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08 जनवरी 2021

अभिभावक जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा

इन दिनों बिटिया रानी के टेस्ट चल रहे हैं. पढ़ाई की तरह टेस्ट भी ऑनलाइन हो रहे हैं. इससे पहले छमाही परीक्षा भी ऑनलाइन ही हुई थी. वैसे यदि ऑनलाइन न कह कर उस परीक्षा और इस टेस्ट को वर्क फ्रॉम होम जैसी स्थिति कहें तो ज्यादा अच्छा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इन दोनों परीक्षाओं के लिए स्कूल से कॉपी मिल गईं थीं. सम्बंधित विषय के पेपर वाले दिन ऑनलाइन पेपर आ जाता स्कूल की वेबसाइट पर या फिर व्हाट्सएप्प ग्रुप पर. पेपर आता ठीक उसी समय जो समय पेपर शुरू होने का होता. विद्यार्थी समय के भीतर पेपर करे, इसका ध्यान अभिभावक को तो रखना ही होता, साथ ही स्कूल से एक व्यवस्था की गई थी, जिसके कारण निर्धारित समय के बाद कोई विद्यार्थी पेपर नहीं कर सकता था.


निश्चित समयावधि में अपना पेपर करने के बाद अगले दस-पंद्रह मिनट में सभी विद्यार्थियों को अपनी उत्तर-पुस्तिका की फोटो खींच उसकी पीडीएफ बनाकर सम्बंधित विषय के अध्यापक को भेजनी होती है. इसके लिए भी एक समय निर्धारित किया गया है. इसके बाद आने वाली उत्तर-पुस्तिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाता है. इससे जब विद्यार्थियों द्वारा स्कूल में अपनी सभी विषयों की उत्तर-पुस्तिकाएँ जमा की जायेंगीं तो उनके द्वारा भेजी गई पीडीएफ से उसका मिलान करके आसानी से पता लगा लिया जायेगा कि बच्चों ने समय के बाद तो पेपर नहीं किया है. ऐसी परीक्षा में नक़ल किये जाने की पूरी सम्भावना होती है क्योंकि स्कूल द्वारा किसी भी तरह से कैमरे वाली व्यवस्था न करते हुए अभिभावकों को ही निरीक्षक की भूमिका में बनाया हुआ था. ऐसे में अभिभावकों पर निर्भर करता था कि वे बच्चों से किस तरह की अपेक्षा रखते हैं.  




हम भी निश्चित समय पर पेपर निकाल कर बिटिया रानी को देकर अपनी भूमिका में आ जाते. शिक्षा विभाग से जुड़े होने के कारण हमें स्वयं में ही एक तरह की पारदर्शिता, ईमानदारी बरतनी थी, अपनी बेटी के सामने एक आदर्श उपस्थित करना था. इसे संयोग कहा जाये या फिर पारिवारिक माहौल, न तो बिटिया ने किसी दिन कुछ पूछा और न ही परिवार में किसी ने किसी भी तरह से मदद करने की सोची. छमाही परीक्षाओं की कॉपी की पीडीएफ बनाते समय एक दिन देखा कि एक कॉपी में कुछ सवालों के जवाब छूटे हुए हैं. हमने उसी समय बिटिया से पूछा कि ये सवाल क्यों नहीं किये? उसने सहज भाव से जवाब दिया कि आये नहीं. उसके इस जवाब के मिलते ही अगले पल विचार किया कि हम सभी परिजन तो अपनी ईमानदारी भरी भूमिका निभा रहे हैं, एक बार बिटिया रानी के मन की थाह भी ले ली जाये. उससे कहा कि अरे, अपनी किताब से या नोट-बुक से देख लेती इनके जवाब. बिना एक पल की देरी किये उसने जवाब दिया कि पापा, ये तो चीटिंग हो जाती और चीटिंग करना बुरी बात है. उसके जवाब को सुनकर लगा कि अभी तक संस्कार, शिक्षा गलत दिशा में नहीं ले जा रहे उसे.


नंबर रेस में शामिल होने के लिए कभी भी उस पर दवाब नहीं बनाया. पढ़ने का अनावश्यक बोझ भी कभी नहीं डाला गया. नैसर्गिक रूप से उसके विकास के प्रति हमेशा सजगता दिखाई. ऐसे में नक़ल के प्रति उसकी मनोभावना देखकर ख़ुशी के साथ गर्व भी महसूस हुआ. उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण प्रतिवर्ष अभिभावकों को ही अपने बच्चों को अधिक से अधिक अंक दिलवाने के लिए परेशान होते देखते हैं. कभी प्रैक्टिकल के नाम पर, कभी कॉपी जाँचने के समय सिफारिश के साथ लगातार भटकने की स्थिति देखकर लगता है कि हम अभिभावक ही अपनी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद करने में लगे हुए हैं. एक बार अभिभावक ही जाग जाये तो विद्यार्थी स्वतः ही जाग जायेगा, सजग, सतर्क हो जायेगा.


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वंदेमातरम्

06 जनवरी 2021

बिटिया रानी का पुरस्कार

EVARA फाउण्डेशन द्वारा आयोजित चित्रकला प्रतियोगिता में बिटिया रानी की पेंटिंग को विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया था। 
आज प्रमाणपत्र सहित गिफ्ट आशीर्वाद स्वरुप प्राप्त हुआ। 

❤😍





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वंदेमातरम्

31 जनवरी 2020

बिटिया की मित्रता से बढ़ा सामाजिकता निर्वहन का दायरा


समय रफ़्तार से निकलता है ये बात बहुत लम्बे समय से जानते आये हैं. ऐसा बताया भी जाता रहा है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता है, बस भागता ही रहता है. ऐसा विगत काफी समय से देख भी रहे हैं जबकि समय कुछ ज्यादा ही रफ़्तार पकड़ता जा रहा है. अब देखिये, ऐसा लग रहा है जैसे अभी बहुत सारे लोग नए साल की शुभकामनायें देकर मुड़ भी न पाए हैं और ये एक महीना समाप्त हो भी गया. इतनी रफ़्तार भी अच्छी नहीं समय की. उसे समझना चाहिए कि इन्सान उसकी इसी रफ़्तार को पकड़ने के लिए, उसकी बराबरी करने के लिए पैदल यात्रा से पहिये के आविष्कार पर आया. इसके बाद जानवरों से चलने वाली गाड़ियाँ, उसके बाद साइकिल, कार, बस, ट्रेन, हवाई जहाज से होता हुआ जेट प्लेन तक में यात्रा करने लगा है. अब तो वह जैसे समय को पीछे छोड़ने के मूड में है और इसी के चलते अन्तरिक्ष विमानों में उसकी यात्रा के चरण आरम्भ हो गए हैं. ये और बात है कि इन विमानों का उपयोग एक देश से दूसरे देश के बीच नहीं किया जाना है मगर क्या यही कम है कि जिन ग्रहों, उपग्रहों को अभी तक बस देखा जाता रहा है, अब उन पर जाने का विचार भी सफल होता दिखने लगा है.


समय का परिवर्तन सदैव-सदैव से होता रहा है. इसी परिवर्तन ने समाज को अनेक आविष्कारों से, खोजों से परिचित करवाया. अनेक नवीन और आश्चर्यजनक उत्पादों के द्वारा उनका लाभ दिलवाया. इसी क्रम में समाज में समय ने संबंधों में भी परिवर्तन करवाए हैं. सामाजिकता में भी परिवर्तन उसी तेजी से दिखाए हैं. समय ने अपनी गति बदली या तीव्र की है तो उसी तीव्रता से उसने संबंधों में, सामाजिकता में भी गति प्रदान की है. ऐसा महसूस स्वयं में उस समय हुआ जबकि एक वैवाहिक समारोह में जाने का या कहें कि ले जाये जाने का अवसर मिला. वैवाहिक समारोह वाले किसी भी परिवार से हमारा कोई परिचय नहीं. वर, वधु से भी भी हमारा कोई सम्बन्ध नहीं, कोई परिचय नहीं. उनके किसी परिजन का भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध हमसे नहीं, कोई जान-पहचान नहीं. इसके बाद भी शादी समारोह में शामिल होना पड़ा और उसके पीछे का मूल कारण बनी हमारी बिटिया रानी. कक्षा छः में पढ़ने वाली हमारी बिटिया की सहेली की बड़ी बहिन की शादी का पावन अवसर था. उस बिटिया ने अपने ग्रुप की सभी सहेलियों को विवाह समारोह में आमंत्रित किया था. बिटिया रानी उसी दिन से पगलाई घूम रही थीं. उसे भी आनंद महसूस हो रहा था कि किसी शादी का कार्ड उसके नाम से भी घर में आया है.

एक-दो बार बिटिया को समझाया मगर बाद में लगा कि समय का ये परिवर्तन सामाजिक ही है जो अपने दायरे लगातार बढ़ाता है. किसी ने किसी रूप में हमने भी अपने परिवार के सामाजिक दायरे को बढ़ाया ही है. आज उस दायरे को बढ़ाने का काम समय ने बिटिया के हाथों में दे दिया है. यूँ तो सामाजिक कार्यों में उसकी सहभागिता को हम बहुत पहले से बनाये हुए थे मगर इस तरह के सामाजिक निर्वहन का उसका यह पहला अवसर रहा. इस तीव्र परिवर्तन पर आश्चर्य इसलिए भी हुआ क्योंकि अपने समय में हमें याद नहीं पड़ता कि इंटरमीडिएट तक हम किसी मित्र के द्वारा विवाह समारोह के लिए आमंत्रित किये गए हों या किसी मित्र के यहाँ विवाह समारोह में शामिल हुए हों. बहरहाल, बिटिया रानी को वैवाहिक कार्यक्रम में लेकर जाना हुआ. यथास्थिति उसी की मर्जी से रुकना हुआ ताकि उसे विवाह समारोह में पूर्णतः शामिल होने का एहसास रहे. समय की यह गति हमें जितनी परिवर्तनकारी लगी उतनी ही आश्चर्यजनक भी. अपने ही शहर में निवास बनाये रहने के कारण आज भी हमें अपने पारिवारिक सदस्यों के संबंधों की सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़ता है. ऐसे में लगा कि अब बिटिया रानी के संबंधों के दायरे में आकर उसके संबंधों का निर्वहन हाल-फिलहाल तो हमें ही करना होगा, जो उनके मित्रों के जन्मदिन से एक कदम आगे आकर उनके परिजनों के वैवाहिक कार्यक्रमों के रूप में हमारे सामने आयेंगे.

संबंधों के सामाजिक परिवर्तन में पारिवारिक संबंधों में भी परिवर्तन अपनी इसी गति ने करवाए हैं. हम तो तीस वर्ष की उम्र तक अपने पिताजी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे और आज अभिभावकों-संतानों के सम्बन्ध मित्रवत बनते दिख रहे हैं. सामाजिकता की भावी स्थिति में ये सम्बन्ध कितने सुखद होंगे ये भविष्य के गर्भ में है. फिलहाल तो समय अपनी गति को लगातार बढ़ाता जा रहा है, ये हम लोगों के लिए अनिवार्य जैसी स्थिति है कि हम भी अपनी गति को बढ़ाते हुए उसके साथ कदमताल करते रहें. अन्यथा की स्थिति में पिछड़ने में पल भर भी न लगेगा.


27 नवंबर 2017

बिटोली अर्थात बेटियों को प्यार

जब काम मनमाफिक न हो तो उसमें मन नहीं लगता. कुछ ऐसा ही हमारे साथ प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर हो रहा था, नौकरी को लेकर हो रहा था. सपना था सिविल सेवा में जाने का मगर वो हकीकत में न बदल सका. तमाम उतार-चढ़ावों के बीच 1998 में अजन्मी बेटियों को बचाने की मुहिम छेड़ दी. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान इस सम्बन्ध में बहुत से आँकड़े मिले जो निराशा पैदा करते थे. जिले में जब काम शुरू किया तो अपनी तरह का पहला काम होने के कारण न तो हमारी समझ में आ रहा था कि क्या किया जाये, कैसे किया जाये. इसके साथ ही सामान्यजन को भी समझ नहीं आ रहा था कि हम उसके साथ किस मुद्दे पर बात कर रहे हैं. समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के माध्यम से तमाम जानकारियाँ, आँकड़े जुटाए और जनपद में लोगों को इस बारे में जागरूक करने का प्रयास किया.

इस प्रयास में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. बुजुर्ग महिलाओं-पुरुषों द्वारा इस बारे में पुरानी धारणाओं पर अडिग रहने की मानसिकता दिखी तो युवाओं द्वारा परिवर्तन करने की सोच परिलक्षित हुई. उसी दौरान महिला चिकित्सालय में एक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान लोगों को पीएनडीटी के नियमों, दंड आदि को बताया-समझाया जा रहा था. उसी समय एक बुजुर्ग महिला ने अपना अनोखा सुझाव दिया. उसने कहा कि बेटा, सरकार से कहो कि जिसके दो-तीन बेटियाँ हैं उनको यह जांच फ्री करे कि पेट में लड़का है या लड़की है. उसे पकड़े नहीं, न ही जेल में डाले. जब उस बुजुर्ग महिला को समझाया कि ऐसा करने दिया तो लोग लड़कियों को मार डालेंगे. तमाम तरह के उदाहरणों से उस महिला को समझाया कि बेटियाँ भी अब परिवार का नाम रोशन करती हैं, वंश-वृद्धि करती हैं. बहुत देर तक उस महिला से बात करने पर अंततः उस वृद्ध महिला को एहसास हुआ कि बेटियों को भी जन्म दिया जाना चाहिए. इसके बाद उस महिला ने हमारे सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया. एक महिला चिकित्सक ने जेल भिजवाने की धमकी दी तो एक जगह एक अनाधिकृत विज्ञापन उतरवाने में झगड़ा हुआ.

बेटियों को बचाने का जूनून सा था. काम करना था, कहीं से कोई फंडिंग नहीं थी, प्रशासनिक सहयोग किसी भी तरह से नहीं मिल रहा था. तमाम खर्चों की पूर्ति मित्रों और समाज के कतिपय शुभचिंतकों द्वारा हो जाती थी. इसी दौरान लखनऊ की संस्था वात्सल्य से संपर्क हुआ, जो कन्या भ्रूण हत्या निवारण पर कार्य कर रही थी. वात्सल्य को हमारा अभी तक का कार्य बहुत पसंद आया और उसी के आधार पर उनके कोपल प्रोजेक्ट से हमारा जुड़ना हुआ. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने से कुछ आर्थिक सहयोग अवश्य मिला किन्तु उसी दौरान हुई अपनी दुर्घटना के कारण यह प्रोजेक्ट हाथ से निकल गया. एक साल बिस्तर पर ही निकला. योजनायें बनती रहीं, संपर्क बनाये रखे गए और अंततः सन 2006 में अपनी संस्था दीपशिखा के तत्त्वावधान में राष्ट्रव्यापी अभियान बिटोली आरम्भ कर दिया.


जनपद में पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते जो पहचान मिली वो आज भी हमारा आधार बनी हुई है. इसके अलावा व्यक्तिगत रूप से हमारी पहचान को विस्तार देने का कार्य हमारे सामाजिक कार्यों, सांस्कृतिक अभिरुचि, लेखकीय क्षमता के साथ-साथ कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम ने किया. यदि कहा जाये कि सबसे अधिक पहचान कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम से मिली तो अतिश्योक्ति न होगी. इसका एक पहलू ये भी सामने आया कि जनपद में बहुतायत लोग त्रुटिवश कन्या भ्रूण हत्या वाले कुमारेन्द्र का संबोधन कर जाते हैं. हम उसी समय हँसकर सुधार करवा देते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या वाले नहीं बल्कि कन्या भ्रूण हत्या निवारण वाले.

आज भी यदाकदा वे परिवार, वे बच्चियाँ मिल जाती हैं जो हमारे जागरूकता कार्यक्रम के कारण इस संसार में हैं तो ख़ुशी होती है. ये और बात है कि उनको हम मर्यदावश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं ला सकते. बहुत सी बेटियों को बचा भी सके और बहुत सी बेटियों को बचा भी न सके. सैकड़ों परिवारों को जागरूक किया पर सैकड़ों को समझा भी न सके. आज कई साल इस अभियान को संचालित करते हुए गुजर गए मगर अभी तक संतोषजनक स्थिति का एहसास नहीं हो सका है. बेटियाँ आज भी असुरक्षित हैं, न सही जन्मने के पहले, जन्मने के बाद ही सही पर वे असुरक्षित हैं.

29 जुलाई 2016

बेटियों के लिए जागना होगा

यह अपने आपमें शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की आदर्शवादिता दिखाने वाले समाज में खुलेआम भ्रूण लिंग जाँच जैसा कुकृत्य किया जा रहा है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हौसले कितने बुलंद हैं कि इसके निरोध के लिए बने अधिनियम (PCPNDT Act) का कोई भी खौफ इनके मन-मष्तिष्क पर नहीं है. यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष 2011 की जनगणना में वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है. 



चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके. पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियां होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है. इसके साथ ही महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका भी बनी रहती है, जिसके परिणामस्वरूप महिला के शरीर में खून की कमी होने से अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु हो जाती है. इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियों जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है. उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है. इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं. इसके अलावा समाज में अनेक विषमताओं के उत्पन्न होने का खतरा भी है. विवाह योग्य लड़कियों का कम मिलना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, जबरन महिलाओं को उठाया जाना, बलात्कार, बहु-पति प्रथा आदि विषम स्थितियों से इतर कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. समाज में महिलाओं की संख्या कम हो जाने से शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महिलाओं की खरीद-फरोख्त होना, एक महिला से अधिक पुरुषों के शारीरिक संबंधों के बनने की आशंका, इससे यौन-जनित रोगों के होने की सम्भावना बनती है. सवाल खड़ा होता है तो इनको रोका कैसे जाए? इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये? इनकी कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये?

इस विकृति से निपटने के लिए हर बार जन-जागरूकता की बात की जाती है किन्तु लगता है कि जनता ने जागरूकता से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये. कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है.


सामाजिक प्राणी होने के नाते हर जागरूक नागरिक की जिम्मेवारी बनती है कि वो कन्या भ्रूण हत्या निवारण हेतु सक्रिय रूप से अपना योगदान दे. अपने परिवार के बुजुर्गों को समझाने का काम करें कि किसी भी वंश का नाम बेटियों के द्वारा भी चलता रहता है. उनको महारानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी का उदाहरण देना होगा. समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करके बच्चियों के साथ-साथ उनके माता-पिता के मन में भी महिलाओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव जाग्रत करना होगा. इधर देखने में आया है कि दलालों की मदद से बहुत से लालची और कुत्सित प्रवृत्ति के चिकित्सक अपनी मोबाइल मशीन के द्वारा निर्धारित सीमा का उल्लंघन करके भ्रूण लिंग की जाँच अवैध तरीके से करने निकल पड़ते हैं. जागरूकता के साथ ऐसी किसी भी घटना पर, मशीन पर, अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड मशीन की पड़ताल भी करते रहें और कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर प्रशासन को सूचित करें. इसके साथ-साथ जन्मी बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रोकने हेतु हमें आगे आना होगा. उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा आदि की स्थितियों पर भी ध्यान देना होगा कि कहीं वे किसी तरह के भेदभाव का, दुर्व्यवहार का शिकार तो नहीं हो रही हैं. यदि इस तरह के कुछ छोटे-छोटे कदम उठाये जाएँ तो संभव है कि आने वाले समय में बेटियाँ भी समाज में खिलखिलाकर अपना भविष्य संवार सकती हैं. यदि ऐसा नहीं किया गया तो धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच, कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 

चित्र गूगल छवियों से साभार 

17 नवंबर 2015

भ्रूण हत्या रोकने को अनिवार्य रूप से सख्ती हो

          भ्रूण लिंग जाँच और अवैध गर्भपात को रोकने के लिए पीसीपीएनडीटी एक्ट होने के बाद भी ऐसा कुकृत्य करने वालों में किसी प्रकार का भय व्याप्त नहीं है. सरकार द्वारा, विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार जागरूकता कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं किन्तु आज आवश्यकता जागरूकता कार्यक्रमों की कम क्रियान्वयन कार्यक्रमों की अधिक है. देखा जाये तो समाज में शहरी क्षेत्र हो अथवा ग्रामीण क्षेत्र, सभी को भली-भांति मालूम है कि भ्रूण लिंग जाँच करवाना गैर-कानूनी है, ये सभी को ज्ञात है कि ऐसे मामलों में गर्भपात करवाना भी गैर-कानूनी है, सबको इसकी भी जानकारी है कि ऐसा कृत्य करने पर कानूनी रूप से सजा का प्रावधान है. यदि भ्रूण लिंग जाँच में अथवा भ्रूण हत्या में संलिप्त लोगों को उक्त जानकारियाँ नहीं होती तो वे ऐसे कृत्य खुलेआम करने-करवाने का कार्य कर रहे होते, जबकि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. ऐसे कार्य गोपनीय तरीके से किये-करवाए जा रहे हैं. ये अपने आपमें शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की संकल्पना रचने वाले समाज में भ्रूण लिंग जाँच/हत्या में लोगों की संलिप्तता आज भी है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक भी सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. कमोवेश ये स्थिति अकेले किसी एक स्थान विशेष की नहीं वरन देश के बहुतायत भागों की है. ऐसे में सवाल उठता है कि इनको रोका कैसे जाए? इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये? इस कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये? ऐसे सवालों का जवाब कई बार खुद ऐसे हालात ही बन जाते हैं. स्पष्ट है कि यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में भयंकर गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष 2011 की जनगणना में भले ही वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये भी संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है.
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ऐसी स्थिति में जबकि लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, सरकारें बेटी बचाओ अभियान के द्वारा जागरूकता लाने में लगी हुई हैं, गैर-सरकारी संगठन और अनेक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बेटियों के हितार्थ कार्य करने में लगे हैं इसके बाद भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इसका उदाहरण इससे लगाया जा सकता है कि आये दिन कहीं नालियों में, कहीं झाड़ियों में, कहीं कूड़े के ढेरों पर नवजात शिशु, भ्रूण आदि मिलने की खबरें सामने आती हैं. ऐसी घटनाओं के लगातार बढ़ने से आशंका इसकी भी बलबती है कि संभव हो कि विविध चिकित्सालयों में कार्य करने वाले व्यक्तियों द्वारा, दाइयों द्वारा, अथवा सरकारी चिकित्सा सेवा में संलग्न विभिन्न कर्मियों द्वारा अवैध रूप से ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जा रहा हो? ये आशंका इस कारण से उठती है कि यदि एक सुविधा-संपन्न चिकित्सालय, नर्सिंग होम ऐसे कार्य को अंजाम देता है तो उसके पास भ्रूण को पूर्णतः नष्ट करने के साधन उपलब्ध रहते हैं. संभव है कि ऐसे कुकृत्य प्रशिक्षित अथवा अप्रशिक्षित व्यक्तियों की देखरेख में किसी अवैध स्थान पर किये जा रहे हों.  
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वर्तमान में लगातार ऐसी घटनाओं के सामने आने से जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. इसके साथ-साथ निजी रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटर्स, निजी चिकित्सालयों में, नर्सिंग होम में, निजी प्रैक्टिस कर रहे चिकित्सकों के साथ-साथ सरकारी चिकित्सा सेवा के कार्य कर रहे विभिन्न कर्मियों में से संदिग्ध लोगों को तलाशने का कार्य किया जाए क्योंकि ऐसा कुकृत्य बिना चिकित्सकीय मदद के संभव नहीं है. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये.
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इतने सालों की जद्दोजहद से ये स्पष्ट हो चुका है कि बेटी होने पर किसी योजना का लाभ देने का मंतव्य, सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने सम्बन्धी प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं आदि से सुधार होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. ऐसे में कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब कि धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच-कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 
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02 नवंबर 2014

भ्रूण लिंग जाँच, कन्या भ्रूण हत्या का खेल चालू आहे



ये अपने आपमें अत्यंत शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की आदर्शवादिता दिखाने वाले समाज में खुलेआम भ्रूण लिंग जाँच जैसा कुकृत्य किया जा रहा है; गर्भ में बालिका की पहचान होने के पश्चात् उसका जीवन समाप्त किया जा रहा है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक भी सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. इधर हाल में देश की राजधानी में जिस तरह से खुलेआम वहाँ के नर्सिंग होम द्वारा एक महिला को अल्ट्रासाउंड सेंटर का पता बताया जाता है, जहाँ आसानी से भ्रूण लिंग जाँच की जाती है, तो ये कन्या भ्रूण हत्या निवारण की कोशिशों की गंभीरता को दर्शाता है. खुलेआम इस तरह के सेंटर के बारे में बताया जाना ये सिद्ध करता है कि इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हौसले कितने बुलंद हैं और इसके निरोध के लिए बने अधिनियम (PCPNDT Act) का कोई भी खौफ इनके मन-मष्तिष्क पर नहीं है. कमोवेश ये स्थिति अकेले दिल्ली में ही नहीं है वरन देश के बहुतायत भागों में है. लेकिन ये कहकर कि इस कानून की धज्जियाँ उड़ाने वाले, इसका मखौल बनाने वाले, भ्रूण लिंग जाँच करवाने वाले, कन्या भ्रूण हत्या करने/करवाने वाले सम्पूर्ण देश में हैं, दिल्ली के अथवा देश भर के ऐसे अपराधियों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता है, नज़रअंदाज़ किया भी नहीं जाना चाहिए. इसी के साथ सवाल खड़ा होता है तो इनको रोका कैसे जाए, इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये, इनकी कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये. ऐसे सवालों का जवाब कई बार खुद ऐसे हालात ही बन जाते हैं. स्पष्ट है कि यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में भयंकर गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष २०११ की जनगणना में भले ही वर्ष २००१ की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये भी संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है.
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ऐसी स्थिति में जबकि लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, सरकारें बेटी बचाओ अभियान के द्वारा जागरूकता लाने में लगी हुई हैं, गैर-सरकारी संगठन और अनेक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बेटियों के हितार्थ कार्य करने में लगे हैं इसके बाद भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इस विकृति से निपटने के लिए हर बार जन-जागरूकता की बात की जाती है किन्तु अब जबकि खुलेआम ऐसे सेंटर की जानकारी दिए जाने से लगता है कि जनता ने भी जागरूकता से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये.
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इतने सालों की जद्दोजहद से ये स्पष्ट हो चुका है कि बेटी होने पर किसी योजना का लाभ देने का मंतव्य, सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने सम्बन्धी प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं आदि से सुधार होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. ऐसे में कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब कि ऐसे धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच-कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 
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21 सितंबर 2014

बेटियों के लिए हमें जागरूक होना पड़ेगा



          इंसानी कदम आधुनिकता के साथ अंतरिक्ष की ओर बढ़ते जा रहे हैं किन्तु ‘कन्या भ्रूण हत्या’ जैसा कृत्य उसको आदिमानव सिद्ध करने में लगा है। समाज में बच्चियों की गिरती संख्या से अनेक तरह के संकट, अनेक विषमताओं के उत्पन्न होने का संकट बन गया है। विवाह योग्य लड़कियों का कम मिलना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, जबरन महिलाओं को उठाया जाना, बलात्कार, बहु-पति प्रथा आदि विषम स्थितियों से इतर कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। समाज में महिलाओं की संख्या कम हो जाने से शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महिलाओं की खरीद-फरोख्त होना, एक महिला से अधिक पुरुषों के शारीरिक संबंधों के बनने की आशंका, इससे यौन-जनित रोगों के होने की सम्भावना बनती है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके। पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियां होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है। इसके साथ ही महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका भी बनी रहती है, जिसके परिणामस्वरूप महिला के शरीर में खून की कमी होने से अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियों जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है। उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं।
सामाजिक प्राणी होने के नाते हर जागरूक नागरिक की जिम्मेवारी बनती है कि वो कन्या भ्रूण हत्या निवारण हेतु सक्रिय रूप से अपना योगदान दे। बेटियों को जन्म देने से रोकने वाली किसी भी प्रक्रिया का समाज में सञ्चालन होने से रोके। हम अपने-अपने परिवार के बुजुर्गों को ये समझाने का काम करें कि किसी भी वंश का नाम बेटियों के द्वारा भी चलता रहता है। उनको महारानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी का उदहारण देकर समझाना चाहिए। परिवार के इन बुजुर्गों के ये भी बताना होगा कि जिनके बेटे पैदा नहीं हुए उनके कार्यों से उनका नाम आज तक समाज में आदर के साथ लिया जा रहा है। ऐसे उदाहरणों के लिए स्वामी विवेकानंद, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस, जवाहर लाल नेहरू आदि का नाम लिया जा सकता है। बेटे की चाह रखने वाले इन्हीं परिवारीजनों को समझाना चाहिए कि यदि समाज से बेटियाँ समाप्त हो जाएँगी तो फिर वंश-वृद्धि के लिए पुत्र जन्मने वाली बहू कहाँ से आएगी। हम अपने आसपास की, पड़ोस की, मित्रों-रिश्तेदारों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखें, उनके बच्चे के जन्मने की स्थिति को स्पष्ट रखें। यदि कोई महिला गर्भवती है तो उसको प्रसव होना ही है (किसी अनहोनी स्थिति न होने पर) इसमें चाहे बेटा हो या बेटी। हम स्वयं में भी जागरूक रहें और स्वयं को और अन्य दूसरे लोगों गर्भस्थ शिशु की लिंग जाँच के लिए प्रेरित न करें। इधर देखने में आया है कि दलालों की मदद से बहुत से लालची और कुत्सित प्रवृत्ति के चिकित्सक अपनी मोबाइल मशीन के द्वारा निर्धारित सीमा का उल्लंघन करके भ्रूण लिंग की जाँच अवैध तरीके से करने निकल पड़ते हैं। हम जागरूकता के साथ ऐसी किसी भी घटना पर, मशीन पर, अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड मशीन की पड़ताल भी करते रहें और कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर प्रशासन को सूचित करें। कई-कई जगह पर वैध रूप से पंजीकृत अल्ट्रासाउंड सेंटर्स द्वारा गर्भपात (कन्या भ्रूण हत्या) करने की घटनाएँ प्रकाश में आई हैं। हम सबका दायित्व बनता है कि इस तरह के सेंटर्स पर भी निगाह रखें। इसी के साथ-साथ जन्मी बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रोकने हेतु हमें आगे आना होगा। उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा आदि की स्थितियों पर भी ध्यान देना होगा कि कहीं वे किसी तरह के भेदभाव का, दुर्व्यवहार का शिकार तो नहीं हो रही हैं।
यदि इस तरह के कुछ छोटे-छोटे कदम उठाये जाएँ तो संभव है कि आने वाले समय में बेटियाँ भी समाज में खिलखिलाकर अपना भविष्य संवार सकती हैं। अभी से यह चेतावनी सी देना कि समाज में बच्चियों की संख्या भविष्य में कम होते जाने पर उनके अपहरण की सम्भावना अधिक होगी; ऐसे परिवार जो सत्ता-शक्ति से सम्पन्न होंगे, वे कन्याओं को मण्डप से उठा ले जाकर अपने परिवार के लड़कों के उनका विवाह करवा दिया करेंगे; बालिकाओं की अहमियत बढ़ जायेगी और सम्भव है कि बेटियों के परिवारों को दहेज न देना पड़े बल्कि लड़के वाले दहेज दें आदि कदाचित ठीक-ठीक नहीं जान पड़ता है। यह स्पष्ट है कि वर्तमान में महिला लिंगानुपात जिस स्थिति में है, महिलाओं को, बच्चियों को जिन विषम हालातों का सामना करना पड़ रहा है आने वाला समाज बेटियों के लिए सुखमय तो नहीं ही होगा। समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करके बच्चियों के साथ-साथ उनके माता-पिता के मन में भी महिलाओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव जाग्रत करना होगा और पुत्र लालसा में अंधे होकर बेटियों को मारते लोगों को समझाना होगा कि यदि आज बेटी को मारोगे तो कल बहू कहाँ से लाओगे?’