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07 मार्च 2019

ईश्वरीय सत्ता या अन्धविश्वास


कुछ बातें जिनका उत्तर नहीं मिलता वे ये जानते हुए भी कि उनका सटीक उत्तर नहीं मिलना है, लगातार परेशान करती रहती हैं. ऐसा हमारे साथ पिछले लम्बे समय से हो रहा है. इन बातों में मुख्यतया जो बातें हैं वे ईश्वरीय शक्ति, ईश्वरीय सत्ता से सम्बंधित हैं. मन में लगातार ऐसे सवाल उमड़ते हैं कि क्या वाकई ईश्वर जैसी कोई चीज होती है? क्या जिस जगह को सिद्ध स्थान मानकर लोगों द्वारा पूजा जाता है वहाँ वाकई कोई सिद्धि होती है? क्या वाकई अपनी कामना ईश्वर के सामने रखने से वह पूरी होती है? क्या धार्मिक कृत्य करने से भगवान के प्रसन्न होने वाली बात सत्य है? ऐसे सवाल एक हिन्दू धर्म से सम्बंधित ही नहीं उभरते बल्कि सम्पूर्ण विश्व में जितने तरह के धर्म हैं, धार्मिक क्रियाकलाप हैं, धार्मिक स्थल हैं उन सभी को लेकर ऐसे विचार उमड़ते रहते हैं. सनातन धर्म से सम्बंधित होने का कारण स्पष्ट है कि सनातनी धार्मिक क्रियाकलापों से ही परिचय होता रहा है, अतः सवाल भी उसी से सम्बंधित सामने आना स्वाभाविक है.


यहाँ अपनी बात आगे कहने से पहले एक तथ्य स्पष्ट कर देना उचित रहेगा, क्योंकि देश में धर्म के नाम पर जिस तरह से कुतर्क दिए जाते हैं वे सही बातों को, तथ्यों को भी हाशिये पर खड़ा करवा देते हैं. यहाँ स्पष्ट कर दें कि इस लेख का तात्पर्य किसी भी रूप में किसी तरह से ईश्वरीय शक्ति का विश्लेषण करना नहीं है. किसी भी तरह से किसी की धार्मिक मान्यताओं पर चोट करना नहीं है. किसी की ईश्वरीय आस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना नहीं है. किसी भी व्यक्ति के लिए ईश्वर का मानना या न मानना उसका अपना व्यक्तिगत विचार है. हाँ, यदि किसी पर इस तरह के विचारों को यदि थोपा जाता है तो वह नितांत गलत है. यहाँ हमारा विचार महज इतना है कि जिस तरह से समाज में धार्मिक लामबंदी करते हुए लोगों के विचारों से, लोगों की मनोभावनाओं से, लोगों की आस्था से खिलवाड़ किया जाता है वह किसी भी रूप में धर्म नहीं है और न ही ईश्वरीय इच्छा है. हम सभी आये दिन अपने आसपास किसी न किसी रूप में ईश्वरीय शक्ति से सम्बंधित होने वाली कोई न कोई घटना अवश्य देखते होंगे. धार्मिक कृत्यों का होना तो ठीक है कि वह सम्बंधित व्यक्ति के मन को संतुष्टि दे रहा है. कोई व्यक्ति अपनी परेशानियों का समाधान ऐसे कृत्य में खोजता है तो बुरा कहाँ है. इसमें बुराई तब शामिल हो जाती है जबकि ऐसे किसी कृत्य के लिए असामाजिक कृत्य करने शुरू कर दिए जाएँ. किसी भी धार्मिक कृत्य में बुराई तब है जबकि वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करने लगे. और यदि पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखा जाये तो आज यही हो रहा है. धर्म के नाम पर ठगी का धंधा तेजी से फ़ैल रहा है. गली-गली छोटे-बड़े धार्मिक केन्द्रों का खुलना इसी का द्योतक है कि आम नागरिक अपनी धार्मिक आस्था को किसी दूसरे के हाथ का खिलौना बनाये है.

मनोकामनाओं का पूरा होना, किसी विशेष धार्मिक व्यक्तित्व का महिमामंडन, किसी ईश्वर विशेष के नाम से स्थानों का पूज्य हो जाना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिन पर किसी भी व्यक्ति को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. यहाँ विचारणीय बिंदु यह है कि क्या वाकई ईश्वर से कुछ माँगने से वह प्राप्त होता है? क्या ईश्वरीय सत्ता इंसानों के सारे कार्यों को पूरा करने का माध्यम है? कभी कोई व्यक्ति ईश्वरीय शक्ति से माँगे कि उसके चार हाथ हो जाएँ, तो क्या ऐसा हो जायेगा? क्या किसी इन्सान के ईश्वर से यह मनोकामना करने कि उसकी चार आँखें हो जाएँ, पूरी हो जाएगी? कोई वाहन-विहीन व्यक्ति ईश्वर से कामना करे कि उसके घर की कोई वस्तु कार में बदल जाए, तो क्या ऐसा संभव है? प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष के संसर्ग के, नौ महीने गर्भधारण के बजाय इन्सान के पसंद की कोई वस्तु उसकी संतान के रूप में बदल जाए, क्या ईश्वर उस व्यक्ति की ऐसी मनोकामना पूरी कर देगा? इसी तरह क्या किसी व्यक्ति ने अपने घर में लगे पौधों में सारे मौसमी फलों के निकल आने की कामना कभी की है? विचार करिए कि असल में एक व्यक्ति भगवानरुपी शक्ति से क्या माँगता है? नौकरी, परीक्षा में पास होना, विवाह, संतान, तरक्की, स्वास्थ्य, रोजगार आदि. देखा जाये तो ये सारे काम कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में इंसानों के हाथ में ही हैं. बस उपयुक्त प्रयासों और उपयुक्त समय में ये काम संपन्न होते हैं. 

ऐसे में आँख बंद करके कहीं भी, किसी को भी, किसी भी स्थान को ईश्वरीय शक्ति से संपन्न मान लेना, उसी को ईश्वर मान लेना सिवाय अन्धविश्वास के कुछ नहीं. ऐसे अंधविश्वासों ने ही प्रकृति के प्रति भी उपेक्षा का भाव पैदा कर रखा है. यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए विचार किया जाये तो प्रकृति को ही ईश्वरीय शक्ति से संपन्न माना जा सकता है. उसी के द्वारा संचालित क्रियाएँ ही ईश्वर का आभास देती हैं. उसका विनाश करते हुए अन्य किसी भी रूप में ईश्वर की भक्ति करना सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं. अपने-अपने विचार, अपनी-अपनी श्रद्धा-आस्था-भक्ति के अनुसार सभी को अपना ईश्वर मानने, बनाने का अधिकार है सो वह भले ही ऐसा करता रहे मगर असल सत्य यही है कि ईश्वर इन्सान द्वारा निर्मित कृति है और वही इन्सान उसी कृति के हाथों की कठपुतली बना हुआ है. बाकी तो समझने की आवश्यकता है, जो किसी के द्वारा हो नहीं रहा है. आज के दौर में जबकि चारों तरफ परेशानियों का बोलबाला है, अपराध है, कैरियर की चिंता है तब अपने प्रयासों पर भक्ति का मुलम्मा चढ़ा लेना सबको सहज लगता है. शायद यही कारण है कि आज युवा वर्ग बहुत तेजी से धर्म की तरफ मुड़ रहा है, नित्य ही नए-नए ईश्वर का निर्माण कर रहा है. देखिये आसपास, कहीं कोई नया ईश्वर किसी नए नाम के साथ, नए रूप के साथ किसी को ठग तो नहीं रहा.

05 सितंबर 2016

चमत्कार और ढोंग की बारीक रेखा

अंततः मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिल गई. संत बनने के लिए आवश्यक था कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम से दो चमत्कार हुए हों. आश्चर्य देखिये कि मदर टेरेसा के नाम से दो चमत्कार हो भी गए. जैसी कि अपेक्षा थी कि एक चमत्कार भारत में तो होगा ही और ऐसा हुआ भी. पश्चिम बंगाल में उनके नाम का एक चमत्कार हुआ. पश्चिम बंगाल में एक महिला के पेट का गंभीर ट्यूमर चमत्कारी मैडल के पेट पर स्पर्श कराने मात्र से दूर हो गया. इसी तरह का दूसरा चमत्कार ब्राजील में हुआ, जहाँ कोमा में गए व्यक्ति की सर्जरी के अंतिम प्रयास से पूर्व ही वो महज इस कारण स्वस्थ पाया गया क्योंकि उसकी पत्नी ने मदर टेरेसा की प्रार्थना की थी. आश्चर्य देखिये, संत घोषित किये जाने की इस परम्परा में पोप द्वारा चमत्कारों को प्रमाण सहित जाँचा जाता है.

बहरहाल मदर टेरेसा के भारत में कार्य करने को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. कभी उनका नाम इलाज के बहाने धर्म परिवर्तन से जोड़ा गया तो कभी वे आरक्षण के मुद्दे पर सड़क पर उतरती दिखी. कष्टों में व्यक्ति ईश्वर के सबसे करीब होता है, का पाठ पढ़ाने वाली मदर टेरेसा के आश्रम में मरीजों को मामूली चिकित्सा के सहारे अपने कष्टों का निवारण करना होता था जबकि वे स्वयं बीमारी की अवस्था में इलाज के लिए विदेश जाती थीं. सोचने का विषय है कि क्या वे कष्ट में ईश्वर के समीप जाने का लोभ नहीं रखती थीं? या कि उन्हें पहले से ज्ञात था कि वे ईश्वर की सेवक हैं, जिसे मृत्यु के बाद संत की उपाधि से विभूषित किया जायेगा? उनके भारत आने, यहाँ लोगों की सेवा करने के बहाने ईसाई मिशनरी का प्रचार-प्रसार करने से लेकर उनके अंतिम दिनों तक की कार्यप्रणाली के जहाँ प्रशंसक भी हैं वहीं विरोधी भी. हाल-फ़िलहाल तो मुद्दा ये नहीं कि उनका कार्य क्या था और वे क्या करती थीं. सवाल ये है कि जिस देश में विगत कुछ माह पूर्व कतिपय बुद्धिजीवियों ने एक समाजसेवी, जो हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास दूर करता था, की हत्या पर अपने-अपने पुरस्कार लौटाना शुरू कर दिए थे, वहाँ मदर टेरेसा के चमत्कारों को स्वीकार्यता कैसे मिल गई? आये दिन टीवी पर, समाचारों में देखने को मिलता है कई-कई ईसाई मिशनरी मंच लगाकर अनेकानेक तरीके से हिन्दू धर्म की पूजा-पद्धति पर सवाल खड़े करते हैं. उसकी वैज्ञानिकता पर सवाल उठाते हैं, वे ऐसे तथाकथित चमत्कारों पर खामोश क्यों हैं?


किसी व्यक्ति को संत बनाने या न बनाने की रोमन कैथोलिक प्रक्रिया है. उनकी प्रक्रिया पर किसी तरह का कोई सवाल-जवाब नहीं. उनके अपने देश की, अपने धर्म की व्यवस्था है. उनकी अपनी प्रक्रिया है. भारतवासियों को उसे स्वीकार करना है या नहीं, इसका भी उनसे कोई लेना-देना नहीं. सभी धर्मों की अपनी-अपनी आस्था, अपने-अपने विश्वास हैं, उन पर अन्य धर्मावलम्बियों को तब तक सवाल खड़े भी नहीं करने चाहिए जब तक कि समाज का सामूहिकता में नुकसान न हो रहा हो. इसके बाद भी ये स्थिति विचारणीय अवश्य होनी चाहिए कि यदि एक धर्म की सारी बातें ढोंग लगती हैं; यदि उस धर्म के व्यक्ति पाखंडी समझ आते हैं; यदि हिन्दू धर्म के संत, महात्मा, बाबा आदि चोर, भ्रष्ट, दुराचारी दिखते हैं तो बाकी धर्मों के ऐसे लोग संत कैसे हो सकते हैं? बाकी धर्मों के ऐसे आस्थावान कृत्य चमत्कार कैसे हो जाते हैं? यहाँ समझना होगा कि इसी भारत देश में आज मदर टेरेसा को ‘संत’ घोषित करते ही जश्न मनाया जा रहा है. सरकारी प्रतिनिधिमंडल वहाँ जाकर उस समारोह में शामिल होता है. यदि एक व्यक्ति के संत बनाये जाने को जनसामान्य का, सरकार का समर्थन प्राप्त है तो फिर हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों पर ऊँगली कैसे उठाई जा सकती है? ये उन लोगों को भी सोचना होगा जो विगत महीने पहले एक कथित समाजसेवी की हत्या पर लामबंद हो गए थे. 

05 सितंबर 2013

आडम्बरों के चलते धार्मिक मान्यताएं बनीं अंध-विश्वास




एक तरफ इन्सान अपने कदम विज्ञान की ओर बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ वह अन्धविश्वास की तरफ भी जा रहा है. दैनिक क्रियाकलापों में तमाम धार्मिक गतिविधियों को शामिल कर इन्सान ने जहाँ धर्म को पाखंड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है वहीं धर्म की आड़ में अपना व्यापार करने वालों को भी फलने-फूलने में मदद की है. समाज के वैज्ञानिक, तार्किक हो जाने का तात्पर्य ये कतई नहीं है कि धर्म से विमुख हो जाया जाये; या फिर विज्ञान के नाम पर तमाम सारे क्रियाकलापों को, मान्यताओं को, रीति-रिवाजों को, परम्पराओं को ठुकरा दिया जाये. ऐसा भी नहीं है कि जितनी भी धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न की जाती हैं वे सभी आडम्बरों को, अन्धविश्वास को बढ़ावा देती हों किन्तु जिस तरह से उनका सञ्चालन होने लगा है, उसने उन सभी को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है.
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पुरातन काल में जब इन्सान पढ़ा-लिखा नहीं था, विज्ञान से उसका व्यावहारिक सम्बन्ध नहीं था उस दौर में उसने विभिन्न गतिविधियों को जनहित की दृष्टि से धार्मिकता से सम्बद्ध कर दिया था, जिससे कि समाज उनका पालन करते हुए हानि से बच सके. इसको एक-दो उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है. ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू नहीं लगानी चाहिए, देखा जाये तो इसके पीछे इतनी ही सोच रही होगी कि अँधेरे में घर की कोई वस्तु, सामग्री कूड़े में न चली जाये. ये सभी को ज्ञात है कि उस समय प्रकाश व्यवस्था किस हालत में रही होगी. इसी तरह से नदियों, पेड़-पौधों, जानवरों आदि में ईश्वरीय शक्ति बता देने के पीछे कहीं न कहीं पर्यावरण की रक्षा का मंतव्य रहा होगा. कहीं न कहीं मानव स्वतंत्रता के लिए ही देवी-देवताओं के अनगिनत रूपों को प्रचलित कर रखा गया होगा. किसी पर देवी-देवता विशेष को मानने-पूजने का बंधन नहीं रखा गया होगा. इसी तरह के शगुन-अशगुन देख कर तमाम दूसरे टोन-टोटके बनाये गए होंगे. इनमें से बहुत से समय से साथ खंडित भी किये जाते रहे हैं. जिनमें सूर्य-ग्रहण, चन्द्र-ग्रहण सम्बन्धी मान्यताओं को देखा जा सकता है.
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इस सत्य से शायद ही कोई इंकार करे कि हम जब भी किसी संकट में घिर जाते हैं तो अपने से सक्षम का सहारा तलाशते हैं, विशेष रूप से अपने बड़े का. दैवीय शक्ति की मान्यता के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा कि जब इन्सान किसी मुसीबत में घिर जाये तो उसका स्मरण करके खुद में एक तरह का विश्वास पैदा कर सके. इस मान्यता को कतिपय धार्मिक कर्मकांडियों ने अपनी गिरफ्त में लेकर लोगों के सामने भगवान का भय जगाना शुरू कर दिया; मुसीबतों से बचाने का कारोबार करना शुरू कर दिया; हर समस्या का समाधान निकालना शुरू कर दिया. अशिक्षितों की कौन कहे जब पढ़े-लिखे लोग ही ढोंगियों के चक्कर में फंसकर धर्म को रसातल की ओर ले जाने लगे; सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय दृष्टि से बनाई गई मान्यताओं को अन्धविश्वास के सहारे पल्लवित-पुष्पित करने लगे. आज हालत ये है कि अधिसंख्यक व्यक्ति या तो घनघोर तरीके से धर्म के कब्जे में हैं या फिर वे लोग हैं जो धर्म को अन्धविश्वास, पाखंड बताकर मानवहित में बनी मान्यताओं को आधुनिकता के नाम पर ध्वस्त करने में लगे हैं. हो सकता है कि धार्मिकता का नाम देकर पुरातनकाल में बनाई गई अधिकांश मान्यताएं आज स्वीकार्य न हों किन्तु इसके बाद भी बहुत सी मान्यताएं ऐसी हैं जिनके स्वीकार करने, अपनाने से सामाजिकता का, मानवता का भला ही होगा. इसके लिए हमें अंध-विश्वास से बाहर आना होगा, अंध-श्रद्धा से बाहर आना होगा, अंध-व्यक्ति से बचना होगा.

02 सितंबर 2013

धार्मिक आडम्बरों की अंध-दौड़ के चलते जागरूकता संभव नहीं




पिछले कुछ दिनों से देश की मीडिया द्वारा यौन शोषण के आरोपी आसाराम की पल-पल की गतिविधि को इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे देश के सामने वर्तमान में एकमात्र समस्या यही रह गई हो. इधर आसाराम के समर्थक और विरोधी सीधे-सीधे निष्कर्ष देने में लगे हुए हैं. सत्यता क्या है ये तो जाँच के आधार पर ही ज्ञात हो सकेगा किन्तु जिस तरह से इसे हाईप्रोफाइल ड्रामा बना दिया गया वो नागरिकों के मानसिक स्तर को समझने के लिए पर्याप्त है. बलात्कार, यौन शोषण के अनेक मामलों में एकाध पर जबरदस्त प्रतिक्रिया होना, मीडिया का एकाएक सरगर्मी के बाद चुप हो जाना, संवेदनशीलता का नेपथ्य में चले जाना आदि हमारी क्षणिक जागरूकता प्रदर्शित करता है. इसके ठीक उलट आसाराम प्रकरण लगातार मीडिया में, सोशल मीडिया में, जनमानस में अपनी सुगबुगाहट बनाये रहा, जो अपनी अलग ही कहानी कहता है.
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इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर जाने के, विज्ञान के ज्ञान के बाद भी भारतीय जनमानस खुद को धर्म से, धार्मिक कर्मकांडों से, धार्मिक व्यक्तित्वों से अलग नहीं कर सका है. धर्मगुरु पर लगने वाला कोई भी आरोप उसके समर्थकों के विश्वास को खंडित करता है, भावनाओं को चोट पहुँचाता है, भक्तों की भक्ति पर उँगली उठाता है. ऐसा किसी एक धर्म मजहब के साथ नहीं बल्कि ये स्थिति सभी धर्मों के सन्दर्भ में एक जैसी ही है. किसी भी धर्मगुरु के प्रति उसके भक्तों की अगाध श्रद्धा को सभी धर्मगुरु जानते-समझते हैं और गाहे-बगाहे इसका अनुचित लाभ भी उठाते रहते हैं. भारतीय समाज में बचपन से ही धर्म के प्रति जिस तरह से एक अलग किस्म की घुट्टी पिलाई जाती है उसके बाद धर्म के विरुद्ध जा पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव नहीं हो पाता है. इसी के चलते लाभ-हानि, अर्थ-अनर्थ, स्वर्ग-नरक, मंगल-अमंगल आदि अवधारणाओं ने मन-मष्तिष्क को कुंद कर दिया है.
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तथाकथित धर्मगुरुओं के अनगिनत और रसूखदार अनुयायी होने के कारण जहाँ ये बाबा अकूत संपत्ति के मालिक बन बैठते हैं वहीं धर्म की आड़ में आपराधिक गतिविधियों का सञ्चालन भी करने लगते हैं. एक आसाराम प्रकरण ने ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न धर्मों के विभिन्न तथाकथित गुरुओं ने अपने क्रियाकलापों से धार्मिक विश्वास को खंडित किया है. धार्मिक उपदेश देते, प्रवचन करते इन तथाकथित बाबाओं को अपने अनुयायियों का विश्वास खंडित करने से, धार्मिक पाखण्ड फ़ैलाने से भले ही कोई न रोक पाए किन्तु इनकी अंध-भक्ति में लीन इनके अनुयायियों को समझाना होगा कि वास्तविकता क्या है...उनके धर्म-गुरुओं की असलियत क्या है. हालाँकि धार्मिक आडम्बरों की अंध-दौड़ में शामिल समाज से ऐसी जागरूकता दिख पाना हाल-फ़िलहाल तो संभव नहीं लगता.

12 दिसंबर 2012

समय को नियंत्रण में लेने की कवायद



            12-12-12 का अद्भुत संयोग किसी नक्षत्र, किसी ग्रह, किसी तारे के कारण नहीं वरन् हम मनुष्यों द्वारा बनाये गये कैलेण्डर के कारण सामने आया है। यह इस कारण से विशेष, अद्भुत और ऐतिहासिक है कि यह संयोग इस सदी का अंतिम संयोग है और ऐसा पूरी एक सदी के बाद सामने आने वाला है। यह और बात है कि तकनीकी को अपने नियन्त्रण में समझने वाला मनुष्य कहीं न कहीं इसी तकनीक के द्वारा समय को भी नियन्त्रण में लेना चाहता है। 12-12-12 के इस संयोग में बहुत से माता-पिता अपने बच्चों का जन्म भी करवाना चाह रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भी ऐसे संयोगों में बहुतेरे माता-पिताओं ने ऑपरेशन के द्वारा बच्चों को समय से पूर्व ही इस संसार से परिचित करवा दिया था।

            आदिमानव से मानव और फिर मानव से महामानव बनने की चेष्टा में मनुष्य ने तकनीक का विस्तार तो किया ही किन्तु उसी तेजी से अपने अंधविश्वासों में भी वृद्धि कर ली। 12-12-12 के इस क्षण को अकारण अंकशास्त्र से, ज्योतिष से जोड़कर इसके लाभ-हानि का आकलन किया जा रहा है। समझने वाली बात है कि मनुष्यों द्वारा बनायी गई इस गणनाविधि को लाभ-हानि से, मनुष्य के जीवन पर उसके अच्छे-बुरे प्रभाव से कैसे जोड़ा जा सकता है? 21वीं सदी की बात करने वाला इंसान, चांद को अपने पैरों तले रौंदने वाला इंसान, अंतरिक्ष में आये दिन सैर-सपाटा करने वाला इंसान कितनी आसानी से चन्द तारीखों के संयोग में अपने आपको नियन्त्रित कर लेता है। देखा जाये तो किसी न किसी रूप में उसका इन तिथियों के नियन्त्रण में आना कहीं न कहीं समय को नियन्त्रित करने की कवायद भर है।

            किसी भी विशेष तिथि पर, किसी भी विशेष संयोग पर अपने जीवन की महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण और साधारण से साधारण घटना को जोड़कर इंसान जीवन भर के लिए उस समय विशेष को अपनी कैद में कर लेना चाहता है। यह किसी भी मायने में बुरा अथवा गलत नहीं है किन्तु कई बार इस समय को नियन्त्रण में लेने के लिए उसके द्वारा उठाये गये कदमों से एक प्रकार की निरर्थकता दिखती है। बहरहाल, प्रत्येक इंसान की अपनी-अपनी कार्यशैली और अपनी-अपनी सोच होती है। उसी के द्वारा वह स्वयं ही अच्छे और बुरे का निर्णय लेता है। इंसान के निर्णयों को इंसान पर ही छोड़ते हुए हम बिना किसी अंकशास्त्र के, बिना किसी ज्योतिष की गणना के स्वयं को इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनाकर अपने आपको समय के नियन्त्रण में कर रहे हैं; समय को भी अपने नियन्त्रण में करने का प्रयास कर रहे हैं।

            12-12-12 के इस ऐतिहासिक संयोग के साक्षी बनने के साथ-साथ हम 12:12:12 के संयोग के भी साक्षी बन रहे हैं। 12-12-12/12:12:12 के इस ऐतिहासिक पल की साक्षी रहेगी हमारी यह पोस्ट। आइये हम सभी इस ऐतिहासिक पल का स्वागत करें, कोई अच्छा सा काम करें और जिन्दगी भर के लिए इस सदी के इस पल को अपने नियन्त्रण में कर लें।
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चित्र गूगल छवियों से साभार 

21 अप्रैल 2010

करते रहो अपराध --- तुम कहाँ करते हो, करने वाला और करवाने वाला तो भगवान है




धर्म के नाम पर जो आस्था लोगों में दिखती है उस आस्था के पीछे के तर्क और कुतर्क अपनी आस्था को सही सिद्ध करने के लिए दिये जाने का औचित्य आज तक हमारी समझ में नहीं आया। समाज हर प्रकार की सोच वालों से भरा पड़ा है, किसी की सोच धर्म को लेकर, ईश्वर को लेकर सकारात्मक है और किसी की सोच नकारात्मक है। सभी के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं, इसमें अच्छा-बुरा स्वयं उसकी सोच का परिणाम हो सकता है।

ईश्वर के अस्तित्व को लेकर, उसके द्वारा किये जाने वाले कार्यों को लेकर समाज में अपनी-अपनी राय कायम है। जो भी ईश्वर को मानता है, उसके अस्तित्व पर भरोसा करता है उसके अनुसार प्रत्येक होने वाले कार्य के पीछे कुछ न कुछ अच्छाई छिपी होती है। हो सकता है कि यह देखने का नजरिया हो किन्तु हमेशा ही ऐसा हो यह सत्य नहीं है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

माना कि इंसान के साथ जो भी घटित होता है उसके पीछे भगवान की अच्छा करने की मंशा छिपी होती है तो फिर आपस में किसी भी बात को लेकर विवाद क्यों होता है? क्यों नहीं हर काम को भगवान की अच्छी नियति का परिणाम माना जाता है? यह भी स्वीकारा जाता है कि व्यक्ति जो भी काम करता है उसके करवाने के पीछे भगवान का हाथ होता है। यदि इसे भी ईश्वरवादी दृष्टिकोण से सही मान लिया जाये तो भी हमें किसी भी काम के लिए किसी पर आरोप-प्रत्यारोप नहीं करने चाहिए।

इस मत के अनुसार तो आतंकवाद, हिंसा, हत्या, बलात्कार, डकैती आदि-आदि जो कुछ भी हो रहा है उसमें इंसान का नहीं भगवान का हाथ है। तमाम सारे सेक्स स्कैंडल में बाबाओं का फँसना दिखाया जा रहा है तो बेचारे बाबा कहाँ ऐसा कर रहे हैं, करवाने वाला तो ईश्वर है और हो सकता है कि इस सेक्स स्कैंडल में भी कोई अच्छाई छिपी हो?

हो सकता है कि इस पूरे दृष्टिकोण में, सोच में कोई सकारात्मकता छिपी हो किन्तु इसके बाद भी एक बात हमारी समझ में कभी नहीं आई कि जिस परिवार में किसी जवान बेटे-बेटी की मौत हो गई हो वहाँ इस तरह की घटना के पीछे भगवान की कौन सी अच्छाई छिपी हो सकती है?

यह भले ही हो सकता हो कि हम अपने आपको प्रत्येक कार्य के लिए उपयुक्त नहीं पाते हैं और ऐसे में किसी न किसी का सहारा खोजते हैं। इस सहारे के लिए हमने भगवान जैसी सर्वशक्तिमान अवधारणा को जन्म दे रखा है। यदि ऐसा है तो इस तरह के कुतर्क अवश्य ही समाप्त होने चाहिए कि जो होता है वह अच्छे के लिए होता है अथवा जो भी होता है वह भगवान की मर्जी से होता है।

भगवान, ईश्वर व्यक्ति की अपनी श्रद्धा का प्रतीक है, इसे किसी पर जबरदस्ती नहीं थोपा जाना चाहिए। ऐसा आवश्यक नहीं कि किसी काम का फल एक के लिए सुखद हो तो वह सभी के लिए सुखद ही होगा। भगवान का नाम लेकर समाज को बरगलाने वालों से अब सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि इधर हाल के वर्षों में भगवान, ईश्वर, पूजा, हवन, ज्योतिष आदि पर लोगों की श्रद्धा अगाध रूप से बढ़ती जा रही है जो यकीनन किसी सुखद और सकरात्मक दृष्टिकोण का परिचायक नहीं है।

इस बढ़ती हुई भक्ति भावना की सत्यता को, ईश्वर की सत्ता की सत्यता को जल्द से जल्द सामने लाना होगा। इसके पीछे इस तथ्य को ध्यान रखना होगा कि अब ईश्वरीय सत्ता में अगाध आस्था, श्रद्धा, भक्ति दर्शाने वाला वर्ग युवाओं का है। यह वह युवा वर्ग है जिसके हाथों में देश का, समाज का और स्वयं उनका भविष्य है और इन हाथों में अभी से पूजा की थाली, फूल, जुड़े हुए हाथ, मंत्रोच्चारण करती जुबान कदापि सुखद और सकारात्मक नहीं कहे जा सकते हैं।



24 अक्टूबर 2008

मन का विश्वास भगवान, मन का वहम भूत

हम इक्कीसवीं सदी में खड़े हैं और अंधविश्वास को अभी भी उसी तरह जकडे बैठे हैं जैसे कि कहीं हड़प्पा संस्कृति में निवास कर रहे हों. आए दिन तमाम तरह के आडम्बरों का संचालन, भूत-प्रेतों के किस्से, ओझा-तांत्रिकों की गतिविधियाँ आदि-आदि बतातीं हैं कि हम पढने लिखने के साथ-साथ इन सब बातों पर भी बहुत ज्यादा विश्वास करने लगे हैं. हो सकता है कि ये बात बहुतों को न पचे पर ये व्यक्तिगत रूप से हमारे साथ सत्य है कि हम भूत-प्रेत को नहीं मानते और उसी के साथ भगवान् को भी नहीं मानते; इसके उलट एक शक्ति पर विश्वास है जो अच्छी है तो भगवान् और बुरी है तो भूत.
अपनी मित्र-मंडली में इस बात को लेकर बहुत बहसाबहसी होती है. हमारे कई मित्रों का, जो भगवान्, पूजा-पथ आदि करते हैं उनका कहना है कि भगवान् है और भूत नहीं. वे तर्क देते हैं कि भूत मन का वहम है, हमारा मानना है कि भगवान् मन का विश्वास है. उनका कहना है कि भूत को किसने देखा, हमारा जवाब कि भगवान् को किसने देखा? बहस चलती रहती है, तर्क-वितर्क होते रहते हैं वे अपनी बात पर अडे रहते हैं हम अपनी बात पर. इधर कुछ ऐसा हुआ कि लगा कि इन सब बातों पर आजकल लोगों का ध्यान अपनी आपाधापी की जीवन-शैली के कारण भी बढ़ गया है. मन का विश्वास किसी चीज को भगवान् बना देता है और मन का वहम उसी चीज को भूत बना देता है.
अपने मन की सोच और परिस्थिति भी बहुत हद तक भूत-भगवन की स्थिति का निर्धारण करती है. अपने छात्र जीवन में स्नातक की पढाई के समय होस्टल में रहने का अवसर मिला. ग्वालियर साइंस कॉलेज की बात है. पहला वर्ष, होस्टल में भी आए हुए लगभग एक माह हुआ था. हमारा होस्टल जिस जगह पर बना था वहाँ किसी ज़माने में कब्रिस्तान रहा था (ऐसा वहाँ के बूढे बाबा और पुराने छात्रों, लोगों का कहना था) बहरहाल, होस्टल के शुरू के दिनों में पढाई कम और हुडदंग अधिक होता था. सीनियर छात्रों का एक विशेष अभियान रात को दस-ग्यारह बजे के बाद चलता था नए छात्रों के रूम में जाकर अड्डेबाजी करना और हँसी-मजाक के दौर के बीच भूत-प्रेतों के किस्से सुनाना; होस्टल के अन्दर होने वाली डरावनी बातों, घटनाओं (उनकी ख़ुद की बनाई कहानी) की बड़े डरते हुए अंदाज़ में चर्चा करना. ऐसा लगभग रोज का काम होता था।
इधर घर में कुछ माहौल ऐसा रहा कि डर नहीं लगता था पर होस्टल के नाम का डर किसी भी भूत से अधिक था.नए-नए थे इस कारण रैगिंग का भी डर रहता था पर माहौल बहुत अच्छा रहता था. बहरहाल एक रात को यही कहानी ख़तम हुई और सब अपने-अपने कमरों को चले गए. हमारा रूम-पार्टनर 'राजीव' हमारे शहर उरई का ही था और वो किसी काम से घर आ गया था. रूम में हम अकेले, भूतों-प्रेतों, डरावने किस्सों को लेकर सोने लगे. सोये हुए लगभग एक घंटा हुआ होगा (शायद तीन बजे का समय रहा होगा) खर्र....खर्र....खर्र की आवाज़ सुनाई पडी. पलंग के सिरहाने ही हमारी स्टडी टेबल रहती थी हाथ बढ़ा कर उस पर रखा टेबल-लेम्प जला दिया...आवाज़ आनी बंद हो गई. कमरे में इधर-उधर देखा, कहीं कुछ नहीं............फ़िर लाईट बंद की, आँख बंद की और फ़िर वही खर्र......खर्र.....खर्र की आवाज़.........फ़िर हाथ बढ़ा कर लाईट जलाई, आवाज़ बंद। ऐसा लगभग पाँच-छः बार हुआ. अब न डरने के बाद भी एक अनजाना सा डर लगने लगा.
बड़ी हिम्मत करके बगल में रखी हाकी उठा कर उस खिड़की तरफ़ देखा जहाँ से आवाज़ आ रही थी. नीचे झांक कर देखा (कमरा पहली मंजिल पर था) एक आवारा गाय पेड़ के तने से अपना सींग रगडती है. जब लाईट बंद रहती है तो वो सींग रगड़ने लगती है और लाईट जलने पर बंद कर देती थी. यहाँ हमारे न डरने का एक कारण ये भी रहा था कि हमें लग रहा था कि होस्टल का हमारा कोई साथी हमें डराने की कोशिश कर रहा है पर एक डर ये भी लग रहा था कि ऐसा क्या है जो लाईट जलते ही बंद हो जाता है और लाईट बंद होते ही आवाज़ करना शुरू कर देता है?
आज-कल कुछ इसी तरह की स्थिति हमारी हो गई है.......चैनल हमारे हास्टल के पुराने छात्रों की तरह किस्से-कहानियाँ सुना-दिखा रहे हैं..........हम अपने सोचने-समझने की शक्ति को बंद करे डर रहे हैं. अपने लिए न सही आने वाली पीढी के लिए ही सही, हाथ बढ़ा कर समझ-विश्वास की लाईट को जलाना होगा।