लोकतंत्र में विरोध करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार होता है किन्तु उस विरोध
का उद्देश्य अराजकता फैलाना हो, समाज को गुमराह करना हो तो ऐसे विरोध को अवसरवाद कहा जाता है. बिना ठोस
प्रमाण के ऐसे विरोधी स्वर देश का विपक्ष उठाने में लगा है. इस स्वर में वोट चोरी,
निर्वाचन आयोग आयुक्त का इस्तीफा सुनाई दे रहा है. सड़कों पर
कांग्रेस सहित अनेक दल एसआईआर को खारिज करने और इसके लागू होने के बाद सम्पन्न
विधानसभा चुनावों को भंग करने की बात भले कर रहे हों मगर सर्वोच्च न्यायालय में
दायर की गई याचिका में वे एसआईआर की वैधता को स्वीकार करते हैं. याचिका में कहा है
कि इसका उद्देश्य एसआईआर की वैधता को चुनौती देना नहीं है. सोचने वाली बात है कि
यदि इसे चुनौती देना, खारिज करवाना उद्देश्य नहीं है तो
सड़कों पर अराजक रूप से उतर कर जनता को भ्रमित क्यों किया जा रहा है? ऐसे में आंदोलन की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है कि वह वास्तव
में मतदाताओं के अधिकारों के लिए है या फिर दलों द्वारा अपनी राजनीतिक जमीन को
बचाने के लिए है.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर जो राजनीतिक उत्पात
सा काटा जा रहा है, उसमें
पूछा जाना चाहिए कि यदि लाखों मतदाताओं के नाम गलत ढंग से काट दिए गए हैं तो वे असली मतदाता हैं
कहाँ? उन प्रभावित मतदाताओं द्वारा
किसी भी रूप में अपनी शिकायतों को किसी सम्बंधित अधिकारी के समक्ष रखा गया है? मान लिया जाये कि वे सभी मतदाता इसके लिए
सक्षम नहीं हैं तो शोर मचाने वाले विपक्षी दलों को ऐसे मतदाताओं के दस्तावेजों,
विवरणों को प्रस्तुत करते हुए निर्वाचन अधिकारियों से स्पष्टीकरण माँगें. मंचों से
लाखों वोट कटने की बात करना, इसकी आड़ में सड़कों पर अराजकता फैलाना किसी भी रूप में उचित नहीं है. जो
लोग इस अनावश्यक विरोध में अपना भी स्वर मिला रहे हैं क्यों उन्होंने विचार किया
है कि क्या यह एसआईआर पहली बार हो रहा है? क्या मतदाता सूची
में से पहली बार मतदाताओं के नाम हटाये गए हैं? क्या बिना
पुनरीक्षण के पुरानी मतदाता सूची को ही बनाए रखना औचित्यपूर्ण है? आखिर नए नागरिक वयस्क होंगे, मतदाता बनेंगे, उनको सूची में शामिल
किया जायेगा; मृत व्यक्तियों के नाम हटेंगे. इसी तरह से दोहरी
प्रविष्टियों, स्थान परिवर्तन के कारण भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता है. ऐसे
में प्रश्न उठता है कि क्या इन बिन्दुओं के आधार पर नाम हटाने को वोट चोरी कहा
जाएगा? हाँ, ये सत्य है कि पुनरीक्षण के नाम पर
मनमाने ढंग से नाम काटने का अधिकार किसी को नहीं. यदि किसी पात्र मतदाता का नाम कटता
है तो उसकी अपील पर सुनवाई अवश्य होनी चाहिए.
ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा माँगने वाले विपक्षियों का आरोप है कि मतदाताओं के
नाम हटने का लाभ भाजपा को मिला है; उसको वोट न देने वालों के नाम काटे गए हैं. इस
हास्यास्पद आरोप पर विपक्षी दल स्वयं ही बता पा रहे कि वे किस आधार पर दावा कर रहे
कि भाजपा को वोट न देने वालों के ही नाम काटे गए हैं. क्या विपक्ष के पास ऐसे आँकड़े हैं? इस बात को विपक्षी
दलों द्वारा उठाये जाने का आधार वे अवैध नागरिक हैं जिनका नाम मतदाता सूची से
हटाया गया है. देश का संविधान भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्रदान करता है.
विदेशी नागरिक, वे चाहे किसी भी देश के
क्यों न हों, भारत में निवास
करने के कारण भारतीय मतदाता नहीं हो सकते. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि विगत
वर्षों में रोहिंग्या,
बांग्लादेशी शरणार्थियों के नाम पर अवैध नागरिकों की संख्या देश में बढ़ी है. यदि
ऐसे लोगों का किसी भी तरीके से मतदाता सूची में नाम अंकित हो गया था और जाँच के
बाद यह सत्यापित होने पर उनके नाम को हटाया जाना वोट चोरी कैसे हो गया?
ज्ञानेश कुमार को दोषी ठहराते हुए उनकी आलोचना करने, इस्तीफ़ा माँगने वाले
विपक्ष को स्मरण होना चाहिए कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल फरवरी
2025 से शुरू हुआ और विपक्षी
दल इससे पहले के विधानसभा, लोकसभा चुनावों में पराजित होते रहे हैं. अपने आरोपों की सत्यता के लिए विपक्ष
को प्रमाण देना चाहिए न कि सड़क पर हंगामा मचाना चाहिए. केवल यह कह देना उचित नहीं
कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष नहीं. यह बताना होगा किस प्रकार किसी दल विशेष को
अनुचित लाभ दिया गया. यदि किसी मामले में संस्थागत प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उनकी स्वतंत्र और
निष्पक्ष जाँच अवश्य होनी चाहिए किन्तु बिना पर्याप्त आधार के सड़क पर अराजकता
फैलाते हुए इस्तीफे की माँग करना कोई समाधान नहीं है.
एसआईआर पर यदि किसी भी तरह की विसंगति है तो उसका समाधान नारे लगाकर नहीं, इस्तीफ़ा माँग कर नहीं, देश में अराजकता फैलाकर नहीं, झूठे दावों के साथ नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर निकल सकता है. यदि वाकई
में पात्र मतदाताओं के नाम गलत ढंग से हटाए गए हैं तो उनको तत्काल शामिल किया जाए. यदि नाम
नियमानुसार हटे हैं तो उनको वोट चोरी कहकर संवैधानिक संस्था पर आरोप न लगाया जाए.
लोकतंत्र में मतदाता सूची देश के नागरिकों के मताधिकार का आधार है. इसलिए उसका
निष्पक्ष और पारदर्शी होना अत्यावश्यक है. इसके लिए निर्वाचन आयोग, सरकार के साथ-साथ विपक्षी दलों को
भी सजग रहने की आवश्यकता है. इसलिए एसआईआर का विरोध विपक्ष को करना है तो प्रमाणों
के साथ करे न कि किसी की फीलिंग के आधार पर. यहाँ सरकार को एक बात ध्यान रखनी होगी कि
देश को ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहाँ फर्जी मतदाताओं के लिए कोई स्थान न हो किन्तु वास्तविक
नागरिक भी अपने मताधिकार से वंचित न रहे. इसी तरह विपक्षी दलों को भी इसका स्मरण
रहे कि चुनावी राजनीति में बिना प्रमाण किया गया विरोध, अराजक रूप से पैदा किया गया शोर
क्षणिक लाभ तो दे सकता है किन्तु विश्वसनीयता, स्थायित्व पैदा नहीं कर सकता
है.
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