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02 फ़रवरी 2019

लोक कल्याणकारी बजट


चुनावी वर्ष में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिम बजट के द्वारा एक तरफ जनमानस को खुश करने का काम किया है वहीं विपक्षियों को साफतौर पर चेताया सा है कि अभी उनके तरकश में तीर बकाया हैं. इस बजट में करदाताओं का, वेतनभोगियों का, किसानों का ध्यान तो रखा ही गया है विशेष बात यह रही कि श्रमिक वर्ग का भी ख्याल रखा गया है. अभी तक के बजट में संभवतः ऐसा कम ही देखने को मिला है कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए किसी तरह की योजना का प्रावधान किया गया हो. इस बार साठ वर्ष से अधिक आयु के असंगठित कामगारों को पेंशन सुविधा का आरम्भ किया गया है. इस बजट में इनके अलावा और भी ऐसे प्रावधान किये गए हैं जिनको देखते हुए इसे लोककल्याणकारी बजट कहा जा सकता है. आमजनमानस के हितों के साथ-साथ देश की आर्थिक, सामरिक स्थिति के सम्बन्ध में भू पुख्ता कदम उठाये जाने से स्पष्ट होता है कि सरकार ने किसी एक पक्ष की तरफ ही अपना ध्यान नहीं लगाया है.


लोककल्याण की भावना निहित होने के चलते ही अभी तक विपक्षियों द्वारा, विशेषज्ञों द्वारा बजट की उन स्वरों में आलोचना नहीं की जा सकी है, जैसी कि विगत वर्षों में होती रही है. केंद्र में किसी भी सरकार द्वारा बजट का प्रस्तुत करना रहा हो मगर उसके प्रावधानों पर तत्कालीन विपक्ष सदैव हमलावर बना रहता था. संभवतः इस बार ऐसा देखने को मिला है जबकि बजट के द्वारा विपक्षियों को आलोचना करने का, सरकार पर वार करने का अवसर नहीं मिल पाया है. यह इस बजट की विशेषता है कि इसके द्वारा देश के लगभग अस्सी प्रतिशत नागरिकों तक को लाभान्वित करने का प्रयास किया गया है. मझोले-छोटे किसानों, असंगठित मजदूरों, कामगारों आदि के साथ-साथ मध्यमवर्गीय वेतनभोगियों को आयकर छूट सीमा बढ़ाकर लाभ के दायरे में शामिल किया है.  

देश में उदारीकरण का दौर आने के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से सरकारों ने लोककल्याणकारी कदम उठाये जाने की तुलना में व्यापारिक कदम उठाने को ज्यादा महत्त्व दिया था. आयकर छूट सीमा में वृद्धि किये जाने की आशा कई वर्षों से वेतनभोगी व्यक्ति लगाये हुए था मगर ऐसा अबकी बजट में हो सका है. इसके अलावा पीएफ खाताधारकों को दुर्घटना बीमा, बैंक खातों में ब्याज पर टैक्स की सीमा में वृद्धि, ग्रेच्युटी में बढ़ोत्तरी आदि ने मध्यमवर्ग को संतुष्ट किया है. इस बजट को देखकर इसे बड़े उद्योगपतियों का बजट नहीं कहा जा सकता है. जैसा कि पिछले बजट के दौरान विपक्षियों द्वारा कहा जाता था. वर्तमान केंद्र सरकार ने इस बजट के द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों के बजाय छोटे-छोटे वर्ग तक पहुँच बनाने की कोशिश की है. इसे भले ही चुनावी दाँव कहा जाये मगर इसके द्वारा मध्यमवर्ग को राहत मिली है. आयकरदाताओं के बीच संतुष्टि का भाव जन्मा है. 

पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार ने जिस तरह से सख्ती के साथ कदम उठाते हुए नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया, उससे यह तो स्पष्ट हुआ था कि सरकार आने वाले समय में मध्यमवर्ग को लाभान्वित करते हुए राहत देगी. ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को कर के दायरे में शामिल करते हुए भी मध्यमवर्ग को कर से राहत प्रदान करवाना है. सरकार समझती है कि जीएसटी के द्वारा कारोबारी अपने ऊपर आने वाला कर जनता के ऊपर स्थानांतरित कर देंगे. इसके चलते वह जनता पर, आमजनमानस पर दोहरा भार डालने के मूड में नहीं दिख रही थी. यही कारण है कि आयकर छूट सीमा को बढ़ाया गया है. विरोध के नाम पर विरोध तो ऐसे भी दिखाई देने लगा है कि छोटे किसानों को दिए जाने वाले वार्षिक 6000 रुपये को भी प्रतिदिन के हिसाब से आकलन करके इसे नाकाफी बताया जाने लगा है. जबकि बजट में स्पष्ट कहा गया है कि यह राशि दो-दो हजार रुपये की तीन किश्तों में दी जाएगी. इसके अलावा वर्तमान बजट को राजकोषीय घाटा बढ़ाने वाला बताया जाने लगा है. यदि विगत वर्षों के राजकोषीय घाटे पर निगाह डालें तो स्पष्ट रूप से समझ आएगा कि वर्ष 2011-12 के बाद से राजकोषीय घाटा लगातार कम ही हुआ है. ऐसे में सरकार खुद अपने स्तर से प्रयास करेगी कि राजकोषीय घाटा वर्ष 2017-18 के 3.5 से बहुत ज्यादा न बढ़े.


फ़िलहाल, विपक्षियों के पास इस बजट की बुराई करने के, आलोचना करने के बिंदु नहीं हैं. किसी भी दृष्टि से इस बजट को बड़े कारोबारियों से प्रभावित बजट नहीं कहा जा सकता है. किसी भी रूप में ऐसी कोई योजना नहीं बनाई गई है जो सिर्फ पूंजीपतियों की सहायता कर रही हो. निसंदेह पहली बार देश के उस छोटे से तबके का ध्यान रखा गया है जो संगठित नहीं है, जिसके पास कोई भविष्यगत संसाधन नहीं हैं, वृद्धावस्था में अपने जीवन सञ्चालन हेतु कोई आर्थिक मदद नहीं है. ऐसे में कोई कुछ भी कहे मगर वर्तमान बजट लोक कल्याणकारी बजट है.

01 फ़रवरी 2019

मध्यम वर्ग को लाभान्वित करेगा यह बजट 2019


वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा अपना अंतिम बजट अंतरिम बजट के रूप में प्रस्तुत किया गया. इस बजट में आम आदमी, किसान, श्रमिकों का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है. कुछ विशेष बिन्दुओं को रखते हुए इस बजट पर चर्चा का प्रयास रहेगा.

वेतनभोगियों, कर्मचारियों के लिए -
पाँच लाख रुपये तक की आय के साथ डेढ़ लाख रुपये तक की बचत भी करमुक्त.
स्टैण्डर्ड डिडक्शन 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये.
40 हजार रुपये तक के बैंक ब्याज पर टैक्स नहीं. पहले यह सीमा 10 हजार रुपए तक थी.
पीएफ खाताधारकों को 6 लाख रुपये का बीमा किये जाने का प्रावधान.
कर्मचारियों को नई पेंशन स्कीम में सरकार के योगदान को चार प्रतिशत से बढ़ाकर चौदह प्रतिशत किया गया.
21 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने वाले कर्मचारियों को 7 हजार रुपए बोनस.
ग्रैच्युटी की सीमा दस लाख रुपये से बढ़ाकर बीस लाख रुपए की गई.

किसानों के लिए -
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जबकि 22 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से कम से कम 50 फीसदी अधिक निर्धारित किया गया है.
छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि नामक योजना को मंजूरी.
दो हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) तक की भूमि वाले किसानों को 6000 रुपए प्रति वर्ष देने का निर्णय. यह रकम दो-दो हजार रुपए की तीन बराबर किश्तों में सीधे किसानों के खाते में जाएगी.
प्राकृतिक आपदा से प्रभावित होने वाले सभी किसानों के लिए ब्याजमाफी योजना शुरू.
इसमें दो प्रतिशत ब्याज और समय पर कर्ज लौटाने वाले किसानों को तीन प्रतिशत अतिरिक्त ब्याज माफी का लाभ मिलेगा. कुल मिलाकर उन्हें ब्याज में पाँच प्रतिशत की छूट मिल सकेगी.
पशुपालन-मछलीपालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड से लिए कर्ज के ब्याज में दो प्रतिशत ब्याज की छूट.

श्रमिकों के लिए -
रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा चालक, कूड़ा बीनने वाले, खेती कामगार, बीड़ी बनाने वाले जैसे असगंठित क्षेत्र से जुड़े कामगारों को 60 साल की उम्र के बाद तीन हजार रुपए प्रति महीने की पेंशन देने का प्रावधान.
यह योजना 15000 रुपये तक मासिक आय वाले असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए. इसका नाम प्रधानमंत्री श्रम-योगी मानधन वृहद पेंशन योजना रखा जाएगा.
वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत अपने अंतिम बजट, जो अंतरिम बजट है, में माध्यम वर्ग को ज्यादा महत्त्व दिया गया. इस बजट के सम्पूर्ण विश्लेषण के बाद पता चलेगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में यह किस तरह का असर डालेगा किन्तु इस अंतिम बजट से वेतनभोगियों को, किसानों को और श्रमिकों को खुश करने का प्रयास सरकार द्वारा किया गया है. विगत चार वर्षों से अधिक के कार्यकाल में सरकार पर आरोप लगते रहे कि वह किसानों और श्रमिकों के हितों को ध्यान में नहीं रख रही है. वेतनभोगियों, कर्मचारियों के हितों की उपेक्षा का भी आरोप उस पर जब-तब लगता रहा है. इसके साथ-साथ सरकार को चंद गिने-चुने व्यवसायियों की सरकार कहा जाने लगा था.


इस बजट से ऐसी भ्रान्ति दूर होनी चाहिए. वेतनभोगियों से इतर इस बजट में जिस तरह से किसानों और श्रमिकों के लिए योजनाओं को बनाया गया है वह सरकार की दूरदर्शी सोच को प्रकट करता है. छोटे किसानों के लिए वार्षिक सहायता भले ही देखने में छोटी लगे मगर व्यावहारिक रूप में बहुत सहायक सिद्ध होगी. आपदा के समय ब्याज में छूट को सहायता भले माना जाए किन्तु समय पर क़र्ज़ लौटाने वालों को अतिरिक्त ब्याज छूट अब किसानों को सही समय पर कर्ज जमा करने के लिए जरूर प्रोत्साहित करेगा.

इस बजट में तमाम ख़ास बातों में सबसे अधिक प्रशंसनीय श्रमिकों के लिए, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के हितार्थ योजना बनाना रहा है. अभी तक इनके प्रति गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा था. अक्सर ये श्रमिक मुसीबत के समय अकेले नजर आते थे. उम्रदराज होने के बाद इनके सामने रोजी-रोटी का, अपने जीवन-निर्वहन का संकट खड़ा हो जाता था. वर्तमान बजट में प्रस्तुत पेंशन योजना निश्चित ही इन्हें लाभान्वित करेगी और भविष्य के प्रति सुरक्षा का वातावरण पैदा करेगी.

यकीनन विरोधियों की नजर में इसे चुनावी वर्ष से सम्बंधित बजट बताया जायेगा किन्तु जिस तरह से बजट में आम आदमी का, मध्यम वर्ग का ध्यान रखा गया है वह भविष्य की अर्थव्यवस्था की पूर्व-पीठिका है. यहाँ यह याद रखने की आवश्यकता है कि जिस समय सरकार ने नोटबंदी जैसा कठोर कदम उठाया था, उसके तुरंत बाद जीएसटी जैसा कदम उठाकर साबित किया था कि वह वोटबैंक के लिए नहीं वरन देश की आर्थिक स्थिति के लिए काम कर रही है, उसी दिन स्पष्ट हुआ था कि आने वाले दिनों में इस सरकार के द्वारा मध्यम वर्ग को राहत प्रदान की जाएगी. और इस बजट से ऐसा ही हुआ है. आयकर छूट के द्वारा ही लगभग 80 प्रतिशत वेतनभोगियों को लाभ मिला है. निश्चित ही यह एक दीर्घकालिक निवेश है, जो सरकार द्वारा किया गया है, बस इसे समझने की आवश्यकता है. करोड़ों लोगों के हितार्थ एक कदम से योजना बनाना निश्चित रूप में भले ही चुनावी दाँव हो मगर यह आने वाले दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति सकारात्मकता जगायेगा. लोगों को आर्थक सशक्तिकरण के प्रति प्रोत्साहित करेगा.

02 फ़रवरी 2018

अपनी-अपनी नजर का बजट

चुनावी वर्ष में बजट का आना और उसके बाद भी लोक-लुभावन न होना केंद्र सरकार की हिम्मत को ही दर्शाता है. अगले वर्ष 2019 को लोकसभा चुनाव होना है, ऐसी सम्भावना भी व्यक्त की जा रही है कि लोकसभा चुनाव समय से पहले भी हो सकते हैं. ऐसे में वर्तमान वर्ष 2018 के बजट को चुनावों से सम्बद्ध करके देखा जा रहा था. ऐसी सम्भावना जताई जा रही थी कि केंद्र सरकार आगामी वर्ष में चुनावों को देखते हुए अपने बजट को लोक-लुभावन बनाएगी. जैसा कि प्रत्येक बजट के समय होता है कुछ वैसा ही इस बार भी हुआ. सत्ता पक्ष ने इस बजट को राष्ट्र-निर्माण में, राष्ट्र-विकास में सहायक बताया वहीं विपक्ष ने इस बजट को नकारात्मक सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. यहाँ बजट को उसके चुनावी वर्ष में आने या फिर भाजपा द्वारा पेश किये जाने से जोड़कर न देखा जाये तो उसकी कमियां, उसके लाभ सामने सहजता से आ सकेंगे. देश भर के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ सोशल मीडिया के वे लोग जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी अर्थशास्त्र विषय को देखा भी नहीं वे भी इस बजट की समीक्षा करने में लगे हैं.


किसी भी बजट में कमियां हो सकती हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है पर क्या सिर्फ उसी बजट को बेहतर माना जाये जिसमें नौकरीपेशा वालों के लिए आयकर छूट उपलब्ध हो? क्या उसी बजट को ज्यादा जनहितकारी माना जाना चाहिए जिसमें भौतिकतावादी वस्तुओं की कीमतों में कमी की गई हो? यहाँ ध्यान रखना होगा कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था 160 लाख करोड़ रुपयों के साथ विश्व की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है. ऐसी सम्भावना जताई जा रही है कि जल्द ही भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी. ऐसा होते ही हमसे आगे अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी ही होंगे. जो लोग इस तथ्य पर गर्व कर सकते हैं उन्हें शायद वर्तमान बजट से किसी तरह की कोई शिकायत न हो मगर ऐसे लोग जिनके लिए सिर्फ राजनैतिक दल ही महत्त्वपूर्ण है उनको अवश्य ही इस बजट से शिकायत होगी. यदि वर्तमान केंद्र सरकार के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के कार्यकाल पर गौर किया जाये तो उनके कार्यों की आज न केवल देश में वरन वैश्विक स्तर पर प्रशंसा हो रही है. ऐसे में वर्तमान बजट को लेकर सम्भावना व्यक्त की जा रही थी कि कहीं न कहीं पूरे बजट में मोदी अपने उसी छवि को आरोपित करने की कोशिश करेंगे जिससे आगामी लोकसभा चुनावों में उनको मदद मिल सके.

यदि इस बजट के सरकार द्वारा खर्चा किये जाने के आँकड़ों पर गौर किया जाये तो साफ़ तौर पर ज्ञात होता है कि उसके द्वारा रक्षा पर सर्वाधिक खर्च किया जा रहा है. यदि सरकार की आय को सौ रुपये माना जाये और उसके सापेक्ष व्यय का अनुमान लगाया जाये तो रक्षा पर सर्वाधिक 12.2 रुपये खर्च किये जायेंगे. इसके बाद खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी (6.8 रुपये), पेंशन (6.1 रुपये), ग्रामीण विकास (6.0 रुपये), यातायात परिवहन (5.8 रुपये), घरेलू कामकाज (3.9 रुपये), शिक्षा (3.7 रुपये), खाद पर सब्सिडी (3.3 रुपये), कृषि (2.6 रुपये) और स्वास्थ्य (2.3 रुपये) खर्च किया जायेगा. स्पष्ट है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य रक्षा के बाद ग्रामीण विकास को महत्त्व देना है. इस बजट में अनुमान है कि कार, बाइक, स्कूटर, फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रोनिक सामान, सोना, चाँदी, फर्नीचर, सिगरेट आदि मंहगे हो जायेंगे. मध्यम वर्ग को भी बहुत बड़ी राहत नहीं दी गई है. आयकरदाताओं को भी किसी तरह की कोई रियायत नहीं दी गई है. बजाय किसी राहत के सेस को एक फ़ीसदी और बढ़ा दिया गया है. इसका बोझ सीधे-सीधे मध्यम वर्ग पर, नौकरीपेशा व्यक्तियों पर ही पड़ना है.


यही वह सामान्य स्थिति है जो किसी को भी साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है. इसे समझने के लिए किसी तरह से अर्थशास्त्री होने की, आर्थिक विशेषज्ञ होने की आवश्यकता नहीं है, किसी तरह के आर्थिक विश्लेषक होने की जरूरत नहीं है. एक सामान्य नागरिक अपनी सरकार से अपने लिए लाभ की, छूटों की, रियायत की, सुविधाओं की अपेक्षा करता है. यदि किसी कारण से कोई सरकार उसके लिए ऐसा करने में सक्षम नहीं होती है तो वह सरकार ऐसे नागरिकों की निगाह में अक्षम मानी जाती है. ऐसा ही कुछ वर्तमान केंद्र सरकार के साथ होता दिख रहा है. इसके बाद भी जनमानस को सिर्फ अपने लाभों की अपेक्षा को छोड़कर समग्र रूप में इस बजट को देखने की आवश्यकता है. जिस तरह विगत वर्षों में केंद्र सरकार या कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा अपनी जीवटता दिखाते हुए नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया वह तारीफ योग्य है, ठीक वही स्थिति वर्तमान बजट को लेकर भी है क्योंकि यह बजट संभावित चुनावी वर्ष में आया है. यदि ऐसे में यह मतदाताओं को लाभान्वित करने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया, इसका मतलब साफ है कि सरकार की नीयत राष्ट्र-विकास की तरफ है न कि वोट-विकास की तरफ. 

03 फ़रवरी 2017

केन्द्रीय बजट के बारे में

केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 01 फरवरी को देश का केन्द्रीय बजट पेश करके वर्षों से चली आ रही परम्परा को तोड़ दिया. अभी तक केन्द्रीय बजट प्रतिवर्ष फरवरी माह के अंतिम कार्यदिवस को पेश किया जाता रहा है. इस बजट के साथ रेल बजट को भी पेश करके एक और परिपाटी को भी तोड़ा गया है. अभी तक रेल बजट को केन्द्रीय बजट से अलग पेश किया जाता रहा है. इससे पूर्व सन 2000 में तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिंह ने भी बजट से जुड़ी एक परम्परा को तोड़ा था. वर्ष 2000 तक केंद्रीय बजट को फरवरी महीने के अंतिम कार्य-दिवस को शाम पाँच बजे घोषित किया जाता था. ऐसा औपनिवेशिक काल से चला आ रहा था, जब ब्रिटिश संसद दोपहर में बजट पारित करती थी जिसके बाद भारत ने इसे शाम को पेश करना आरम्भ किया. यह परंपरा सर बेसिल ब्लैकैट ने 1924 में शुरु की थी. इसके पीछे का कारण रात भर जागकर वित्तीय लेखा-जोखा जोखा तैयार करने वाले अधिकारियों को आराम बताया जाता था. अटल बिहारी बाजपेयी की एनडीए सरकार (बीजेपी द्वारा नेतृत्व) के तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने परम्परा को तोड़ते हुए 2001 के केंद्रीय बजट के समय को बदलते हुए पूर्वान्ह ग्यारह बजे घोषित किया. 


बजट शब्द की उत्पति लैटिन शब्द बुल्गा से हुई, इसका अर्थ है चमड़े का थैला. बुल्गा से फ्रांसीसी शब्द बोऊगेट की उत्पति हुई. जिसके बाद अंग्रजी शब्द बोगेट अस्तित्व में आया, इससे बजट शब्द बना. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में भारत के केन्द्रीय बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में निर्दिष्ट किया गया है. यह भारतीय गणराज्य का वार्षिक बजट होता है, जिसे प्रत्येक वर्ष फरवरी के अंतिम कार्य-दिवस में भारत के वित्तमंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता रहा है. इसके पश्चात् भारत के वित्तीय वर्ष की शुरूआत अर्थात 1 अप्रैल से बजट को लागू करने से पहले इसे सदन द्वारा पारित करना आवश्यक होता है. भारत देश का पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को ब्रिटिश सरकार के वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने पेश किया था. जबकि आज़ादी के ठीक पहले अंतरिम सरकार का बजट लियाकत अली खां ने पेश किया था. यह बजट 9 अक्टूबर 1946 से लेकर 14 अगस्त 1947 तक की अवधि के लिए था. स्वतंत्र भारत का प्रथम केन्द्रीय बजट 26 नवम्बर 1947 को आर.के. षणमुखम चेट्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया था. इसमें 15 अगस्त 1947 से लेकर 31 मार्च 1948 के दौरान साढ़े सात महीनों को शामिल किया गया था. आर.के. षणमुखम चेट्टी ने ही अपने बजट में पहली बार अंतिरम शब्द का प्रयोग किया था. तब से लघु अवधि के बजट के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा. भारतीय गणतंत्र की स्थापना के बाद पहला बजट 28 फरवरी 1950 को जान मथाई ने पेश किया था. इस बजट में ही योजना आयोग की स्थापना का वर्णन किया था. 

बजट छपने के लिए भेजे जाने से पहले वित्त मंत्रालय मे हलवा खाने की रस्म निभाई जाती है. इस रस्म के बाद बजट पेश होने तक वित्त मंत्रालय के संबधित अधिकारी किसी के संपर्क में नहीं रहते हैं. यहाँ तक कि उनको अपने परिवार से दूर रहकर वित्त मंत्रालय में ही रुकना पड़ता है. 1958-59 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने बजट पेश किया उस समय वित्त मंत्रालय उनके पास था ऐसा करने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने. मोरारजी देसाई ने अब तक सर्वाधिक दस बार बजट पेश किया है. इनमें आठ केन्द्रीय बजट तथा दो अंतरिम बजट हैं. अपने जन्मदिन पर बजट पेश वाले वह एकमात्र प्रधानमंत्री हैं. उनके इस्तीफा देने के बाद इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्रालय का पदभार भी संभाला. वित्त मंत्री के पद को हासिल करने वाली वे पहली महिला भी बनी. 


11 जुलाई 2014

मोदी का पहला बजट : जन-भावनाएँ और देश-हित




जैसा कि तय था, आम बजट पर सत्ता पक्ष की तरफ से सकारात्मक और विपक्ष की तरफ से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. विपक्ष जो विगत दस वर्षों से इसी तरह की आँकड़ेबाज़ी करने में लगा था, तो उसको इस बजट से आपत्ति क्यों है, ये समझ से परे है? यदि वर्तमान सरकार भी उसी की नीतियों को आगे बढ़ा रही है, तो उनका रोना किस कारण से? क्या महज इसलिए कि इस बजट में गाँधी नाम से, नेहरू नाम से किसी योजना का सूत्रपात नहीं किया गया. बजाय गाँधी-नेहरू की मूर्तियों की स्थापना के सरदार पटेल की मूर्ति बनाये जाने की बात कही गई. बहरहाल, ये चर्चा का विषय नहीं है, चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि क्या वाकई इस बजट से देश की आर्थिक दशा सुधरेगी? क्या वाकई ये विकास की राह पर ले जाने वाला बजट है?
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जिस तरह का बहुमत पाकर भाजपा सत्तासीन हुई है, उससे न केवल आम आदमी में बल्कि खुद विपक्ष के बहुसंख्यक लोगों में इस बात की उम्मीद जागी थी कि इस बार का बजट कुछ अलग हटकर होगा. जिस तरह से मोदी ने अपने आरंभिक भाषण में कड़वी दवा देने की बात कही थी, उससे लगा था कि कुछ न कुछ कठोर कदम अवश्य उठाये जायेंगे किन्तु ऐसा नहीं हुआ. विस्तार में यहाँ बजट की चर्चा करना संभव नहीं है किन्तु बजट की सकारात्मकता को इस बात से समझा जा सकता है कि महज राजनैतिक स्टंटबाज़ी न करते हुए महिलाओं की सुरक्षा हेतु, बेटियों के भविष्य हेतु, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, कृषि हेतु अलग से व्यवस्थाएं की गई हैं, प्रावधान किये गए हैं. रसोई गैस सिलेण्डर की संख्या की कटौती न करके गृहणियों को राहत दी है तो आयकर सीमा में बहुत थोड़ी सी वृद्धि करके और छूटयोग्य निवेश सीमा में भी अल्प वृद्धि करके आम आदमियों को देश से विकास से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है. मनरेगा को कृषि से सम्बद्ध करने के प्रयास से इसे बजाय समाप्त करने के और बेहतर बनाये जाने पर बल दिया है. और भी ऐसे प्रावधान हैं जो एक उम्मीद जगाते हैं, विकास की आस बंधाते हैं.
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बजट पेश हो जाने के बाद सवाल खड़ा होता है कि इन योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे होगा, कौन करेगा, कितना करेगा. योजनाओं का बना देना काफी नहीं होता, अब जरूरी है उसके क्रियान्वयन हेतु समुचित कदम उठाये जाने की, आर्थिक आधार जुटाए जाने की. जिस एफडीआई का विरोध लगातार होता रहा, उसी को लागू करने की बात सामने आई. यहाँ इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. निवेश आवश्यक हो किन्तु अनिवार्य नहीं, ऐसी मानसिकता के साथ यदि निवेश होगा तो अवश्य ही देश-हित में होगा. सब्सिडी के सहारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं चलाई जा सकती, ये एक अल्पकालिक व्यवस्था है और यदि आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालिक सफलता चाहिए है तो सब्सिडी से बचने की आदत डालनी ही होगी, जनता को भी, सरकार को भी. नई सरकार से उम्मीद लगाये बैठे लोगों को समझना होगा कि करों के भरोसे ही कोई भी सरकार देश के लिए धन का वन्दोबस्त करती है. ऐसे में व्यक्ति अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ देश को कर देने में कोताही बरतेगा तो आर्थिक मोर्चे पर कहीं न कहीं उसी को चपत लगनी तय है. सरकार को भी ऐसा नहीं कि समस्त करों का बोझ आम आदमी पर, नौकरीपेशा पर, छोटे उद्योगकर्मियों पर ही डाल दे, उसे इस तरह के प्रावधान करने होंगे जिससे बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से अधिक से अधिक कर वसूला जाये. उनको दी जाने वाली सब्सिडी को बंद करके देश को आर्थिक समृद्ध बनाया जाये.
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सरकार अपना काम करने में लगी है, अब आम आदमी को, सामान्य नागरिक को भी देश-हित में कदम उठाये जाने की जरूरत है. सब्सिडी, छूट किसी भी रूप में हमारी विलासिता पूर्ति के लिए नहीं किये जाते; कोई भी प्रावधान बिना हमारी मदद के पूरे नहीं हो सकते; कोई भी योजना बिना हमारे सहयोग के संचालित नहीं हो सकती, ऐसे में हम सभी नागरिकों का प्रयास ये हो कि समवेत रूप में अपने-अपने क्षेत्र में संचालित सरकारी योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कराएँ, सहयोग दें. इससे अपने क्षेत्र का विकास तो होगा ही, देश भी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेगा.
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चित्र गूगल छवियों से साभार