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22 अप्रैल 2026

बाईस को हुए इक्कीस

कभी अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना था कि समय पंख लगाकर उड़ता है. ऐसा होता हुआ अब समझ में भी आता है. पता नहीं आप लोगों को ऐसा महसूस होता है नहीं पर हमें तो लगता है कि जैसे समय वाकई उड़ता है. वर्तमान में खड़े होकर अतीत की किसी भी घटना को याद किया जाये तो लगता है जैसे कल की ही बात है मगर जब समय का आकलन किया जाता है तो समझ आता है कि बहुत-बहुत समय गुजर गया है. ऐसा न केवल सुखद घटनाओं के सन्दर्भ में होता है बल्कि दुखद घटनाओं के सन्दर्भ में भी होता है.

 

अपने जीवन की बहुत सी न भुलाये जाने वाली घटनाओं में एक घटना आज, 22 अप्रैल को घटित हुई थी. आज पलट कर उस दिन को याद किया तो समझ आया कि ये कल की घटना नहीं बल्कि 21 वर्ष पुरानी बात है. चूँकि इस पर हमें आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पहले दिन से लेकर आजतक एक पल को भी उस घटना को भुला नहीं सके हैं. भुलाना चाहते तो भी न भुला पाते, आखिर वो घटना महज एक घटना नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ गई घटना थी. सुबह उठने से लेकर देर रात सोने तक एक-एक पल, एक-एक कदम, एक-एक काम उस घटना से जुड़ा रहता है, उस घटना को जीवित बनाये रखता है. ऐसी स्थिति में उस दिन को, उस घटना को भुलाया जाना सम्भव ही नहीं.

 



बहरहाल, जीवन की साँस, धड़कन की तरह हमारी ज़िन्दगी से जुड़ चुकी वह घटना आज पूर्ण रूप से बालिग़ हो गई है. 21 वर्ष की समयावधि पलक झपकते नहीं गुजरी है बल्कि इन 21 वर्षों के गुजरने ने बहुत बड़ी कीमत वसूली है, बहुत सारा दर्द दिया है, बहुत सारा कष्ट दिखाया है. बावजूद इसके चलना जारी है, समय का पूरे उत्साह से गुजरना बना हुआ है. शौक जिंदा है, एहसास जिंदा है.


16 मार्च 2026

पिताजी के बाद का समय

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 

आज बहुत सी घटनाओं के समय लगता है कि समय ने बहुत कुछ दिया मगर उससे ज्यादा कष्ट दिया है. बावजूद इसके कोशिश यही रहती है कि कहीं से कमजोर न पड़ें. आपकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करते हुए जीवन में आई दिक्कतों, उलझनों से निपटने, निकलने का रास्ता बनाते रहते हैं. 

आपके श्रीचरणों में सादर नमन.

23 फ़रवरी 2026

अइया को याद करते हुए

संसार में आने वाले व्यक्ति को जाना होता ही है, ये विधान है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अईया के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अईया के चले जाने के बाद के पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं मगर एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था.

 

खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अईया की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.


14 जनवरी 2026

कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते

लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


प्रिय मिंटू 

ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

16 जुलाई 2025

जहाँ हो वहाँ खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आज से चार वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.

16 मार्च 2025

आपके बिना दो दशक का सफ़र

 दो दशक की यात्रा, आपके बिना. 

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 


14 जनवरी 2025

रुलाने वाली तारीख

रुलाने लगी है अब ये तारीख. 

लोग कहते हैं कि समय हर तरह के घावों को भर देता है मगर हमें लगता है कि कुछ घाव समय के साथ भी नहीं भरते. ये एक दर्द है, एक घाव है जो आजीवन साथ रहेगा, ताउम्र साथ चलेगा. हर पल में दर्द देगा, हर बात पर आँसू लाएगा. इसके बाद भी जीवन इसी के साथ चलेगा, तुम्हारे बिना तुमको साथ लेकर चलेगा.


प्रिय मिंटू 

ढेरों आशीर्वाद, जहाँ रहो सुखी रहो, खुश रहो.

22 अप्रैल 2024

भुलाए न भूले जो तारीख

समय गुजरता रहता है. दिन, महीने, साल भी गुजरते जाते हैं. इनके साथ-साथ तारीखें भी गुजरती जाती हैं मगर कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो गुजरने के बाद भी अपनी जगह पर रुकी रहती हैं. ऐसा नहीं कि ये तारीखें दिन, महीने, साल के साथ आगे नहीं बढ़तीं, ये भी आगे बढ़ती हैं मगर इन तारीखों में मिले निशान ज्यों के त्यों बने रहते हैं, जिसके कारण ऐसा लगता है कि ये तारीख ज्यों की त्यों अपनी जगह पर रुकी हुई है. लगभग सभी के जीवन में ऐसी कोई न कोई तारीख होती होगी, काश! ऐसी कोई तारीख किसी के जीवन में न आये जो हर पल, हर क्षण अपने होने का दुखद एहसास करवाती रहे. तमाम सारी दुखद तारीखों के बीच एक ऐसी ही दुखद तारीख हमारे लिए 22 अप्रैल है. ये एक ऐसी तारीख है जिसे चाह कर भी न तो हम भुला पा रहे हैं और निश्चित रूप से ताउम्र हमारे अभिन्न में इस तारीख को भुला सकेगा.

 



इस तारीख में जो होना था वो तो हो ही गया मगर इसे न भूल पाने का कारण इस तारीख को मिले वे निशान, वे ज़ख्म हैं जो हर पल साथ हैं, सोते-जागते अपना एहसास कराते हैं. एक दुर्घटना के बाद जो ज़ख्म, जो निशान, जो दर्द मिला उसके बाद बहुत से अपनों-परायों ने सांत्वना देने के लिए, हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा कि समय के साथ इसे भूलने की कोशिश करो. अपने आपको काम में व्यस्त करके इस दुर्घटना के ज़ख्म को, निशान को भूलने का प्रयास करो. चूँकि अपने विश्वास, अपनी शक्ति पर विश्वास अखंड है तो सोचा कि एक बार ऐसी कोशिश करने में क्या समस्या है. आखिर जब खुद को मौत के मुँह के सामने खड़ा पाकर भी वापस लाने में किसी तरह की समस्या हमने खुद में महसूस नहीं की तो उस दुर्घटना के ज़ख्म को, दर्द को भुलाने में क्या समस्या? यही सोचकर पिछले कुछ सालों में लगातार प्रयास किया कि इस दर्द को भुला सकें मगर लाख चाहने के बाद भी इसे भुलाना संभव न हुआ.

 

यदि किसी एक दिन के आरम्भ को सुबह से जोड़कर देखें तो आखिर इस ज़ख्म को कैसे भुला दें जबकि नींद खुलने के बाद अपने दोनों पैरों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बीस-पच्चीस मिनट तक उनकी मालिश करनी होती है? कैसे भुला दें अपनी शारीरिक अक्षमता को जबकि स्वयं को खड़ा करने के लिए एक कृत्रिम पैर की आवश्यकता पड़ती है? कृत्रिम पैर के सहारे दोनों पैरों के दर्द को खुद में पीते हुए दैनिक कर्म संपन्न किये जाते हैं, इसे कैसे भूला जा सकता है? घर से बाहर जाने के लिए तैयार होने के पहले दाहिने पैर के क्षतिग्रस्त पंजे पर पट्टी के बाँधने का अनिवार्य कृत्य करना कैसे भुला देगा कि बिना इस पट्टी के चलना संभव नहीं? रात को सोने की कोशिश में बार-बार पंजे को इधर-उधर टकराने से बचाने का काम करते हुए नींद भी लेना, ऐसी कोशिश में कैसे भूल जाएँ 22 अप्रैल को? 2005 में हुई दुर्घटना के बाद से आज इस पोस्ट के लिखे जाने तक एक पल, एक क्षण ऐसा नहीं गुजरा जबकि दाहिने पंजे में, पैर में दर्द न हुआ हो तब कैसे भूल जाएँ इस दर्द को? अपने काम के दौरान, तमाम सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, अकादमिक गतिविधियों के दौरान बाँए कृत्रिम पैर द्वारा दिए जा रहे कष्ट को सहते हुए कैसे भूल जाएँ कि हमारा एक पैर नहीं है?

 



कई बार लगता है कि बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में कहना बहुत आसान होता है मगर उस कहे को व्यावहारिक रूप देना बहुत कठिन होता है, लगभग असंभव होता है. ऐसा ही कुछ असंभव सा अब हमारे साथ जुड़ा हुआ है. ऐसा ही आजीवन साथ  रहने वाले दर्द हमारे साथ है. हमारे शरीर का अंग न होने के बाद भी शरीर का अंग बने कृत्रिम पैर के साथ पूरे जीवन भागदौड़ करनी है. किसी समय मैदान पर दस हजार मीटर की दौड़ लगाने वाले एथलीट का एक कदम अब बिना छड़ी के नहीं उठता है. ऐसी तमाम स्थितियों को, दिक्कतों कि साथ लेकर एक-एक पल गुजारते समय कैसे भुलाया जा सकता है इस तारीख को? बस आज इस तारीख को याद करते हुए शाम गुजर गई, रात गुजरने वाली है. दर्द जो हमेशा साथ रहना है, उसके लिए क्या रोना? जो ज़ख्म ज़िन्दगी भर के लिए यारी निभाने आया है उसे कैसे भुलाया जाये? ये भी उन्हीं मित्रों, रिश्तेदारों की तरह हैं जिनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और जिनसे पीछा छुड़ाया भी नहीं जा सकता. 


 

17 मार्च 2024

पिताजी के जैसा बनने की कोशिश

उन्नीस साल का सफ़र, जिसमें सब लोग तो साथ थे बस एक आप ही न थे. आपके जाने के बाद बहुत कोशिश की जिम्मेवार बनने की, परिवार को साथ लेकर चलने की. आपके जाने वाली तारीख से लेकर आज तक की तारीख की अपनी यात्रा पर नजर डालते हैं तो लगता है कि हर स्थिति में असफल ही हुए हैं. आपके जैसा स्वभाव नहीं ही पा सके, यदि उसका शतांश भी पाया होता तो मिंटू को नहीं खोते.

 

कोशिश तो हर पल करते हैं आपके जैसे बनने की मगर आज तक नहीं बन सके. बहुत अच्छे से याद है आपके जाने के एक महीने बाद घर के लिए बाजार से लौटते समय पहली बार ककड़ी खरीद कर लाये थे. उस समय और घर आने के दौरान बहुत बार आँखें नम हुईं. समय को कुछ और ही मंजूर था, उसी दिन हम शाम को ट्रेन एक्सीडेंट का शिकार हो गए. साल भर तक वे सभी पारिवारिक जिम्मेवारियाँ, जो हमें उठानी थीं उनको पिंटू-मिंटू ने उठाया.

 

पता नहीं समय ख़राब रहा या फिर कुछ और ही. धीरे-धीरे जब लगा कि सबकुछ सही होने जा रहा है तो मिंटू हम सबको छोड़ आपके पास चल दिया. ये भी एक तरह से हमारी ही गैर-जिम्मेवारी है, इसे हम स्वीकारते हैं. सबसे बड़े भाई होने का दम भरते रहे मगर एक छोटे भाई की समस्या को,उसकी मनोदशा को न समझ सके.

 

पता नहीं समय क्या-क्या दिखाएगा? कोशिश यही है कि जो रास्ता आपने दिखाया है, जो शिक्षा आपने दी है उसका अनुपालन कर सकें. हार-जीत के संघर्च के बीच से खुद को निकाल कर आपकी नज़रों में खुद को साबित कर सकें. कोशिश यही है कि पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने में आपके जैसा बन सकें. 






 

23 फ़रवरी 2024

अइया के साथ अंतिम समय में

समय गुजरता जाता है मगर यादें नहीं गुजरती हैं. वे जहाँ कल थीं, वहीं आज भी दिखाई देती हैं. ये यादें हँसाती भी हैं, रुलाती भी हैं. इन्हीं यादों के साथ जीवन सहज-असहज तरीके से गुजरता हुआ अपनी अंतिम अवस्था तक पहुँच जाता है. यादों के केन्द्र में समाहित व्यक्ति जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं उस व्यक्ति से जुड़ी वस्तुएँ. इसका एक मुख्य कारण ये होता है कि जो व्यक्ति यादों के केन्द्र में है, वो हमें न तो दिखाई देता है और न ही उसका आभास हमें होता है. हम सभी अपनी यादों में, अपनी कल्पना में उसे याद करते हुए उसका एहसास करते रहते हैं. ऐसे में उससे जुड़ी वस्तुएँ, उसके द्वारा उपयोग किये गए सामान ही उसका स्थान ले लेते हैं, उसकी उपस्थिति का एहसास करवाते हैं.

 



कुछ ऐसी ही है ये स्केल, जिसका बहुत ज्यादा उपयोग अइया ने नहीं किया बल्कि सत्य तो ये है कि उन्होंने इसका उपयोग एक पल को भी नहीं किया मगर चंद घंटों के उपयोग के चलते यह उनसे जुड़ गई. असल में अइया को उनके घायल होने के बाद कानपुर में एक हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया. उनके बारे में जैसा सुनते रहे थे और देखते भी रहे थे, स्वभाव से कुछ जिद्दी थीं. इलाज के दौरान उनको विगो लगाईं जाती तो वे उसे किसी न किसी तरह से ख़राब कर देती थीं. इस कारण से उनके इलाज के दौरान चढ़ाई जाने वाली दवाएँ वगैरह उचित ढंग से उनको नहीं दी जा पा रही थीं. ऐसे में एक दिन हॉस्पिटल के डॉक्टर ने कहा कि ऐसे तो इलाज में बहुत दिक्कत आएगी, कैसे भी करके इनका विगो को डिस्टर्ब करना रोकिये. पिछले आठ-नौ दिन से लगातार विगो, इंजेक्शन लगने के कारण हॉस्पिटल के स्टाफ को भी समस्या का सामना करना पड़ रहा था.

 

अइया के द्वारा विगो को डिस्टर्ब करने की समस्या का एक हल हमने सोचा और उसे अमल में लाने का विचार बनाया. हाथ में विगो लगाने के बाद उनकी कोहनी से इसी स्केल को हमने बाँध दिया. यहाँ एक बात और आप सबको बताते चलें कि अइया के उन हॉस्पिटल में एडमिट रहने वाले दिनों में उनके सारे बेटे-बहू, नाती-नातिन उनके पास थे मगर वे सिर्फ अम्मा-पिताजी का या फिर हमारा कहना मानती थीं. इसी कारण हमने उनको समझाया और कोहनी में स्केल बाँध दी. पता नहीं समय क्या कुछ दिखाना चाह रहा था. रात को अइया के हाथों में स्केल बाँधी उसके बाद उनका बातचीत करना कुछ और कम हो गया. अपने ऊपर लगाए गए इस बंधन को उनके द्वारा पूरे चौबीस घंटे भी स्वीकार नहीं किया गया. अगले दिन के शाम होने तक अइया ने हम सबको छोड़कर बाबा जी के पास जाने का मन बना लिया.

 

फरवरी का आज का ही दिन था. उस दिन से लेकर आज तक अइया के बिना एक पल न गुजरा. उनके साथ अंतिम समय में जुड़ी इस स्केल को भी हम भुला नहीं पाए. आज भी ये स्केल हमारी किताबों की अलमारी में सुरक्षित है. पता नहीं आज के समय के हिसाब से हम क्या हैं मगर इसे देखकर लगता है कि अइया आज भी हमारे साथ हैं. 





 

29 अक्टूबर 2023

हर कदम पर प्रोत्साहित करते अभय अंकल

आज, 29.10.2023 को अभय अंकल की स्मृति में संगीत निशा का आयोजन वातायन, उरई द्वारा किया गया था. इस एक पंक्ति में दो-तीन शब्द हमारे ब्लॉग के पाठकों के अलावा बहुत सारे लोगों के लिए एकदम नए और अपरिचित होंगे. इसमें पहला शब्द है अभय अंकल, देश-विदेश के वे सारे लोग जो हमसे परिचित हैं, वे सहज ही अभय अंकल से समझ लेंगे कि किस व्यक्तित्व के लिए ये लिखा गया है. हमसे अपरिचित लोगों के लिए एक संक्षिप्त परिचय देना तो बनता ही है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि यदि विस्तीर्ण परिचय देना शुरू कर दें तो यह पोस्ट बहुत ही अधिक लम्बी हो जाएगी. साइंस कॉलेज, ग्वालियर से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उरई के दयानंद वैदिक महाविद्यालय में रक्षा अध्ययन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. इसके अलावा जनपद की अनेकानेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं में पदाधिकारी के रूप में भी सक्रिय रहे. 



पहली पंक्ति में जिस दूसरे अनजान शब्द वातायन का जिक्र है, उसके जन्म के पीछे दो लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. इसमें एक तो अभय अंकल हैं ही और दूसरे थे ब्रजेश अंकल यानि कि डॉ. ब्रजेश कुमार जी. (ब्रजेश अंकल के बारे में एक पोस्ट अलग से) अभय अंकल वातायन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में रहे. इस सांस्कृतिक संस्था द्वारा अनेकानेक नाट्य-प्रस्तुतियाँ जनपद में और जनपद के बाहर भी दी गईं. नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम वातायन के बैनर पर होते रहे. अभय अंकल के बारे में एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि वे नैसर्गिक रूप से बहुत बेहतरीन संयोजक थे. किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, उनके द्वारा ऐसे संयोजन किया जाता मानो वह कार्यक्रम उनकी उँगलियों पर नाच रहा हो.


इस संयोजन क्षमता के पीछे उनका बुद्धि कौशल तो था ही, उससे बड़ी थी टीम भावना. यहाँ बहुत सारी बातों का जिक्र न करने स्वयं अपने अनुभव से गुजरी एक घटना का जिक्र करना चाहेंगे, जिसने सिद्ध किया कि अभय अंकल किस तरह अद्भुत नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण थे. वर्ष 2004 की बात है. एक दिन दोपहर में अभय अंकल का फोन आया कि तुरंत विभाग में आओ. अगले क्षण हम डीवी कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में उपस्थित थे. एक पत्र उन्होंने हमारे सामने रखते हुए कहा कि एक नेशनल सेमीनार करवाना है. तुम बताओ क्या काम करोगे इसमें? हमने कहा कि जो भी काम हमारे लायक समझें. इस पर अंकल ने कहा कि हमें पता है कि तुम सभी काम बेहतर ढंग से कर सकते हो पर जिसमें तुम्हारी रुचि हो वो बताओ. हमने पूरी बात अंकल पर ही डाल दी.


कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद अंकल ने कहा कि तुम स्मारिका का काम देख लो. इंकार का कोई मतलब ही नहीं था. स्मारिका पर काम अगले दिन से ही शुरू हो गया. अंकल द्वारा बस इतना बताया गया कि इस पर इतना बजट खर्च करना है और इतने पेज की बनना है. इसके बाद उनके द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया गया. हम प्रतिदिन अपने काम के बारे में अंकल को बताते तो वे कहते कि जब फाइनल हो जाये तभी बताना. हमें विश्वास है कि तुम बेहतर स्मारिका निकाल दोगे. फाइनल होते-होते एक समस्या एकदम अंत में आ गई. अभय अंकल द्वारा बताये गए पेज से एक पेज अधिक हो रहा था. इसका कारण भी अभय अंकल द्वारा दिया गया सन्देश था. एक दिन बड़े झिझकते हुए उनको बताया तो बोले कि जब पूरा सम्पादकीय अधिकार तुम्हारे पास है तो झिझको नहीं, अपना काम करो. बस फिर क्या था, अभय अंकल के सन्देश पर भी सम्पादकीय कैंची चला दी गई.


उन्होंने और राजेन्द्र निगम अंकल ने स्मारिका प्रकाशित होने के ठीक एक दिन पहले उसका फाइनल रूप देखा और बहुत आशीर्वाद दिया. स्मारिका का कवर पेज, उसके अन्दर की सामग्री, उसका क्रम आदि सबकुछ हमारे द्वारा ही निर्धारित किया गया. इस पूरे काम को करके इतनी ख़ुशी मिली जो व्यक्त नहीं की जा सकती. इसका कारण काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिलना था. इस घटना ने एक सीख दी कि यदि काम सहज रूप में सफलता के साथ पूर्ण करवाना है तो अपनी टीम पर विश्वास करते हुए उसे पूरी तरह से स्वतंत्र कर देना चाहिए. अभय अंकल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से मिली इस सीख ने आज तक अपना असर दिखाया है. टीम के साथ किये जाने वाले कोई भी काम आजतक असफल नहीं हुए हैं.


आज उनकी स्मृति में आयोजित संगीत निशा के दौरान अभय अंकल बार-बार स्मृति-पटल पर उभरते रहे, आँखों को नम करते रहे, होंठों पर मुस्कान लाते रहे. अभय अंकल को सादर नमन. 





 

29 जून 2023

स्मृतियों को जीवित रखता है कैमरा

प्रत्येक वर्ष 29 जून को राष्ट्रीय कैमरा दिवस मनाया जाता है. इस दिन को कैमरे और उसके आविष्कार की याद में मनाया जाता है. कैमरा एक अपूरणीय उपकरण है जो किसी व्यक्ति, स्थान, कार्यक्रम आदि की छवियों को चित्र में कैद करने में सहायक है. जॉर्ज ईस्टमैन, जिनको फ़ोटोग्राफ़ी का जनक माना जाता है, ने कैमरे को जन-जन तक पहुँचाया. यद्यपि उन्होंने कैमरे का आविष्कार नहीं किया था तथापि कैमरे के उपयोग में सहजता और उसके उत्पादन में सुधार हेतु कई अतिरिक्त चीजें विकसित की. उनके प्रयासों ने कैमरे को सहजता प्रदान की और उसे जन-जन तक व्यापक रूप से पहुँचाया.


आरंभिक दौर में कैमरे बड़े-बड़े और वजनदार थे. कालांतर में इस क्षेत्र में भी विकास हुआ और अनेक तरह के कैमरे विकसित हुए. वर्तमान में डिजिटल कैमरों में अनेक प्रकार की विशेषताएँ पाई जाती हैं. डिजिटल कैमरों के आने के बाद से न केवल व्यावसायिक फोटोग्राफी आसान हो गई बल्कि शौकिया फोटोग्राफर्स के लिए भी बहुत सुविधा हो गई. अब फोटोग्राफी सभी उम्र के लोगों के लिए आकर्षक हो गई है. अब सभी लोगों के लिए फ़ोटो खींचना बहुत आसान हो गया है. बिजनेस इनसाइडर के अनुसार वर्ष 2017 में लोगों ने 1.2 ट्रिलियन से अधिक डिजिटल तस्वीरें खींचीं. 




राष्ट्रीय कैमरा दिवस के बहाने कुछ कैमरों के बारे में आपको जानकारी देते चलें. पहले कैमरे से लेकर आधुनिक डीएसएलआर कैमरे तक का सफर सदियों पुराना है. बड़े-बड़े, भारी-भरकम कैमरों से लेकर मोबाइल में समाहित कैमरों तक का अपना ही रोचक इतिहास है.


कैमरों के संसार में जो सबसे शुरुआती कैमरा आया उसे इतिहास का पहला कैमरा कहा जाता है. कैमरा ऑब्स्क्युरा नाम के कैमरे का वैचारिक विवरण 400 ईसा पूर्व की चीनी पांडुलिपियों में मिलता है. अरब के एक विद्वान इब्न अल-हेथम ने 1000 ईस्वी के आसपास ऑब्स्कुरा कैमरा का विचार प्रस्तुत किया था. यह कैमरा चित्र नहीं लेता था बल्कि इसके स्थान पर यह एक छोटे से छेद के माध्यम से प्रकाश को एक स्क्रीन पर प्रोजेक्ट करता था. इससे सामने की वस्तु का चित्र स्क्रीन पर उभरता था. इसे संरक्षित, सुरक्षित नहीं रखा जाता था.


एक जर्मन लेखक जोहान ज़हान ने सन 1685 में कैमरे का एक डिज़ाइन प्रस्तावित किया जिसे बाद में हैंडहेल्ड रिफ्लेक्स कैमरा के नाम से जाना गया. इसके बाद फोटोग्राफिक कैमरा सबके सामने आया. पहला फोटोग्राफिक कैमरा सन 1816 में फ्रांसीसी जोसेफ निसेफोर नीपसे द्वारा बनाया गया. नीपसे ने सिल्वर क्लोराइड-लाइन वाले कागज पर फोटोग्राफिक चित्र निकाले. आज भी उस कैमरे की सबसे पुरानी मौजूदा तस्वीर सन 1826 के आसपास उन्हीं के द्वारा निकाली गई थी. उसका ऑरिजिनल शॉट आज भी ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय में सुरक्षित रखा हुआ है. जैसे-जैसे तकनीक विकसित होती गई, लोगों को कैमरे का महत्त्व, उपयोग समझ आता रहा वैसे-वैसे कैमरे और विकसित रूप में सामने आते रहे. कालांतर में डगुएरियोटाइप्स कैमरा, मिरर कैमरा, कोडक कैमरा आदि का आना हुआ. वर्ष 1905 और 1913 के बीच कैमरा निर्माताओं ने 35 मिमी फिल्म की रोल के साथ कैमरे के उपयोग पर जोर दिया. इसमें फिल्म रोल को कैमरे में लगाया जा सकता था और निकाला भी जा सकता था. जर्मन वैज्ञानिक और फोटोग्राफर ऑस्कर बार्नैक को इस फ़िल्म कैमरे को प्रस्तुत करने वाले के रूप में जाना जाता है.




रील वाले कैमरे आने के बाद फोटोग्राफी की दुनिया में एक तरह का बदलाव देखने को मिला. अब खींचे गए चित्र को र्सुरक्षित रखना आसान हो गया था. लोगों को अपनी स्मृतियों को संजोने का अवसर मिलने लगा था. बावजूद इसके अभी कैमरा के क्षेत्र में, फोटोग्राफी के क्षेत्र में क्रांति आनी शेष थी. इसका आगमन हुआ सन 1999 में जब पहली बार पहला एसएलआर कैमरा निकाला गया. इस सिंगल लेंस कैमरा (एसएलआर) ने कुछ वर्षों के बाद ही पूरी तरह से सिंगल-लेंस रिफ्लेक्स कैमरों की जगह ले ली. बाद में इसी का डिजिटल संस्करण आ जाने के बाद इस डिजिटल सिंगल-लेंस रिफ्लेक्स कैमरा (डीएसएलआर) के द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली फोटोग्राफी सहज हुई. आज यह कैमरा शौकीन और पेशेवर फोटोग्राफर्स के बीच जबरदस्त रूप सेलोकप्रिय है. 


कैमरे की इस विकास यात्रा में अब लगातार बेहतरीन डिजिटल कैमरों का आगमन बना हुआ है. बेहतरीन क्षमता और गुणवत्ता वाले लेंसों के द्वारा भी कैमरों ने अपना रूप और अधिक विकसित कर लिया है. इनके आने से फोटोग्राफी सहज हुई थी मगर बाद में मोबाइल में कैमरा आने से फोटोग्राफी सर्वसुलभ और अत्यंत आसान हो गई. निश्चित ही कैमरों की दुनिया ने व्यक्तियों को अपने अतीत के साथ, अपनी यादों के साथ जीना सिखाया है, उसकी स्मृतियों को सुरक्षित रखा है, उसके यादगार पलों को जिंदा बनाये रखा है. 





 

16 मार्च 2023

पिताजी के साथ स्मृति यात्रा

कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनको लाख कोशिशों के बाद भी भुलाना संभव नहीं होता है. वे तारीखें अपने आप सम्बंधित घटनाओं को किसी चलचित्र की तरह आँखों के सामने रख देती हैं. हमारे अपने जीवन में ऐसी कोई एक-दो नहीं बल्कि बहुत सारी तारीखें हैं, जिनको चाह कर भुलाया नहीं जा सकता और यदि भूलने की कोशिश भी करते हैं तो उनको भूल नहीं पाते हैं. ऐसी ही अनेक तारीखों की तरह आज, 16 मार्च की तारीख है. आज के दिन हमारे सिर से पिताजी का साया हमेशा के लिए हट गया था. सामान्य परम्परा में यह मन को संतुष्टि देने वाली बात होती है कि पिताजी भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, पर वे आत्मिक रूप में हमारे साथ हैं. यह सोच, यह मानसिकता खुद को कमजोर होने से बचाती है.


बहरहाल, पिताजी का जाना हमारे लिए गहरी चोट जैसा था. खुद को नवजीवन की राह पर उतारे अभी महज एक वर्ष ही बीता था, अभी खुद ही जिम्मेवार होने जैसा कोई एहसास अपने में जगा नहीं पाए थे कि बहुत बड़ी जिम्मेवारी हमारे कंधों पर आ गई थी. विगत 18 सालों में कोई दिन ऐसा नहीं बीता कि पिताजी की कमी को महसूस न किया हो, इसके साथ ही किसी न किसी रूप में उनको अपने साथ बने रहने का भाव भी बनाये रखा है. उनके न होने के भाव ने जहाँ बहुत बार भावनात्मक रूप से कमजोर किया तो उनके साथ रहने के भाव ने आत्मविश्वास बनाये रखा.


बहुत कुछ सोचा था पिताजी के बारे में लिखने को मगर आँखों के धुँधलेपन ने ऐसा करने नहीं दिया. बैठे-बैठे तमाम एल्बम, अनेक फोटो देखकर बीते दिनों को याद कर लिया गया. अब फोटो के रूप में बस यही यादें शेष हैं, बस यही यादें ही साथ हैं. 




























 

17 सितंबर 2022

तारीखों का एहसास

तारीखों का भी अपना एक अलग एहसास होता है. किसी भी महीने की किसी भी तारीख को किसी ऐसी घटना के घटित होने पर, जो व्यक्ति के दिल-दिमाग पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है, वह तारीख प्रत्येक महीने अपने उसी एहसास के साथ सामने आती है. किसी ख़ुशी की घटना के होने के कारण वह तारीख सुखद एहसास दिलाती है और यदि इसके उलट यदि उस तारीख में कुछ सुखद न हुआ हो तो वह तारीख ग़म का एहसास कराती है. कभी-कभी लगता है कि क्या उन तारीखों में किसी तरह की तासीर होती है या फिर उन घटनाओं में, जो सम्बंधित तारीख आने पर उस घटना का एहसास कराती हैं. ऐसा इसलिए दिमाग में आता है कि यदि एक पल को मान लिया जाये कि किसी वैश्विक योजना का अनुपालन करते हुए यदि कैलेण्डर ही बदल दिया जाये, उनकी तारीखों का क्रम बदल दिया जाये अथवा उनको किसी और नाम से परिभाषित कर दिया जाये तो किसी तारीख विशेष में उस दिन घटित घटना का एहसास किस तरह का होगा?




ये सवाल अपने आपमें काल्पनिक ही हैं मगर व्यक्तिगत रूप से हमें लगता है कि किसी भी घटना का घटित होना एक एहसास तो जगाता ही है मगर उसमें सबसे बड़ी भूमिका उस दिन की, उस तारीख की होती है. हम सबने महसूस किया होगा कि कोई भी घटना हमें पूरे माह याद नहीं आती मगर जैसे-जैसे उस तारीख का नजदीक आना होता है, तो वह घटना बहुत तेजी से अपना एहसास जगाती रहती है. इसके पीछे संभवतः उस तारीख के रूप में उस घटना का केन्द्रित किया जाना प्रमुख हो. देखा जाये तो कैलेण्डर, तिथियाँ आदि का निर्माण ही किसी भी घटना को याद रखने के लिए किया गया होगा. इन्हीं के आधार पर हम सभी अच्छी-बुरी घटनाओं को याद रखते हैं.


तारीखों का होना हम सबके जीवन में एक अलग तरह का एहसास जगाना है. इसमें भी यदि किसी एक ही तारीख को किसी एक ही व्यक्ति के साथ अच्छी और बुरी घटना का जुड़ना एकसाथ हो जाये तो उसके एहसासों में अलग तरह की लहरों का उठना-गिरना होता है. इसमें भी उस तारीख की ही भूमिका प्रमुख होती है. 




 

25 जुलाई 2022

खुश रहना जहाँ भी रहना

विगत कई वर्षों की भांति चिर-परिचित तरीके से श्वेता की उपस्थिति का एहसास अपने बीच किया गया. इसे याद करना नहीं कहा जायेगा क्योंकि याद हम सभी उसे करते हैं जिसे भूल जाएँ. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी भी, किसी भी रूप में भुलाए नहीं जा सकते. ऐसे ही व्यक्तित्वों में श्वेता को सहज ही शामिल किया जा सकता है. जो लोग भी उससे मिले होंगे वे निश्चित ही इससे अपनी सहमति देंगे कि वो भुलाने योग्य व्यक्तित्व नहीं है.

 

दस जून ऐसी तारीख बन गई है, जिसे चाह कर भी अपनी स्मृति से मिटाया नहीं जा सकता. उस तारीख के साथ चल कर आई दुखद स्मृति को विस्मृत करने का अत्यंत नायाब तरीका श्वेता के जीवनसाथी अंकुर ने खोज निकाला. दस जून को उनके द्वारा मुस्कान हॉस्पिटल में रक्तदान शिविर का आयोजन विशुद्ध पारिवारिक रूप में किया जाने लगा है. सामाजिक रूप में अंकुर की जो छवि बनी हुई है, उसके अक्स में रूप में श्वेता की झलक उन दिनों में दिखाई पड़ जाती थी. अब जबकि श्वेता की आत्मिक उपस्थिति हम सबके बीच है, ऐसे समय में रक्तदान जैसा पावन कर्म उसकी उपस्थिति को और भी गहरे से महसूस करवाता है.

 



इस बार भी दस जून को रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ. किसी से आग्रह नहीं, किसी से जोर-जबरदस्ती नहीं, किसी की मनुहार नहीं, किसी पर दवाब नहीं इसके बाद भी श्वेता और अंकुर के हार्दिक व्यवहार के चलते लोगों की स्नेहिल उपस्थिति पूरे समय बनी रही. इस बार विशेष बात यह रही कि मुस्कान सेंटर के बच्चों ने अत्यंत उत्साह दिखाया.

 

मुस्कान हॉस्पिटल के रक्तदान शिविर में अपनी सकारात्मक उपस्थिति के बाद लगातार लिखने का मन करता रहा परन्तु हर बार आज की तारीख भी याद आती. दोनों तारीखों को जब भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने भावनात्मक तराजू में तौलते तो हमें आज की तारीख ज्यादा वजनदार महसूस होती. इस 25 जुलाई वाली तारीख में श्वेता की अनुपस्थिति का आभास नहीं होता. आज की तारीख में उसके जाने का नहीं बल्कि इस दुनिया में आने का एहसास दिखाई देता है. उसके खोने की पीड़ा से बहुत अधिक उसके होने की ख़ुशी समाहित दिखती है.

 

श्वेता, जन्मदिन पर तुमको आशीर्वाद, तुम जिस रूप में जहाँ हो हमेशा सुखी रहो, हँसती रहो. लोगों को उसी तरह अपना बनाती रहो जैसे हम सबके बीच रहते हुए सबको अपना बनाती रही.






21 मई 2022

चाय की चुस्कियों वाली महफ़िलें

सुबह की गरमागरम चाय पी लेने के बाद जब मोबाइल खोला तो मालूम चला कि आज अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है. चाय के बहुत बड़े चिलमची होने के बाद भी अक्सर इस दिन को भूल जाते हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि अब चाय हमारी जीवन-शैली में ऐसे शामिल हो गई है, जैसे साँस लेना. न हम साँस लेना याद रखते हैं, न भूलते हैं. कुछ ऐसा ही चाय को लेकर है. हँसी-मजाक के दौर में हम अक्सर सबसे यही कहते हैं कि यदि किसी को अपनी कोई समस्या सुलझानी हो, कोई रुका काम करवाना हो तो हमारा नाम लेकर, दो कप चाय चढ़ा दिया करे, जब हम मिलें तो हमें पिला दिया करे. ऐसा करने से सारे बिगड़े काम बन जाते हैं. 


बहरहाल, चाय दिवस के बारे में जैसे ही जानकारी हुई तो बहुत सी बातें याद आने लगीं. चाय से जुड़ी बहुत सी कहानियाँ हमारे साथ जुड़ी हुई हैं. इसके पीछे का कारण यह है कि हमारे सभी परिचितों को हमारा चाय शौक बहुत अच्छे से पता है. हमारा एक दोस्त तो आज भी कहता है कि कभी यदि गलती से ज्यादा चाय बन जाये तो परेशान न हो, बस कुमारेन्द्र को बुला लो. ये चाय का बल्क कंज्यूमर है. ऐसा सच भी है. कॉलेज टाइम में अक्सर चाय को लेकर शर्त जैसी अघोषित स्थिति बनी रहती थी. एक-एक बैठकी में दस-बीस गिलास चाय ऐसे गटक ली जाती थी जैसे हवा गटक रहे हों. गरम चाय पीने की आदत शुरू से ही थी मगर इस आदत में वृद्धि हॉस्टल में रहने के दौरान हो गई. उन दिनों बहुत सीमित जेबखर्च मिला करता था. चाय की तलब घनघोर रहती थी. उस पर विपदा ये कि कभी अकेले चाय पीना होता नहीं था. दो-चार यार-दोस्त संग रहते ही थे. तब आर्थिक समस्या से निपटने के दौर में एक रास्ता खोजने की कोशिश की जाती कि जो सबसे अंत में चाय पिएगा, वही भुगतान करेगा. ऐसे में जल्दी-जल्दी चाय पीने की आदत भी बन गई. हालाँकि इस नियम का कोई गज़ट पास तो हुआ नहीं था कि ऐसा होना ही होना है, बस तफरी के लिए, हाहा-हीही के लिए यह भी मौज होती रहती थी.




चाय का ही कमाल कहा जायेगा कि उसने हॉस्टल में हमें बड़े भाई जैसे रिश्ते से भी परिचित करवाया. पहली साल थी हॉस्टल में. अभी कुछ महीने ही हुए थे हमको. चूँकि चाय के जबरदस्त शौक़ीन होने के कारण हम हॉस्टल में अपने कमरे में चाय का पूरा इंतजाम किये रहते थे. उन्हीं दिनों हमसे एक साल आगे अक्षय भाईसाहब का हॉस्टल में आना हुआ. वे भी खूब चाय पिया करते थे. चाय की महक उड़ती हुई ऊपर की विंग से नीचे की विंग तक पहुँची. अपने साथ-साथ हम भाईसाहब के लिए भी चाय बनाने लगे. उस चाय से बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज भी उसी जिन्दादिली से चल रहा है. भाईसाहब के साथ-साथ फिर तो चाय की चुस्कियों में और भी लोग शामिल होते चले गए.


समय के साथ यार-दोस्त अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते चले गए, हम भी अपनी दुनिया में खोते चले गए. इसी सब में चाय तो पी जाती रही मगर चाय की महफ़िलें ख़त्म हो गईं. हॉस्टल टाइम में कभी लल्ला, जगदीश के यहाँ की चाय की घंटों के हिसाब से लगती महफ़िलें, कभी देर रात सखा-विलास के ढाबों पर चाय की चुस्की बीच कहानियों का जन्म, कभी रेलवे स्टेशन की चाय के साथ बनते-बिगड़ते सपने आदि-आदि पीछे छूट गए. चाय का स्वाद तभी है जब यारों की महफ़िल हो, ठहाके हों, गप्पबाजी हो. चाय स्वाद भी तभी देती है जबकि हाथ में चाय का प्याला हो, गिलास हो और उसकी चुस्की के साथ कोई न कोई कहानी हो. चाय की वही पुरानी महफ़िल फिर गुलज़ार करने की कोशिश है.


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