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13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


15 अप्रैल 2025

सकारात्मकता ही सफलता प्रदान करवाती है

विकास की दौड़ में अंधाधुंध भागते समाज में यदि मानसिकता की बात की जाये तो बहुतायत में ऐसे लोग मिलेंगे जो नकारात्मकता से भरे दिखते हैं. आपने अपने आसपास महसूस किया होगा कि सड़क पर चलते हुए लोग हों, बाजार के खरीददारी करती भीड़ हो, कार में बैठकर यात्रा पर निकले मुसाफिर हों, अपने काम के सम्बन्ध में दौड़ते-भागते लोग हों अथवा अन्य कोई और समूह, बहुतायत लोग परेशान से, विचारों में खोये, उदास से नजर आते हैं. बहुसंख्यक लोगों के चेहरों से एक तरह की मुस्कान, एक तरह की संतुष्टि, एक तरह की सकारात्मकता गायब मिलती है. यदि नकारात्मकता के सम्बन्ध में गणितीय नियमों पर ध्यान दें तो गणित के अनुसार दो नकारात्मक (निगेटिव) मिलकर धनात्मक (पॉजिटिव) की उत्पत्ति करते हैं. ऐसा निश्चित रूप से गणितीय संरचना में सम्भव है मगर सामाजिक रूप में, किसी व्यक्ति के जीवन में एक निगेटिव ही परेशानी पैदा कर देता है.

 

वर्तमान में समाज में बहुतायत में नकारात्मकता देखने को मिल रही है. काम करने का ढंगजीवन-शैलीसोचना-समझनातर्क-वितर्कसामाजिक सरोकार आदि में नकारात्मकता परिलक्षित हो रही है. विकासोन्मुख इन्सान अपने विकास के सापेक्ष नकारात्मक होता जा रहा है. इसके पीछे खुद इन्सान की ही बहुत बड़ी भूमिका है. किसी भी तरह की जरा सी परेशानी कोछोटे से कष्ट कोकिसी छोटी सी घटना को वह अपने दिल-दिमाग में इस कदर बैठा लेता है कि उसके सापेक्ष सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने लगता हैउन्हीं घटनाओं के सन्दर्भ में आने वाले समय की सफलताओं-असफलताओं को निर्धारित करने लगता है. अतीत की समस्याओंपरेशानियोंकष्टों को वर्तमान अथवा भविष्य के साथ जोड़कर कार्य करने से जहाँ एक तरफ कार्य-क्षमता प्रभावित होती है वहीं दूसरी तरफ अन्य विकासात्मक कार्यों में भी व्यवधान पड़ता है.

 



यह सच है कि परिस्थितियाँ किसी न किसी रूप में मनुष्य के सोचने-समझने को प्रभावित करती हैं किन्तु यह भी सच है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्थिर रखेसंयमित रखेनियंत्रित रखे तो निसंदेह वह अपनी सोच को भी नियंत्रित कर सकता है. इसी सोच के द्वारा जीवन में सकारात्मकतानकारात्मकता का निर्माण होता है. देखा जाये तो किसी के भी जीवन में सकारात्मकता हो या फिर नकारात्मकतावह कहीं बाहर से नहीं आती है. ये उसकी सोच और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है. यह मानवीय स्वभाव की बहुत बड़ी कमजोरी होती है कि किसी भी असामान्य स्थिति के उत्पन्न होने पर, किसी भी तरह की असहज स्थिति सामने आने पर व्यक्ति के मन-मष्तिष्क में सबसे पहले नकारात्मक विचार ही आते हैं. इस तरह की नकारात्मक स्थिति पर अंकुश नहीं लगाये जाने से ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में नकारात्मक लक्षणों की तीव्रता बढ़ती जाती है. इसके चलते वह अपने परिजनोंसहयोगियोंसामाजिक क्रियाकलापों में अकेलेपन का अनुभव करने लगता है. इससे उसके स्वभाव में भी बदलाव आने लगता है.

 

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आई नकारात्मकता को दूर नहीं किया जा सकता है. चूँकि यह स्थिति विशुद्ध सोच परमानसिकता पर आधारित हैइस कारण इससे छुटकारा भी पाया जा सकता है. नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है. इसके लिए सबसे पहले तो किसी भी व्यक्ति को अपने विश्वास कोअपनी सोच को कमजोर नहीं मानना चाहिए. आत्मविश्वास को सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखने वाले व्यक्ति किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते. ऐसे व्यक्ति जिनको छोटी-छोटी समस्याओंपरेशानियों के चलते नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं उन्हें सदैव ऐसे लोगों से मिलने से बचना चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातों को प्रश्रय देते हैंउन्हें बढ़ावा देते हैं. अक्सर देखने में आता है कि व्यक्ति आपसी वार्तालाप में नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता हैअपने साथ होने वाले कष्ट कोदुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता हैउसे ऐसा करने से बचना चाहिए. सकारात्मक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए. इसके साथ-साथ जीवन को निरुद्देश्य समझकर गुजारने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अपना महत्त्व है और वह उसी के अनुसार इस समाज में अपना योगदान दे रहा होता है. समाज में अपना योगदान से रहे ऐसे लोगों को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए साथ ही अपने किसी शौक को भी स्थापित करने की आवश्यकता है. बहुधा देखने में आता है कि व्यक्ति लगातार कार्य करने के बाद भी समाज मेंपरिवार में उस प्रस्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है जिसका हक़दार वह खुद को समझता है. इसके चलते भी उसमें नकारात्मक सोच का जन्म होने लगता है. ऐसे व्यक्तियों को अपने किसी न किसी शौक के द्वारा अपने व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करना चाहिए.

 

नकारात्मकता से दूर रहने के लिए अथवा नकारात्मकता को स्वयं से दूर रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को खुद को तनावमुक्त रखने की आवश्यकता है. वर्तमान जीवन-शैली जिस तरह से होती जा रही है, उससे जरा-जरा सी बात पर व्यक्ति तनावग्रस्त होने लगता है. इससे बचने का एक सूत्र सदैव याद रखना चाहिए कि जो कार्य व्यक्ति के नियंत्रण में, उसकी पहुँच में है उसको कर लेना चाहिए, उसके लिए तनाव लेने की आवश्यकता नहीं और कोई ऐसा कार्य है जो उसके वश में नहीं, उसके द्वारा उसका समाधान किया जा पाना सम्भव नहीं तो ऐसे विषय पर उसे तनाव लेने की आवश्यकता नहीं. गणितीय नियमों की तरह सामाजिक जीवन में भी निगेटिव भी पॉजिटिव में बदलता है किन्तु इसके लिए व्यक्ति को अपने कार्य से संतुष्टिअपनी सोच में विश्वासअपने रहन-सहन में नियंत्रणअपने जीवन में उद्देश्य बनाये रखना चाहिए. याद रखना होगा कि व्यक्ति की सकारात्मकता ही उसको सफलता प्रदान करवाती हैउसे मंजिल तक ले जाती है.

 


26 अगस्त 2023

असफलता जीवन का अंत नहीं

अपने निर्धारित समय पर चंद्रयान 3 के चंद्रमा की सतह पर उतरते ही हम वैश्विक स्तर पर चौथे देश हो गए जिन्होंने चंद्रमा का स्पर्श किया है. इस उपलब्धि के साथ ही हम इसके दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाले पहले देश भी बने. चंद्रयान 3 अब किस तरह से चंद्रमा के, अंतरिक्ष के रहस्यों को उजागर करेगा; कैसे नवीनतम खोजों को आधार मिलेगा; कैसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान 3 भारत का नाम रोशन करेगा; कैसे हमारा देश अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की राह पर लगातार उन्नति के पथ पर बढ़ सकेगा; कैसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए अन्य देशों को अपने यान प्रक्षेपित करने के लिए विश्वसनीय मंच उपलब्ध हो सकेगा आदि पर लगातार मंथन होता रहेगा, विमर्श होता रहेगा. इसके सापेक्ष अभियान की इस सफलता ने प्रमुखता से सिखाया है कि असफलताओं से खुद को निराश नहीं किया जाना चाहिए.  




मात्र चार साल की अल्पावधि में जिस तरह से इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग की निराशा से बाहर निकल कर सफलता का झंडा चंद्रमा पर लहराया है, वह अनुकरणीय है. सन 2019 में भी हमारे वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 को दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था मगर चंद्रमा की सतह से कुछ पहले ही संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया था. लैंडर विक्रम की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने और फिर ऑर्बिटर से उसका संपर्क टूट जाने बाद तत्कालीन इसरो प्रमुख के. सिवन भाव-विह्वल हो उठे थे. उनका अपने आँसू न रोक पाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको गले लगाकर उनका हौसला बढ़ाना भारतवासी आज भी भूले नहीं हैं. उन आँसुओं के पीछे छिपी भावनात्मकता को आज की सफलता के बाद उमड़े आँसुओं से समझा जा सकता है, आज की स्वर्णिम गौरवमयी गाथा को समझा जा सकता है.


चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग के बाद से लेकर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के बीच वैज्ञानिकों के धैर्य, उनकी मेहनत, आत्मविश्वास की कहानी उन बच्चों को अवश्य ही सुनाई जानी चाहिए जो किसी एक प्रतियोगी परीक्षा की असफलता के बाद हताशा, निराशा, अवसाद के अंधकार में जाकर अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. देश का एक शहर कोटा लम्बे समय से जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए प्रसिद्ध रहा है वहीं अब वह बच्चों के द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं के लिए कलंकित हो रहा है. अभिभावकों को कोटा अथवा अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हौसला, हिम्मत बननी चाहिए. अभिभावकों को समझाना और समझना चाहिए कि दो-चार प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता ही ज़िन्दगी का अभीष्ट नहीं है. ज़िन्दगी इसके भी बहुत आगे तक है. सफलताओं के लिए और भी रास्ते हैं, और भी मंच हैं.


इस अभियान की सफलता से यह भी सीखने को मिलता है कि किस तरह से असफलता के तनाव से बाहर निकलकर अल्प समय में भी सफलता को प्राप्त किया जा सकता है. एक-एक अभियान में देश सैकड़ों करोड़ रुपये के साथ-साथ सैकड़ों वैज्ञानिकों की मेधा, श्रम, समय, संसाधन आदि का समन्वित स्वरूप कार्य करता है. एक ऐसे देश के लिए जहाँ पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है; गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या भी अधिक है; जनहितकारी योजनाओं में धन की कमी नहीं रहने दी जाती है; प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी खजाने से बिना किसी भेदभाव के सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वहाँ स्पष्ट है कि न केवल आर्थिक संसाधनों पर बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर, मानवजन्य संसाधनों पर भी एक तरह का दबाव बन जाता है. संभव है कि अनेकानेक भावी योजनाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया गया होगा. संभव है कि अनेक संचालित योजनाओं के बजट को रोककर इस महत्त्वाकांक्षी अभियान को सफलता की राह ले जाया गया होगा. ऐसे में सफलता प्राप्त करने का दबाव किस स्थिति तक रहता होगा, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है.


इन स्थितियों का दबाव न केवल सरकार पर वरन वैज्ञानिकों पर भी रहता होगा. एक अभियान की असफल लैंडिंग का तनाव लेकर, देश की अनेकानेक परेशानियों, समस्याओं को जानते-समझते हुए, वैश्विक जगत में खुद को स्थापित करने के दबाव को लेकर भी हमारे वैज्ञानिकों ने महान उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने दिखाया है कि हम भारतीय महज कीर्तिमान रचने के लिए नहीं वरन दुर्गम्य को सहज बनाने, अलभ्य को सुलभ बनाने के लिए पूर्ण मनोयोग, आत्मविश्वास से कार्य करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि एक असफलता जीवन मे संभावनाओं का अंत नहीं करती है, बस हमें ही अपनी हिम्मत बनाये रखनी चाहिए. यही हौसला, हिम्मत ही मिशन चंद्रयान के बाद गगनयान और सूर्य मिशन के लिए प्रेरित कर रहा है. इसी हौसले को, असफलता के बाद सफलता पाने के जज्बे को हमें अपने बच्चों को समझाने की आवश्यकता है. 





 

05 जनवरी 2021

जीतना भी खुद से, हारना भी खुद से

आज कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा था किन्तु कल से ही दिमाग में, दिल में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जिसका निदान सिर्फ लिखने से ही हो सकता है. असल में अब डायरी लिखना बहुत लम्बे समय से बंद कर दिया है. बचपन में बाबा जी द्वारा ये आदत डाली गई थी, जो समय के साथ परिपक्व होती रही. डायरी लिखने का महत्त्व भी समझ आता रहा सो डायरी लेखन लगातार बना रहा. बीच-बीच में ऐसे पल भी आये जबकि डायरी लेखन ने जीवन में काफी उठापटक मचा दी. भावनाओं का, संबंधों का अतिक्रमण करते हुए कुछ लोगों द्वारा डायरी का पढ़ना हो गया और उसका अनावश्यक दुष्प्रचार करके हमारी अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई. बहरहाल, समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता रहा, डायरी लेखन की आदत छूट न सकी और समयांतराल के साथ-साथ यह आदत बार-बार उभरती रही. हर बार कोई न कोई कारण ऐसा बनता रहा कि इसे बीच-बीच में बंद करते रहना पड़ा. गत वर्ष दिसम्बर में भी ऐसा हुआ। डायरी लिखना शुरू किया पर नियमितता न बन सकी। इसी बीच तकनीक से परिचय हुआ, ब्लॉग का आना हुआ और डायरी लेखन की आदत कागज से हटकर डिजिटल मंच पर आने लगी. ब्लॉग कहीं न कहीं डायरी के रूप में हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया. अब विचार है कि इसी माध्यम को डायरी की तरह प्रयोग में लाया जाए।



इधर बहुत लम्बे समय से ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम जीवन के विविध मंचों पर, तमाम आयामों पर असफल से होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि जीवन के किसी मोड़ पर सफलता नहीं मिली हो मगर जिस तरह से असफलताओं का आना होता रहा, उसके हिसाब से सफलताएँ कम ही साथ आईं हैं. यदि एक सामान्य रूप से अपने जीवन का आकलन, विश्लेषण करने बैठ जाएँ तो असफलताओं का कैनवास बहुत बड़ा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से अचानक ऐसी स्थितियों ने दिल-दिमाग पर जैसे कब्ज़ा सा कर लिया है. अपने आपका अपनी ही दृष्टि से मूल्यांकन किया जाता रहता है. कहाँ-कहाँ, किस-किस तरह की गलतियाँ हमारे द्वारा होती रहीं इनका विश्लेषण किया जाता रहता है. किस-किस गलती को सुधारा जा सकता है, कैसे सुधारा जा सकता है इसका भी आकलन किया जाता रहता है. भरसक प्रयास किया जाता है कि लगभग सभी गलतियों को सुधार दिया जाए. इसके बाद भी बहुत से कदम ऐसे हैं जिनको अब टाइम मशीन के द्वारा ही दोबारा पाया जा सकता है. उन कदमों के साथ हुई गलतियों को अब किसी भी रूप में सुधारा नहीं जा सकता है. ऐसे में लगता है कि उनका प्रायश्चित ही कर लिया जाए. यहाँ आकर भी सिर्फ खाली हाथ नजर आते हैं क्योंकि यह भी समय के चक्र में कहीं दूर हो चुकी स्थिति है.


फिलहाल तो आजकल अपने आपसे लड़ना हो रहा है. खुद से लड़ना, खुद से जीतना, खुद से हारना और फिर सबकुछ शून्य में विलीन होकर ज्यों का त्यों उसी अवस्था में दिखाई देने लगता है, जहाँ से लड़ना शुरू किया था. दिल-दिमाग लगाने के बाद भी हर एक स्थिति समझ से बाहर लगती नजर आती है. सबकुछ साथ होने के बाद भी साथ छूटता सा दिखाई देता है. हर गलती स्वीकारने के बाद भी, हर गलत कदम का प्रायश्चित करने के बाद भी गलतियाँ कम होने का नाम नहीं लेती हैं. तमाम सारी आदतों के बीच एक और आदत जो बाबा जी के द्वारा विकसित करवाई गई थी, रात को सोने के पहले दिन भर की गतिविधियों में से अच्छी और बुरी गतिविधियों का आकलन करना. अच्छी बातों को आगे करते रहने का संकल्प करना और बुरी बातों के लिए माफ़ी मांगते हुए आगे से न करने का वादा करना. हर रात उसी एक दिन की गतिविधियों के आकलन से शुरू होती है जो चलते-चलते अतीत तक पहुँच जाती है. अच्छी बातों के ऊपर गलत बातों का साया फैलता दिखाई देने लगता है. कब तक, कितनी बार, किस-किस से प्रायश्चित किया जाये? प्रत्यक्ष से, अप्रत्यक्ष से, चेतन से, अचेतन से, जीवित से, मृतक से न जाने किस-किस से ऐसा करना होता है, किया जा रहा है. इसके बाद भी खुद में हार जैसा, खुद में असफल होने जैसाएहसास बराबर बना रहता है. पता नहीं अन्दर से ऐसी कौन सी शक्ति विश्वास को बढाए रहती है, आत्मविश्वास को कमजोर नहीं होने देती है अन्यथा खुद के हार कर, टूट कर बिखरने में कोई कमी समझ नहीं आती है. पता नहीं कब तक ऐसा होता रहेगा?



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वंदेमातरम्

19 दिसंबर 2020

छोटे-छोटे सपनों के साथ बढ़ें सफलता की राह

कहते हैं कि सपने बड़े देखना चाहिए, बड़े सपने लगातार आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं. ऐसा कहने वालों का हो सकता है कि अपना अनुभव रहा हो इस तरह का. उनके द्वारा कोई बड़ा सपना देखा गया हो और वे उसी के लिए लगातार कार्य करते रहे हों, संघर्षशील रहे हों और अंततः अपने सपने को सच करने में सफल रहे हों. इसके उलट हमारा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि सपने बड़े उन स्थितियों में देखना चाहिए जबकि उनको सच करने के लिए संघर्ष करने की क्षमता असीमित हो. बड़े सपनों को देखने के बारे में उसी समय सोचना चाहिए जबकि अपने उस सपने को सच करने के अलावा किसी और तरह के कदमों को न बढ़ाना हो. यदि ऐसी स्थिति नहीं है तो छोटे-छोटे सपने देखने चाहिए और उनको लगातार सच करते हुए क्रमिक रूप से बड़े सपने की तरफ बढ़ते रहना चाहिए.


इस सन्दर्भ में अपने अनुभव के द्वारा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सक्रियता बनी हुई है. लगातार व्यावहारिक कार्य करने के साथ-साथ युवा वर्ग को इसके लिए प्रोत्साहित भी करते रहे हैं. अनेकानेक अवसरों पर राष्ट्रीय सेवा योजना के, राष्ट्रीय कैडेट कोर के बच्चों के साथ संवाद करने का मौका मिला. इसके अलावा बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भी लोगों को सामाजिक कार्यों के प्रति, कैरियर के प्रति जागरूक करने का अवसर मिला. इन सबके अपने अनुभवों से यह सीखने को मिला कि किसी भी सपने को, अपने किसी भी लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगता मेहनत की जाती है, लगातार प्रयास किया जाता है और इसके बाद भी यदि असफलता मिलती है तो बहुत ज्यादा निराशा होती है. लगातार मिलती असफलता, निराशा व्यक्ति में हताशा भी पैदा कर देती है.




जिन लोगों ने बड़े सपने, बड़े लक्ष्य निर्धारित करने के बारे में कहा होगा उनका भी अपना अनुभव रहा होगा. यहाँ उनके द्वारा कही गई बात को अथवा उनके अनुभव को गलत साबित करना हमारा इरादा नहीं है. आज जिस तरह से प्रतिस्पर्द्धा का माहौल है, आज जिस तरह से आपस में गलाकाट प्रतियोगिता हो रही है, इस समय जिस तरह से एक-दूसरे की टांग खींचते हुए खुद आगे निकल जाने की स्थिति दिखाई दे रही है उसमें सफलता की राह में एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल साबित हो रहा है. इसके साथ-साथ संसाधनों का लाभ लगभग सभी को मिल रहा है. इसमें उन्नीस-बीस का आँकड़ा भले हो मगर आज सभी किसी न किसी रूप में संसाधनों का लाभ ले उठा रहे हैं. ऐसे में योग्यता, तकनीक, ज्ञान, जानकारी किसी एक वर्ग अथवा एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई है. इससे भी आपसी प्रतिस्पर्द्धा में, प्रतियोगिता में बहुत ज्यादा संघर्ष बढ़ गया है. ऐसी स्थिति के चलते भी सफलता की तरफ बढ़ते कदमों में कदम-कदम पर अवरोध दिखाई देते हैं.


ऐसी स्थिति में आज की पीढ़ी बहुत जल्दी हताशा, निराशा, अवसाद में चली जाती है. एक-दो प्रयासों के बाद सफलता का मिल पाना उनके लिए जैसे जीवन की सभी राहों को बंद होने जैसा हो जाता है. ऐसा समझ में आते ही उनके द्वारा गलत कदम भी उठा लिए जाते हैं. आज की स्थिति को देखते हुए भी, आज के बहुसंख्यक युवाओं की कमजोर इच्छा-शक्ति को देखते हुए भी हमारा विचार यही रहता है कि सपने छोटे-छोटे देखे जाएँ, लक्ष्य छोटे-छोटे निर्धारित किये जाएँ. ये सपने सच भी हो सकते हैं, लक्ष्य की प्राप्ति भी हो सकती है, इससे हौसला भी बढ़ेगा और नए सपने, नए लक्ष्य की तरफ बढ़ने का प्रोत्साहन भी मिलेगा.



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वंदेमातरम्

12 जनवरी 2020

रिश्तों के निर्वहन में सामने आती असफलता


आज की पोस्ट रिश्तों पर लिखने की सोच रहे थे मगर लगा कि रिश्तों की परिभाषा है क्या? जो हम आपसी संबंधों के द्वारा निश्चित कर देते हैं, क्या वही रिश्ते कहलाते हैं? क्या रिश्तों के लिए आपस में किसी तरह का सम्बन्ध होना आवश्यक है? दो व्यक्तियों के बीच की दोस्ती को क्या कहेंगे, सम्बन्ध या रिश्ता? इस बारे में और भी सवाल हैं, अब कुछ इससे अलग. मान लिया जाये कि किसी भी तरह के सम्बन्ध को रिश्ते से परिभाषित कर सकते हैं. ऐसे में क्या रिश्तों की भी कोई उम्र होती है? क्या रिश्ते भी अंशकालिक, पूर्णकालिक, दीर्घकालिक, अल्पकालिक, क्षणिक आदि जैसे होते हैं? ये तमाम सारे सवाल दिमाग में इसलिए उपजे क्योंकि ये सब कहीं न कहीं हमारे दिल से जुड़े हुए हैं.


आये दिन ही किसी न किसी रिश्ते का खुद से दूर होना, टूटना देखते हैं. ऐसी स्थिति में हम खुद को ही परखने की कोशिश करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही गलत हों. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही रिश्तों का लिहाज न कर पा रहे हों. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही संबंधों के निर्वहन में सकारात्मकता न दिखा पा रहे हों. खुद को अनेक बार कई-कई नजरिये से, कई-कई मानकों से परखने के बाद भी कई बार लगता है कि हम ही गलत रहते होंगे, हम ही कोई न कोई गलती करते होंगे. यदि ऐसा नहीं तो क्यों किसी रिश्ते के, किसी सम्बन्ध के दिल से जुड़े होने के बाद भी वह हमसे दूर हो जाता है? यदि हम सही हैं तो फिर हमारे साथ संबंधों की, रिश्तों की स्थिति गलत कैसे हो जाती है? 

ऐसे संबंधों में किसी क्षणिक सम्बन्ध का, तात्कालिक रिश्ते का टूटना नहीं होता है. ऐसे सम्बन्ध, ऐसे रिश्ते जो कहीं न कहीं टूट गए हैं, कहीं न कहीं दरक गए हैं और लगभग टूटने की स्थिति में हैं वे कोई एक-दो साल के नहीं वरन दो दशकों के, उससे भी पुराने सम्बन्ध हैं. क्या सम्बन्ध भी किसी इमारत, भवन की तरह हैं जिनका एक समय बाद दरकना स्वाभाविक प्रक्रिया है? क्या लगातार मिलते रहना, लगातार संपर्क में रहना, सुख-दुःख में मिलना-मिलाना संबंधों की इमारत के लिए सुरक्षा कवच का काम नहीं करता है? कैसे एक झटके में दो-तीन दशक पुराने सम्बन्ध समाप्त कर लिए जाते हैं? क्यों एक झटके में पुरानी सारी बातें एक झटके में मिटा दी जाती हैं? क्यों बहुत पुराने सम्बन्ध विश्वास के आधार को बना नहीं पाते हैं?

आज ये सवाल बस सवाल बनकर सामने खड़े हैं. न इनके जवाब सूझ रहे हैं और न ही इनके जवाब तलाशने की हिम्मत हो रही है. व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कि हम हार रहे हैं, हार गए हैं. खुद को अपने ही पैमाने पर, अपनी ही दृष्टि में परखते हैं तो लगता है कि अत्यधिक गुणांक में असफलता ही साथ चलती है. ऐसा एहसास होता है कि अपने खुद के किसी भी रूप में हम सफल सिद्ध नहीं हो सके हैं. इन तमाम रूपों में एक व्यक्ति के रूप में हम किसी भी रूप में अपने आपको सफल सिद्ध न कर सके, इनमें खुद के पुत्र, पति, पिता, भाई, दोस्त सहित अनेकानेक रिश्ते समाहित हैं. समझ नहीं आता कि हम कहाँ असफल रह जाते हैं? कहाँ हम गलत कर जाते हैं? कहाँ हम किसी भी रिश्ते की तमाम अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते हैं. संभव है कि हमारी असफलता का पैमाना पूर्ण न हो मगर सत्य यही है कि बहुतायत में हमारे हिस्से असफलता ही आई है, किसी भी रिश्ते, किसी भी सम्बन्ध के निर्वहन को लेकर.

30 दिसंबर 2019

वर्ष 2019 में असफलताएँ ज्यादा आईं हमारे हिस्से में


दिसम्बर अपनी अंतिम अवस्था में है, ये साल भी अपनी अंतिम स्थिति में है. यही एक अवसर सभी की ज़िन्दगी में ऐसा होता है जबकि वह जाने वाले के लिए दुखी नहीं होता है बल्कि आने वाले के लिए ख़ुशी मनाता है. देश भर में सभी लोग आने वाले साल के स्वागत में जुट जाते हैं बिना इसकी परवाह किये कि जाने वाला साल पूरे साल, पूरे 365 दिन उसके साथ रहा. ऐसा क्यों? क्या जाने वाले के साथ हम सभी का क्षणिक नाता हो गया है, इसलिए? क्या जाने वाले को हम महज चंद पलों के लिए याद करना चाहते हैं, इसलिए? क्या हम यह सम्भावना तलाशने लगे हैं कि हर आने वाला हमारे जीवन में कुछ नया लेकर आएगा? जिस वर्ष को, जिस पल को हमने अभी देखा नहीं; वह हमारे लिए क्या-क्या लेकर आने वाला है; वह अपने साथ हमारे हितार्थ कौन-कौन सी सम्भावनाएं छिपाए हुए है ये हमें कुछ भी ज्ञात नहीं मगर हम सब उसके स्वागत में तत्पर हैं. क्यों?


बहरहाल, किसी भी साल के आने पर ऐसा ही होता है. कौन सा ऐसा पहली बार हो रहा है. ऐसा प्रत्येक वर्ष होता आया है, आगे भी होता रहेगा. न हमारे रोके रुकना है, न हमारे रोके रुकेगा. ऐसा अकेले अंग्रेजी नववर्ष के समय ही नहीं होता है वरन हिन्दू नववर्ष के आगमन पर भी होता है. दरअसल सामाजिक रूप से इसकी एक परिपाटी सी बना ली गई है कि आने वाले वर्ष का स्वागत करना है. अच्छा है ऐसा करना क्योंकि किसी भी नवांगतुक का स्वागत किया ही जाना चाहिए मगर इसके साथ-साथ जो आपके साथ लम्बे समय तक रहा, उसका आकलन भी आवश्यक है. आखिर जो साल इतने लम्बे समय तक साथ रहा. हर अच्छे-बुरे काम उसी के साए में किये गए तो क्या ये आवश्यक नहीं कि चंद पल रुक कर उनका आकलन कर लिया जाये? ये जान लिया जाए कि जाते हुए वर्ष के साथ हमने क्या अच्छा किया और क्या बुरा? क्या ये जानना भी आवश्यक नहीं कि जो साल अब दोबारा नहीं आने वाला वह हमारे लिए सुखद रहा या दुखद? 

संभव है कि बहुत से लोग इसे महज एक तरह का आदर्शवाद साबित करने की कोशिश करें. ये भी संभव है कि ऐसे किसी कदम को स्वानुभूति का माध्यम बताएं. कुछ भी संभव है मगर जिस तरह की एक आदत हमारे भीतर बचपन से डाली गई उसके अनुसार हम प्रतिदिन की घटनाओं का आकलन करते हैं. सोने के पहले ये विचार करते हैं कि दिन भर में हमने क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया. कितनी बातों को लेकर हम सफल रहे और कितनी बातों को लेकर हम असफल रहे. दिन भर की घटनाओं में कितनी घटनाओं ने हमें निराश किया और कितनों ने हमें खुश किया. साल के अंतिम दिन ऐसा ही गुणा-भाग हमारे साथ चलता रहता है. एक-एक दिन का आकलन करना और पूरे साल भर का आकलन करना अपने आपमें अलग काम है. ऐसे में खुद को नियंत्रित करके अपने कार्यों के, अपने स्वभाव के बारे में कुछ भी आकलन करना, विश्लेषित करना बहुत बड़ा काम होता है. समाज को दिखाने के लिए कुछ भी कह-सुन लिया जाये मगर हम खुद की नज़रों में अपना आकलन निष्पक्ष रूप से करते हैं. यदि आज इस वर्ष के जाने के महज एक दिन पहले अपना आकलन करें तो समीक्षात्मक रूप से हम असफल ही रहे हैं. सामाजिक स्तर पर, पारिवारिक स्तर पर, दोस्ती के स्तर पर, व्यावहारिक स्तर पर. यदि कहीं सफलता मिली है तो वह भी क्षणिक खुद के खेलकूद के स्तर पर. इसके अलावा लगभग सभी स्थितियों में हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी है. किसी भी रूप में हम किसी भी स्तर की ख़ुशी सबके बीच इस हिसाब से नहीं बाँट सके कि कहा जा सके कि यह स्थिति हमारे लिए सुखद रही. आने वाले वर्ष में इन सभी को देखते हुए सुधारने की कोशिश करना है. वर्ष 2020 में भी सफल होंगे या असफल, ये तो समय के गर्भ में है.



10 दिसंबर 2019

प्रबल आत्मविश्वास ने ज़िन्दगी को जीना सिखलाया

किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके आत्मविश्वास का बहुत बड़ा योगदान होता है. इस बात को न केवल कहा जाता रहा है बल्कि बहुत से व्यक्तियों ने इसे अमल में लाकर इसे सच भी साबित किया है. विश्वास से ओतप्रोत व्यक्ति के चेहरे की आभा, उसके बातचीत का तरीका, कार्य करने का ढंग सबसे अलग ही नजर आता है. उसका सबसे अलग अंदाज ही उसे सबका प्रिय भी बनाता है और जीवन में सतत सफलता की राह पर भी ले जाता है. विश्वास, आत्मविश्वास को बनाये रखना किसी और के हाथ में नहीं वरन उसी सम्बंधित व्यक्ति के हाथ में होता है. उसकी खुद की सोच, उसकी खुद की मनोदशा, उसकी खुद की प्रकृति निर्धारित करती है कि उसके विश्वास का बिंदु किस ऊँचाई तक जा सकता है.


अपने जीवन में अनेक व्यक्तियों से मिलना हुआ, जिनमें विश्वास का चरम देखने को मिला. बहुत से लोग ऐसे मिले जो सहज रूप में अपनी जीवन-शैली का निर्वहन करते आ रहे हैं. ऐसे लोगों के जीवन में भले ही सुविधाओं की अतिशयता न रही हो मगर उनके सामने समस्याओं का, मजबूरी का, किसी कमी का होना भी नहीं रहा है. ऐसे लोग बिना किसी परेशानी के, स्वयं ही अत्यंत सहजता से अपने विश्वास के द्वारा अपनी सफलता की राह निर्मित करते मिले. इसके साथ-साथ ऐसे लोगों से भी मिलना होता रहा जिनके जीवन में अभाव बुरी तरह से रहे. ऐसे लोगों से भी मिलना हुआ जिनके लिए किसी तरह की सशक्त, समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि उपलब्ध नहीं रही. बहुत से ऐसे लोग मिले जिन्होंने अपने जीवन का बहुत बड़ा समय समस्याओं को हल करने में, अपनी परेशानियों को हल करने में ही लगाया. बहुत से ऐसे व्यक्तियों से भी परिचय होता रहा जिनकी शारीरिक स्थिति सामान्य व्यक्तियों की तरह से नहीं रही. ऐसे सभी लोगों के पास भले ही संसाधनों का अभाव रहा हो, भले ही पारिवारिक समृद्धि उनके लिए रास्तों का निर्माण नहीं कर सकी हो, भले ही उनकी शारीरिक स्थिति ने उन्हें समाज में सामान्य व्यक्ति की तरह से अनेक क्रियाकलापों से दूर कर रखा हो मगर ऐसे लोगों ने अपने विश्वास के बलबूते, आत्मबल के सहारे खुद को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित किया है.

आत्मविश्वास से लबरेज एक ऐसे व्यक्ति से आज लगभग दो दशक पुरानी दुर्घटना की याद के सहारे मिलना हुआ. उस समय अपने करीबी, बड़े भाई सरीखे अभिन्न मित्र के परिजन का एक ट्रेन दुर्घटना में अत्यंत गंभीर रूप से घायल होने का समाचार मिला. युवावस्था में कदम रखने के दौरान, जबकि आँखों में भावी जीवन के सपने बनने शुरू ही हुए होंगे, तकनीकी शिक्षा का आरम्भ अभी हुआ ही था लगा जैसे उसके सपने बिखर गए हैं. लगा जैसे कि जीवन आरम्भ होने के पहले ही किसी स्पीड ब्रेकर पर थमने सा लगा है. समय गुजरता रहा. उस होनहार युवक के बारे में लगातार जानकारियाँ मिलती रहीं. उसके द्वारा आत्मविश्वास के लगातार सहारे उन्नति के रास्ते पर बढ़ने के समाचार मिलते रहे. इन सबके बाद भी कभी मिलने का अवसर नहीं मिल सका. न मिलने के बाद भी महसूस होता रहा कि अपनी युवावस्था में दुर्घटना के द्वारा देह के स्तर से उपजी अक्षमता को उस होनहार, प्रसन्नचित्त, आत्मविश्वासी युवक ने जैसे हरा दिया है. अब जबकि उससे मिलना हुआ तो उसे वैसा ही पाया जैसा कि हम महसूस करते थे. आज पहली बार मिलना हुआ, उस युवक से. ढेर सारी बातें हुईं. पुरानी बातों को याद न करते हुए वर्तमान पर ही चर्चा हुई. हँसी-ख़ुशी के माहौल में उसका हँसमुख व्यवहार, विश्वास से दमकता चेहरा, मिलनसार व्यक्तित्व निश्चित रूप से उस निकटता को और बढ़ा गया, जो निकटता लगभग दो दशक पहले उसकी दुर्घटना की खबर सुनने के बाद बनी थी. निश्चित ही ऐसे युवक समाज में ऐसे लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं, जो सभी तरह से सक्षम होने के बाद भी अपनी असफलताओं का रोना रोते रहते हैं. खुद को समाज की मुख्यधारा से अपने कमजोर विश्वास के हाथों हाशिये पर लगाये रहते हैं.

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चित्र परिचय –
काले सूट में गीत, जो लगभग दो दशक पहले एक ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैर और बायाँ हाथ खो चुके हैं. उस समय वह इंजीनियरिंग के छात्र थे. अपनी शिक्षा को उसके बाद भी उन्होंने पूरा किया. इस स्थिति में भी अपने विश्वास को, आत्मबल को उन्होंने कमजोर न पड़ने दिया. शिक्षा पूरी करने के बाद वे वर्तमान में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, SAIL में कार्यरत हैं.
आप जनपद जालौन के प्रसिद्द रंगकर्मी, फिल्मकार प्रभात तिवारी (कुरते में बैठे हुए) के भांजे हैं.