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06 दिसंबर 2019

समय, परिस्थिति के हिसाब से अपने-अपने सत्य-असत्य


आज के दौर में जबकि एक तरफ संवैधानिक रूप से चलने की बात की जाती है उस समय में संवैधानिक क्या है, इसे लेकर भी संशय बना हुआ है. हैदराबाद की जघन्य घटना के बाद आम जनमानस में आक्रोश बना हुआ था और आरोपियों को जनता के हवाले करके, जनता के द्वारा हिसाब बराबर किये जाने की आवाजें उठ रही थीं. देश के सर्वोच्च सदन से भी एक सदस्य ने अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए जनता के द्वारा ही ऐसे लोगों का न्याय किये जाने की बात कही थी. किसी भी लोकतान्त्रिक देश में जहाँ कि संविधान, कानून आदि के द्वारा समाज का, सत्ता का सञ्चालन होता हो वहाँ ऐसे किसी भी तानाशाही तरीके को सहज स्वीकार नहीं किया जा सकता है. यह जानते-समझते हुए भी जो भी अपराध हो रहा है, पकड़े जाने वाले व्यक्ति अपराधी हैं, वे अपना अपराध कबूल चुके हैं इसके बाद भी जनता को सीधे तौर पर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है. सड़कों से चाहे आक्रोशित जनता की आवाज़ उठी हो या फिर सदन के भीतर से किसी सदस्य की, सभी में आरोपियों के खिलाफ मानसिकता, महिलाओं के साथ होती आ रही जघन्य वारदातों के कारण उपजा आक्रोश था मगर सिर्फ इसी से उनको किसी तरह का न्याय करने का, कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता. 


ऐसे आक्रोश भरे दौर में जबकि लोग आरोपियों द्वारा अपना अपराध कबूल लेने के बाद भी उनको न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने को महज समय की बर्बादी मान रहे थे, किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण समझ रहे थे, उसी समय उन चारों आरोपियों के एनकाउन्टर की खबर ने जैसे अबको चौंका दिया. अचानक से बहुत से स्वर बदले दिखने लगे. जो कल तक सड़कों पर न्याय की मांग कर रहे थे, अचानक पुलिस एनकाउन्टर के बाद मानवाधिकार की बात करने लगे. इ चारों आरोपियों की आड़ में किसी बड़े आदमी को बचाने की चर्चा करने लगे. ऐसा कुछ भी संभव है मगर इस तरह की घटनाओं से दो तरह की बातें तो साफ़ होती हैं कि क्या कानून को जनभावना के कारण ऐसा कोई भी कदम उठा लेना चाहिए? दूसरे कि क्या ऐसे कदमों से प्रशासनिक निरंकुशता बढ़ने की सम्भावना है? पुलिस द्वारा एनकाउन्टर की जो कहानी बनाई-बताई जा रही उसमें कितनी सच्चाई है, कितनी नहीं ये तो पुलिस वाले ही जानें किन्तु असल सत्य यही है कि चार ऐसे व्यक्ति मारे गए जिन्होंने अपने अपराध कबूल लिया था. यहाँ सवाल उठाने वालों के अपने सत्य हैं और उन सवालों का विरोध करने वालों के अपने सत्य हैं.

इन्हीं सवालों के साये में देखना होगा कि पिछले सात सालों से दिल्ली की सड़कों पर बर्बरता का शिकार हुई उस बेटी को कहाँ इंसाफ मिल सका है? उसके अलावा बहुत सी बेटियाँ ऐसी हैं जो अभी भी इंसाफ की तलाश में भटक रही हैं, कुछ जीवित अवस्था में और कुछ की आत्मा. क्या उनके परिजनों को यह भटकाव सही लगता होगा? आज की एनकाउन्टर की घटना एकबारगी कानूनी रूप में, संवैधानिक रूप में गलत भले लगे किन्तु उस डॉक्टर बेटी के परिजनों को किसी भी रूप में यह कदम गलत नहीं लग रहा होगा. उस परिवार से जुड़े लोगों को या फिर ऐसी किसी भी जघन्य घटना के दर्द को सह रहे लोगों को भी पुलिस का यह कदम किसी भी रूप में गलत नहीं लग रहा होगा. किसी भी घटना को दीर्घकालिक रूप में देखने की मानसिकता से बचना चाहिए. पुलिस का यह कदम जनभावना का सम्मान था या फिर किसी रसूखदार को बचाने वाला, यह तो आने वाले समय में स्पष्ट होगा. इस कदम से किसी और दूसरे राज्य सबक के तौर पर लेंगे या फिर संवैधानिक, कानूनी सुधार के रूप में, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता है. इस तरह से आरोपियों के मारे जाने के बाद ऐसे अपराधों में किसी तरह की कमी आएगी ही, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. कुल मिलाकर पुलिस के इस कदम ने जनाक्रोश को ठंडा करने का काम किया है. पीड़ित परिजनों के आँसू पोंछने का काम किया है. शेष तो बहुत कुछ ऐसा है समाज में जो गलत होने के बाद भी चल रहा है, जो सही होने के बाद भी समाज को स्वीकार नहीं है.

01 दिसंबर 2019

मन की, देह की जकड़न तोड़नी होगी


हैदराबाद में चिकित्सक महिला के साथ हुई वीभत्स वारदात के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस बहस के केन्द्र में जहाँ महिलाओं की सुरक्षा है, शासन-प्रशासन की कानून व्यवस्था है वहीं इसके साथ-साथ मजहब विशेष के पुरुषों द्वारा ऐसे जघन्य घटनाक्रम को अंजाम दिए जाने पर भी चर्चाएँ आम हैं. इस्लामिक आतंकवाद की तरह से लव जिहाद समाज में पर्याप्त रूप से चलन में आ चुका है, लगभग उसी तरह से अब देखने में आ रहा है कि सामूहिक बलात्कार और उसके बाद बर्बरता के साथ महिलाओं, बच्चियों की हत्या के पीछे इस्लामिक व्यक्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. इसे समझना होगा कि आखिर ये है क्या? क्यों इस तरह की बर्बर घटनाओं के पीछे मजहब विशेष के लोगों के नाम ही दिखाई देते हैं? आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में सदैव कहा जाता रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. यह सत्य है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होना चाहिए. कुछ लोगों के कारण सम्पूर्ण मजहब को कलंकित नहीं किया जाना चाहिए. इसके बाद भी एक बात सामने निकल कर आती है कि सभी इस्लामिक व्यक्ति आतंकवादी नहीं हैं मगर पकड़े-मारे जाने वाले सभी आतंकी इस्लामिक निकलते हैं. ये क्या है? इसे क्या कहा जाये? कुछ इसी तरह से अब बलात्कार सम्बन्धी मामलों में हो रहा है. इसमें भी बहुतायत में इस्लाम से जुड़े लोग ही अपराधी के रूप में सामने आ रहे हैं. 


बहरहाल, वर्तमान में चर्चा का विषय मजहबी आधार पर ऐसे अपराध को परिभाषित करने से ज्यादा इस पर होना चाहिए कि ऐसे अपराधों को कैसे रोका जाये. जब भी समाज में बलात्कार की चर्चा होती है तो उसके साथ ही महिलाओं के पहनावे की चर्चा की जाने लगती है. उनके समय-असमय बाहर निकलने को लेकर चर्चा की जाने लगती है. उनकी स्वतंत्रता, उनके क्रिया-कलाप पर बहस छिड़ जाती है. ऐसे में चर्चा बलात्कार के कारणों, उसके निवारणों से अलग हट कर पक्ष-विपक्ष में बंट जाती है. एक पक्ष महिलाओं के पहनावे, उसके क्रियाकलापों पर बहस करता है तो दूसरा पक्ष उम्र का सन्दर्भ देते हुए बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करने लगता है. यह सही है कि विगत कुछ समय से बलात्कार के, सामूहिक बलात्कार के मामलों में उम्र का सन्दर्भ रह ही नहीं गया है. चंद महीनों की बच्चियाँ भी दुराचार का शिकार हुईं हैं तो वयोवृद्ध महिलायें भी ऐसे व्यक्तियों का शिकार बनी हैं.

यदि समाज वाकई बलात्कार के कारण-निवारण पर चर्चा करने के मूड में हो तो उसे पहनावे, क्रिया-कलाप आदि से बाहर निकल कर उन घटनाओं की तरफ जाना होगा जो किसी भी व्यक्ति के भीतर यौनेच्छा को बढ़ावा देती हैं. क्या कभी इस बात पर गौर किया गया है कि आज किसी उत्पाद की बात हो, किसी गाने की चर्चा हो, किसी म्यूजिक एल्बम का चित्रण हो, किसी कहानी का आना हो, किसी सीरियल का दृश्य हो, किसी फिल्म का सीन हो, कोई विज्ञापन हो सभी में महिलाओं की ऐसी छवि का चित्रण किया जा रहा है जो अश्लील के समकक्ष है. ऐसा महसूस होता है जैसे किसी व्यक्ति के किसी विपरीतलिंगी के साथ यौन सम्बन्ध नहीं हैं तो उसका जीवन अधूरा है. इन दृश्यों को देखकर ऐसा लगता है जैसे जीवन का एकमात्र ध्येय महिला की नग्न देह और उसके साथ यौन खिलवाड़ करना रह गया है. ऐसे में विचार कीजिये कि यौनेच्छा के जागने के बाद उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसके पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने का कोई साधन नहीं? क्या कभी इस पर विचार किया गया है कि विगत कुछ समय से सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़े हैं, बच्चियों के साथ दुराचार के मामले बढ़े हैं, बलात्कार के बाद हत्या के केस बढ़े हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ? सेक्स सम्बन्धी चित्रण के कारण अपने दिमाग में यौनेच्छा को जन्म देने के बाद व्यक्ति किसी सहज शिकार की तलाश में निकलता है. ऐसे में वे या तो एक समूह के रूप में अपनी वासना को शांत करने का काम करते हैं अथवा वह किसी कमजोर महिला, बच्ची को अपना शिकार बनाता है.

सामान्य रूप से देखने में आता है कि ऐसी किसी भी घटना के बाद उत्तेजना, आक्रोश, गुस्सा अपने चरम पर होता है. सरकार की तरफ से, शासन-प्रशासन की तरफ से अपनी खानापूरी कर ली जाती है और फिर जनाक्रोश शांत हो जाता है. सोशल मीडिया के कारण लोगों को अपनी अभिव्यक्ति का सहज मौका मिल जाता है. बस ऐसे में तमाम सुझाव, तमाम तरीके, तमाम कदम पेश किये जाने लगते हैं. बेटियों को सशक्त बनाये जाने, उनको आत्मरक्षा के गुण सुखाये जाने के, बेटों को संस्कारी बनाये जाने के बड़े-बड़े भाषण दिए जाने लगते हैं. ऐसे विचारों के आने के पीछे सामाजिक ढांचे को एकदम से विस्मृत कर दिया जाता है. जिस समाज में, परिवार में बेटियों को जरा-जरा सी बात पर लगभग भयभीत सा करके रखा गया होता है वहां अपेक्षा की जाती है कि वे चाकू चलायें, अपराधियों के शरीर पर घातक वार करें. जिस समय में लड़कियों में अपनी देह के प्रति एक असुरक्षा भाव होने के साथ-साथ उसका सौन्दर्य-बोध भी छिपा होता है वहां माना जाता है कि वे कोई कठोर निर्णय लेने में सक्षम हैं. जहाँ लड़कियों में जीरो फिगर के प्रति, अपनी त्वचा, देह के सौन्दर्य के प्रति आसक्ति भाव है वहां उनसे दैहिक कठोरता की अपेक्षा की जा रही है. जहाँ लड़कियाँ घर में छिपकलियों, कोक्रोचों, चूहों, अँधेरों से घनघोर तरीके से घबराती हैं वहां विचार किया जा रहा है कि वे दुर्दांत अपराधियों के छक्के छुड़ा देंगी.

असल में ये सब महज काल्पनिकता से भरी बातें हैं. जिस समाज में बेटियों के साथ घर की महिलायें ही उनकी देह से सम्बंधित बातें करने में हिचकती हैं वहां उन बच्चियों को सही-गलत कौन समझाएगा? जहाँ माना जाता है कि बेटियां दैहिक रूप से कोमल, कमजोर हैं वहां उनको दौड़ने, भागने, कूदने, चिल्लाने, वार करने, लड़ने आदि की शिक्षा कौन देगा? समाज से पहले हम सभी को अपने-अपने परिवार में ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहाँ बेटे-बेटियों में सिर्फ खान-पान, शिक्षा, पहनावे को लेकर ही विभेद समाप्त न किया जाये बल्कि उनके कार्यों, उनकी जमीनी भागदौड़, उनकी शारीरिक कसावट को लेकर भी विभेद समाप्त किया जाये. बेटों को संस्कारी बनाया जाये या न बनाया जाये मगर अपनी बेटी को इतना सशक्त अवश्य बनाया जाये कि वह लात, घूंसे, हाथों का भरपूर वार सामने वाले अपराधी पर कर सकने में सक्षम हो. बेटियों को सिलाई, संगीत, पाककला की जानकारी हो या न हो मगर उनको आत्मरक्षा के गुण आने चाहिए, उनमें आत्मविश्वास की सशक्तता हो, आत्मबल की तीव्रता हो. यह ध्यान रखना होगा कि समाज में सभी व्यक्ति न ही भले हैं और न ही सभी व्यक्ति बुरे हैं. हर भला व्यक्ति सड़क चलते सबका भला नहीं कर रहा है, उसी तरह अपराधी व्यक्ति सड़क चलते हर व्यक्ति के साथ अपराध नहीं कर रहा है. यहाँ भी अपनी तरह की मनोवैज्ञानिकता है, एक तरह की कुंठा है. इसके सन्दर्भ में समझना होगा कि ऐसे आपराधिक व्यक्तियों की कुंठा का, उसके मौके का शिकार हमारी-आपकी बेटी न बने.


29 नवंबर 2019

बेटियों को सशक्त बनाएँ

बेटियों के साथ होने वाली किसी भी घटना के बाद एक आम पोस्ट आती है कि बेटियों के बजाय बेटों को शिक्षा दें कि वे स्त्री को एक इन्सान समझें.

हम बराबर और बार-बार कहते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष का, लड़के-लड़की का, बेटे-बेटी का भेद करने से कभी कोई सुधार नहीं आने वाला. बेटों को किसी तरह की शिक्षा दें या न दें मगर सभी माता-पिता अपनी बेटियों को ये शिक्षा अवश्य दें कि

=>> वे जीरो फिगर की फालतू अवधारणा से बाहर निकलें.

=>> वे खुद को सभी काम करने में सक्षम समझें न कि अपने भाई, पिता आदि के भरोसे रहें.

=>> शारीरिक सौष्ठव किसी भी रूप में अपमानजनक नहीं है. खुद की देह को क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, परफ्यूम आदि की जकड़न से बाहर निकाल कसरती बनायें.

=>> घर की चाहरदीवारी में घुसे रहने की प्रवृत्ति त्याग कर खुद को मैदानी इन्सान बनाने के लिए आगे आयें. दौड़ने, भागने, कूदने आदि क्रियाओं में दक्षता हासिल करें.

=>> दिन भर मोबाइल के ऊटपटांग एप्प पर अपनी ऊर्जा को खर्च करने के बजाय अपनी ताकत को, दिमागी ऊर्जा को किसी न किसी आत्मरक्षा वाले गुण के विकास में खर्च करें.

=>> अपने घर की अन्य बुढ़िया टाइप औरतों के साथ बैठकर सास-बहू जैसे सीरियल्स में अपने दिमाग को खपाने के बजाय समाज में आसपास छिपे कुत्सित विचारों वाले जानवरों को समझने की क्षमता का विकास करें.

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ध्यान रखें, बेटों को शिक्षा देने के विचार के बहाने आप अपनी बेटियों को घरों में कैद रखने की मानसिकता का त्याग करें. जानवर किसी के बेटे नहीं होते मगर इन्हीं जानवरों का शिकार होने वाली लड़कियाँ, स्त्रियाँ आपकी नहीं तो किसी न किसी की बेटी अवश्य ही होती है.

01 अगस्त 2018

निर्लज्ज हँसी में छिपते अपराध


जब तक सत्ता के गलियारों से आपराधिक लोगों को संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक ये निर्लज्जता बनी रहेगी. संरक्षणगृहों से इस तरह के कुकृत्यों का निकलना कोई पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले भी कई काण्ड इस तरह से सामने आते रहे हैं. हरेक घटना में किसी न किसी रसूखदार का, किसी न किसी सत्ताधारी का संरक्षण दिखता रहा है. हर बार सत्ता की तरफ से कठोर से कठोर कार्यवाही किये जाने की बात कही जाती है, कुश दोषियों की गिरफ़्तारी भी हो जाती है, जाँच करवाए जाने की लीपापोती कर दी जाती है और उसके बाद सबकुछ भूल-भुला लिया जाता है. इस तरह के कृत्य कुछ दिन चर्चा में रहते हैं फिर जनमानस की खोपड़ी से ग़ायब हो जाते हैं. निठारी कांड कितनों को याद है? कितनों को उसके दोषी की सज़ा याद है? कुछ दिन बाद ऐसा ही कुछ यहाँ होगा.


यही कारण है कि गिरफ्तार होने के बाद भी मुजफ्फरपुर का दोषी खुलकर हँस रहा है. समझ नहीं आता कि वह किस पर हँस रहा है? इस व्यवस्था पर हँस रहा है, इस कानून पर हँस रहा है, सत्ता में बैठे लोगों पर हँस रहा है, जनता पर हँस रहा है, उसके खिलाफ कार्यवाही करवाने वालों पर हँस रहा है. वह किसी पर भी हँस रहा हो मगर देखा जाये तो एक वह अकेला ही नहीं हँस रहा है. समाज में जहाँ-जहाँ भी व्यवस्था की खिल्ली उड़ाई गई है वहां-वहां संलिप्त सभी लोग हँस ही रहे हैं. ऐसे लोग व्यवस्था पर हँसते हैं, कानून पर हँसते हैं, अदालत पर हँसते हैं, न्याय पर हँसते हैं, सामाजिक रूप से सक्रिय रहने वालों पर हँसते हैं, शोषितों पर हँसते हैं, न्याय मांगने वालों पर हँसते हैं, सरकार पर हँसते हैं, विपक्ष पर हँसते हैं. इनके हँसने में सिर्फ हँसी नहीं है वरन व्यंग्य है, मखौल है. ये जानते हैं कि कानून इनका कुछ न बिगाड़ सकेगा, सिस्टम इनके साथ कोई कठोर कार्यवाही नहीं कर सकेगा. इनको भली-भांति मालूम है कि कहाँ से कैसे बचना है. ये जानते हैं कि किसके द्वारा सजा से बचा जाना है. इनके हँसने के पीछे एक पूरा का पूरा अतीत है जो इनके साथ ठहाके लगाता है. इनके साथ वे रोता, सिसियाता अतीत है जो व्यवस्था की मार सहता हुआ जिन्दा है मगर लाश जैसा है.

व्यवस्था को, सत्ता को, विपक्ष को, मीडिया को, न्याय को, कानून को किसी भी कीमत पर खरीदने का दम रखने का अहंकार पाले ये लोग ही समाज में विद्रूपता फैलाये रहते हैं. कभी संरक्षण के नाम पर व्याभिचार, कभी शिक्षा के नाम पर व्याभिचार, कभी व्यापार के नाम पर यौन-अपराध, कभी राजनीति के नाम पर जिस्मफरोशी, कभी रोजगार के नाम पर कुकर्म. सभी पर पड़े परदे उठते भी हैं मगर सामने आते चेहरों पर खौफ नहीं दिखता है. खाकी वर्दी के साथ अदालत की तरफ जाते, न्याय के कटघरे की तरफ जाते इन दोषियों की चाल में अहंकार टपकता है. लगता नहीं कि किसी दोषी को पुलिस पकड़ कर ले जा रही है वरन ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी विशिष्ट के स्वागत की तैयारी हो रही हो. निर्लज्ज रूप से ऐसे लोग हनते हुए सम्पूर्ण समाज का, शोषितों का मजाक उड़ाते हैं. इस हँसी के पीछे से निकलता उनका विश्वास सिद्ध करता है कि ये लोग महज मोहरे हैं, असल खिलाड़ी कोई और है जो इसके बाद किसी और निर्लज्ज मोहरे को सामने लाकर खेल खेलेगा. वक्त की मार के चलते कभी वह मोहरा भी पिटा तो वह भी इसी तरह की निर्लज्ज हँसी के द्वारा सबका मखौल उड़ाएगा, सबका मजाक बनाएगा.

02 जुलाई 2018

समय से पहले बच्चों का वयस्क होना


आज खबर पढ़ने को मिली कि कानपुर में चार नाबालिगों ने चार साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक दुराचार किया. इन चारों नाबालिगों में से एक की उम्र बारह वर्ष बताई गई है जबकि अन्य तीन की उम्र छह वर्ष से दस वर्ष के बीच है. बच्ची के पिता द्वारा की गई रिपोर्ट के बाद उन चारों बच्चों को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने बताया कि एक पोर्न फिल्म देखने के बाद उन्होंने उसी का कृत्य उस बच्ची पर आजमाया. बच्चे सुधार गृह में भेज दिए गए हैं, ऐसी खबर है.


वैसे देखा जाये तो ये कोई पहली घटना नहीं है, इतने छोटी उम्र के बच्चों का सेक्स जैसे मामले में शामिल होना. इससे पहले भी सहमति वाली और रेप वाली कई घटनाएँ सामने आईं हैं. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर आये दिन इस तरह की फोटो, वीडियो सामने आते रहे हैं जिनमें छोटी कक्षाओं के बच्चे अपने गुप्तांग एक-दूसरे को दिखाते पकड़े गए हैं. ऐसी भी खबरें आपस में इधर से उधर होती रही हैं जिनमें लड़के-लड़कियाँ आपस में मम्मी-पापा का खेल खेलते पाए गए. इस खेल में उनके द्वारा सेक्स क्रियाएं भी संचालित करते हुए देखी गईं हैं. देखा जाये तो ये अकस्मात् नहीं होता है. इसके पीछे पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तंत्र काम करता है. संभव है कि संस्कृति के ठेकेदार इसे नकारने का काम करें मगर यदि गौर से देखा जाये तो सेक्स सम्बन्धी हरकतें बच्चों द्वारा बहुत छोटी वय से करते देखी जाती हैं. हमारे समाज में सेक्स का सन्दर्भ आज भी दो वयस्कों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. आज, इक्कीसवीं सदी के देश दशक से अधिक समय निकल जाने के बाद भी यौन शिक्षा का अर्थ दो विषमलिंगियों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से लगाया जाता है. इसी तरह की संकुचित मानसिकता के चलते ही सेक्स को लेकर बहुत गलत, भ्रामक धारणाएँ समाज में फैली हुई हैं. बच्चों की कम उम्र की गतिविधियों को यदि गौर किया जाये तो विषमलिंगी बच्चे आपस में एक-दूसरे के गुप्तांगों को लेकर अचंभित होते हैं. लड़के-लड़कियों के गुप्तांगों में बचपन से ही जबरदस्त अंतर दिखाई देता है और बच्चों के लिए यह कौतूहल की स्थिति होती है. उस कम उम्र में उनके लिए यह अंतर सेक्स का पर्याय नहीं होता वरन आश्चर्य का विषय होता है. उनके द्वारा इस अंतर का कारण पूछे जाने पर अभिभावकों द्वारा सही उत्तर न दिया जाना भी आगे चलकर हानिकारक होता है.

बच्चों की बढ़ती उम्र और घर में उनका अकेलापन उन्हें विषमलिंगियों के शरीर के प्रति आकर्षित करता है. उस अंतर का भेद जानने को प्रेरित करता है, जिसे वे बचपन में नहीं जान सके थे. ऐसी स्थिति में उनको मदद पोर्न फिल्मों, उनके अभिभावकों द्वारा या परिवार के बड़े युगलों द्वारा असावधानीपूर्ण बनाये जा रहे शारीरिक संबंधों द्वारा मिलती है. देह के अंतर को वे ऐसे में देख-समझ लेते हैं और किसी दिन इसे खुद आजमाने के प्रयास में रहते हैं. इसके अलावा हम लोग अपने परिवारों में तीन-चार साल के बच्चों को उनके क्लास में पढ़ने वाले लड़के/लड़कियों के नाम पर चिढ़ाते हैं. उनके बॉयफ्रेंड का, गर्ल फ्रेंड का नाम पूछते हैं. और तो और उनकी शादी तक की बात भी करके उन्हें चिढ़ाते हैं. माता-पिता अपने छोटे बच्चों के सामने रोमांटिक मूड में बने रहते हैं. अक्सर बेपरवाह होकर बेपर्दा भी हो जाते हैं. बच्चे मासूमियत में भले होते हैं मगर ऐसे कृत्य के बारे में जानना चाहते हैं. ऐसा उनके लिए इसलिए भी गलत नहीं होता क्योंकि उनके मम्मी-पापा ऐसा कर रहे होते हैं. ऐसे में बच्चों द्वारा इस तरह का कृत्य मनोरंजन के स्थान पर अपनी जिज्ञासा का शमन करने जैसा होता है.

इसके अलावा एक बात और, आज जिस पोर्न साइट्स का, इंटरनेट के दुरुपयोग का हम सब रोना रो रहे हैं, यदि याद हो तो मोदी सरकार ने आने के कुछ समय बाद पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लिया था. उस समय समाज के कथित आधुनिकतावादी इस निर्णय के विरोध में उतर आये थे. उनका कुतर्क था कि अब सरकार निर्णय करेगी कि लोग क्या देखें क्या नहीं. सोचिये, आप क्या देख रहे और आपके बच्चे क्या देख रहे. आज हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है तो हर हाथ में पोर्न है. बच्चों के माता-पिता जिस गोपन को पलंग के एक छोर पर संचालित करते हैं, बच्चे उसी गोपन का ज्ञान अपने हाथों में सहेजे मोबाइल के माध्यम से करने में लगे हैं. बस वे इसके प्रयोग के इंतजार में रहते हैं. जैसे ही वे इसे पाते हैं किसी न किसी रूप में उसका निदान कर लेते हैं. ऐसी एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ हैं जहाँ नाबालिगों ने नाबालिग लड़की से सम्बन्ध बनाये हैं, रेप किया है. ये और बात है कि कानपुर की ये घटना पकड़ में आ गई और समाज के लिए आश्चर्यजनक बन गई है. हाथ में पकड़े मोबाइल से लेकर बेडरूम में सजे टीवी तक किसी न किसी रूप में आज के बच्चे सिर्फ और सिर्फ सेक्स देख रहे हैं, अश्लीलता देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें समझाना कठिन है कि यह उनकी उम्र के लिए नहीं है. आइये, बस आधुनिकता का यह तमाशा देखिये क्योंकि हम सब भौतिकतावादी दौड़ में सबकुछ भुलाकर लगे हुए हैं.

01 जुलाई 2018

बलात्कारियों में डर-भय नहीं कानून का


दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली समेत देश के कई भागों में इन बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की माँग जोर पकड़ने लगी थी, ऐसा ही कुछ अब हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के निर्धारण से देश में बलात्कारियों में डर व्याप्त हो जायेगा अथवा बलात्कार होने बन्द हो जायेंगे। याद होगा शायद सभी को कि धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के आरोप में ही फाँसी दी गई थी। क्या हुआ उसके बाद? क्या बदला उसके बाद? विगत कुछ माह से लगातार होती आ रही या कहें कि रोज ही होती आ रही बलात्कार की घटनाएँ चिंतित करने वाली हैं, विचलित करने वाली हैं। चिंता इसकी कि अब ऐसा लग रहा है कि समाज में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं हैं और विचलित करने वाली घटनाएँ इसलिए क्योंकि बलात्कार की, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में अब बच्चियों को शिकार बनाया जाने लगा है। कभी लगता है कि जनता जाग रही है तो कभी लगता है कि वह एकदम भावशून्य पड़ी हुई है। प्रशासन-शासन की विफलता के बाद उसको चेताने के लिए, जगाने के लिए जनता का जागरूक होना आवश्यक है। इस जागरण में सिर्फ और सिर्फ फाँसी की माँग करना अकेले ही इस समस्या का समाधान नहीं।


बलात्कार के लिए फांसी की सजा की मांग करने के पूर्व हमें उन तमाम सारे कानूनों की ओर भी ध्यान देना होगा जिनके द्वारा किसी अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है। क्या उन तमाम अपराधों में कमी आई है अथवा वे अपराध होना बन्द हो गये है? पूर्वाग्रह दृष्टि न रखने वालों का एक ही जवाब इसके लिए होगा और वो भी न में। तमाम सारे वे अपराध आज भी तेजी से समाज में होते दिख रहे हैं, जिनके लिए सजा के रूप में फांसी की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि बलात्कार की सजा के रूप में फांसी को मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम महिलाओं के प्रति ही खड़े होने की आशंका है। यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

जनता जागरूक होकर सरकार को, प्रशासन को घेरने का काम करे। वह इसके लिए शासन-प्रशासन को विवश कर दे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर काम करे। यदि शासन-प्रशासन अपनी तरफ से चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था रखने के लिए तत्पर हो जाये तो परिणाम कुछ हद तक सुखद मिलने की सम्भावना है। यदि जागरूकता लोगों को सजग रहने के लिए दिखाई जाये तो महिलाओं को इस तरह से आये दिन दुराचारियों का शिकार न होना पड़े। यदि एकजुटता की स्थिति को अपराधियों में मन में खौफ पैदा करने के लिए दिखाई जाये तो पल प्रति पल ऐसी वीभत्स घटनाओं से हमें दो-चार नहीं होना पड़ेगा। दिल्ली कांड के बाद कानून बनाया गया मगर क्या हुआ उसका? इसी काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। और तो और विपक्षी दल, वे चाहे कोई भी हों सब किसी न किसी बहाने सरकार पर हमला बोलने की मंशा बनाये रहते हैं। उनके कदमों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें न महिलाओं से मतलब है, न बच्चियों से मतलब है, न ही अपराधियों से। वे सब महज अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग तलाशते रहते हैं। यदि वाकई कानून का, किसी तरह की सजा का कोई डर-भय होता तो दिल्ली कांड के बाद भी देश के कई भागों में गैंगरेप के और मामले सामने नहीं आये होते।



28 अप्रैल 2018

रेप पर राजनीति


समाज असंवेदनशील हो गया है या हम सब, ये समझ से बाहर है. अब तो हम बच्चियों के साथ होने वाली दुराचार की घटनाओं को भी धर्म, जाति विचारधारा के आधार पर आंकने लगे हैं. इधर विगत कुछ दिनों से बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ बहुतायत में सामने आईं. कुछ घटनाओं विशेष में समाज के वर्ग विशेष का विरोध, सक्रियता देखने को मिली शेष सभी मामलों में वह चुप्पी साधे रहा. ऐसा वर्ग अपने आपको बुद्धिजीवी घोषित करता है. विगत दिनों कठुआ रेप काण्ड चर्चा का विषय बना. इसमें एक बच्ची के साथ रेप की घटना को मंदिर में अंजाम दिए जाने के संकेत मिले. ऐसा संकेत आते ही कि बच्ची जिसकी रेप के बाद हत्या कर दी गई, मुस्लिम समुदाय से है, बलात्कार करने वाला आरोपी हिन्दू समुदाय से है, बलात्कार से पहले अपहरण और उस बच्ची को रखने का स्थान मंदिर है समाज का एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी तबका तख्तियां, मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर उतर आया. जस्टिस फॉर... की तख्तियां हवा में तैरने लगीं, सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की प्रोफाइल पिक्चर बदलने लगी, लोगों ने जस्टिस फॉर... का अभियान सा छेड़ दिया. बच्ची के साथ रेप और उसकी हत्या को लेकर न केवल मुस्लिम समुदाय वरन हिन्दुओं ने भी अपना पुरजोर विरोध दर्ज करवाया. मुस्लिम समुदाय के साथ जुलूस निकालने से लेकर मोमबत्तियां जलाने तक, सरकार-विरोधी नारे लगाने तक बराबर से साथ दिया.


इसी बीच एक और बच्ची ऐसे दुर्दांत अपराधियों का शिकार बन गई. इस बार शोषित बच्ची का धर्म अलग था. आरोपी का मजहब अलग था. जहाँ उसके साथ कई-कई बार बलात्कार हुआ वह जगह अलग थी इस कारण से विरोध के स्वर भी कमजोर रहे. अबकी शोषित बच्ची हिन्दू समुदाय से निकली. बलात्कारी आरोपी एक मौलवी निकला और वह जगह जहाँ उस बच्ची के साथ बार-बार, कई बार बलात्कार हुआ वह मदरसा निकला. अबकी बार वे सारे बुद्धिजीवी जो कठुआ कांड में दहाड़ें मार-मार के रो रहे थे, मोमबतियां जला-जलाकर अँधेरे को भगा रहे थे, सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल पिक्चर को काला करके विरोध दर्ज करवा रहे थे वे अचानक न जाने कहाँ अलोप हो गए. इस बच्ची के बलात्कार पर वे कथित बुद्धिजीवी तो सामने नहीं आये वरन मुस्लिम समुदाय के मानसिक रोगी और मीडिया के मानसिक भडुए अवश्य ही सामने नजर आने लगे. जहाँ पूरा हिन्दू समुदाय कठुआ कांड पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़ा हुआ था वहीं इस मदरसा काण्ड पर मुस्लिम समुदाय उस बच्ची को भाभी के संबोधन से पुकारने लगा. उस बच्ची और आरोपी मौलवी के विवाह की बात करना लगा. इन मुस्लिमों के द्वारा जस्टिस फॉर निकाह आरम्भ किया गया. मानसिक पतन की इतनी पराकाष्ठ शायद ही किसी दौर में देखने को मिली होगी. 


ऐसी घटनाओं के बाद इस मुस्लिम समुदाय की ऐसी हरकतें आँखें खोलने वाली हैं. एक रेप पीड़ित बच्ची के साथ खड़े होने के बजाय वे सब अपने मजहब के उस आरोपी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. देखा जाये तो न केवल खड़े दिखाई दे रहे हैं वरन पुरजोर ढंग से उस आरोपी के समर्थन में खड़े होकर ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं कि वह बच्ची स्वेच्छा से मदरसे में उस मौलवी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने गई थी. इस पूरे माहौल को कुछ मीडिया संगठन भी हवा देने में लगे हैं. ऐसे समय में वे सभी बुद्धिजीवी संज्ञा-शून्य पड़े हैं. उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा है. उनके द्वारा कोई मोमबत्ती नहीं जलाई जा रही है. किसी की प्रोफाइल पिक्चर काली नहीं हो रही है. हिन्दू विरोध का, भाजपा विरोध का या कहें कि मोदी विरोध का इससे घिनौना कदम कभी देखने को नहीं मिला है. ऐसे लोग जो जाति, धर्म देखकर बच्चियों के साथ खड़े होते हैं, वे कहीं न कहीं अपनी खुद की बच्चियों के लिए खतरनाक अवसरों को जन्म दे रहे हैं. यहाँ समझने की बात है कि अपराधी सिर्फ और सिर्फ अपराधी है. उसके लिए हवस का साधन कोई स्त्री है, भले ही वह कुछ माह की बच्ची हो या फिर कई साल की वृद्धा मगर हम सब तो अपने आपको बुद्धिजीवी, जागरूक कहते हैं. हमें तो सजग होने की, सतर्क होने की, निष्पक्ष होने की आवश्यकता है.

25 अप्रैल 2018

कानूनी उपाय के साथ समाजिक उपाय भी आवश्यक हैं रेप रोकने को


इन दिनों रेप की घटनाओं की बाढ़ सी आई हुई है। कोई दिन ऐसा नहीं निकल रहा है जबकि रेप की घटनाओं से सामना न होता हो। शर्मनाक है ऐसी स्थिति। इससे ज्यादा चिंताजनक स्थिति यह भी है कि अब ऐसा कृत्य करने वाले मासूम बच्चियों को भी यौन शोषण का शिकार बनाने लगे हैं। दो-दो, चार-चार महीनों की बच्चियों के साथ रेप किया जा रहा है, रेप के प्रयास किये जा रहे हैं। घृणित कृत्य के साथ जघन्यता की पराकाष्ठा दिखाई जाने लगी है। ऐसा लगने लगा है जैसे समाज से संवेदनशीलता, मानवीयता पूरी तरह समाप्त हो गई है। यौन-कुंठा का इतना वीभत्स रूप शायद की कभी देखने को मिला हो। दिनों-दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज में आ रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का दुष्परिणाम हैं। एक एजेंसी के आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन पचास से अधिक महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं, लगभग पाँच सौ महिलाएँ छेड़खानी का शिकार होती हैं। कार्यशील महिलाओं पर किये गए एक सर्वेक्षण के पश्चात् सामने आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पचास प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। लगभग पच्चीस प्रतिशत महिलाएँ स्पर्श जैसे उत्पीड़न की पीड़ा सहती हैं। एक अध्ययन के अनुसार अस्सी प्रतिशत बलात्कार के मामले दस वर्ष से लेकर तीस वर्ष की युवतियों के साथ होते हैं। इसमें भी चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दस वर्ष कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले भी चार प्रतिशत के आसपास पाये गये हैं। ये आँकड़े भले हों मगर दिखाते हैं कि यौन पिपासा में हमारा समाज कितना पतित हो चुका है।


इस पतन के लिए वर्तमान में सामाजिक जीवन-शैली बहुत अधिक जिम्मेवार है। सेल्युलाइड पर बिखरती रंगीनियों ने, टी०वी० कार्यक्रमों की नग्नता ने एक कुंठित वर्ग को जन्म दिया है। अश्लीलता घर-घर परोसी जा रही है। मोबाइल के कारण हर हाथ में पोर्न सहजता के साथ उपलब्ध है। पुरुषों के उपभोग की वस्तु हो, बच्चों की आवश्यकता सम्बन्धी हो या फिर महिलाओं की जरूरत, नारीदेह दर्शन बिना किसी भी तरह का विज्ञापन पूरा नहीं होता है। अधोवस्त्रों के विज्ञापन हों, सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन हों, गर्भनिरोधकों के विज्ञापन हों, पेयपदार्थों के विज्ञापन हों, बॉडी स्प्रे हो, वाहन का विज्ञापन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सबका प्रस्तुतीकरण अश्लीलता-नग्नता से भरपूर रहता है। विज्ञापनों के अलावा फिल्मों, धारावाहिकों, म्यूजिक एल्बम, लाइव शो यहाँ तक कि कॉमेडी शो तक में महिलाओं को अशालीन, अर्द्धनग्न रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। उनकी भावभंगिमा, गीतों के बोल, आपसी बातचीत, संवाद अदायगी कहीं न कहीं शारीरिकता का बखान करती दिखती है। जिससे आभास होता है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य सेक्स की प्राप्ति है। इससे कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति को नारीदेह के बिना, सेक्स के बगैर अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी यौनेच्छा को पूरा करने के लिए किसी न किसी माध्यम की तलाश करता है। अश्लील, नग्नता सम्बन्धी दृश्य सामग्री देखने के बाद ऐसे कामातुर जिनके पास कामेच्छा संतुष्टि का साधन है वे सहज भाव से अपनी संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं किन्तु जिनके पास ऐसी सुविधा नहीं है वे अपनी यौनेच्छा की संतुष्टि का साधन खोजने निकल पड़ते हैं। ऐसे समय में ही उसकी यौनेच्छा का शिकार असहाय, कमजोर महिला वर्ग होता है। बच्चियाँ ऐसे लोगों को सबसे आसान शिकार जान पड़ती हैं। महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों की कठिनाई अथवा बाधा उत्पन्न होने पर इसका विकृत रूप सामूहिक बलात्कार, मासूम बच्चियों के शोषण के रूप में सामने आ रहा है। आज आधुनिकता के नाम पर सेक्स को प्रमुखता से स्वीकार करके देह की नुमाइश, खुलेआम शारीरिक सम्बन्धों की ओर मुड़ने, विवाहपूर्व-विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध बनाने की संस्कृति जिस तेजी से फ़ैल रही है वह आधुनिक उच्छृंखल महिला-पुरुष को तो दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के रास्ते उपलब्ध करवा रही है किन्तु यौन-कुंठित वर्ग को यौन अपराधोन्मुख कर रही है।

फिल्मों, टी०वी० धारावाहिकों में प्रेम करना, दैहिक संबंधों की सहजता का दिखाया जाना एकमात्र कार्य बनता जा रहा है। कहानी भले ही किसी शैक्षिक संस्था से आरम्भ हो, भले ही किसी परिवार या अन्य जगह से शुरू हो पर जल्द ही वह प्यार करने, प्यार होने, शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने के आसपास घूमने लगती है। प्यार के नाम पर सेक्स को, नारी देह को दिमाग में इस तरह प्रत्यारोपित किया जा रहा है कि राजी, राजी नहीं तो गैर-राजीकी अवधारणा पर बस प्रेम करना है, शारीरिक सम्बन्ध बनाने हैं। प्रेम का किशोरवय अथवा युवाओं से सम्बंधित स्वरूप ही सामने नहीं रखा जा रहा है वरन विवाहेतर संबंधों को, जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकार करवाए जाने को भी स्थापित सा किया जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है कि आये दिन बच्चियाँ तेजाबी हमले का शिकार हो रही हैं, कहीं किसी बच्ची के साथ बलात्कार किया जा रहा है तो कहीं किसी विवाहित महिला को जबरन प्रेम सम्बन्ध स्वीकारने को मजबूर किया जा रहा है। अत्याधुनिक समाज के चाल-चलन के अनुसार गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड जैसी अवधारणा अनिवार्य सी समझी जाने लगी है। आधुनिक बनने के इन क़दमों ने इन बच्चों को ही संकट में डाला है। बच्चियाँ आपराधिक प्रवृतियों के चंगुल में फँस जा रही हैं; कुत्सित मानसिकता के लड़कों के बहकावे में आकर या तो गर्भवती हो जा रही हैं या फिर गैंग रेप का शिकार बन रही हैं; बहला-फुसला उनको देह-व्यापार के दलदल में भी धकेला जा रहा है; प्रेम के नाम पर असफलता हाथ लगने वाले सिरफिरों के हमलों का शिकार बन रही हैं।

ऐसे विषम समय में हमें स्वयं तय करना है कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या है, देह-दर्शना वस्त्र, यौनेच्छा को बढ़ाने वाली स्थितियां अथवा सुरक्षित समाज, सुरक्षित बच्चियां, सुरक्षित महिलायें? असल सुधार तो इस प्राथमिकता को निर्धारित करने के बाद ही होगा। सुरक्षा अपने हाथ में है क्योंकि विकृत मानसिकता, यौन-कुंठित व्यक्ति सिर्फ बच्ची के लिए नहीं, महिलाओं के लिए नहीं पूरे समाज के लिए घातक है। महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों को रोकने अथवा कम करने का उपाय कानूनी दृष्टि से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक है। केंद्र सरकार द्वारा बारह वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ रेप के मामले में फाँसी की सजा से ऐसी घटनाओं के रुकने की सम्भावना बहुत कम है। इसके उलट आशंका इसकी अवश्य है कि कहीं ये दरिन्दे अपनी हवस का शिकार बच्चियों की हत्या करना न शुरू कर दें। कानून अपना काम करता ही है मगर समाज का भी अपना दायित्व होता है। कुछ वर्ष पहले इसी केंद्र सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाया था तो सरकार विरोधी लोग इस प्रतिबन्ध के विरोध में सडकों पर उतर आये थे। उस समय इन लोगों का कुतर्क था कि सरकार कैसे और क्यों निर्धारित करेगी कि कोई क्या देखे। ये ठीक उसी तरह से है जैसे कि नारीवादियों द्वारा कुतर्क किया जाता है कि देह उनकी है, वे चाहे जैसे दिखाएँ। यहाँ सोचना होगा कि जो सक्षम है, जो कपड़ों के भीतर से झांकती देह को सुरक्षा घेरे में लिए घूम रहा है, जिसके आसपास दैहिक सम्बन्ध बनाये जाने के तमाम विकल्प उपलब्ध हैं वे कभी भी रेप का शिकार नहीं होती हैं पर उनकी अश्लील भाव-भंगिमाओं का खामियाजा बच्चियों को उठाना पड़ता है।

न केवल सरकार को वरन समाज को अब जागने की ही नहीं बल्कि सख्ती दिखाने की आवश्यकता है। किसी भी तरह से विज्ञापनों, धारावाहिकों, फिल्मों, कार्यक्रमों आदि में अनावश्यक रूप से नारीदेह की कामुक छवियों के चित्रण, प्रदर्शन आदि पर रोक लगाई जाए। किसी भी स्त्री को बाजार में उत्पाद की तरह से प्रस्तुत करने से बचना होगा। इसके साथ-साथ देश भर में सख्ती से पोर्न साइट्स पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाया जाए। अब ऐसा इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि मोबाइल के कारण बच्चों-बच्चों के हाथों में पोर्न साइट्स खेलने में लगी हैं। यही कारण है कि आज कम उम्र के बच्चों द्वारा भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ सामने आने लगी हैं। विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा के साथ-साथ यौन शिक्षा को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाये। बालक-बालिकाओं को संस्कारवान बनाये जाने की आधारभूमि उनके विद्यालय से ही आरम्भ की जाये। इसी तरह से बच्चियों को शारीरिक सुरक्षा सम्बन्धी प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से विद्यालयों में दिया जाना चाहिए। एक कदम सरकार को सख्ती से उठाये जाने की आवश्यकता है और वह है वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देना। ये कहने-सुनने में भले ही असहज लगे मगर आज जिस तरह से घर-घर में, गली-गली में यौन-कुंठित व्यक्ति जन्म ले रहे हैं उनकी यौनेच्छा दमन के लिए कोई न कोई जगह अवश्य होनी चाहिए। यदि आधुनिकता का तकाजा देह-दर्शन है, छोटे वस्त्र हैं, यौन-सम्बन्ध हैं तो उसी आधुनिकता को सही दिशा देने के लिए यौन-कुंठित व्यक्तियों की यौनेच्छा शमन की व्यवस्था बनाये जाने के लिए वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देनी होगी।

इसके साथ-साथ हम सबको ध्यान रखना होगा कि बलात्कार के मूल में यदि नारीदेह की कामुक छवि का प्रदर्शन है तो संस्कृति से विमुख होना भी एक अन्य कारण है। भारतीय संस्कृति के गौरवमयी आँचल की छाँव को त्यागकर मांसलता, अश्लीलता की चकाचौंध भरी धूप को स्वीकारने से रिश्तों की गर्माहट, भावनाओं की पवित्रता को सुखाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होने वाला नहीं और इसका खामियाजा हमारी बेटियों को उठाना पड़ रहा है। नारी देह दर्शन की वकालत करने वालों को समझना होगा कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू दत्तक पुत्र एवं अनुरक्षण अधिनियम, बाल विवाह प्रतिरोध अधिनियम, मातृत्व हितलाभ अधिनियम, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी एक्ट, दहेज निरोध अधिनियम, अनैतिक व्यापार अधिनियम, परिवार न्यायालय, महिलाओं के प्रति अभद्र प्रस्तुतीकरण अधिनियम जैसे अनेक अधिनियमों के अलावा लड़कियों का अल्पायु में विवाह प्रतिबन्धित करने, तलाक लेने, पिता, पति और पुत्र की संपत्ति पर अधिकार पाने का हक, समान अवसर, कार्यस्थल पर सुरक्षा, मातृत्व अवकाश का अधिकार आदि महिलाओं के देह-विमर्श का, अश्लील आधुनिक बनने का परिणाम नहीं हैं।

21 अप्रैल 2018

संवेदनशीलता के साथ हो कठुआ काण्ड की जाँच


अभी तक किसी भी घटना पर मीडिया ट्रायल देखते आ रहे थे, अब सोशल मीडिया भी इसी भूमिका में आ गया है. पिछले दिनों कठुआ कांड को जिस तरह से मजहबी रंग देकर उछाला गया उसे लेकर मीडिया की अपनी भूमिका रही. उसकी भूमिका से इतर सोशल मीडिया पर लोगों के अपने-अपने विचार सामने आने लगे. फोटो, वीडियो खुलकर पीड़ित बच्ची का नाम, पता बताने में लग गए. इन्हीं फोटो, वीडियो के बीच ऐसी भी पोस्ट सामने आईं जो उस कांड की सत्यता उजागर करने की ओर बढ़ती दिख रही थीं. लोगों की न्यायविद बनने, पत्रकार बनने, नेता बनने, जज बनने, जासूस बनने की भूमिकाओं के बीच हिन्दू धर्म को कटघरे में खड़ा कर दिया गया. मंदिरों को अपराध-स्थल और हिंदुत्व को बलात्कारी धर्म जैसा साबित किया जाने लगा. कार्टून बनाये जाने लगे, टी-शर्ट पहनकर विदेशों तक में ये बताया जाने लगा कि भारत में स्त्री सुरक्षित नहीं है. विदेश की बातें फिर कभी क्योंकि वहां बैठे लोग और देश में बैठे उनके एजेंट देश की छवि वैश्विक स्तर पर ख़राब करने को सदैव से आमादा रहे हैं. बहरहाल, देश में कठुआ कांड को लेकर इस तरह की मोर्चेबंदी की जाने लगी जैसे भाजपा और हिंदूवादी लोग बलात्कार करने में लगे हैं. हिन्दू धर्म पर इसी बहाने न केवल उंगली उठाई गई बल्कि पूरी तरह से बदनाम भी किया गया. बहुतेरे बुद्धिभोगी टाइप लोगों को अपने हिन्दू होने पर, अपने पुरुष होने पर शर्म आने लगी. इसके बाद भी उन्होंने न अपना हिन्दू धर्म त्यागा और न ही पुरुष से लिंग परिवर्तन किया.


आरोपों, प्रत्यारोपों के बीच बहुत से ऑडियो, बहुत से वीडियो, बहुत सी रपटों ने कठुआ कांड की असलियत को सामने लाने का काम भी किया. घटना से सम्बंधित तमाम सारी बातों के बीच मीडिया में खबर छपी कि दुष्कर्म के एक आरोपी उस दिन अपनी परीक्षा दे रहा था. इस बावत साक्ष्य भी प्रस्तुत किये गए. इसी के साथ हल ही में खबर आई कि पीड़ित बच्ची के साथ रेप नहीं हुआ था. ये भी बताया गया कि उसकी खोपड़ी भी सुरक्षित थी जबकि इससे पहले बताया जा रहा था कि बच्ची की हत्या सिर कुचल कर की गई थी. मंदिर के सम्बन्ध में भी अनेक तथ्य सामने आने से और मृतक बिटिया की स्थिति से ये समझाने की कोशिश की गई कि अपराध मंदिर में नहीं हुआ था. रेप हुआ या नहीं, घटना मंदिर में हुई या नहीं, हत्या सिर कुचल कर की गई या अन्य तरीके से इन बिन्दुओं पर चर्चा होने से बेहतर है कि अब पहली चर्चा इस बात पर हो कि एक बेटी की हत्या हुई है, एक बच्ची की मौत हुई है उसकी यदि हत्या हुई है तो आरोपी कौन है? और यदि उसकी मृत्यु किसी दुर्घटना से या फिर किसी असामान्य स्थिति में हुई है तो वह क्या है? मीडिया या सोशल मीडिया इन बिन्दुओं पर चर्चा नहीं हो रही है. अभी तक कठुआ कांड में रेप घटना के बारे में बोलने वाले पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को गलत बताने में लग गए हैं और इससे इतर लोग दूसरे तरह की बयानबाजी में लग गए हैं.


एक बच्ची की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ एक जाँच और आवश्यक है कि किसने और क्यों इस पूरे मामले को हिन्दू-विरोधी रंग देने की कोशिश की? कैसे एक योजनाबद्ध तरीके से देश भर में उस बच्ची का नाम, फोटो सार्वजनिक किया गया? किस तरह से सामाजिक अपराधिक घटना को राजनैतिक रंग देकर किसके द्वारा अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया गया? ऐसा नहीं है कि देश में रेप की या फिर बच्चियों के साथ रेप की यह पहली वारदात थी. इसके पहले भी ऐसी घिनौनी हरकतें होती रही हैं किन्तु इसी बार इस मामले को मजहबी रंग देने की कोशिश की गई है, इसकी भी जाँच की जानी चाहिए कि आखिर वे कौन लोग हैं जो संवेदनशील मामले को धार्मिक रंग देने में लगे थे? शर्मनाम यह रहा कि इस पूरे मामले में सोशल मीडिया के वे लोग भी पुरजोर ढंग से सरकार के, हिंदुत्व के खिलाफ दिखे जो अपने आपको बुद्धिजीवी बताते नहीं थकते हैं. इस मामले में एक शर्मनाक पहलू और भी सोशल मीडिया में निकल कर आया कि इस मामले के सापेक्ष समूचे माहौल को पुरुष-विरोधी साबित किया जाने लगा. बहुत सी महिलाओं द्वारा अपनी प्रोफाइल काली करके महिला-विहीन समाज होने की स्थिति बनाई गई. यहाँ उनकी खुद की समझ से परे था कि कैसे एक बच्ची की हत्या और यदि रेप हुआ है तो वह समाज में महिला-पुरुष विरोधी आन्दोलन की आधारभूमि कैसे बन सकता है. (इस विषय पर बाद में)

कुल मिलाकर जिन ताकतों ने एक बच्ची की मौत को धार्मिक उन्माद में बदलने की साजिश रची थी, वे सफल नहीं हो सके. हाँ, ऐसे लोग सोशल मीडिया पर अवश्य ही माहौल ख़राब करने में सफल रहे. किसी आपराधिक घटना को संवेदना-रहित बनाकर अपने-अपने तर्क-कुतर्क करते देखे गए. रेप की आड़ में पुरुष समाज को गाली देते देखे गए. मंदिर को निशाना बनाकर हिन्दू धर्म को कलंकित करते देखे गए. फ़िलहाल, सबके अपने-अपने तर्क-कुतर्क हैं मगर सत्य यह है कि एक बच्ची की मौत हुई है, सत्य यह भी है कि कतिपय स्वार्थी ताकतों ने धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश की है. ऐसे में जाँच एजेंसियों की, सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि वह पूरी गंभीरता के साथ इस मामले की जाँच करे और इसके दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये.

11 सितंबर 2017

बच्चों के लिए जिम्मेवारी समझना होगी

साक्षर, सुसंस्कृत पीढ़ी निर्माण का संकल्प है मगर उसी पीढ़ी को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं जिसको साक्षर, सुसंस्कृत बनाना है. आये दिन समाज में बच्चों-बच्चियों के साथ हो रही वारदातें सामने आ रही हैं. कुछ दिनों तक आक्रोशित दिखाई देने के बाद हम सभी अपने-अपने में सिमट जाते हैं. फिर हमें बस अपना ही परिवेश दिखाई देने लगता है. न वे बच्चे दिखाई देते हैं जो किसी की हैवानियत का शिकार हो चुके हैं और न ही वे बच्चे दिखाई देते हैं जो आने वाले समय में हैवानियत का शिकार हो सकते हैं. ये समझ से परे है कि आखिर समाज में इतनी क्रूरता कहाँ से आ रही है? समाज में इतनी स्वार्थपरता कहाँ से आ रही है? क्यों हम अपने आसपास से लगातार कटते जा रहे हैं? बच्चों के साथ हिंसा, साल-दो साल की बच्चियों के साथ शारीरिक दुराचार, बच्चों की क्रूरतम तरीके से हत्याएँ आदि के आँकड़े जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उससे लग रहा है जैसे कि हम सब किसी असंवेदनशील समाज में रह रहे हैं. समाजशास्त्रियों के रूप में काम कर रहे लोगों ने, मनोवैज्ञानिकों के रूप में काम कर रहे लोगों ने, लोगों के व्यक्तित्त्व विकास के लिए काम कर रहे लोगों ने कभी समाज में फ़ैल रही इस विसंगति का, इस बुराई का अध्ययन करने का प्रयास पूरे मन से नहीं किया है.


हरेक घटना के बाद उसी के आसपास के कारणों-समस्याओं को खोजा जाने लगता है और उसी का हल निकालने का प्रयास किया जाने लगता है. इसके उलट होना यह चाहिए कि ऐसी घटनाओं का हल मूलरूप में खोजा जाना चाहिए. कौन-कौन से कारक ऐसी वारदात के पीछे रहते हैं, उनका अध्ययन होना चाहिए. सामाजिक रूप से किसी एक संस्थान के लिए भले ही संभव न हो कि वह एक-एक बच्चे की मानसिकता का अध्ययन कर सके किन्तु विद्यालयीन स्तर पर किसी भी रूप में यह कार्य असंभव नहीं है. स्कूल के स्तर पर प्रत्येक बच्चे की मानसिकता का, उसके हावभाव का, उसके व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है. एक-एक बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से जांचा-परखा जा सकता है. समय-समय पर बच्चों के माता-पिता से संपर्क करके भी उनकी गतिविधियों की पड़ताल की जा सकती है. इससे भी उन बच्चों की हरकतों, घरवालों के प्रति उनका व्यवहार और घरवालों का बच्चों के प्रति व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है. आजकल स्कूल, घर, परिवार, माता-पिता, शिक्षक, पड़ोसी आदि सबने बस अपने कर्तव्यों का औपचारिक निर्वहन सा करना शुरू कर दिया है. कोई भी अपने दायित्व को, कर्तव्य को अधिकार के साथ, जिम्मेवारी के साथ करने से बचता दिख रहा है. यही कारण है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोग बच्चों के प्रति इसी अकेलेपन का लाभ उठा रहे हैं. किसी न किसी रूप में उनको लालच देकर ऐसे आपराधिक लोग बच्चों के दिल-दिमाग पर हावी होने में सफल सिद्ध हो जाते हैं.


घर, स्कूल में बच्चों के साथ माता-पिता, शिक्षकों को उनके साथ हिल-मिल कर रहना चाहिए. सिर्फ यह कह देना कि माता-पिता या शिक्षक बच्चों के मित्र जैसे हैं, उनके साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करें ही काफी नहीं है. बच्चों को इस रूप में मित्र के अलावा एक मार्गदर्शक भी चाहिए, एक सुरक्षा का घेरा भी चाहिए, एक वास्तविक अभिभावक चाहिए है. उसके साथ मित्रता का व्यवहार हो मगर उनको दिशा-निर्देश देने के रूप में न कि उनकी अनावश्यक माँगों, जिदों को पूरा करने के लिए. ऐसा करने से जहाँ बच्चों में हताशा, उद्दंडता, आक्रामकता का भाव पैदा होगा ही साथ ही अकेलापन भी बढ़ेगा. स्कूल जाते बच्चों के पास मित्रों की कमी नहीं होती. सच तो ये है कि उनके पास अभिभावकों की कमी होती है. उनको उचित राह दिखाने वालों की कमी होती है. मित्र बनकर अभिभावक, शिक्षक भले ही उन बच्चों की समस्याओं का पता लगा लें किन्तु बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हीं को सुरक्षा कवच बनना होगा. बच्चों का निर्देशक बनना होगा. बच्चों का आदर्श बनना होगा. यदि ऐसा करने में माता-पिता, शिक्षक सफल हो पाते हैं और तमाम मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री ये जानने में सफल हो जाते हैं कि बच्चों का व्यवहार उनकी किस मानसिकता का द्योतक है तब हम समाज के किसी भी आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को अपने बच्चों तक पहुँच पाने से रोकने में सफल हो जायेंगे. बच्चों को उनके दुराचार, उनकी क्रूरता से बचाने में भी सफल हो जायेंगे. 

06 अगस्त 2016

बलात्कार की जड़ समझने की जरूरत



महिलाओं के साथ-साथ मासूम बच्चियाँ भी यौन शोषण का शिकार होने लगी हैं. दिनों-दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज में आ रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का दुष्परिणाम हैं. यौन-कुंठा का इतना वीभत्स रूप शायद की कभी देखने को मिला हो. नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाएँ छेड़खानी का शिकार होती हैं. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 50 प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. लगभग 25 प्रतिशत महिलाएँ स्पर्श जैसे उत्पीड़न की पीड़ा सहती हैं. एक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिशत बलात्कार के मामले 10 से 30 वर्ष की युवतियों के साथ होते हैं. चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 10 वर्ष कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले भी 4 प्रतिशत पाये गये हैं, यह दिखाता है कि यौन पिपासा हमारे समाज को कितना पतित कर चुकी है.

पहनावे की आधुनिक बिडम्बना के बीच सेल्युलाइड पर्दे ने सब कुछ उघाड़कर रख दिया है. बिखरती रंगीनियों ने, टी०वी० की नग्नता ने एक कुंठित वर्ग को जन्म दिया है. आज अश्लीलता घर-घर परोसी जा रही है, मोबाइल से हर हाथ में अश्लीलता सुशोभित हुई है. पुरुषों के उपभोग की वस्तु हो, बच्चों की आवश्यकता सम्बन्धी हो या फिर महिलाओं की जरूरत, नारीदेह दर्शन बिना किसी भी तरह का विज्ञापन पूरा नहीं होता है. अधोवस्त्रों के विज्ञापन हों, सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन हों, गर्भनिरोधकों के विज्ञापन हों, पेयपदार्थों के विज्ञापन हों, बॉडी स्प्रे हो सबका प्रस्तुतीकरण अश्लीलता से भरपूर दिखता है. विज्ञापनों के अलावा फिल्मों, धारावाहिकों, म्यूजिक एल्बम, लाइव शो यहाँ तक कि कॉमेडी शो तक में महिलाओं को अशालीन, अर्द्धनग्न रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है. उनकी भावभंगिमा, गीतों के बोल, आपसी बातचीत, संवाद अदायगी कहीं न कहीं शारीरिकता का बखान करती दिखती है. जिससे आभास होता है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य सेक्स की प्राप्ति है. इससे कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति को नारीदेह के बिना, सेक्स के बगैर अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है. ऐसी स्थिति में वह अपनी यौनेच्छा को पूरा करने के लिए किसी न किसी माध्यम की तलाश करता है. उसकी इस यौनेच्छा का शिकार असहाय, कमजोर महिला वर्ग होता है. बच्चियाँ ऐसे लोगों को सबसे आसान शिकार जान पड़ती हैं. महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों की कठिनाई अथवा बाधा उत्पन्न होने पर इसका विकृत रूप सामूहिक बलात्कार, मासूम बच्चियों के शोषण के रूप में सामने आ रहा है. आज आधुनिकता के नाम पर सेक्स को प्रमुखता से स्वीकार करके देह की नुमाइश, खुलेआम शारीरिक सम्बन्धों की ओर मुड़ने, विवाहपूर्व-विवाहेतर शारीरिक सम्बन्ध बनाने की संस्कृति जिस तेजी से फ़ैल रही है वह आधुनिक उच्छृंखल महिला-पुरुष को तो दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के रास्ते उपलब्ध करवा रही है किन्तु यौन-कुंठित वर्ग को यौन अपराधोन्मुख कर रही है.

हमें स्वयं तय करना है कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या है, देह-दर्शना वस्त्र, यौनेच्छा को बढ़ाने वाली स्थितियां अथवा सुरक्षित समाज, सुरक्षित बच्चियां, सुरक्षित महिलायें? असल सुधार तो इस प्राथमिकता को निर्धारित करने के बाद ही होगा. सुरक्षा अपने हाथ में है क्योंकि विकृत मानसिकता, यौन-कुंठित व्यक्ति सिर्फ बच्ची के लिए नहीं, महिलाओं के लिए नहीं पूरे समाज के लिए घातक है. महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों को रोकने अथवा कम करने का उपाय कानूनी दृष्टि से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक है. इसके लिए नारीदेह की कामुक छवियों के चित्रण, प्रदर्शन आदि पर रोक लगे. देश भर में पोर्न साइट्स पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाया जाए. यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करने के साथ-साथ बच्चियों को शारीरिक सुरक्षा सम्बन्धी प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से विद्यालयों में दिया जाना चाहिए. वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देकर यौन-कुंठित व्यक्तियों की यौनेच्छा शमन की व्यवस्था होनी चाहिए.

बलात्कार के मूल में यदि नारीदेह की कामुक छवि का प्रदर्शन है तो संस्कृति से विमुख होना भी एक अन्य कारण हो सकता है. भारतीय संस्कृति के गौरवमयी आँचल की छाँव को त्यागकर मांसलता, अश्लीलता की चकाचौंध भरी धूप को स्वीकारने से रिश्तों की गर्माहट, भावनाओं की पवित्रता को सुखाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होने वाला नहीं और इसका खामियाजा हमारी बेटियों को उठाना पड़ रहा है. आखिर महिलाओं को भी समझना होगा कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिन्दू दत्तक पुत्र एवं अनुरक्षण अधिनियम, बाल विवाह प्रतिरोध अधिनियम, मातृत्व हितलाभ अधिनियम, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी एक्ट, दहेज निरोध अधिनियम, अनैतिक व्यापार अधिनियम, परिवार न्यायालय, महिलाओं के प्रति अभद्र प्रस्तुतीकरण अधिनियम जैसे अनेक अधिनियमों के अलावा लड़कियों का अल्पायु में विवाह प्रतिबन्धित करने, तलाक लेने, पिता, पति और पुत्र की संपत्ति पर अधिकार पाने का हक, समान अवसर, कार्यस्थल पर सुरक्षा, मातृत्व अवकाश का अधिकार आदि महिलाओं के देह-विमर्श का परिणाम नहीं हैं. 

21 अप्रैल 2016

बोल न ऐसे बोल

प्रदेश के संवैधानिक पद पर बैठे माननीय कहना क्या चाहते थे? लोगों को समझाना क्या चाहते थे? अपने ही कार्यकर्ताओं को क्या सन्देश देना चाहते थे? सपा का झंडा लगाकर लडकियाँ न छेड़ें. समझ से परे है ये बयान, जो कि एक मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया. उत्तर प्रदेश वर्तमान में चुनावी वर्ष में प्रवेश कर चुका है. ऐसे में तमाम सारे राजनैतिक दलों की कोशिश जनता के साथ अधिक से अधिक संपर्क साधने की रहती है. इसमें भी सत्ता पक्ष अपने आपको जनता का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध करने का प्रयास करता है. ऐसा ही कुछ सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी द्वारा प्रदेश में किया जा रहा है. विगत चार वर्षों के इस सरकार के विकास कार्यों को उसी के कार्यकर्ताओं और जाति-विशेष के लोगों की गुंडागर्दी ने कहीं हाशिये पर धकेल रखा है. विकास कार्यों पर गुंडागर्दी, माफियागीरी, जातिवाद हावी रहा. इस कोढ़ में खाज का काम इस दल के इन्हीं बड़े-बड़े नेताओं द्वारा भी किया जाता रहा है. मुख्यमंत्री से पहले पार्टी के मुखिया द्वारा बलात्कार को लेकर किया गया ‘नादानी’ वाला आपत्तिजनक बयान दिया गया था. अबकी खुद मुख्यमंत्री ने ही जैसे लड़कियों के छेड़ने सम्बन्धी गाइडलाइन सी जारी कर दी.

कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ देश ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे अभियान को संचालित करने में लगा है. देश का लगभग हर राज्य बेटियों के विकास के लिए काम कर रहा है. सरकारी, गैर-सरकारी संगठन बेटियों के विकास के लिए लगातार प्रत्यनशील हैं. इन सबके बीच मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील पद पर, जिम्मेदाराना, संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किस तरह गैर-जिम्मेवाराना बयान देता है. हो सकता है कि वे अपने दृष्टिकोण से इसे सही समझ रहे हों किन्तु इस बयान का सार देखा जाये तो बहुत कुछ कहता है. कहीं न कहीं एक सन्देश ये भी जाता है कि लड़कियों को छेड़ते समय छेड़ने वाले लोग सपा का झंडा न लगायें. इसका अर्थ ये भी निकाला जा सकता है कि यदि झंडा लगाकर ही छेड़ना है तो किसी और झंडे के साये में ऐसा किया जा सकता है. वर्तमान में मुख्यमंत्री जी अपने भ्रमण के द्वारा, अपने विकास कार्यों के बखान के द्वारा, राहत सामग्री के वितरण के द्वारा विगत चार वर्षों का ‘डैमेज कण्ट्रोल’ करना चाहते हैं. इस चक्कर में वे स्वयं में कुछ अटपटा बोल गए.

सपा के विगत चार वर्षों का लेखा-जोखा देखा जाये तो ये शासन उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर नहीं कहा जा सकता है. सरेआम महिलाओं के, लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ, उनके साथ बलात्कार की वारदातें, गैंग रेप के साथ-साथ उनकी हत्या के जघन्य कांडों ने सपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. इसमें भी उसके लिए मुश्किल इसकी रही कि अधिसंख्यक मामलों में सपा के कार्यकर्त्ता आरोपी की भूमिका में नजर आये. बलात्कार के मामले में स्वयं सपा मुखिया भी नादानी सम्बन्धी बयान देकर विवादों के घेरे में रहे थे. ऐसे में महिला-विरोधी छवि को दूर करने की कवायद में मुख्यमंत्री ने शहर-शहर, नगर-नगर मुख्य मार्गों पर, स्थानीय मार्गों पर महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाये जाने का आश्वासन दिया, व्हाट्सएप्प पर छेड़खानी की खबर देने पर कार्यवाही करने का भरोसा दिखाया मगर एक जरा से बयान ने सबकुछ साफ़ कर दिया. दरअसल, वे अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के विरोध में मुखरता से बोलने की हिम्मत इस चुनावी वर्ष में नहीं जुटा पाए. वर्तमान सरकार के लिए महिला सुरक्षा जितना बड़ा मुद्दा है, उससे कहीं बड़ा मुद्दा अपने कार्यकर्ताओं के भरोसे को बनाये रखना भी है. देखा जाये तो मुख्यमंत्री ने एक बयान के द्वारा अपने ही कार्यकर्ताओं को ताकत प्रदान की है. यही ताकत उनके लिए चुनावी समर में सीटें लाने का काम करती है. अब महिलाओं को सोचना होगा कि उनके प्रति ऐसी सोच रखने वाले किसी भी दल, किसी भी व्यक्ति के साथ उन्हें कैसा व्यवहार करना है.