विश्व पर्यावरण दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विश्व पर्यावरण दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

03 जून 2024

बढ़ता हुआ तापमान और मानवीय जिम्मेवारी

देश के अनेक राज्य, जिले भीषण गर्मी की चपेट में हैं. भयंकर लू का चलना और रिकॉर्डतोड़ तापमान ने होश उड़ा रखे हैं. एक-दो स्थानों से नहीं बल्कि अनेक जगहों से तापमान के 50 डिग्री सेल्सियस पार जाने की खबर आई. देश की राजधानी दिल्ली के मुंगेशपुर में अधिकतम तापमान 52.9 डिग्री सेल्सियस पहुँच गया. यह अपने आपमें भयावह स्थिति है. गर्मी के आरम्भ होते ही लगभग समूचे देश में तापमान में अचानक से वृद्धि दिखाई देने लगी. इन दिनों में 45 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक तापमान सामान्य रूप से रिकॉर्ड किया गया. इस वर्ष अप्रैल माह में वैश्विक तापमान के सामान्य से 1.32 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने की घटना के चलते लगातार बढ़ते तापमान को वैश्विक घटना कहकर नकारा नहीं जा सकता है.  

 

तेजी से बढ़ते तापमान का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण असंतुलन है. पर्यावरण असंतुलन के लिए तीव्रगति से बढ़ती जनसंख्या और उपभोक्तावादी प्रवृत्ति का लगातार बढ़ते जाना प्रमुख रूप से जिम्मेवार हैं. बढ़ती हुई जनसंख्या हो या फिर व्यक्ति की भोगवादी सोच, दोनों में नुकसान प्रकृति को ही उठाना पड़ रहा है. विकास के नाम पर, औद्योगीकरण के नाम पर अंधाधुंध तरीके से पेड़ों को काटा जा रहा है. विगत वर्षों में बनी सड़कें, एक्सप्रेस वे को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. जहाँ सड़कों का विकास सकारात्मक रूप में हुआ मगर प्राकृतिक विकास में जबरदस्त नकारात्मकता देखने को मिली. पेड़ों की इस तरह से होने वाली कटाई के कारण उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन ने पर्यावरण में जहरीली गैसों को बढ़ा दिया है. उनको अवशोषित करने वाले पेड़ों को काटा गया मगर उनके स्थान पर भरपाई नहीं की गई.

 



सुख-सुविधाओं के चलते, उपभोक्तावादी प्रकृति के चलते आज लगभग पूरा समाज अत्याधुनिक उपकरणों पर निर्भर हो गया है. मोबाइल, कम्प्यूटर, एसी, फ्रिज आदि लगभग प्रत्येक घर में उपयोग किये जा रहे हैं. इन सबसे उत्सर्जित होने वाली गैसों के कारण भी पर्यावरण असंतुलन उत्पन्न हुआ है. ग्रीन गैसों का मामला हो या फिर तापीय प्रदूषण इनके द्वारा मानवीय सभ्यता को ही संकट का सामना करना पड़ रहा है. वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन आदि के लगातार बढ़ते जाने के कारण हवा में इन प्रदूषित तत्वों की उपस्थिति बढ़ गई है. इसके चलते भी तापमान वृद्धि देखने को मिलती है. नीति आयोग के एक सदस्य का कहना है कि प्रदूषण के लिए ग्लोबल थ्रेशहोल्ड या पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) 440 है जबकि इसका वर्तमान स्तर 417 पीपीएम से 420 पीपीएम के बीच है. जिस तरह से इसमें वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष 2.3 पीपीएम जुड़ जाता है, उसके चलते माना जा रहा है कि अगले दस वर्षों में यह स्तर 440 पीपीएम तक पहुँच जाएगा. निश्चित ही यह सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती है.

 

जलवायु परिवर्तन एक ऐसा खतरा है जिसके चलते मानव स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. इसमें भी तापमान के बढ़ने से सर्वाधिक खतरा ब्रेन स्ट्रोक पड़ने का होता है. वैश्विक रूप से होते आये अनेक शोध-कार्यों की रिपोर्ट के आधार पर ऐसा माना गया है कि बढ़ते तापमान, जलवायु परिवर्तन के कारण स्ट्रोक से होने वाली मौतों और विकलांगता में वृद्धि देखने को मिली. ये अपने आपमें खतरनाक संकेत है. आँकड़े बताते हैं कि देश में लू के कारण प्रतिवर्ष औसतन तीस हजार से अधिक मौतें होती हैं. इसके अलावा साँस की बीमारियों के साथ-साथ टीबी, कैंसर, त्वचा रोग आदि जैसी कई असाध्य बीमारियाँ भी इसी कारण उत्पन्न होती हैं. ऐसा नहीं कि बढ़ते तापमान से सिर्फ़ इंसान ही प्रभावित होता है बल्कि इससे वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्रों पर भी प्रभावित होते हैं. पशु-पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ दूसरे क्षेत्रों में पलायन कर जाती हैं अथवा विलुप्त हो जाती हैं. इससे पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ग्लोबल वार्मिंग, कृषि क्षेत्र की गिरती स्थिति आदि भी इसी कारण से है.

 

पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें स्वयं सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं. सरकार द्वारा पॉलीथीन पर पाबंदी लगाने के लिए समय-समय पर कदम उठाए गए लेकिन हम अपनी तरफ से इस ओर सजगता नहीं दिखा सके हैं. प्रयास किया जाये कि हमारे दैनिक उपभोग में ऐसे पदार्थों का कम से कम इस्तेमाल हो जिनके द्वारा किसी भी रूप में प्रकृति को, पर्यावरण को नुकसान होता हो. उपभोक्तावादी संस्कृति में जीवन बिताना मजबूरी हो सकती है मगर प्राकृतिक स्त्रोतों का दोहन उसी रूप में किया जाये, जिससे कि प्रकृति को संकट न हो. ऊर्जा के लिए रासायनिक पदार्थों, पेट्रोलियम आदि के उपभोग से ज्यादा सौर-ऊर्जा पर निर्भरता को बढ़ाना होगा. पेड़-पौधों की कटाई रोकने के साथ-साथ हम सभी को खाली पड़ी जगहों पर अधिक से अधिक पौधारोपण करने की आदत डालनी होगी. अच्छा हो कि हम अन्य किसी पर दोषारोपण करने के स्थान पर स्वयं जागें और प्रकृति संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लें.


04 जून 2022

पर्यावरण के लिए घातक है ई-कचरा

पर्यावरण के प्रति सामाजिक रूप से सभी चिंतित दिखाई देते हैं. बचपन से पर्यावरण की एक रटी-रटाई परिभाषा ‘परि+आवरण’ के साथ आगे बढ़ते रहने के कारण जल, वायु, ध्वनि, मृदा प्रदूषणों पर सबकी चिंता देखने को मिलती है मगर अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आज भी बहुत बड़े जनमानस की तरफ से समझने की कोशिश न हो रही कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी भयानक तरीके से पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है.


इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. इस शब्द का प्रयोग चलन से बाहर हो चुके पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिये किया जाता है. ई-कचरा सूचना प्रौद्योगिकी और संचार उपकरण तथा उपभोक्ता इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स के रूप में निकलता है. इसमें मूलतः सेलफोन, स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर से सम्बंधित उपकरण, माइक्रोवेव, रिमोट कंट्रोल, बिजली के तार, स्मार्ट लाइट, स्मार्टवॉच आदि शामिल हैं.


सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइट, सीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे कई प्रकार के विषैले पदार्थ पाए जाते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं.




ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 के अनुसार दुनिया भर में वर्ष 2019 53.6 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में एशिया में ई-कचरे की सर्वाधिक मात्रा लगभग 24.9 मीट्रिक टन उत्पन्न हुई. रिपोर्ट के अनुसार कुल ई-कचरे में स्क्रीन और मॉनिटर 6.7 मीट्रिक टन, लैंप 4.7 मीट्रिक टन, आईटी और दूरसंचार उपकरण 0.9 मीट्रिक टन शामिल हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत ने 2019-20 में 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न किया जो 2017-18 के 7 लाख टन से काफी अधिक है. इसके विपरीत 2017-18 से ई-कचरा निपटान क्षमता 7.82 लाख टन से नहीं बढ़ाई गई है. एक रिपोर्ट कहती है कि ई-कचरा उत्पादक देशों अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत का स्थान है.


ई-कचरे में मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैं, जो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारा, लिथियम, लेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबों, नालों, नदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरों, पौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्क, हृदय, यकृत, गुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.


ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 रिपोर्ट में कहा गया है कि अब वैश्विक स्तर पर उन देशों की संख्या 61 से बढ़कर 78 हो गई है जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीति, कानून या विनियमन अपनाया है. इसमें भारत भी शामिल है किन्तु इसके बाद भी भारत में ई-अपशिष्ट के प्रबंधन से सम्बंधित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.


उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारत में ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण करने वाली कुल 312 अधिकृत कंपनियाँ हैं जो प्रतिवर्ष लगभग 800 किलो टन ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण कर सकती हैं. हालाँकि अभी भी भारत में औपचारिक क्षेत्र की पुनर्चक्रण क्षमता का सही उपयोग संभव नहीं हो पाया है क्योंकि ई-कचरे का बहुत बड़ा भाग अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि देश का लगभग नब्बे प्रतिशत ई-कचरे का पुनर्नवीनीकरण अनौपचारिक क्षेत्र में किया जाता है.


तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.


पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. संभव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  

 

.

07 जून 2019

पर्यावरण संरक्षण हेतु छोटे-छोटे कदमों की आवश्यकता


वर्तमान दौर में पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल वॉर्मिंग है. इस कारण से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे मानव जीवन के कदम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में अगर हमने पर्यावरण को बचाने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा. पर्यावरण संरक्षण के लिए हम सभी के बहुत छोटे-छोटे प्रयास भी बहुत बड़े साबित हो सकते हैं. इसके लिए हम सभी निम्न कदम अपना सकते हैं - 

(1) नागरिकों को पौधारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाये. भले ही कम पौधे लगाये जाएँ किन्तु उनकी विधिवत देखभाल की जाये. अपने पारिवारिक सदस्यों के जन्मदिन या किसी भी यादगार क्षण पर पौधे लगाकर उन यादों को चिरस्थायी बनाया जाये.
(2) मकान बनाते समय पेड़-पौधारोपण के लिए अतिरिक्त जगह छोड़ी जा सकती है. जहाँ वर्तमान में जगह नहीं है वहां अपने आंगन में थोड़ी सी जगह में गमलों के द्वारा हरियाली की जा सकती है. यही तापमान कम करेगी.
(3) पॉलिथीन से प्रदूषण फैलता है अत: पॉलिथीन का उपयोग न करते हुए रद्दी-पेपर से बनी थैलियों और कपड़े से बनी थैली और बैग्स का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए.
(4) पर्यावरण जागरूकता हेतु जल-संरक्षण भी आवश्यक है. इसके लिए हम सभी को कम से कम पानी का उपयोग करना चाहिए. शॉवर की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाएं. आंगन या फर्श सीधे पानी से धोने की बजाए झाडू लगाकर बाद में पोंछा लगा सकते हैं.
(5) घर में नल को टपकने न दें. प्लम्बर बुलाकर तुरंत ठीक करवाएं. इसके साथ-साथ सार्वजनिक जगहों में बहते नल को बंद करके पानी बचाया जा सकता है.
(6) घर के कचरे को बाहर खुले में फेंकने से बचा जाये. इसके साथ-साथ गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग जगहों पर एकत्रित किया जाना चाहिए.
(7) जल-संरक्षण के साथ-साथ बिजली की बजट करके भी पर्यावरण जागरूकता लाई जा सकती है. ऑफिस हो या घर बिजली का किफायती उपयोग करें. कमरे से बाहर निकलते समय बिजली से चलने वाले सभी उपकरण बंद कर दें.
(8) एसी, फ्रिज खरीदते समय ध्यान रखें कि ऐसे उपकरण पर्यावरण को नुकसान न पहुँचायें. विद्युत उपकरणों का समय-समय से रखरखाव करें.
(9) इसके साथ-साथ घर-घर जाकर लोगों को पर्यावरण बचाने के प्रति जागरूक किया जा सकता है. जिससे लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने से प्रकृति की रक्षा करने में मदद मिलेगी.
(10) इसी तरह नई पीढ़ी को प्रकृति, पर्यावरण, पानी व पेड़-पौधों का महत्व समझाएं. उनको इसके प्रति संवेदनशील बनायें. पृथ्वी हरी भरी होगी तो पर्यावरण स्वस्थ होगा, पानी की प्रचुरता से जीवन सही अर्थों में समृद्ध व सुखद होगा.

++

पर्यावरण संरक्षण हेतु आवश्यक नहीं कि सिर्फ एक दिन विशेष पर ही जागरूक हुआ जाये. रोज ही छोटे-छोटे कदमों से, सामान्य से उपायों के द्वारा पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है.  आइये हम सब एकसाथ आगे बढ़ें. 

05 जून 2018

पर्यावरण के लिए संकट है पॉलीथीन


सम्पूर्ण विश्व अनेकानेक संकटों से गुजरने के साथ-साथ पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. सत्यता यह है कि यह संकट मनुष्य द्वारा ही उत्पन्न किया गया है. इन्सान इस संकट के लिए किसी शक्ति, परमात्मा, प्राकृतिक कारकों को दोषी नहीं ठहरा सकता है. पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में खड़ा हुआ है. इसके मूल में तमाम कारण होते हुए भी सबसे प्रमुख है इन्सान का विकास की अंधी दौड़ में लगे रहना. इस दौड़ ने मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों से विमुख कर दिया है. आदिमानव से महामानव बनने की अदम्य लालसा में इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी, उसने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. मनुष्य के उठते लगभग प्रत्येक कदम से आज पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है. इसमें भी सबसे ज्यादा नुकसान उसके द्वारा प्रत्येक छोटे-बड़े कामों के लिए उपयोग में लाई जा रही पॉलीथीन से हो रहा है.


पॉलीथीन से पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान होता समझ भी आ रहा है, दिख भी रहा है. इसमें पाली एथीलीन के होने के कारण उससे बनने वाली एथिलीन गैस पर्यावरण क्षति का बहुत बड़ा स्त्रोत है. पॉलीथीन में पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. इन रसायनों की उपस्थिति के कारण पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक उसको नष्ट करना संभव नहीं होता है. जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है. 

सबकुछ जानते-समझते हुए भी आज बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग किया जा रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.

05 जून 2017

पॉलीथीन का नकार, पर्यावरण का बचाव

वर्तमान विकास के दौर में समाज पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. वास्तविकता यह है कि इस संकट को खुद मनुष्य ने उत्पन्न किया है. इसके लिए किसी शक्ति को, किसी परमात्मा को, किसी प्राकृतिक आपदा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. मनुष्यों के द्वारा उत्पन्न किया गया पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में आया है. विकास की अंधी दौड़ में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत कर दिया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को इस बात की परवाह किये बिना क्षतिग्रस्त किया है कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. स्व-विकास में लिप्त, स्वार्थ में लिप्त इंसान के लिए सोचने का भी समय नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है. दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है.


सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चारों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.

विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.


इसमें भी हम देखते हैं कि सर्वाधिक नुकसान पॉलीथीन से होता समझ आ रहा है, दिख भी रहा है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें पाली एथीलीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है. इसमें पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक, उसमें पाये जाने वाले इन रसायनों को नष्ट करना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि प्लास्टिक या पॉलीथीन को जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है.

ये जानते-समझते हुए भी बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग हो रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.


वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में मनुष्य को ही समाधानात्मक कदम उठाने होंगे. इससे भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न हो पर बहुत हद तक इससे निपटने में सहायता मिल जाएगी.