुरू वैज्ञानिक सफलता यात्रा अभी आरम्भ ही  हुई थी, देशवासी अभी इस उमंग की सराबोर से उबरे भी न थे कि एक कदम सामाजिक भेदभाव दूर करने के लिए उठाया गया. तीन तलाक की समाप्ति भले ही एक समुदाय विशेष से संदर्भित हो मगर इसके समाप्त होने से देश की मातृशक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया, उनके व्यक्तित्त्व को एक इन्सान समझने की परिभाषा से अलंकृत किया गया.


इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही एक देश, एक संविधान के विधान को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया गया. किसी समय राजनैतिक प्रतिस्थितियों के चलते उठाया गया कदम कालांतर में न केवल राजनैतिक विभेद का कारक बना बल्कि देश के भूभाग को भी एक तरह से अलग-थलग किये रहा. धारा 370 की समाप्ति के साथ ही दो राज्यों का निर्माण होने ने राजनैतिक सजगता की दिशा में कदम बढ़ाया तो देश को वास्तविक रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने का सन्देश दिया. यह भी देश की स्वतंत्रता के प्रति सार्थकता कही जा सकती है.


इन घटनाओं का होना शायद पूर्व-निर्धारित रहा होगा, शायद एक संयोग रहा होगा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एकसाथ, एक दिन मनाने का अवसर मिला. इसको एक सन्देश के रूप में देखने की आवश्यकता है. रक्षाबंधन को महज भाई-बहिन के पवित्र प्रेम के रूप में, सुरक्षा के रूप में देखने से इतर अब व्यापकता में देखने की आवश्यकता है. सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता को स्थापित किया, सामाजिकता को मान्यता दी और राष्ट्रीयता को एकता प्रदान की. अब हम सभी नागरिकों की जिम्मेवारी बनती है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करें. अपने कार्यों से, अपनी जिम्मेवारियों से, अपने कर्तव्यों से देश को, समाज को, नागरिकों को सफलता की राह प्रदान करें, सुरक्षा की भावना का विकास करें, उनको आज़ादी का भान बना रहने दें.


आशा है कि हम सभी स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के एकसाथ मनाये जाने के सन्देश को समझेंगे, इसमें अन्तर्निहित भावना को आपस में मिलकर और पुष्ट करेंगे. यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही हम सभी स्वतंत्रता का महोत्सव को सही आयाम प्रदान करेंगे, रक्षाबंधन की पवित्रता को अक्षुण्य रख सकेंगे. इसी पावन भावना के साथ आइये एक कदम समानता, भाईचारे, स्नेह, सुरक्षित स्वतंत्रता की ओर बढ़ाएं.

जय हिन्द

15 अगस्त 2018

सच्ची सलामी के इंतजार में है तिरंगा


स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था। सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी। स्वभाव में अभिमान था। स्वर में प्रसन्नता थी। सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा। गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा। आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा। आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे। अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है। हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं। इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। 

अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है। अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं। महिला सशक्तिकरण के आँकड़े दिखाए जा रहे हैं किन्तु एक लड़ाई तीन तलाक और हलाला के लिए भी लड़ी जा रही है। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं। मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं। हाथों में औजार थामे नजर आते । अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।

15 अगस्त 2016

तिरंगे को सच्ची सलामी अभी बाकी है

          जब पहली आधी रात को तिरंगा फहराया गया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था तब भी जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र आबो-हवा में अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन था मगर आत्मा में दृढ़ता थी, स्वभाव में अभिमान था, स्वर में प्रसन्नता थी, सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा; गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा; आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा; आँखों के आँसू हर बार तेजी से बहते रहे मगर कभी हमने हाथों के कम्पन को नहीं थामा, आँसुओं का बहना नहीं रोका; आँखों के आँसू नहीं पोंछे। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने, अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है; हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


          शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। यही कारण है कि आज हर ओर अराजकता का, हिंसा, अपराध, अत्याचार, भेदभाव आदि का बोलबाला दिख रहा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं।

          आजाद भारत में लोकतन्त्र एक तरह की राजशाही में परिवर्तित होता चला जा रहा है। जनप्रतिनिधि अब जनता के सेवक से ज्यादा उनके हुक्मरान बनते जा रहे हैं। आजादी के दीवानों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि विकास के नाम पर सत्तासीन लोग समाज के विकास के स्थान पर अपनी पीढ़ियों का विकास करने में जुट जायेंगे; विकसित समाज की अवधारणा में आम आदमी को महत्व नहीं मिल पायेगा। यही कारण है कि समय-समय पर देश में अलगाववादी ताकतें, नक्सलवादी ताकतें अपना सिर उठाने लगती हैं। अपने अधिकारों की माँग करते-करते ये ताकतें आतंकवादी शक्तियों में परिवर्तित हो जाती हैं और देश में अराजकता को फैलाने लगती हैं।

          इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

          देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं। मॉल, जगमगाते शहर, मैट्रो, मल्टीस्टोरीज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं। जब तक एक भी बच्चा भूखा है, एक भी बच्चा अशिक्षित है, एक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं। हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है। जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगा, जब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगे, जब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगा, जब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगे, जब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगा, जब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगी, जब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगा, जब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं।

          ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।


चित्र गूगल छवियों से साभार 

11 अगस्त 2016

आज़ादी बचाने को आज ही जागना होगा

ये संभवतः अपने आपमें हास्यास्पद प्रतीत हो कि इक्कीसवीं सदी में विचरण करता मानव आज भी कबीलाई संस्कृति में निवास कर रहा है. आवश्यक नहीं कि कबीलाई संस्कृति में निवास करने के लिए जंगलों, गुफाओं, कन्दारों, पेड़ों आदि पर रहा जाए. ये भी आवश्यक नहीं कि इस संस्कृति का होने के लिए नग्नावस्था में विचरण किया जाये या फिर पशुओं की खाल, घास-पत्तियों के द्वारा अपने शरीर को ढँका जाए. दरअसल कबीलाई संस्कृति अपने आपमें एक प्रकार की सामाजिक स्थिति थी, जिसे तत्कालीन समाज में मान्यता प्राप्त थी. संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना, धनलोलुपता में अपने ही सगे रिश्ते-नातों का खून बहा देना, राह चलती महिलाओं के साथ दुराचार करना, बच्चियों तक को अपनी हवस का शिकार बना लेना, अपनी ही सगी बेटियों-बहनों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने लगना, आपस में विश्वासघात कर बैठना, दोस्ती को दुश्मनी में बदल देना, इंसान होकर भी इंसानों का शोषण करना, उनको गुलाम बनाना, उनके साथ अमानुषिक कृत्य करना, अमानवीयता दिखाना आदि-आदि ऐसा कुछ है जो इंसान के कबीलाई मानसिकता रखने को सिद्ध करता है. अपने आसपास धर्म, मजहब, क्षेत्र, भाषा, बोली आदि के छोटे-छोटे दल बना रखे हैं. इन छोटे-छोटे दलों के द्वारा वह कभी धर्म के नाम पर हंगामा खड़ा करता है तो कभी क्षेत्र के नाम पर उत्पात मचाता है. कभी उसके लिए बोली विवाद का विषयवस्तु बन जाती है तो कभी वह इंसानी गतिविधि को ही आक्रामकता के दायरे में समेट लेता है.  इंसानी गतिविधियों को, उसके क्रियाकलापों को देखने के बाद लगता नहीं है कि ये उसी देश के वासी हैं जहाँ गंगा-जमुनी संस्कृति का बखान अनेकानेक महामनाओं ने किया है. 



मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती जैसे गीतों को गाने वाले इस देश में ऐसे-ऐसे लोग जन्म ले रहे हैं जो किसी आतंकी को महज इसलिए शहीद बताने में लगे हैं क्योंकि वो एक मजहब विशेष से सम्बंधित था. मेरा रंग दे बसंती चोला गाते-गाते फांसी के फंदे को चूम लेने वाले भगत सिंह के सामने उस व्यक्ति को खड़ा किया जा रहा है जिसने खुलेआम देश की बर्बादी के नारे लगाने वालों का साथ दिया. क्या विद्रूपता है कि एक विद्यार्थी को जबरन दलित बता कर उसकी आत्महत्या पर राजनीति की जाती है वहीं सैकड़ों किसानों की आत्महत्याओं पर किसी के द्वारा संवेदना प्रकट नहीं होती, किसी के पुरस्कारों की वापसी नहीं होती है. जिस देश में भारतमाता की जय के नारे पर राजनीति होने लगे, जहाँ सूर्य नमस्कार पर राजनीति की जाने लगे, जहाँ योग को मजहब विरोधी बताया जाने के पीछे राजनैतिक साजिश दिखे, जहाँ तिरंगा लहराने पर पुलिस लाठियाँ भाँजे, जहाँ देश विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में बुद्धिजीवी सड़कों पर उतरने लगे, जहाँ राजनैतिक विरोध दर्शाने के लिए किसी आतंकी लड़की को बेटी बनाने की होड़ दिखाई देने लगे वहाँ सोचा जा सकता है कि स्थितियाँ कितनी विस्फोटक, कितनी विध्वंसक, कितनी अराजक होती जा रही हैं.

आज भी समाज का एक बहुत बड़ा तबका इन सबसे ऊपर उठकर आपसी समन्वय से, सौहार्द्र से, सहयोग से, प्रेम-स्नेह से साथ रहना चाहता है. एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि की राजनीति में नहीं पड़ना चाहता है. एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके लिए भाईचारा, सामाजिक सौहार्द्र ही सबसे बड़ी पूजा है, सबसे बड़ी इबादत है. इसके साथ ही समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसका उद्देश्य देश के अमन-चैन में खलल पैदा करना है. ऐसे लोगों की मानसिकता लोगों को धर्म, मजहब, जाति, क्षेत्र के खाँचे में बाँटकर समाज का विघटन करवाना है. इन तमाम सारी संदिग्ध भूमिकाओं के बीच खुद इंसान की भूमिका को भी संदेह से मुक्त नहीं किया जा सकता है. इसका कारण महज इतना है कि यदि हम इंसान ही आपस में विवाद पैदा करने के लिए, वैमनष्यता फ़ैलाने के लिए, आपसी खून बहाने के लिए आगे नहीं आयेंगे तो उन फिरकापरस्त ताकतों के किये धरे कुछ होने वाला नहीं है.

आज आम धारणा है कि किसी भी घटनाक्रम के लिए राजनेताओं को, राजनीति को, राजनैतिक दलों को सीधे-सीधे आरोपित कर दिया जाता है. ऐसा करने हम सभी लोग अपनी-अपनी भूमिकाओं को छिपा लेना चाहते हैं. अपने-अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ने का काम करने लगते हैं. सवाल उठता है कि आखिर तरक्की पसंद इंसान क्यों लोगों के भड़काने में आ जाता है? क्यों उसके द्वारा धर्म-मजहब की राजनीति की जाने लगती है? क्यों वह खुद को फिरकापरस्त ताकतों के बनाये हुए खाँचों में खुद को फिट करने लगता है? क्यों नहीं सब मिलकर ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब देते हैं? क्यों नहीं सब मिलजुलकर एक-दूसरे की रक्षा करने को आगे आते हैं? क्यों नहीं सभी शिक्षित इंसान निरक्षर इंसानों को सही-गलत की जानकरी देने सामने आते हैं? स्पष्ट है कि हम सारे इंसानों के भीतर बैठा एक कबीला ऐसे समय में जाग जाता है. उसके अन्दर निवास करता हिंसक जानवर ऐसे माहौल में अपने आपको सशक्त महसूस करने लगता है. उसके अंदर की लहू पीने की प्यास और तेजी से भड़कने लगती है. चाँद, मंगल, अंतरिक्ष तक का सफ़र करने के बाद भी इंसान अपने भीतर विराजमान कबीले को, उसमें निवास करते जानवर को मार नहीं पाया है. यही कारण है कि मौका मिलते ही वह अपने मूल रूप में सामने आ जाता है, अपनों को मिटाने लगता है, अपनों का खून बहाने लगता है, रिश्तों का सर्वनाश करने लगता है. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि नितांत स्वार्थमयी सोच के कारण यदि उसने अपने आपको कठपुतली बनने से नहीं रोका तो समाज में चारों तरफ धमाके सुनाई देंगे, लहू के दरिया बहते दिखाई देंगे, नौनिहाल रोते-बिलखते मिलेंगे. आने वाले सुखद समय के लिए, सामाजिक सौहार्द्र के लिए, स्नेहिल वातावरण के लिए हम सबको, हम इंसानों को आज ही जागना होगा. कल तो बहुत देर हो चुकी होगी.