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01 अप्रैल 2018

है अजर, अमर ये कालपी




बुन्देलखण्ड का प्रवेश द्वार, है शान हमारी कालपी. 
है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी.
माँ वनखंडी औ वेद व्यास का सम्मान हमारी कालपी.
है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी.
 
भव्य भास्कर जिस धरती पर, सबसे पहले आते हों,
पावन यमुना के आँचल में, खेत जहाँ लहलहाते हों,
उस अलौकिक पावनता की, पहचान हमारी कालपी.
है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी.

 
ज़र्रा-ज़र्रा जहाँ महकता, शौर्य और बलिदान से,
जो मिट्टी ज्वाला बन दहकी, वीरों के अभिमान से,
आज़ादी के अफसानों का, गान हमारी कालपी.
है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी.

गुझिया-हलवे की मिठास ने प्रेम का रस बिखराया है,
धर्म-कर्म में एक बने सब, अंतर को बिसराया है,
कभी आरती और कभी है अजान हमारी कालपी.
है अजर, अमर ये कालपी, है अजर, अमर ये कालपी.

31 मार्च 2018

विरासत हमारी पहचान है


हमारी अपनी विरासत से जुड़ा कोई भी आयोजन उस विरासत से नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए, उस विरासत के बारे में नई पीढ़ी को बताने के लिए किया जाता है. इन आयोजनों का उद्देश्य महज मनोरंजन नहीं बल्कि उन सभी लोगों को जागरूक करना होता है जो किसी न किसी रूप में अपनी विरासत को भूलते जा रहे हैं. हम सभी जिस तरह से अपनी संस्कृति का, अपनी विरासत का गर्व करते हैं उसके सापेक्ष कई बार लगता है कि हम ही अपनी संस्कृति को नष्ट करते जा रहे हैं. अपनी विरासत को मिटाते जा रहे हैं. पुरानी पीढ़ी तो किसी न किसी रूप में खुद को इस विरासत से जोड़े हुए है मगर नई पीढ़ी के बहुतायत लोगों को न अपनी संस्कृति से मतलब है और न ही अपनी विरासत बचाए रखने की इच्छा है. वे अपनी विरासत के बारे में जानना-सुनना भी पसंद नहीं कर रहे हैं. ऐसे में उनसे इसके संरक्षण की अपेक्षा करना ही बेमानी होगा. यही कारण है कि आज बहुत से स्मारकों में, इमारतों में, ऐतिहासिक भवनों में न केवल गन्दगी दिखाई दे रही है बल्कि उनमें क्षरण भी दिख रहा है. वीरान, सुनसान में बने ऐसे स्मारकों में, इमारतों, भवनों में अराजक युवाओं के उपद्रव देखे जा सकते हैं. देर शाम वहाँ उनकी ऐय्याशी के कारनामे देखे जा सकते हैं. इसके अलावा इमारतों में खुदे कथित प्रेमी-प्रेमिकाओं के नाम, कोयले या किसी अन्य सामग्री से लिखे गए अश्लील वाक्य भी अपनी विरासत के प्रति हमारी असंवेदनशीलता का परिचायक हैं.


हम सभी को ध्यान रखना चाहिए कि यही विरासत है जो हम से हमारा परिचय करवाती है. यदि आने वाले समय में हम अपनी विरासत को भुला देंगे तो इसका अर्थ होगा कि हम अपने ही व्यक्तित्व को भुला रहे हैं, अपने अस्तित्व को मिटा रहे हैं. संभव है कि आज की आधुनिक जिंदगी की चकाचौंध में नई पीढ़ी को धनार्जन से फुर्सत न मिले मगर कल को उनके अस्तित्व के लिए उनकी विरासत का जिंदा रहना अत्यावश्यक है. जिस तरह से हमारी भौतिकतावादी जीवनशैली के लिए धन आवश्यक है उसी तरह हमारे अपने परिचय, अपनी पहचान के लिए हमारी विरासत का जीवित रहना अनिवार्य है. बिना विरासत हम सभी की स्थिति ठीक उसी तरह से होगी जैसे कि बिना जड़ के किसी पौधे की हो सकती है. स्पष्ट है कि जैसे बिना जड़ के किसी पौधे का पनपना, बढ़ना संभव नहीं ठीक उसी तरह से किसी इन्सान का बिना उसकी विरासत के विकास करना संभव ही नहीं. इसलिए न केवल अपने वर्तमान के लिए वरन अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य के लिए हम सभी को अपनी विरासत सुरक्षित रखने की आवश्यकता है. उसे पल्लवित, पुष्पित, संरक्षित करने की आवश्यकता है.

27 जनवरी 2018

कुछ कहता है गाँव का वो बूढ़ा घर

यादें जिंदगी को तरोताजा रखने का काम करती हैं बशर्ते इन्सान उनमें खुशियाँ तलाशने का काम करे. यादों में खुशियों के साथ-साथ ग़मों का भी समावेश होता है और इन्सान जब यादों के सफ़र पर निकलता है तब यह उसकी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह खुशियों में या गम में रहना चाह रहा है. आज यादों का पिटारा लेकर गाँव की यात्रा पर जाना हुआ. ऐसा नहीं कि गाँव की ये कोई पहली यात्रा थी. इससे पहले भी कई बार गाँव जाना हुआ. गाँव में खूब रहना हुआ. गाँव में घूमना-फिरना भी हुआ. पिछले एक दशक से अधिक समय में जब-जब गाँव जाना हुआ, तब-तब वहां से जुडी यादें वहां पहुँचने के पहले दिल-दिमाग पर हावी होकर पुरानी बातों का स्मरण करवा देती.


आज गाँव जाने का अवसर कुछ धार्मिक, पारिवारिक कृत्य से जुड़ा हुआ था. पारिवारिक धार्मिक मान्यताओं से जुड़े कार्यों को पूरा करवाने के बाद गाँव में अपने पैतृक मकान के दर्शन करने चल दिए, समस्त परिजनों संग. कुछ वर्षों पहले परिवार में शामिल हुए कुछ नए सदस्यों, जो परिवार की बहुओं के रूप में शामिल हुई थीं और कुछ मासूम से नन्हे सदस्य जो अपने जन्म के द्वारा परिवार से जुड़े, उन लोगों का अपने गाँव जाने का, गाँव के पैतृक मकान के दर्शन का पहला अनुभव था. पिछले एक दशक से अधिक का समय हो चूका है जबकि पैतृक आवास को निर्जन छोड़ दिया गया है. अपने परिजनों के चले जाने के एहसास ने ईंट-गारे के उस मकान को भी आहत किया होगा, तभी धीरे-धीरे उसने अपने आपको कमजोर काना शुरू कर दिया. इसके बाद भी उसके आँगन, उसकी दीवारें, उसकी छत, उसका मैदान, उसके पेड़-पौधे बराबर उन दिनों की याद दिलाते रहे जबकि हम सब बालरूप में उस घर की जमीन पर धमा-चौकड़ी मचाया करते थे.



घर की जर्जर होती दीवारों को छूकर उसी एहसास को अपने अन्दर उतारने की कोशिश हरबार की जाती थी, आज भी की गई. हर बार लगता था कि वो बूढ़ा घर, जिसने हमारे दादा, परदादा को अपने आगोश में खेलते देखा है कुछ कहना चाहता है. उसके निःशब्द संबोधन को, स्वर को सुनने की, समझने की चेष्टा हर बार की गई. समझने के बाद भी, उसका कहा सुनने के बाद भी उस पैतृक आवास के प्रति अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन नहीं कर सके. अभी भी उसके प्रति एक जिम्मेवारी है मगर अधूरी ही बनी हुई है. कोशिश होगी कि जल्द ही उस जर्जर होती काया को कुछ एहसासों के साये में, यादों की सुखद स्मृतियों में फिरसे सजीव किया जाये ताकि कल को उस आवास के आँगन में खड़े होकर यादों के जंगल में विचरण करते समय बबूल के वे काँटे न चुभें जो आज उस आँगन में बेतरतीब से खड़े हो चुके हैं.