भाषा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भाषा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

04 अक्टूबर 2022

भाषा और कला के द्वारा समावेशी गुणों का विकास

शिक्षा किसी भी मानव को एक न्यायसंगत और समाज के विकास की राष्ट्रीय अवधारणा के लिए प्रेरित करती है. यह उसे वैश्विक मंच तक ले जाती है. एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वैश्विक मंच पर सामाजिक न्याय, समानता, उन्नति आदि के मार्ग खोलती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य देश के विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है. आज समूचा विश्व एक व्यापक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि के द्वारा वैज्ञानिक और तकनीकी विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर डाटा साइंस, कंप्यूटर, गणित, विज्ञान आदि क्षेत्रों में ऐसे कुशल लोगों की आवश्यकता है जो विभिन्न क्षेत्रों में विविध विषयों में मानक योग्यता रखते हों. इसी को दृष्टिगत रखते हुए नई शिक्षा नीति में भारतीय परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों को आधार बनाते हुए इस प्रकार के लक्ष्य शामिल किए गए हैं जो सभी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ भाषा, कला, संस्कृति, इतिहास से भी परिचित करा सकें.


वर्तमान शिक्षा नीति के द्वारा तर्कसंगत विचार, कार्य करने की क्षमता, करुणा, सहानुभूति, वैज्ञानिक चिंतन, रचनात्मक कल्पनाशीलता, नैतिक मूल्य आदि के समावेशी गुणों से ओतप्रोत इंसान का विकास करना है. इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा अवधारणात्मक हो ना कि रटंत पद्धति वाली. इसी से अध्ययन-अध्यापन कार्य में भाषा की शक्ति को प्रोत्साहन दिया गया है. उसमें सीखने के सतत मूल्यांकन पर जोर दिया गया है. सभी पाठ्यक्रमों और शिक्षण शास्त्रों में स्थानीय संदर्भों की विविधता और सांस्कृतिकता पर विशेष बल दिया गया है. यह कदाचित सत्य भी है कि कोई व्यक्ति जितनी सहजता से स्थानीय भाषा में, अपनी संस्कृति में किसी ज्ञान को सीख सकता है, किसी अन्य भाषा में उतनी सहजता से नहीं सीख सकता है.




शिक्षा के द्वारा ऐसे व्यक्तियों को तैयार किया जाए जो एक से अधिक विशिष्ट क्षेत्रों में गहन स्तर पर अध्ययन करने में सक्षम हों और जिनमें नैतिक चरित्र, संवैधानिक मूल्यों, बौद्धिक जिज्ञासा, वैज्ञानिक रचनात्मकता, सेवा की भावना, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, मानविकी, भाषा आदि की क्षमताओं को सहेजने की क्षमता भी हो. इसके लिए ऐसे शिक्षा संस्थान निर्मित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो स्थानीय एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा के कार्यक्रम को बढ़ा सकें. इस बात पर भी बल दिया गया है कि बहु-विषयक शिक्षा व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए जाएं. शिक्षा नीति के प्रस्ताव में बतलाया गया है कि भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई है, जिसके कारण देश ने विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित कर दिया है. वे भाषाएँ जिनकी लिपि नहीं है, विलुप्त होने की कगार पर हैं. जनजाति और समुदायों की भाषा भी विलुप्त हो रही है. भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन हेतु शिक्षा को प्रभावी माना जा रहा है. इसी कारण से ऐसे पाठ्यक्रमों को विकसित करने पर जोर है, जिनमें भारतीय भाषाओं, तुलनात्मक साहित्य, सृजनात्मक लेखन, कला, संगीत, दर्शनशास्त्र आदि के कार्यक्रमों का निर्माण और विकास किया जा सके. स्थानीय संगीत, कला, भाषा आदि के प्रति विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए उनको स्थानीय संस्कृति और ज्ञान से परिचित करवाना भी एक प्रभावी कदम है. इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए शिक्षण संस्थानों में मातृभाषा, स्थानीय भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग में लाये जाने पर जोर दिया गया है.


विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति समझ विकसित करने के लिए स्थानीय पर्यटन, विरासत, संग्रहालय आदि के प्रति भी जागरूक दृष्टि अपनाये जाने को प्रमुखता दी गई है. इसके लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया गया है. एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना के अंतर्गत देश के 100 स्थलों की पहचान कर वहाँ विद्यार्थियों को इन क्षेत्रों के बारे में ज्ञानवर्धन करने, उनके ऐतिहासिक, वैज्ञानिक योगदान, परंपराओं, स्वदेशी साहित्य और ज्ञान आदि का अध्ययन करने के लिए भेजा जायेगा. यहाँ इस बात पर भी बल दिया गया है कि इन सभी स्थलों के इतिहास, संस्कृति, ज्ञान आदि का सभी भारतीय भाषाओं और उससे संबंधित स्थानीय कला एवं संरक्षण हेतु दस्तावेजीकरण किया जाए. इसमें स्थानीय भाषा में बोलना, कहानियाँ सुनाना, कविता पाठ करना, नाटक खेलना, लोक गायन, लोक नृत्य करना आदि शामिल है.


भाषाई विकास एवं संरक्षण हेतु भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित किये जाने का भी प्रस्ताव शिक्षा नीति में रखा गया है. इसमें प्रत्येक भाषा से श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलने वाले लोग शामिल करने का विचार है ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द-भंडार निर्मित करने में सहायता मिल सकेगी. इसके अलावा इससे नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किया जा सकेगा तथा शब्दकोश और शब्द-भंडार को भी विकसित किया जा सकेगा. इसके लिए भाषाई विद्वानों के साथ-साथ शिक्षकों और विद्यार्थियों का भी सहयोग लिया जाये. इससे उनके अपने विषय से संबंधित शब्द-भंडार और शब्दकोश को न केवल निर्मित करवाया जा सकता है बल्कि उसे लगातार विकसित भी करवाया जा सकता है.


अभी तक देखने में आता रहा है कि न केवल संस्थान का बल्कि शिक्षक और शिक्षार्थी का उद्देश्य कैसे भी करके अपने पाठ्यक्रम को समाप्त कर लेना भर था. उनका ध्यान स्थानीय भाषा, बोली अथवा स्थानीय संस्कृति, इतिहास की जानकारी करना, उसका विकास अथवा संरक्षण करना नहीं होता था. मानविकी, कला, संगीत से लगातार दूर होता जाता विद्यार्थी सिर्फ और सिर्फ अच्छे अंक लाने के लिए, डिग्री प्राप्त करने की दिशा में ही दौड़ता रहता था. यह स्थिति उसे तनावग्रस्त करती जा रही थी. इसका दुष्परिणाम समाज में युवाओं का अवसाद में चले जाने, नशे का शिकार होने, निराशा-हताशा के चलते आत्महत्या करने के रूप में सामने आ रहा था. नई शिक्षा नीति में जिस तरह से पाठ्यक्रम में विज्ञान, कला, मानविकी, संगीत, संस्कृति, इतिहास आदि का समावेशी और वातावरण अनुकूलित स्वरूप निर्मित किया गया है, इससे विद्यार्थियों के समग्र विकास की दिशा का बहुत हद तक निर्धारण संभव है. 





 

15 जून 2022

भाषाई संवर्द्धन में सहायक राष्ट्रीय शिक्षा नीति

देश के लिए भाषाई स्तर पर हाल की दो घटनाएँ निश्चित ही आह्लादकारी रही हैं. इनमें पहली घटना हिन्दीभाषी उपन्यास को बुकर पुरस्कार मिलना तथा दूसरी घटना संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनी भाषाओं में हिन्दी भाषा को शामिल करना रहा है. यह संयोग ही नहीं है कि एक तरफ भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला, संस्कृति के संवर्द्धन हेतु विशेष प्रावधान किये हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषा को एक अलग पहचान मिलनी भी दिखने लगी है. 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ‘भारत की इस सांस्कृतिक सम्पदा का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रसार देश की उच्चतम प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यह देश की पहचान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है. भारत में भ्रमण, भारतीय अतिथि सत्कार का अनुभव लेना, भारत के खूबसूरत हस्तशिल्प एवं हाथ से बने कपड़ों को खरीदना, भारत के प्राचीन साहित्य को पढ़ना, योग एवं ध्यान का अभ्यास करना, भारतीय दर्शनशस्त्र से प्रेरित होना, भारत के अनुपम त्योहारों में भाग लेना, भारत के वैविध्यपूर्ण संगीत एवं कला की सराहना करना और भारतीय फिल्मों को देखना आदि ऐसे कुछ आयाम हैं जिनके माध्यम से दुनिया भर के करोड़ों लोग प्रतिदिन इस सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित होते हैं, इसका आनंद उठाते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं.’ कला, संस्कृति की यह विशालता निश्चित रूप से भाषा के साथ जुड़ती है. भाषा के माध्यम से ही किसी भी देश की संस्कृति, कला आदि से परिचय होता है, उसके साथ समन्वय बनता है. एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति के नागरिकों संग बातचीत करना, एक देश का दूसरे देश के साथ तालमेल बैठाना, अपने अनुभवों को दूसरों से साझा करना आदि भाषा से ही संचालित होता है. यदि कहा जाये कि संस्कृति हमारी भाषाओं में समाहित है तो यह अतिश्योक्ति न होगी.




राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के प्रति सजगता का एक बहुत बड़ा कारण है कि भारतीय भाषाओं के प्रति समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. उनके संवर्द्धन, संरक्षण के प्रति भी सकारात्मक एवं ठोस कदम नहीं उठाये गए हैं. इस नकारात्मक वृत्ति का दुष्परिणाम यह रहा है कि विगत पचास वर्षों की कालावधि में देश ने अपनी दो सौ से अधिक भाषाओं को खो दिया है. यूनेस्को ने भी 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय की श्रेणी में शामिल किया है. यह स्थिति किसी भी देश की भाषाई संस्कृति के लिए सुखद तो कदापि नहीं कही जाएगी. भारतीय भाषाओं की इसी दशा को देखते हुए शिक्षा नीति में प्रावधान किया गया है कि स्कूली स्तर पर ही कला, संगीत, हस्तकौशल पर विशेष ध्यान देते हुए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा बनाया जाये. मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा को दिए जाने के पीछे भी सरकार की मंशा यही है कि कम से कम स्कूली शिक्षा, अध्ययन के माध्यम से ही मातृभाषा, स्थानीय भाषाओं का संरक्षण, संवर्द्धन हो सकेगा.


भाषा को लेकर यहाँ के नागरिकों में अनेक प्रकार के भ्रम फैले हुए हैं. शिक्षा क्षेत्र में ऐसे लोगों का विचार है कि विज्ञान विषयों का अध्ययन मातृभाषा में किया जाना सहज, संभव नहीं है. इसके लिए ऐसे राज्यों अथवा शिक्षण संस्थानों द्वारा अंग्रेजी को वरीयता दी जाती है. उनका मानना है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर विज्ञान विषयों को अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाना श्रेयस्कर है. इस बारे में देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम से सीख लेने की आवश्यकता है. यह सुनकर भाषाई विभेद करने वाले लोगों को आश्चर्य होगा कि डॉ. कलाम ने बारहवीं तक की सम्पूर्ण शिक्षा, जिसमें विज्ञान विषय भी शामिल हैं, अपनी मातृभाषा तमिल में ली थी. 


शिक्षा नीति में बहुभाषिक व्यवस्था को लागू करते हुए त्रिभाषा फार्मूला का यथाशीघ्र क्रियान्वयन किये जाने पर बल दिया गया है. त्रिभाषा फार्मूला के पीछे की भावना यही है कि हिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी दक्षिण अथवा अन्य राज्यों की एक भाषा सीखें, इसी तरह अहिन्दीभाषी राज्यों के विद्यार्थी हिन्दी सीखें. ऐसा करने से देश के विभिन्न राज्यों में फैली भाषाई कटुता को दूर करने में सहायता मिलेगी. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस प्रकार की व्यवस्था भी की गई है जिसके अंतर्गत भारतीय भाषाओं के शिक्षण को बढ़ावा देने हेतु राज्य परस्पर अनुबंध कर भाषा शिक्षकों का आदान-प्रदान कर सकते हैं.  त्रिभाषा फार्मूला में संस्कृत भाषा को भी मुख्य धारा में शामिल करने के लिए इसे उच्चतर शिक्षा तक अपनाये जाने की व्यवस्था की गई है. इसे एक पृथक विषय के पढ़ाने से ज्यादा रुचिपूर्ण एवं नवाचारी तरीकों से जोड़ने का सकारात्मक कदम उठाया गया है. गणित, खगोलशास्त्र, योग आदि सहित अन्य समकालीन विषयों को संस्कृत के साथ जोड़कर संस्कृत विश्वविद्यालयों और अन्य उच्चतर शिक्षण संस्थानों को बहु-विषयक संस्थानों के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया गया है.


इन प्रावधानों के साथ ही शिक्षा नीति में अनुवाद को लेकर बहुत ही गंभीरता दिखाई गई है. अभी तक अनुवाद को मौलिक कार्य तो स्वीकारा ही नहीं जाता रहा है, इससे भी दुखद स्थिति यह रही है कि अनुवाद को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है. इस दिशा में न तो बहुत ज्यादा कार्य हुआ हुआ है और न ही अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित किया गया है. ऐसी स्थिति होने के कारण ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, इतिहास आदि विषयों के प्रसार का क्षेत्र संकुचित रह जाता है. किसी भी विषय का यदि उसी क्षेत्र की स्थानीय भाषा में अनुवाद करा दिया जाये तो उस ज्ञान से, उस विषय से सभी क्षेत्रों के नागरिक परिचित हो सकते हैं. यदि वैश्विक स्तर पर कोई ज्ञानवर्द्धक पुस्तक किसी भी भाषा में छपती है और यदि भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद उपलब्ध हो जाये तो निश्चित ही देश के नागरिक, विद्यार्थी वैश्विक साहित्य का लाभ अपनी भाषा में ले सकेंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में राष्ट्रीय अनुवाद संस्थान की स्थापना तथा अनुवाद के उच्च गुणवत्ता वाले पाठ्यक्रम चलाने का प्रावधन किया जाना दर्शाता है कि भाषा विकास हेतु सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है.


कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत के विभिन्न भाषाओं, बोलियों, कला एवं संस्कृति के संवर्धन हेतु पर्याप्त प्रावधान किये गये हैं. यदि इन सभी प्रावधानों का शतप्रतिशत क्रियान्वयन हो गया तो भारतीय सनातन संस्कृति अपने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त कर भारत को विश्व के अग्रिम पंक्ति के देशों में स्थापित करने में सफल होगी. यहाँ हम सभी को स्मरण रखना होगा कि यदि नागरिकों में अपनी ही भाषा के प्रति स्वाभिमान नहीं होगा तो उनको विश्व में कहीं सम्मान नहीं मिल सकेगा.


.