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29 जुलाई 2026

तकनीकी दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता

 

भारतीय संस्कृति में आदिगुरु के रूप में पूजनीय महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व गुरु पूर्णिमा हमारी महान ज्ञान परम्परा के स्मरण का पवित्र अवसर है. भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु-शिष्य परम्परा का गौरवशाली स्थान रहा है. इसी कारण से अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मानवता को विवेक-मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है.

 

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को एक तरह की ऊर्जा के रूप में परिभाषित किया गया है. भारतीय मनीषियों ने इसे जीवन की समग्रता को जानने-समझने की एक प्रक्रिया माना है. इसे ऐसी चेतना बताया है जो गुरु मुख से शिष्य के हृदय की ओर संचरित होती है. गुरु-शिष्य की इस परम्परा में ज्ञान और आचरण में किसी तरह का विभेद स्वीकारा नहीं गया है. कथनी और करनी में विभेद न होने को ही शिक्षा माना गया है. गुरु-शिष्य परम्परा के कारण भारतीय संस्कृति में गुरु का सम्मान सामाजिक शिष्टाचार के रूप में स्वीकार्य नहीं रहा है बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के रूप में स्वीकारा गया है. गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः के रूप में यह बताया गया है कि समस्त शक्तियों का ज्ञान और उनका बोध कराने वाला माध्यम गुरु ही है और ऐसा माध्यम ईश्वर से भी उच्च पद पर है. गुरु ही है जो इंसान के भीतर की कुंठा, अहंकार, अज्ञानता, लालच, विद्वेष आदि को समाप्त करता है. उसके ऐसे परिष्करण से ही किसी भी शिष्य की आंतरिक प्रतिभा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगती है.

 

समय के साथ गुरु-शिष्य परम्परा में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं. इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में देखें तो सम्पूर्ण विश्व तकनीकी विकास, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण आदि के दौर से गुजर रहा है. आज का युग सूचनाओं का युग बन गया है. इंटरनेट, गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि के इस दौर में ज्ञान किसी एक व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है. हर हाथ में डिवाइस ने एक क्लिक पर व्यक्ति के सामने वैश्विक जानकारी का भंडार लगा दिया है. यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है कि हमारे सामने एक क्लिक पर जानकारी आ रही है अथवा ज्ञान? हमें इस तकनीकी रफ़्तार वाले युग में यह भी समझना होगा कि उँगलियों के सहारे स्क्रॉल करती जानकारी हमारे लिए वाकई लाभकारी है अथवा हम अनावश्यक जानकारियों का भंडार-गृह बनते जा रहे हैं? तकनीकी के बदलते दौर में, शिक्षा के बदलते आयामों के युग में लोगों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तकनीकी युग में गुरु की प्रासंगिकता शेष है?

 

इस प्रश्न के उत्तर के पूर्व हम सभी को वर्तमान सन्दर्भों में सूचनाओं का, आँकड़ों का सुलभता से मिलना और उसके उपयोग के बारे में सोचना, विचार करना पड़ेगा. भले ही तकनीकी माध्यमों से सूचनाएँ, आँकड़े, जानकारियाँ कितनी भी सुलभता से क्यों न उपलब्ध हो जाएँ किन्तु वे कभी भी ज्ञान का, बोध का का स्थान नहीं ले सकती हैं. अब जबकि मशीनी तकनीकी से जानकारियाँ तो उपलब्ध हो जा रही हैं मगर उनके उपयोग पर, उनके समायोजन पर, व्यक्ति के समन्वय पर, इंसानी चरित्र पर सवालिया निशान तो लग ही रहे हैं. तीव्र तकनीकी विकास के चलते जिस तरह से आज का युवा उन्मादित होकर भटकता; सोशल मीडिया के भ्रामक मायाजाल में फँसा हुआ; एकाकीपन से भरा हुआ; मानसिक अवसाद से गुजरता हुआ; तनाव से जूझता दिख रहा है तब वास्तविक गुरु की आवश्यकता और अधिक महसूस होने लगी है.

 

आज शिक्षा व्यवस्था को एक व्यावसायिक उत्पाद बना दिया गया है; शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रम पूरा करवाने और डिग्री बाँटने का केन्द्र बना दिया गया है; चरित्र निर्माण, मूल्य-शिक्षा, नैतिकता, समन्वय, भावनात्मकता आदि का लोप होता दिखने लगा है तब समझ आ रहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने केवल सफल व्यक्ति बनाने का प्रयास किया है न कि संवेदनशील मनुष्य बनाने का. ऐसे व्यावसायिक दौर में गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता विक्रेता और क्रेता के रूप में बदलता जा रहा है. कोचिंग संस्थानों, शिक्षा के बाजार ने सम्बन्धों की, रिश्तों की मर्यादा को, गरिमा को नष्ट कर दिया है. इस विकृति के बीच गुरु पूर्णिमा का पर्व मूल जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है. यह पर्व हमें इस बात का भी एहसास कराता है कि भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य को ही गुरु के रूप में नहीं स्वीकारा गया है बल्कि प्रकृति, जीव-जन्तु, घटनाओं आदि को भी गुरु रूप में स्वीकारा गया है.

 

आज के डिजिटल युग में गुरु को वेदों, शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों के ज्ञाता  के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक, परामर्शदाता, जीवन-प्रशिक्षक की भूमिका में देखने की आवश्यकता है. समय बदलने के साथ-साथ गुरु का स्वरूप, उसकी भूमिका में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है. आज भले ही ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य सम्पन्न होने लगा हो किन्तु यह समझना होगा कि तकनीकी प्रगति के बीच भी गुरु-शिष्य के बीच का मानवीय रिश्ता, संवेदना, नैतिक ऊर्जा का संस्कार विलुप्त न हो पाए. एक वास्तविक गुरु केवल विषयों को पढ़ाने का काम नहीं करता है बल्कि वह विद्यार्थियों के मन में उठने वाले संशयों का शमन करता है. अपने शिष्यों को सही और गलत के बीच का भेद समझा कर संकटकाल में नैतिक संबल प्रदान करता है. वर्तमान सन्दर्भों में ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो तकनीकी कौशल के साथ-साथ करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व आदि जैसे मानवीय मूल्य भी सिखाएँ.

 

कह सकते हैं कि गुरु पूर्णिमा का पर्व अतीत की वंदना करने का ही नहीं बल्कि भविष्य के प्रति संकल्पित होने का दिन भी है. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भले ही युग बदल जाए, तकनीक विकसित हो जाए, जीवन की प्राथमिकताएँ बदल जाएँ परंतु मानव जीवन में गुरु की आवश्यकता सदैव रहेगी. व्यक्ति को सही दिशा देने के लिए एक प्रकाशपुंज, मार्गदर्शक, गुरु का होना अनिवार्य है. जब तक समाज में अज्ञान, द्वेष, अहंकार, भटकाव आदि रहेगा तब तक गुरु की प्रासंगिकता भी रहेगी.

07 फ़रवरी 2026

जेन ज़ी की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह

शिक्षक रह चुके न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वाथ ने अपनी रिसर्च के माध्यम से बताया कि जेन ज़ी के रूप में पहचानी जाने वाली पीढ़ी की बुद्धिमत्ता में अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में गिरावट आई है. ऐसा तब हुआ है जबकि ये पीढ़ी पिछली सदी के बच्चों की तुलना में अपना अधिक समय शिक्षण संस्थानों में व्यतीत कर रहे हैं. इस पीढ़ी के आईक्यू को कम बताने पर चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि सामान्य रूप में ऐसा माना जाता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमता वाली होती है. सोशल मीडिया के माध्यम से हमेशा चर्चा में रहने वाली जेन ज़ी पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमत्ता वाला होना प्रथम दृष्टया आश्चर्य में डालता है किन्तु जब डॉ. होर्वाथ के द्वारा बताये गए कारणों पर गौर करते हैं तो ऐसा होना सच भी लगता है. उन्होंने ऐसा होने के पीछे इस पीढ़ी का तकनीक और मशीनों पर अधिक से अधिक निर्भर होना बताया है. जेन ज़ी के द्वारा बहुतायत में 'एजुकेशनल टेक्नोलॉजी' अर्थात पढ़ाई में तकनीक और स्क्रीन्स का उपयोग किया जाता है. इसके चलते एक तरफ उनकी एकाग्रता में कमी आई है वहीं समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी घटी है.

 



किसी रिसर्च के आधार पर जेन ज़ी की क्षमताओं को आँकने के साथ-साथ यदि इनकी जीवन-चर्या, कार्य-शैली आदि का अध्ययन किया जाये तो इनकी क्षमताओं में कमी का अकेला कारण तकनीक अथवा स्क्रीन पर अधिकाधिक समय बिताना ही नहीं है. बचपन से लेकर इनकी युवावस्था तक की समयावधि पर गौर किया जाये तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि इस पीढ़ी की सामाजिकता, समन्वय, सहयोग आदि को आरंभिक दौर से ही कम से कमतर किया जाता रहता है. इनके खेलने-कूदने, मैदानों में जाने, पारम्परिक खेलों में भाग लेने, शारीरिक श्रम करने में लगातार कमी आते-आते एक तरह की शून्यता आ गई है. शिक्षा के नाम पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव, ज्ञान के बजाय तकनीकी रोजगार पाने की आकांक्षा ने बच्चों को मशीन में परिवर्तित कर दिया है. किसी समय गर्मियों की छुट्टियाँ खेलकूद, यात्राओं, रिश्तेदारों से मेलजोल, कार्य-निपुणता आदि के द्वारा बच्चों का न केवल मनोरंजन करती थीं बल्कि उनको सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सहयोग का पाठ भी सिखाती थीं. इसके उलट आज इन छुट्टियों में ये पीढ़ी अपने संस्थानों के प्रोजेक्ट को पूरा करने में, किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास करने में, किसी तकनीक को सीखने में ही उलझे रहते हैं.

 

अध्ययन की समयावधि के साथ-साथ अपने फुर्सत के कुछ पलों को भी लैपटॉप, मोबाइल आदि के साथ गुजारने के कारण ये पीढ़ी खुद को सामाजिक रूप से लगभग अलग कर चुकी होती है. ऐसे में इनकी पारंपरिक बुद्धिमत्ता जैसे तार्किकता, एकाग्रता, याददाश्त, कल्पनाशीलता आदि में कमी आना स्वाभाविक है. गैजेट्स के सहारे छोटे-छोटे से काम करने, पुस्तकों से खुद को दूर कर लेने, रील्स जैसी अत्यधिक तीव्र दुनिया के रोमांच में खोने, खुद को डिजिटल डिवाइस में कैद कर देने के कारण इस पीढ़ी में निर्णय लेने की त्वरित क्षमता में कमी आना, संकटकालीन स्थिति में अवसाद में चले जाना, जरा सी असफलता पर घनघोर नैराश्य को अपना लेना आदि भी सहज रूप में नजर आता है.

 

सामान्य रूप में ऐसा वैज्ञानिक तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के लिए बातचीत के, पुस्तकों को पढ़ने के माध्यम से सीखना सहज होता है. यही कारण है कि आज भी तकनीक के बदलते दौर में भी शिक्षण संस्थानों का महत्त्व बना हुआ है, शिक्षकों को वरीयता प्रदान की जा रही है. ऐसा माना भी जाता है कि इस तरह की कार्यविधि के माध्यम से किसी सामग्री को, किसी ज्ञान को मष्तिष्क जल्द से जल्द स्वीकारता है. आज की पीढ़ी में आमने-सामने बात करने, पुस्तकों को पढ़ते हुए कल्पनाशीलता का विकास करने के स्थान पर स्क्रीन को जल्दी-जल्दी स्क्रॉल करने, मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़कर सीखने में विश्वास करने लगी है. यही कारण है कि उसकी सीखने की क्षमता कम हुई है. यह स्थिति किसी एक देश की नहीं बल्कि लगभग सभी देशों की इस पीढ़ी की है.

 

डॉ. होर्वाथ की खोज से निकले निष्कर्ष को किसी प्रयोग का अंतिम निष्कर्ष भले न माना जाये किन्तु यह तो अवश्य ही माना जा सकता है कि जेन ज़ी पीढ़ी ने खुद को तकनीकी के हाथों की कठपुतली बना दिया है. ऐसे में अब जबकि खोज बता रही है कि उनकी पिछली पीढ़ी उनसे अधिक बुद्धिमत्ता वाली है तो पिछली पीढ़ी का दायित्व बनता है कि इस पीढ़ी को मशीनी खिलौना बनने से बचाया जाये. तकनीकी विकास और भौतिकतावादी युग में आज भले ही धनोपार्जन मुख्य मुद्दा बनता जा रहा हो किन्तु कुछ शारीरिक श्रम, खेलकूद, मेल-जोल, सामाजिकता, पारिवारिकता आदि के लिए समय निकालना ही होगा. परिवारों को एक निश्चित समय गैजेट्स, मशीनों, मोबाइल आदि के बिना रहते हुए सदस्यों के बीच बातचीत करते हुए, आपसी चुहल करते हुए बिताना शुरू करना होगा. अपने बच्चों को मशीनी खेल से बाहर निकाल कर मैदानों में भेजना होगा. हार-जीत के रूप में सफलता-असफलता का स्वाद चखने के लिए उनको तैयार करना होगा. हमें ही ध्यान रखना होगा कि जेन ज़ी भी अपनी पिछली पीढ़ी की तरह एक इन्सान है न कि कोई मशीन या रोबोट. इस पीढ़ी को भी संवेदनात्मक रूप से, भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं कि जेन ज़ी सक्षम अथवा समर्थ नहीं है, बस उसने खुद को तकनीक में, मशीनों में उलझा दिया है और हम सबको उसे इसी उलझन से बाहर निकालना है.

 


28 नवंबर 2025

ई-कचरे का बढ़ता खतरा

जलवायुध्वनिमृदा प्रदूषणों के बीच अपना विकराल रूप धारण कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरफ अभी समाज बहुत गम्भीर नहीं दिखता है. आम जनमानस समझने की कोशिश नहीं कर रहा कि इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट भी पर्यावरण के लिए, मानव के लिए खतरा बन गया है. इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट को सामान्य बोलचाल में ई-कचरा के रूप में जाना जाता है. प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण टूटने, पुराने होने के कारण फेंक दिए जाते हैं, वह ई-कचरा ही है. उचित तरीके से इसका निपटान, पुनर्चक्रण नहीं होने से ये स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बन जाते हैं. ई-कचरे में कम्प्यूटर, मोबाइल, घरेलू उपकरण, व्यावसायिक उपकरण, माइक्रोवेवरिमोट कंट्रोलबिजली के तारस्मार्ट लाइटस्मार्टवॉच आदि आते हैं.

 

सामाजिक रूप से यह बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि समाज का जिस तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है, उसी तेजी से ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. आधुनिक तकनीक और मानव जीवन शैली में आने वाले बदलाव के कारण ऐसे उपकरणों का उपयोग दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है जो विषैले, हानिकारक पदार्थों के जनक बनते हैं. ट्यूबलाइटसीएफएल जैसी रोज़मर्रा वाली वस्तुओं में पारे जैसे विषैले पदार्थ पाए जाते हैं जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं. ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया में लगभग 488 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर के चौथे संस्करण में बताया गया कि दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन दर्ज ई-कचरे के पुनर्चक्रण की तुलना में पाँच गुना तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट में बताया गया कि 2022 में रिकॉर्ड 62 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो 2010 की तुलना में 82 प्रतिशत अधिक है. इसके 2030 तक 32 प्रतिशत तक बढ़कर 82 मिलियन टन होने की सम्भावना है. विश्व स्तर पर रिकॉर्ड 62 बिलियन किलो ई-कचरा उत्पन्न हुआ जो प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष औसतन 7.8 किलो के बराबर है. 2022 में यूरोप ने प्रति व्यक्ति 17.6 किलो के हिसाब से सर्वाधिक ई-कचरा उत्पन्न किया.

 



ई-कचरे में मरकरीकैडमियम और क्रोमियम जैसे कई विषैले तत्त्व शामिल होते हैं. इनके निस्तारण के असुरक्षित तौर-तरीकों से मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. इससे अनेक तरह की बीमारियाँ होने की आशंका रहती है. भूमि में दबाने से ई-कचरा मिट्टी और भूजल को दूषित करता है. जब मिट्टी भारी धातुओं से दूषित हो जाती है तो उस क्षेत्र की फसलें विषाक्त हो जाती हैंजो अनेक बीमारियों का कारण बन सकती हैं. भविष्य में कृषियोग्य भूमि को भी अनुपजाऊ हो सकती है. मिट्टी के दूषित होने के बाद ई-कचरे में शामिल पारालिथियमलेड, बेरियम आदि भूजल तक पहुँचती हैं. धीरे-धीरे तालाबोंनालोंनदियों, झीलों आदि का पानी अम्लीय और विषाक्त हो जाता है. यह स्थिति मानवों, जानवरोंपौधों आदि के लिए घातक हो सकती है. ई-कचरा में शामिल विषाक्त पदार्थों का नकारात्मक प्रभाव मस्तिष्कहृदययकृतगुर्दे आदि पर बहुत तेजी से दिखाई देता है. इसके साथ-साथ मनुष्य के तंत्रिका तंत्र और प्रजनन प्रणाली को भी यह प्रभावित कर सकता है.

 

ई-कचरा के निपटान की अपनी स्थितियाँ, अपनी चुनौतियाँ हैं. इस कारण सबसे ज्यादा जोर इसके पुनर्नवीनीकरण पर दिया जा रहा है. पुनर्नवीनीकरण के द्वारा प्लास्टिक, धातु, काँच आदि को अलग-अलग करके उसको पुनरुपयोग योग्य बनाया जाता है. वैश्विक स्तर पर अब 81 देश ऐसे हैं जिन्होंने ई-कचरे से संबंधित कोई नीतिकानून या विनियमन अपनाया है. इन 81 देशों में से 67 ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) सिद्धांत लागू किया है, 46 ने अपने नियमों में राष्ट्रीय ई-कचरा संग्रहण लक्ष्य निर्धारित किए हैं और 36 ने राष्ट्रीय स्तर पर ई-कचरा पुनर्चक्रण लक्ष्यों को अपनाया है. भारत भी ई-कचरे से संबंधित कोई नीतिकानून या विनियमन को अपनाने वाले देशों में शामिल है इसके बाद भी यहाँ ई-अपशिष्ट प्रबंधन से सम्बन्धित अनेक चुनौतियाँ हैं. सबसे बड़ी चुनौती जन भागीदारी का बहुत कम होना है. इसके पीछे उपभोक्ताओं की एक तरह की अनिच्छा है जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रीसाइक्लिंग के लिये बनी रहती है. इसके अलावा हाल के वर्षों में एक और चुनौती इस रूप में सामने आई है कि देश में बहुत से घरों में ई-कचरे का निस्तारण बड़े पैमाने पर होने लगा है. यह स्थिति तब है जबकि भारत में ई-कचरे के प्रबंधन के लिये वर्ष 2011 से कानून लागू है जो यह अनिवार्य करता है कि अधिकृत विघटनकर्त्ता और पुनर्चक्रणकर्त्ता द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किया जाए. इसके लिये वर्ष 2017 में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016 अधिनियमित किया गया है.

 

तकनीक, आधुनिक जीवनशैली, आवश्यकता आदि की आड़ लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग भले ही अंधाधुंध तरीके से किया जाने लगा हो मगर यह स्वीकारना होगा ई-कचरा भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गैजेट्स का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता है और बहुतायत समाज का इन्हीं पर निर्भर होते जाना खतरे का सूचक है. आज की युवा पीढ़ी के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुविधा के लिए कम, पैशन के लिए ज्यादा उपयोग किया जा रहा है. ऐसे में उनके द्वारा उपकरणों को जल्दी-जल्दी बदल दिया जाता है. नवीन तकनीक के कारण भी बहुतेरे उपकरण आउटडेटेड हो जाते हैं. यह भी ई-कचरा की मात्रा को बढ़ाने का काम कर रहा है.

 

पर्यावरण की, मानव, जीवों की सुरक्षा की खातिर लोगों को केवल हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधों को बचाने के बारे में ही सजग नहीं होना है बल्कि ई-कचरा के प्रति भी सावधान होने की आवश्यकता है. बेहतर हो कि जीवनशैली को संयमित, नियंत्रित किया जाये. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यावश्यक होने पर ही उपयोग किया जाये. उनके निस्तारण के लिए औपचारिक क्षेत्र की सहायता ली जाये. सम्भव है कि मानव समाज कुछ हद तक आने वाले खतरे को टाल सके.  


20 सितंबर 2025

सेमीकंडक्टर : भारतीय अर्थव्यवस्था का डिजिटल हीरा

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में सेमीकंडक्टर चिप के बारे में चर्चा करते हुए कहा था कि वर्ष 2025 के अंत तक भारत की पहली स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप बाजार में होगी. इसके कुछ दिन बाद ही सेमीकॉन इंडिया 2025 आयोजन में देश की पूरी तरह से स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर चिप को पेश किया गया. विक्रम नामक चिप को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सेमीकंडक्टर लैबोरेट्री (SCL) ने बनाया है. यह 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर है, जिसे पूरी तरह से देश में डिजाइन किया और बनाया गया है. देश की पहली एवं पूर्णतः स्वदेशी चिप को विशेष रूप से अंतरिक्ष मिशनों के लिए तैयार किया गया है. अंतरिक्ष में रॉकेट प्रक्षेपण की कठिन परिस्थितियों को सहने में सक्षम यह चिप -55 डिग्री सेल्सियस से लेकर +125 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकती है. सेमीकॉन इंडिया 2025 इवेंट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिप्स को डिजिटल डायमंड के रूप में परिभाषित किया. सेमीकंडक्टर चिप जिसे माइक्रोचिप या इंटीग्रेटेड सर्किट भी कहते हैं. यह एक छोटा सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है, जो सिलिकॉन का बना होता है. यह अपने छोटे से आकार में लाखों-करोड़ों ट्रांजिस्टर समेटे इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को नियंत्रित करता है. स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, टेलीविजन, कार, मेडिकल उपकरण, सैटेलाइट, मिसाइल आदि के लिए ये चिप दिमाग की तरह काम करती है.

 



वर्तमान डिजिटल युग में तमाम सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जो आज हमारे जीवन का प्रमुख हिस्सा हैं, इन्हीं सेमीकंडक्टर चिप के सहारे काम करते हैं. जीवन शैली को सहज और सरल बनाने में उपयोगी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयोग होने वाली चिप का उत्पादन गिने-चुने देशों में ही होता है. ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका इसके उत्पादन के केन्द्र-बिन्दु हैं. भारत को भी इन्हीं देशों पर निर्भर रहते हुए चिप सम्बन्धी माँग को पूरा करने के लिए इनसे आयात करना पड़ता है. आज भले ही गिने-चुने देशों के पास चिप उत्पादन की क्षमता हो मगर सेमीकंडक्टर चिप के आविष्कार, निर्माण की यात्रा वैश्विक स्तरीय रही है. देखा जाये तो सेमीकंडक्टर चिप का इतिहास 1947 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार से शुरू हुआ. जब अमेरिका के बेल लैब्स के विलियम शॉकली, वाल्टर ब्रेटेन और जॉन बार्डीन ने जर्मेनियम पर आधारित पहला ट्रांजिस्टर बनाया. इसके बाद 1958 में टेक्सास के जैक किल्बी ने जर्मेनियम का उपयोग करते हुए विश्व के पहले इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) का निर्माण किया. इसके कुछ महीनों पश्चात् 1959 में फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर के रॉबर्ट नॉयस ने सिलिकॉन का उपयोग करते हुए इंटीग्रेटेड सर्किट बनाया. इस आविष्कार ने कालांतर में आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप निर्माण की राह निर्मित की. जिस आधुनिक चिप का स्वरूप आज हमारे सामने है उसका आधार 1959 में मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर (MOSFET) के रूप में बना.  

 

भारतीय सन्दर्भ में यदि सेमीकंडक्टर के इतिहास पर नजर डालें तो अस्सी के दशक के आरम्भ में सेमीकंडक्टर चिप निर्माण हेतु चंडीगढ़ में सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (SCL) की स्थापना की गई थी. तकनीकी एवं आर्थिक कारणों से सेमीकंडक्टर चिप निर्माण में अवरोध उत्पन्न होने के कारण लम्बे समय तक देश को इसके लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा. दूसरे देशों पर निर्भरता की एक लम्बी यात्रा पूरी करने के बाद अपनी पहली पूर्ण स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप विक्रम के निर्माण पश्चात् भारत ने अब अगली जनरेशन की सेमीकंडक्टर तकनीक में कदम रख दिया है. केन्द्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 16 सितम्बर को बेंगलुरु में एआरएम (ARM) के नए कार्यालय का उद्घाटन किया. यहाँ पर विश्व की सबसे उन्नत किस्म की चिप्स तकनीक पर काम शुरू किया जायेगा. जिनमें एआई सर्वर, ड्रोन और मोबाइल उपकरणों के लिए 2 नैनोमीटर प्रोसेसर शामिल हैं. एआरएम  के नए डिजाइन ऑफिस में 2 नैनोमीटर चिप तकनीक पर काम शुरू होना भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल करता है जो हाईटेक चिप बना सकते हैं. यह तकनीक निश्चित रूप से देश को वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर हब बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम समझी जा सकती है. इससे पहले मई 2025 में नोएडा और बेंगलुरु में 3 नैनोमीटर चिप डिजाइन सेंटर खोले जा चुके हैं.

 

सरकार की पहल पर भारत में सेमीकंडक्टर इंडिया कार्यक्रम का आरम्भ 2021 में हुआ. इसके अंतर्गत 2023 में पहले प्लांट को मंजूरी मिलने के बाद कई अन्य परियोजनाओं को भी मंजूरी मिली. इससे अब तक छह राज्यों में दस परियोजनाएँ प्रगति पथ पर हैं, जिसमें लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है. इस मिशन के अंतर्गत 76000 करोड़ रुपये का सरकारी बजट भी निर्धारित कर दिया गया है. देश में ही सेमीकंडक्टर का उत्पादन आरम्भ होने के बाद से भारत में जहाँ बड़े निवेश आकर्षित हुए हैं वहीं स्वदेशी चिप डिज़ाइन कम्पनियों ने भी अपनी रुचि दिखाई है. ये कम्पनियाँ और बहुतेरे स्टार्टअप रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक वाहनों, अन्तरिक्ष क्षेत्र के लिए विशेष रूप से चिप्स का उत्पादन कर रही हैं. अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी सेमीकंडक्टर चिप निर्माण में वैश्विक संभावनाएँ हैं. इस समय वैश्विक बाजार लगभग 600 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है. ऐसे में भारत के लिए व्यापक अवसर यहाँ उपलब्ध हैं. ऐसी सम्भावना जताई जा रही है कि 2026 तक भारत में इस क्षेत्र में लगभग दस लाख नए रोजगार सृजित किये जाने की उम्मीद है.

 

वर्तमान में ताइवान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, चीन, मलेशिया देश चिप निर्माण करते हैं. अब जबकि भारत ने इस क्षमता को विकसित कर लिया है तो निकट भविष्य में भारतीय इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग को आत्मनिर्भर बनने, वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा करने से कोई नहीं रोक सकता है. देश का स्वदेशी सेमीकंडक्टर सिस्टम भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स, अन्तरिक्ष, स्वास्थ्य, ऊर्जा, रक्षा आदि क्षेत्रों में भारत को विश्व में अग्रिम पंक्ति में खड़ा करेगा.

 


04 सितंबर 2025

मशीनी शैक्षिक दौर में शिक्षकों का महत्त्व

विकास के परिवर्तनशील चरणों में शिक्षा क्षेत्र में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. शिक्षा व्यवस्था परिवर्तनों के दौर में गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इसके बाद भी समाज से शिक्षकों के महत्त्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. जब तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेदारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. किसी भी शिक्षक का काम विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र नहीं है, उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है. ऐसा होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. अध्यापन कार्य के पीछे की मूल भावना के अनुसार एक शिक्षक को किसी उत्पाद का निर्माण नहीं करना है वरन वह एक नागरिक तैयार करना है, एक व्यक्तित्व का विकास करना है.

 

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को ही शिक्षक मान लिया गया है. ये मशीनी अंग शिक्षक के सहायक उपकरण तो हो सकते हैं किन्तु किसी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकते हैं. मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से किसी विषय को भले ही सहजता से समझाया जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों को विकसित नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है.

 

सत्यता यही है कि मशीन ज्ञान तो दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

 


06 जून 2025

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल

1315 मीटर लम्बे और एफिल टावर से भी ऊँचे पुल का उद्घाटन 06 जून 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया. जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बना यह पुल दुनिया का सबसे ऊँचा पुल है. यह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चिनाब रेल सेतु इस्पात और कंक्रीट का मेहराबदार पुल है जो जम्मू-कश्मीर के जम्मू मंडल के रियासी जिले में बक्कल और कौरी के बीच स्थित है. नदी तल से इस पुल की ऊँचाई 359 मीटर (1178 फीट) है.

 

चिनाब सेतु भूकंपीय क्षेत्र पाँच में स्थित है. यह दो पहाड़ों के बीच बना है, जहाँ तेज हवाओं की वजह से विंड टनल फिनोमेना देखा जाता है. इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए पुल को इस तरह से बनाया गया का, इस तरह से इसका डिजाइन तैयार किया गया है कि यह 260 किलोमीटर प्रति घंटा की हवा की गति का भी सामना आसानी से कर सकता है. जिसे इस तरह से बनाया गया है कि यह भूकंप और तेज हवाओं को भी झेल सकता है. 

 





07 जुलाई 2020

कीबोर्ड वाले मोबाइल का अपना आकर्षण

समय के बदलाव के साथ विगत कुछ वर्षों में जिस तेजी से परिवर्तन आये हैं वे अकल्पनीय हैं. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से परिवर्तन देखने को मिले हैं. तकनीक के विकास ने बहुत सी वस्तुओं में क्रांतिकारी बदलाव किये हैं. बदलाव के बहुत सारे क्षेत्रों में मोबाइल और ऑटो-मोबाइल में जबरदस्त परिवर्तन देखने को मिल रहा है. पिछले कई सालों के सामाजिक, तकनीकी परिवर्तन पर नजर दौड़ाई जाये तो जिस तेजी से इन दो क्षेत्रों में बदलाव आया है, उतना किसी और क्षेत्र में नहीं आया है.


मोबाइल को हाथ में लेकर टहलते, दौड़ते, भागते या फिर किसी भी काम को करते-करते बतियाते समय एक पल को याद आता है एक डोर से बंधा, सीमित दूरी तय करने वाला बेसिक फोन. बेसिक फोन के साथ याद आता है घंटों नंबर डायल करने के लिए पुराने समय के फोन में लगी रिंग का घुमाया जाना. इसमें भी बदलाव उस समय हुआ जबकि रिंग की जगह बटनों ने ले ली. फोन में बदलाव आया मगर नंबर लगने की जटिलता में कमी नहीं आ सकी. इक्का-दुक्का घरों की शान बने फोन को ललचा कर देखने वालों की संख्या में कमी उस समय आनी शुरू हुई जबकि गली-गली, कोने-कोने में पीसीओ का खुलना शुरू हो गया.



वह दौर भी अपने आपमें अलग अनुभव देने वाला रहा है. एक दौर वो था जबकि फोन कॉल की दो दरें ही काम किया करती थीं. दिन भर फुल चार्ज वाला हिसाब और रात आठ बजे से आधी दरों पर एसटीडी कॉल की सुविधा. इसी में आगे जाकर अलग-अलग तीन-चार तरह की दरें निर्धारित की गईं. यही वो दौर था जबकि पीसीओ सुविधा के कारण लोगों से बातचीत करना सहज होता जा रहा था. पीसीओ में लगी लाइन और लोगों की आँखें कॉल मीटर पर लगी रहतीं. यदि एक बार में किसी व्यक्ति का नंबर नहीं मिलता और पीसीओ पर भीड़ है तो फिर उस व्यक्ति को तीन-चार बार ही रीडायल करने की सुविधा भीड़ की सहमति से मिल पाती थी.

तकनीक में परिवर्तन का दौर आ चुका था. बेसिक टेलीफोन में भी परिवर्तन आना ही आना था. मोबाइल आने के पहले बेसिक टेलीफोन ने अपने बदलाव की आहट को सुन-समझ लिया था. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हमें लगता है कि उसी बदलाव ने मोबाइल को जन्म दिया होगा. संभव है कि आप लोग अंदाजा लगा चुके हों, उस बदलाव के बारे में. बेसिक टेलीफोन और मोबाइल के बीच की कड़ी में बेसिक का ही अवतार बनकर उभरा कॉर्डलेस फोन. वैसे यह एक तरह से बेसिक टेलीफोन के उस उपकरण का विकास था किन्तु जिस तरह से उसे लेकर दस-बीस मीटर तक की पहुँच बना ली गई, तारों की बंधी-बंधाई सीमा-रेखा से मुक्ति मिली, उसने निश्चित ही एक बड़ा बदलाव किया होगा. इसी के चलते मोबाइल का जन्म हुआ. 

बेसिक फोन में भी परिवर्तन देखने को मिला और वह मोबाइल के रूप में बिना किसी तार के लोगों की जेब तक पहुँच गया. आज के स्मार्ट फोन को अपनी ज़िन्दगी बना चुकी इस पीढ़ी के लिए यह समझना ही कठिन होगा कि कैसे मैसेज टाइप करने के दौरान कुछ अक्षरों को टाइप करने के लिए एक बटन को तीन-तीन, चार-चार बार दबाना होता था. आज लगभग मुफ्त कॉलिंग वाली स्थिति का अनुभव कर रही पीढ़ी के लिए यह सोच पाना भी मुश्किल है कि उस समय जब मोबाइल का जन्म हुआ तो न केवल आउटगोइंग कॉल के लिए पैसे देने पड़ते थे बल्कि इनकमिंग कॉल का भी भुगतान करना पड़ता था. मोबाइल का होना उस समय एक स्टेटस सिम्बल तक बन गया था.

तकनीक के इस तीव्र विकास में एक गैजेट ऐसा भी आया था जो अपना विकास देख पाने के पहले ही एकदम से गायब हो गया था. याद आया आपको वह गैजेट? पेजर को भूले नहीं होंगे वे लोग जिन्होंने उसे देखा, उपयोग किया होगा. स्मार्ट फोन के साथ कुश्ती लड़ती आज की पीढ़ी ने शायद पेजर नाम सुना भी नहीं होगा. बहरहाल, उस समय जबकि मोबाइल का किसी व्यक्ति के पास स्टेटस सिम्बल हुआ करता था, तब हमारे एक परिचित अपने परिचितों पर रोब दिखाने के लिए मोबाइल की जगह पर टीवी का रिमोट कसे रहते थे. याद आ गया होगा, बेल्ट में बंधा एक कवर और उस कवर में बड़ी हिफाजत से रखा गया मोबाइल. चूँकि इनकमिंग कॉल भी खर्चीली होती थी, इस कारण न सबको नंबर दिया जाता था, न सबकी बात करवाई जाती थी. सो किसी को क्या खबर कि कमर में कवर में मोबाइल सुरक्षित रखा हुआ है या फिर टीवी का रिमोट मगर हमारे उन परिचित ने इसी तरह महीनों अपने परिचितों पर कथित मोबाइल की हनक बनाये रहे.


आज के स्मार्ट फोन के साथ एप्प का होना उसकी सजावट बना हुआ है. बहुत हुआ तो कोई अच्छा सा डिजायनर कवर उसकी शोभा बढ़ाने लगा. इसके उलट कीबोर्ड वाले मोबाइल के दौर में तमाम सारे साजो-सामान उनको सजाने के लिए आया करते थे. मोबाइल में बाँधने वाली रंग-बिरंगी डोरी, पारदर्शी कवर, कॉल-मैसेज आने के पहले उनके सिग्नल पाकर चमकने वाले स्टीकर, गुच्छे आदि मोबाइल को शोभायमान बनाया करते थे. बाद में मोबाइल की कई तरह की रंग-बिरंगी बॉडी बाजार में आ जाने के बाद मोबाइल का बाहरी आवरण भी बदलने लगा था. उपभोक्ताओं की मानसिकता, उनकी रुचि के अनुसार मोबाइल कंपनियों ने भी कई तरह के बदलाव अपने मोबाइल में करना शुरू कर दिए थे. कॉल आने के साथ लाइट का चमकना, कीबोर्ड का रंगीन बनाया जाना, रंगीन बॉडी का आना, मोबाइल में अलग-अलग तरह की लाइट का लगातार चमकते रहना आदि उस दौर के मोबाइल को खूबसूरत बनाने में लगे थे.

उन सादा मोबाइल के साथ-साथ स्लाइडिंग मोबाइल, फोल्ड होने वाले मोबाइल, दो सिम के मोबाइल का आना भी लोगों को सम्मोहित कर रहे थे. आज बहुतेरे व्यक्ति हजारों-लाखों रुपये के मोबाइल अपने हाथों में लिए घूमते हैं, स्लिम मोबाइल, घड़ी वाले मोबाइल सहित तमाम तरह के कीमती मोबाइल बाजार में उपलब्ध हैं मगर वे उस तरह का आकर्षण पैदा नहीं कर पा रहे हैं, जैसा कि बटन वाले मोबाइल पैदा करते थे.

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03 मार्च 2018

इंसानों के बीच बढ़ती दूरियाँ


आधुनिक होकर हम सभी विस्तारित होते जा रहे हैं. इसमें तकनीक भी सहायक सिद्ध हो रही है. तकनीकी विकास ने इंसानों के बीच, शहरों के बीच, राज्यों के बीच, देशों के बीच दूरियों को कम किया है. इंसानों को छोड़ कर बाकी तत्वों के लिए दूर या पास होने का बहुत भावनात्मक स्तर नहीं रहता है. इन्सान एकमात्र ऐसा तत्त्व है जो भौगोलिक दूरी के साथ-साथ भावनात्मक दूरी का एहसास रखता है. तकनीक के विकास ने भौगोलिक दूरियों को लगभग समाप्त सा कर दिया है. मोबाइल क्रांति ने जहाँ पल भर में एक-दूसरे को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की क्षमता को विकसित किया है वहीं यातायात सुविधा ने दूरियों को घंटों में समेट दिया है. अब हम दूरियों की बात किमी में नहीं वरन समय के अनुपात में करने लगे हैं. मोबाइल क्रांति के साथ-साथ सोशल मीडिया के तमाम सारे मंचों ने दूरियों को मिटाते हुए सबको एक-दूसरे से मिलने का अवसर दिया है. देशों की सीमाओं को लाँघते हुए समूचे विश्व को एक गाँव में परिवर्तित कर दिया है.


दूरियों के भेद को भौगोलिक रूप से मिटाने के बाद भी इंसानों ने दिल के भेद को मिटाने में सफलता हासिल नहीं कर पाई है. तकनीकी विकास ने लोगों को परदे पर एक-दूसरे के सामने जरूर बैठा दिया है मगर वास्तविक रूप से आमने-सामने बैठने की मानसिकता में लगातार गिरावट आती जा रही है. सामान्य दिनों की मेल-मिलाप वाली प्रक्रिया, दोस्त-यारों की घंटों के हिसाब से लगने वाली बैठकी, दर्जनों की संख्या में एकत्र होकर जमघट लगाने की सोच भी अब देखने को नहीं मिल रही है. सामान्य दिनों के मेल-मिलाप में आने वाली इस गिरावट को पर्व-त्योहारों के अवसर पर भी देखा जा रहा है. अब पर्व-त्यौहार भी औपचारिकता में संपन्न या कहें कि निपटाए जाने लगे हैं. दोस्तों के हुजूम के हुजूम अब सड़कों पर, बाजार में, घरों में देखने को नहीं मिलते हैं. हँसी-मजाक की महफ़िलें अब जमती नहीं दिखाई देती हैं. कई-कई परिवारों के बीच दिखाई देने वाले आत्मीय रिश्तों का भी लोप होता दिखाई देने लगा है. त्योहारों के अवसर पर मिलने-जुलने की परम्परा को अब बोझिलता से निपटाने का उपक्रम किया जाने लगा है. अब आपस में मिलने-जुलने के बजाय लोग मोबाइल के माध्यम से मिलने को ज्यादा सुविधाजनक समझने लगे हैं. सोशल मीडिया मंचों का अधिकाधिक उपयोग करके वे पर्व-त्योहारों की औपचारिकता का निर्वहन करने लगे हैं. इत्तेफाक से मिलने-मिलाने की स्थिति यदि कभी, कहीं अपवादस्वरूप बनती दिखती भी है तो वहां मोबाइल का हस्तक्षेप सबसे ज्यादा रहता है. आमने-सामने बैठे लोग भी आपस में बातचीत करने से ज्यादा पल-पल मोबाइल को निहारने में लगे रहते हैं. जरा-जरा सी देर में इस तरह मोबाइल खंगाला जाता है जैसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण मसला हल किया जा रहा हो.


सामान्य रूप से इस तरह की हरकतें असामान्य हरकतों में, बुरे बर्ताव के रूप में देखी जानी चाहिए मगर आधुनिकता के वशीभूत सब इसको सामान्य सी घटना, सामान्य सी प्रक्रिया, दैनिक चर्या मानकर सहज रूप में स्वीकार करने लगे हैं. असल में लगभग सभी कहीं न कहीं इस हरकत से खुद भी ग्रसित हैं, ऐसे में उनके द्वारा किसी दूसरे को दोष देने की हिमाकत भी नहीं की जा सकती है. तकनीक के विकास ने जहाँ बहुत सारे सार्थक परिणाम समाज को दिए हैं, उसी तकनीक ने इस तरह का नकारात्मक माहौल भी समाज में बनाने में सहायक भूमिका निभाई है. इंसानों के बीच भौगोलिक दूरियों के मिटने से जहाँ समूचा विश्व एकसूत्र में बंधा दिखाई देता है वहीं दो इन्सान कोसों दूर दिखाई देते हैं. ऐसा लगता है कैसे आमने-सामने बैठे दो इंसानों के बीच बहुत ऊंची दीवार उठी हुई है या फिर वे दोनों बहुत दूर बैठे हुए हैं. यह तकनीकी विकास भले ही आभासी रूप में, सोशल मीडिया के चमकते परदे पर एक-दूसरे को आमने-सामने खड़ा कर रहा हो मगर उसी तकनीक ने दो इंसानों को आपस में बहुत-बहुत दूर कर दिया है. ये दूरी न केवल मानसिक, शारीरिक रूप से परिलक्षित होने लगी है वरन संवेदनात्मक रूप से भी इंसानों में दूरियाँ आने लगी हैं.