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22 दिसंबर 2025

अन्तरिक्ष तक दिव्यांगजन की उपस्थिति

बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हुए अनेकानेक परिवर्तनों को देखते हुए ऐसा माना जाने लगा था कि ज्ञान, विज्ञान, आधुनिकता, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, बौद्धिकता, स्वतंत्रता आदि के सन्दर्भ में इक्कीसवीं सदी क्रांतिकारी सदी होगी. ऐसा बहुत हद तक हुआ भी. समाज ने इस सदी में बहुत से बंधनों से स्वयं को मुक्त किया, विकास के अनेक नए मानकों को प्राप्त किया. बावजूद इसके बहुत से क्षेत्र ऐसे रहे जिनको लेकर समाज की सोच में बदलाव नगण्य रूप में देखने को मिला. दिव्यांगजनों के प्रति अभी भी समाज का दृष्टिकोण सहानुभूति, दया दर्शाने वाला बना हुआ है. सभी क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति को प्रदर्शित करने के बाद भी दिव्यांगजनों को कमजोर कड़ी के रूप में देखा जाता है. इसके बाद भी दिव्यांगजनों ने अपने कार्यों, अपनी क्षमताओं, अपने आत्मबल के द्वारा लगातार स्वयं को सिद्ध किया है. इस 20 दिसम्बर को जर्मनी की दिव्यांग इंजीनियर माइकला बेंथॉस ने इतिहास रचते हुए नवीन उपलब्धि हासिल की है. जर्मन एयरोस्पेस इंजीनियर माइकला रॉकेट पर उड़ान भरने वाली पैरालिसिस से ग्रस्त पहली इंसान बन गईं हैं.

 



दिव्यांग माइकला ने सबसे अलग हटते हुए अपना अलग रास्ता बनाया और खुद को अन्तरिक्ष तक पहुँचा दिया. उन्होंने अमेरिका के वेस्ट टेक्सास से ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट से उड़ान भरी और अन्तरिक्ष में अपनी उपस्थिति के द्वारा दिव्यांगजनों की जिजीविषा और क्षमता की उपस्थिति दर्ज की. व्हीलचेयर का प्रयोग करने वाली वे पहली व्यक्ति बन गई हैं जिसने अन्तरिक्ष की उड़ान भरी. ब्लू ओरिजिन के एनएस-37 मिशन में 33 वर्षीया माइकला के साथ पाँच अन्य यात्री भी शामिल थे. उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने कर्मन रेखा को पार किया. यह रेखा अन्तरिक्ष की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किमी ऊपर है. इस रेखा का नामकरण वैमानिकी और अन्तरिक्ष विज्ञान में सक्रिय इंजीनियर थियोडोर वॉन कर्मन के नाम पर किया गया है. वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस ऊँचाई की गणना करते हुए बताया था कि इस ऊँचाई पर वायुमंडल इतना पतला हो जाता है कि वहाँ हवाई उड़ान सम्भव नहीं है.

 



आज से लगभग सात वर्ष पूर्व, 2018 में माइकला एक माउंटेन बाइक दुर्घटना में घायल हो गईं थीं. उस दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त होने के कारण वे कमर के नीचे लकवाग्रस्त हो गई थीं. जिसके बाद उन्होंने व्हीलचेयर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. इस दुर्घटना के बाद जब वे व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने लगीं तो उनको लगा था कि उनका अन्तरिक्ष यात्री बनने का बचपन का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. व्हीलचेयर पर अपने सारे काम करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में काम करती रहीं. अन्तरिक्ष यात्रा करने के बचपन के सपने को पूरा करने के लिए माइकला लगातार इसके लिए प्रयासरत भी रहीं और कार्य भी करती रहीं. इसके लिए उन्होंने पैराबोलिक ज़ीरो-ग्रेविटी फ़्लाइट्स में हिस्सा लिया, जो भारहीनता (जीरो-ग्रेविटी) की नकल करती है. इसके अलावा उन्होंने पोलैंड में व्हीलचेयर-एक्सेसिबल लूनारेस रिसर्च स्टेशन पर दो हफ़्ते के अनुरूप अन्तरिक्ष यात्री (एनालॉग एस्ट्रोनॉट) मिशन के दौरान मिशन कमांडर के तौर पर काम भी किया. उनके पास मानव अन्तरिक्ष उड़ान से जुड़ा काफी अनुभव भी है. वे एक जर्मन एयरोस्पेस और मेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर हैं जो अभी यूरोपियन स्पेस एजेंसी के साथ यंग ग्रेजुएट ट्रेनी के तौर पर जुड़ी हुई हैं.

 

ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड रॉकेट की यह यात्रा लगभग दस मिनट की रही. इस दौरान यात्रियों ने भारहीनता अर्थात ज़ीरो-ग्रेविटी का अनुभव किया और पृथ्वी का अद्भुत नज़ारा देखा. माइकला की इस स्वप्निल उड़ान के समय उनके साथ स्पेस एक्स के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैंस कोएनिग्समैन भी थे, जिन्होंने इस यात्रा को सम्भव बनाने में मदद की. इसके लिए रॉकेट में किसी तरह का व्यापक ढाँचागत परिवर्तन नहीं करना पड़ा था. एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड और माइकला की स्थिति के अनुकूल कैप्सूल व्यवस्था के द्वारा उनको उड़ान के लिए तैयार किया गया. चूँकि माइकला व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, ऐसे में उनको रॉकेट में चढ़ने के लिए तथा वहाँ अपनी सीट तक पहुँचने के लिए एक विशेष ट्रांसफर बोर्ड का उपयोग किया गया. इस विशेष बोर्ड की सहायता से वे अपनी व्हीलचेयर को धरती पर छोड़ खिसककर सीट पर बैठ सकीं. अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद उन्होंने इस ऐतिहासिक उप-कक्षीय यात्रा में भाग लिया. उड़ान के दौरान उन्हें भारहीनता का अनुभव हुआ.

 



अन्तरिक्ष से लौटने के बाद माइकला ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे शानदार अनुभव था. कभी अपने सपनों को मत छोड़ो. दुनिया अभी भी दिव्यांगों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं है. अभी भी और अधिक बदलावों की जरूरत है. उन्होंने अपील की कि दिव्यांगजनों के लिए दुनिया को अधिक सुलभ  बनाया जाये ताकि भविष्य में उनके जैसे और लोग भी अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. इस मिशन में उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि शारीरिक अक्षमता सपनों के आड़े नहीं आ सकती. उनकी इस ऐतिहासिक उड़ान से दिव्यांगों के लिए अन्तरिक्ष यात्रा के द्वार खुलने की एक शुरुआत अवश्य हुई है. सम्भव है कि भविष्य में और भी दिव्यांग अन्तरिक्ष की यात्रा कर सकें. यह भी सम्भव है कि अब समाज दिव्यांगजनों के प्रति अपनी संकीर्ण सोच को त्यागकर उन्हें भी एक सामान्य इंसान की तरह से जानने-समझने का प्रयास करे.  


03 दिसंबर 2025

दिव्यांगजनों में विश्वास जगाना होगा

03 दिसम्बर का आना हुआ और शासन-प्रशासन की तरफ से सभी जगह दिव्यांगजनों के लिए अंतरराष्ट्रीय विकलांग (दिव्यांग) दिवस को मनाया गया. इस दिवस को लेकर वैसी चहल-पहल नहीं दिखती जैसी कि अन्य दिवसों को लेकर दिखाई पड़ती है. अभी 01 दिसम्बर को ही एड्स दिवस पर जागरूकता के लिए रैलियाँ निकाली गईं, कई जगह गोष्ठियाँ, प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं थीं वैसा कुछ आज देखने को नहीं मिला. इसके पीछे एक मुख्य वजह जो हमें समझ आती है वो यह कि विकलांगता को लेकर समाज में अभी भी एक तरह की दया का भाव बना हुआ है. यदि इस दया के भाव को समाज के साथ-साथ पारिवारिक रूप में, सहयोगियों में, मित्रों में भी उपस्थित माना जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. ऐसा हम स्वयं व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हैं.  

 



बहरहाल, वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा निर्णय लिया गया कि सन 1981 को विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रुप में मनाया जायेगा. इस दिवस का आरम्भ भले ही वर्ष 1981 से कर दिया गया हो मगर सन 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है. इस दिवस के मनाये जाने का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाना है. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. इसके बाद से ही सन 1992 से इसे पूरी दुनिया में हर साल से लगातार मनाया जा रहा है.

 

इस दिवस को मनाये जाने के बाद भी, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर देने के बाद भी ऐसे लोगों के प्रति समाज की सोच में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. आज भी दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. समाज के बहुत से क्षेत्रों में उनके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. आप सब लोगों ने भी महसूस किया होगा और यदि अभी तक ऐसा कुछ आपकी आँखों के सामने से नहीं गुजरा है तो अपने शहर के ऐसे केन्द्रों में जाकर देखिये जहाँ विकलांग व्यक्ति रहते हों, आज भी वे लोग दया, सहानुभूति का पात्र बनते हैं. ऐसे लोग भले ही शिक्षित हों अथवा अशिक्षित, शहरी हो अथवा ग्रामीण, रोजगार में हो अथवा बेरोजगार सभी के साथ समाज की तरफ से एक दया का भाव देखने को मिलता है.




ऐसा होने के पीछे को हम व्यक्तिगत रूप से समाज से अधिक दोष विकलांगता से जूझ रहे लोगों का मानते हैं. कमोबेश बहुतायत विकलांग व्यक्ति समाज से दया, सहानुभूति ही चाहते हैं. कुछ वर्षों पूर्व इस क्षेत्र में कार्य करने की मंशा से विकलांग शक्ति (जिसे बाद में दिव्यांग शक्ति कर दिया गया) के नाम से एक अभियान शुरू किया. इसके माध्यम से ऐसे विकलांग व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का मन बनाया था जिनमें किसी न किसी तरह की प्रतिभा हो, कोई न कोई हुनर हो. सोचा था कि ऐसे लोगों के हुनर को समाज के सामने लाकर इनको भी आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जाये. इस अभियान से ऐसे विकलांग व्यक्ति बहुत कम जुड़े जिनको अपनी प्रतिभा का, अपने हुनर का प्रतिफल चाहिए था. बहुतायत लोगों के लिए भत्ता, पेंशन, सरकारी अनुदान, लाभ आदि को प्राप्त करना उनका अभीष्ट था.

 

ये सही है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना आज के दिन का उद्देश्य है. ऐसे में जहाँ दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव दूर करना होगा वहीं खुद दिव्यांगजनों को अपने आपको मजबूर, कमजोर मानसिकता से ऊपर लाना होगा. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में, दिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के साथ-साथ दिव्यांगजनों में विश्वास पैदा करने के लिए, दिव्यांगजनों को प्रोत्साहित करने के लिए भी इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.


07 दिसंबर 2024

विकलांगता के साथ व्यावसायिक दृष्टि उचित नहीं

 


ये तस्वीर अक्सर सामने आती रहती है. किसकी है, किसने खींची, कहाँ की है ये जानकारी नहीं.


इस फोटो को देखकर हर बार एक ही ख्याल मन में उभरता है, (सही या गलत होना अलग बात) कि इस चित्र को विशुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य से खींचा गया है. उसके बाद इसका उपयोग विशुद्ध भावनात्मक रूप से किया जा रहा है. इसके पीछे का क्या मकसद है, ऐसा क्यों किया जा रहा है पता नहीं.


ऐसा इसलिए कह रहे क्योंकि हमारी जानकारी में कोई भी संस्थान जो कृत्रिम पैर बनाता है, जरूरतमंद को उपलब्ध कराता है वो इस पैर को बिना कवर किये नहीं देता है. इस चित्र में इस व्यक्ति के दोनों कृत्रिम पैर बिना कवर के हैं.


व्यावसायिक लाभ लेने के लिए, भावनात्मक फायदा उठाने की दृष्टि से यदि इस व्यक्ति को कथित रूप में शामिल किया गया है तो हम व्यक्तिगत रूप से इसकी निंदा करते हैं. अभी इसी माह के आरम्भ में विकलांग दिवस पर बड़े-बड़े आदर्श बघारे गए. उनको भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

 


03 दिसंबर 2022

दिव्यांगजनों के प्रति ऐसी संज्ञाशून्यता उचित नहीं

लगभग दो घंटे बाद तीन दिसम्बर समाप्त होकर चार दिसम्बर में बदल जायेगा. ये कोई आश्चर्य का विषय नहीं है मगर आश्चर्य का विषय जो है वो ये कि आज का दिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का होने के बाद भी मीडिया से लुप्त रहा. सामान्य मीडिया से, सोशल मीडिया से भी.


आज, तीन दिसम्बर को International Day of Disabled Persons के रूप में मनाया जाता है. सामान्य बोलचाल में हम लोग इसे अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग (विकलांग) दिवस के रूप में पहचानते हैं.


चिरकुट टाइप के दिवस मनाने में सिद्धहस्त सोशल मीडिया पुरोधा भी इधर खामोश दिखे. बहुतेरी सम्पादकीय टिप्पणियों से भी इस दिवस के बारे में, दिव्यांगजनों के बारे में कुछ लिखा देखने को न मिला.


आखिर ऐसी उदासीनता क्यों? आपके माता, पिता, भाई, बहिन, मित्र, वेलेंटाइन, धरती, पर्यावरण, जल, जंगल, टाइगर आदि की तरह दिव्यांग भी इसी समाज का हिस्सा है. आपके परिजन, मित्र, सहयोगी, सहकर्मी, अपरिचित, मजदूर, श्रमिक आदि किसी रूप में भी ऐसा कोई व्यक्ति आपको दिखाई दे जाता होगा.


इतनी और ऐसी संज्ञाशून्यता उचित नहीं.

 







 

01 दिसंबर 2022

मानसिकता बदलनी होगी दिव्यांगजनों के प्रति

03 दिसम्बर को हम सभी अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस मना रहे होंगे किन्तु दिव्यांगजनों के प्रति अभी वह व्यवहार चलन में नहीं ला सके हैं, जिसकी उनको आवश्यकता है. दिव्यांगजनों के प्रति अंतरराष्ट्रीयराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर पुनरुद्धाररोकथामप्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. कालांतर में सन 1992 से इस दिन को पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा.  


प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले अनेकानेक दिवसों की तरह से आम नागरिक अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस को भी देखता है जबकि इस दिवस को बहुत ही गंभीरता से लेने की आवश्यकता है. जनमानस समाचारों में, बैनरों में, होर्डिंग्स में इसके बारे में जान-समझकर अपने आपको उसी क्षण उससे जोड़ता है और अगले ही पल उसे विस्मृत कर देता है. आज समाज को इस बारे में जागरूक करने की अत्यधिक आवश्यकता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से देश में अब विकलांग के स्थान पर दिव्यांग शब्द प्रयोग होने लगा है किन्तु उनके साथ कार्य-व्यवहार में अभी भी स्थिति बदली नहीं है. अभी भी समाज में धारणा बनी हुई है कि दिव्यांगों के लिए कार्य करने जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की है. ऐसा इसलिए है क्योंकि दिव्यांगजनों के प्रति किसी कार्य अथवा मानसिक स्थिति के बदलने के लिए समाज में, आम नागरिकों में जागरूकता देखने को नहीं मिलती है. समाज के बहुसंख्यक लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं कि तीन दिसम्बर को इस तरह का कोई दिवस आयोजित भी किया जाता है.




यही कारण है कि देश में दिव्यांग शब्द अब सरकारी कार्यों में, आम बोलचाल में दिखाई देने लगा है किन्तु आम जनमानस में अभी भी एक तरह की सुसुप्तावस्था देखने को मिलती है. जनमानस को लगता है जैसे कि किसी दिव्यांग के प्रति एकमात्र सहानुभूति दर्शाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की जा सकती है. मदद के नाम पर चंद सिक्के, दो शब्द ही दिखाई देते हैं. अभी भी समाज में दिव्यांगों के प्रति सहानुभूति का, दया का भाव बना हुआ है. शिक्षित, समर्थ, योग्य दिव्यांग व्यक्ति के लिए भी समाज इसी तरह की धारणा बनाये हुए है. किसी भी दिव्यांग व्यक्ति से मिलते ही लोगों का नजरिया बदल जाता है. उसके प्रति सहयोग से अधिक सहानुभूति का भाव उमड़ने लगता है. ऐसा माना जाने लगता है कि वह व्यक्ति बिना किसी दूसरे की सहायता के कोई काम नहीं कर सकता है. छोटे से छोटे, बड़े से बड़े कार्य के लिए सामाजिक प्राणी उसके साथ ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह दिव्यांग सम्बंधित कार्य को करने में अक्षम है. इसी कारण से दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है.


आज समाज को उन हौसलों से परिचित करवाए जाने की आवश्यकता है जिसकी कहानियाँ अनेकानेक दिव्यांगजन लिख चुके हैं. बहुतायत में अनेक दिव्यांगजन ऐसे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, अपनी कर्मठता, अपनी जिजीविषा से असंभव को संभव कर दिया है. उनको महत्ता देते हुए आम नागरिकों के बीच स्थापित किया जाये. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना भी इस दिन का उद्देश्य है. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे मेंदिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.


दिव्यांग दिवस के आयोजन में आम नागरिकों की सहभागिता अधिक से अधिक होनी चाहिए. इससे एक तो नागरिकों को भी ऐसे आयोजनों से जुड़ने का अनुभव होगा, दूसरे समाज के लोगों को अपने बीच के लोगों की समस्याओं के बारे माँ जानने-समझने का अवसर मिलेगा. दिव्यांगजनों की समस्या आर्थिक सशक्तिकरण की उतनी नहीं है जितनी कि सामाजिक स्वीकार्यता की है, उनके विश्वास को बनाये रखने की है, उनका हौसला बढ़ाये रखने की है. दिव्यांगजन अपनी मेहनत, अपनी जिजीविषा, अपने हौसले, अपने विश्वास से स्वयं को समाज में बनाये हुए हैं, उन्हें बस यही एहसास करवाए जाने की आवश्यकता है कि वे इसी समाज का अंग हैं, इसी समाज के नागरिक हैं, वे हाशिये पर नहीं हैं, वे दोयम दर्जे के नहीं हैं. ऐसा समझा-समझाया जाना तभी संभव है जबकि समाज का एक-एक व्यक्ति दिव्यांगों को नागरिक ही समझे. उसकी दिव्यांगता किसी कारणवश उत्पन्न हुई हो सकती है, उसकी दिव्यांगता जन्मजात हो सकती है मगर इस कारण से उसे नकारात्मकता से गुजरना पड़े, यह सुखद नहीं.


समाज सभी विभेदों को मिटाकर दिव्यांगजनों को सहानुभूति की नजर से देखना बंद करे. उनको सहयोग की आवश्यकता तो हो सकती है मगर वे किसी दया के, किसी भीख के पात्र नहीं हैं. यदि इस सत्य को समझा जा सका तो इस वर्ष की अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस मनाए जाने की थीम भविष्य के लिए निर्धारित किए गये सभी सत्रह लक्ष्यों की प्राप्ति को वास्तविकता में मनाया जा सकता है.

 





 

20 अक्टूबर 2021

पैरा शूटिंग खिलाड़ियों हेतु वर्गीकरण

अस्त्र-शस्त्र के प्रति बचपन से ही एक तरह का लगाव रहा है. घर में भी हथियार होने के कारण उनके सञ्चालन को लेकर, रख-रखाव को लेकर कोई असमंजस नहीं रहा. बचपन से फायरिंग के प्रति रुचि होने के कारण प्रदर्शनी, मेला आदि में गुब्बारे फोड़ कर अपने मन को बहला लिया करते थे. बाद में कॉलेज के समय में एनसीसी कैम्प के चलते असली बन्दूक चलाने का मौका मिलता रहा. इसके अलावा विजयादशमी पूजन के पश्चात् बन्दूक,. रिवाल्वर के द्वारा भी फायरिंग करने का अवसर मिलता रहा. इस रुचि को खेल के माध्यम से पूरा करने का मौका उस समय मिला जबकि उरई में एक शूटिंग रेंज का उदघाटन हुआ. कुछ महीनों के बाद शूटिंग रेंज के द्वारा दस मीटर एयर रायफल को अपनी स्पर्धा के लिए चुना.


कोई ढाई-तीन महीने के नियमित अभ्यास के दौरान जानकारी हुई उत्तराखंड में देहरादून में होने वाली स्टेट चैम्पियनशिप के बारे में. उस राज्य स्तरीय स्पर्धा में सहभागिता करने का पूरा मन बना लिया. इसके पीछे एक तो हमारा अपना विश्वास था और इसके अलावा शूटिंग स्पर्धा को करीब से देखने का मन भी था. किसी शूटिंग चैम्पियनशिप में पहली बार सहभागिता करने के हिसाब से परिणाम उत्साहित करने वाले थे. दस मीटर एयर रायफल में चौथा स्थान मिला किन्तु प्राप्त अंकों के अनुसार नेशनल खेलने के लिए चयनित हुए. इसी के साथ पचास मीटर .22 रायफल स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त हुआ. हमारी मुख्य स्पर्धा दस मीटर एयर रायफल ही थी, इसलिए उसमें नेशनल हेतु चयनित होने पर ख़ुशी बहुत ज्यादा थी. नेशनल में खेलने के अनुसार अभ्यास, तैयारी शुरू कर दी गई.


इस अभ्यास, तैयारी को उस समय विराम लग गया जबकि जानकारी हुई कि अभी नेशनल इवेंट नहीं हो रही है. उसके बाद जनवरी-फरवरी 2020 से कोरोना का जो हंगामा शुरु हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है. पिछले डेढ़-दो साल इसी ऊहापोह में निकल गए. इसी दौरान जानकारी हुई कि पैरा स्पोर्ट्स के लिए आगे खेलने हेतु वर्गीकरण अनिवार्य है. इस हेतु भी अपनी सक्रियता बनाई गई. इसी माह जानकारी हुई कि दिल्ली में वर्गीकरण होने वाला है. उसके लिए सम्बंधित प्रक्रिया को पूरा किया गया और आखिर निर्धारित तिथि पर हमारा वर्गीकरण हो गया. आप सभी को यहाँ जानकारी दे दें कि हम पैरा के रूप में शूटिंग स्पर्धा में सहभागिता करते हैं. ऐसे में यहाँ के लिए निश्चित किये गए वर्गीकरण को करवाना आवश्यक होता है. दिल्ली में 17 अक्तूबर को हुए हमारे वर्गीकरण में हमें SH1A वर्ग में शामिल किया गया है. एक आवश्यक काम तो संपन्न हो गया, अब बाकी का काम तैयारी करना, अभ्यास करना तो है ही साथ ही पैरा इवेंट का इंतजार करना भी है.




वर्गीकरण की इस प्रक्रिया से गुजरने के दौरान जाना कि इस शूटिंग स्पर्धा में किस तरह से वर्गीकरण किया जाता है. इस बारे में एक संक्षिप्त जानकारी आप लोगों के साथ साझा कर रहे हैं. 


पैरा खेलों में निशानेबाजी का वर्गीकरण यह निर्धारित करने का आधार है कि कौन सा खिलाड़ी किस वर्ग में प्रतिस्पर्धा कर सकता है. निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा स्थापित करने के लिए वर्गीकरण का उपयोग किया जाता है. इससे सम्बंधित वर्ग में उसी वर्गीकरण वाले खिलाड़ियों के बीच आपस में प्रतिस्पर्धा होती है. पैरा शूटिंग के लिए तीन वर्गीकरण हैं, वर्गीकरण प्रणाली कार्यात्मक क्षमता पर आधारित है. अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मूल रूप से पांच वर्गीकरण थे. बार्सिलोना खेलों के बाद कार्यक्षमता की निष्पक्ष पहचान के चलते आईपीसी ने 2003 में एक नई वर्गीकरण प्रणाली विकसित करने की योजना बनाई. यह वर्गीकरण प्रणाली 2007 में प्रभावी हुई. इसके अंतर्गत दस विभिन्न विकलांगता प्रकारों को परिभाषित किया गया. बाद में 2011 में इस वर्गीकरण को तीन कर दिया गया. इन स्पर्धाओं में शारीरिक अक्षमता वाले पुरुष और महिला एथलीट प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. राइफल और पिस्टल स्पर्धाओं के साथ पुरुषों, महिलाओं की खड़े होकर और व्हीलचेयर पर बैठकर मिश्रित प्रतियोगिताएं होती हैं. बाद में इन स्पर्धाओं में दृष्टिबाधित खिलाड़ी भी प्रतिस्पर्धा करने के पात्र माने जाने लगे.


वर्गीकरण सामान्य रूप में तीन प्रकार से किया जाता है- SH1, SH2, SH3. पैरालंपिक खेलों में केवल SH1 और SH2 वर्गों का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो विश्व शूटिंग पैरा स्पोर्ट वर्गीकरण नियमों और विनियमों पर आधारित है.


SH1 के अंतर्गत वे खिलाड़ी या निशानेबाज़ आते हैं जो बिना स्टैंड के अथवा बिना सहारे के रायफल से निशाना लगाने में सक्षम हैं.

SH2 वर्ग में शामिल निशानेबाजों को निशाना लगाने के लिए रायफल को सहारा देने की आवश्यकता होती है.

SH3 वर्ग में दृष्टिबाधित खिलाड़ी शामिल किये जाते हैं. इन खिलाड़ियों को आवाज के माध्यम से निशाना लगाना होता है.


पैरालंपिक में दो वर्गीकरण ही मान्य हैं, SH1 और SH2. इन दो वर्गों में खिलाड़ियों को पुनः वर्गीकृत किया जाता है.


SH1 उपवर्ग 

इन उपवर्गों का उपयोग अनुमत बैकरेस्ट की ऊंचाई निर्धारित करने के लिए किया जाता है. यदि प्रतियोगी खड़े होकर प्रतिस्पर्धा करते हैं तो उन्हें केवल साधारण कृत्रिम अंग/ऑर्थोसिस द्वारा सहारा मिलना चाहिए. आर्म प्रोस्थेसिस में निश्चित कोहनी नहीं होनी चाहिए या राइफल को पकड़ना नहीं चाहिए. SH1 के भीतर वर्गीकृत सभी प्रतियोगी SH1 वर्ग में प्रतिस्पर्धा करते हैं, चाहे उनका उप-वर्गीकरण कुछ भी हो.


SH1Aइसमें खिलाड़ी बैठे या खड़े होकर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. कोई बैकरेस्ट की अनुमति नहीं होती है.

SH1B - खिलाड़ी बैठ कर प्रतिस्पर्धा करते हैं. इसमें निचले अंगों में गंभीर हानि लेकिन श्रोणि में सामान्य कार्य शामिल होता है. इस वर्ग में खिलाड़ियों को कम बैकरेस्ट की अनुमति होती है.  

SH1Cइसमें खिलाड़ी बैठ कर खेल सकते हैं. निचले अंगों का कार्य नहीं करना अथवा निचले अंगों में गंभीर हानि के साथ-साथ धड़ में हानि का होना शामिल होता है.


SH2 उप वर्ग 

इन उप-वर्गों का उपयोग बैकरेस्ट की अनुमति पूर्ण ऊंचाई और स्प्रिंग के लचीलेपन को निर्धारित करने के लिए किया जाता है. IPC द्वारा प्रमाणित शूटिंग स्टैंड के अलावा राइफल को सपोर्ट करने के लिए किसी अन्य डिवाइस की अनुमति नहीं होती है. SH2 के भीतर वर्गीकृत सभी प्रतियोगी SH2 वर्ग में प्रतिस्पर्धा करते हैं, चाहे उनका उप-वर्गीकरण कुछ भी हो.


SH2Aइसमें खिलाड़ी बैठे या खड़े होकर प्रतिस्पर्धा करते हैं. दोनों ऊपरी अंगों की गंभीर हानि या एक ऊपरी अंग का काम न करना इसमें शामिल होता है. कोई बैकरेस्ट की अनुमति नहीं है.

SH2B - खिलाड़ी बैठ कर प्रतिस्पर्धा करते हैं. कम बैकरेस्ट की अनुमति रहती है.

SH2Cइसमें एथलीट बैठ कर प्रतिस्पर्धा करते हैं. निचले अंगों में गंभीर हानि होती है या उनसे कार्य नहीं लिया जा सकता है.


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31 अगस्त 2021

टोक्यो पैरालम्पिक खेलों के वर्गीकरण की जानकारी

टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. अभी पैरालम्पिक खेल चल रहे हैं. ये खेल अभी पाँच सितम्बर 2021 तक चलने हैं, तब तक और भी ढेर सारे पदक भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते जाने हैं. ये विश्वास है क्योंकि हमारे खिलाड़ी अत्यंत ऊर्जा, विश्वास के साथ लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं. 


ऐसे बहुत से खेल प्रेमी जो खेलों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, खिलाड़ियों के जीतने पर प्रसन्न भी होते हैं मगर उनमें से बहुत से लोग पैरालम्पिक में किये गए वर्गीकरण को समझ नहीं पाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पैरालम्पिक के बारे में अथवा पैरा खेलों के बारे में जनसामान्य को बहुत अधिक न तो बताया गया है और न ही उनको भी इस बारे में बहुत ज्यादा रुचि है. लोगों के लिए विभिन्न स्पर्धाओं में किये गए वर्गीकरण, खिलाड़ियों की शारीरिक स्थिति के चलते उनकी स्पर्धा को समझ पाना बहुत जायद क्लिष्ट नहीं है. एक बार गंभीरता से इसे जान लिया जाये तो फिर पैरालम्पिक खेलों की विभिन्न स्पर्धाओं के बारे में सहजता से समझा जा सकता है. 




इस बारे में अपने पूर्व आलेख में कुछ समझाने का प्रयास किया था. इसे यहाँ क्लिक करके (पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी) पढ़ा जा सकता है. 


टोक्यो पैरालम्पिक में किस तरह का वर्गीकरण किया गया है, इसे यहाँ क्लिक करके (Paralympic Games Classification) समझा जा सकता है. 


इस बारे में इस आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पीडीएफ का भी अध्ययन यहाँ क्लिक करके किया जा सकता है. 


जो भी सामग्री लिंक पर उपलब्ध है, वह टोक्यो पैरालम्पिक 2020 की निम्न वेबसाइट से ली गई है. 

https://olympics.com/tokyo-2020/en/paralympics

29 अगस्त 2021

पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी

टोक्यो ओलम्पिक के बाद इस समय टोक्यो पैरालम्पिक चर्चा में है. ये और बात है कि ओलम्पिक की तरह मीडिया में इनको बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिल पा रहा है मगर हमारे देश के खिलाड़ी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके पैरालम्पिक खेलों की तरफ जनसामान्य का ध्यान खींच रहे हैं. पैरालम्पिक खेल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता में मुख्य रूप से वे खिलाडी सहभागिता करते हैं जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) की श्रेणी में आते हैं.  


यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो जानकारी मिलती है कि पैरालंपिक खेलों को दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था. सन 1948 में दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल चोट को ठीक करने के लिए न्यूरोलोजिस्ट गुडविंग गुट्टमान ने रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए खेलों का चयन किया. उस समय इन खेलों को अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स के नाम से पहचान मिली थी. कालांतर में सन 1960 में रोम में पहले पैरालम्पिक खेल हुए. इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी भाग ले सकते थे. इन खेलों में उस समय 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. ब्रिटेन के मार्गेट माघन पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बने. उन्होंने तीरंदाज़ी में स्वर्ण पदक जीता. इस पहले पैरालम्पिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. समय के साथ पैरालम्पिक खेलों में बदलाव होते गए और सन 1976 में अन्य पैरा खिलाड़ियों को भी इन खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया.




पैरालम्पिक में सहभागिता करने वाले खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है. उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि मुकाबला बराबरी का रहे. जैसे हाथ से विकलांग खिलाड़ियों को एक वर्ग में, पैरों से विकलांग खिलाड़ियों को एक अलग वर्ग में रखा जाता है. इसके अलावा पैरालम्पिक खिलाड़ियों के वर्गीकरण में उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी श्रेणी का निर्धारण किया जाता है.


किसी खिलाड़ी को पैरा खिलाड़ी मानने के दस मानदंड हैं-

1. माँसपेशियों की दुर्बलता

2. जोड़ों की गति की निष्क्रियता

3. किसी अंग में कोई कमी

4. टाँगों की लम्बाई में अंतर

5. छोटा क़द

6. हाइपरटोनिया यानी माँसपेशियों में जकड़न

7. शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी

8. एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी गति

9. नज़र में ख़राबी

10. सीखने की अवरुद्ध क्षमता.


श्रेणीकरण के साथ-साथ खेलों का भी वर्गीकरण किया जाता है. फील्ड की प्रतियोगिताएं एफ कोड के साथ जानी जातीं हैं. इसमें शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो आदि शामिल हैं. विकलांगता के हिसाब से इन खेलों में लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. ट्रैक की प्रतियोगिताओं को टी से परिभाषित किया जाता है. इसमें दौड़ और कूदने जैसी प्रतियोगिताएँ शामिल हैं. इन खेलों में 19 श्रेणियाँ होती हैं. सभी खेल स्पर्धाओं को विकलांगता के अनुसार अलग-अलग नंबरों में बाँटा जाता है. जैसे फील्ड की स्पर्धाओं में एफ़-32, एफ़-33, एफ़-34 आदि नंबर देखने को मिलते हैं. यहाँ इन्हीं नंबरों के अनुसार विकलांगता की स्थिति को पहचाना जाता है. जिस स्पर्धा में जितना कम नंबर होता है, उसकी उतनी ही अधिक विकलांगता होती है.


फील्ड और ट्रैक की प्रतियोगिताओं के अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर वाले खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और तलवारबाजी) भी पैरालम्पिक में खेले जाते हैं. व्हीलचेयर पर खेले जाने वाले खेलों की पहचान डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से की जाती है. इन खेलों में भी जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं उनको एस से पहचाना जाता है. इसको भी दो अलग-अलग विकलांगता श्रेणियों में बाँटा गया है. यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में विकलांगता होती है तो एस के साथ यू लिखा होगा, जिसका अर्थ है अपर लिंब. इसी तरह यदि एस के आगे एल लिखा है तो इसका अर्थ हुआ कि शरीर के निचले हिस्से (लोअर लिंब) में विकलांगता है.




पैरालम्पिक खेलों में खिलाड़ियों के चयन के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी (आईपीसी) द्वारा मानक का निर्धारण किया गया है. इसमें भी ये आवश्यक नहीं कि किसी खिलाड़ीद्वारा इस मानक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे चयनित नहीं माना जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीसी द्वारा प्रत्येक देश एक निश्चित कोटा है, इस निर्धारित कोटे से ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते. ऐसे में यदि निर्धारित कोटे से अधिक ख़िलाड़ी निर्धारित मानक लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाया जाता है. इसमें चयनित खिलाड़ी ही अंतिम रूप से पैरालम्पिक के लिए चयनित होते हैं. इसके अलावा विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है.


वर्तमान में देश की तरफ से अनेक खिलाड़ी टोक्यो में अपना प्रदर्शन करने के लिए गए हैं. उन सभी को शुभकामनाएँ.

03 दिसंबर 2020

बेहतर पुनर्निमाण : दिव्यांगजनों के लिए समावेशी, सुलभ और अनुकूल माहौल हो

आज, 03 दिसम्बर को सभी देश दिव्यांगजनों के लिए मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस मना रहे हैं. वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रुप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था. इस दिवस के मनाये जाने का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनाना है. इस दिवस का आरम्भ भले ही वर्ष 1981 से कर दिया गया हो मगर सन 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है. विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है. इसके बाद से ही सन 1992 से इसे पूरी दुनिया में हर साल से लगातार मनाया जा रहा है.  


समाज में आज भी दिव्यांगजनों के प्रति विभेद देखने को मिलता है. समाज के बहुत से क्षेत्रों में उनके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. कई बार उनको उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने की दिशा में काम करने को प्रेरित करना भी आज के दिन का उद्देश्य है. दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने की स्थिति ये है कि ज्यादातर लोग ये नहीं जानते कि उनके घर के आसपास कितने लोग दिव्यांग हैं. लोगों को इसकी भी जानकारी नहीं कि समाज में दिव्यांगजनों को बराबर का अधिकार मिल रहा है या नहीं. ऐसे में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में,  दिव्यांगजनों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये इस दिवस को मनाना बहुत आवश्यक है.



संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व विकलांग दिवस की एक थीम प्रतिवर्ष निश्चित कर दी जाती है. उसी के अनुसार प्रतिवर्ष दिव्यांगजनों के हितार्थ कार्य होते रहते हैं. विगत कुछ वर्षों की थीम इस तरह से हैं.


वर्ष 1998 - कला, संस्कृति और स्वतंत्र रहन-सहन

वर्ष 1999 - नयी शताब्दी के लिये सभी की पहुँच

वर्ष 2000 - सभी के लिये सूचना क्रांति कार्य निर्माण

वर्ष 2001 - पूर्ण सहभागिता और समानता: प्रगति आँकना और प्रतिफल निकालने के लिये नये पहुँच मार्ग के लिये आह्वान

वर्ष 2002 - स्वतंत्र रहन-सहन और दीर्घकालिक आजीविका

वर्ष 2003 - हमारी खुद की एक आवाज

वर्ष 2004 - हमारे बारे में कुछ नहीं, बिना हमारे

वर्ष 2005 - विकलांगजनों का अधिकार: विकास में क्रिया

वर्ष 2006 - ई-एक्सेसिबिलीटी

वर्ष 2007 - विकलांगजनों के लिये सम्माननीय कार्य

वर्ष 2008 - विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन : हम सभी के लिये गरिमा और न्याय

वर्ष 2009 - एमडीजी का संयुक्त निर्माण : पूरी दुनिया में विकलांग व्यक्तियों और उनके समुदायों का सशक्तिकरण

वर्ष 2010 - वादे को बनाये रखना : 2015 और उसके बाद की ओर शताब्दी विकास लक्ष्य में मुख्यधारा विकालांगता

वर्ष 2011 - सभी के लिये एक बेहतर विश्व के लिये एक साथ : विकास में विकलांग व्यक्तियों को शामिल करते हुए

वर्ष 2012 - सभी के लिये एक समावेशी और सुगम्य समाज उत्पन्न करने के लिये बाधाओं को हटाना

वर्ष 2013 - बाधाओं को तोड़ें, दरवाज़ों को खोलें : सभी के लिये एक समावेशी समाज और विकास

वर्ष 2014 - सतत् विकास : तकनीक का वायदा

वर्ष 2015 - समावेश मायने रखता है : सभी क्षमता के लोगों के लिये पहुँच और सशक्तिकरण

वर्ष 2016 - भविष्य के लिए 17 लक्ष्य हासिल करना

वर्ष 2017 - सभी के लिए टिकाऊ और लचीला समाज की ओर परिवर्तन

वर्ष 2018 - विकलांग व्यक्तियों को सशक्त बनाओ तथा उनके समावेश और समानता को सुनिश्चित करो

वर्ष 2019 - विकलांग व्यक्तियों के नेतृत्व और उनकी भागीदारी को बढ़ावा देना

वर्ष 2020 - बेहतर पुनर्निमाण : कोविड-19 के बाद की दुनिया में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समावेशी, सुलभ और अनुकूल माहौल हो

 

सभी नागरिकों से यही अपेक्षा है कि जब इस बीमारी (कोविड-19) से समूचा विश्व प्रभावित है, तब अपने आसपास के दिव्यांगजनों के साथ बराबरी का व्यवहार करें. उनको किसी से कमतर न समझें. उनको हीनभावना से नहीं बल्कि समाज के एक जिम्मेवार, सम्मानित नागरिक की तरह ही देखें, समझें. ऐसी भावना के साथ ही हम लोग समाज के दिव्यांगजनों के विकास, विश्वास में सहायक सिद्ध हो सकते हैं.

 

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वंदेमातरम्

13 अप्रैल 2020

दिव्यांगों का उपहास उड़ाते टिकटॉक वीडियो

विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द किये जाने के बाद भी समाज की मानसिकता में बदलाव क्यों नहीं आया? क्या दिव्यांगजन दया, रहम, भीख, लाचारी, करुणा, उपहास, मजाक, तिरस्कार आदि जैसे भाव के ही अधिकारी हैं? ऐसे संभवतः आप सबकी समझ में नहीं आएगा. यदि इसका मर्म समझना चाहते हैं तो पढ़िएगा इसे.


देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने पहले कार्यकाल में अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए विकलांग शब्द को परिवर्तित करते हुए इसे दिव्यांग बना दिया था. इसके पीछे उनकी सोच थी कि समाज में विकलांग शब्द से शारीरिक अक्षम व्यक्तियों के प्रति जिस तरह की मानसिकता का निर्माण होता जा रहा है वह दूर होगा. दिव्यांग शब्द देने का उनका कारण इसके पीछे छिपी दिव्यता था. उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए जो कहा था उसका भावार्थ इतना था कि प्रकृति की तरफ से, ईश्वर की तरफ से यदि किसी अंग की कमी रखी जाती है, किसी अंग को कमजोर बनाया जाता है तो उसमें वह शक्ति अपनी दिव्यता भर देती है. इसी अप्रत्यक्ष दिव्यता के चलते उन्होंने विकलांग शब्द को दिव्यांग में परिवर्तित कर दिया था. उनके इस निर्णय के तुरंत बाद ही हमने लेखों, विचारों, टिप्पणियों के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा भी था कि समाज की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है न कि शब्द बदलने की. इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री जी को एक पत्र भी लिखा था.


शब्द परिवर्तन का कदम स्वयं प्रधानमंत्री जी द्वारा उठाया गया था, ऐसे में सरकारी स्तर पर तुरत-फुरत कार्यवाही करते हुए सभी जगहों पर विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द कर दिया गया, चलन में ला दिया गया. मंत्रालयों, विभागों, सरकारी तथा गैर-सरकारी कार्यालयों में भी उसी के तुरंत बाद दिव्यांग शब्द चलन में आ गया. जैसा कि आशंका थी वही हुआ. दिव्यांग शब्द तो लिखत-पढ़त में कार्य करने लगा, कागजों में इसकी उपस्थिति दिखने लगी मगर समाज की सोच से, उसकी मानसिकता से यह दूर नहीं हो सका. लोगों के दिमाग में विकलांग शब्द बना ही रहा. इस शब्द के साथ इन लोगों के प्रति दया, रहम, भीख, लाचारी, करुणा, उपहास, मजाक, तिरस्कार आदि जैसे भाव भी चिपके रहे. ऐसा इसलिए क्योंकि आज सम्पूर्ण विश्व चीनी वायरस कोरोना की चपेट में आकर महामारी से जूझ रहा है. अपना देश भी इससे अछूता नहीं रह सका है. देश में महामारी बहुत बुरी तरह न फैले, कोरोना का संक्रमण व्यापक रूप से यहाँ के नागरिकों को प्रभावित न करे इसके लिए सरकार द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया है. इस लॉकडाउन को गंभीरता से लिया जाना चाहिए था, बहुत से लोगों द्वारा इसे गंभीरता से लिया जा रहा है. इस गंभीरता में भी बहुत से लोग मजाकिया, हास्य का संचार करते हुए वातावरण को हल्का करने का प्रयत्न कर रहे हैं. इसी प्रयत्न में कुछ असामाजिक लोग ऐसे भी हैं जो हास्य के द्वारा भी दिव्यांगजनों का मजाक उड़ाने से नहीं चूक रहे हैं.


ये असामाजिक तत्त्व टिकटॉक पर सार्वजनिक रुप से वीडियो बनाकर दिव्यांगो का उपहास करने में लगे हैं. ये वीडियो टिकटॉक पर बनाये जाने के बाद सोशल मीडिया वायरल किये जा रहे हैं. देश में एक तरफ कोरोना से बचाव के लिए लॉकडाउन जैसी व्यवस्था लागू की गई है वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग अपने समय को व्यतीत करने के लिए दिव्यांगों का मजाक उड़ाने में लगे हुए हैं. इस तरह के वीडियो में स्पष्ट रूप से फिल्माया जा रहा है कि लॉकडाउन की स्थिति में बाहर निकला व्यक्ति (इसमें स्त्री, पुरुष दोनों दिखाए जा रहे हैं) पुलिस के हूटर की आवाज़ सुनते ही अपने आपको पुलिस से बचाने के लिए दिव्यांगजनों की तरह नकल उतारने लग जाता है. इस फिल्मांकन में बैकग्राउंड में जोरों से हँसने की आवाज़ भी स्पष्ट रूप से सुनाई देती है. यह कहीं न कहीं दिव्यांगजनों के प्रति उपेक्षा, उपहास, मजाक का भाव है. उनके प्रति दया, लाचारी जैसा भाव भी है जो सन्देश देने की कोशिश करता है कि यदि इस लॉकडाउन जैसी गंभीर स्थिति में पुलिस की कार्यवाही से बचना है तो दिव्यांगजनों की तरह चलना, व्यवहार करना शुरू कर देना चाहिए.

टिकटॉक पर ऐसे वीडियो दिव्यांगो का उपहास करते हुए उनकी गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं. यहाँ ध्यान रखना होगा कि भारत सरकार के एक अधिनियम के अंतर्गत दिव्यांगों के मजाक उड़ाने को, उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाने को कानूनी अपराध माना जाता है. टिकटॉक पर बनाये जा रहे वीडियो समाज की मानसिकता को ही उद्घाटित करते हैं. इन वीडियो का व्यापक रूप से वायरल होना सिद्ध करता है कि हमारा समाज विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द भले ही स्वीकार कर ले मगर उनके प्रति उपेक्षा, उपहास, लाचारी जैसा भाव दूर नहीं कर पा रहा है.  


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

14 फ़रवरी 2020

एक-दूजे के हमसफ़र बने नेत्रहीन दिव्यांग

14 फरवरी, समाज में बहुतायत लोगों के लिए वेलेंटाइन डे का परिचायक बना हुआ है. वेलेंटाइन के बारे में बिना जाने-समझे विपरीत-लिंगी एक-दूसरे को लुभाने में लगे हुए हैं. बहरहाल, समाज में सबकी अपनी स्वतंत्र सोच है, अपना स्वतंत्र अस्तित्व है जो कुछ भी मानने, मनाने के लिए मुक्त है. इसी दिन वर्ष 2019 में पुलवामा में आतंकी हमले में देश ने अपने अनमोल नगीने सदा-सदा को खो दिए थे. अनेक परिवारों के चिराग हमेशा-हमेशा को खामोश हो गए थे. आज का दिन बहुत से लोग उनको याद करते हुए मनाने में व्यस्त हैं. यह भी व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता, अपनी इच्छा के कारण ही है. वैसे भी हरेक दिन किसी न किसी के लिए बुरा होता है, किसी के लिए अच्छा. कोई दिन विशेष को सुख के लिए सदैव याद रखता है तो कोई उस दिन विशेष के दुःख में सदैव आंसू बहाता रहता है. आज जब लोग कहीं पुलवामा के शहीदों को याद करते हुए उनको नमन कर रहे थे, कहीं-कहीं लोग वेलेंटाइन के नाम पर प्रेम की तलाश में भटक रहे थे उसी समय उरई शहर के हुलकी माता मंदिर में दो इंसान दाम्पत्य जीवन में प्रवेश कर रहे थे, एक नई राह पर चलते हुए नवजीवन का आधार निर्मित कर रहे थे. 



दाम्पत्य जीवन में तो रोज ही अनेक लोग बँधते हैं, नित्य ही अनेक लोग नवजीवन का आरम्भ करते हैं मगर आज इस वैवाहिक आयोजन के अपने ही मायने थे. मंदिर प्रांगण की पावनता के बीच संपन्न होने वाले वैवाहिक आयोजन में स्वतः ही एक तरह की पावनता, मधुरता झलक रही थी. दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करने वाले दोनों इंसान दुनिया को बजाय देखने के महसूस करते हैं, उसका एहसास करते हैं. जी हाँ, उरई शहर में संचालित होने वाले अंध-विद्यालय के नेत्रहीन शिक्षक तेजपाल आज विवाह के बंधन में बंधे. सुजाता उनकी जीवन-संगिनी बनी जो वर्तमान में तकनीकी शिक्षा में अध्ययनरत हैं. इसे संयोग कहा जाये या कुछ और कि सुजाता भी तेजपाल की तरह ही दुनिया को देखने के स्थान पर महसूस करती हैं. सुजाता का परिवार मध्य प्रदेश के जबलपुर में निवास करता है, जिनका मूल कार्य मजदूरी करना है. तकनीकी शिक्षा के अध्ययन के दौरान सुजाता की मित्रता अपनी ही तरह एक नेत्रहीन नीता से हुई जिसके द्वारा उनकी राह उरई में निवास कर रहे तेजपाल तक चली आई. असल में नीता का विवाह विगत वर्ष मई में नेत्रहीन शिक्षक रामसूरत के साथ हुआ. रामसूरत और तेजपाल एकसाथ अध्ययन करते रहे हैं और उरई ने अंध-विद्यालय में एकसाथ रहे भी हैं. मित्रता का ध्रुव बजाय एकपक्षीय रहने के द्विपक्षीय रहा. उधर सुजाता और नीता मित्र थीं इधर तेजपाल और रामसूरत मित्र थे. दोनों के प्रयासों से दोनों परिवार मिले और बात अंततः विवाह पर आकर संपन्न हुई.




उरई के हुलकी माता मंदिर के प्रांगण में दिन में गायत्री परिवार के रीति-रिवाजों के साथ तेजपाल और सुजाता का विवाह संपन्न हुआ. इस विवाह में न केवल दोनों के परिजन शामिल हुए वरन अंध-विद्यालय के बच्चे, शिक्षक, कर्मचारी सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिक और प्रशासनिक अधिकारियों में सर्वसुलभ और अत्यंत सहज-सरल अपर जिलाधिकारी भी शामिल हुए. एक विशेष बात यह भी रही कि वर्तमान में अमेठी में कार्यरत रामसूरत और उनकी पत्नी नीता भी अपने मित्रों के वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने अपने परिजनों संग उपस्थित हुए. तेजपाल और सुजाता की भावी राह सुखमय रहे यही कामना है.



बाँए से - गणेश शंकर त्रिपाठी, नीता, रामसूरत (पति-पत्नी), कुमारेन्द्र 

10 जनवरी 2020

जीवट आत्मविश्वास के आगे बौनी बनी शारीरिक अक्षमता


उरई के इंदिरा स्टेडियम में बुन्देलखण्ड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट का आयोजन का आज शुभारम्भ हुआ. पहले दी ही अनेक मैच हुए. उन मैचों सहित पूरे टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग की जिम्मेवारी हमारे ऊपर थी. ऐसे में एक-एक मैच को देखा जा रहा था, उनके परिणामों पर, खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर भी रखी जा रही थी. इसी निगरानी के बीच एक मैच सामने से गुजरा जो कहीं न कहीं हमारी दो-तीन साल पुरानी मांग को पूरा करता दिखा साथ ही आश्चर्य में भी डाल गया. जिला बैडमिंटन क्लब विगत कई वर्षों से टूर्नामेंट का आयोजन करता आ रहा है. अपने शौक और अपनी शारीरिक स्थिति के चलते हर बार आयोजकों से निवेदन किया जाता रहा है कि कम से कम एक मैच पैरा खिलाड़ियों के लिए करवा दिया करें. भले ही ये मैच प्रदर्शनी हो मगर ऐसा होना चाहिए. इससे एक तरफ पूरे समाज में सन्देश जाएगा कि जनपद जालौन का जिला बैडमिंटन क्लब पैरा स्पोर्ट्स के लिए सजग है, साथ ही जनपद में तथा जनपद के आसपास के पैरा खिलाड़ियों में भी उत्साह का संचार करेगा.


बहरहाल विगत कई वर्षों की मांग सिर्फ मांग बनकर ही रह गई. इसके पीछे यहाँ के लोगों का, खिलाड़ियों का आगे न आना भी रहा. आज जब बालिका जूनियर वर्ग में एक मैच चल रहा था. उस मैच को हम महज मीडिया की दृष्टि से देख रहे थे. तभी हमारी नजर में वो खिलाड़ी आई जिसकी चर्चा हमसे क्लब के पदाधिकारियों द्वारा पैरा मैच करवाने के सन्दर्भ में हो चुकी थी. वो खिलाड़ी बहुत ही आत्मविश्वास से अपने मैच का जैसे आनंद ले रही हो. जैसा कि उसके खेलने के ढंग से, उसके शॉट लगाने के हावभाव से लग रहा था कि वह पूरी तरह से अपनी जीत के प्रति आशान्वित है. मैच जैसा कि अपेषित था, उसी ने जीता. मैच के समाप्त होने के बाद तमाम तरह की औपचारिकताओं के करने के बाद, कतिपय मीडियाकर्मियों से बातचीत करने के बाद लगा कि वह फ्री है तो उससे बात करने का समय लिया. ऐसा इसलिए नहीं कि उससे महज बात करनी थी बल्कि इसलिए कि एक खिलाड़ी के रूप में उसका सम्मान बना रहे.


उससे अनुमति लेकर ही उसका वीडियो बनाया, जो फेसबुक पर लाइव भी किया, उसकी अनुमति लेकर. ऐसा इसलिए किया कि महज उसकी शारीरिक अवस्था के चलते उसे किसी तरह का विभेद न महसूस हो. आज के दिन वह एक खिलाड़ी थी और वह भी विजेता. ऐसे में उसके साथ व्यवहार भी एक विजेता की तरह किया जाना था. उसकी अनुमति के साथ ही औपचारिक, अनौपचारिक बातचीत के द्वारा उसके बारे में, उसके खेल के बारे में, उसकी इस खेल में आने की स्थिति के बारे में, उसके परिवार के बारे में जानने का प्रयास किया. स्वाति सिंह, जी हाँ, यही नाम है उस जीवट खिलाड़ी का, जिसका दायाँ हाथ जन्म से पूर्ण नहीं है. कोहनी के आगे का हाथ विकसित ही नहीं हो सका. बहरहाल, उसे किसी भी क्षण ये महसूस नहीं हुआ कि उसका एक हाथ पूर्ण नहीं है. अपनी आँखों से उसे मैच में जहाँ सर्विस लेते देखा वहीं अपने सामने बैठकर उसे जूतों के फीते बांधते देखा. 


स्वाति में जितना आत्मविश्वास अपने खेल के प्रति लगा उतना ही भोलापन उसके स्वभाव में नजर आया. कृषक पिता की सबसे बड़ी संतान के रूप में कबड्डी को तिलांजलि देकर वह पी०वी० सिंधु को अपना आदर्श मानकर बैडमिंटन में उतर आई. दसवीं की परीक्षा एक साल पहले उत्तीर्ण करने के बाद स्वाति वर्तमान में प्राविधिक शिक्षा ग्रहण कर रही है. दो छोटे भाई-बहिन गाँव में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और स्वाति उरई में स्वावलंबी और खिलाड़ी बनने के लिए प्रयासरत है. सबसे बड़ी बात यह कि महज तीन महीने के अभ्यास के बाद उसमें बैडमिंटन के प्रति असीम प्रेम, स्नेह, समर्पण दिखाई देता है. अपने सभी वरिष्ठ साथियों के सहयोग के प्रति वह अभिभूत है. उसका कहना है कि स्टेडियम के सभी साथियों का इतना सहयोग ही है तभी वह आज इस टूर्नामेंट में भाग ले पा रही है. इन्हीं साथियों की बदौलत वह पूरे विश्वास के साथ अपनी तैयारी कर पाई है. ऐसा लगा भी क्योंकि अपने जीवन का पहला मैच, पहला टूर्नामेंट खेलने वाली स्वाति जबरदस्त आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी. वर्तमान में पैरा से इतर खुद को सामान्य वर्ग में सबके सामने उतार कर स्वाति ने खुद को ही साबित किया है. कामना है कि जल्द ही वह अपनी प्रतिभा को समूचे देश के सामने प्रदर्शित करे.

03 दिसंबर 2018

दिव्यांगजनों के प्रति मानसिकता बदलने की आवश्यकता

वर्ष भर प्रतिदिन किसी न किसी दिवस के आयोजन के कारण जनमानस का ध्यान भी अब राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय दिवसों के आयोजनों से हटने लगा है. इसी दिसम्बर माह के आरम्भिक तीनों दिन किसी न किसी दिवस के आयोजन हेतु रहे. ये किस्सा पूरे साल बना रहता है. जनमानस समाचारों में, बैनरों में, होर्डिंग्स में इन दिवसों के बारे में जान-समझकर अपने आपको उसी क्षण उस दिवस से जोड़ता है और अगले ही पल उसे विस्मृत कर देता है. ऐसे में किसी गंभीर आयोजन का भी हाल सामान्य सा रह जाता है. उस दिन विशेष का आयोजन किस कारण किया जाना है, उसके आयोजन का उद्देश्य क्या है, उसका सुफल क्या प्राप्त हुआ इस पर फिर किसी का ध्यान नहीं रहता है. ऐसा ही कुछ उन दिवसों के बारे में देखने को मिल रहा है जिनके आयोजन की महती आवश्यकता है. समाज को उनके बारे में जागरूक करने की अत्यधिक आवश्यकता है. ऐसे ही महत्त्वपूर्ण दिवसों में एक दिवस अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस भी शामिल है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से देश में अब विकलांग के स्थान पर दिव्यांग शब्द प्रयोग होने लगा है किन्तु उनके साथ कार्य-व्यवहार में अभी भी स्थिति बदली नहीं है.


दिव्यांग शब्द अब सरकारी कार्यों में, आम बोलचाल में दिखाई देने लगा है किन्तु आम जनमानस में अभी भी एक तरह की सुसुप्तावस्था देखने को मिलती है. जनमानस को लगता है जैसे कि किसी दिव्यांग के प्रति एकमात्र सहानुभूति दर्शाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की जा सकती है. मदद के नाम पर चंद सिक्के, दो शब्द ही दिखाई देते हैं. ऐसा इसलिए भी समझ आता है क्योंकि अभी भी समाज में आम धारणा बनी हुई है कि दिव्यांगों अथवा किसी अन्य जरूरतमंद के लिए कार्य करने जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ सरकार की है. ऐसा इसलिए भी और है क्योंकि सरकारी कार्यक्रमों में जनमानस की भागीदारी उतनी तीव्रता से नहीं करवाई जाती है जितनी कि जनप्रतिनिधियों की होती है, सत्ताधारी दल के छोटे-बड़े पदाधिकारियों की होती है, समाज के प्रतिष्ठित लोगों की होती है. सरकारी आयोजनों में ऐसे लोग ही सम्मान हासिल करते देखे जाते हैं और भीड़-दर्शकों के नाम पर या तो लाभान्वित होते हैं या फिर सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी. यहाँ आम नागरिक लगभग विलुप्त सा होता है. ऐसे में किसी दिवस के आयोजन को लेकर समाज में, आम नागरिकों में जागरूकता देखने को नहीं मिलती है. कमोबेश ऐसी स्थिति दिव्यांग दिवस को लेकर भी है. समाज के बहुसंख्यक लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं कि तीन दिसम्बर को इस तरह का कोई दिवस आयोजित भी किया जाता है.


बाकी किसी और दिवस के आयोजन के बारे में तो नहीं कहा जा सकता किन्तु दिव्यांग दिवस के आयोजन में आम नागरिकों की सहभागिता अधिक से अधिक होनी चाहिए. इससे एक तो नागरिकों को भी ऐसे आयोजनों से जुड़ने का अनुभव होगा, दूसरे समाज के लोगों को अपने बीच के लोगों की समस्याओं के बारे माँ जानने-समझने का अवसर मिलेगा. दिव्यांगजनों की समस्या आर्थिक सशक्तिकरण की उतनी नहीं है जितनी कि सामाजिक स्वीकार्यता की है, उनके विश्वास को बनाये रखने की है, उनका हौसला बढ़ाये रखने की है. दिव्यांगजन अपनी मेहनत, अपनी जिजीविषा, अपने हौसले, अपने विश्वास से स्वयं को समाज में बनाये हुए हैं, उन्हें बस यही एहसास करवाए जाने की आवश्यकता है कि वे इसी समाज का अंग हैं, इसी समाज के नागरिक हैं, वे हाशिये पर नहीं हैं, वे दोयम दर्जे के नहीं हैं. ऐसा समझा-समझाया जाना तभी संभव है जबकि समाज का एक-एक व्यक्ति दिव्यांगों को नागरिक ही समझे. उसकी दिव्यांगता किसी कारणवश उत्पन्न हुई हो सकती है, उसकी दिव्यांगता जन्मजात हो सकती है मगर इस कारण से उसे नकारात्मकता से गुजरना पड़े, यह सुखद नहीं.

व्यक्तिगत अनुभव से एहसास हुआ है कि अभी भी समाज में दिव्यांगों के प्रति सहानुभूति का, दया का भाव बना हुआ है. शिक्षित, समर्थ, योग्य दिव्यांग व्यक्ति के लिए भी समाज इसी तरह की धारणा बनाये हुए है. छोटे से छोटे, बड़े से बड़े कार्य के लिए सामाजिक प्राणी उसके साथ ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह दिव्यांग सम्बंधित कार्य को करने में अक्षम है. जबकि ऐसा नहीं है. वर्तमान में अनेकानेक वास्तविक कहानियाँ हमारे आसपास दिव्यांगजनों के हौसले को चित्रित करती दिखाई दे रही हैं. बहुतायत में ऐसे दिव्यांगजन ऐसे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, अपनी कर्मठता, अपनी जिजीविषा से असंभव को संभव कर दिया है. ऐसे में यदि सरकारी अथवा गैर-सरकारी आयोजनों को किया जाता है तो उसमें महज औपचारिकता का निर्वहन न किया जाये बल्कि उसको महत्ता देते हुए आम नागरिकों के बीच स्थापित किया जाये. अभी भी बराबर महसूस होता है कि दिव्यांगों के प्रति सामाजिक सोच में बदलाव आने में दशकों लगेंगे. 
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वैसे इस वर्ष 2018 की थीम विकलांग व्यक्तियों को सशक्त बनाओ तथा उनके समावेश और समानता को सुनिश्चित करो (इम्पावरिंग पर्सन विथ डिसएबिलिटीज एंड इनश्योरिंग इनक्लूजीवनेस एंड इक्वालिटी) है.