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18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


08 अक्टूबर 2021

नशे की गिरफ्त में युवा

हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया, एक गीत की ये पंक्ति आज के किशोरों को बड़ा उत्साहित करती है. इस एक पंक्ति के उत्साह में वे जगह-जगह, कहीं छिपे भाव में, कहीं खुलेआम उन्मुत रूप में धुआँ उड़ाते दिख जाते हैं. शहर की एक सड़क के किनारे खुले तमाम सारे कोचिंग सेंटर्स के आसपास झुण्ड के झुण्ड में दिखते किशोर और उन झुंडों पर तैरते धुंए के बादल. ये किसी एक शहर का दृश्य नहीं होता आजकल, लगभग सभी शहरों में ऐसी स्थिति दिख रही है. धुआँ उड़ाते इन किशोरों को उस गीत की धुआँ उड़ाती पंक्ति तो उत्साहित कर जाती है मगर उसके ठीक पहले का हिस्सा याद नहीं रहता. वह हिस्सा जो साफ़-साफ़ कहता है कि मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, इस हिस्से को ये युवा, किशोर कई तरीके से भुलाने का काम कर रहे हैं. बिना फ़िक्र के फ़िक्र को उड़ाने की कोशिश और उसी कोशिश में तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा ज़िन्दगी को भी उड़ाते जा रहे हैं.

 

आपको आश्चर्य लगे मगर सच यही है. रुके हैं तो धुंए में खोए हैं और चल रहे है तो हवा से बातें कर रहे हैं. ये एक तरह की जीवन-शैली बनती जा रही है आज के बहुसंख्यक युवाओं की, किशोरों की. ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से ही खिलवाड़ करते हुए इन बच्चों को आभास नहीं है कि वे क्या करने की कोशिश में अपने घर से बाहर निकलते हैं और क्या करने लग जाते हैं. भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के माता-पिता भी शामिल दिखाई देते हैं. लाड़-प्यार के चलते बच्चों के लिए सभी अत्याधुनिक संसाधन सहज मुहैया करवा दिए जाते हैं. ऐसे में बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती है, न समय की, न कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. माता-पिता के प्यार को, उनके द्वारा मेहनत से जुटाई जाने वाली सुविधाओं को, उनके द्वारा एक आवाज़ पर उपलब्ध करवाए जाने वाले संसाधनों को ये बच्चे अपना अधिकार सा समझते हैं. उनकी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति हो जाने के कारण वे इसकी महत्ता तो समझते ही नहीं हैं, दूसरों को भी तिरस्कृत समझते हैं. 

 



समाज में युवाओं की, किशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरण, वैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावना, जल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसा, कम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. जहाँ घुस जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ के, उन्नति के, समर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार को, समाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फंस गया है उसको समझाने की, सँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सके, सामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सके, कर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 


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04 जुलाई 2020

यादों में भटकना और भविष्य की चिंता

पुराने दिनों में कितना लौटा जाये? कितने दिनों तक स्मृति वन में विचरण किया जाये? ये सवाल एक हमारे मन में ही नहीं वरन बहुत से लोगों के मन में भी उठते होंगे. एक समय तक यादों की दुनिया में रहना अच्छा लगता है मगर एक समय बाद यही यादें परेशान भी करती हैं और वापस वर्तमान में जाने को विवश करती हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मन में अतीत, वर्तमान और भविष्य लगातार अपनी चहलकदमी करते रहते हैं. एक पल में मन यादों के आँचल में सुख की छाँव में आनंदित होता है कि अगले पल वाल भविष्य की चिंता में डूब जाता है. यहाँ भी वह एक पल को चैन से नहीं रुकता है और एक झटके में वर्तमान में आकर खड़ा हो जाता है.


मन की इस तीव्रतम आवाजाही में दिल की स्थिति बड़ी विकट हो जाती है. वह कहीं भी सुकून से नहीं रह पाता है. यादें उसे सुख भी देती हैं, मुस्कान भी देती हैं तो आँसू भी लाती हैं, दुखी भी करती हैं. यही दिल भविष्य की चिंता में परेशान भी दिखाई देता है. ऐसे में आजकल जबकि बहुतायत लोगों के पास काम की कमी है और समय की अधिकता है तो वे लोग दो ही स्थितियों में विचरण कर रहे हैं. या तो वे यादों के साथ अपना समय बिता रहे हैं या फिर भविष्य में जाकर आने वाले स्थिति का आभास करने में लगे हैं. यह स्थिति न तो सुखद कही जाएगी और न ही संतोषजनक.


यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो वर्तमान हालातों में सिर्फ यादों के साये में टहलते रहने से कुछ नहीं होने वाला. यादों की सुखद छाँव का अनुभव करते हुए भविष्य के लिए कुछ नए-नए आयामों पर विचार करना होगा. अभी जो हालात हैं उनको देखते हुए कहा नहीं जा सकता है कि वर्तमान के कौन-कौन से आधार भविष्य की इमारत बनाये जाने योग्य सुरक्षित रहेंगे. अभी तो वर्तमान की नींव ही बहुत सी जगह दरकती दिखाई पड़ रही है. ऐसे में बहुत सारे समय का सदुपयोग किये जाने की आवश्यकता है. वर्तमान की स्थिति का आकलन करते हुए सभी को अपने भविष्य का नया आधार सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियमित वेतन के साथ अपने कार्यों का संपादन कर रहे हैं, वे कम परेशान हैं मगर वे लोग जो निजी सेवाओं में संलग्न हैं, वे लोग जो बहुत छोटे स्तर पर अपना काम कर रहे हैं, ज्यादा परेशान हैं. ऐसे लोगों को अपने व्यापार की स्थिति, उनके नए आयामों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है.

समय इस समय भले ही सबके पास खूब है मगर सबके दिल-दिमाग-मन एकसमान स्थिति में स्थिर नहीं हैं. सभी के सामने आजीविका को लेकर, रोजगार को लेकर, परिवार को लेकर, भरण-पोषण को लेकर लगातार संघर्ष की, मंथन की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में भरे पेट वालों के लिए यादों में विचरण करना सहज हो सकता है मगर जिनके सामने भरण-पोषण की असमंजसता है, समस्या है उनके लिए यादों में विचरण करने का सुख लेना सहज नहीं. वे अपने वर्तमान को स्थिर करते हुए भविष्य को मजबूत आधार देने का विचार करने में लगे हैं, उसी की योजना में विचरण कर रहे हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

22 सितंबर 2015

उच्च शिक्षित, चपरासी पद और सरकारी नौकरी


जब किसी प्रदेश में चपरासी पद के लिए आवेदन करने वालों में इंजीनियर, पी-एच० डी०, परास्नातक, स्नातक आदि शामिल हों तो उस प्रदेश में रोजगार की स्थिति को समझा जा सकता है. चपरासी के के 368 पदों के लिए तेईस लाख से अधिक लोगों का आवेदन करना प्रदेश में बेरोजगारों की भारी-भरकम फ़ौज को चित्रित करता है.कितना भयावह लगता है कि चपरासी के जिस पद की योग्यता महज पाँचवीं उत्तीर्ण होना हो, उससे सम्बंधित आवेदन पत्रों की संख्या तिरेपन हजार है जबकि इसके उलट उच्चतर शिक्षा प्राप्त लोगों के द्वारा किये गए आवेदन पत्रों की संख्या कई गुणा अधिक है. खबर है कि डेढ़ लाख से अधिक आवेदन पत्र तो इंजीनियरिंग, बी०एस-सी० आदि किये लोगों ने भरे हैं जबकि 255 ऐसे व्यक्तियों ने आवेदन किया है जो पी-एच०डी० किये हुए हैं. यकीनन ये संख्या किसी भी रूप में हास्य का, नजरंदाज करने का मसला नहीं है वरन चिंता करने योग्य है. प्रदेश की सरकार को इस बारे में चिंतित होने की आवश्यकता है.
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यदि सम्पूर्ण देश के बजाय प्रदेश की रोजगार सम्बन्धी स्थिति पर निगाह डालें तो पाएंगे कि विगत कई वर्षों में प्रदेश सरकारों द्वारा रोजगार के अवसर सृजित नहीं किये गए हैं. अनेकानेक विभाग ऐसे हैं जहाँ दशकों से नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं. दर्जनों के हिसाब से पद खाली पड़े हैं. यदि उच्च शिक्षा को ही देखा जाये तो कई हजार पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं और आयोग द्वारा लगातार विज्ञापन निकालने के अतिरिक्त कोई दूसरा काम नहीं किया गया है. कुछ ऐसी स्थिति माध्यमिक में, प्राथमिक में देखने को मिल रही है. कमोवेश ऐसी स्थिति सभी विभागों में है. कहीं नियुक्तियाँ नहीं की जा रही हैं, कहीं नियुक्तियों में अनियमितताएँ हैं, कहीं नियमानुसार रिक्तियों को नहीं भरा जा सका है, कहीं अदालती आदेश के चलते भर्तियों पर रोक लगा दी गई है, कहीं-कहीं तो रिक्तियों को, नियुक्तियों को रद्द ही किया गया है, कहीं भ्रष्टाचार के चलते नियुक्तियों में अनियमितताएँ हैं तो कहीं भाई-भतीजावाद, कहीं जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि के चलते नियुक्तियाँ अधर में लटकी हुई हैं. हालात ये हैं कि स्थायी नियुक्तियाँ किये जाने के स्थान पर लगभग सभी जगहों पर मानदेय के रूप में, संविदा के रूप में, अंशकालिक रूप में, अस्थायी रूप में नियुक्तियाँ करके काम निपटाया जा रहा है. इस तरह से कार्य करते लोगों में जहाँ युवा बेरोजगार भी है वहीं सेवानिवृत्त कर्मचारी भी हैं. स्पष्ट है कि सरकारी स्तर पर इस तरह की नीति बनाई ही नहीं जा रही है कि प्रदेश के युवा बेरोजगारों को स्थायी रूप से रोजगार मिल सके.
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इतनी बड़ी संख्या में बेरोजगारी का होना, बेरोजगार युवाओं का होना दर्शाता है कि प्रदेश के आधारभूत ढाँचे में बहुत बड़ी खामी है. इस खामी को दूर करने का कार्य सरकार द्वारा किया नहीं जा रहा है और न ही युवाओं द्वारा इस तरह के प्रयास किये जा रहे हैं कि वे शिक्षा के क्षेत्र में उभरते माफियाराज को दूर करने का काम करें. कुकुरमुत्तों की तरफ जगह-जगह उग रहे बहुत से महाविद्यालयों, इंजीनियरिंग संस्थानों ने अपनी व्यवस्थाओं से शिक्षा व्यवस्था को जहाँ एक ओर खोखला सा किया है वहीं युवाओं को रसातल में भेजने का काम भी किया है. नक़लयुक्त शिक्षा व्यवस्था, अध्यापनशून्य वातावरण, कागजों पर प्रशिक्षित अध्यापक और वास्तविक में अप्रशिक्षित शिक्षकों का होना, शिक्षा व्यवस्था को व्यापार बना देना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके चलते शिक्षा संस्थानों ने बेरोजगारों की फ़ौज का निर्माण किया है. बड़ी-बड़ी, मोटी-मोटी रकम चुकाने के बाद भारी-भरकम डिग्री लेने के बाद भी ऐसे युवाओं का आधारभूत ज्ञान शून्य ही रहा, शिक्षा का उद्देश्य इनके लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी करना रहा सो लगातार बेरोजगारी की मार देश-प्रदेश को दे रहे हैं. स्पष्ट है कि यदि सरकार इस स्थिति के लिए दोषी है तो ये युवा जो उच्चतम शिक्षा लेने के बाद भी चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं, कम दोषी नहीं हैं.
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इसके अलावा जो बात अत्यंत महत्त्वपूर्ण है वो ये कि चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करने को रोजगार सम्बन्धी मजबूरी बताने वाले ये उच्च शिक्षा प्राप्त युवा बताएँगे कि वाकई बेरोजगारी की स्थिति इतनी भयावह है कि इनको चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करना पड़ा? या फिर इनकी डिग्री, शिक्षा इस स्तर की नहीं है कि कहीं उच्च स्तरीय रोजगार, नौकरी प्राप्त की जा सके? या फिर इन सबको सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी की चाह है और उसी की लालसा में, लोभ में चपरासी पद का आवेदन किया है? मीडिया में खबर आते ही तमाम लोग जिस तरह से सक्रिय होकर सरकार की, व्यवस्था की, बेरोजगारी की बुराई करने लगे थे उन सभी लोगों को इस तथ्य को भी गंभीरता से लेना होगा कि क्या ये युवा किसी निजी कंपनी में, निजी शिक्षा संस्थान में, किसी निजी कारखाने में ऐसा कोई काम नहीं कर सकते जो इनकी डिग्री-योग्यता पर के हिसाब से हो, इनकी डिग्री-योग्यता पर शोभित होता हो? चलिए मान भी लिया जाये कि प्रदेश में ढांचा इतना ख़राब हो गया है कि उच्च शिक्षित व्यक्ति की डिग्री-योग्यता के हिसाब से कोई नौकरी नहीं बची है या नहीं मिल रही है तो क्या ये युवा किसी दूसरे निजी संस्थान में चपरासी की ही नौकरी करने को तैयार होंगे? इसका उत्तर निश्चित रूप से ‘नहीं’ ही होगा. जिन युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण रहेगा, मेहनत के स्थान पर आराम वाली नौकरी की चाह रहेगी, बैठने को कुर्सी और पैर फ़ैलाने को मेज की तृष्णा रहेगी, शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की ललक न रहेगी, अव्यवस्था से लड़ने की जिम्मेवारी न रहेगी, विकास की राह बढ़ने की उत्कंठा न रहेगी तब तक ऐसे युवा सरकारी नौकरी के लिए, आरामतलबी के लिए चपरासी से नीचे के पद हेतु भी आवेदन करते मिलेंगे.

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