भारतीय राजनीति में ये 'दीदी', 'भाईसाहब' कहा जाना एक तरह की रूढ़ि बन गया है. उम्र, अनुभव देखे बिना.... सामने वाले को सार्वजनिक रूप से दीदी, भाईसाहब सम्बोधित करना शुरू कर दिया जाता है. इस सम्बन्ध में एक हास्यास्पद घटना याद आ रही है, जब वहाँ आयोजकों को उस ग़लती के बारे में बताया तो वे भी हँसते हुए उसमें सुधार के लिए तत्पर हो गए.
कुछ साल पहले प्रदेश की राजनीति में एक बयान के कारण से अपनी पार्टी से बर्खास्त किये गए राजनीतिक व्यक्ति की पत्नी ने सक्रियता दिखाई. कालांतर में उनकी सक्रियता के चलते उनको मंत्री पद भी मिला. बहरहाल, अपनी चर्चाओं के प्रसिद्धि भरे दौर में उन दोनों व्यक्तियों का, जो आपस में पति-पत्नी थे, जनपद में एक कार्यक्रम में आना हुआ. उनके मंचासीन होने के बाद कार्यक्रम संचालक से लेकर हर आने वाला व्यक्ति उनके सम्मान में 'दीदी', 'भाईसाहब' का सम्बोधन करने के बाद अपना भाषण दे रहा था. चार-पाँच लोगों के आने-जाने के क्रम में लगा कि शायद ये लोग खुद को सम्बोधन स्तर पर सही कर लेंगे मगर ऐसा नहीं हुआ.
इसके बाद हमने उठकर कार्यक्रम सञ्चालन कर रहे व्यक्ति से, आयोजक से कहा कि कम से कम इन दोनों के रिश्ते का ध्यान रखते हुए इनका सम्बोधन करिए, करवाइए. तुम्हारे 'दीदी', 'भाईसाहब' के कारण दोनों लोग भी आपस में भाई-बहिन हो गए. बात की गम्भीरता को समझ वहाँ एक ठहाका गूँजा मगर मंच से 'दीदी', 'भाईसाहब' का रिश्ता पंडाल में तैरता रहना बंद न हुआ.
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