05 September 2013

आडम्बरों के चलते धार्मिक मान्यताएं बनीं अंध-विश्वास




एक तरफ इन्सान अपने कदम विज्ञान की ओर बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ वह अन्धविश्वास की तरफ भी जा रहा है. दैनिक क्रियाकलापों में तमाम धार्मिक गतिविधियों को शामिल कर इन्सान ने जहाँ धर्म को पाखंड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है वहीं धर्म की आड़ में अपना व्यापार करने वालों को भी फलने-फूलने में मदद की है. समाज के वैज्ञानिक, तार्किक हो जाने का तात्पर्य ये कतई नहीं है कि धर्म से विमुख हो जाया जाये; या फिर विज्ञान के नाम पर तमाम सारे क्रियाकलापों को, मान्यताओं को, रीति-रिवाजों को, परम्पराओं को ठुकरा दिया जाये. ऐसा भी नहीं है कि जितनी भी धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न की जाती हैं वे सभी आडम्बरों को, अन्धविश्वास को बढ़ावा देती हों किन्तु जिस तरह से उनका सञ्चालन होने लगा है, उसने उन सभी को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है.
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पुरातन काल में जब इन्सान पढ़ा-लिखा नहीं था, विज्ञान से उसका व्यावहारिक सम्बन्ध नहीं था उस दौर में उसने विभिन्न गतिविधियों को जनहित की दृष्टि से धार्मिकता से सम्बद्ध कर दिया था, जिससे कि समाज उनका पालन करते हुए हानि से बच सके. इसको एक-दो उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है. ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू नहीं लगानी चाहिए, देखा जाये तो इसके पीछे इतनी ही सोच रही होगी कि अँधेरे में घर की कोई वस्तु, सामग्री कूड़े में न चली जाये. ये सभी को ज्ञात है कि उस समय प्रकाश व्यवस्था किस हालत में रही होगी. इसी तरह से नदियों, पेड़-पौधों, जानवरों आदि में ईश्वरीय शक्ति बता देने के पीछे कहीं न कहीं पर्यावरण की रक्षा का मंतव्य रहा होगा. कहीं न कहीं मानव स्वतंत्रता के लिए ही देवी-देवताओं के अनगिनत रूपों को प्रचलित कर रखा गया होगा. किसी पर देवी-देवता विशेष को मानने-पूजने का बंधन नहीं रखा गया होगा. इसी तरह के शगुन-अशगुन देख कर तमाम दूसरे टोन-टोटके बनाये गए होंगे. इनमें से बहुत से समय से साथ खंडित भी किये जाते रहे हैं. जिनमें सूर्य-ग्रहण, चन्द्र-ग्रहण सम्बन्धी मान्यताओं को देखा जा सकता है.
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इस सत्य से शायद ही कोई इंकार करे कि हम जब भी किसी संकट में घिर जाते हैं तो अपने से सक्षम का सहारा तलाशते हैं, विशेष रूप से अपने बड़े का. दैवीय शक्ति की मान्यता के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा कि जब इन्सान किसी मुसीबत में घिर जाये तो उसका स्मरण करके खुद में एक तरह का विश्वास पैदा कर सके. इस मान्यता को कतिपय धार्मिक कर्मकांडियों ने अपनी गिरफ्त में लेकर लोगों के सामने भगवान का भय जगाना शुरू कर दिया; मुसीबतों से बचाने का कारोबार करना शुरू कर दिया; हर समस्या का समाधान निकालना शुरू कर दिया. अशिक्षितों की कौन कहे जब पढ़े-लिखे लोग ही ढोंगियों के चक्कर में फंसकर धर्म को रसातल की ओर ले जाने लगे; सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय दृष्टि से बनाई गई मान्यताओं को अन्धविश्वास के सहारे पल्लवित-पुष्पित करने लगे. आज हालत ये है कि अधिसंख्यक व्यक्ति या तो घनघोर तरीके से धर्म के कब्जे में हैं या फिर वे लोग हैं जो धर्म को अन्धविश्वास, पाखंड बताकर मानवहित में बनी मान्यताओं को आधुनिकता के नाम पर ध्वस्त करने में लगे हैं. हो सकता है कि धार्मिकता का नाम देकर पुरातनकाल में बनाई गई अधिकांश मान्यताएं आज स्वीकार्य न हों किन्तु इसके बाद भी बहुत सी मान्यताएं ऐसी हैं जिनके स्वीकार करने, अपनाने से सामाजिकता का, मानवता का भला ही होगा. इसके लिए हमें अंध-विश्वास से बाहर आना होगा, अंध-श्रद्धा से बाहर आना होगा, अंध-व्यक्ति से बचना होगा.

1 comment:

Lalit Chahar said...

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