सामयिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सामयिक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

22 जून 2018

वाकई शो मस्ट गो ऑन


जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह जीवन भी दो पहलुओं में सिमटा हुआ है. दुःख और सुख का, हँसी और आँसू का, ख़ुशी और गम का सह-सम्बन्ध जीवन में सहज ही देखने को मिलता है. जीवन जितना सहज, खुशनुमा, सुरमयी दिखाई देता है उतना ही क्रूर, जटिल, दुखद भी है. दुःख-सुख के एकसाथ आने या फिर क्रमशः आने की अनिश्चितता के चलते जीवन को एक रंगमंच सरीखा माना गया है. कुछ भी हो जाये, कुछ भी होता रहे मगर जीवन-चक्र चलता ही रहता है. दुखों का साया हो या फिर खुशियों का आँचल जीवन की गति रुकती नहीं है. शो मस्ट गो ऑन की संतोषमयी अवधारणा के चलते इन्सान तमाम सारी समस्याओं, परेशानियों के सामने आने के बाद भी सतत आगे बढ़ता रहता है. इसे जीवन गति के आगे बढ़ाते जाने की मजबूरी समझी जाए या फिर इन्सान की जिजीविषा, जिसके चलते वह दुखों, कष्टों के सामने बने रहने के बाद भी सामान्य ढंग से जीवन-पथ पर आगे बढ़ता जाता है. देखने में आया है कि सहज भाव से जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है. दुखों, कष्टों, समस्याओं, परेशानियों के होने के बाद भी मनुष्य इस कारण से आगे बढ़ता रहता है क्योंकि उसके सामने सुखों, खुशियों के आने की सम्भावना बनी होती है.


सोचने वाली बात यह है कि कोई इन्सान जब अपनी पूरी क्षमताओं से खुशियों का आनंद उठाने में लगा हो ठीक उसी पल दुखों का साया उसे घेर ले, तब वह जीवन को किस तरह जीता है? दुखों की घड़ी आने के बाद भी उसे खुशियों भरे पल का निर्वहन करना है तब उसी मानसिकता क्या, कैसी रहती होगी? यह स्थिति विषम से भी अधिक विषम समझ आती है. एक तरफ दुःख के कारण पसरा मातम और दूसरी तरफ खुशियों के पल का निर्वहन. निश्चित ही जीवन की इसी अनिश्चितता के चलते व्यक्ति यदि कमजोर बनता है तो दूसरी तरफ यही अनिश्चितता उसे ताकत प्रदान करती है. यही अनिश्चितता उसे अतीत को विस्मृत करके वर्तमान में जीने का सन्देश देती है. सैद्धांतिक रूप से ऐसा कहना सहज होता है कि अतीत को भुलाकर वर्तमान में जीना चाहिए. यह कहना भी सरल होता है कि शो मस्ट गो ऑन, यह समझाना भी आसान होता है कि दुखों को भुलाकर खुशियों का स्वागत करना चाहिए मगर ऐसा करना तब बहुत मुश्किल होता है जबकि दुःख किसी अपने के जाने का हो. अपने मन को समझा पाना तब और भी कठिन होता है जबकि जाने वाला व्यक्ति आपका जन्मदाता हो. ऐसा करना तब और भी कठिन हो जब अतीत महज चंद घंटे पुराना हो. ऐसी स्थिति के बाद भी यदि व्यक्ति और पूरा परिवार हँसते-मुस्कुराते हुए दरवाजे खड़ी खुशियों का स्वागत कर रहा हो, सामने खड़े उल्लासित पल पर अतीत की छाया नहीं पड़ने दे रहा है तब समझ आता है कि वाकई इन्सान की जिजीविषा ही जीवन को गति प्रदान करती है. भविष्य की सुखद संकल्पना इसी की कोख से जन्म लेती है.

ऐसा कहीं और नहीं जब खुद सहना पड़ता है, अपने परिवार के साथ होना देखना पड़ता है तब शब्द मुस्कुराते हुए कहते हैं शो मस्ट गो ऑन मगर दिल अन्दर ही अन्दर आँसू बहा रहा होता है. बहुत बड़ा दिल चाहिए खुशियों भरे पल का स्वागत करने के लिए जबकि चंद घंटे पहले आपने अपने परिजन को खोया हो, किसी ने पत्नी को, किसी ने माँ को, किसी ने दादी-नानी को, किसी ने किसी और रिश्ते को. अपने परिवार में इस विषम स्थिति को, सुख-दुःख को एकसाथ सामने खड़े देखा. बहरहाल, दुःख का आना, किसी का जाना प्राकृतिक सत्य है, जीवन का क्रम है जिसे न तो भुलाया जा सकता है न ही टाला जा सकता है. इसके बाद भी वर्तमान की खुशियों का स्वागत करने की जीवटता, सामने खड़े सुखद पल को आत्मसात करने की मानसिकता, दुखों के साए पर खुशियों का आँचल ओढ़ाने की जिजीविषा जिस प्रकार देखने को मिली वह अनुकरणीय है. ऐसी जिजीविषा के लिए, ऐसी अदम्य जीवटता के लिए, वर्तमान को सुखद बनाने के साहस के लिए अपने परिवार को नमन, अपने परिजनों को नमन.

18 दिसंबर 2015

बच्चों की परवरिश पर ध्यान देने की आवश्यकता


समाज जिस तरह के एकांगी होता जा रहा है, उसका सर्वाधिक असर परिवार पर दिखाई दे रहा है. इसमें भी कहें कि परिवार के सबसे छोटी इकाई ‘बच्चों’ पर ये एकांगीपन सर्वाधिक दुष्प्रभाव डाल रहा है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी. देखने में आ रहा है कि बहुसंख्यक परिवारों ने अपने आपको सीमित कर रखा है. संयुक्त परिवार से बाहर निकल कर एकल परिवार और फिर उससे भी एक कदम आगे जाकर नाभिकीय परिवार सामने आने लगे हैं. ऐसे परिवारों के अस्तित्व में आने के बाद बच्चों के लालन-पालन सम्बन्धी अनेक समस्याओं से भी समाज को, माता-पिता को सामना करना पड़ा है. कई बार बच्चों की गतिविधियों को देखकर अभिभावकों को एहसास होता है कि क्या हम अपने बच्चों का लालन-पालन सही से नहीं कर पा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे उद्दण्ड, अनुशासनहीन होते जा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे माता-पिता के प्यार का नाजायज फायदा उठा रहे हैं? क्या माता-पिता बच्चों के बिगाड़ने में खुद प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं?
.
ये सवाल आये दिन, पल प्रति पल हमारे दिमाग में कौंधते रहते हैं. ऐसे सवालों का उभारना इसका संकेत है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य है. समाज में परिवार के बिखरते ढाँचे के कारण बच्चों की परवरिश की तरफ अभिभावकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा रहा है, जिसके चलते बच्चों में चिडचिड़ापन आता जा रहा है. यही कारण है कि अब समाज में आये दिन हम युवा, किशोरवय के लड़के-लड़कियों, मासूम बच्चों की असमय मृत्यु की खबरों को सुन रहे हैं. कहीं उनके द्वारा आत्महत्या किये जाने की खबर तो कहीं उनके द्वारा अपने साथी की हत्या किये जाने के बाद जान देने का मामला है. कहीं वे हताशा में आत्महत्या की तरफ मुड़ रहे हैं तो कभी नशे की हालत में बच्चे मृत्यु की तरफ जा रहे हैं तो कहीं किसी तरह के अपराधबोध के कारण ऐसा हो रहा है. बच्चों के साथ-साथ वर्तमान युवाओं की मनोदशा पर गौर किया जाये, किशोरवय के लोगों की मानसिकता को समझा जाये तो पता चलता है बहुतायत में ऐसे मामलों के पीछे प्यार में असफलता की, एकतरफा प्यार की कहानी छिपी होती है. ये अपने आपमें अचंभित करता है कि जिस उम्र में इन बच्चों को अपने कैरियर पर ध्यान देना चाहिए, रोजगार के लिए, भविष्य बनाने के लिए सचेत रहने की, जागरूक रहने की जरूरत है, उस समय वे नौनिहाल नशे का, अपराध का, हत्या का, आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं.
.
समस्या के आलोक में समझना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यहाँ अभिभावक गलत हैं अथवा बच्चे गलत हैं? ये जानकारी करनी होगी कि समाज उनको गलत दिशा दिखा रहा है अथवा परिवार उनका सही दिशा-निर्देशन नहीं कर पा रहा है? वर्तमान समय की आपाधापी में माता-पिता दोनों ही अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए जद्दोजहद करने में लगे हैं, साथ ही भौतिकतावादी दुनिया में दिखावे के लिए भी अभिभावकों द्वारा रहन-सहन को दिखावटी बनाए जाने की कवायद की जा रही है, जिसके चलते भी उनका एकमात्र मकसद धनोपार्जन रह जाता है. ऐसे में उनके द्वारा अपने बच्चों के लिए समय, स्नेह, प्यार आदि दे पाना सहज रूप से संभव नहीं हो पता है. मासिक रूप से भारी-भरकम जेबखर्च देने को, महंगी-महंगी बाइक, कार आदि उपलब्ध करवा देने को, एशो-आराम की सभी वस्तुओं की उपलब्धता को माता-पिता की प्यार भरी छाँव के रूप में नहीं देखा-समझा जा सकता है. इस स्थिति के दूसरे पहलू के रूप में विचार किया जाये तो बच्चे भी कम दोषी नहीं लगते हैं. बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सुविधानुसार सुख-सुविधा के सभी संसाधनों को उपलब्ध करवाए जाने के प्रयास किये जाते हैं. बच्चों की जायज, नाजायज मांगों को तुरंत स्वीकार कर लेना भी बच्चों में गलत सन्देश का बीजारोपण करता है. किशोरावस्था में बच्चों को सही-गलत को परिभाषित करना सहज नहीं होता है और वे अपने माता-पिता, परिवार से मिल रही आज़ादी को नकारात्मक रूप में देखने लगते हैं. सहज उपलब्ध स्थिति के चलते ही ऐसे बच्चों में कुछ भी सहजता से पा लेने की भावना घर करने लगती है और इसका दुष्परिणाम ये होता है कि ऐसे बच्चे किसी भी स्थिति में असफलता मिलने पर अपनी जान गँवा बैठते हैं अथवा सामने वाले की जान ले बैठते हैं.
.
ऐसे मोड़ पर जबकि समाज घनघोर संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, माता-पिता को अपने बच्चों के लालन-पालन में आरम्भ से ही इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि वे उनकी किसी भी तरह की नाजायज मांगों को न मानें. खुद किशोरावस्था के बच्चों को भी चाहिए कि वे समाज में सही-गलत को समझकर अपने माता-पिता की भावनाओं को सम्मान दें. बच्चों को समझना ही होगा कि दुनिया में कोई भी माता-पिता अपने स्तर पर अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते हैं और उसको अपनी सामर्थ्य भर प्रत्येक सुख-सुविधा उपलब्ध करवाने की कोशिश करते हैं. ऐसे में माता-पिता को अपने बच्चों को पर्याप्त समय देने की जरूरत है, उनकी आवश्यकताओं को सहज रूप में लेने की जरूरत है. माता-पिता का एक-एक पल, एक-एक कदम ही बच्चों को सही-गलत दिशा की तरफ ले जाता है.

.

07 नवंबर 2015

सहिष्णु बने रहने का अर्थ ज्यादती सहते रहना

देश में साहित्यकारों सहित अनेक लोगों को पुरस्कार/सम्मान वापस करते देखकर एहसास हुआ कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि असहिष्णुता यदि बढ़ी है तो पहले से देश में व्याप्त थी, तभी तो बढ़ी है, यदि पहले से अस्तित्व में न होती तो क्या बढ़ती. अब इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए कि जब पहले से असहिष्णुता थी तो किसके शासन में पैदा हुई और किसने इसे पैदा किया? यदि उसी समय उसके पैदा होते ही उसको समाप्त कर दिया गया होता तो शायद आज इतनी ज्यादा न बढ़ी होती और न ही साहित्यकारों सहित अनेक लोगों के लिए बवाले-जान बनती. दरअसल देश में सहिष्णुता, असहिष्णुता के मायने कभी कायदे से समझाए ही नहीं गए. महात्मा गाँधी के ‘एक गाल पर तमाचा खाने के बाद दूसरा गाल कर दो’ के सिद्धांत के चलते सहिष्णुता या सहनशीलता को सार्वभौमिक माना जाने लगा. इसके चलते स्वीकार कर लिया गया कि सामने वाला किसी भी हद तक बदतमीजी दिखाए, दुर्व्यवहार करे, अपमान करे किन्तु उसके प्रति सहिष्णु बने रहना है, सहिष्णुता दर्शाना है, सहनशीलता दिखाना है. यदि ऐसा न किया जा सका तो समाज के सामने दुर्व्यवहार सह रहा, अपमान सह रहा, बदतमीजी सह रहा व्यक्ति असहिष्णु हो जायेगा, असहिष्णुता को बढ़ावा देने लगेगा. स्पष्ट है कि यदि आप अपमान सहने का, बदतमीजी सहने का, दुर्व्यवहार सहने का माद्दा नहीं रखते हैं तो आप असहिष्णु हैं और इसके प्रतिरोध में आप कोई भी कदम उठाते हैं तो वे असहिष्णुता को बढ़ाते हैं, सहिष्णुता को कमजोर करते हैं.
.
इसके अलावा एक विशेष बात गौर करने वाली ये है कि पुरस्कार लौटाता वर्ग जिस असहिष्णुता की बात करने में लगा है, उसमें सहिष्णुता के पीछे अपने आप एक तरह की ज्यादती, दुर्व्यवहार छिपा हुआ है. सम्मान वापस करते लोगों ने असहिष्णुता बढ़ने का आधार बनाया है साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इखलाक की हत्याओं को. यदि इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि का अध्ययन कर लिए जाये तो सहजता से ज्ञात होता है कि इन सभी के कृत्यों में कहीं न कहीं एक किसी वर्ग विशेष के लिए नफरत, दुष्प्रचार आदि की भावना छिपी हुई थी. हालाँकि इसमें कोई दोराय नहीं कि कोई भी इस बात का समर्थन नहीं करेगा कि किसी भी ज्यादती का प्रतिरोध किसी की हत्या नहीं होती है तथापि इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बार-बार की नफरत, बार-बार के दुर्व्यवहार, बार-बार के अपमान के चलते कभी-कभी व्यक्ति उग्र स्वरूप अपना लेता है. संभवतः ऐसे हालातों में कुछ उपद्रवी तत्त्वों द्वारा, आपराधिक प्रवृत्ति वालों द्वारा कुत्सित मानसिकता अपनाकर आपराधिक कृत्य कर दिया गया. आखिर कभी ये समझाने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि सहनशीलता कब अपनाई जानी है? किसी व्यक्ति, वर्ग, समाज के सामने कौन-कौन से हालात उत्पन्न हों कि वो अपनी सहिष्णुता को त्यागकर असहिष्णु हो जाए? किसी घर में चोरी करने वाले चोर को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाये कि असहिष्णुता न बढ़ जाए? क्या किसी आपराधिक व्यक्ति को महज इसलिए छोड़ दिया जाये कि सहिष्णुता दिखानी है? किसी महिला के साथ शारीरिक दुराचार करते व्यक्ति को महज इस कारण छोड़ दिया जाना चाहिए कि कहीं समाज में असहिष्णुता न बढ़ने लगे? ऐसे ही अनेक सवालों के आलोक में पुरस्कार/सम्मान वापस करते लोग बताएँगे कि आखिर सहिष्णुता/असहिष्णुता का वास्तविक आधार क्या हो?

.
यदि कला के नाम पर देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये जाएँ और विरोध न किया जाये तो सहिष्णुता; यदि अन्धविश्वास दूर करने के नाम पर देवी-देवताओं की मूर्तियों पर पेशाब करने की बात की जाये और कोई कुछ न कहें तो सहिष्णुता; यदि धार्मिक भावनाओं के प्रभावित होने के नाम पर मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवा लिए जाएँ और अन्य वर्ग के धार्मिक कृत्य का शोर लगातार उठता रहे और कुछ न बोला जाये तो सहिष्णु माना जायेगा; यदि अपने आपको आधुनिक बताने के नाम पर बीफ पार्टियों जैसे कृत्य खुलेआम, सार्वजानिक रूप से किये जाएँ और सब कुछ शांत होकर देखा जाये तो सहिष्णुता बनी रहती है; मीटिंग करने के नाम पर शहीद स्मारक से तोड़फोड़ की जाती है मगर कोई कुछ न बोलता है तो वहाँ सहिष्णुता जन्म लेती है; एक राष्ट्र के नाम पर खुलेआम कत्लेआम होता है, आतंकवाद फैलाया जाता है और कोई आवाज़ न उठाये तो सहिष्णु समझा जाता है किन्तु जैसे ही इसमें से किसी भी या सभी कृत्यों के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दी जाती है तो देश में असहिष्णुता बढ़ने लगती है; लोग असहिष्णु होने लगते हैं; देश का वातावरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए नहीं रह जाता है. इसका सीधा सा तात्पर्य ये है कि असहिष्णुता का अर्थ तो यही हुआ कि हमने सहनशीलता की सीमारेखा को पार कर लिया है. आखिर ऐसा मौका ही क्यों दिया जाए कि किसी को सहनशीलता की सीमा पार करनी पड़ जाए? सोचो...!!
.

08 सितंबर 2015

अध्यापन-कार्य से विरक्ति


देश के जाने-माने शिक्षक और पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाये जाने की परम्परा का इस वर्ष भी पालन किया गया. लोगों द्वारा शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते देखकर सुखद एहसास हुआ. उन तमाम विद्यार्थियों द्वारा, जो आये दिन अपने शिक्षकों को अपमानित करने से नहीं चूकते हैं, उनको सम्मान करते देखा; उन तमाम महानुभावों के द्वारा, जो शिक्षकों को निठल्ला कहना अपना धर्म समझते हैं, शिक्षकों को माला पहनाते देखा गया; ऐसे अनेक लोगों द्वारा, जो शिक्षकों को हराम की कमाई खाने वाले’ कहकर अपमानित करते हैं, आज प्रशस्ति-पत्र देते देखा गया. कहने का तात्पर्य ये कि आज शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजनात्मक व्यवस्था चालू है. शिक्षक दिवस गुजरते ही शिक्षक के प्रति सम्मान भी गुजर जाता है. ऐसा लगता है जैसे समाज में किसी भी वर्ग के शिक्षक को एक नाकारा व्यक्ति समझ लिया गया है. यही कारण है कि आज के आधुनिक सोच वाले, भौतिकतावादी दौर में, रातों-रात अकूत सम्पत्ति पैदा करने की लालसा रखने वाले समाज में युवा शिक्षक नहीं बनना चाहता है; बहुतायत में ऐसे माता-पिता भी हैं जो अपनी संतानों को अध्यापक नहीं बनाना चाह रहे हैं.
.
वर्तमान व्यवस्था और जीवनशैली पर निगाह डाली जाये तो ये सबकुछ हम सबकी मानसिकता को परिलक्षित करता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी-भरकम पैकेज के बीच, आधुनिक साजो-सामान से लैस निजी कंपनियों के लुभावने आवरण के बीच युवा वर्ग की मानसिकता शिक्षक बनने की दिखती ही नहीं है, इसके अतिरिक्त घर-परिवार में भी इनको अध्यापन-कार्य हेतु प्रेरित भी नहीं किया जाता है. माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के दौरान ही अभिभावकों द्वारा अपनी संतानों के मन में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का बीजारोपण कर दिया जाता है. उनको बड़ी-बड़ी व्यावसायिक डिग्री के प्रति जागरूक किया जाता है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के बड़े-बड़े पैकेज लेने को प्रेरित किया जाता है. हालाँकि इस भौतिकतावादी व्यवस्था के बीच युवाओं में शिक्षक बनने की होड़ हाल-फ़िलहाल में दिखने लगी है तथापि इस होड़ के पीछे के कारण बहुत अलग हैं.
.
धन के पीछे भागती इस दुनिया में युवाओं में शिक्षक बनने की सोच, होड़ उस समय विकसित होती है जबकि तमाम रास्तों पर अवरोधक आने लगते हैं; नौकरी करने के, व्यवसाय करने के, बड़े-बड़े पैकेज मिलने के अवसर समाप्त से दिखने लगते हैं. यही कारण है कि इंजीनियरिंग सहित तमाम व्यावसायिक डिग्रीधारियों को आज प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनते देखा जा रहा है. दरअसल उनके शिक्षक बनने के पीछे का कारण उनकी अध्यापन-कार्य में आने की सोच या प्रेरणा नहीं वरन स्वयं को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना है. सोचा जा सकता है कि ऐसी मानसिकता में जो व्यक्ति इस क्षेत्र में आएगा वो अध्यापन-कार्य के साथ कितना न्याय कर पायेगा? विद्यार्थियों को शिक्षा के प्रति कितना संवेदित कर पायेगा? समाज में शिक्षकों के लिए कितनी सम्मानजनक स्थिति को बना पायेगा? सच्चाई तो ये है कि आज न तो युवा-वर्ग में शिक्षक बनने के प्रति जागरूकता है और न ही अभिभावकों द्वारा उनको इसके लिए प्रेरित किया जाता है. ऐसी स्थिति में महज धनोपार्जन के लिए बने शिक्षकों से उत्कृष्टता की उम्मीद रखना बेमानी ही है. और शायद यही कारण है कि शिक्षा का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है, समाज में शिक्षकों के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है, विद्यार्थियों में नैतिकता का ह्रास होता जा रहा है. अभिभावकों को इसके लिए जागना होगा, यदि उनको अपने बच्चों को के लिए बेहतर शिक्षा चाहिए है तो शिक्षण संस्थानों में उत्कृष्ट शिक्षकों का होना अनिवार्य है. किसी को तो अपने बच्चों में मात्र धनार्जन के नहीं वरन शिक्षा देने के संस्कार पैदा करने होंगे, शिक्षक बनने के गुण विकसित करने होंगे. यदि ऐसा नहीं होता है तो हम शिक्षा के क्षेत्र से बहुत जल्द नैतिकता को तिरोहित कर देंगे, समाज में उत्कृष्ट शिक्षकों का शून्य खड़ा कर देंगे. ये न केवल वर्तमान के लिए अपितु भविष्य के लिए भी खतरनाक है.

.

03 जुलाई 2015

दोष किसका, दोषी कौन


क्या हम अपने बच्चों का लालन-पालन सही से नहीं कर पा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे उद्दण्ड, अनुशासनहीन होते जा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे माता-पिता के प्यार का नाजायज फायदा उठा रहे हैं? क्या माता-पिता बच्चों के बिगाड़ने में खुद प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं? क्या समाज का, तकनीक का, आधुनिकता का नकारात्मक प्रभाव बच्चों की परवरिश पर पड़ रहा है? ऐसे और भी सवाल हैं जो आये दिन, पल प्रति पल हमारे दिमाग में कौंधते रहते हैं और इनका जवाब पाने के लिए हम बहुत ज्यादा प्रयत्नशील नहीं दिखते हैं. इन सवालों का कौंधना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं, कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य हो रहा है और उस गड़बड़ को कोई समझने की कोशिश भी नहीं कर रहा है. आये दिन हम युवा, किशोरवय के लड़के-लड़कियों की असमय मृत्यु की खबरों से दो-चार हो रहे हैं. कहीं उनके द्वारा आत्महत्या किये जाने की खबर है तो कहीं उनके द्वारा अपने साथी की हत्या किये जाने के बाद जान देने का मामला है. कहीं वे हताशा में आत्महत्या की तरफ मुड़ रहे हैं तो कहीं उनकी लापरवाही उनको मृत्यु की तरफ ले जा रही है. कभी नशे की हालत में इस आयुवर्ग के बच्चे मृत्यु की तरफ जा रहे हैं तो कहीं ऐसा उनके द्वारा किसी अन्य तरह के अपराधबोध के कारण ऐसा किया जा रहा है. इसके अलावा यदि गौर किया जाये तो बहुतायत में ऐसे मामलों के पीछे प्यार में असफलता की, एकतरफा प्यार की कहानी छिपी मिलती है. ये अपने आपमें अचंभित करने वाला विषय है कि जिस उम्र में लड़के-लड़कियों को अपने कैरियर पर ध्यान देना चाहिए, अपनी नौकरी के लिए, रोजगार के लिए, भविष्य बनाने के लिए सचेत रहने की, जागरूक रहने की जरूरत है, उस समय वे युवा नशे का, अपराध का, हत्या का, आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं.
.
समस्या के आलोक में समझना होगा कि आखिर गलती किस पक्ष से है? आखिर गलती क्यों हो रही है? क्या अभिभावक गलत हैं अथवा बच्चे गलत हैं? समाज उनको गलत दिशा दिखा रहा है अथवा परिवार उनका सही दिशा-निर्देशन नहीं कर पा रहा है? वर्तमान समय की आपाधापी में देखा जाये तो बहुतायत में माता-पिता दोनों ही अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए जद्दोजहद करने में लगे हैं. इसके अलावा बहुत से अभिभावक ऐसे हैं जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ धन कमाना रह गया है और इसके पीछे उनका कुतर्क अपने बच्चों की परवरिश की खातिर ऐसा करने का दिया जाता है. ये सच हो सकता है कि आज के दौर में बच्चों का लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन आदि अत्यंत मंहगा होता जा रहा है. साथ ही साथ भौतिकतावादी दुनिया में दिखावे के लिए भी अभिभावकों द्वारा रहन-सहन को दिखावटी बनाए जाने की कवायद की जा रही है, जिसके चलते भी उनका एकमात्र मकसद धनोपार्जन रह जाता है. ऐसे में उनके द्वारा अपने बच्चों के लिए समय, स्नेह, प्यार आदि दे पाना सहज रूप से संभव नहीं हो पता है. मासिक रूप से भारी-भरकम जेबखर्च देने को, महंगी-महंगी बाइक, कार आदि उपलब्ध करवा देने को, एशो-आराम की सभी वस्तुओं की उपलब्धता को माता-पिता की प्यार भरी छाँव के रूप में नहीं देखा-समझा जा सकता है. और ऐसी स्थितियों में बच्चों में अपने माता-पिता के प्रति एक तरह का नकारात्मक भाव पनपने लगता है और यही स्थिति शनैः-शनैः विकराल रूप धारण करने लगती है.
.
इस स्थिति के दूसरे पहलू के रूप में विचार किया जाये तो बच्चे भी कम दोषी नहीं लगते हैं. बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सुविधानुसार सुख-सुविधा के सभी संसाधनों को उपलब्ध करवाए जाने के प्रयास किये जाते हैं. उनके द्वारा अपने बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार से पाला जाता है, उस लाड़-प्यार का घड़ी-घड़ी अनावश्यक प्रदर्शन भी किया जाता है. इसके अलावा बच्चों की जायज, नाजायज मांगों को तुरंत स्वीकार कर लेना भी बच्चों में गलत सन्देश का बीजारोपण करता है. किशोरावस्था में बच्चों को सही-गलत को परिभाषित करना सहज नहीं होता है और वे अपने माता-पिता, परिवार से मिल रही आज़ादी को नकारात्मक रूप में देखने लगते हैं. जेबखर्च के रूप में मिलती भारी-भरकम रकम, तकनीकी के साथ चलने देने की अहंकारी दशा के चलते महंगी कार, बाइक, मोबाइल आदि के शौक बच्चों में सहजता से विकसित होते देखे जा सकते हैं. सहज उपलब्ध स्थिति के चलते ही ऐसे बच्चों में कुछ भी सहजता से पा लेने की भावना घर करने लगती है और वे ऐसा वस्तुओं के साथ-साथ इंसानों के लिए भी विचार करने लगते हैं. दुष्परिणाम ये होता है कि ऐसे बच्चे ही एकतरफा प्यार में असफल रहने पर अपनी जान गँवा बैठते हैं अथवा सामने वाले की जान ले बैठते हैं.
.
ऐसे मोड़ पर जबकि समाज घनघोर संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ माता-पिता इस खौफ के साथ जीते हैं कि उनकी औलाद कहीं कुछ गलत न कर बैठे; बच्चे इस ठसक के साथ अपनी जिंदगी को गुजारते हैं कि ऐसा करना तो उनके माता-पिता का फ़र्ज़ है, ऐसा करके वे कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. जब इस तरह की मानसिकता समाज में परिवारों में, अभिभावकों में, बच्चों में विकसित हो जाएगी तो संबंधों का सहज निर्वहन संभव नहीं दिखता है. ऐसे में माता-पिता को अपने बच्चों के लालन-पालन में आरम्भ से ही इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि वे उनकी किसी भी तरह की नाजायज मांगों को न मानें. खुद किशोरावस्था के बच्चों को भी चाहिए कि वे समाज में सही-गलत को समझकर अपने माता-पिता की भावनाओं को सम्मान दें. बच्चों को समझना ही होगा कि दुनिया में कोई भी माता-पिता अपने स्तर पर अपने बच्चों का बुरा नहीं चाहते हैं और उसको अपनी सामर्थ्य भर प्रत्येक सुख-सुविधा उपलब्ध करवाने की कोशिश करते हैं. फिर भी यदि ऐसे हालातों पर विचार करें तो प्रथम दृष्टया ज्ञात होता है कि ऐसे में माता-पिता ही सर्वाधिक दोषी हैं, उनको अपने बच्चों को पर्याप्त समय देने की जरूरत है, उनकी जरूरतों को समझने की आवश्यकता है, उनकी आवश्यकताओं को सहज रूप में लेने की जरूरत है. माता-पिता का एक-एक पल, एक-एक कदम ही बच्चों को सही-गलत दिशा की तरफ ले जाता है.

.

25 मई 2015

सोशल मीडिया की स्वतन्त्रता और भेदिया बनते हम

दिन प्रतिदिन सोशल मीडिया अपना विस्तार करता हुआ तेजी से आमजन के बीच पैठ बनाता जा रहा है। इसके माध्यम से अपने भावों की, अपने विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होने के कारण भी इसे लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है। अपनी इस विशिष्टता के कारण सोशल मीडिया ने वैचारिकी को प्रमुखता दी और लोगों को मुखर बनाया। यही कारण है कि किसी समय विचारों के प्रसारण हेतु लोगों को मंच की तलाश रहती थी, जो आज समाप्त हो गई है। अब न किसी संस्थान की जरूरत, न किसी सम्पादक की मनमर्जी का सवाल, न विचारों पर किसी तरह के प्रतिबंध का डर। अब व्यक्ति पूरी स्वतन्त्रता के साथ अपने विचारों का प्रकटीकरण कर रहा है। अब उसके सामने किसी तरह का अवरोधक नहीं है। अब उसे अपने विचारों के प्रकाशन हेतु किसी तरह का इंतजार नहीं करना पड़ रहा है। एक व्यक्ति पूरी तन्मयता से अपनी वैचारिकी का प्रदर्शन करते हुए अपने लिए नवीन क्षितिज तलाश रहा है। विचार स्वतन्त्रता के इस दौर में ऐसे मंचों ने जहाँ किसी व्यक्ति को असीमित आसमान देकर सम्भावनाओं के नये द्वार खोले हैं, वहीं निर्द्वन्द्व रूप से एक तरह का घातक हथियार भी थमा दिया है। 

सोशल मीडिया के स्वतन्त्र मंच ने अभिव्यक्ति को सहज, सरल बनाया तो लोगों ने अपनी रुचियों को स्थापित करने का रास्ता तलाशा। इसके चलते साहित्य, कला, संस्कृति, संगीत आदि से लोगों का सहज परिचय होने लगा। दुर्लभ सामग्रियों के सामने आने के बहाने मिले साथ ही लोगों ने अव्यवस्थाओं के विरुद्ध एकजुट होना शुरू किया। शासन, प्रशासन की अच्छाइयों को सराहा तो उनकी कमियों को भी दर्शाया। सरकार के कार्यों की प्रशंसा हुई तो उसकी बुराई भी की गई। ऐसे हालातों में सोशल मीडिया पर मिली स्वतन्त्रता अपने साथ एक अजब तरह की नकारात्मकता लेकर आई, जिसके साथ एक देशव्यापी खतरा भी साथ आता दिखा। लोगों द्वारा स्वतन्त्रता के अतिउत्साह में वैचारिकी के साथ-साथ इस तरह की कमियों को सामने रखना शुरू कर दिया जो किसी भी रूप में समाजहित में नहीं कही जा सकती। सरकार, शासन, प्रशासन से सम्बन्धित लोगों ने इधर-उधर से, गोपनीय ढंग से जानकारी लेकर उसको सोशल मीडिया पर प्रकट करने का कार्य किया। सरकारी आँकड़ों, खबरों को तोड़मरोड़ कर विकृत, भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया गया। धर्म, जाति को आधार बनाकर अन्य दूसरे धर्मों, जातियों पर टिप्पणी करने का काम किया गया। समाज के किसी भी वर्ग की स्थिति, उसकी क्षमताओं, जीवनशैली, कार्यक्षमताओं आदि को लेकर भी नकारात्मकता दर्शायी गई। और तो और व्यक्तियों द्वारा अपने स्वयं के जीवन की अंतरंगता को सामने रखा गया, पति-पत्नी के बीच की गोपनीयता को  सार्वजनिक किया गया, रिश्तों की मर्यादा को भूल उन्हें कलंकित करने का कार्य किया गया। एकबारगी को ये सारा काम सक्रियता का सूचक समझ आता हो, भले ही ये सब व्यक्तियों की जागरूकता का पैमाना समझा जा रहा हो, हो सकता है इसे तकनीकी विकास की स्वतन्त्रता का मानक समझ लिया गया हो किन्तु जानकारी के स्तर पर, सूचनाओं के स्तर पर यह किसी खतरे से कम नहीं है। 

हो सकता है कि बहुत से लोगों को ये कपोलकल्पना जैसा लगे किन्तु यदि गम्भीरता से समूची बात को समझा जाये तो एहसास होगा कि किस तरह हम अनजाने अपने देश की, अपने शासन की, अपने समाज की, अपने परिवार की, अपने आपकी सूचनाओं को विदेशी हाथों में सहजता से पहुँचा रहे हैं। शायद हम सभी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित होंगे कि सोशल मीडिया के ऐसे तमाम मंचों का संचालन विदेश से ही हो रहा है। सम्भव है कि उनके द्वारा उनके तमाम उपभोक्ताओं का कोई डाटाबैंक गोपनीय रूप से तैयार किया जा रहा हो, जिसका कि वे स्वार्थ हेतु अध्ययन कर रहे हों। सोशल मीडिया पर पोस्ट किसी भी सामग्री को विदेशी प्रस्तोता अपने ढंग से प्रयोग कर सम्बन्धित समाज की जानकारी हासिल कर लेता हो। हम सब मुफ्त मिली स्वतन्त्रता और मुफ्त मिले मंच के द्वारा अनायास ही चित्रों, विचारों, तथ्यों द्वारा जानकारी, सूचना आदि विदेशियों को उपलब्ध कराते जा रहे हैं। किसी भी समाज, किसी भी देश, किसी भी व्यक्ति, किसी भी सरकार को कमजोर साबित करना हो, उसे परास्त करना हो तो उससे सम्बन्धित समस्त सूचनाएँ, जानकारियाँ एकत्र कर लेनी चाहिए। सोचने वाली बात है कि कहीं सोशल मीडिया के द्वारा विदेशी देश ऐसा ही तो नहीं कर रहे? कहीं हम सब विचाराभिव्यक्ति के अतिउत्साह में स्वयं ही तो सभी सूचनाएँ, जानकारियाँ विदेश तो नहीं भेजे दे रहे? सोशल मीडिया पर मिली निर्बाध स्वतन्त्रता के पीछे कारण कुछ भी हो किन्तु हम सभी को ये विचार करना होगा कि सबकुछ पोस्ट कर देने, प्रचारित कर देने की लालसा में हम विदेशों के लिए जासूसी तो नहीं किए जा रहे? सजग होना, सजग रहना  आज के  दौर में अत्यावश्यक है, इस तथ्य को समझने की जरूरत है।

28 अप्रैल 2015

संवेदनहीनता बनी मौत का कारण


जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में एक व्यक्ति की मृत्यु की खबर नेपाल में आये भूकम्प के कारण ठन्डे बक्से में डाल दी गई हैं. संवेदनहीनता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या मिलेगा कि एक व्यक्ति पेड़ पर चढ़कर आत्महत्या करने का उपक्रम करने में लगा हो और दूसरी तरफ भीड़ का हिस्सा बने लोग उसका वीडियो बनाने में, फोटो खींचने में मस्त हों. नेता मंच से भाषण दिए जा रहे हों, पुलिस शांति से समूचा तमाशा देखने में लगी हो, ये संवेदनशीलता तो प्रदर्शित नहीं करता है. व्यक्ति ने आत्महत्या की अथवा असावधानी में उसके द्वारा बनाये गए फंदे से उसकी मौत हो गई; किसी दवाब में उसने ऐसा किया या किसी ने ऐसा करने को उकसाया; वो वाकई लाचार-परेशान किसान था अथवा राजनीति में अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा था आदि-आदि नजरिये से इस घटना को देखा जा सकता है किन्तु एकमात्र सत्य यही है कि एक व्यक्ति की मौत सैकड़ों लोगों के सामने हो गई, एक राज्य के मुख्यमंत्री के सामने हो गई.

ऐसे में इस मौत का जिम्मेवार किसे माना जायेगा? क्या वह व्यक्ति जिम्मेवार है जो बिना आगा-पीछा सोचे इस तरह का कृत्य करने में लगा था? क्या वो भीड़ जिम्मेवार है जो समूचे घटनाक्रम को एक तमाशे की तरह देख रही थी? या पुलिस प्रशासन जिम्मेवार है जो उस व्यक्ति को बजाय पकड़ने के चुपचाप खड़ा देख रहा था? या फिर कि वो मुख्यमंत्री, वो पार्टी जिम्मेवार है जिसकी रैली में आया व्यक्ति उन्हीं के सामने आत्महत्या जैसा कृत्य करने के लिए पेड़ पर चढ़ जाता है? गंभीरता से इन सवालों को समझने की आवश्यकता है क्योंकि ये एक हादसे में हुई मृत्यु नहीं है, असावधानी में हुई मौत नहीं है वरन कहीं न कहीं समाज में पनप रही संवेदनहीनता की परिचायक है.

इधर विगत कुछ वर्षों से युवाओं में राजनीति के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा हुआ है. जल्द से जल्द आलाकमान की निगाह में आने की लालसा कुछ भी कर गुजरने को प्रेरित करती है. ऐसा ही कुछ गजेन्द्र के साथ भी हुआ. उसने अपनी राजनैतिक महत्त्वकांक्षा के चलते विगत एक दशक में चार राजनैतिक दलों की यात्रा कर डाली, और तो और विधानसभा चुनाव में हाथ भी आजमाया डाला. संभव हो कि उस व्यक्ति ने अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने, आलाकमान की निगाह में आने के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो और उसके अतिशय उत्साह में हुई एक असावधानी ने उसको मृत्यु के आगोश में पहुँचा दिया.

इसके अतिरिक्त आम आदमी पार्टी के नेताओं की, मंचस्थ मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री सहित अनेक नेताओं की भूमिका को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता है. वर्तमान में वे आन्दोलनकारियों का जत्था नहीं वरन दिल्ली की सरकार के रूप में स्थापित हैं. साथ ही वो रैली खुद आम आदमी पार्टी ने बुलाई थी, जिसमें पार्टी के चंद नेता ही नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री भी वहाँ उपस्थित थे. ऐसे में किसी भी व्यक्ति का आत्महत्या करने का ऐलान करते हुए पेड़ पर चढ़ जाना, अपने गमछे का फंदा बनाकर गले में डाल लेना आदि नकारने योग्य स्थितियां नहीं हैं. सरकार होने के नाते, रैली के आयोजक होने के नाते आम आदमी पार्टी की जिम्मेवारी बनती थी कि वो पूरी कड़ाई से उस व्यक्ति को पेड़ से नीचे उतारने के आदेश पुलिस प्रशासन को देते. इसके उलट पार्टी के नेता मंच से महज अपील सी करते रहे और बार-बार केंद्र सरकार, राज्य सरकार के सम्बन्धों का रोना रोते रहे.

ऐसा नहीं है कि जंतर-मंतर पर हुई मृत्यु ही सामाजिक संवेदनहीनता की एकमात्र परिचायक है वरन इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ, दुर्घटनाएं इस तरह की सामने आती रही हैं जिनमें समाज के संवेदनहीन होने के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित हुए हैं. सड़क दुर्घटनाओं में, कहीं सुनसान में, अनजान व्यक्ति के साथ होने वाली किसी भी विषम स्थिति में लोगों का उस घटना से बचकर निकलना आम बात बनी हुई है. जंतर-मंतर पर हुई उस मौत को किसी किसान द्वारा की गई आत्महत्या बताने से किसी की लापरवाही पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है. भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए सभी राजनैतिक दलों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, समाज को संवेदित करने की आवश्यकता है, लोगों को यथोचित राजनैतिक मूल्यों को समझाए जाने की आवश्यकता है. 

.