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10 नवंबर 2024

साहित्य आजतक में उर्फी जावेद?

ये फ़ोटो आज चर्चा में है. ये फ़ोटो एडिट लग रही है क्योंकि आज तक के आधिकारिक पेज पर साहित्य कार्यक्रम में इसका नाम नहीं है. हाँ, ऐसी जानकारी मिली कि ये 2022 के कार्यक्रम में चर्चा में आई थी. साहित्य का कार्यक्रम है और लोगों की आपत्ति है कि ये कौन सी साहित्यकार है? यहाँ एक बात सबको समझनी जाननी चाहिए कि सिनेमा अब हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम का हिस्सा है. सिनेमा अब विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है. हिन्दी साहित्य से जुड़े बहुत से लोग वर्तमान में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं, किताबें लिखते हैं.

 

ऐसे में इस प्रतिभा का स्वागत होना चाहिए. आख़िर प्रसिद्ध तो है ही और लोग भी किसी भी साहित्यकार से ज़्यादा इसे पहचानते होंगे. न हो विश्वास तो आप अपने मोहल्ले में ही किसी वर्तमान साहित्यकार का नाम लेकर उसका परिचय पूछिए और इसका परिचय पूछिए. स्थिति स्पष्ट हो जायेगी.

 




11 फ़रवरी 2016

उठो नागरिको



देश में रहकर देशविरोधी नारे लगाये जाना किसी भी रूप में स्वस्थ मानसिकता, स्वस्थ विचारधारा का सूचक नहीं है. जैसा कि खुलकर सामने आया है कि देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में एक आतंकवादी को शहीद घोषित करते हुए आयोजन किया गया. इस आयोजन में न केवल कश्मीर की आज़ादी सम्बन्धी नारे लगाये गए वरन भारत की बर्बादी के, उसके मुर्दाबाद के नारे भी लगाये गए. ऐसे आयोजनों को, ऐसे प्रदर्शनों को महज विरोधी स्वर कहकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. देखा जाये तो यही वे बिंदु होते हैं जो संगठित होते-होते एक बड़ा समुच्चय बना लेते हैं. देश की राजधानी में उठा ऐसा कदम कदापि नजरअंदाज़ करने योग्य नहीं है. इसके पीछे मूल कारण ये है कि किसी भी देश की राजधानी पर न केवल सम्बंधित देश के लोगों की वरन समूचे विश्व समुदाय की दृष्टि केन्द्रित होती है. ऐसी स्थिति में ये घटना विकराल इस कारण से भी है क्योंकि ये एक विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थान में संपन्न हुई, एक आतंकवादी के समर्थन में संपन्न हुई है. सरकार को, शासन-प्रशासन को इस मामले में कठोर कार्यवाही करने की आवश्यकता है क्योंकि यदि इस घटना को महज घटना मानकर विस्मृत कर दिया गया तो भविष्य में इसके और विकराल रूप धारण करने की आशंका है.
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यहाँ ध्यान देना होगा कि ऐसी घटनाओं से किसी भी देश की छवि को नकारात्मकता प्राप्त होती है. समझना होगा कि अभी कुछ दिन पहले हैदराबाद के एक छात्र की आत्महत्या को भी इस रूप में प्रसारित किया गया जैसे कि भारत सरकार छात्र-विरोधी है, दलित-विरोधी है. जबकि इस मामले में स्पष्ट हो चुका है कि वो और उसके अन्य साथी एक आतंकी की फाँसी का विरोध कर रहे थे और उसकी मौत के बाद घर-घर में उस जैसा आतंकी पैदा होने की नारेबाजी कर रहे थे. इसके बाद अब ऐसी घटना के सामने आने से निश्चित ही एक नकारात्मक सन्देश समाज में जाता दिखता है. ऐसा लगता है जैसे देश में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. यहाँ जब जिसकी मर्जी होती है वो अपने अनुसार अपने-अपने आदर्श स्थापित करने लग जाता है. जब जिसकी मर्जी होती है वो देश-विरोधी गतिविधियों में खुलेआम संलग्न होने लगता है. जब जिसका मन होता है वो देश-विरोधी ताकतों से मिलकर सरकार विरोधी कार्यवाही को अंजाम देने लगता है.
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ऐसे में एक आतंकवादी को शहीद घोषित करते हुए देश-विरोधी नारे लगाये जाने को तथाकथित रूप से उन संगठनों की अप्रत्यक्ष सजगता समझा जाना चाहिए जो किसी न किसी रूप में सरकार के विरोध में अपने कार्य करते रहते हैं. स्पष्ट है कि ऐसे संगठनों के लिए, ऐसे व्यक्तियों के लिए देश का कोई महत्त्व नहीं है. यदि उनके लिए देश का महत्त्व किसी भी रूप में होता, देश-हित का कोई अर्थ होता, देश-विरोधी ताकतों के विरोध में खड़े होने का मन होता तो ऐसे लोगों द्वारा देश को कमजोर करने वाले कार्यों में संलिप्त न हुआ जाता. सरकार का विरोध करना लोकतान्त्रिक कदम माना जा सकता है किन्तु जिस तरह से अब घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया जाने लगता है, किसी भी घटना को दलित विरोधी बताकर प्रचारित किया जाने लगता है, किसी भी घटना पर देश-विरोधी प्रदर्शन किये जाने लगते हैं वे कदापि स्वीकार्य नहीं होने चाहिए. ऐसी घटनाओं पर न केवल शासन-प्रशासन को, न केवल सरकार को वरन नागरिकों को भी सचेत रहने की, सजग रहने की आवश्यकता है. शासन-प्रशासन, सरकार अपने स्तर पर कार्यवाही तो करे ही नागरिकों को भी ऐसी देश-विरोधी ताकतों के खिलाफ सामाजिक तिरस्कार का अभियान चलाया जाना चाहिए. यहाँ सवाल महज सरकार का नहीं वरन देश का है और किसी भी नागरिक को समझना-जानना होगा कि जब बात देश की हो, देश-हित की हो अथवा देश-विरोध की हो सबको संयुक्त रूप से, पूर्वाग्रह से रहित होकर एकजुट होना ही चाहिए, एकजुट होना ही पड़ेगा.


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03 जनवरी 2016

माताओं का चरित्रहनन है ये आरोप


‘चयन के बदले डीडीसीए के चयनकर्ता द्वारा सेक्स की माँग की गई’ जैसे आरोप की गम्भीरता को समझने की आवश्यकता है. इस आरोप को सामान्य आरोप अथवा झूठा बयान कहकर विस्मृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऐसे आरोप की जानकारी किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा नहीं दी गई है. संवैधानिक पद पर बैठे, मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा यदि इस तरह के आरोप का खुलासा किया जा रहा है तो ऐसे आरोप को आपसी विवाद कहकर नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दिल्ली मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय पर सीबीआई के छापे के तत्काल बाद ही जागृत अवस्था में आये दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को डीडीसीए के घोटालों में घेरने का प्रयास किया. इसी प्रयास में वे खिलाड़ी के चयन के बदले सेक्स की माँग जैसे आरोप को सामने रखने से भी नहीं चूके. ये आरोप जितनी सपाट तरीके से डीडीसीए चयनकर्ताओं पर लगाया गया उतनी ही सपाट तरीके से इसे भुला सा दिया गया. इस आरोप की गम्भीरता पर न तो डीडीसीए की तरफ से ध्यान दिया गया और न ही स्वयं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा दिया गया. इस तरह के आरोप के द्वारा भले ही केजरीवाल ने डीडीसीए को अथवा जेटली को घेरने का प्रयास किया हो किन्तु इसे हलके में नहीं लिया जा सकता है. प्रत्यक्ष रूप से न सही किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से ही केजरीवाल ने अनेकानेक चयनकर्ताओं की माँओं के चरित्र पर सवालिया निशान लगा दिए. डीडीसीए चयनकर्ताओं ने मात्र उसी एक खिलाड़ी का चयन नहीं किया होगा, यदि सेक्स की माँग सही है तो केवल उसी के खिलाड़ी की माँ से नहीं की गई होगी और यदि ऐसा कोई भी आरोप असत्य है तो भी कितनी-कितनी महिलाओं, कितने-कितने खिलाडियों को शर्मसार होना पड़ रहा होगा इसका अंदाजा स्वयं केजरीवाल को नहीं होगा.
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ऐसे आरोप की जानकारी होने के बाद भी केजरीवाल का शांत होकर बैठ जाना अपने में एक अलग कहानी कहता है. जैसा कि उनके द्वारा बताया गया कि एक पत्रकार ने उनको ऐसी जानकारी दी तो उन्हें समूचे घटनाक्रम को स्वयं संज्ञान में लेते हुए डीडीसीए के चयनकर्ताओं के खिलाफ जाँच बैठानी चाहिए थी. और यदि इस तरह की बयानबाज़ी में कोई सत्यता नहीं है तो केजरीवाल ने न केवल समूचे लोकतंत्र का अपमान किया है बल्कि तमाम महिलाओं का अपमान किया है, देश की प्रतिभाओं का भी अपमान किया है. मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा ऐसी जानकारी देने के बाद भी किसी तरह की जाँच न करना इसे कपोलकल्पित सिद्ध करता है. यदि ऐसा महज राजनैतिक कटुता के कारण किया गया है तो घिनौनी राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण कहीं और नहीं मिलेगा. ऐसे बयान के बाद भी आश्चर्य देखिये कि किसी भी जागरूक महिला संगठन की तरफ से, न किसी राजनैतिक दल की तरफ से, न डीडीसीए की तरफ से, न किसी पत्रकार संगठन की तरफ से इसका कोई विरोध नहीं किया गया है. ये समझाने के लिए ही पर्याप्त है कि किस तरह से राजनीति में महिलाओं को सम्मान दिया जा रहा है. किसी वरिष्ठ राजनीतिक द्वारा सौ टका टंच माल से लेकर एक मुख्यमंत्री द्वारा सेक्स की माँग के बयान तक उतर आना समूची स्थिति को स्पष्ट करता है.
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अपने आन्दोलन के बाद से जिस तरह से केजरीवाल और उनकी टीम ने लोकप्रियता हासिल की थी वो उनके क्रियाकलापों के चलते लगातार कम होती जा रही है. उनके समर्थक भले ही कुछ भी कहते रहें किन्तु आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान की आत्महत्या के प्रयास में मृत्यु हो जाना, दिल्ली में हुए रेप कांड के नाबालिग आरोपी को रिहाई पश्चात् आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाए जाने सम्बन्धी बयान, आम आदमी पार्टी के मंत्रियों, नेताओं का कई-कई आपराधिक मामलों में लिप्त पाया जाना, मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय से विदेशी मुद्रा का मिलना और अब स्वयं मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा महिलाओं, खिलाडियों के चरित्र को घेरे में खड़ा कर देना अत्यंत क्षोभजनक है. केजरीवाल को समझना चाहिए कि दिल्ली का मुख्यमंत्री होना किसी राज्य का मुख्यमंत्री होना भर नहीं है; देश की राजधानी होने के कारण वैश्विक दृष्टि दिल्ली में लगी रहती है. उनके इस बयान के दीर्घगामी परिणाम/दुष्परिणाम क्या होंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किन्तु इस तरह के बयान को देने और फिर किसी भी तरह की कार्यवाही न करना उनकी क्षुद्र मानसिकता को ही दर्शाता है. राजनीति में विभिन्न दलों के बीच, विभिन्न व्यक्तियों के मध्य आपसी वाद-विवाद चलते ही रहते हैं किन्तु राजनैतिक विवाद में जिस तरह के कदम केजरीवाल द्वारा अथवा उनके अन्य नेताओं द्वारा उठाये जाते रहे हैं वे निंदनीय हैं. कहीं न कहीं ‘राजनीति बदलने आये हैं’ जैसे उनके बयान की ही बखिया उधेड़ते हैं. यहाँ इन नेताओं को नहीं वरन उन महिलाओं को सजग होने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी बात को महिलाओं की इज्जत से जोड़ते हुए वितंडा खड़ा करने लगती हैं. केजरीवाल ने जो कुछ कहा है वो महज बयान नहीं, महज एक आरोप नहीं बल्कि अनेकानेक माताओं का चरित्रहनन है.

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29 नवंबर 2015

रिश्ते सुधारो मगर सहजता से


पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे कि उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार सुधार प्रक्रिया के साथ-साथ इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. एक तरफ बस चलाकर आपसी सम्बन्धों के आदान-प्रदान का रास्ता खोला जाता है तो दूसरी तरफ उसी शांति के रास्ते से कारगिल में घुसपैठ कर दी जाती है. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है लगभग नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा. इस जोर-आजमाइश के चक्कर में कई-कई बार हमारे देश की तरफ से भी राजनीतिज्ञ विवादस्पद बयान दे बैठते हैं अथवा कोई असंवदेनशील कदम उठा बैठते हैं.
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पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही दो बातें ऐसी हुई हैं जिन्हें राष्ट्रीय एकता, सद्भाव की दृष्टि से कतई सुखद नहीं कहा जा सकता है. इसमें पहली घटना भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच आरम्भ करने वाली रही और दूसरी घटना जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला द्वारा दिया गया बयान रहा है. पहले चर्चा भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच सीरीज के सम्बन्ध में, दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं, उसे स्वीकारते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं, बहुत से लोग युद्ध को एकमात्र और अंतिम विकल्प के रूप में स्वीकारते हैं तथापि दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच सीरीज के आरम्भ करने के समय का लगभा सम्पूर्ण देश ने एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश मुंबई हमले में मारे गए सैकड़ों लोगों को याद कर रहा था, सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को श्रद्धांजलि दे रहा था और उधर दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले उसी दिन मैच खेलने पर सहमति व्यक्त करने में लगे हुए थे. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जिन्होंने अत्यल्प संसाधनों में उन आतंकियों का सामना किया जो अत्याधुनिक हथियारों से लैस खूनी खेल खेलने में लगे हुए थे.
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इस अपमानजनक स्थिति से अभी पूरी तरह उबरना भी नहीं हो पाया था कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला का बयान कि ‘पाकिस्तान अधिग्रहीत कश्मीर (पीओके) पाकिस्तान का ही हिस्सा है’ तथा ‘हमारी पूरी सेना भी पाकिस्तान के आतंकवादियों को नहीं रोक सकती, जब तक कि पाकिस्तान न चाहे’ एक तरह से राष्ट्रद्रोह वाला ही है. उनके बयान के ठीक एक दिन पहले ही नवाज शरीफ का बयान आता है कि पाकिस्तान बिना शर्त भारत से बातचीत करने को तैयार है और इस मौके को भुनाने के बजाय इसी देश के एक नेताजी इस तरह का बयान देकर मनोबल गिराने का कार्य करने में लग जाते हैं. ये स्पष्ट है कि भारतीय सेना का मनोबल किसी एक व्यक्ति, एक राजनीतिज्ञ के बयान से गिरने वाला नहीं है मगर ऐसे बयानों की आड़ में ही वे ताकतें जो देश में अशांति फ़ैलाने का, उपद्रव करने का मंसूबा संजोये बैठी रहती हैं, सक्रिय हो जाती हैं. भले ही अभी पीओके वाला मसला सुलझा नहीं हो, भले ही अभी हमारा देश पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जड़ से न उखाड़ सका हो मगर इसका अर्थ कदापि ये नहीं कि कोई पूर्व मुख्यमंत्री ऐसे विवादस्पद बयान जारी करे. आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है.
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यहाँ समझने की आवश्यकता है कि हमारा देश पाकिस्तान से किस दृष्टि से दोस्ताना सम्बन्ध बनाने को आतुर है? पाकिस्तान की तरफ से क्या-क्या हरकतें होती रही हैं, होती रहती हैं, ये अलग विषय है किन्तु शांति की राह बनाने के लिए, रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए इतनी आतुरता, आकुलता भी आवश्यक नहीं कि जिस समय हम अपने शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहे हों उसी समय पूरी बेशर्मी सबकुछ भूल जाने को आमादा हैं. एक राष्ट्र के साथ सम्बन्ध बनाने को लेकर यहाँ के राजनीतिज्ञों की तुष्टिकरण की राजनीति इतनी भी सहज न हो कि समूची सेना को चंद आतंकियों के सामने पस्त बताया जाने लगे, देश का एक हिस्सा पाकिस्तान का ही बताया जाने लगे. केंद्र सरकार को ऐसे मामलों में कठोरता, सशक्तता, दृढ़ता से निपटने की आवश्यकता है. यदि ऐसा करने में वो असफल रहती है तो देश की शांति-एकता-सद्भाव को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के साथ-साथ तुष्टिकरण की नीति अपनाने वाले नेताओं से भी खतरा हो जायेगा. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.

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28 नवंबर 2015

हैप्पी टू ब्लीड या हैप्पी टू बेशर्मी


एक मोहतरमा ने पूरी बिलबिलाहट के साथ इनबॉक्स में प्रवेश किया और भट्ट से दे मारा कि यदि हम महिलाएँ हैप्पी टू ब्लीड को लेकर आगे आ रही हैं तो आपको क्या समस्या है, अथवा आप पुरुष वर्ग को क्या आपत्ति है? उनकी बात अपनी जगह पूरी तरह सही थी, आखिर हमें अथवा पुरुष वर्ग को महिलाओं के किसी कदम से आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आखिर आप अथवा आपका पुरुष वर्ग क्या जनता-समझता है मासिक धर्म के बारे में? उनको जो समझाया, उसी का विस्तृत रूप मात्र इतना ही है कि हैप्पी टू ब्लीड में उत्साह से भाग लेने वाली, अपनी सलवार पर लाल दाग को अच्छा बताने वाली महिलाओं से कोई आपत्ति नहीं है. हाँ, आपत्ति है तो किसी भी कदम के प्रस्तुतीकरण से. यदि इस समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपको इसकी आज़ादी देती है कि आप मासिक-धर्म के दौरान बिना नैपकिन के रहें, अपने कपड़ों पर लगते दागों का प्रदर्शन करें तो यही समाज इसकी भी आज़ादी देता है कि हम अपने मन से किसी भी कदम का समर्थन अथवा विरोध कर सकें. समाज की कुछ अतिशय जागरूक महिलाओं के द्वारा हैप्पी टू ब्लीड जैसा कदम महज इसलिए उठाया गया क्योंकि किसी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के समय उनके मासिक धर्म सम्बन्धी जाँच की बात कही गई. ऐसे कदम की पहरुआ महिलाएँ बताएँ कि क्या कोई ऐसी मशीन वाकई बन गई है जो बाहरी शारीरिक स्पर्श से किसी महिला के बारे में बता सके कि वो मासिक धर्म से गुजर रही है अथवा नहीं? मेरी अपनी जानकारी में संभवतः ऐसा कुछ नहीं है. ऐसे में हैप्पी टू ब्लीड जैसे कदम का उठाया जाना उस मंदिर के प्रबंधकों द्वारा लिया गया निर्णय नहीं वरन अपने आपको मीडिया की निगाह में लाना है.

इसके अलावा जहाँ तक बात मासिक धर्म को जानने न जानने की है तो ये सच है कि ऐसी बातों को जानने-समझने की एक उम्र होती है. एक उम्र थी हमारी, जबकि आज की तरह न तो हाथों में स्मार्ट फोन थे और न ही इंटरनेट की सुविधा. तब जानकारियों के प्रसारण में अनेक तरह की बाध्यताएं थीं. ऐसी ही बाध्यता के बीच ज्ञान नहीं था कि लाल रंग से भीगे रुई के टुकड़े में, कपड़े के टुकड़े में किसी चोट का खून नहीं वरन नारी देह की नैसर्गिकता छिपी हुई है. इसके बाद जब चोट के रक्त और मासिक धर्म के रक्त का अंतर समझ आया तो उसके साथ ही ये भी समझ आया कि ये किसी महिला को सम्पूर्ण करता है, उसको मातृत्व का सुख प्रदान करने का संकेत देता है. किसी महिला को मासिक धर्म होने का अर्थ उसके लिए शर्म नहीं वरन गर्व का, उसकी सम्पूर्णता का विषय होता है. इसी संदर्भ में आपको बताते चलें कि हमारी एक मित्र को अपनी शारीरिक उलझनों के चलते दैनिक कार्यों में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. नित-प्रति बढ़ती उसकी समस्याओं को देखकर उसके परिवार वालों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसको गर्भाशय निकलवाने की सलाह दे डाली, जिसका उद्देश्य उसको प्रतिमाह पाँच दिनों की कठिनाई से छुटकारा दिलाना था. उस साहसी युवती ने अपने परिवार के ऐसे निर्णय का विरोध ये कह कर किया कि वो अधूरी महिला होकर जीना नहीं चाहती. सोचिये, जहाँ एक युवती को नित्य प्रति अपने ही शरीर की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ रहा हो, उसके बाद भी वो मासिक धर्म को अपने स्त्री होने की सम्पूर्णता मानती है वहीं आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल कुछ महिलाएँ हैप्पी टू ब्लीड के बहाने सम्पूर्ण स्त्रियों के मातृत्व को शर्मसार करने में लगी हैं.

ये अवश्य हो सकता है कि किसी मंदिर प्रबंधन के द्वारा अतिशयता में आपत्तिजनक निर्णय लिया गया हो पर ऐसी महिलाएँ अपने घर-परिवार पर दृष्टि डालें. ऐसे कदम का समर्थन कर रही महिलाओं से एक ही सवाल कि ऐसा हैप्पी टाइप कोई कदम उन्होंने तब उठाया था जबकि उनकी दादी ने, माँ ने, सास ने, परिवार की किसी बुजर्ग आदि ने उनको रसोई में, मंदिर में जाने से रोका था? क्या ऐसी महिलाओं को मासिक धर्म के समय उनकी माओं ने, उनके परिवार की बुजुर्ग महिलाओं ने, उनको सासों ने नहीं रोका था? अब जबकि परिवार के नाम पर पति-पत्नी रह गए हैं तो क्या वे उन पाँच दिनों में भी पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव नहीं करती हैं? बाज़ार द्वारा ऐसे दिनों में भी स्वतंत्रता का एहसास करने के लिए अत्याधुनिक, अनेकानेक साइज़ में नैपकिन उपलब्ध नहीं करवाए जा रहे हैं? क्या हैप्पी टू ब्लीड के नाम से समाज में एक अजब तरह की गंद फैलाती इन महिलाओं ने अपने परिवार की महिलाओं के विरोध में ऐसा कोई मोर्चा खोला था? नए-नए नैपकिन बनाती कंपनियों के विरुद्ध भी कोई मोर्चा खोलकर वे अपने हैप्पी टू ब्लीड अभियान को सफल बनाने का उपक्रम करेंगी? निश्चित रूप से इन महिलाओं ने न ऐसा किया था और न ही ऐसा कुछ करने जा रही हैं.

सत्यता ये है कि वर्तमान में उपस्थिति का संकट सबके सामने है, स्त्री-सशक्तिकरण की पहरुआ बनती स्त्रियों के सामने भी ऐसी समस्या है. ऐसे में उनको कोई न कोई एक ऐसा विषय चाहिए जो घर बैठे प्रसिद्धि पाने का माध्यम बन सके. सोचने का विषय मात्र ये है कि क्या वाकई हैप्पी टू ब्लीड जैसे अनावश्यक कदम उठाये जाने से वे समस्याएं दूर हो जाएँगी जिन्हें महिलाओं के मासिक धर्म से जोड़कर देखा जाता है? क्या अपने इस अभियान को सफलता दिलाने के लिए ये महिलाएँ अपने घर की सभी स्त्रियों को हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर नैपकिन सुरक्षा प्रणाली से दूर रखने का कार्य करेंगी? इस अभियान के नाम पर क्या ये महिलाएँ वाकई उन पाँचों दिनों में बिना किसी साधन के अपने नित्य-कार्यों को संपन्न करने का साहस जुटाएंगी? समस्या इतने पर ही आकर नहीं ठहरती दिख रही है. असल समस्या तो शायद उस दिन शुरू हो जबकि हैप्पी टू ब्लीड जैसे अनावश्यक कदमों का समर्थन करने वाली महिलाएँ स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों को परदे के भीतर से निकाल कर घर के आँगन में उतार दें; सड़क पर नुमाईश बनाकर रख दें; बाज़ार में उसकी प्रदर्शनी बना दें.

07 नवंबर 2015

सहिष्णु बने रहने का अर्थ ज्यादती सहते रहना

देश में साहित्यकारों सहित अनेक लोगों को पुरस्कार/सम्मान वापस करते देखकर एहसास हुआ कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि असहिष्णुता यदि बढ़ी है तो पहले से देश में व्याप्त थी, तभी तो बढ़ी है, यदि पहले से अस्तित्व में न होती तो क्या बढ़ती. अब इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए कि जब पहले से असहिष्णुता थी तो किसके शासन में पैदा हुई और किसने इसे पैदा किया? यदि उसी समय उसके पैदा होते ही उसको समाप्त कर दिया गया होता तो शायद आज इतनी ज्यादा न बढ़ी होती और न ही साहित्यकारों सहित अनेक लोगों के लिए बवाले-जान बनती. दरअसल देश में सहिष्णुता, असहिष्णुता के मायने कभी कायदे से समझाए ही नहीं गए. महात्मा गाँधी के ‘एक गाल पर तमाचा खाने के बाद दूसरा गाल कर दो’ के सिद्धांत के चलते सहिष्णुता या सहनशीलता को सार्वभौमिक माना जाने लगा. इसके चलते स्वीकार कर लिया गया कि सामने वाला किसी भी हद तक बदतमीजी दिखाए, दुर्व्यवहार करे, अपमान करे किन्तु उसके प्रति सहिष्णु बने रहना है, सहिष्णुता दर्शाना है, सहनशीलता दिखाना है. यदि ऐसा न किया जा सका तो समाज के सामने दुर्व्यवहार सह रहा, अपमान सह रहा, बदतमीजी सह रहा व्यक्ति असहिष्णु हो जायेगा, असहिष्णुता को बढ़ावा देने लगेगा. स्पष्ट है कि यदि आप अपमान सहने का, बदतमीजी सहने का, दुर्व्यवहार सहने का माद्दा नहीं रखते हैं तो आप असहिष्णु हैं और इसके प्रतिरोध में आप कोई भी कदम उठाते हैं तो वे असहिष्णुता को बढ़ाते हैं, सहिष्णुता को कमजोर करते हैं.
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इसके अलावा एक विशेष बात गौर करने वाली ये है कि पुरस्कार लौटाता वर्ग जिस असहिष्णुता की बात करने में लगा है, उसमें सहिष्णुता के पीछे अपने आप एक तरह की ज्यादती, दुर्व्यवहार छिपा हुआ है. सम्मान वापस करते लोगों ने असहिष्णुता बढ़ने का आधार बनाया है साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इखलाक की हत्याओं को. यदि इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि का अध्ययन कर लिए जाये तो सहजता से ज्ञात होता है कि इन सभी के कृत्यों में कहीं न कहीं एक किसी वर्ग विशेष के लिए नफरत, दुष्प्रचार आदि की भावना छिपी हुई थी. हालाँकि इसमें कोई दोराय नहीं कि कोई भी इस बात का समर्थन नहीं करेगा कि किसी भी ज्यादती का प्रतिरोध किसी की हत्या नहीं होती है तथापि इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बार-बार की नफरत, बार-बार के दुर्व्यवहार, बार-बार के अपमान के चलते कभी-कभी व्यक्ति उग्र स्वरूप अपना लेता है. संभवतः ऐसे हालातों में कुछ उपद्रवी तत्त्वों द्वारा, आपराधिक प्रवृत्ति वालों द्वारा कुत्सित मानसिकता अपनाकर आपराधिक कृत्य कर दिया गया. आखिर कभी ये समझाने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि सहनशीलता कब अपनाई जानी है? किसी व्यक्ति, वर्ग, समाज के सामने कौन-कौन से हालात उत्पन्न हों कि वो अपनी सहिष्णुता को त्यागकर असहिष्णु हो जाए? किसी घर में चोरी करने वाले चोर को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाये कि असहिष्णुता न बढ़ जाए? क्या किसी आपराधिक व्यक्ति को महज इसलिए छोड़ दिया जाये कि सहिष्णुता दिखानी है? किसी महिला के साथ शारीरिक दुराचार करते व्यक्ति को महज इस कारण छोड़ दिया जाना चाहिए कि कहीं समाज में असहिष्णुता न बढ़ने लगे? ऐसे ही अनेक सवालों के आलोक में पुरस्कार/सम्मान वापस करते लोग बताएँगे कि आखिर सहिष्णुता/असहिष्णुता का वास्तविक आधार क्या हो?

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यदि कला के नाम पर देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये जाएँ और विरोध न किया जाये तो सहिष्णुता; यदि अन्धविश्वास दूर करने के नाम पर देवी-देवताओं की मूर्तियों पर पेशाब करने की बात की जाये और कोई कुछ न कहें तो सहिष्णुता; यदि धार्मिक भावनाओं के प्रभावित होने के नाम पर मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवा लिए जाएँ और अन्य वर्ग के धार्मिक कृत्य का शोर लगातार उठता रहे और कुछ न बोला जाये तो सहिष्णु माना जायेगा; यदि अपने आपको आधुनिक बताने के नाम पर बीफ पार्टियों जैसे कृत्य खुलेआम, सार्वजानिक रूप से किये जाएँ और सब कुछ शांत होकर देखा जाये तो सहिष्णुता बनी रहती है; मीटिंग करने के नाम पर शहीद स्मारक से तोड़फोड़ की जाती है मगर कोई कुछ न बोलता है तो वहाँ सहिष्णुता जन्म लेती है; एक राष्ट्र के नाम पर खुलेआम कत्लेआम होता है, आतंकवाद फैलाया जाता है और कोई आवाज़ न उठाये तो सहिष्णु समझा जाता है किन्तु जैसे ही इसमें से किसी भी या सभी कृत्यों के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दी जाती है तो देश में असहिष्णुता बढ़ने लगती है; लोग असहिष्णु होने लगते हैं; देश का वातावरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए नहीं रह जाता है. इसका सीधा सा तात्पर्य ये है कि असहिष्णुता का अर्थ तो यही हुआ कि हमने सहनशीलता की सीमारेखा को पार कर लिया है. आखिर ऐसा मौका ही क्यों दिया जाए कि किसी को सहनशीलता की सीमा पार करनी पड़ जाए? सोचो...!!
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