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12 अगस्त 2020

लिव इन रिलेशन की सामाजिकता

समाज का बहुसंख्यक वर्ग वर्तमान में वैवाहिक संबंधों के प्रति नकारात्मकता दिखा रहा है. पति-पत्नी के आपसी संबंधों में लगातार बिखराव की स्थिति आ रही है. वैवाहिक संबंधों से वितृष्णा दिखाकर वर्तमान युवा और स्वच्छंद पीढ़ी एक नए रिश्ते को समाज में स्थापित कर चुकी है. यह नई संकल्पना लिव-इन-रिलेशन के नाम से जानी जा रही है. इन लोगों को विषय की गंभीरतासमाज पर उसका प्रभावउसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सिद्ध करना होता है. इस समय युवा वर्ग कैरियर बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है ऐसे में उसके लिए विवाह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य अपने कैरियर में सफलता प्राप्त करना होता हैअधिकाधिक धनार्जन करना होता हैऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. इस आपाधापी के चलते युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास समाप्त सा होता जा रहा है. ऐसी स्थिति में बिना किसी प्रतिबन्धबिना किसी जिम्मेवारीस्वतंत्र भाव से जीने की संकल्पनाअकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन हैं और ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिकपूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है.



इस मानसिकता का सर्वाधिक लाभ बाजार ने उठाया है. बाजार में जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों कीगर्भ रोकने के उपायों की भरमार है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों कीबिन-व्याही माताओं कीकूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है. ये समूची स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैंशारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए हैअल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों में किसी भी समय पर लड़के द्वारा लड़की को छोड़ देने, किसी और लड़की के साथ लिव-इन में चले जाने, इस रिलेशन में रहने वाली लड़की के गर्भवती होने, कई-कई शारीरिक संबंधों से होने वाले यौन-रोगों आदि दुष्परिणाम भी सामने आने की आशंका बनी रहती है.

सामाजिक संरचना में विवाह संस्था यौन-संबंधों की स्वीकार्यता मात्र के लिए नहीं है अपितु सृष्टि के विकास की अवस्था में सहगामी कदम भी है. इसके द्वारा जहाँ पारिवारिक संरचना का विकास होता है वहीं सामाजिकता भी अपना विकास करती है. ऐसे में लिव-इन-रिलेशन की सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस होखुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा होसकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो. ऐसा करना न सिर्फ वर्तमान के लिए वरन भविष्य के लिए भी उचित कदम होगा.

21 सितंबर 2018

जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन


न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन किसी ग़ज़ल के ये चंद शब्द आज भी दिल को धड़का देते हैं. इन शब्दों में छिपी भावना को, प्यार को लगभग प्रत्येक व्यक्ति खुद के भीतर छिपी प्यार की भावना से एकाकार करके भावविभोर होता है. उम्र और जन्म का बंधन उसके लिए नकार चाहता है किन्तु जैसे ही यही भावना किसी और के प्यार के साथ जुड़ती दिखाई देती है वैसे ही सारी संवेदना हवा हो जाती है. अपने से इतर किसी दूसरे के लिए ऐसा होते ही समाज, संस्कार, मर्यादा, सामाजिकता आदि की सीमारेखा दिखाई देने लगती है. ऐसे एक-दो नहीं वरन हमारे आसपास अनेक उदाहरण हैं, जबकि दो व्यक्तियों की उम्र में जबरदस्त अंतर के चलते उनके संबंधों को मजाक बनाया गया, उनका मजाक बनाया गया. कुछ ऐसा ही हाल में ग़ज़ल-भजन गायक अनूप जलोटा और जसलीन के संबंधों के सामने आने के बाद हुआ. एक टीवी शो में उनके संबंधों का खुलासा होते ही उन पर चुटकुलों के, व्यंग्य के, परिहास के, उपहास के तीखे तीर चलाये जाने लगे. उम्र और जन्म के बंधन को न मानने वाले शब्द गुनगुनाने वाले भी उनके सम्बन्ध के पीछे पड़ गए. लिव-इन-रिलेशन, समलैंगिकता के समर्थक, किस ऑफ़ लव जैसे आयोजन का समर्थन करने वाले भी एकदम से अनूप जलोटा को चरित्रहीन साबित करने पर उतर आये. सोशल मीडिया पर जैसे एक आयोजन सा होने लगा. किसी एक पोस्ट पर, किसी एक चित्र पर अनेकानेक लाइक, टिप्पणी, शेयर मिलने लगे. बिना आगा-पीछा सोचे भेड़चाल शुरू हो गई. 


यहाँ विचार करना चाहिए कि क्या वाकई अनूप जलोटा ने अपराध जैसा कुछ किया है? तथ्यों के आलोक में देखना चाहिए कि क्या वाकई अनूप जलोटा को चरित्रहीन माना जाना चाहिए? उम्र के बहुत बड़े अंतर के कारण, भजन गायकी के चलते वे अचानक से व्यंग्य-बाणों का शिकार भले हो रहे हों मगर उन पर ऐसा कटाक्ष, व्यंग्य करने वालों को कई बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. भजन सम्राट के रूप में प्रसिद्द अनूप जलोटा का वैवाहिक जीवन अपने आपमें संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है. उन्होंने तीन शादियाँ की. उनकी पहली पत्नी गायिका सोनाली सेठ थीं हालांकि उनकी शादी बहुत समय तक नहीं टिक सकी और उनका तलाक हो गया. तलाक के बाद सोनाली ने गायक रूपकुमार राठौड़ से विवाह किया. अनूप जलोटा ने इस सम्बन्ध-विच्छेद के बाद अपने परिवार के कहने पर बीना भाटिया से शादी की. यह विवाह सम्बन्ध भी बहुत लम्बे समय तक न चल सका और इसकी परिणति भी सम्बन्ध-विच्छेद के रूप में हुई. इसके बाद अनूप जलोटा ने पूर्व प्रधानमंत्री गुजराल की भतीजी मेधा गुजराल से विवाह किया. उनके वैवाहिक को जैसे किसी की नजर लगी थी. सन 2014 में लीवर की बीमारी के चलते उनकी तीसरी पत्नी मेधा का देहांत हो गया. अकेले रह गए अनूप जलोटा के बारे में कहा जाता है कि वे जसलीन से संपर्क में आने के पहले दो लड़कियों के साथ लिव-इन-रिलेशन में भी रहे. क्या ये सब सामाजिक रूप से गलत माना जायेगा? क्या एक विवाह सफल न होने के बाद दो या तीन विवाह करना गलत है?

असल में हम सब लोकतांत्रिक देश में रहने का दम्भ भरते हैं और एक झटके में ही अलोकतांत्रिक हरकतें करने पर उतर आते हैं. आखिर हम आज भी किसी व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पा रहे हैं? खुद को लोकतान्त्रिक, आधुनिक स्वतंत्र मानने, बताने वाले किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने को तत्पर हो जाते हैं. अनूप जलोटा के सम्बन्ध को मजाक का, आलोचना का विषय बनाने वालों को खुद से सवाल करने होंगे कि क्या उसने अपनी बीवी रहते ऐसा किया? क्या उसने अगली महिला के साथ रेप किया? क्या वे उसे भगा कर लाये हैं? क्या उसने किसी दूसरे का घर उजाड़ा है? क्या उसने आलोचना करने वालों के जीवन में ख़लल डाला है? क्या उसने समाज के किसी व्यक्ति का वैवाहिक जीवन तोड़ा है? फिर लोग क्यों अनूप जलोटा के पीछे पड़े हुए हैं? ऐसा कहीं इसलिए तो नहीं कि समाज में आज भी बहुतायत मध्यमवर्गीय लोगों का जीवन इतना सहज नहीं है? उनके लिए आज भी सेक्स, लड़की, लिव इन रिलेशन उनकी समझ से बाहर हैं? सामाजिकता, धर्म, उम्र, कार्य, संस्कार का नाम देकर ऐसे किसी भी सम्बन्ध का मजाक उड़ाने के पीछे कहीं खुद की कुंठा को दूर करना तो नहीं होता है? ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग यौन-कुंठा के मारे दूसरों के जीवन में, वैवाहिक जीवन में तांक-झांक करता रहता है. ऐसे लोगों के अपने वैवाहिक जीवन से, अपनी यौन सम्बंधी इच्छा से, विपरीत सेक्स से उत्पन्न उनकी संकुचित मानसिकता, कुंठित मानसिकता ही दूसरों को आलोचना के केंद्र में खड़ा कर देती है. कुछ ऐसा ही आज अनूप जलोटा के साथ हो रहा है और ऐसा ही कुछ समय पूर्व कुछ राजनीतिज्ञों के साथ, फ़िल्मी कलाकारों के साथ भी हुआ है. अतीत के मुर्दों को उखाड़ने से बेहतर है कि वर्तमान को देखा जाये तो इस सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं जिसे चरित्रहीन कहा जाये, अपराध कहा जाये, अमर्यादित कहा जाये, अश्लील कहा जाये. हाँ, अपने-अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट लोग, यौन-कुंठा से भरे लोग अवश्य ही ये सब इस सम्बन्ध में खोज निकालेंगे.

25 अगस्त 2015

लिव-इन-रिलेशन और सामाजिकता


वर्तमान परिदृश्य में समाज का बहुसंख्यक वर्ग वैवाहिक संबंधों के प्रति नकारात्मकता दिखाने में लगा हुआ है. किसी न किसी कारण से पति-पत्नी के आपसी संबंधों में बिखराव की स्थिति आ रही है. इसके पीछे के कारण अपने आपमें शोध का विषय हो सकते हैं किन्तु वैवाहिक संबंधों से वितृष्णा सी दर्शाती वर्तमान युवा और स्वच्छंद पीढ़ी एक नए रिश्ते को नाम देकर समाज में नई संकल्पना को प्रस्तुत कर चुकी है. इस नई संकल्पना को लिव-इन-रिलेशन के नाम से जाना-पहचाना जा रहा है. महिला मुक्ति के समर्थक ऐसे विषय का समर्थन करते आसानी से दिख जाते हैं जहाँ शारीरक संबंधों में स्वतंत्रता मिलती हो जबकि संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाये घूमते लोग ऐसे विषयों के विरोध में दिखते हैं. देखा जाये तो दोनों पक्षों के लोग एक तरह की कट्टरता का पालन ही करते हैं. इन लोगों को विषय की गंभीरता, समाज पर उसका प्रभाव, उसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता, उन्हें तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते देखा जाता है. लिव-इन-रिलेशन भी इसी तरह का विषय है जो एक तरफ स्त्री-स्वतंत्रता का आयाम तय करता है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति को ही नकारात्मकता प्रदान करता है.
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भूमंडलीकरण के इस दौर में जबकि युवा वर्ग कैरियर की जद्दोजहद में लगा हुआ है, उसके लिए वर्तमान में विवाह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण सफलता हासिल करना होता है; अधिकाधिक धनार्जन करना होता है; ऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. इस आपाधापी के चलते युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास समाप्त सा होता जा रहा है. किसी तरह की सामाजिकता उन्हें इस संस्था में नहीं दिखती है वरन उनके लिए यह एक प्रकार के प्रतिबन्ध सा होता है. बिना किसी प्रतिबन्ध, बिना किसी जिम्मेवारी, स्वतंत्र भाव से जीने की संकल्पना, अकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन हैं और ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिक, पूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है.
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इसमें कहीं कोई दोराय नहीं कि प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष की शारीरिक स्थिति नितांत भिन्न रही है. सामाजिक प्रस्थिति को सफलता के बिंदु पर ले जाने के बाद भी महिलाओं का अपनी विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रहा है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों की, गर्भ रोकने के उपायों की बाज़ार में भरमार हुई है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों की, बिन-व्याही माताओं की, कूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है. ये समूची स्थितियाँ सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैं; शारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए है; अल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों में किसी भी समय पर लड़के द्वारा लड़की को छोड़ देने, किसी और लड़की के साथ लिव-इन में चले जाने, इस रिलेशन में रहने वाली लड़की के गर्भवती होने, कई-कई शारीरिक संबंधों से होने वाले यौन-रोगों आदि दुष्परिणाम भी सामने आने की आशंका बनी रहती है. देखा जाये तो कैरियर के लिए अल्पकालिक अथवा पूर्णकालिक वैवाहिक रिश्तों का नकार किसी भी व्यक्ति का निजी निर्णय हो सकता है मगर ऐसे निर्णयों की आड़ में लिव-इन-रिलेशन का बनाया जाना संभवतः सामाजिक नहीं है. सामाजिक संरचना में विवाह यौन-संबंधों की स्वीकार्यता मात्र नहीं है अपितु सृष्टि के विकास की अवस्था में सहगामी कदम भी है. इसके द्वारा जहाँ पारिवारिक संरचना का विकास होता है वहीं सामाजिकता भी अपना विकास करती है. ऐसे में लिव-इन-रिलेशन की सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस हो, खुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा हो, सकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो. ऐसा करना न सिर्फ वर्तमान के लिए वरन भविष्य के लिए भी उचित कदम होगा.

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02 दिसंबर 2013

सेक्स प्रचुर बाज़ार में एड्स रोकथाम के प्रयास




समाज वर्तमान में एक प्रकार की विभ्रम स्थिति में खड़ा हुआ है. एक तरफ वह गलत का विरोध करता है तो दूसरी तरफ गलत का साथ देता भी दिखता है. कुछ ऐसा ही खतरनाक बीमारी ‘एड्स’ को लेकर भी हो रहा है. एक दिसम्बर को समूचे देश में एड्स दिवस मनाया गया, लोगों को एड्स के प्रति सचेत किया गया, शारीरिक संबंधों में विश्वास बनाये रखने की बात समझाई गई. एड्स के प्रति जागरूकता लाने वाले विचार मंच से सुशोभित होकर वहीं ढेर हो जाते हैं. नितांत औपचारिकता में लपेट कर ऐसे कार्यक्रमों की इतिश्री कर ली जाती है और समाज में एड्स को स्वतंत्रता से विचरण करने को छोड़ दिया जाता है.
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एड्स से इतर यदि समाज की वर्तमान स्थिति को दृष्टिगत करें तो एड्स विरोध के साथ ही अनेक विरोधभास सामने आते दिखेंगे. एक ऐसे समाज में जहाँ उन्मुक्त सेक्स को लेकर नए-नए मापदंड स्थापित किये जा रहे हों; ऐसे वातावरण का निर्माण किया जा रहा हो जहाँ विवाहपूर्व अथवा विवाहेतर शारीरिक संबंधों को सहजता से स्वीकार किया जाये; जहाँ गर्भपात करने के सुरक्षित उपाय बाज़ार में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हों; असुरक्षित सेक्स के चलते गर्भ रोकने को उपलब्ध गोलियों को महिलाओं की दैहिक स्वतंत्रता समझा जा रहा हो; जबरदस्त यौन-आनन्द, चरमोत्कर्ष पाने के लिए पुरुषों के लिए तेल/क्रीम/दवाई के लुभावने ऑफर सजे दिख रहे हों वहाँ शारीरिक संबंधों में विश्वास को बनाये रखने की बात कपोलकल्पना ही लगती है. किसी समय में परिवार नियोजन के लिए बनाये गए उपकरण ‘निरोध’ का उपयोग वर्तमान में सुरक्षित यौन-सम्बन्ध बनाये जाने के लिए किया जाने लगा है तो समझा जा सकता है कि समाज में सुरक्षित यौन-सम्बन्ध, विश्वासपरक शारीरिक सम्बन्ध की क्या परिभाषा होगी. इसके अलावा विगत कुछ समय से जिस तरह से सामाजिक संबंधों के निर्वहन में माननीय न्यायालय ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है, उससे भी कहीं न कहीं एड्स उन्मूलन में एक तरह का अवरोध ही आया है.
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इधर देखने में आया है कि समलैंगिकता को लेकर, लिव-इन-रिलेशन को लेकर माननीय न्यायालय की टिप्पणियों के बाद से समाज में एक तरह की उथल-पुथल सी मची हुई है. इन संबंधों का भविष्य और इसके परिणामस्वरूप समाज का भविष्य क्या होगा, ये तो अभी भविष्य की ही बात है किन्तु ये अवश्य कहा जा सकता है कि सामाजिक संबंधों में अवश्य ही अनैतिकता और तेजी से बढ़ेगी. वर्तमान समाज तमाम सारी विसंगतियों, असमानताओं, अनैतिकता को लेकर आगे बढ़ रहा है और तमाम सारे घटनाक्रम को देखने के बाद स्पष्ट रूप से समझ में आता है जैसे अधिसंख्यक लोगों का एकमात्र ध्येय सिर्फ और सिर्फ सेक्स ही रह गया है. इसके अलावा ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि एड्स के जितने भी कारण गिनाये जाते हैं उनमें से असुरक्षित यौन-संबंधों के कारण ही एड्स रोगियों की संख्या में सर्वाधिक बढ़ोत्तरी हो रही है. ऐसे में जब समाज के अधिसंख्यक लोगों का ध्येय सेक्स बना हो; जब सेक्स को लेकर विविध मानक स्थापित किये जा रहे हों; सेक्स की उन्मुक्तता को जीवन की आवश्यकता बताया जा रहा हो; एमटीपी का उपयोग अवांछित गर्भ से मुक्ति पाने के लिए किया जा रहा हो; अधिक से अधिक यौन साथी रखना भी स्टेटस-सिम्बल बनता जा रहा हो तो एड्स दिवस को खुशगवार रूप में मनाये जाने की जरूरत है. यदि एड्स को मिटाना होता, उसका समूल नाश करना होता, एड्स की रोकथाम करनी होती तो सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाले विचारों का समर्थन नहीं किया जाता; सामाजिकता का ह्रास करने वालों को सहज-स्वीकार्य नहीं बनाया जाता; पारिवारिक जिम्मेवारी से मुक्ति का नहीं पारिवारिकता का पाठ सिखाया जाता;  संबंधों की, रिश्तों की गरिमा के बारे में बताया जाता. और शायद यही कारण है कि हम आज भी एड्स उन्मूलन दिवस नहीं, एड्स निवारण दिवस नहीं, एड्स रोकथाम दिवस नहीं..... एड्स दिवस ही मनाने में लगे हैं... एड्स बढ़ाने में लगे हैं.

30 नवंबर 2013

स्वच्छंदता, दैहिक स्वतंत्रता, सेक्स का घालमेल लिव-इन-रिलेशन




माननीय न्यायालय की टिप्पणी के बाद लिव-इन-रिलेशन फिर चर्चा में है. महिला मुक्ति के समर्थक ऐसे किसी भी विषय का समर्थन करते आसानी से दिख जाते हैं जहाँ से शारीरक संबंधों की बाध्यता से स्वतंत्रता मिलती दिखती हो जबकि संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाये घूमते लोग ऐसे विषयों के विरोध में बात करते दिखते हैं. देखा जाये तो इन दोनों पक्षों के लोग कहीं न कहीं एक तरह की कट्टरता का अनुपालन करते दिखते हैं. इन लोगों के लिए विषय की गंभीरता, उसके उद्देश्य, समाज पर उसका प्रभाव, उसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ और सिर्फ अपनी-अपनी बात को सिद्ध करने का अनर्गल प्रयास करने में लगे रहते हैं. लिव-इन-रिलेशन भी एक इसी तरह का विषय है जो एक तरफ स्त्री की स्वतंत्रता का आयाम तय करता है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति को ही नाजुकता प्रदान करता है.
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भूमंडलीकरण के इस दौर में युवा वर्ग अपने कैरियर को बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. उसके लिए वर्तमान में विवाह से अधिक महत्त्वपूर्ण जल्द से जल्द सफलता का मुकाम हासिल करना होता है; अधिक से अधिक धनार्जन करना होता है; ऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. आगे निकलने की आपाधापी में लगे युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास भी लगभग शून्य सा होता जा रहा है. किसी तरह की सामाजिकता का भान उन्हें इस संस्था में नहीं दीखता है वरन यह एक तरह की बंदिश, प्रतिबन्ध सा दिखाई देता है. बिना किसी प्रतिबन्ध, बिना किसी जिम्मेवारी, निर्द्वन्द्व भाव से जीवन जीने की संकल्पना, अकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन होते हैं और यदि ये कहा जाए कि ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिक, पूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है, उन महिलाओं का कोपभाजन बनना होता है जो शारीरिक स्वतंत्रता को महिला-स्वतंत्रता से सम्बद्ध करके देखती हैं. जबकि सत्यता यही है कि ऐसे संबंधों में प्रत्येक रूप में महिलाओं को ही दुष्परिणाम सहने पड़ते हैं.
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प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष की शारीरिक स्थिति नितांत भिन्न रही है. सामाजिक प्रस्थिति को सफलता के बिंदु पर ले जाने के बाद भी महिलाओं का अपनी विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रहा है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों की, गर्भ रोकने के उपायों की बाज़ार में भरमार हुई है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों की, बिन-व्याही माताओं की, कूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि देखने को मिली है. ये समूची स्थितियाँ महिलाओं को अत्यधिक प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैं; सामाजिकता का अनुपालन करते हुए वैवाहिक कर्मकांडों से बचने के लिए है; शारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए है; अल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. इस असामाजिकता को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है कि भले ही ऐसे सम्बन्ध दो अविवाहितों के बीच बनें, दो विवाहितों के बीच बनें या फिर एक अविवाहित-एक विवाहित के बीच बनें वे सिर्फ और सिर्फ अनैतिकता को ही बढ़ावा देंगे. लिव-इन-रिलेशन को सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता देने के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस हो, खुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा हो, सकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो.