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19 मई 2026

श्रम की महत्ता समझाएगा श्रमदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विद्यालयों में बच्चों से श्रमदान करवाने वाले शिक्षकों को सम्मानित करने का विचार रखना एक प्रशासनिक औपचारिकता भर अथवा कोई तात्कालिक सुर्खी का विषय नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाये तो उनका वक्तव्य हमारी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने के प्रति एक विमर्श का सूचक है. अंकों की मारामारी के अंधे दौर में हमारी शिक्षा प्रणाली और अभिभावक सूचनाओं के संकलन, तकनीकी के नियंत्रण और अंकों की अबूझ प्रतिस्पर्धा में उलझकर रह गए हैं. इस व्यवस्था ने विद्यालयों से पारम्परिक और बुनियादी अवधारणाओं को लगभग समाप्त सा कर दिया है. श्रमदान भी इसी तरह की व्यावहारिक व्यवस्थाओं से बाहर कर दी गई है. हमें सोचना चाहिए कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या उसके द्वारा किसी इंसान को कामगार के रूप में तैयार करना है या फिर एक संवेदनशील, सामाजिक नागरिक का निर्माण करना है?

 


आधुनिक दौर की कॉरपोरेट संस्कृति ने बच्चों के मस्तिष्क
को भले ही तीक्ष्ण किया हो लेकिन उनके ह्रदय को श्रम, सामाजिकता, समन्वय से दूर ही किया है. अब न केवल बच्चों में बल्कि अभिभावकों में शिक्षा के प्रति, शिक्षण संस्थानों के प्रति आत्मीयता का, परिवारिकता का नहीं बल्कि व्यापारिकता का भाव होता है. बच्चों को अब शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए, अधिकाधिक अंक लाने के लिए भेजा जाने लगा है. अब किसी बच्चे द्वारा अपनी कक्षा की मेज साफ करना, विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना अथवा पेड़-पौधों में, क्यारियों में पानी देना उसके आन्तरिक गुणों के विकसित होने के क्रम में नहीं बल्कि शारीरिक शोषण किये जाने के रूप में देखा जाता है. वास्तविकता तो यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा वह किसी शोषण का, बाल-श्रम का शिकार नहीं हो रहा होता है बल्कि वह अपने आसपास के भौतिक परिवेश के साथ एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है. इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के भीतर पनपने वाले अभिजात्य अहंकार, वर्ग-विभेद आदि को तोड़ती हैं. ऐसे कार्यों के द्वारा बच्चों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और यही सीख उनके भीतर समन्वय का, सामंजस्य का निर्माण करती है.

 

समकालीन दौर में बाल विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक अवसाद, एकाकीपन आदि प्रमुख हैं. आज बच्चे मोबाइल के जाल में उलझकर प्रकृति से, शारीरिक श्रम से लगभग दूर हो चुके हैं. ऐसे में विद्यालयों में श्रमदान केवल किसी कार्य तक सीमित न समझा जाये बल्कि इसे एक तरह की शारीरिक और मानसिक चिकित्सा माना जाना चाहिए. सामूहिक रूप से किया जाने वाला शारीरिक श्रम बच्चों में सकारात्मकता बढ़ाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है. श्रमदान को बालश्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं क्योंकि यह एक सामूहिक विधा है जो अलग-अलग पृष्ठभूमि, जातियों, आर्थिक स्तरों से आने वाले विद्यार्थियों में टीम वर्क, सहानुभूति, सहयोग आदि की भावना विकसित करती है. इस तथ्य को उस समय और भी सहज भाव से देखा जा सकता है जबकि यही बच्चे उच्च शिक्षा में आने के पश्चात् बिना किसी संकोच, भेदभाव के एनसीसी, एनएसएस आदि के माध्यम से अपने आसपास की बस्तियों में श्रमदान करते हैं, स्वच्छता हेतु मिलजुल कर कार्य करते हैं.

 

श्रमदान बच्चों में भावनात्मकता का विकास करता है. हम सभी अपने घरों को, अपनी सम्पत्ति को साफ़-सुथरा रखते हैं, उनके प्रति आत्मीय भाव रखते हैं किन्तु सार्वजनिक सम्पत्ति को गंदा करने में संकोच नहीं करते हैं. यह प्रवृत्ति एक गम्भीर सामाजिक बीमारी बन चुकी है. इसके मूल में नागरिकों का सार्वजनिक संपत्तियों से भावनात्मक जुड़ाव न होना है. यदि एक बच्चा पसीना बहाकर अपने विद्यालय को सँवारता है तो उसके भीतर उस स्थान के प्रति भावनात्मकता का, अपनत्व का बोध जागृत होता है. ऐसा बच्चा भविष्य में सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उदारता, अपनत्व के भाव से जुड़ेगा. श्रम की गरिमा का अभाव हमारे देश का एक कड़वा सच है. हमने मानसिक श्रम को उच्च और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता बना ली है. यही कारण है कि आज देश का शिक्षित युवा किसी भी स्तर की नौकरी के लिए भी कतारों में खड़ा मिल जायेगा किन्तु वह किसी शारीरिक श्रम कार्य को अपनाने से बचता है. श्रमदान के द्वारा बच्चों में श्रम की महत्ता को समझाया जा सकता है, उसके प्रति निम्नता की ग्रंथि समाप्त किया जा सकता है.

 

मुख्यमंत्री के विचार के बाद विद्यालयों में बच्चों के श्रमदान को एक दिशा देने की आवश्यकता है. इसके लिए उठाने वाले तमाम उपायों के बीच देखना होगा कि श्रमदान के नाम पर उनको बालश्रम के रूप में परिवर्तित न कर दिया जाये. बच्चों को, अभिभावकों को बालश्रम और श्रमदान के अंतर को समझाना होगा. बच्चों द्वारा विद्यालय प्रांगण में साफ़-सफाई करना श्रमदान है मगर उन्हीं बच्चों से मिड-डे-मील बनवाया जाना बालश्रम होगा. विद्यालय परिसर में पौधारोपण करना, उनमें पानी देना श्रमदान है मगर किसी उच्चाधिकारी के आने पर उसकी आवभगत करवाना बालश्रम होगा. श्रमदान कोई सुधार कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिकता, परिवारिकता का पाठ है. यदि श्रमदान को सामाजिक सहयोग के रूप में धरातल पर क्रियान्वित किया जाए तो यह आत्मनिर्भरता का, स्वावलम्बन का, श्रम के प्रति पूजनीयता का भाव जागृत करेगा.

 


23 जून 2023

बचपन की तिरछी राइटिंग और स्केचिंग

यदि कोई दोस्त यदि वाकई में आपका दोस्त है तो उसका दोस्त होना आपको प्रसन्न कर देता है. दोस्तों के मामले में, दोस्ती के मामले में हम बहुत सौभाग्यशाली रहे हैं. दोस्त हमेशा ऐसे मिले हैं जो वाकई दोस्ती के काबिल रहे, जिनकी दोस्ती पर गर्व किया जा सकता है. आप सभी में से बहुत से लोग ऐसे होंगे जिनको दोस्त की, दोस्ती की असली दौलत मिली होगी. ऐसे दोस्तों के साथ एक-दो मिनट का पल भी बहुत सुखद और मन को स्फूर्ति देने वाला होता है. 


आज के दौर में जबकि हम सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं, अपने परिवार में व्यस्त हैं, अपनी एक रूटीन दिनचर्या में व्यस्त हैं, ऐसे समय में यदि आपको कोई मित्र आपके ऐसे शौक, आपके ऐसे काम को याद रखे हो जो तीन दशकों से अधिक समय पुराना हो तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. एक गणितीय आकलन कीजिये वर्ष 1983-84 से आज 2023 के बीच के समय का. लगभग चालीस वर्ष का समय बीच में निकल गया. ऐसे में आपको भी आश्चर्य होना चाहिए कि यदि कोई दोस्त आज से चालीस साल पहले की बात को, काम को स्पष्टतः याद रखे हो. यह आश्चर्य उस समय और भी ज्यादा हो जाता है जबकि आपको इसकी जानकारी हो कि अपने इस दोस्त से आप नियमित भले मिल रहे हों मगर अपनी व्यक्तिगत रुचियाँ, अपने शौक आदि उसके साथ बाँटे न जा रहे हों.


ऐसा पढ़ कर आप लोग संशय न करने लगिएगा. पता नहीं आप सबके पास ऐसे मित्र हैं या नहीं पर हमारे पास ऐसे दोस्त हैं जिनके साथ मुलाकात किसी न किसी विशेष आयोजन पर होती है. कभी किसी त्यौहार पर, कभी किसी समारोह में, कभी किसी वैवाहिक कार्यक्रम में तो कभी किसी अन्य पारिवारिक कार्यक्रम में. उन मित्रों से भले ही पल-पल की बातें शेयर न की जाती हों, भले ही उनको अपनी नितांत गोपनीय, नितांत व्यक्तिगत जानकारी दी जाती हो मगर उनके साथ दोस्ताना सम्बन्ध में कोई कमी नहीं होती है, उनके साथ दोस्ती का जज्बा बीते दिनों की तरह ही बना रहता है. हमारे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जो आजकल अपने रोजगार, अपनी आजीविका के सम्बन्ध में उरई से बाहर हैं. बहुत से मित्र ऐसे हैं जो उरई में ही हैं मगर व्यस्तता के कारण उनसे मिलना-जुलना यदा-कदा भले होता हो मगर दोस्ती में, दोस्त होने के अंदाज में कोई कमी नहीं आई है.




बहरहाल, जो बात आपको बताना चाह रहे थे, वो दोस्तों के चक्कर में रही जा रही है. बचपन के अपने स्केचिंग, पेंटिंग के शौक को जब-तब समय मिलने पर पूरा करते रहते हैं. इस बार जून की छुट्टियों में लगभग रोज ही किसी न किसी रूप में स्केचिंग की जा रही है. कभी पेन्सिल से तो कभी सीधे पेन से. ऐसे में एक दिन विचार आया कि कोई छोटी सी डायरी आकार की स्केच बुक/डायरी ले ली जाये. उसी पर स्केच बनाने से वे सभी एक जगह सुरक्षित रहेंगे. बाजार में इस तरह की किसी स्केच बुक/डायरी के बारे में पता किया तो परिणाम शून्य मिला. अब समझ नहीं आया कि अपने इस शौक को कैसे अपने सोचे हुए ढंग से अंजाम दिया जाये. इसी सब में ध्यान आया कि व्यापारी, दुकानदार बही खाता सम्बन्धी जिस किताब का उपयोग करते हैं, उसके छोटे आकार से हमारा काम बन सकता है. अपने परिचित की एक दुकान पर अपनी बात रखी, उन्होंने तुरंत पुस्तकाकार एक बही खाता हमें थमा दिया. उपयोग करके उसकी उपयोगिता को परखने के उद्देश्य से वह लाल किताब हमने खरीद ली. 


इसके बाद जब हम अपने स्कूटर में पेट्रोल डलवाने गए तो वहाँ अपने मित्र से मुलाक़ात हो गई. वह हमारे साथ कक्षा छः से पढ़ा है. ये समय संभवतः 1983-84 का रहा होगा. पेट्रोल डलवाने के लिए जैसे ही हमने अपने स्कूटर की सीट ऊपर की तो उसको वह बही खाता पुस्तिका दिख गई. उसने आश्चर्य से पूछा तुमको क्या काम इस बही खाते का? जैसे ही हमने उसे बताया कि पेंटिंग, स्केचिंग करने के लिए लिया है तो वह बहुत ही आश्चर्य से पूछने के अंदाज में बोला कि कक्षा छ, सात, आठ के शौक अभी तक चल रहे हैं? हमने जोर का ठहाका लगाया और बताया कि वे शौक तो चल ही रहे हैं, और नए शौक जुड़ भी गए हैं. इसके बाद आश्चर्यचकित होने की बारी हमारी थी जब उसने सवाल किया कि अभी भी तिरछी राइटिंग में लिखते हो? असल में उस समय अपने फाउंटेन पेन की निब को तिरछा काटकर उसके सहारे कैलीग्राफी की जाती थी. तब न हमें मालूम था कि उस लिखने की स्टाइल को क्या कहते हैं और न ही हमारे मित्र को. उसकी याददाश्त को शाबासी देते हुए उसे बताया कि सामान्य लेखन तो सामान्य ढंग से ही होता है मगर अभी भी तिरछी राइटिंग में भी लिखते हैं.




असल में उस समय हमारी क्लास में बहुत कम बच्चे ऐसे थे जिनकी हस्तलिपि अच्छी, सुन्दर थी. उन बच्चों में एक हम थे और इसी कारण से कक्षा के बहुत से बच्चों की कॉपी में, किताबों में, प्रैक्टिकल बुक में नाम लिखने, डिजाईन बनाने का काम हमारे पास रहता था. अब जबकि कंप्यूटर के कारण से लोगों का लिखना लगभग बंद हो चुका है, तब भी हम नियमित रूप से लिखते हैं. ये बात उस दिन बड़ी न लगी जब हमारे मित्र ने हमारी चालीस बरस पुरानी बात को याद दिलाया. ये वाकई बहुत ज्यादा ख़ुशी की बात है. सबके लिए हो या न हो पर हमारे लिए अवश्य है कि कम से कम हमारे मित्र तो हमारी किसी विशेषता को आज भी याद रखे हैं.   






 

01 जनवरी 2021

कुछ सीखने-सिखाने का प्रयास नहीं होता नववर्ष के पहले दिन

नया वर्ष 2021, नये साल का पहला दिन। सभी लोग उत्साह, उमंग से भरे दिख रहे हैं। सभी के चेहरे किसी उम्मीद के साथ नये साल का स्वागत करने को तत्पर हैं। अभी-अभी गया हुआ वर्ष 2020 अप्रत्याशित सा निकला, इस कारण लोगों में अनजान भय के बीच एक सुखद संदेश की आस है। इस आस के उत्साह को देखकर लगा कि समय के साथ न केवल समय बदलता है बल्कि लोगों के विचार, मानक, कार्यशैली भी बदल जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है पर कुछ बातें ऐसी हैं जो समय के साथ आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहें तो बेहतर होता है।



विगत कई वर्षों से देखने में आ रहा है कि नववर्ष के पहले दिन को पार्टी, पिकनिक के रूप में लिया जाने लगा है। आधी रात से शुरू होने वाला ये सिलसिला कई-कई दिनों तक चलता रहता है। हमें आज भी बहुत अच्छे से याद है कि हमारे बचपन में पहली तारीख को स्कूल बंद नहीं होते थे। हम बच्चे नियमित दिनचर्या की तरह स्कूल जाते थे। यह सब इसलिए भी याद है क्योंकि उस दिन हमारे अध्यापक, अध्यापिका बार-बार इस बात पर बल देते कि नये साल के पहले दिन किया जाने वाला कार्य बिना किसी परेशानी के साल भर सफल रहता है। उस दिन स्कूल में हम सबको पढ़ना, लिखना तो होता ही था, भोजन अवकाश के बाद के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी अनिवार्य रूप से भाग लेना होता था। 

इसके पीछे उद्देश्य यही था कि साल भर करते रहने के लालच में हम बच्चे न केवल पढ़ने-लिखने की ओर बढ़ें बल्कि खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी हिस्सा लें, रुचि दिखाएँ। अब इधर काफी समय से ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा। अब पहली तारीख को छुट्टी होती है और पार्टी के नाम पर सैर-सपाटा। इधर न तो शैक्षणिक संस्थानों द्वारा प्रतिभा विकास पर बल दिया जा रहा है और न ही अभिभावकों द्वारा इस पर ध्यान दिया जा रहा है। आज नया साल सिर्फ मौज-मस्ती करने का माध्यम भर रह गया है, इसके आयोजन द्वारा किसी तरह की सीख देने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। 


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वंदेमातरम्

03 जुलाई 2020

स्वच्छंद उड़ान के लिए तैयार करना चाहिए बच्चों को

बच्चों के लिए जुलाई का आना पिछले वर्ष तक उत्साह का समय होता था. इस वर्ष गर्मियों की छुट्टियाँ आईं भीं और चली भी गईं मगर छुट्टियों जैसा माहौल न बना सकीं. इन गर्मियों में सभी अपनी-अपनी जगह कैद होकर रहे. न कोई कहीं घूमने जा सका, न बच्चे लोग अपनी दादी-नानी के घर जा सके. इन दिनों में छुट्टियों जैसा माहौल भले ही रहा हो मगर मजा उन छुट्टियों जैसा नहीं आया जैसे कि पिछले साल तक आता रहा. इस बार बीच परीक्षाओं के समय से शैक्षणिक संस्थाओं के बंद होने ने बच्चों को घर की कैद में डाल दिया. इस कैद में वे अपने शौक को पूरा कर सकते थे, उनको विकसित कर सकते थे मगर भविष्य की अंधी दौड़ में दौड़ते अभिभावकों, संस्थाओं के कारण उन बच्चों को भारी-भरकम बोझ का सामना भी करना पड़ा. यह बोझ ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से, बेहिसाब होमवर्क के माध्यम से आता रहा. 

इस आपदा के दौर में जबकि अभी कुछ भी निश्चित नहीं हो पा रहा है, अभी सबकुछ जैसे धुँध में है, अभी हर तरफ अनिश्चितता का दौर बना हुआ है तब भी लोगों में भागमभाग मची दिखती है. अभी भी लोग एकतरफ अपनी जान बचाने की कोशिश में लगे हैं तो कुछ हैं जो इस माहौल में भी कैरियर की चिंता में लगे हैं. समझ से परे है कि ऐसे दौर में भी बच्चे हँसना-खेलना छोड़कर चिंताग्रस्त हैं. समझना होगा कि ये समय सबके लिए एकसमान है. सम्पूर्ण विश्व अभी एक जैसी स्थिति में खड़ा है. जो हाल इस देश के बच्चे की शिक्षा का हो रहा है कमोबेश वैसा ही हाल कहीं विदेश के बच्चों का भी है. सभी जब एक ही पायदान पर हैं तो फिर बजाय चिंता के बच्चों को, उनके अभिभावकों को उनको स्वच्छंद उड़ान के लिए तैयार करना चाहिए.


विगत तीन माह से अधिक के समय ने एक सबक सबको दिखाया ही है, सीखा किसने है ये बात और है कि इंसान के सोचने से कुछ नहीं होना, उसकी भविष्य की बनी योजनाओं का कोई मतलब नहीं, उसके द्वारा बनाये जा रहे तमाम आधारों का कोई आधार नहीं. ऐसे में भी यदि कोई सीख न ले तो वह उसकी बेवकूफी कही जाएगी. सोचिये एक पल को इतनी लम्बी छुट्टियाँ मिलने के बाद कोई कहीं नहीं जा सका. वे परिवार भी जो सप्ताह में दो-तीन दिन मॉल, फिल्म, और बाहर के भोजन में गुजारते थे, वे भी इन दिनों घर के अन्दर बंद रहे. जो ये कहते हुए बहुत ज्यादा गौरवान्वित होते थे कि उनके बच्चे जंक फ़ूड खाए बिना रह ही नहीं पाते, वे भी इस समय दाल-रोटी खाकर दिन बिता रहे हैं. वे जो गर्मियों में बजाय अपने घर के किसी हिल स्टेशन पर रहना पसंद करते थे, वे भी अब इसी गर्मी में अपनी दिनचर्या बिता रहे हैं.

अभिभावकों को समझना चाहिए कि जुलाई भले आ गई है मगर अभी संस्थान बंद हैं, यदि वे अभी इन तीन महीनों में अपने बच्चों को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, रचनात्मक, सहयोगी आदि न बना सके हैं, इस बारे में कुछ न सिखा सके हैं तो जुलाई से अपने घर को ही कोई शैक्षणिक संस्थान समझकर उनको यही सिखाने का काम करें. पाठ्यक्रम की पढ़ाई ज़िन्दगी भर होती रहेगी, वे ज़िन्दगी भर करते रहेंगे मगर ज़िन्दगी के लिए जो सीखना है वह इसी दौर में आसानी से समझाया जा सकता है, सिखाया जा सकता है. यही सबकुछ ज़िन्दगी भर काम आएगा, शेष तो समझिये कि नौकर बनाने के लिए, किसी की नौकरी करवाने के लिए ही है.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

01 जुलाई 2020

वर्षों पुराना सपना शायद वापस गाँव ले जाए

क्या हम लोग गाँवों की तरफ लौटना पसंद करेंगे? क्या हम शहर की भौतिकतावादी ज़िन्दगी को आज तक जीने के बाद अब गाँव में जीवन बिताना स्वीकार करेंगे? ऐसे और भी सवाल उस समय भी उठे थे जबकि चीनी वायरस कोरोना के चलते लगाये गए लॉकडाउन में मजदूरों की, श्रमिकों की वापसी गाँव के लिए हुई थी. इस तरह के सवाल उस समय भी हमारे मन में उभरे थे जबकि पिताजी के देहांत के पश्चात् गाँव के पैतृक घर की स्थिति देखी थी. उस घर के आँगन में, छत पर, चौक पर, वहाँ की छोटी सी फुलवारी में हमने अपना बचपन बिताया है, गर्मियों की छुट्टियाँ बिताई हैं इस कारण तो उस घर, आँगन से लगाव होना स्वाभाविक ही है. इसके साथ-साथ उस मकान से अपने पुरखों की तमाम स्मृतियों को जुड़े हुए देखा है, उनकी कहानियों को सुना है, उस घर के अनेक किस्सों को सुना है इसके चलते भी उस जगह से लगाव होना सहज है.


बाबा जी के देहांत के पश्चात् गाँव के घर में जाना-रहना एकाधिक बार ही हुआ. उनके बाद कभी-कभार ही जाना होता रहा. धीरे-धीरे यह आना-जाना भी बंद सा हो गया. गाँव के मकान की तरफ विचार इसलिए भी नहीं आया क्योंकि अभी वह पिताजी की देखरेख में था. उस घर में बाद में रहने का मौका भले ही न मिला हो मगर हमेशा एक सपना मन के कोने में कहीं दुबका बैठा रहता. सोचते थे कि ज़िन्दगी के एक पड़ाव पर आने के बाद पुरखों की उस विरासत पर बहुत भव्य इमारत बनवाई जाएगी. एक निश्चित समय तक कुछ न कुछ करने के बाद सारी आपाधापी से दूर उसी की छाँव में रहा जायेगा. चूँकि घर का पैतृक मकान बहुत बड़ा है, इसलिए यह भी विचार आता था कि उस मकान के एक हिस्से में गाँव के बच्चों के लिए विद्यालय खुलवा दिया जायेगा.



कालांतर में स्थितियाँ बदलती रहीं मगर मन के कोने में सजा वह सपना ज्यों का त्यों बना हुआ है. अब जबकि परिवार की नई पीढ़ी (हमारी और हमारे बाद वाली) में से किसी का गाँव आना या कहें कि वापस लौटना असंभव है. सभी भाई अपने-अपने कार्यों, रोजगार के कारण घर से बहुत दूर हैं. ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में पैतृक घर-जमीन को निकालने की सहज, समवेत स्वीकृति बन जाये. हमारा सपना भी पूरा होगा या नहीं यह अभी कहा नहीं जा सकता है क्योंकि परिस्थितियाँ जिस तेजी से इस वर्ष बदलीं हैं, आने वाले समय में उनका क्या स्वरूप होगा इसका आकलन नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं कि गाँव में रहना आज के समय में मुश्किल हो गया है. आज भी हमारे परिचित में अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने बहुत सुख-सुविधाओं भरा जीवन बड़े-बड़े शहरों में व्यतीत करने के बाद वृद्धावस्था में गाँव में निवास करना ही पसंद किया.

आने वाले समय के बारे में अभी से कुछ कहना संभव नहीं. भविष्य की किसी योजना के फलीभूत होने के बारे में अभी से कोई भविष्यवाणी नहीं. इसके बाद भी पैतृक घर में गाँव के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का सपना किसी न किसी हाल में पूरा करने का प्रयास किया जायेगा. उस जमीन पर जहाँ कभी हमारे पुरखों की उपस्थिति रही हो, जिस जगह का अपना इतिहास रहा हो उस जगह पर भव्य इमारत न बने मगर एक छोटी झोपड़ी बनाने का सपना पूरा करने का प्रयास होगा. भले ही उसमें स्थायी रूप से निवास करने का अवसर न मिले मगर क्षणिक रूप से वहाँ कुछ पल गुजार कर बीते दिनों का अनुभव लेने का प्रयास किया जायेगा.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

12 मई 2020

तीन बोर्ड परीक्षाएँ पास करने के पुरोधा

लॉकडाउन के इस सीजन में शैक्षणिक संस्थानों के सामने छूटी परीक्षाओं को करवाने का संकट मुँह बाए खड़ा है. इससे बचने का तो कोई उपाय है ही नहीं. संकट ने मुँह खोला है तो कुछ न कुछ करेगा ही. कहीं-कहीं से ऐसी खबरें भी आने लगीं हैं कि जून में, कहीं जुलाई में शेष रह गयी परीक्षाओं को करवाकर बच्चों का भला किया जायेगा. एक तरफ कोरोना से बचने के लिए दूरी बनाये रखने के उपाय समझाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ परीक्षाओं के लिए कमर कसी जा रही है.


इधर एक तरफ संस्थाएँ परीक्षा करवाए जाने के लिए चिंतित हैं दूसरी तरफ इन्हीं संस्थानों में ऑनलाइन क्लासेज को लेकर नए नाटक चल रहे हैं. इसे नाटक ही कहेंगे, क्योंकि सबको मालूम है कि बाजार बंद है, स्टेशनरी मिलनी नहीं इसके बाद भी होमवर्क को नोट बुक पर करके अपलोड करना है. यहाँ न नोट बचे और बुक बाजार में हैं ही नहीं. बहरहाल, सरकार को दिखाने के लिए, अभिभावकों से फीस वसूलने के लिए, अध्यापकों को वेतन दिए जाने के बदले काम करवा लेने के संतोष के चलते ऐसा करना आवश्यक समझ आ रहा होगा.


ये सब अभी कोरोना, लॉकडाउन के चक्कर में शुरू हो गया है मगर देखा जाये तो भारतीय समाज में पढ़ाई को लेकर कुछ ज्यादा ही नौटंकी होने लगी है. छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर बोझ डालकर अभी से उनको बोझ उठाने की आदत डलवा दी जा रही है. भारी-भरकम पाठ्यक्रम के द्वारा सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही सिविल सेवा में चयनित करवाने की होड़ मची रहती है. आज बच्चों को पढ़ाई के बोझ से दबे देखते हैं तो अपना दौर याद आ जाता है. आज के दौर में बच्चों को दो-दो बोर्ड परीक्षाओं से पार होना पड़ता है, जबकि हमें तीन बोर्ड परीक्षाओं को पास करना पड़ा था. सुन कर आज के बच्चों को अजूबा लग रहा होगा सुनकर.

अजूबा आज के लिए हो सकता है मगर आपमें से बहुत से लोगों ने बोर्ड परीक्षा के तीन दौर निपटाए होंगे. कक्षा पाँच की परीक्षाएँ आने वाली थीं. स्कूल की दीदियाँ हम लोगों को समझाती थीं कि खूब पढ़ा करो, बोर्ड परीक्षा होगी. तब उस मासूमियत भरी उम्र में हम लोग समझ रहे थे कि बोर्ड में लिखना होगा. होते-करते वो दिन भी आ गया जबकि हमारी बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत हुई. सभी बच्चे निश्चित समय पर अपने स्कूल पहुँचे. वहाँ से दो अध्यापकों के साथ हम बच्चे पास के एक दूसरे स्कूल ले जाए गए. अपने स्कूल से अलग किसी स्कूल में परीक्षा देने का अपना ही आनंद समझ आ रहा था. परीक्षा से ज्यादा ध्यान उस स्कूल में लगे पेड़-पौधों की तरफ जा रहा था.

जिस तरह से परीक्षा होनी थी, हुई. तीन-चार दिन में कक्षा पाँच की और हमारी पहली बोर्ड परीक्षा संपन्न हुई. बचपन की उस बोर्ड परीक्षा का कोई महत्त्व आने वाले दिनों के लिए नहीं था मगर जिस बोर्ड परीक्षा का महत्त्व आने वाले दिनों के लिए था, वे भी उसी मस्ती और अल्लहड़ तरीके से पूरी की गईं. परीक्षा देने के समय ही हम दोस्तों के बीच निर्धारित कर लिया जाता था कि किस मैदान में क्रिकेट खेलने पहुँचना है, किस जगह पर बैडमिंटन की चिड़िया उड़ानी है. 

मस्ती और बेफिक्री के उस दौर के वापसी की बस कल्पना ही है और आये दिन उसी कल्पना में घूम-टहल लेते हैं.

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09 अप्रैल 2018

स्कूल का पहला दिन, वो पहला-पहला स्कूल - बारह सौवीं पोस्ट


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.


हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम याद नहीं पर शायद राधाकृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के बाद कितना समय स्कूल में बिताया, ये भी सही से याद नहीं पर इतना याद है कि कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में स्कूल हमें अच्छा सा न लगा. हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा.

जिद से ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के बलबूते शिक्षक के साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक की रास्ता कैसे याद रही? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में बस जाता है.

पहले स्कूल का पहला दिन तो जाने और आने के साथ ही समाप्त हो गया था. उसके बाद तो ये भी याद नहीं कि दूसरे स्कूल में जाना कितने दिन बाद हुआ था. उम्र का एक लम्बा समय गुजरने के कारण उपजी याददाश्त-दोष वाली इस स्थिति के बाद भी पहले स्कूल का पहला दिन अभी तक याद है तो दूसरे नए स्कूल का पहला दिन भी अभी तक बहुत अच्छे से याद है. तैयार होकर, तेल-फुलेल के साथ अपने बच्चा चाचा के साथ स्कूल पहुँचे. चाचाओं में दूसरे नंबर के बच्चा चाचा, हम सभी बच्चों के अत्यंत प्रिय चाचा हैं. हाँ तो, अपने नए स्कूल के पहले दिन हम अपने इन्हीं बच्चा चाचा के साथ स्कूल के लिए चल पड़े. स्कूल पहुँचे तो हम सारे जरूरी साजो-सामान से सुसज्जित थे, बस कमी थी तो हमारे टिफिन बॉक्स की. इसी को ध्यान में रखते हुए ही हमारे लिए टिफिन सजाया जाना था. सो चाचा जी हमें स्कूल में छोड़कर खुद बाजार को निकल गए.

स्कूल में हमारा समय सही से बीत रहा था. पहले वाले स्कूल के मुकाबले खूब खुला-खुला. प्यार-दुलार देती दीदियाँ. कक्षा के गिने-चुने विद्यार्थियों के बीच पहले ही दिन छा जाना, आज भी याद है. कुछ देर बाद कक्षा में आकर हमारा नाम पुकारा गया. उस तरफ देखा तो आया माँ अपने हाथ में एक नया टिफिन बॉक्स लिए खड़ी हैं और स्कूल के बाहर चाचा जी हमारी कक्षा की तरफ निहारते खड़े हुए थे. लाल-सफ़ेद रंग का गोल टिफिन, जो कई वर्षों तक हमारे लिए अपनी सेवाएँ देने के बाद घर के अन्य कामों में प्रयोग होने लगा. भोजनावकाश के समय अपने टिफिन बॉक्स को खोला तो जैसा कि आपको बताया था उसमें बिस्किट, टॉफी हमारे स्वागत में तत्पर थे. घर के सभी लोगों से, अम्मा से सुना है कि हमने भोजन बहुत देर से, लगभग छह-सात वर्ष की उम्र से करना शुरू किया था. तब तक दूध, बिस्किट, दालमोंठ और बाकी चट्ठा-मिट्ठा से काम चलाया जाता था, अपनी भूख मिटाने को. टिफिन बॉक्स में अपना मनपसंद भोजन देख मन और अधिक प्रसन्न हो गया और हम स्कूल का पहला दिन पूरा समय बिताकर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान भी समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक शीला आया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है.


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यह हमारे इस ब्लॉग की 1200वीं पोस्ट है. अपने स्कूल का पहला दिन और फिर पहले-पहले स्कूल की यादों को आप सबसे बाँटने से बेहतर कुछ और नहीं समझ आया, इस पोस्ट के लिए.