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28 मई 2022

वीर सावरकर और सेलुलर जेल की कोठरी

घूमने का शौक बचपन से रहा है. भले ही देश में भी बहुत सारी जगहों पर घूमना न हो पाया हो मगर अपने आसपास घूम कर अपने शौक को पूरा कर लिया करते हैं. ये तो घूमने वाली एक बात हुई मगर दूसरी बात ये कि देश के बहुत सारे स्थानों को देखने की इच्छा रही है, अभी भी है. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. जब हम लोग यहाँ घूम रहे थे तो इस जेल में शेष बची इमारत की कोठरियों के एक जैसे दिखने के कारण वीर सावरकर सेल वाली पट्टिका देखने के बाद उस तरफ जाना हुआ. ये सुन-पढ़ रखा था कि वीर सावरकर को इसी जेल की किसी कोठरी में कैद किया गया था. 


एक सेल के किनारे पर लगी इस पट्टिका के बारे में जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. ऐसा मालूम पड़ते ही एक सिरहन सी पूरे शरीर में दौड़ गई. पैर ऐसा महसूस होने लगे जैसे उनमें शक्ति बची न हो. जैसा पढ़ते आये थे, उसका ध्यान अचानक से आते ही आँखों के सामने अँधेरा जैसा समझ आने लगा. अपने आपको एक पल में संयत करके उस कोठरी के दर्शन करने को कदम बढ़ाये जहाँ वीर सावरकर ने अपना लम्बा जीवन व्यतीत किया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी जन्मतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 




26 फ़रवरी 2022

क्रांतिधाम सेलुलर जेल और वीर सावरकर के दर्शन

घूमने का, फोटोग्राफी का शौक बचपन से रहा है. ये और बात है कि देशकाल, परिस्थिति के कारण बहुत सारी जगहों पर बहुत घूमना न हुआ मगर आसपास की जगहों पर खूब घूमना होता रहा. तमाम सारी जगहों के बारे में पढ़ने-देखने के कारण बहुत सी जगहों को देखने का, वहाँ के बारे में जानने-लिखने का, उसकी फोटोग्राफी खुद करने का बहुत मन हुआ करता था. ऐसी ही जगहों में एक जगह सेलुलर जेल हुआ करती थी. बचपन से पढ़ाई के दौरान, परिवार से मिलती जानकारी के कारण से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को काला पानी के नाम से ही पहचानते थे. उसमें भी उस काला पानी में सेलुलर जेल का नाम सुन रखा था. बचपन में तो नहीं मगर जैसे-जैसे समझ आती रही, बचपन की पकड़ से बाहर आते रहे, सेलुलर जेल को देखने की, वहाँ की मिट्टी को माथे लगाने की इच्छा बलबती होती रही. कालांतर में वीर सावरकर जी के बारे में पढ़ने को मिला तो न केवल सेलुलर जेल को बल्कि उस कोठरी को भी नमन करने का मन होने लगा जहाँ वीर सावरकर को कैद किया गया था. 


समय गुजरता रहा, मन में अंडमान निकोबार जाने की, सेलुलर जेल दर्शन की अभिलाषा और विकट रूप धारण करती रही. आखिरकार एक दिन ऐसा आ ही गया कि अंडमान निकोबार जाने का, पोर्ट ब्लेयर की धरती छूने का, सेलुलर जेल की मिट्टी को माथे लगाने का सुअवसर आ ही गया. दिल्ली से उड़े हवाई जहाज ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एयरपोर्ट के दर्शन करवाते हुए वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतार दिया. हवाई जहाज से बाहर आने पर वीर सावरकर जी का नाम देखकर सिर स्वतः ही उनके प्रति श्रद्धा से झुक गया.


अपने छोटे भाई के घर पहुँचने के बाद सबसे पहले सेलुलर जेल के दर्शन किये गए. जेल की सभी जगहों को अपने हिसाब से देखा, उनका एहसास किया गया. सेलुलर जेल अपनी जिस मूल स्थिति में थी, अब वैसी नहीं है. मूल रूप में यह जेल सात शाखाओं में बनाई गई थी. बाद में इसकी चार शाखाएँ स्थानीय लोगों द्वारा ही नष्ट कर दी गईं. अब इस जेल की कुल सात शाखाओं में से केवल तीन शाखाएँ शेष बची हुई हैं.


सेलुलर जेल का मॉडल 

तीन मंजिल की इस जेल का नाम सेलुलर जेल रखने के पीछे का कारण इसका रूप-विन्यास भी है. इसमें प्रत्येक शाखा में कई-कई कोठरियाँ हैं. सभी कोठरी इस तरह से बनी हैं कि किसी कोठरी में कैद व्यक्ति दूसरी कोठरी को नहीं देख सकता था. एक सेल की तरह से बने होने के कारण इसे सेलुलर जेल कहा गया. इसी में एक मंजिल पर सीढ़ी के पास ही वीर सावरकर सेल की पट्टिका लगी हुई है. 


जानकारी करने के बाद मालूम हुआ कि इसी मंजिल पर वीर सावरकर को एक कोठरी में कैद करके रखा गया था. हम लोग पूरी श्रद्धाभाव से, तन-मन में सिरहन लिए, आँखों में पानी लिए सेलुलर जेल के कोने-कोने को जैसे आत्मसात करने के लिए घूम रहे थे. ऐसी स्थिति में जब उस कोठरी के सामने पहुँचे जहाँ वीर सावरकर को कैद में रखा गया था तो आँखों से आँसू स्वतः ही बह निकले. सभी कोठरियों में सामान्य एक गेट था मगर वीर सावरकर की कोठरी को दो फाटकों से बंद किया गया था. तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को इतने से भी संतोष नहीं था, उन्होंने वीर सावरकर को डराने, भयभीत करने के लिए ऐसी कोठरी में रखा था जो फाँसीघर के सबसे नजदीक थी. उन अंग्रेजों का मानना था कि फाँसी लगाए जाने के दौरान आती चीखों से घबराकर किसी दिन वीर सावरकर भी टूट जायेंगे.


सावरकर कोठरी, इसे दो फाटकों से बंद किया गया था 

इसी शाखा में सबसे अंत में है कोठरी सावरकर जी जहाँ कैद रखे गए 

वीर तो वीर ही होता है और सावरकार तो वास्तविक में वीर थे, जिन्होंने सेलुलर जेल से भाग निकलने का दुस्साहस किया. भारतीय इतिहास में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको दो बार काला पानी की, सेलुलर जेल की सजा दी गई. ये भी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि इतिहास में वे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनके साथ उनके भाई को भी सेलुलर जेल में सजा काटने भेजा गया था. आश्चर्य देखिये कि एक ही जेल में बंद दो भाइयों को महीनों तक इसकी जानकारी ही नहीं हुई कि दो सगे भाई एकसाथ एक ही जेल में सजा काट रहे हैं.


वीर सावरकर जी की कोठरी में कुछ समय बिताने के बाद, उनकी फोटो के सामने अपनी मनोभावनाओं को प्रकट करने के बाद भी वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था. दिल में, मन में अत्यंत श्रद्धाभाव लेकर, सावरकर जी के प्रति, तमाम वीर सेनानियों के प्रति कृतज्ञता भाव लेकर, उनका आशीष लेकर हम लोग वास्तविक धाम के, क्रांतिधाम के दर्शन करके घर लौट आये. हमारा अपना व्यक्तिगत विचार ये है कि देश भर के किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भले ही अपने धार्मिक स्थल के दर्शन का अवसर न मिले मगर एक बार सेलुलर जेल के, इस क्रांतिधाम के दर्शन अवश्य करने चाहिए.


वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


सावरकर कोठरी में 

सेलुलर जेल के सामने बने पार्क में 



29 मई 2021

एकांत में कहानी सुनाते सेलुलर जेल और रॉस आइलैंड

पोर्ट ब्लेयर से लगभग तीन-चार किमी की दूरी पर रॉस आइलैंड स्थित है. किसी समय में अंग्रेज अधिकारियों के निवास स्थान एवं अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए उपयोग होने वाला यह द्वीप आज एकदम निर्जन है. पहले यहाँ अंग्रेजों का राज रहा फिर द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानियों ने इस पर कब्जाकर इसे उजाड़कर रख दिया. बनने-उजड़ने की प्रक्रिया से जूझता यह द्वीप आज अपनी भव्य इमारतों के खंडहर संभाले निर्जन, अकेला, सुनसान खड़ा है. इसकी ख़ामोशी, अकेलेपन को यहाँ आने वाले पर्यटकों की चहल-पहल ही दूर करती है. चारों तरफ से समुद्र से घिरा होने के कारण यह द्वीप अंग्रेजों के लिए अत्यंत सुरक्षित जगह थी. सन 1859 में अबरडीन का युद्ध और फिर सन 1872 में शेरअली पठान द्वारा अंग्रेजी वायसराय लार्ड मेयो की हत्या ऐसी घटनाएँ थीं जिन्होंने अंग्रेज अधिकारियों के दिल में भय पैदा कर रखा था. इसी कारण से कालांतर में भले ही क्रांतिकारियों को वाइपर द्वीप की जेल से पोर्ट ब्लेयर में बनाई सेलुलर जेल में स्थानांतरित कर दिया गया हो मगर अंग्रेजों ने अपने रहने के ठिकाने को नहीं बदला. वे रॉस आइलैंड पर ही जमे रहे. बाद में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने इसे अपने कब्जे में लेकर पूरी तरह से उजाड़ दिया था.


रॉस आइलैंड में लाइट एंड साउंड शो 


आज इस द्वीप पर तत्कालीन सभ्यता के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं. यहाँ बने मकान, चर्च, चिकित्सालय, पोस्ट ऑफिस, दुकानों आदि के खंडहरों पर वृक्ष उग आये हैं. इसके अलावा जापानियों द्वारा बनाये बंकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. पोर्ट ब्लेयर से फैरी के द्वारा चंद मिनट की समुद्री यात्रा के बाद रॉस आइलैंड उतरना होता है. यह द्वीप पूरी तरह से भारतीय सेना के हवाले है, जिसके चलते सुरक्षा औपचारिकताओं के साथ प्रवेश करते ही एक तरफ जापानी बंकर से सामना होता है तो दूसरी तरफ हिरन, मोर, खरगोश अपनी मासूमियत से पर्यटकों के साथ खेलते-कूदते नजर आते हैं. रॉस आइलैंड पर इमारतों के भव्य खंडहर अपनी कहानी खुद कहते नजर आये मगर समूचे इतिहास को यहाँ होने वाले लाइट एंड साउंड कार्यक्रम ने सामने रखा. गुलज़ार के सम्मोहित करते अंदाज़ ने रॉस आइलैंड के बनने-उजड़ने के साथ-साथ इससे जुड़े अनेक तथ्यों को अत्यंत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया. 


वाइपर द्वीप जेल से क्रांतिकारियों का भागना, आदिवासियों के बीच रहकर एक क्रांतिकारी दूधनाथ तिवारी का उनका विश्वासपात्र बन जाना, अबरडीन का युद्ध, दूधनाथ का विश्वासघात, शेरअली द्वारा लार्ड मेयो की हत्या, क्रांतिकारी कैदियों से सेलुलर जेल का बनवाया जाना, जापानियों का रॉस आइलैंड पर हमला, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा जिमखाना ग्राउंड पर तिरंगा फहराना आदि घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया, लगा कि हम खुद उसी समय में जी रहे हैं. लगभग एक घंटे के उस लाइट एंड साउंड प्रोग्राम को देखने के बाद महसूस हुआ कि अंडमान-निकोबार भ्रमण का यह अनिवार्य अंग होना चाहिए, किसी भी पर्यटक के लिए.


सेलुलर जेल में लाइट एंड साउंड शो 


रॉस आइलैंड के लाइट एंड साउंड की तरह ही सेलुलर जेल में भी लाइट एंड साउंड प्रोग्राम की व्यवस्था है. एक तरफ रॉस आइलैंड में एक शो ही होता है वहीं दूसरी तरफ पोर्ट ब्लेयर में ही होने के कारण सेलुलर जेल में लाइट एंड साउंड के दो शो होते हैं. हिन्दी भाषा के साथ-साथ एक शो अंग्रेजी भाषा में भी होता है. सेलुलर जेल के इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से जेल के बारे में, यहाँ के क्रांतिकारियों के बारे में, उन पर किये गए अमानवीय अत्याचारों के बारे में बताया जाता है. रॉस आइलैंड का लाइट एंड साउंड प्रोग्राम जानकारी देता है, कहीं-कहीं भावनात्मकता पैदा करता है किन्तु सेलुलर जेल का प्रोग्राम जानकारी देने के साथ-साथ लगातार आँखों को नम किये रहता है. ओमपुरी की गंभीर आवाज़ में वहाँ स्थित पीपल के पेड़ के द्वारा कही जा रही कहानी, बेहतरीन ध्वनि प्रभाव के चलते क्रांतिकारियों पर होते ज़ुल्मों का शोर, उनकी चीखें, वन्देमातरम, भारत माता की जय का घोष अन्दर तक हिलाकर रख देता है. सेलुलर जेल में लगभग एक घंटे के इस कार्यक्रम को देखते हुए तत्कालीन स्थितियों के साथ इतना अन्तर्सम्बंध बन गया था कि इसके समापन के बाद भारत माता की जय का घोष लगाये बिना मन न माना. ख़ुशी इस बात की हुई कि तीन बार के घोष में वहाँ उपस्थित जनसमुदाय की सैकड़ों आवाजें साथ दे रही थी.


अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भले ही अनेक द्वीपों की सुन्दरता के वशीभूत आने वाले पर्यटकों की संख्या यहाँ बढ़ने लगी हो किन्तु व्यतिगत रूप से हमारा विचार है कि यहाँ आकर मुख्य रूप से सेलुलर जेल, यहाँ का लाइट एंड साउंड प्रोग्राम देखने के साथ-साथ रॉस आइलैंड का लाइट एंड साउंड अनिवार्य रूप से देखना चाहिए. सेलुलर जेल तो वैसे भी राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रसिद्द है जो गवाह है कि कैसे हमारे वीर क्रांतिकारियों ने हमारी आज़ादी के लिए ज़ुल्म सहे, कष्ट सहे, यातनाएं सहीं. इसे देखना अपने आपमें सुकून देता है, इसके साथ ही यहाँ और रॉस आइलैंड के लाइट एंड साउंड प्रोग्राम इतिहास से परिचित करवाते हुए तत्कालीन काला पानी का वास्तविक चित्र सामने रखते हैं.


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26 फ़रवरी 2019

वीर सावरकर को नमन


वीर सावरकर को याद करते हुए. आज, 26 फरवरी उनकी पुण्यतिथि है. विनम्र श्रद्धांजलि उस व्यक्तित्व को जिसने पूरे इतिहास में अकेले दो बार काला पानी की सजा पाई मगर राष्ट्रपिता की उपाधि से कोई और सम्मानित किया गया. ऐसे लोग जिनके परिवार का कोई व्यक्ति सेलुलर जेल में सजा काटने नहीं गया, वह देश का सर्वोच्च राजनैतिक परिवार माना गया मगर जिन दो भाइयों ने एकसाथ सेलुलर जेल में सजा काटी, वे अज्ञातवास काट रहे हैं.  

देश सबकुछ देख रहा है, सबकुछ याद किये है.... समय आने पर सब बदलेगा... सब बदलेगा.... याद रखना. 

05 मार्च 2017

आँखों में नमी, गर्व है दिल में - सेलुलर जेल दर्शन : अंडमान-निकोबार यात्रा

सेलुलर जेल, जहाँ एक तरफ अंग्रेजी शासन में अमानवीय यातनाओं का केंद्र रहा वहीं दूसरी तरफ आज आज़ाद भारत में क्रांतिकारियों के तीर्थस्थल के रूप में पहचाना जा रहा है. ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जो देश की आज़ादी में न्योछावर हो चुके क्रांतिकारियों के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखता है, सेलुलर जेल किसी भी तीर्थ से कम नहीं है. कभी सोचा नहीं था कि देश की मुख्यभूमि से हजारों किमी दूर समुद्र के बीच स्थित पोर्ट ब्लेयर में इस जगह के दर्शनार्थ लोगों का हुजूम पहुँचता होगा. सेलुलर जेल के सामने जब खुद को साक्षात् खड़ा पाया और अपने साथ क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान-आदर का भाव लिए भीड़ को देखा तो लगा कि भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया कितनी भी स्वार्थी क्यों न हो गई हो मगर उसने अपने वीर शहीदों को विस्मृत नहीं किया है. ऐसे लोग भी दिखे जो महज घूमने के लिए वहाँ आये हुए थे किन्तु सेलुलर जेल की अमानवीयता से किसी न किसी रूप में परिचित थे या वहाँ के गाइड के माध्यम से परिचित हो रहे थे, वे सब उन क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान भाव तथा तत्कालीन अंग्रेजी शासन के प्रति घृणा का भाव प्रदर्शित कर रहे थे.


बाहर से साधारण सी इमारत दिखने वाली सेलुलर जेल की विशालता का अनुभव मुख्य द्वार को पार करने के बाद होता है. लगभग बीस-पच्चीस फुट की गैलरी को पार करते ही जेल की वे कोठरियाँ नजर आती हैं जो किसी समय अमानवीयता का परिचायक रही थीं. यद्यपि गैलरी पार करने के पूर्व गैलरी के दांये-बांये बने दो विशाल हॉल में प्रदर्शित चित्र एवं अन्य सामग्री जेल की भयावहता का परिचय वहाँ आये सैलानियों को दे देती है. जेल में बंद क्रांतिकारियों के भोजन हेतु दिए जाने वाले बर्तन, उनको पहनने के लिए दिए जाने वाले कपड़े, उनके साथ हुई अमानवीयता की कहानियाँ आँखों को नम करती हैं.



गैलरी से होते हुए अन्दर जेल प्रांगण में दाखिल होते ही सामने कोठरियों से बनी दो बड़ी-बड़ी कतारें (विंग्स) दिखाई देती हैं. बांये तरफ की विंग से कोठरियों के पीछे भाग के दर्शन और दाहिने तरफ की विंग से कोठरियों के सामने के भाग दिख रहे थे. तीन मंजिला इमारत विशालता और उसकी बनावट अपने आपमें ये समझाने को पर्याप्त थी कि एक साथ बंद होने के बावजूद वहाँ क्रांतिकारी किस कदर खुद को अकेला महसूस करते होंगे. तमाम सारे सर्वेक्षण पश्चात् जब अंग्रेजी शासन द्वारा देश के क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए सेलुलर जेल का निर्माण शुरू किया गया तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि देश के क्रांतिकारियों को यातना देने के लिए ऐसी भयावह जेल का निर्माण करवाया जायेगा. सेलुलर जेल से वर्षों पूर्व 10 मार्च 1858 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 200 बंदी पहले जत्थे के रूप में अंडमान-निकोबार के विभिन्न द्वीपों पर लाये गए. इसके बाद तीन अन्य जहाजों- रोमन एम्पायर में 171, डलहौजी में 140, एडवर्ड में 130 राजनैतिक बंदियों को और लेकर आया गया. इस तरह भारतीय क्रांतिकारियों के साथ आजीवन कारावास या कहें कि काला पानी की सजा के यातना-अमानवीयता के पृष्ठ जुड़ने लगे.


सेलुलर जेल का निर्माण कार्य सन 1896 को इन्हीं बंदियों के द्वारा करवाना शुरू हुआ जो सन 1906 में पूरा हुआ. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने, उन्हें अमानवीय यातनाएं देने की दृष्टि से ही इस जेल का निर्माण करवाया था. इस कारण इसकी बनावट भी ऐसी रखी गई जो अपने आपमें अमानवीयता का परिचायक बनी. पूरी जेल सात कतारों (विंग्स) में बनाई गई. इसमें एक विंग के सामने दूसरी विंग का पीछे का भाग पड़ता है. सातों विंग्स को एक मुख्य इमारत से जोड़ा गया था, जिस पर से एकसाथ सातों विंग्स की निगरानी की जा सकती थी. सातों विंग्स में कुल मिलाकर 689 कोठरियाँ (सेल्स) थीं. इसमें पहली विंग में 105, दूसरी में 102, तीसरी में 150, चौथी में 53, पांचवीं में 93, छठीं में 60 और सातवीं में 126 कोठरी थीं. प्रत्येक कोठरी 13.5 फुट लम्बी, 7 फुट चौड़ी, 10 फुट ऊँची है. प्रत्येक कोठरी में जमीन से 9 फुट ऊपर एक 3 फुट और 1 फुट लम्बाई-चौड़ाई वाली खिड़की बनी हुई है. प्रत्येक कोठरी लोहे के मजबूत फाटक के सहारे बंद होती थी और जिसका हैंडल दीवार में इस तरह बनाया गया था कि कोठरी के अन्दर के लाख कोशिश के बाद भी उस तक अपना हाथ नहीं पहुँचाया जा सकता था. यहाँ बंद सेनानियों को दैनिक क्रियाओं के लिए भी छूट नहीं मिलती थी. एक निश्चित समयावधि के बाद उनको अपनी दैनिक क्रियाएँ उसी कोठरी में संपन्न करनी पड़ती थीं. शाम को पाँच बजे बंद किये गए वीर सेनानी अगले दिन सुबह छह बजे तक बाहर आने को तरस जाते थे. यातना की इतनी इन्तिहाँ शायद ही हममें से किसी ने सोची हो.




वर्तमान में जेल की सात विंग्स में से केवल तीन विंग्स शेष हैं. बाकी चार विंग्स जापानियों द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के समय किये गए हमले में तथा तत्कालीन स्थानीय नागरिकों के तोड़-फोड़ में पूरी तरह मिट चुकी हैं. वहाँ अब एक चिकित्सालय, बाजार स्थित है. ये तो भलमानसता कहिये भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई की जिन्होंने सेलुलर जेल के रिहा किये गए राजनैतिक बंदियों और उनके परिजनों के आग्रह को स्वीकार करते हुए 11 फरवरी 1979 को सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया.


बहरहाल, हम लोगों ने मुख्य गैलरी से प्रांगण में प्रवेश किया तो सामने स्थित दो विंग्स के साथ दांयें-बांयें दो स्मारक और भी दिखाई दिए. एक स्मारक ने जहाँ गर्व की अनुभूति कराई वहीं दूसरे स्मारक को देखकर शरीर में झुनझुनी फ़ैल गई. बांयी तरफ अमर शहीदों की स्मृति में प्रज्ज्वलित स्वतंत्रता ज्योति और एक स्तम्भ के दर्शन हुए जबकि दाहिनी तरफ वीर क्रांतिकारियों को मौत की नींद सुलाने के लिए बनाया गया फाँसी घर दिख रहा था. फाँसी घर में एकसाथ तीन क्रांतिकारियों को फाँसी देने की व्यवस्था अंग्रेजी सरकार ने कर रखी थी. ज़ुल्म और यातनाओं के बाद भी अंग्रेजी शासन का मन नहीं भरता था शायद इसी कारण से फाँसी घर के ठीक बगल में तिरष्कृत कोठरियों का निर्माण करवाया गया था. यहाँ उन राजनैतिक बंदियों को रखा जाता था जिन्हें फाँसी की सजा दी जा चुकी है किन्तु उसकी पुष्टि गवर्नर जरनल से नहीं हो सकी है. स्पष्ट है कि ऐसे वीरों के मन में मौत के लिए दहशत पैदा करना उन अंग्रेजों का मकसद था किन्तु आज़ादी के वीर मतवाले इससे भय खाने वालों में से नहीं थे. इसी फाँसीघर के बगल में बना हुआ रसोईघर आज भी स्थित है. यहाँ हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग रसोई घरों की व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा की गई थी. इसके द्वारा वे उन क्रांतिकारियों में आपस में फूट डालना चाहते थे.



इन्हीं तिरष्कृत कोठरियों के ठीक ऊपर दूसरी मंजिल पर वीर सावरकर को कैद किया गया था. जिस कोठरी में उनको कैद किया गया था वो आज सावरकर कोठरी के नाम से जानी जाती है, जो वहाँ आये दर्शनार्थियों के लिए पूज्य है. ये अपने आपमें गर्व का विषय है कि देश के क्रांति इतिहास में वीर सावरकर एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन्हें दो बार काला पानी की सजा हुई. वे अकेले क्रांतिकारी हैं जो अपने भाई के साथ सेलुलर जेल में कैद थे और पूरे एक साल तक उनके भाई को खबर नहीं हो सकी कि वीर सावरकर भी वहाँ कैद हैं. वीर सावरकर अथाह सागर की चिंता किये वगैर एक बार जेल को तोड़कर भाग चुके थे ऐसे में दोबारा उनके आने पर जेल प्रशासन अत्यंत चौकन्ना और भयभीत था. एकमात्र उन्हीं को उनकी कोठरी में एक अतिरिक्त फाटक के द्वारा कैद किया गया था.




इसी प्रांगण में दाहिने हाथ पर ही उस तेल मील के चिन्ह उपस्थित हैं जिसका आधार लेकर वहाँ के बंदियों पर अत्याचार किये जाते थे. एक राजनैतिक बंदी को प्रतिदिन तीस पौंड नारियल का तेल या फिर दस पौंड सरसों का तेल निकालना होता था. जो किसी भी सामान्य व्यक्ति की क्षमता से परे था. इसके अलावा जूट की रस्सी बनाने का काम भी इनके जिम्मे आता था. ये काम न हो पाने की दशा में उन बंदियों को लोहे की बनी एक तिपाही पर बांधकर नग्नावस्था में बेंत मारने की सजा दी जाती थी. जेल प्रांगण में स्थित वे उपकरण, लोहे की बनी तिपाही देखकर बरबस ही आँखें नम हो गईं, देह में सिरहन दौड़ गई. एहसास हुआ कि वाकई किस तरह के अमानुषिक अत्याचार सहकर हमारे वीर सेनानियों ने हमारे लिए आज़ाद हवा-पानी का इन्तेजाम किया.



सातों विंग्स, वर्तमान में तीन को एकसाथ जोड़ती केन्द्रीय मीनार के सहारे इन विंग्स की छत पर खुली हवा में आज साँस ली जा सकती है. किसी समय कोठरी के बाहर स्थित चार फुट के बरामदे में भी साँस लेना दुर्लभ था. इसी केन्द्रीय मीनार में यहाँ के राजनैतिक बंदियों के नामों का उल्लेख करते हुए शिलालेख स्थित हैं. ऊपर आकर तीन तरफ विशाल समुद्र दिखाई देता है. एक तरफ सामने अवश्य ही रॉस आयलैंड दिखाई देता है, जहाँ आज तिरंगा फहराता है पर कभी यूनियन जैक लहराया करता था. इस आयलैंड को अंग्रेजी अधिकारी के निवास के तौर पर प्रयोग में लाया जाता था. वे देश के क्रांतिकारियों से इतने भयभीत रहते थे कि रहने के लिए पोर्ट ब्लेयर से दूर समुद्र के बीच रॉस आयलैंड में आये.




सेलुलर जेल का अपना इतिहास है. कई कैदी यहाँ की अमानवीय यातनाओं को सहते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. कई क्रांतिकारियों को फाँसी के द्वारा मौत की नींद सुला दिया गया. वहाँ के क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल से, उनके संघर्ष से सभी राजनैतिक बंदियों को मुख्यभूमि की जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया. हालाँकि सेलुलर जेल में आतंक का दौर इसके बाद भी जारी रहा. अंग्रेजों के बाद जापानियों ने दूसरे विश्व युद्ध में यहाँ कब्ज़ा करके अपना आतंक फैलाया. बहरहाल, देश की आज़ादी के बाद सभी राजनैतिक बंदियों को यहाँ से मुक्ति मिली. इसी सेलुलर जेल के ठीक सामने बने वीर सावरकर पार्क में सावरकर जी की प्रतिमा के साथ-साथ भूषण रॉय, बाबा भानसिंह, मोहित मोइत्रा, पंडित रामरक्षा बाली, महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्होंने अमानवीय यातनाएं सहते हुए इसी जेल में अंतिम साँस ली.



आँखों में नमी, दिल में श्रद्धा-भाव, मन में गर्व की अनुभूति करते हुए वास्तविक तीर्थस्थान से जब बाहर निकले तो किसी लेखक की ये पंक्तियाँ मन सहज ही कह उठा कि
मत कहो इसे कालापानी, यह तीरथ वीर जवानों का,

आज़ादी के परवानों का, भारत माँ की संतानों का.