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25 फ़रवरी 2026

इंडिकेटर की समस्या

वैसे तो हमारा बहुत सारा समय यात्राओं में निकलता है किन्तु पिछले पाँच-छह महीने से यात्राएँ कुछ ज्यादा ही हो रही हैं. इससे पहले भी और अभी भी रात की यात्रा में सबसे बड़ी जो समस्या देखने को मिली वो इंडिकेटर वाली. देखने में आया कि रात के समय अधिकतर वाहन दूसरे वाहन को पास देने के लिए उसी इंडिकेटर (पीली लाइट) का इस्तेमाल करते हैं, जिसके माध्यम से रास्ता माँगा जाता है. इसके चक्कर में कई बार संशय की स्थिति उत्पन्न होने से दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है.

ऐसी स्थिति को लेकर पिछले दो-तीन साल में मंत्रालय को कई बार पत्र लिखे गए किन्तु इस बारे में कोई सुधार नहीं हुआ. हमारा सुझाव ये है कि गाड़ियों में एक हरे रंग की लाइट और लगनी चाहिए, इसका उपयोग उस समय किया जाये जबकि पीछे से आने वाले वाहन को रास्ता देना हो. पीले रंग के इंडिकेटर का उपयोग रास्ता माँगने के लिए, मुड़ने के लिए ही किया जाये तो सही रहेगा.


26 मार्च 2025

पुरानी उरई को खोजते दो अफलातून

कई वर्षों के बाद संदीप का उरई आना हुआ. प्रयागराज से सरप्राइज यात्रा के साथ रात को लगभग नौ बजे उसका उरई आना हुआ. घर पहुँचकर सामान्य हाल-चाल का आदान-प्रदान होने के बाद, चाय-जलपान के बाद दस बजे करीब स्कूटर उठाकर अपने समय की उरई को खोजने निकला गया. दोनों मित्र रात को बहुत देर तक उरई की सड़कों-गलियों में स्कूटर को दौड़ाते हुए पुराने दिनों में घूमते रहे, बीती बातें याद करते रहे. अबकी चमकती, रौशनी से जगमगाती, सीसी रोड पर दौड़ती उरई में वो बात नजर नहीं आती जो हमारे समय की उस उरई में थी. 


बहरहाल, नवीनता का स्वागत करते हुए, विगत को याद करते हुए बजाय तमाम सारी फोटोग्राफी करने के हम दोनों मित्र घूमते-बतियाते-ठहाके लगाते उरई के रंग में रँगे रहे.




27 अक्टूबर 2024

19 अगस्त 2024

युद्ध-काल में मोदी की यूक्रेन यात्रा

रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते हुए दो वर्ष से अधिक का समय हो चुका है मगर अभी भी इस युद्ध की अंतिम परिणति दिखाई नहीं दे रही है. दोनों देशों में जिसे जब अवसर मिलता है, वह जबरदस्त हमला करके दूसरे देश को क्षति पहुँचा देता है. युद्ध के चलते रहने की ऐसी स्थिति के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा यूक्रेन का दौरा करना वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है. इसी माह की 23 तारीख को नरेन्द्र मोदी अपनी पोलैंड यात्रा के तुरंत बाद यूक्रेन दौरा करेंगे. भारत और यूक्रेन के बीच तीस वर्ष पूर्व, 1992 में राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने के बाद पहली बार है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यूक्रेन की यात्रा की जा रही है. अपनी इसी महत्ता के साथ-साथ रूस-यूक्रेन युद्ध तेज होने के बीच भारतीय प्रधानमंत्री का यूक्रेन दौरा महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है.

 

ऐसा नहीं है कि रूस-यूक्रेन युद्ध-काल में मोदी और जेलेंस्की की यह पहली मुलाकात है. इससे पहले भी इन दोनों नेताओं की तीन बार मुलाकात हो चुकी है. यूक्रेन दौरे पर नरेन्द्र मोदी और जेलेंस्की की होने वाली मुलाकात उनकी चौथी मुलाकात होगी. पहली बार इन दोनों नेताओं की मुलाकात 2021 में ग्लासगो में हुई थी. इसके बाद मई 2023 को जी7 शिखर सम्मलेन के दौरान दोनों नेताओं का हिरोशिमा में मिलना हुआ था. तीसरी मुलाकात जून 2024 को इटली में हुए जी7 शिखर सम्मलेन में हुई थी, यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा की थी. इस चौथी को इस कारण से और भी महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इन दोनों नेताओं के मध्य यह पहली आधिकारिक मुलाकात होगी. इससे पहले दोनों नेताओं की मुलाकात किसी दूसरे देश में किसी अन्य मंच पर ही होती रही है. प्रधानमंत्री मोदी इस बार जेलेंस्की के आमंत्रण पर यूक्रेन जा रहे हैं. 

 



प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध के समय में अभी हाल ही में रूस की यात्रा की गई थी. युद्ध-काल में रूस की अपनी पहली यात्रा में रूसी राष्ट्रपति पुतिन और नरेन्द्र मोदी का गले मिलना पश्चिमी मीडिया के गले नहीं उतरा था. मीडिया के द्वारा इसकी आलोचना करने के साथ-साथ स्वयं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की द्वारा भी इस पर आपत्ति की गई थी. इस पर उन्होंने कहा था कि आज रूस के मिसाइल हमले में 37 लोग मारे गए, इसमें तीन बच्चे भी शामिल थे. रूस ने यूक्रेन में बच्चों के सबसे बड़े अस्पताल पर हमला किया. एक ऐसे दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का दुनिया के सबसे ख़ूनी अपराधी से मॉस्को में गले लगाना शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए बड़ी निराशा की बात है. ऐसे में जहाँ मोदी की रूस यात्रा के दौरान जेलेंस्की को आपत्ति हुई थी, माना जा रहा है कि मोदी की यूक्रेन यात्रा से रूस को आपत्ति, असहजता हो सकती है.

 

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि भारत के रूस और यूक्रेन से अपने-अपने स्तर से अलग-अलग सम्बन्ध हैं. जहाँ तक रूस-यूक्रेन के इस युद्ध का सवाल है तो भारत द्वारा कूटनीतिज्ञ भूमिका अपनाते हुए लगातार यही प्रयास किया गया है कि यह युद्ध समाप्त हो. उसके द्वारा किसी एक देश का न तो समर्थन किया गया है और न ही विरोध. भारत के रूस और यूक्रेन दोनों से मजबूत और स्वतंत्र सम्बन्ध होने का ही परिणाम है कि भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की न तो निंदा की और न ही संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया. इसी तरह से भारत द्वारा युद्ध-काल में यूक्रेन को लगातार मानवीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती रही है. यूक्रेन और रूस के साथ भारत के राजनयिक सम्बन्ध होने के साथ-साथ व्यापारिक सम्बन्ध भी बने हुए हैं, जो इस युद्ध के दौरान भी लगातार स्थापित रहे. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-22 में 386 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया. इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य कृषि उत्पाद, धातुकर्म उत्पाद, प्लास्टिक, पॉलिमर, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, रसायन, खाद्य उत्पाद आदि का आयात-निर्यात पूर्व की भांति होता रहा.

 

मोदी और जेलेंस्की की यह मुलाकात कृषि, बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, रक्षा आदि सहित अनेक बिन्दुओं पर केन्द्रित रहेगी. इसके अलावा इस मुलाकात से रूस-यूक्रेन युद्ध के सन्दर्भ में कोई सकारात्मक बिन्दु सामने आने की अपेक्षा की जा रही है क्योंकि भारत हमेशा से युद्ध के बजाय आपसी बातचीत के द्वारा रूस और यूक्रेन के मध्य विवाद के समाधान तक पहुँचने की बात करता रहा है.स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है. युद्ध के मैदान में समाधान नहीं ढूंढे जा सकते. युद्ध और वैश्विक अराजकता के इस दौर में पिछले महीने भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के बाद अब यूक्रेन की यात्रा से सकारात्मक सन्दर्भ तलाशने की आवश्यकता है.  

 


08 जुलाई 2024

नरेन्द्र मोदी की रूस यात्रा के निहितार्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर रूस पहुँचे. यहाँ वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. तीसरे कार्यकाल की उनकी यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. ऐसे समय में जबकि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है; रूस-यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से बेनतीजा चल रहा है; रूस और चीन के बीच सम्बन्ध दोस्ताना दिख रहे हैं, यह यात्रा महत्त्वपूर्ण हो जाती है. यह यात्रा उनकी पिछली परम्परा से हटकर है, इसलिए भी उनकी इस यात्रा को अलग नजरिये से देखा जा रहा है. नरेन्द्र मोदी ने पूर्व के दोनों कार्यकालों में पहली द्विपक्षीय यात्रा में पडोसी देशों को महत्त्व दिया था. पहले और दूसरे कार्यकाल में उनकी यात्रा क्रमशः भूटान और मालदीव की हुई थी. ऐसे में इस बार उनका पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए रूस जाना कूटनीतिक, व्यापारिक, सामरिक केन्द्र में है.

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भी मोदी की रूस यात्रा महत्त्वपूर्ण है. मोदी ने वर्ष 2022 में उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में पुतिन संग द्विपक्षीय वार्ता के दौरान यूक्रेन से युद्ध समाप्त करने को कहा था. पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के साथ मोदी ने कई बार टेलीफोन पर बातचीत करते हुए युद्ध समाप्ति हेतु कूटनीतिक दबाव बनाना जारी रखा है. चूँकि इस बार भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के कजाकिस्तान शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुआ. रक्षा मामलों के विशेषज्ञों की राय है कि भारत इस उम्मीद के साथ एससीओ में शामिल हुआ था कि उसका प्रभाव मध्य एशिया में बढ़ेगा किन्तु इसमें चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण ऐसा नहीं हो सका. इसके अलावा पाकिस्तान भी अब एससीओ का सदस्य है. ऐसे में चीन के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप के कारण भारत को अपनी स्थिति महत्त्वपूर्ण न लगी होगी. विशेष बात ये है कि रूस और चीन इस संगठन के सदस्य हैं. ऐसे में इस रूस यात्रा में सम्भव है कि मोदी द्वारा चीन के बढ़ते प्रभावों का मुद्दा भी उठाया जाये.

 



रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद मित्र, सहयोगी है. रूस के द्वारा अनेक मुश्किल पलों में भारत का साथ दिया गया. आज भी भारत के साथ उसके गहरे व्यापारिक सम्बन्ध हैं. दोनों देशों में लम्बे समय से रणनीतिक साझेदारी के अन्तर्गत रक्षा, अंतरिक्ष और आर्थिक समझौतों पर सहमति है. भारत द्वारा भी रूस के साथ अपनी मित्रता और भरोसे को बनाये रखा गया है. रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत-रूस का आयात-निर्यात सम्बन्ध बना हुआ है. भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में फार्मास्यूटिकल्स, कार्बनिक रसायन, विद्युत मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, लोहा और इस्पात शामिल हैं जबकि रूस से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, खनिज संसाधन, कीमती पत्थर और धातु, वनस्पति तेल आदि शामिल हैं. व्यापारिक संबंधों की महत्ता को वाणिज्य विभाग के आँकड़ों से समझा जा सकता है. उसके अनुसार वित्त वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार 65.70 बिलियन डॉलर में भारत का निर्यात 4.26 बिलियन डॉलर और आयात 61.44 बिलियन डॉलर रहा जो अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है.

 

व्यापारिक महत्त्व के रूप में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) भी प्रमुख है. भारत और रूस दोनों के लिए यह सम्पर्क मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह गलियारा माल ढुलाई के लिए जहाज, रेल और सड़क मार्गों का 7200 किमी लंबा मल्टी-मोड नेटवर्क है. भारत, ईरान और रूस ने इससे सम्बंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ताकि ईरान और सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ने वाला सबसे छोटा परिवहन मार्ग प्रदान करने के लिए एक गलियारा बनाया जा सके. हाल ही में रूस ने पहली बार इसके द्वारा भारत को कोयला ले जाने वाली दो ट्रेनें भेजी हैं. यद्यपि यह मार्ग अभी पूर्ण रूप से शुरू नहीं हुआ है तथापि जब यह मार्ग पूरी तरह चालू हो जाएगा तो भारत और रूस के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

 

पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का उद्देश्य रूस को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अकेला करना था मगर भारत ने रूस का साथ देते हुए कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस के साथ किये जा रहे सौतेले व्यवहार के पक्ष में भारत नहीं है. ऐसे में भारत ने रूस के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के साथ-साथ सामरिक सम्बन्धों को भी बनाये रखा. सामरिक महत्त्व में भारत द्वारा रूस से एस-400 मिसाइलों की खरीदारी महत्त्वपूर्ण विषय है. टी-90 टैंक, एसयू 30, एके 203 राइफलें भी भारत में ही संयुक्त उत्पादन में निर्मित हो रही हैं. इस तरह के रक्षा सम्बन्धों के साथ-साथ सहयोगात्मक विदेश नीति के कारण भारत-रूस सम्बन्धों का वैश्विक दृष्टि से व्यापक प्रभाव है.

 

विगत कुछ समय से वैश्विक स्तर पर युद्ध की स्थितियाँ चारों तरफ बनती दिखाई देने लगी हैं. बहुसंख्यक देशों के बीच तनाव भी नजर आ रहा है. ऐसे में वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका, चीन, पश्चिमी देशों की अनावश्यक अराजकता, आक्रामकता, विस्तारवाद जैसी स्थितियों से बचाने के लिए शक्ति संतुलन की आवश्यकता है. नरेन्द्र मोदी सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाते हुए भारतीय सम्बन्धों को पश्चिमी देशों, यूरोपीय देशों सहित अमेरिका के साथ संतुलन बनाये रखने हेतु लगातार प्रयासरत हैं. निश्चित ही रूस की इस यात्रा से भारत के साथ-साथ सकल विश्व को भी सकारात्मक सन्देश प्राप्त होगा.


23 अक्टूबर 2023

एकेडमिक सह घुमक्कड़ी में आप भी हमारे साथ सैर करिए

एकेडमिक सह घुमक्कड़ी में आप भी हमारे साथ प्रतिदिन सैर पर निकलिए. जिस दिन घूमने का मन करे, उसी दिन की फोटो पर क्लिक करके हमारे साथ हो लीजिये. 


पहला दिन : अकादमिक सह घुमक्कड़ी यात्रा का आरम्भ - 06.10.2023


दूसरा दिन : शोध-पत्रों की प्रस्तुति पश्चात् बाघ का इंतजार - 07.102023


तीसरा दिन : बिर्थी फॉल से बहकर पंचाचूली पर्वत श्रेणियों पर - 08.10.2023


चौथा दिन : पांडव-पांचाली से सुनहली मुलाकात - 09.10.2023


पाँचवाँ दिन : नदियों सी रवानी, पहाड़ों सी जीवटता के साथ हँसता-खिलखिलाता सफ़र - 10.10.2023






 

20 अक्टूबर 2023

नदियों सी रवानी, पहाड़ों सी जीवटता के साथ हँसता-खिलखिलाता सफ़र

पिथौरागढ़ की आखिरी सुबह, वहाँ के होटल की आखिरी चाय का स्वाद लेकर हल्द्वानी के लिए चल दिए. रात की ट्रेन होने के कारण योजना ये थी कि जागेश्वर धाम होते हुए कैंचीताल, भीमताल को भी निहार लिया जायेगा. देशकाल, परिस्थिति का ध्यान रखते हुए वापसी यात्रा की तैयारी की गई. अभी तक की यात्रा जितनी सहज, सुखद रही थी वापसी का ये एक दिन आशंकित कर रहा था. कैंचीताल, भीमताल की यात्रा पर आशंका छाई थी वहाँ लगने वाले जाम के कारण. जागेश्वर धाम को लेकर ड्राईवर ने बताया कि नीचे तक निजी वाहनों को नहीं जाने दिया जाता है. एक निश्चित स्थान के बाद वहाँ की समिति की गाड़ियों द्वारा जाया जा सकता है. ये बात अभी तक तो सशंकित नहीं किये थी मगर जब जानकारी हुई कि अगले दिन वहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आना है तो लगा कि कहीं नीचे तक जाने ही न दिया जाये. बहरहाल, यात्रा को बिना किसी शंका के शुरू किया गया, उसी उत्साह-उमंग-हंगामे और हँसी-मजाक के साथ जैसे कि अभी तक सारी यात्रा रही. 



हल्द्वानी से पिथौरागढ़ आते समय टनकपुर वाला रास्ता पकड़ा था, वापसी अल्मोड़ा वाले रास्ते से की जा रही थी. इस रास्ते मिलने वाले पहाड़ों में कुछ अंतर समझ आया. अभी तक की यात्रा में मिलने वाले पहाड़ों पर अधिकतम में जलप्रवाह खूब मिला. इस रास्ते मिलने वाले पहाड़ हरियाली मिलने के बावजूद पानी से भीगे नहीं मिले. एक जगह पर पहाड़ लगभग सड़क पर ही रखा हुआ समझ आया. ड्राईवर ने बताया कि ये अभी पिछले महीने खिसक कर यहाँ सड़क पर आ गया है. गहरी खाई, लगातार साथ बहती सरजू नदी के चलते रास्ता सौन्दर्य से भरा मगर जोखिम वाला बना हुआ था. रास्ते भर चीड़, देवदार कतारबद्ध खड़े होकर विदाई देते नजर आये. पिछले कई दिन के सुहाने सफ़र को दिल-दिमाग में कैद किये वर्तमान अकादमिक सह घुमक्कड़ी सफ़र के अंतिम दिन वहाँ बिखरे प्राकृतिक सौन्दर्य को आँखों के सहारे, कैमरे के सहारे कैद किये जा रहे थे. रास्ते में दो-तीन जगह चाय-नाश्ते के लिए रुका गया तो भी फोटोग्राफी बंद नहीं हुई.



खिसक कर सड़क पर उतर आया पहाड़ 

रास्ते में सरजू नदी और रामगंगा नदी के संगम पर पड़ने वाले रामेश्वर मंदिर को देखा सड़क किनारे से देखा गया. कहा जाता है कि इसी स्थान पर शिव पूजन करने के बाद भगवान श्रीराम ने अपनी नर लीला को विराम दिया था. ड्राईवर ने बताया कि दक्षिण के रामेश्वरम जैसी ही इसकी मान्यता है. इसी तरह से सड़क किनारे खड़े होकर रास्ते में पड़ने वाले डोल आश्रम को भी देखा गया. अल्मोड़ा जिले में घने जंगलों के बीच योग और ध्यान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है. समयाभाव के कारण दोनों स्थलों को दूर सड़क से निहारने के साथ आगे बढ़ चले. समय अपनी गति से भाग रहा था और हमारी कार अपनी नियंत्रित गति से हल्द्वानी के लिए चली जा रही थी. रास्ते भर पहाड़, बादल, चीड़, देवदार विदाई समारोह सा करते रहे, मिलते रहे.


डोल आश्रम (अल्मोड़ा)

पहाड़ों की शांत यात्रा के बाद अचानक से भीड़ नजर आने लगी. सड़क पर ट्रैफिक भी कुछ अधिक हो गया. वाहनों की, लोगों की गति में भी परिवर्तन सा दिखाई दिया. पहाड़ों की ढलान भी कम से कमतर होते हुए कुछ समतल सी लगने लगी. कई दिन से झरनों की शक्ल में बहता पानी यहाँ झील का स्थिर रूप धारण किये था. योजना में होने के बाद भी नैनीताल की यात्रा भले न हो पाई हो मगर नैनीताल जनपद की यात्रा अवश्य कर ली थी. सड़क के बाँए तरफ स्थिर सी, शांत झील के किनारे गाड़ी रुकवाकर झील किनारे बनी सीढ़ियों पर हम तीनों लोग विराजमान हो गए. संध्याकाल में सुनहली धूप की रंगत में भीमताल की झील सुहानी लग रही थी. नावें किनारे पर लगी हुई थीं मगर उनकी यात्रा करने वाले नदारद थे. पूरी झील में दो-तीन नावें ही इधर से उधर डोल रही थीं. पंछियों, मछलियों, जल-तरंगों के साथ कुछ समय बिताने के बाद खुद को तरोताजा महसूस किया और फिर हल्द्वानी के लिए चल दिए. पर्याप्त समय के अंतर पर हम लोग हल्द्वानी रेलवे स्टेशन पर खड़े थे. सुखद यात्रा के इन पलों में ड्राईवर का सहज स्वभाव का होना भी सोने पर सुहागा रहा. हम लोगों का सामान प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचाने के समय वह भी भावुक हो उठा. फिर मिलने का आश्वासन लेने-देने के साथ ही हम लोग प्लेटफ़ॉर्म पर सुकून से बैठने की जगह तलाशने लगे.



भीमताल झील (नैनीताल)


बहुत ही आराम से, बिना किसी परेशानी के संपन्न इस यात्रा में इस अंतिम दिन जागेश्वर धाम मंदिर की यात्रा सबसे मजेदार और आश्चर्यजनक रही. मजेदार इसलिए क्योंकि जैसा कि शुरू में ही आपको बताया कि ड्राईवर सशंकित था कि मोदी जी के आने के चलते हम लोगों को नीचे जाने को भी मिलेगा या नहीं? जागेश्वर धाम के लिए जाने वाले रास्ते पर गाड़ी मुड़ते ही जगह-जगह पुलिस वाले, सुरक्षाकर्मी नजर आने लगे. जगह-जगह बैरिकेडिंग के साथ सभी मुस्तैदी से अपने-अपने काम में लगे हुए थे. ड्राईवर ने दो-तीन जगह पुलिस वालों को, सुरक्षाकर्मियों को देखकर कार रोकने की कोशिश की तो उससे कहा कि वह कार अपनी निश्चित स्पीड पर चलाता रहे. जब तक रोका न जाये कहीं भी न गाड़ी धीमी करे और न ही किनारे लगाते हुए रोके. चूँकि ड्राईवर वहाँ आता रहता था, इसलिए उसे जानकारी थी कि समिति के लोग कार नीचे नहीं जाने देंगे. एक-दो जगह उसने बेरिकेंडिंग देखकर कार को किनारे रोकने की कोशिश भी की मगर उसको थोड़ा तेज आवाज़ में बोलकर गाड़ी न धीमे करने, न रोकने को कहा तो वह फिर गाड़ी को आराम से चलाता रहा.


जैसे-जैसे हम लोग मंदिर के नजदीक बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे वहाँ के इंतजाम, वहाँ की व्यवस्था चाक-चौबंद दिखाई दे रही थी. सुरक्षाकर्मियों की संख्या, उनकी मुस्तैदी, अस्त्र-शस्त्र, सुरक्षा यंत्र, तामझाम भी बढ़ता नजर आ रहा था. सड़क किनारे गाड़ियों की कतार लगी हुई थी. प्रशासन की, स्थानीय नेताओं की कारें कतारबद्ध सड़क के दोनों तरफ का सौन्दर्य बढ़ा रही थीं. जगह-जगह लगी बेरिकेडिंग पर खड़े सुरक्षाकर्मियों की नजर कार की तरफ उठती और फिर वे अपने काम में लग जाते. मन में कई बार आया कि हमारी कार न तो समिति वालों के द्वारा रोकी गई और न ही किसी पुलिस वाले द्वारा, आखिर ऐसा क्या? एकबारगी लगा कि आखिर यहाँ की पुलिस किसी समय उत्तर प्रदेश वाली ही पुलिस थी, ये अचानक से ऐसा हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? बहरहाल, इसी सब सोचा-विचारी में और इस स्थिति को स्वीकार्यता देने की तैयारी के साथ कि हमारी कार कहीं भी, कभी भी रोकी जा सकती है हम लोग मंदिर के मुख्यद्वार के सामने आ गए. आश्चर्य के साथ हम तीनों लोगों ने एक-दूसरे को निहारा, ड्राईवर ने भी आश्चर्य से हमारी तरफ देखा. बिना कुछ सोचे-समझे तुरत-फुरत में हम लोग कार से उतरे और ड्राईवर को कार को पार्किंग में लगाने के लिए आगे बढ़ गया.



जागेश्वर धाम मंदिर (अल्मोड़ा)

मंदिर की सीढ़ियों से लेकर अन्दर समूचे परिसर में इक्का-दुक्का नागरिकों के अलावा सुरक्षाकर्मी ही सुरक्षाकर्मी दिखाई दे रहे थे. इसके अलावा वहाँ की व्यवस्था बनाते हुए कारीगर, मजदूर. सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आने पर हमारे लिए आगे जा पाना संभव नहीं था क्योंकि जूते वहीं उतारने पड़ते. हमने अपना कैमरा सँभाला, रेड कार्पेट बिछाने में सुस्ती दिखाने वाले के हालचाल लिए, एक-दो सुरक्षाकर्मियों से हलकी-फुलकी जानकारी ली और हमारे दोनों साथी मंदिर दर्शन के साथ-साथ पूजन सामग्री सहित मंदिर प्रांगण में उतर गए. यथास्थिति पूजन के बाद वापस आने पर हम लोग जब कार में बैठ कर चल दिए तो आपस में इसी बात पर खूब हँसी-मजाक हुआ कि हम लोगों की कार मंदिर के मुख्य द्वार तक न रोकी गई.




बहरहाल, इसी तरह से हँसते-गाते-मौज-मजाक के साथ हल्द्वानी के रेलवे स्टेशन पर समय गुजारने के बाद ट्रेन के सहारे वापस लखनऊ उतरे. जहाँ से घर का चाय-नाश्ता करने के बाद, अपने पुराने साथी दुर्गेश जी से मुलाकात के बाद अरुण की उसी कार से वापस उरई आ गए, जिस कार से लखनऊ पहुँचे थे. अकादमिक यात्रा के साथ बनी इस पर्यटन यात्रा से बहुत कुछ नया देखने-सीखने को मिला. नए लोग मिले, पुराने लोगों से पहचान का नवीनीकरण हुआ. ऐसी सुखद, दोस्ताना यात्राएँ भविष्य में भी होती रहेंगी, सभी से मुलाकातें होती रहेंगी, ऐसी अपेक्षा है.  



पिथौरागढ़ की प्रसिद्ध बॉल मिठाई के साथ पहाड़ों, नदियों से फिर मिलने के वादे सहित विदा 


(इतिश्री)






 

14 अक्टूबर 2023

पांडव-पांचाली से सुनहली मुलाकात

होम स्टे वाले ने घर का बनाया बेहतरीन भोजन पूरे मन से करवाया. एक बात पूरी यात्रा में विशेष ये देखने को मिली कि यहाँ लोगों ने बहुत मन से आवभगत की. होटल वाले, ढाबे वाले चाय-नाश्ता भी ऐसे करवाते जैसे उनके यहाँ मेहमान बनकर आये हों. बारिश रात के नौ बजने पर भी हो रही थी. जिस तरह से वहाँ के मौसम के बारे में बताया गया था, उसके चलते शंका हुई कि सुबह पंचाचूली पर्वत श्रृंखला दिखाई भी देगी या नहीं? होम स्टे वाले ने बताया कि सुबह साढ़े पाँच-छह बजे तक उठ जायेंगे तो बहुत आराम से पंचाचूली के दर्शन हो जायेंगे. जो ठंडक हमारे लिए गुलाबी-गुलाबी सी बनी हुई थी उसी ने हमारे दोनों दोस्तों के लिए कड़ाके वाली ठंडक का एहसास बना रखा था. होम स्टे के कमरे की खिड़की से पंचाचूली पर्वत श्रेणी अभी निपट काली सी नजर आ रही थी. उसे बर्फ में लिपटी देखने की लालसा लिए नींद का रास्ता देखने लगे. 


पंचाचूली पर्वत श्रेणियाँ 

जैसा कि हमारे साथ बहुत लम्बे समय से हो रहा है, रात भर नींद का आना-जाना बना रहा. आँख खुलने पर एक निगाह खिड़की से सामने वाली पर्वतमाला पर डाल लेते और माहौल ज्यों का त्यों बना देखकर वापस नींद की राह ताकने लगते. कैमरा, मोबाइल भी एकदम तत्परता से मुस्तैद थे. उनको आदेशित कर रखा गया था कि किसी भी रूप में चूकना नहीं है. इससे पहले कि बादल पंचाचूली को अपने आगोश में लें, उसकी बहुत सारी फोटो और वीडियो निकाल लेना है. सुबह धुंधलके जैसी स्थिति में पंचाचूली नजर आने लगी. कहा जाता है कि पांडवों ने द्रोपदी सहित यहीं से स्वर्ग के लिए चलना शुरू किया था. वे लोग जब चले होंगे यहाँ से तब चले होंगे, हम लोगों ने अपने-अपने कैमरे, मोबाइल चलाने शुरू कर दिए.






समय के साथ-साथ रौशनी भी बढ़ती जा रही थी. सबसे बड़े पर्वत, जिसे युधिष्ठिर माना जाता है के सिर पर सुनहला मुकुट जैसा भी कुछ पल के लिए दिखाई देने लगा. उसके साथ-साथ बाकी पर्वत श्रेणियाँ भी सुनहले रंग की चादर ओढ़ती नजर आईं. ऊपर से सूरज की रौशनी में पंचाचूली का चमकना होता जा रहा था, नीचे से बादल उसे अपने आगोश में लेने के लिए ऊपर आते जा रहे थे. दो-दो, चार-चार मिनट में ऐसा लगता जैसे उसके रूप में परिवर्तन हो रहा है. इधर चाय के स्वाद ने सामने रजत पर्वत श्रृंखला को देखने का मजा और बढ़ा दिया. दो-तीन घंटे अपने कमरे के सामने बने टैरेस पर, ऊपर छत पर कब, कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला. जब नीचे से ऊपर को चले आते बादलों ने पंचाचूली को पूरी तरह से अपने रंग में रंग लिया तो हम तीनों लोग भी अपने-अपने कमरों में आकर आगे की यात्रा की तैयारी में लग गए.


आगे की यात्रा वहीं स्थानीय बाजार, कुछ जगहें, नंदा देवी मंदिर आदि घूमने के बाद वापस पिथौरागढ़ के लिए करनी थी. इसी बीच दो-तीन बार चाय के मजेदार स्वाद के साथ नाश्ता भी आ गया. हँसी-मजाक के बीच जिस भाँग की चटनी की चर्चा पिथौरागढ़ में सेमीनार हॉल में हुई थी, वो चटनी यहाँ मुनस्यारी में नाश्ते की थाली में आलू के गरमागरम पराठे के साथ सजी दिख रही थी. होम स्टे वाले लड़के ने और हमारे ड्राईवर ने बताया कि इसे खाने से नशा नहीं होता है मगर अनजान जगह होने के कारण और सफ़र करने के कारण भाँग की चटनी का स्वाद नहीं लिया. हाँ, हल्की सी चख ली गई तो कुछ दानेदार जैसी समझ आई.


कमरे से निकल कर कार के साथ हम तीनों लोग अब सड़क पर थे. नंदा देवी मंदिर के परिसर से मुनस्यारी से दस-बारह किमी दूर स्थित खलिया टॉप दिखाई पड़ता है, ऐसा कुछ बताया गया मगर शायद तेज धूप होने के कारण आसपास बस बादल ही बादल दिखाई पड़ते रहे. नंदा देवी मंदिर के विशाल घासयुक्त मैदान में फोटो खींचने की तो अनुमति थी मगर ड्रोन से फोटोग्राफी करना प्रतिबंधित था. ऐसा क्यों है वहाँ, किसी से पूछा नहीं, सो बता नहीं सकते. इसी परिसर में बहुत सी झाड़ी लगी थीं, बहुत छोटे-छोटे लाल फल से लदी हुईं. फलों को तोड़कर देखा तो हलके गूदेदार समझ आये मगर अपरिचित फल होने के कारण उनको खाने की कोशिश भी नहीं की. हालाँकि अरुण ने कई बार प्रयास किया कि उस फल को अपने मुँह के हवाले कर ले मगर बाकी हम दोनों के मुखारविंद से निकलती तेज-तेज आवाजों ने उसका प्रयास सफल नहीं होने दिया. जब मंदिर के लगभग बाहर आने को हुए तो दो-तीन लोगों को उसी फल को झाड़ियों से तोड़-तोड़ कर खाते देखा. ये देखकर अरुण की हिम्मत बढ़ी और उसने भी लपक कर कई सारे फल चबा लिए. उन्हीं दोनों स्थानीय लोगों ने बताया कि ये पहाड़ी सेब है, स्थानीय भाषा में घिंघारू कहते हैं. कार में बैठे-बैठते कुछ का स्वाद लिया तो बेर की तरह, सेब की तरह का मिला-जुला स्वाद समझ आया.



घिंघारू या पहाड़ी सेब 

पिथौरागढ़ की तरफ लौटने की योजना दूसरी तरफ के रास्ते से थी मगर स्थानीय लोगों ने बताया कि उस सड़क पर लगातार काम चलने के कारण रास्ता ख़राब है. कार फँसने की आशंका है. ऐसे में जिस रास्ते मुनस्यारी आना हुआ था, उसी रास्ते वापस जाने का मन बना लिया. हाँ, मुनस्यारी में बाजार के और वहाँ स्थित जनजातीय विरासत संग्रहालय के नज़ारे भी ले आये. संग्रहालय के केयर टेकर जरूर घनघोर खुड़खुड़िया मिले. पता नहीं उस दिन वो अपने घर से लड़-झगड़ कर आये थे या उनका स्वभाव ही ऐसा था. बहरहाल, हम लोगों ने अपने खिलंदड़ स्वभाव के साथ ही उस छोटे से सांस्कृतिक निजी संग्रहालय को देखा. यह संग्रहालय भोटिया लोगों के इतिहास, संस्कृति और जीवनशैली के बारे में जानकारी देता है. ऊँची, खड़ी पहाड़ी पर बने इस संग्रहालय तक पहुँचने और वापस आने में दिमाग ठिकाने लग गए, महज सौ, डेढ़ सौ मीटर का रास्ता अन्तरिक्ष तक पहुँचने का रास्ता लग रहा था.








जिस रास्ते जाना हुआ था, उसी रास्ते से भले आना हुआ मगर नया सा अनुभव दे रहा था. लौटते में बिर्थी फॉल में ठहर कर आवभगत से भरपूर चाय-नाश्ता का स्वाद लिया गया. जगह-जगह बादलों, बारिश से परिचय करते हुए अंततः पिथौरागढ़ में होटल की शरण में आ गए. पिथौरागढ़ की अंतिम शाम को वहाँ का बाजार घूमने का मन बनाया मगर स्थानीय वाहन सुविधा न होने के चलते मन को वापस होटल के टैरेस की तरफ मोड़ लिया. अगली सुबह हल्द्वानी के लिए निकलना था. रास्ते में जागेश्वर धाम सहित रास्ते के कुछ दर्शनीय स्थलों को भी कैमरे में कैद करना था. पिछले कुछ दिनों की यात्रा के अनुभव, अगले दिन की प्लानिंग के साथ रात को गहराने दिया, नींद को आँखों तक आने दिया. 


(क्रमशः)






 

11 अक्टूबर 2023

बिर्थी फॉल से बहकर पंचाचूली पर्वत श्रेणियों पर

चाय की चुस्की के बीच में चंडाक से चमकते पिथौरागढ़ की, बाघ न दिखाई पड़ने की बातें होती रहीं, काल्पनिक किस्से गढ़ते हुए हँसी-ठहाके लगते रहे. जल्दी सोने की और सुबह जल्दी उठने की मजबूरी के बीच बिस्तर पर जाने का मन नहीं हो रहा था. आखिर गप्पबाजी का अपना ही अलग स्वाद होता है, जिसे हम मित्र भरपूर तरीके से ले रहे थे. जल्दी सोने-जागने की मजबूरी ये थी कि सुबह-सुबह मुनस्यारी के लिए कार दौड़ाना थी. असल में शालीन, स्वस्थ हास-परिहास के साथ पहले दिन का जब समापन हुआ तो हँसी-मजाक के दौर में भाँग की चटनी से शाब्दिक परिचय हुआ. रात को खाने में इसे बनवाए जाने का मौखिक आदेश भी पारित हुआ. हँसते-गुनगुनाते आसपास के घूमने-फिरने के स्थानों के बारे में जानकारी की तो बहुसंख्यक लोगों ने पिथौरागढ़ से सवा सौ किमी दूर मुनस्यारी जाने की सलाह दी. मुनस्यारी के आगे सभी पर्यटक स्थलों को लगभग बौना साबित करने की बातों ने अंततः वहीं जाने पर अंतिम मुहर लगा दी. कम दूरी होने के बाद भी बहुत अधिक समय इसलिए लगना था क्योंकि वहाँ का रास्ता अत्यधिक चढ़ाई वाला और खतरनाक मोड़ों से भरा हुआ था. 




नए-पुराने मित्रों संग होती हाहा-हीही को बेमन से विराम देते हुए निद्रादेवी के आगोश में जाने की तैयारी में जुट गए. जागते-सोते बीती रात के जाते-जाते एलार्म ने जागने का निमंत्रण भेजा तो कुछ देर में कार ड्राईवर रवि ने फोन करके अपनी तत्परता का परिचय दिया. जो समय निश्चित किया गया था, उसी समय पर कार मुनस्यारी के रास्ते दौड़ चली. चूँकि जगह हम तीनों मित्रों के लिए एकदम नई और अपरिचित थी. ऐसे में सेमीनार के आयोजक मंडल को इस यात्रा के बारे में जानकारी दे दी थी. पिछले दो दिनों से पूरे स्नेहिल भाव से सेवा-भावना के साथ तत्पर शोधार्थी मनोज इस यात्रा में हम लोगों के साथ ऑनलाइन मोड में जुड़े रहे.


कार को आरामदायक स्थिति में चलाते हुए ड्राईवर रवि हम लोगों के गाइड भी बने रहे. दो-तीन दिनों से हम लोगों के साथ नियमित रूप से बने रहने के कारण वो हमारे फोटोग्राफी के शौक को समझ चुका था. ऐसे में रास्ते में कहीं कोई इस तरह की जगह आने को होती, जहाँ फोटोग्राफी की जा सकती तो वो ‘फोटोग्राफर तैयार हो जाएँ’ को हँसते-मुस्कुराते कहकर कार को सड़क किनारे रोक देता. वैसे तो पूरा रास्ता रोमांच से भरा हुआ था. तीव्र मोड़, ऊँची चढ़ाई, गहरी घाटियाँ आदि एक तरफ अपनी ओर आकर्षित भी करतीं तो भीतर-भीतर सिरहन भी पैदा कर देतीं. कुछ माह पूर्व बरसात के मौसम में हुए भूस्खलन का असर सड़क पर जगह-जगह दिखाई दे रहा था. बादलों, हरियाली, जगह-जगह पहाड़ों से बहते पानी, छोटे-छोटे से झरनेनुमा स्थानों से गुजरते हुए कार एक ढाबे जैसी जगह पर रुकी. कार रुकने के पहले ही फोटोग्राफर को संकेत मिल चुका था और उस स्थान से काफी दूर पहले एक मोड़ से एक झरने को दिखाया भी जा चुका था.


बिर्थी फॉल 

कार से उतरते ही चाय की माँग के साथ कदम अपने आप आसमान से बहते झरने की तरफ बढ़ चले. बिर्थी फॉल के नाम से प्रसिद्ध यह जलप्रपात मुनस्यारी से टीस-चालीस किमी पहले पड़ता है. लगभग चार सौ फुट की ऊँचाई से गिरते पानी की बौछार से कैमरे को बचाते हुए झरने को कैद किया जा रहा था. सड़क किनारे बनी दुकान की छत पर बैठकर न केवल झरने को कैमरे में कैद किया बल्कि चाय की चुस्कियों के साथ हम मित्र भी कैमरे की कैद में आ गए. अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य की गोद से न चाहते हुए भी निकल कर कालामुनि पर्वत के रास्ते होते हुए मुनस्यारी की तरफ चल दिए.






कालामुनि पर्वत के बारे में ड्राईवर ने बताया कि एक ही पहाड़ पर बीस से अधिक घुमाव बने हुए हैं और सभी घुमाव पहाड़ के एक तरफ ही बने हुए हैं. रास्ते में जगह-जगह Hairpin Bends लिखे संकेतक दिल की धड़कन बढ़ा देते. रास्ते भर बादल लुकाछिपी करते रहे और अंत में मुनस्यारी प्रवेश करने के ठीक पहले बरसने ही लगे. मुनस्यारी में रुकने के लिए एक तरफ होटल तो बने ही हैं साथ ही स्थानीय निवासी होम स्टे जैसी सुविधा भी बनाये हुए हैं. ड्राईवर की सलाह पर हम लोगों ने उसके एक परिचित होम स्टे में रात्रि विश्राम का मन बनाया. वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते बारिश अपने पूरे रंग में आ गई. अंतिम रूप से होम स्टे को सहमति देने के पहले कमरों की, जगह की, सम्बंधित व्यक्तियों की स्थिति को जाँचना उचित लगा. बरफ से ढंके जिन पर्वतों का चित्रण, वर्णन पिथौरागढ़ में लोगों ने कर रखा था, वे पर्वत आँखों के ठीक सामने खड़े हुए थे. कमरों की दशा पर एक निगाह डालकर छत पर गरमागरम चाय के साथ बारिश का, सामने खड़े पहाड़ों का रसास्वादन करने लगे.




होम स्टे और भोजन पर अपनी सहमति देने के बाद हम लोग बारिश का आनंद लेने के लिए कार से ही मुनस्यारी के स्थानीय बाजार के लिए निकल लिए. सूर्यास्त की लालिमा के साथ रंग बदलते आसमान, बादल, पर्वतों ने खुलकर हम लोगों का स्वागत किया. वहीं बने एक संग्रहालय में स्थानीय कला, वस्तुओं आदि का नजारा लेते हुए शाम के रात में बदलने के पहले ही हम लोग विश्राम के लिए वापस लौट आये. बारिश अभी भी अपना स्वरूप बनाये हुए थी तो एक डर लगा कि अगली सुबह मुनस्यारी के उस सौन्दर्य के दर्शन हो भी सकेंगे जिसके बारे में लोगों ने बहुत ही ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बता रखा था. फिलहाल तो स्नान-ध्यान करके गरम-गरम चाय के साथ अनथक गप्पों का सिलसिला फिर शुरू हुआ. कमरे की खिड़की से सामने स्थित पंचाचूली की पाँच-पाँच पर्वत-श्रेणियाँ झाँकते हुए हम मित्रों की गपबाजी में शामिल होने को लालायित थीं. 

शाम के समय पंचाचूली पर्वत श्रेणियाँ 



(क्रमशः)