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28 सितंबर 2020

नया फाउंटेन पेन मिलने की ख़ुशी बदली सजा में

हस्तलिपि की चर्चा छिड़ी तो बचपन की एक घटना याद आ गई. उस समय हम कक्षा पाँच में पढ़ते थे. एक शाम पिताजी बाजार से वापस आने के बाद अपना लिखा-पढ़ी का कोई काम कर रहे थे. हमने देखा कि पिताजी अपने जिस फाउंटेन पेन से लिखते थे, उससे न लिख कर एक नए पेन से लिख रहे हैं. मैरून रंग का वह पेन बहुत अच्छा लग रहा था. यद्यपि रंगीन पेन हमारे लिए नया नहीं था क्योंकि पिताजी जिन फाउंटेन पेन का प्रयोग करते थे, वे रंगीन बॉडी के ही थे. उन पेन को छूने की हिम्मत भी नहीं होती थी.


उस शाम पता नहीं हमें क्या हुआ, शायद मैरून रंग का ज्यादा आकर्षण रहा कि जैसे ही पिताजी ने अपना काम बंद करके पेन रखा, हमने पिताजी से पूछा कि ये पेन हम ले लें? पिताजी की अनुमति मिलते ही ख़ुशी का ठिकाना न रहा. झटपट पेन उठाया, अपनी कॉपी निकाली. कॉपी के एक पेज पर बड़ी ही फुर्ती में अपना पूरा नाम (जैसा चित्र में लाल रंग में लिखा है) लिख कर पिताजी को दिखाने पहुँच गए.




उन्होंने पूछा कि कुमारेन्द्र कैसे लिखा जाता है?


हमारी फुर्ती, पेन पाने की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया. तुरंत इतना समझ आ गया कि लिखने में कुछ गलती कर गए. कॉपी पर लिखे अपने नाम को फिर से देखा तो समझ आ गया कि द्र की मात्रा गलत लगा गए. गलती समझ आई तो तुरंत सही तरीके से कुमारेन्द्र लिख कर दिखा दिया (जैसा कि चित्र में पीले रंग में लिखा है). पिताजी ने सिर हिलाते हुए उस सही को स्वीकार किया और गलत लिखने की सजा भी सुना डाली.


अब जाओ, सौ बार कुमारेन्द्र लिखो.


नए फाउंटेन पेन से लिखने के चक्कर में सजा पहले तो सजा जैसी न लगी मगर बीस-तीस बार कुमारेन्द्र लिखने के बाद नया पेन आफत लगने लगा. फिलहाल सजा तो पूरी करनी ही थी, सो करी. आज भी बरसों बरस बीत जाने के बाद भी कहीं भी जब अपना नाम लिखते हैं तो तुरंत यह सजा, वह मैरून फाउंटेन पेन याद आ जाता है.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 अप्रैल 2020

प्रसिद्धि पाने का सहज रास्ता है रुपहला पर्दा

पिछले दो दिन में फिल्म इंडस्ट्री के दो नामचीन और मशहूर चेहरे दुनिया को अलविदा कह गए. पहले इरफ़ान खान और फिर ऋषि कपूर का जाना अपने-अपने क्षेत्र में एक खालीपन का एहसास अवश्य कराएगा. ऋषि कपूर के पिता राजकपूर की फिल्म का एक डायलाग है शो मस्ट गो ऑन. ये सही है. दुनिया किसी के जाने से कभी रुका नहीं करती. किसी के जाने से खाली हुई जगह भले ही उसी रूप में न भरी जा सके मगर किसी न किसी रूप में उसी की तरह से भरने की कोशिश अवश्य वहाँ होने लगती है. 

कोरोना महामारी के इस दौर में जबकि सोशल मीडिया पूरी तरह से इसी बीमारी की गिरफ्त में दिख रहा है, सुबह से लेकर देर रात तक बस कोरोना की चर्चा दिखाई दे रही है तब इन दो कलाकारों के बारे में बराबर लिखा जाना इनकी शोहरत को दर्शाता है. यहीं सवाल उठता है कि क्या वाकई इनकी शोहरत या फिर इनके चेहरे का, इनका चमकते परदे पर दिखाई देना? इसमें कोई दोराय नहीं कि इन दोनों कलाकारों का अभिनय के क्षेत्र में अपना अलग स्थान है. दोनों ही अपनी तरफ से अलग तरह के अभिनय के लिए जाने जाते रहे हैं. इसमें एक इरफ़ान खान ने जहाँ अपनी मेहनत से अभिनय जगत में अपनी पहचान बनाई वहीं ऋषि कपूर खानदानी अभिनय क्षेत्र से जुड़े होने के बाद भी मेहनत करते दिखाई देते थे.



बहरहाल, चर्चा ये नहीं कि कौन मेहनत कर रहा था, कौन नहीं? कौन किस तरह का अभिनय करता था, कौन दूसरे तरह का. चर्चा इस बात की कि शोहरत के लिए, नाम के लिए जितना महत्त्वपूर्ण मेहनत करना, कार्य करना है उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण उस माध्यम का है जो आपको जनसामान्य के बीच लेकर जाता है. इसमें दृश्य माध्यम का बहुत बड़ा हाथ है. फिल्मों ने, टीवी ने फ़िल्मी कलाकारों को घर-घर में लोगों के बीच पहुँचा दिया है. ऐसे में सर्वसुलभ माध्यम के चलते प्रसिद्धि सहज, सरल हो जाती है. समाज में इन फ़िल्मी कलाकारों के अलावा भी बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो वास्तविक रूप में जमीनी काम कर रहे हैं, समाजोपयोगी कार्य कर रहे हैं, सबके हितार्थ कार्य कर रहे हैं मगर उनको ऐसी प्रसिद्धि नहीं मिल पाती है, जितनी कि किसी फ़िल्मी कलाकार को मिल जाती है.

यहाँ आकर सवाल उठता है कि आखिर इसका जिम्मेवार कौन? इसका सबसे सरल और सहज जवाब है, सरकार. है न? आखिर किसी भी स्थिति की जटिलता से बाहर आने का सबसे आसान रास्ता होता है किसी भी स्थिति के लिए सरकार को जिम्मेवार बता देना. हम अपने आसपास के वास्तविक नायक-नायिकाओं को सामने लाने के प्रति संकुचित मानसिकता अपनाये होते हैं. उनको किसी माध्यम से चमकते परदे पर लाये जाने का काम नहीं किया जाता है. सरकारी, गैर-सरकारी माध्यम, मंच भी ऐसे लोगों को सामने लाने का काम करते हैं जो पहले से किसी न किसी परदे की शोभा बने हुए हैं.

यहाँ कहने का आशय यह नहीं कि इन कलाकारों के प्रति सम्मान प्रदर्शित न किया जाये, ऐसा भी नहीं कि इनको इज्जत न दी जाये मगर इनके साथ-साथ उनको भी सबके सामने लाने का काम किया जाना चाहिए जो वास्तविक रूप से हमारे रोल मॉडल बन सकते हैं.

22 जुलाई 2015

नाम तेरे कितने नाम

सुबह-सुबह मोबाइल ने बजना शुरू किया। गुस्सा बहुत आया। रात को सोच कर सोये थे कि देर तक सोयेंगे पर कमबख्त मोबाइल। मन मार कर कॉल रिसीव की और आँखें बंद किये-किये ही हाय-हैलो बोल दिया। हैलो बोलते ही तेज गुस्सा भी आया साथ ही नरमी भी दिखाई आवाज़ में क्योंकि दूसरी तरफ से एक महिला स्वर उभर कर कान में मिश्री घोल रहा था। दूसरी तरफ वाले ने जो नाम पुकारा वह हमारे घर में तो क्या दूर-दूर तक न तो रिश्तेदारी-नातेदारी में था और न ही पास-पड़ोस में। 
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यह सोच कर कि गलत नम्बर लगा दिया है मोहतरमा ने हमने पूछा किसको नम्बर लगाया है, कौन सा नंबर लगाया है? जवाब में हमें हमारा ही नम्बर बताया गया। फिर पूछा किसने दिया? अबकी जो जवाब मिला उससे लगा कि उन मैडम जी को बात हम से ही करनी है।


दरअसल हम कुछ दोस्त मिल कर एक एसोसिएशन बनाये हैं और लोगों को उससे जोड़ने का काम चल रहा है। पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन’ नाम से इस एसोसिएशन में विशेष रूप से पी-एच0डी0 वालों को ही जोड़ा जा रहा है। उसी से जुड़ने के लिए उस तरफ से फोन था।
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सामने वाली महिला से हमने नितांत शालीनता से पूछा कि ये नम्बर तो हमारा है पर इस नाम का यहाँ कोई नहीं है। जब उसने हमारे दोस्त का नाम बताया कि फलां श्रीमान ने कहा था कि आप जिससे बात करेंगी, उसका नाम कुमारी इंदिरा है और उससे बात करके आपको एसोसिएशन के बारे में पूरी जानकारी मिल जायेगी। यदि आप कहते हैं कि इस नम्बर पर इस नाम का कोई नहीं है तो हम आपको डिस्टर्ब करने के लिए आपसे सॉरी बोलते हैं।

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इतनी देर में नींद तो गायब ही हो गई और हमारी समझ में पूरी बात आ गई। बात समझते ही जोर की हँसी आई किन्तु अपनी हँसी को रोक कर कहा बताइये क्या जानकारी चाहिए? हम वही बोल रहे हैं जिनका नाम आपको फलां श्रीमान ने बताया है। अबकी शायद चकराने की बारी सामने वाले की थी क्योंकि उस तरफ खामोशी सी छा गई। हम समझ गये कि उस तरफ नाम को लेकर संशय उभर आया है। हमने तब उनको समझाया कि आपको जिस व्यक्ति से बात करनी है वो हम ही हैं, बस नाम के उच्चारण को लेकर कुछ गड़बड़ हो गई है। हम ही वो कुमारेन्द्र हैं जिससे आपको बात करनी थी  और आप परेशान न हों क्योंकि आप सही व्यक्ति से बात कर रहीं हैं। जब उन मैडम जी को असलियत बताई तो वे भी खिलखिला पड़ीं। 
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हो सकता है कि ये सब पढ़कर आप सब भी संशय में आ गए हों? आपको शायद अंदाज़ा न हो कि वे मोहतरमा किससे बात करना चाहतीं थींवो बात करना चाहतीं थीं कुमारी इन्दिरा से। उन्होंने अच्छे भले कुमारेन्द्र को संधि-विच्छेद करके कुमारी इन्दिरा बना दिया था।
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अकसर हमारे नाम को लेकर ऐसा होता रहा है। कभी नादानी में तो कभी प्यार में तो कभी चुहल में। हमारा एक मित्र है संदीप। वैसे तो वह हमें कुमारेन्द्र ही बुलाता है पर जब कभी अपने मूड में होता है तो कुम्मू ही बुलाता है। हमारे इन्हीं दोस्त के रिश्ते के एक भाई हैं। उनको मालूम है कि हमारा नाम कुमारेन्द्र है पर वे आज भी हमें रामेन्द्र बुलाते हैं और सुनने वाला भी समझ जाता है कि बात हमारी हो रही है।
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कालेज के दौरान हमारा एक साथी था, उसने भी हमारे नाम के अलग-अलग हिस्से करके एक अलग ही नाम बना दिया था। यहाँ उस समय कालेज के समय का लड़कपन, चुहलबाजी ही काम करती थी। उसने हमारे नाम को चार हिस्सों में बाँट दिया था - कुमार, इन्द्र, सिंह, सेंगर। इसके बाद इसको अंग्रेजी के शार्टफार्म में बनाकर पुकारता था। किस’ (KISS) - कुमार का K, इन्द्र का I, सिंह का S, सेंगर का S। इसी तरह और भी कई तरह से लोग उच्चारण में गलती करके नाम के कई रूप बनाते रहे हैं पर मोबाइल से बात करने वाली उन मैडम जी ने जो नाम दिया उसने तो हमें भी घुमा दिया।


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वाह! कैसे हो (कैसी हो) कुमारी इन्दिरा?

19 जून 2013

कौरव भाइयों के नाम



कौरव भाइयों के नाम

१-दुर्योधन
२-दुःशासन
३-दुसः
४-दुःशल
५-जलसन्ध
६-सम
७-सह
८-विंद
९-अनुविन्द
१०-दुर्धर्ष
११-सुबाहु
१२-दुःशप्रघर्षण
१३-दुर्मर्षण
१४-दुर्मुख
१५-दुश्कर्ण
१६-कर्ण
१७-विविंशीत
१८-विकर्ण
१९-शल
२०-सत्व
२१-सुलोचन
२२-चित्र
२३-उपचित्र
२४-चित्राक्ष
२५-चारुचारित्र
२६-शरासन
२७-दुर्भद
२८-दुर्विगाह
२९-विविस्सु
३०-विकटानन
३१-ऊर्ण
३२-सुनाम
३३-नंद
३४-उपनंद
३५-चित्रवान
३६-चित्रवर्मा
३७-सुवर्मा
३८-दुर्विमोचन
३९-आयोबाहु
४०-महाबाहु
४१-चित्रांग
४२-चित्रकुंडल
४३-भीमवेग
४४-भीमबल
४५-बलाकी
४६-बलवर्धन
४७-उग्रायुध
४८-सुवेण
४९-कुंडधार
५०-महोधर
५१-चित्रायुध
५२-निशंगी
५३-पाशी
५४-व्रंदारक
५५-दृढ़वर्मा
५६-दृढ़छत्र
५७-सोमकीर्ति
५८-अनूदर
५९-दृढ़संघ
६०-जरासंध
६१-सत्यसंघ
६२-सदःसुवाक
६३-अग्नश्रवा
६४-उग्रसेन
६५-सेनानी
६६-दुष्पराजय
६७-अपराजित
६८-कुंडशायी
६९-विशालाक्ष
७०-दुराधर
७१-दृढ़हस्त
७२-सुहस्त
७३-वातवेग
७४-सुवर्चा
७५-आदित्यकेतु
७६-वह्याशी
७७-नागदत्त
७८-अग्नयायी
७९-कवची
८०-क्रयन
८१-कुंडी
८२-उग्र
८३-भीमरथ
८४-वीरबाहु
८५-अलोलुप
८६-अभय
८७-रौद्रकर्मा
८८-दृढ़रथाश्रय
८९-अनाधृष्टा
९०-कुंडभेदी
९१-विरावी
९२-दीर्घबाहु
९३-प्रमथ
९४-प्रमाथी
९५-दीर्घरोमा
९६-महाबाहु
९७-व्युढारेस्क
९८-कनकध्वज
९९-कुंडाशी
१००-विरजा

इन सौ भाइयों की ‘दुःशला’ नाम की एक बहिन भी थी.