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02 फ़रवरी 2020

घुमक्कड़ी नई-नई जानकारी के लिए


घूमना-फिरना किसे अच्छा नहीं लगता है? नई-नई जगह देखना, नई-नई जानकारियाँ इकठ्ठा करना, अलग तरह की संस्कृति, कला, जीवन-शैली आदि से परिचय होता है. घूमना-फिरना मतलब साफ़ है कि यात्रा करनी है. यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का साधन नहीं हैं वरन इनके द्वारा बहुत कुछ सीखने को मिलता है. पर्यटन को भी इसी कारण से सरकारों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है कि इसी बहाने लोग एक-दूसरे की संस्कृति से परिचित हो सकें. देखा जाये तो किसी स्थान विशेष तक पहुँच जाना ही यात्रा का उद्देश्य नहीं. किसी स्थान विशेष के बारे में जानकारी कर लेना ही पूर्ण पर्यटन नहीं. यात्रा तो एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाना भर है. पर्यटन किसी स्थान विशेष को घूम लेना भर है. इसके बीच में भी बहुत कुछ होता है जो बहुत कम लोग आत्मसात कर पाते हैं.
घूमने-फिरने का शौक बहुत बुरी तरह से है. अक्सर अपने व्यस्त समय के बीच से भी कुछ समय निकाल कर घुमक्कड़ी कर ली जाया करती है. नई-नई जगह देखने का शौक, नए-नए लोगों से मिलना, उनकी जीवन-शैली के बारे में जानना आदि का शौक लगातार बना हुआ है और इसमें घूमना बहुत मदद करता है. कई बार अत्यधिक व्यस्तता अथवा छुट्टियों की समस्या के चलते अथवा किसी साथ के न मिलने के चलते कहीं दूर घूमना नहीं हो पाता है तो शहर के आसपास ही एक तरह से भटक लेते हैं. ऐसा करना घुमक्कड़ी की भूख को बहुत हद तक शांत करता है. हमारी घुमक्कड़ी के मायने बहुत अलग से हैं. जिस जगह जा रहे होते हैं, उस जगह के बारे में जानकारी, उससे संदर्भित अन्य किसी तरह की जानकारी तो वहाँ पहुँच कर मिल ही जाती है मगर हमारे लिए उस जगह तक पहुँचने के बीच की तमाम जगहों, अनेक लोगों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करना भी मुख्य बात होती है. यात्रा का साधन कुछ भी रहे मगर यात्रा शुरू होते ही हाथ में कैमरा अपने एक्शन मोड में आ जाता है. यह एक्शन मोड रात होने पर ही थमता है. 

रास्ते भर की तमाम जगहों के फोटो, जगह-जगह रुकने पर वहाँ से संदर्भित जानकारी के बारे में पता करना, वहाँ के लोगों से बातचीत करना आदि लगातार होता रहता है. यात्राओं का शौक होने के कारण बहुत ज्यादा यात्राएँ नहीं कर सके हैं. अभी तो अपना देश ही पूरी तरह से नहीं घूम सके हैं, विदेश का तो कोई प्लान ही नहीं. अपने क्षेत्र बुन्देलखण्ड और उसके आसपास के अलावा देश के कई भागों में जाना हुआ. हाँ, अभी नॉर्थ-ईस्ट की तरफ जाना नहीं हुआ मगर जहाँ-जहाँ जाना हुआ है वहाँ पूरे मन से जाना होता है. कैमरा साथ होने के कारण मन और भी ज्यादा लगा रहता है. अक्सर ऐसे दृश्य दिखाई पड़ जाते हैं जो सदैव उस जगह की स्मृति को ताजा करते रहते हैं. कभी कोई प्राकृतिक दृश्य, कभी किसी शहर का अजब सा नजारा, कभी ट्रेन की क्रासिंग के पास की स्थिति, कभी किसी जगह के अटपटे से होर्डिंग्स आदि. ये सब हो सकता है कि उस समय बहुत महत्त्वपूर्ण न लगें, उस समय इनके बारे में कुछ विशेष न लगे मगर बाद में ऐसे चित्र बहुत कुछ याद दिलाते हैं.

उदाहरण के लिए नीचे दिया गया चित्र हमारे कन्याकुमारी जाने के समय का है. ये आपको सामान्य से समोसे ही नजर आ रहे होंगे. हमें भी समोसे ही नजर आये थे और खास बात ये कि ये समोसे ही हैं. बस इनकी खासियत ये है कि ये आलू के बजाय प्याज के बने हुए हैं. विजयवाड़ा स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही हम लोग उतरे. एक मित्र को बुलाया था, वह सामने से आ रहा था. उसी समय इन पर नजर पड़ी. जानकारी करने पर मालूम हुआ कि ये समोसे प्याज के बने हैं. खटाक से हमारे कैमरे ने इन्हें अपने आगोश में ले लिया. देखिये, आज ये सब आपके सामने हैं. यदि उस दिन इनकी फोटो न ली होती तो आज ये कैसे आपके सामने होते. बस, यही सब हमारी यात्रा का, हमारी घुमक्कड़ी का अंग बन जाते हैं. स्थान विशेष से ज्यादा यात्रा के दौरान मिले स्थानों, लोगों, वस्तुओं के बारे में हमारी सजगता ही हमें लगातार यात्राओं के लिए, घुमक्कड़ी के लिए उकसाती रहती है. अब जल्दी ही एक नई यात्रा शुरू करनी है क्योंकि बहुत दिन हो गए जबकि किसी नई जगह को अपने कैमरे में कैद नहीं किया है.



11 सितंबर 2016

दो पहाड़ियों के बीच हवा में बहता पानी

हम लोगों के दर्शनीय स्थलों में मुख्य रूप से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल, विवेकानन्द केंद्र और कन्याकुमारी का समुद्रतट था. इसके अलावा कन्याकुमारी में बना वैक्स म्यूजियम, सुचिन्द्रम, माथूर हैंगिंग ब्रिज, पद्मनाभम पैलेस, कोवलम बीच भी शामिल थे. विवेकानन्द केंद्र में संचालित इंटरनेट कैफे तथा ट्रेवल-टूर सेंटर पर संपर्क किया और किराया, समय, स्थान आदि का निर्धारण करने के बाद अगले दिन टैक्सी से घूमने का निश्चय किया. उस सेंटर के मालिक से हुई फोन पर बातचीत के बाद एक टैक्सी सुबह सात बजे के लिए बुक कर दी गई. 


अगले दिन रक्षाबंधन का पावन पर्व था. अपने शहर से बहुत दूर होने, कलाई सूनी होने का दुःख तो था ही साथ ही ठीक एक वर्ष पूर्व हुई दुर्घटना भी दिमाग में छाई हुई थी. तमाम सारी उदासियों के बीच सुखद एहसास इसका हुआ कि टैक्सी सुबह सात बजने से चन्द मिनट पहले काशी’(जहाँ हम रुके थे) के सामने खड़ी हो गई. सुखद एहसास इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हमने अपनी तरफ टैक्सी को समय से आते कम ही देखा है. ड्राईवर ने आने की सूचना मोबाइल पर दी और हम लोग नीचे आने को तैयार हुए. पहली मंजिल पर कमरा होने के कारण हम सीढ़ियों से धीरे-धीरे उतरते हुए नीचे आ रहे थे. ये लोग जल्दी से उतर कर केंद्र के कमरों सम्बन्धी हिसाब-किताब करने की दृष्टि से रिसेप्शन की तरफ चले गए. 
सीढ़ियाँ उतर कर जैसे ही बरामदे को पार किया, अचानक से सामने एक लड़की और लड़का प्रकट से हो गए. लड़की के हाथ में छोटी सी स्टील की प्लेट थी, जिसमें एक दीपक जल रहा था. प्लेट में एक तरफ करीने से रोली, हल्दी, चावल रखे हुए थे. अगरबत्ती भी अपनी महक फैला रही थी. लड़का एक छोटा सा थैला अपने हाथों में समेटे था. सलवार कुर्ता, पैरों में स्लीपर, आँखों में नजर का चश्मा लगाये आत्मीय भाव से लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा, “भैया आज रक्षाबंधन है. आपको राखी बाँधना है.” 


जिस कमी को सोचते-सोचते सीढियाँ उतर रहे थे, उसी को अचानक पूरा होते देखकर मन ख़ुशी से झूम उठा. बिना कुछ कहे-पूछे उसके सामने अपनी सूनी कलाई बढ़ा दी. अपने दुपट्टे को अपने सिर पर रखकर दाहिने हाथ की ऊँगली से हमारे माथे पर टीका लगाया, चावल लगाये और फिर आरती उतार कर प्लेट अपने साथ वाले लड़के को पकड़ा दी. कलाई पर राखी बाँधने के बाद उसने तेजी से झुकते हुए हमारे पैर छूने की कोशिश की. उसकी तत्परता से अधिक फुर्ती के साथ उसके हाथों को बीच में ही रोक कर हमने उसके पैर छुए. आप बड़े हो, पैर नहीं छूतेकहते हुए उसने अपने संस्कारों को स्पष्ट किया. हम लोग बहिनों से पैर नहीं छुआते बल्कि उनके पैर छूते हैंकहते हुए उसको स्नेह-भेंट दी. इस पर वे दोनों ही अचकचा गए.समझाने पर वे उसे स्वीकारने को तैयार हुए. ख़ुशी से आँखें छलकाते हुए हम तीनों लोग एकसाथ आगे बढ़े. सामने से सुभाष को, बिटिया और निशा को आते देखकर उस बहिन ने इनको भी राखी बाँधी. हँसते-मुस्कुराते हुए वो आगे बढ़ गए और हम लोग टैक्सी में बैठ घूमने को निकल पड़े. 

टैक्सी चल दी. मुरुगन नाम था ड्राईवर का. दो-चार मिनट के औपचारिक परिचय से समझ आया कि उसे हलकी-फुलकी हिन्दी समझ आती है. उतनी ही हलकी-फुलकी बोल भी लेता है. विवेकानन्द केंद्र के बाहर सड़क पर आकर उसने कार दाहिनी तरफ मोड़ दी. जगह अनजान थी, जहाँ जा रहे थे वे जगह भी अनजानी थी. आसपास में कोई परिचित भी नहीं था. ऐसे में असुरक्षा का बोध होते ही दिमाग सक्रिय हुआ. अपने भाइयों को, दीदी को टैक्सी का नंबर, ड्राईवर का नाम, मोबाइल नंबर, ट्रेवल-टूर सेंटर वाले का नाम, मोबाइल नंबर, कहाँ-कहाँ जाना है आदि विवरण व्हाट्सएप्प कर दिया. क्या होगा, क्या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता मगर अब दिमाग में ये भाव था कि हमारी जानकारी सबके पास है.


टैक्सी मुख्य सड़क पर कुछ देर चलने के बाद दाहिनी तरफ मुड़ गए एक पक्के रास्ते पर मुड़ गई. जैसा कार्यक्रम ड्राईवर के साथ बना था, उसके अनुसार हम लोगों को पहले पद्मनाभम पैलेस देखना था. (इसके बारे में विस्तार से आगे) पद्मनाभम पैलेस से निकलते ही हमारी टैक्सी उसी सिंगल रोड पर आगे बढ़ चली. अब हम लोग हैंगिंग ब्रिज की तरफ जा रहे थे. छोटे-छोटे कस्बों, केले, नारियल के खेतों के अलावा दोनों तरफ कुछ और बड़े-बड़े, लम्बे-लम्बे अनजाने से पेड़ दिखे. मुरुगन ने बताया कि ये रबर के पेड़ हैं. तेजी से भागती टैक्सी के साथ-साथ भागने की होड़ लगाते केले, नारियल, रबर के छोटे-छोटे बगीचे, खेत मन मोह ले रहे थे. दोनों तरफ फैली हरियाली, सामने पक्की सड़क, बीच-बीच में आते जाते पक्के-कच्चे मकानों के बीच से हम लोग स्थानीय जानकारी लेते हुए आगे चले जा रहे थे. थोड़ी देर बाद दाँयी तरफ दूर पहाड़ों की श्रृंखला नजर आने लगी. बादल पहाड़ों से उतरकर सड़क पर आने की कोशिश कर रहे थे. पहाड़ों की श्रृंखला और दूर होती रही और हमारी टैक्सी घुमावदार रास्ते पर दौड़ती रही. दाँए-बाँए घूमते-घूमते पहाड़ कब बाँयी तरफ आ गए पता ही नहीं चला. पहाड़ के सहारे से बनी सड़क पर टैक्सी घुमाते हुए ड्राईवर मुरुगन ने टैक्सी स्टैंड सी दिखने वाली जगह पर कार रोक दी.


कार से उतरकर आसपास निहारा. पक्की सड़क और पहाड़ के बीच एक बहुत छोटी सी नहर सी नजर आई. गहराई बहुत ज्यादा समझ नहीं आ रही थी. दाँयी तरफ बहुत बड़े भाग में केले, नारियल, रबर के पेड़ हरियाली बिखेरते हुए खड़े थे. प्राकृतिक सुन्दरता को आँखों-आँखों में समेट उस दिशा में चल दिए जिस तरफ हैंगिंग ब्रिज बना हुआ था. सुभाष टिकट लेने को और हम फोटो लेने को आगे बढ़े. 


हमारे साथ-साथ बाँयी तरफ वो नहर भी चली जा रही थी. उसका यूँ पहाड़ी पर बहते रहना समझ नहीं आया. दाहिनी तरफ जिस तरह का दृश्य दिख रहा था उससे एकबारगी लगा कि हो सकता है ये नहर किसी झरने जैसा काम करे. 


पुल की तरफ जाने वालों की संख्या अत्यंत कम थी. हम लोगों के अलावा संभवतः 7-8 लोग और होंगे. चन्द कदम आगे चलने पर आँखों के ठीक सामने पुल बना दिख रहा था. पहली नजर में आम पुलों की भांति वो भी नजर आया. लम्बाई अधिक दिखी, ऊँचाई भी अधिक समझ आई हाँ, चौड़ाई कुछ कम लगी. 


रास्ता हल्का सा बाँयी तरफ घूम कर पुल से मिल गया. दाहिनी तरफ नीचे जाने को सीढियाँ बनी हुई थीं. पूरा पुल कई खम्बों के सहारे टिका हुआ सामान्य पुलों जैसा ही दिखा. यदि सामान्य सा पुल है, खम्बों पर ही टिका है तो इसको हैंगिंग ब्रिज कहने का क्या औचित्य है, ये समझ नहीं आया. नीचे जाने वाली सीढ़ियों पर गौर न करके पुल की तरफ घूम गए. 


ओ तेरी! तो ये है असली वजह, अब समझ आया.ऐसा लगा जैसे पुल पर चढ़ते ही ज्ञान मिल गया हो. काफी दूर से जो नहर पानी लिए हमारे साथ बाँयी तरफ चल रही थी वो पुल के सहारे ही एक पहाड़ी से सामने बनी दूसरी पहाड़ी पर पानी ले जा रही थी.


संकरे से लगभग 3 फीट चौड़े पुल पर जब हमने चलना शुरू किया तो दाहिनी तरफ भरपूर गहराई दिखाई दी. बाँयी तरफ देखा तो पैरों के ठीक नीचे पानी बह रहा था. यही असली कारण था, उसे हैंगिंग ब्रिज कहने का. 29 खम्बों के सहारे खड़ा पुल एक तरफ से दूसरी तरफ पानी लेकर जाता है. 


लगभग 7-8 फीट गहरी और लगभग इतनी ही चौड़ी टंकी या कहें कि नाली का निर्माण पुल के रूप में किया गया. इसी पर लगभग तीन फीट चौड़ा पक्का रास्ता बना दिया गया. जिस पर चलकर एक तरफ से दूसरी तरफ जाया जा सकता है. 


पुल के किनारे लगे एक सूचना बोर्ड से सामान्य सी जानकारी मिली. कुछ जानकारी वहाँ सामान बेचते लोगों से, कुछ स्थानीय नागरिकों से मिली और कुछ जानकारी इंटरनेट ने उपलब्ध करवा दी. इसे एशिया का सबसे बड़ा जलसेतु कहा जाता है. 


पुल पर सहम-सहम कर धीरे-धीरे चलते हुए बीचों-बीच पहुँचकर देखा तो पुल के नीचे से एक नदी बह रही थी. पुल पर सहमना इस कारण से हुआ क्योंकि जमीन से लगभग सौ फीट की ऊँचाई पर हम लोग खड़े थे, हवा भी खूब तेज बह रही थी. पुल के साथ बहता पानी बाँयी तरफ तो दिख ही रहा था, सीमेंट के पत्थरों के बीच की दरारों के कारण कदमों के नीचे बहता भी दिख रहा था. इसके अलावा आसपास बनी सीमेंट की रेलिंग भी बहुत सुरक्षित समझ नहीं आ रही थी. रेलिंग के दो खम्बों के बीच पर्याप्त स्थान था, जो डराने के लिए काफी था.


बहरहाल, तेज धूप के बीच होते बादलों, तेज हवा, बिलकुल नजदीक बहते तेज पानी के बीच नीचे दूर-दूर तक फैली हरियाली का आनंद लेकर हम लोग लौट आये. पुल के संकरेपन को ऐसे समझिये कि दो लोग एकसाथ नहीं चल सकते थे. 


वापस आकर सीढ़ियों के सहारे नीचे जाकर पुल की ऊँचाई को परखा. उसके नीचे महेन्द्रगिरि पहाड़ी से निकलने वाली पहराली नदी को कैमरे में कैद किया. 




नदी के किनारे लगे बोर्ड में साफ़-साफ़ ‘Swimming is Strictly Prohibited in this Place’ लिखा होने के बाद भी दो लोगों का तैरना कैद किया. ये इस उद्देश्य से कि नियम तोड़ने का काम सिर्फ उत्तर भारतीय ही नहीं करते, नियम का पालन करने को प्रसिद्द लोग भी ऐसा करते हैं. सन 1966 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के० कामराज द्वारा सूखे की समस्या से निपटने के लिए इसे बनवाया गया था. इसके पास बसे छोटे से गाँव के नाम पर इस पुल को पर्यटक माथुर हैंगिंग ब्रिजके नाम से जानते हैं.



तेज धूप के बीच अचानक होने वाली बरसात तथा आगे के अन्य दूसरे दर्शनीय स्थलों को देखने की ललक ने हम लोगों को कार की तरफ दौड़ाया. वहाँ सामान बेचते लोगों से आम, नारियल पानी, स्थानीय खाद्य पदार्थों के लेकर हम लोग कार में बैठकर आगे को चल दिए. अब जलसेतु को जाती नहर हमारे दाँए एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी को पानी भेजने हेतु दत्तचित्त थी. और हम एक जगह से दूसरी जगह जाने को तत्पर थे. 


08 सितंबर 2016

विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के आध्यात्मिक सम्मोहन में


पहले दिन समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक के दर्शन करने के बाद उसको एकदम करीब से देखने की चाहत और बढ़ गई थी. सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखने के बाद सूर्योदय देखने की उत्कंठा बढ़ गई. बहरहाल दो दिन की यात्रा, पहले दिन का समुद्र तट का जबरदस्त भ्रमण तन-मन को बाहरी रूप में भले ही न थका सका हो मगर अंदरूनी रूप से ये दोनों आराम चाह रहे थे. ये तो नहीं कहेंगे कि पलंग पर हमारे बिछते ही नींद ने हमें घेर लिया क्योंकि तन-मन भले शांति चाह रहे थे मगर दिमाग अगले दिन की तैयारियों में भागदौड़ करने में लगा हुआ था. सुबह उठना है, सूर्योदय देखना है, फिर रॉक जाना है, बहुत-बहुत सी फोटो निकालना है, कैमरे की बैटरी को फुल्ली चार्ज रखना है, पैर में दिक्कत न हो इसका बंदोवस्त करना है आदि-आदि सोचा-विचारी में दिमाग लगा रहा. दिमाग को शांत न होता देखकर तन-मन ने उसको अकेला छोड़ दिया और नींद की गोद में जा छिपे. 

भोर में उठाने के लिए मोबाइल से ज्यादा दिमाग सक्रिय था. इससे पहले कि मोबाइल घनघनाता, दिमाग ने अपनी बत्ती जला दी. आश्चर्य कि हम तो उठे ही बिटिया रानी हमसे ज्यादा चैतन्य रूप में बैठी हुई थी. स्कूल जाने की आनाकानी यहाँ नहीं दिख रही थी. फटाफट हम सब तैयार होकर विवेकानन्द केंद्र परिसर के आखिरी छोर पर चल दिए. पक्की सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़, इधर-उधर नाचते मोर मन को मोह रहे थे. कई-कई सहयात्रियों के साथ चलते-चलते हम लोग भी सूर्योदय स्थल पर पहुँचे. कैमरा, मोबाइल कैमरा, सेल्फी स्टिक सब अपने-अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार थे. ओह गज़ब! मुँह खुला का खुला रह गया. कल दोपहर से शाम तक देखे गए समुद्र से एकदम अलग रूप दिख रहा था समुद्र का. बाँयी तरफ से सूर्य निकलने का संकेत मिल रहा था और दाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल पूरी गरिमा-भव्यता से खड़ा हुआ था. सामने से दूधिया लहरें काली रेत पर बिखर-बिखर जा रही थी. धीरे-धीरे सूर्योदय होने लगा. रजत रश्मियाँ बिखर-बिखर कर समूचे समुद्र को रजतमय बनाने लगीं. 


विवेकानन्द केंद्र से रॉक मेमोरियल
हम सब सम्मोहित से किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में खड़े हुए थे. बिटिया रानी रेत पर कभी नाम लिखती, कभी घरौंदे बनाती. लहरें आ-आकर इन सबको अपने साथ ले जाती. बिटिया रानी उछल-उछल कर लहरों के साथ अपना तारतम्य जोड़ती दिखती. हम भी मंत्रमुग्ध से कैमरे में सबकुछ कैद कर लेना चाहते थे. सो दाँए-बाँए, इधर-उधर होकर, सारी स्थितियों में समूचे दृश्यों को पकड़ते जा रहे थे. (यहाँ के आनंद के बारे में आगे फिर कभी) यद्यपि समुद्री लहरें, बहुत-बहुत दूर दिखती छोटी-छोटी नौकाएँ, जमीन से आसमान की राह पर चढ़ता सूरज का सौन्दर्य हम सबको रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा था मगर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल देखने की अभिलाषा के चलते इन सारे दृश्यों से विदा ली. 


रेत पर बिटिया की कलाकारी

रेत पर बिटिया की कलाकारी
जल्दी-जल्दी समूचे काम निपटाकर विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के द्वार पहुँच गए. बड़े से जालीदार फाटक को पार करके अन्दर परिसर में प्रवेश किया. कोई छुट्टी नहीं थी फिर भी लगभग 100 लोगों की भीड़ लाइन में लगी दिख रही थी. चैतन्य सेवाव्रतियों (सेवाभाव से विवेकानन्द केंद्र में अपनी सेवाएं देने वाले व्यक्ति), स्वयंसेवकों, वर्दीधारी सहज व्यक्तियों ने मुस्कुराकर स्वागत किया. हमारी शारीरिक स्थिति को देखकर लाइन में लगने की बाध्यता को हमारे ऊपर लागू न करते हुए उस स्थान पर पहुँचने का संकेत किया जहाँ से फैरी पर चढ़ने का इंतजार किया जाता है. हमारी धर्मपत्नी निशा और उनके साथ बितिया रानी भी टिकट लेने के लिए लाइन में लग गई. हम और मित्र सुभाष सुरक्षाकर्मी द्वारा बताये गए स्थान की तरफ चल दिए. जिस बरामदे में लगभग 200 से अधिक लोग बैठे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. हम लोगों ने परिसर में बड़े से पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर लोगों को पढ़ने का, आसपास की स्थितियों को जानने-परखने का शौक अंजाम देना शुरू किया. दिमागी और जुबानी क्रियाविधि के साथ-साथ उंगलियाँ कैमरे पर थिरकती रहीं और आसपास के दृश्यों को कैद करती रहीं. 

सामान्य टिकट के साथ-साथ विशेष टिकट की भी वहाँ व्यवस्था थी. जिसमें निर्धारित से कहीं अधिक मूल्य चुकाकर लाइन में लगने से बचा जा सकता था. हालाँकि बहुतायत में ऐसे लोग ही थे जो सामान्य टिकट ले रहे थे. विशेष टिकट लेने वालों में विदेशी सैलानी, कुछ अधिकारी जैसे लोग समझ आये. उस बड़े से जालीदार फाटक से अन्दर प्रवेश करने वाले सभी लोगों को उसी पंक्ति में लगना पड़ता. विशेष टिकट लेने के इच्छुक सीधे परिसर में आ पाते थे. इस बीच देखा कि एक स्वयंसेवक लगातार भागदौड़ करने में लगा था. दो-तीन सुरक्षाकर्मियों से मिलकर उसने हर बार हमारी तरफ इशारा किया. कुछ संशय सा लगा तो उसके पास जाकर पूछा कि कोई समस्या है क्या? उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं, बस उन सभी सुरक्षाकर्मियों को ये बताना था कि आप लोगों को अन्दर जाने दें. हम लोगों को समझ आया कि वो अपनी जिम्मेवारी को पूरी तरफ से सम्पादित करने में लगा हुआ है. उधर टिकट की लाइन पीछे से बढ़ती जा रही थी और आगे से घटती जा रही थी. इसी बीच एक सुरक्षाकर्मी से, जो उसी इंतजार करने वाले हॉल की व्यवस्था में संलग्न था, बातचीत से ज्ञात हुआ कि वो सेना से सेवानिवृत व्यक्ति है. झाँसी में सेवारत रहने के कारण उसे भी हम लोगों से विशेष लगाव महसूस हुआ. काफी देर तक बातचीत के बाद आखिरकार हम लोगों की बारी आ गई. 


आत्मीय सुरक्षाकर्मी के साथ सुभाष और हम
आवश्यक सुरक्षा जाँच के बाद, टिकट जाँच के बाद हम लोग तट पर खड़ी फैरी की तरफ बढ़ चले. इससे पहले एक विशेष बात जो वहाँ की व्यवस्था के बारे में पता की वो बड़ी मजेदार लगी. जो व्यक्ति हमारे लिए बड़ी मुस्तैदी से भागदौड़ कर रहा था, उसी से पूछा कि आखिर आप लोग सभी को टिकट लेने की लाइन में क्यों लगा रहे हैं? क्या सभी को अपना-अपना टिकट लेना पड़ता है? तब उसने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है. एक व्यक्ति कितने भी टिकट ले सकता है मगर परिसर के अन्दर भीड़ न फैले, इधर-उधर किसी और काम में न लग जाये इसलिए ऐसा नियम बना दिया है कि सभी को टिकट लेने वाली लाइन में लग्न पड़ेगा. समझ आया कि वाकई एक-एक व्यक्ति का टिकट लेना और उसके साथ आये कई-कई लोगों का परिसर में नाहक टहलना इन स्वयंसेवकों के लिए, सुरक्षाकर्मियों के लिए सिरदर्दी तो हो ही सकता था. अब ऐसे में उन सबका ध्यान सिर्फ लाइन पर ही था.  


चल पड़े फैरी में बैठ
किनारे खड़ी फैरी ने हम सबको आदर सहित अपने अन्दर स्थान दिया. एकबार में 150 लोगों को लेकर फैरी हिलते-डुलते विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की तरफ चल पड़ी. चन्द मिनट में फैरी जब रॉक किनारे लगी तो विशालकाय इमारत सामने खड़ी हाथ फैलाये हमारा इंतजार कर रही थी. सबसे ऊपर फहराता भगवा ध्वज पूरी गरिमा से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल को भव्यता प्रदान कर रहा था. सन 1970 में नीले, लाल, काले, हरे रंग के ग्रेनाइट पत्थरों से बना मेमोरियल, जिसका गुंबद 70 फुट ऊंचा है, समुद्रतल से लगभग 20 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. पता चला कि यह स्थान 6 एकड़ के क्षेत्र में फैला है. यह विवेकानन्द जी के 24, 25 और 26 दिसम्बर 1892 को श्रीपद पराई आने तथा गहरे ध्यान-आध्यात्मिक ज्ञान का स्मारक है. 


शान से लहराता भगवा ध्वज
चट्टान पर बने निश्चित रास्ते पर चलते समय चारों तरफ समुद्र की विशालता अद्भुत लग रही थी. हमारे बाँयी तरफ वे लोग कतारबद्ध रूप से खड़े थे जो रॉक से वापस जा रहे थे. हम लोग प्रसन्नता, उत्साह, उमंग में बढ़ते हुए आगे चले जा रहे थे. सामने से आती बहुत तेज हवा जैसे पीछे गिराने के मूड में हो और हम लोग उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने के मूड में. रॉक पर चढ़ने के क्रम में बाँयी तरफ वापस जाने वालों की कतार तथा दाँयी तरफ इमारतें, मेमोरियल का प्रशासनिक भवन, टिकट वितरण केंद्र बना हुआ था. सामान्य से शुल्क वाले टिकट को लेकर हम लोग आगे बढ़ते, वहाँ व्यवस्था देख रहे एक सेवाव्रती श्री राजकुमार जी को अपने आने की सूचना दी. उनसे विवेकानन्द केंद्र पर ही मुलाकात हुई थी और वे बड़े ही प्रभावित हुए थे. 


टिकट वितरण केंद्र
उनसे चन्द मिनट की औपचारिक मुलाकात के बाद आगे बढ़े तो देखा कि मेमोरियल के दर्शन के लिए बनी सीढ़ियों के सहारे ऊपर जाना होगा. इन सीढ़ियों पर चढ़ने से पहले जूते-चप्पल वहाँ बने नियत स्थान पर जमा करने थे. ऊपर बिना जूते-चप्पल के ही जाने की अनुमति थी. ये स्थिति व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए सहज नहीं थी. उस लड़के से, वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी से जूते न उतार पाने की अपनी समस्या बताई तो उसने इसे आवश्यक बताया. भाषाई दिक्कत का सामना यहाँ करना ही पड़ रहा था. किसी तरह उसको अपने परेशानी बताई तो उसने जूतों की तरफ इशारा करते हुए कहा, नो लेदर? हमने उसको बताया कि जूते लेदर के नहीं हैं तो उसने मुस्कुराते हुए इशारों में समझाया कि जूतों पर कपड़ा लपेट लीजिये. अब जूते-चप्पलें एकत्र करता बालक और वो सुरक्षाकर्मी कपड़ा खोजने में लग गए. अंततः एक कपड़ा मिल ही गया और उसे दो हिस्सों में बाँटकर जूतों पर चढ़ा सीढ़ियों की तरफ बढ़ चले. उन लोगों की सहायता, सहजता को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा. 


प्रशासनिक भवन


समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल
ऊपर उस स्थान पर पहुँचने पर, जहाँ कि एक तरफ श्रीपद मंडपम और विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है, खुद को चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ पाया. बहुत तीव्रगति से चलती हवा एक जगह स्थिर नहीं रहने दे रही थी. समुद्र की लहरें पूरी ताकत से आकर शिला से टकराती और बिखर जाती. चारों तरफ से उठता समुद्र का शोर उसकी विशालता के साथ-साथ उसकी भयावहता का परिचय करवा रहा था. ये सोचकर ही समूचे बदन में सिरहन दौड़ गई कि लगभग सवा सौ वर्ष पहले नितांत निर्जन में निपट अकेले ही स्वामी विवेकानन्द ने इसी भयंकर शोर को जीता था. आसमान पर सूर्य पूरे तेज के साथ चमक रहा था, हवा पूरे जोश से बह रही थी, समुद्र चारों तरफ तो नहीं मगर तीन तरफ से अपनी लहरों के द्वारा टकराने में लगा था मगर ये सब भयावहता के बजाय अद्भुत पावनता का एहसास करा रहे थे. 


श्रीपद मंडपम
विचारों का प्रभाव किस तरह समूचे वातावरण को परिवर्तित कर देता है, इसे यहाँ आकर महसूस किया जा सकता है. सैकड़ों लोगों की भीड़, तीन-तीन सागरों का गर्जन, लहरों और हवा का रौद्र रूप का समाहित स्वरूप भी स्वर्गिक शांति का आभास करा रहे थे. अब हम ठीक उस स्थान पर खड़े हुए थे जहाँ सामने समुद्र, पीछे समुद्र दाँए हाथ श्रीपद मण्डपम और बाँए हाथ विवेकानन्द मंडपम बना हुआ है. श्रीपद मण्डपम श्रीपद पराई पर स्थित है जिसे पवित्र स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि यहीं देवी कन्याकुमारी (देवी पार्वती का रूप) ने अपना पहला कदम रखा था. यहाँ बने मंडपम में एक शिला पर प्रथम पाद के रूप में चरण का चिन्ह आज भी बना हुआ है. 


विवेकानन्द मंडपम प्रवेश द्वार
विवेकानन्द मंडपम में प्रवेश के लिए सीढियाँ चढ़कर पहुँचना होता है. इस भवन में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के ठीक सामने स्वामी विवेकानन्द की प्रभावशाली प्रतिमा के दर्शन होते हैं. लगभग चार फुट ऊंचे आधारतल पर कांसे की बनी इस मूर्ति की ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. यह इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है. किसी तरह से आदेशित हुए बिना लोग गहन शांति में उस प्रभावशाली व्यक्तित्व के दर्शन कर कृतार्थ महसूस करते दिखे. प्रवेश द्वार के ठीक अगल-बगल स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता के चित्र स्थापित है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे विवेकानन्द उन दोनों को निहार रहे हैं और वे दोनों वात्सल्यभाव से उनको आशीष दे रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि विवेकानन्द जी तैरकर इस शिलाखंड पर आये और इसी स्थान पर तीन दिन, तीन रात गहरी ध्यान साधना में लीन रहकर खुद को देश सेवा के प्रति समर्पित करने तथा वेन्दान्त दर्शन को समूचे विश्व में प्रसारित करने को तैयार किया. इस भवन में ही मूर्ति के पार्श्व में बने द्वार से नीचे उतर कर ध्यान मंडपम में पहुँचा जा सकता है. ध्यान मंडपम में जाकर ध्यान करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. यह स्वेच्छा पर आधारित है. छोटे से अत्यधिक कम रौशनी से ढंके हॉल में द्वार से प्रवेश करते ही सामने दीवार पर चमकता ॐ दिखाई देता है. इसके साथ-साथ अत्यधिक धीमे स्वर में इसका उच्चारण वहाँ आध्यात्मिक उपस्थिति का एहसास करवाता है. हम चारों लोगों ने भी चमकते ॐ के सामने कुछ देर ध्यान की मुद्रा में बैठकर मानसिक शांति का अनुभव किया. 


विवेकानन्द मंडपम भवन  
कुछ देर बाद बाहर आकर शांत भाव से चारों तरफ घूम-टहलकर समुद्र के भयावह सौन्दर्य को निहारते रहे. यदि वहाँ से नियत समय पर वापसी का कोई नियम न होता तो संभवतः रात को वहीं रुककर उस भयावह कोलाहल का एहसास किया जाता, जिसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी ने अपने में समाहित कर लिया था. मन ही मन विवेकानन्द जी को नमन करते हुए वापस फैरी की राह चल दिए. फैरी समुद्र की लहरों पर मंथर गति से दौड़ने लगी. रॉक मेमोरियल पीछे छूटने लगा. हृदय में फिर एक बार उसे छूने की, दर्शन करने की उत्कंठा जन्मने लगी. 
समुद्र तट से विवेकानन्द रॉक मेमोरियल और तमिल कवि की प्रतिमा

तमिल कवि तिरुवल्लुवर
जहाँ से फैरी पर बैठे थे वहाँ वापस उतरकर भी बाहर जाने का मन नहीं हुआ. बहुत देर तक वहीं किनारे बैठे-बैठे रॉक को निहारते रहे. इसी रॉक के बगल में प्रसिद्द तमिल कवि तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची विशालकाय प्रतिमा स्थापित है. अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम पर स्थापित इस मूर्ति की ऊँचाई तमिल मुक्तक काव्य तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों या अथियाकरम का प्रतिनिधित्व करती है. इसी तरह उनकी तीन उंगलियाँ अरम, पोरूल और इनबम नामक तीन विषयों अर्थात नैतिकता, धन और प्रेम के अर्थ को इंगित करती हैं.  अंततः वहाँ परिसर से बाहर आकर थोड़ी दी पेटपूजा करने के बाद समुद्रतट पर किनारे आकर फिर बैठ गए. जहाँ से दाँयी तरफ सूर्यास्त का और बाँयी तरफ विवेकानन्द रॉक मेमोरियल का दर्शन किया जा सकता था. सब कुछ अपने हृदय में भर लेने के लिए एकटक देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं.