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10 फ़रवरी 2022

हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगीतो इसमें आश्चर्य न होगा. यह सच है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व की शारीरिक अवस्था का, कहीं भी हुई दुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती. कुछ लोग संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगेमीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगाक्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहींकिसी सड़क दुर्घटना के वीभत्स दृश्यचिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है. इसके अलावा किसी सेलिब्रिटी की मृत्यु पर उसकी शारीरिक अवस्था की दुर्बलता, उसकी बीमारी से उपजी मनोदशा आदि का प्रसारण, किसी ख्यातिलब्ध व्यक्ति की मृत्यु की भ्रामक, गलत खबर का लगातार प्रसारित किया जाना भी संवेदनहीनता की, मृत्यु का आनंद लेने जैसी ही अवस्था है. 


ऐसा सोशल मीडिया के नशे की तरह से इस्तेमाल करने, सबसे पहले हमारे द्वारा की मानसिकता, पल दो पल में अनेक वीभत्स चित्रों, वीडियो के आते रहने के कारण होने लगा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया पर ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गयाखेल का सामान हमारे लिए बन गया लगातार चरितार्थ होती दिख रही है. कहीं सुखद घटना हो या फिर दुखदहास्य का विषय हो या फिर विषाद काकिसी कार्यक्रम का आयोजन है या फिर कोई दुर्घटना की भयावहतासबकुछ आनन-फानन सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइलहर हाथ में इंटरनेटहर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन हैसमाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज परसमाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों सेप्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हमारे द्वारा की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है. तकनीक का वर्तमान दौर भयावह सा लगने लगा है. यहाँ हर कोई अपने आपको तकनीक का पुरोधा समझ कर उसका दुरुपयोग करने में लगा है. इस दुरुपयोग से मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ हैसंवेदनाओं को नष्ट किया है.


यदि संजीदगी से विचार किया जाये तो हम लगभग रोज ही सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से हिंसाबलात्कारहत्यादुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स तस्वीरों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शवफंदे पर लटकता किसी का शवदुर्घटना में क्षत-विक्षत देहशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की नग्न देह सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर भेज दिए जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर काकिसी देह काकिसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता हैकिसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता है किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


तकनीक से जुड़े रहने के क्रम मेंसबसे पहले सूचना देने के लोभ मेंबहुतायत लोगों तक सूचना-सम्प्रेषण के चलते वर्तमान में ऐसे-ऐसे चित्रों कावीडियो का प्रसारण किया जा रहा है जो किसी भी रूप में नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे आज के दौर में जबकि रिश्तों कासंबंधों कासंस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना होता है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. किसी समय में पत्रकारिता में ऐसे चित्रों का प्रकाशनप्रसारण निषिद्ध माना जाता थाऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करने जैसा समझा जाता थाशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की पहचान को किसी भी रूप में उजागर करना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित माना गया थाक्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस समझा जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे अपराध उजागर करने के लिए अनिवार्य माना जाने लगा हैजागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है.


तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार सरकारों की तरफ से सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें वो सफल नहीं हुई. आश्चर्य तो इसका हुआ कि पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध अति-जागरूक जनता ने करके सरकार को अपने कदम वापस लेने को विवश कर दिया. ऐसे में स्वयं नागरिकों कोसोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या-क्या पोस्ट किया जायेक्या-क्या प्रतिबंधित रखा जाये. जिस तरह से क्षत-विक्षत शवों कीदर्दनाक हादसों कीदेह की नग्नता कीहत्याओं-आत्महत्याओं की तस्वीरेंवीडियो सोशल मीडिया के विविध माध्यमों के द्वारा एक पल में हजारों-हजार लोगों तक प्रेषित कर दिए जाते हैं वो चिंतनीय है. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के नाम पर ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरेंवीडियो अपने आरंभिक दौर में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैंसंवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देती हैं. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों के लिए अभ्यस्त हो जाना संवेदनाओं को समाप्त करता है. घटना के प्रतिदुर्घटना के प्रतिमरने वाले के प्रतिशोषित के प्रतिमृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्याबलात्कारआत्महत्याहिंसादुर्घटना आदि की खबरेंदृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैंसूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्याबलात्कारदुर्घटनामृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैंकब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्तिइससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता कावीभत्सता काविकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.


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(उक्त आलेख को जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र सच बेधड़क, दिनांक 10-02-2022, के अंक में प्रकाशित किया गया है.)

05 फ़रवरी 2022

एक बीमारी ने बचाया तो दूसरी ने घेरा बच्चों को

असमंजस का दौर अभी भी समाप्त नहीं हुआ है. भयग्रस्त वातावरण अभी भी बना हुआ है. विविध प्रकार के नुकसान रोज ही सामने आ रहे हैं. विगत दो वर्षों से कोरोना वायरस से लड़ते हुए देश ने बहुत सारे मोर्चों पर सफलता भी पाई है तो बहुत सारे क्षेत्रों में नुकसान भी उठाना पड़ा है. विविध क्षेत्रों के नुकसान का आकलन लगाकर उसकी भरपाई के तरीके भी खोजे जाने लगे हैं. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपनी-अपनी तरह से संसाधनों को एकत्र करके, उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवन प्रदान करके नुकसान को बहुत हद तक पाटने की कोशिश जारी है. इसी में एक क्षेत्र ऐसा है जिसके नुकसान की तरफ बहुत अधिक न तो ध्यान जा रहा है और न ही उसकी भरपाई के लिए विचार किया जा रहा है.


ऐसा एक क्षेत्र शिक्षा जगत है, जहाँ विगत दो वर्षों से व्यापक असमंजस बना हुआ है. जैसे ही लगता है कि स्थिति कुछ सामान्य होने जा रही है वैसे ही कोरोना का कोई नया वेरिएंट आकर सबको भयग्रस्त कर देता है. ऐसे में सबसे ज्यादा डर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ही उत्पन्न होता है. इस भय के चलते ही जहाँ एक तरफ अभिभावक बच्चों को शैक्षिक संस्थानों में भेजने से बचने लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी एक तरह का अभिभावकत्व भाव अपनाते हुए शैक्षिक संस्थानों को सबसे पहले बंद करवा देती है.


यह सच है कि बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी शारीरिकता को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा सकती है. सरकार का आरम्भ से ही प्रयास रहा है कि बच्चों को इस बीमारी के प्रकोप से बचाए रखा जाये. वैक्सीन की अनुपलब्धता होने की स्थिति में तमाम सारे सुरक्षात्मक उपाय समय-समय पर सरकार की तरफ से, समाज की तरफ से बताये जाते रहे, अपनाये जाते रहे. शैक्षिक संस्थानों का बंद किया जाना भले ही बच्चों को इस बीमारी से बचाए रखने का एक कारगर उपाय बनकर सामने आया हो मगर इसके भी अपनी तरह के नुकसान बच्चों को उठाने पड़े हैं. ऐसे नुकसान ये बच्चे आज भी उठा रहे हैं.


संस्थानों को बंद करवा कर, बच्चों को विद्यालयों में न भेजकर उनकी स्वास्थ्य समस्या के प्रति एक तरह की जागरूकता दिखाई गई, उनको स्वास्थ्य मामलों में भले ही सुरक्षित कर लिया हो मगर इसी के दूसरे पहलू में बच्चों को असुरक्षित भी कर दिया गया है. इस सन्दर्भ में यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो ऑनलाइन कक्षाओं ने बच्चों को कई तरह से नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है. कई-कई घंटे मोबाइल, कम्प्यूटर की स्क्रीन में आँखें लगाये बैठे बच्चों को आँखों की समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. किसी समय मोबाइल और कम्प्यूटर की रौशनी को बच्चों की आँखों, उनके रेटिना के लिए घातक बताया जाता था. अब कोरोना के चलते हुई बंदी ने इसी खतरे के साथ बच्चों को बड़ा होने को विवश किया.


यहाँ एक बिंदु आँखों की समस्या का होना ही नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ एक और शारीरिक समस्या उभरी गर्दन में दर्द की, रीढ़ की हड्डी में विकार की. सामान्य रूप में किसी भी विद्यालय द्वारा कम से कम पाँच घंटे तक ऑनलाइन कक्षाओं का सञ्चालन किया गया. इतनी लम्बी अवधि तक एक अवस्था में बैठ कर, गर्दन को झुकाकर मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन में काम करने से बहुतायत बच्चों में रीढ़ की हड्डी की, गर्दन की समस्या उभरी है. इन शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ बहुत से बच्चों में आपसी समन्वय, सहयोग, सामंजस्य आदि जैसी स्थितियों में भी ह्रास देखने को मिला है. इस अवधि में बहुत से बच्चे मानसिक रूप से कमजोर भी हुए हैं. ये और बात है कि उनके द्वारा अपनी पाठ्य-सामग्री को, अपने पाठ्यक्रम को बखूबी पूरा किया गया, अपने शैक्षणिक अंकों के मामले में भी उनमें बहुत ज्यादा नकारात्मकता देखने को नहीं मिली है मगर जिस उद्देश्य के साथ बच्चों को किसी संस्थान में जाना होता है, उस उद्देश्य की पूर्ति न होने के कारण बच्चों के मानसिक विकास में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.


लॉकडाउन जैसी स्थिति के कारण से बच्चों का बाहर निकलना भी बंद रहा, पार्क, मैदान में खेलना-कूदना भी बंद रहा. अपने मित्रों, विद्यालय के सहयोगियों के साथ मिलना-जुलना न होने के कारण भी उनमें अकेलेपन जैसी मानसिकता ने जन्म लिया है. समूह के साथ मिलकर काम करने की भावना में भी कमी आई है. न केवल खेलने के सन्दर्भ में बल्कि सामूहिक रूप से अध्ययन करने, परीक्षाओं की तैयारी करने के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है. इस तरह की कमी होने से बच्चों के मानसिक विकास का एक पक्ष कहीं न कहीं कमजोर हुआ ही है. बहुत से नौनिहाल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी आरंभिक अवस्था में विद्यालय के दर्शन ही नहीं किये हैं. उम्र की दृष्टि से उनको आगे की कक्षाओं में भले ही प्रवेश दे दिया जाये, उनके ज्ञान को, शब्द-भंडार को भले ही घर-परिवार के द्वारा समृद्ध कर दिया गया हो मगर विद्यालय की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा से वे निश्चित ही हमेशा के लिए वंचित रह गए हैं. निश्चय ही इससे उनके कोमल मन पर जिस भावना का प्रस्फुटन होना था, वह नहीं हो सका है.


शैक्षिक संस्थानों को आये दिन बंद करके सरकार ने, समाज ने, परिवार ने बच्चों को बीमारी से तो बचा लिया. उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या में जाने से रोक लिया मगर उसके बदले दूसरी तरह की शारीरिक समस्या में अजनाने ही धकेल दिया है. उनके शैक्षणिक विकास के लिए तकनीक का सहारा दिलवाया तो उसके बदले मानसिक समस्या का उपहार भी दे दिया. कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाया गया मगर वे अकेलेपन, अवसाद, गुस्सा, तनाव आदि से संक्रमित होने लगे. बीमारी से बचाव के लिए उठाये गए कदमों ने बच्चों को, नौनिहालों को अजनाने दूसरी तरह की बीमारियों, समस्याओं से ग्रसित करवा दिया. असमंजस के वर्तमान दौर से उबरते हुए बच्चों को उनकी इस नवीन समस्या से, उनकी मानसिक परेशानी से मुक्त करवाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि सरकार, समाज, शैक्षिक संस्थान, परिवार ऐसा करने में असफल रहते हैं तो देश की बहुत बड़ी भावी पीढ़ी एक अनचाही, अनजानी बीमारी के साथ आगे बढ़ेगी.




(उक्त आलेख दिनांक 05.02.2022 के बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)

03 फ़रवरी 2022

कोरोनाकाल में सर्वाधिक नुकसान में रहे बच्चे

असमंजस का दौर अभी भी समाप्त नहीं हुआ है. भयग्रस्त वातावरण अभी भी बना हुआ है. विविध प्रकार के नुकसान रोज ही सामने आ रहे हैं. विगत दो वर्षों से कोरोना वायरस से लड़ते हुए देश ने बहुत सारे मोर्चों पर सफलता भी पाई है तो बहुत सारे क्षेत्रों में नुकसान भी उठाना पड़ा है. विविध क्षेत्रों के नुकसान का आकलन लगाकर उसकी भरपाई के तरीके भी खोजे जाने लगे हैं. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपनी-अपनी तरह से संसाधनों को एकत्र करके, उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवन प्रदान करके नुकसान को बहुत हद तक पाटने की कोशिश जारी है. इसी में एक क्षेत्र ऐसा है जिसके नुकसान की तरफ बहुत अधिक न तो ध्यान जा रहा है और न ही उसकी भरपाई के लिए विचार किया जा रहा है.


ऐसा एक क्षेत्र शिक्षा जगत है, जहाँ विगत दो वर्षों से व्यापक असमंजस बना हुआ है. जैसे ही लगता है कि स्थिति कुछ सामान्य होने जा रही है वैसे ही कोरोना का कोई नया वेरिएंट आकर सबको भयग्रस्त कर देता है. ऐसे में सबसे ज्यादा डर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ही उत्पन्न होता है. इस भय के चलते ही जहाँ एक तरफ अभिभावक बच्चों को शैक्षिक संस्थानों में भेजने से बचने लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी एक तरह का अभिभावकत्व भाव अपनाते हुए शैक्षिक संस्थानों को सबसे पहले बंद करवा देती है.


यह सच है कि बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी शारीरिकता को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा सकती है. सरकार का आरम्भ से ही प्रयास रहा है कि बच्चों को इस बीमारी के प्रकोप से बचाए रखा जाये. वैक्सीन की अनुपलब्धता होने की स्थिति में तमाम सारे सुरक्षात्मक उपाय समय-समय पर सरकार की तरफ से, समाज की तरफ से बताये जाते रहे, अपनाये जाते रहे. शैक्षिक संस्थानों का बंद किया जाना भले ही बच्चों को इस बीमारी से बचाए रखने का एक कारगर उपाय बनकर सामने आया हो मगर इसके भी अपनी तरह के नुकसान बच्चों को उठाने पड़े हैं. ऐसे नुकसान ये बच्चे आज भी उठा रहे हैं.


संस्थानों को बंद करवा कर, बच्चों को विद्यालयों में न भेजकर उनकी स्वास्थ्य समस्या के प्रति एक तरह की जागरूकता दिखाई गई, उनको स्वास्थ्य मामलों में भले ही सुरक्षित कर लिया हो मगर इसी के दूसरे पहलू में बच्चों को असुरक्षित भी कर दिया गया है. इस सन्दर्भ में यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो ऑनलाइन कक्षाओं ने बच्चों को कई तरह से नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है. कई-कई घंटे मोबाइल, कम्प्यूटर की स्क्रीन में आँखें लगाये बैठे बच्चों को आँखों की समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है. किसी समय मोबाइल और कम्प्यूटर की रौशनी को बच्चों की आँखों, उनके रेटिना के लिए घातक बताया जाता था. अब कोरोना के चलते हुई बंदी ने इसी खतरे के साथ बच्चों को बड़ा होने को विवश किया.


यहाँ एक बिंदु आँखों की समस्या का होना ही नहीं है बल्कि इसके साथ-साथ एक और शारीरिक समस्या उभरी गर्दन में दर्द की, रीढ़ की हड्डी में विकार की. सामान्य रूप में किसी भी विद्यालय द्वारा कम से कम पाँच घंटे तक ऑनलाइन कक्षाओं का सञ्चालन किया गया. इतनी लम्बी अवधि तक एक अवस्था में बैठ कर, गर्दन को झुकाकर मोबाइल, कम्प्यूटर स्क्रीन में काम करने से बहुतायत बच्चों में रीढ़ की हड्डी की, गर्दन की समस्या उभरी है. इन शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ बहुत से बच्चों में आपसी समन्वय, सहयोग, सामंजस्य आदि जैसी स्थितियों में भी ह्रास देखने को मिला है. इस अवधि में बहुत से बच्चे मानसिक रूप से कमजोर भी हुए हैं. ये और बात है कि उनके द्वारा अपनी पाठ्य-सामग्री को, अपने पाठ्यक्रम को बखूबी पूरा किया गया, अपने शैक्षणिक अंकों के मामले में भी उनमें बहुत ज्यादा नकारात्मकता देखने को नहीं मिली है मगर जिस उद्देश्य के साथ बच्चों को किसी संस्थान में जाना होता है, उस उद्देश्य की पूर्ति न होने के कारण बच्चों के मानसिक विकास में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.


लॉकडाउन जैसी स्थिति के कारण से बच्चों का बाहर निकलना भी बंद रहा, पार्क, मैदान में खेलना-कूदना भी बंद रहा. अपने मित्रों, विद्यालय के सहयोगियों के साथ मिलना-जुलना न होने के कारण भी उनमें अकेलेपन जैसी मानसिकता ने जन्म लिया है. समूह के साथ मिलकर काम करने की भावना में भी कमी आई है. न केवल खेलने के सन्दर्भ में बल्कि सामूहिक रूप से अध्ययन करने, परीक्षाओं की तैयारी करने के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है. इस तरह की कमी होने से बच्चों के मानसिक विकास का एक पक्ष कहीं न कहीं कमजोर हुआ ही है. बहुत से नौनिहाल तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी आरंभिक अवस्था में विद्यालय के दर्शन ही नहीं किये हैं. उम्र की दृष्टि से उनको आगे की कक्षाओं में भले ही प्रवेश दे दिया जाये, उनके ज्ञान को, शब्द-भंडार को भले ही घर-परिवार के द्वारा समृद्ध कर दिया गया हो मगर विद्यालय की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा से वे निश्चित ही हमेशा के लिए वंचित रह गए हैं. निश्चय ही इससे उनके कोमल मन पर जिस भावना का प्रस्फुटन होना था, वह नहीं हो सका है.


शैक्षिक संस्थानों को आये दिन बंद करके सरकार ने, समाज ने, परिवार ने बच्चों को बीमारी से तो बचा लिया. उनको स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या में जाने से रोक लिया मगर उसके बदले दूसरी तरह की शारीरिक समस्या में अजनाने ही धकेल दिया है. उनके शैक्षणिक विकास के लिए तकनीक का सहारा दिलवाया तो उसके बदले मानसिक समस्या का उपहार भी दे दिया. कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाया गया मगर वे अकेलेपन, अवसाद, गुस्सा, तनाव आदि से संक्रमित होने लगे. बीमारी से बचाव के लिए उठाये गए कदमों ने बच्चों को, नौनिहालों को अजनाने दूसरी तरह की बीमारियों, समस्याओं से ग्रसित करवा दिया. असमंजस के वर्तमान दौर से उबरते हुए बच्चों को उनकी इस नवीन समस्या से, उनकी मानसिक परेशानी से मुक्त करवाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. यदि सरकार, समाज, शैक्षिक संस्थान, परिवार ऐसा करने में असफल रहते हैं तो देश की बहुत बड़ी भावी पीढ़ी एक अनचाही, अनजानी बीमारी के साथ आगे बढ़ेगी.


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(उक्त आलेख दिनांक 03.02.2022 के जनसन्देश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर 'जनसंपादकीय' कॉलम के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है.)

29 जनवरी 2022

अभिभावक करें सहयोग

कोरोना के संक्रमण गति बढ़ने के कारण देश में लगभग सभी गतिविधियों पर विराम सा लगा दिया गया था. सभी तरह के क्षेत्रों में बंदी की स्थिति बन चुकी थी. बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी लोग घर पर रहते हुए ही अपने काम को पूरा कर रहे थे. आर्थिक ढाँचा यदि गड़बड़ हो रहा था तो शैक्षिक जगत में भी नकारात्मक माहौल देखने को मिल रहा था. सरकारें, प्रशासन, शासन आदि सभी लोग देश के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के बारे में विचार करने में लगे हुए थे, आज भी लगे हुए थे. यहाँ देश के आर्थिक स्तर से अधिक सोचनीय स्थिति बच्चों के शैक्षिक और मानसिक स्तर को समझने की है. भले ही वर्तमान दौर बहुत अधिक चिंता का कारण न हो मगर बच्चों के लिए यह समय अवश्य ही चिंताजनक बना हुआ है. ऐसे माहौल में जबकि आये दिन कोरोना संक्रमण के चलते संस्थानों को बंद करवा दिया जाता है, बाजार, पार्क, कोचिंग आदि पर भी पहरा सा लगा दिया जाता हैऐसे हालात में जबकि सामाजिकता का स्तर आपसी मेल-मिलाप के मामले में लगभग शून्य हो चुका हो तब बच्चों के शारीरिकमानसिक स्तर परउनकी क्रियाशीलता पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है.

 

यह वो स्थिति है जबकि बच्चे पूरी तरह से घरों में बंद हैं. उनके सामने ऑनलाइन क्लास करना, खेलने के नाम पर कंप्यूटर, मोबाइल हैं, मनोरंजन के नाम पर भी टीवी, मोबाइल आदि हैं, सामाजिक सक्रियता के नाम पर, खेलकूद के नाम पर अपने परिजन ही हैं. नित्यप्रति के वही सीमित से कार्यवही एक जैसी दिनचर्या गुजारते रहने के कारण बच्चों में एक तरह का चिड़चिड़ापन आता जा रहा है. इस वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों के लिए बच्चों के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस लगभग कैदखाने जैसे वातावरण में उनके लिए बच्चों का लालन-पालनउनकी परवरिश समस्याजनक हो गई है. बच्चों का उद्दंड होते जानाअत्यधिक उग्रता धारण करना एक समस्या है तो अभिभावकों का व्यवहार भी चिंताजनक है. बात-बात पर आदेशनुमा कदमकिसी भी कार्य का टोकाटाकी भी उचित नहीं है. इसे समझने की आवश्यकता है. इसके लिए बाल मनोविज्ञान को समझना-परखना अत्यंत आवश्यक है.

 

इस समय कोरोनाकाल के चलते बच्चों के स्कूल बंद हैं तथापि ऑनलाइन क्लास अवश्य ही चालू हैं. यहाँ भी स्थिति चूँकि सामान्य कक्षा जैसी नहीं है, सामान्य रूप से विद्यालय जाने वाली नहीं है. इस कारण ऑनलाइन क्लास करवाने के लिए बच्चों को सुबह जगाने के नाम पर चीखना-चिल्लानाउनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होनाउनको पढ़ाने के नाम परहोमवर्क करवाने के नाम पर खीझना अभिभावकों के लिए सामान्य गतिविधि बन गई है. इस तरह के व्यवहार में वर्तमान लॉकडाउन जैसी स्थिति भी बहुत हद तक जिम्मेवार है. इससे पहले भी बच्चों का सड़क पर निकल करघर से बाहर जाकर खेलना-कूदनाशरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई थींइसे इस लॉकडाउन जैसी स्थिति ने और भी भयावह बना दिया है. अब बच्चे घर से बाहर निकले बिना ही अपने समय को व्यतीत कर रहे हैं. जरा-जरा सी बात पर एक तरफ उनके साथ टोका-टाकी बढ़ी है दूसरी तरफ अत्यधिक सुरक्षित रहने के दवाब ने भी बच्चों को परेशान सा कर रखा है.

 

पहले भी बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती थी और न ही उनको बाहर खेलने की बहुत ज्यादा अनुमति मिलती थी. जितनी आज़ादीजितनी अनुमति उनको अपनी कॉलोनीअपनी सोसायटी अथवा अपनी गली-मोहल्ले की बहुत छोटी जगह में खेलने-कूदने के लिए मिलती थी वह भी इस आपदा में छीन ली गई है. ऐसी विषम परिस्थिति में उनके शारीरिक मनोरंजन केअपने दोस्तों के साथ शरारत करने के जो नाममात्र के अवसर हुआ करते थेवे तो समाप्त ही हो गए हैं किन्तु स्कूल का जो बोझ उनके दिमाग परउनके मन पर था वह ज्यों का त्यों बना हुआ है. स्कूल के कामपढ़ाई के बोझऑनलाइन क्लास की अनिवार्यता में वे खुद को दबा हुआ पा रहे हैं. इस समय बच्चों के पास खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल ही हैंजिनके साथ वे ऑनलाइन क्लास के कई-कई घंटे बिताकर आये होते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पा रहा है. यदि इसी में उनको प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी होने लगे तो ये बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता पालने लगते हैं.

 

आज की स्थिति में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार मेंघर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. इसके लिए अपने बच्चों से उनके दैनिक अनुभवों के बारे में बात करें. वे दिन के बहुत बड़े भाग को ऑनलाइन क्लास में बिताने के बाद अकेले जैसे ही हैं. ऐसे में उनकी पढ़ाई से ज्यादा आवश्यक है कि उनको उनकी रुचियों की तरफ ले जाया जाये. उनको अन्य गतिविधियों में संलिप्त करवाया जाये. घर के ऐसे छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगेउनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. बागवानीड्राइंगसंगीतक्राफ्ट आदि ऐसे विषय हैं जिनके द्वारा बच्चों में उत्पन्न हो रही निराशा को दूर किया जा सकता है.

 

कोरोना का यह दौर बहुत कुछ सिखाने के लिए आया है. यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर समय सिर्फ पढ़ाई की बातें बच्चे से नहीं करनी चाहिए. वर्तमान युग में कैरियर एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है मगर जिस भविष्य की इमारत की नींव को यदि आज कमजोर कर दिया जायेगा उस पर बुलंद इमारत बनाया जाना संभव नहीं होगा. ऐसे में उसके साथ किसी भी तरह से ऐसा व्यवहार न करें जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाये. किसी भी काम को करने के लिए तेज आवाज़ में बोलनाबच्चे की छोटी से छोटी गलती के लिए उसको डाँटनाचिल्लाते हुए किसी काम को करने का आदेश देना आदि ऐसे कदम हैं जिनके द्वारा बच्चे में एक तरह का भय बैठ जाता है. उसके अन्दर कमजोरी के भाव पनपने लगते हैं. ऐसे में वह हीनभावनाअसुरक्षाअवसाद जैसी स्थिति का शिकार होने लगता है. कोरोनाकाल में ऐसी अवस्था बच्चों को नकारात्मकता की तरफ धकेल सकता है. सभी अभिभावकों को ऐसे माहौल में अपने बच्चों के साथ सहयोगात्मक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है.



(उक्त आलेख जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'सच बेधड़क' के दिनांक 29 जनवरी 2022 अंक के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.)

25 जनवरी 2022

साइबर अपराध से सतर्क रहने की आवश्यकता

वर्तमान तकनीकी दौर में मोबाइल ने जिस तेजी से जनमानस के बीच अपनी जगह बनाई है उतनी शायद ही किसी और उपकरण ने बनाई हो. मोबाइल, कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि के समन्वय ने रोजमर्रा के कामों को भी बहुत हद तक सरल किया है. वर्तमान में समाज के लगभग सभी कार्य इंटरनेट के माध्यम से होने लगे हैं. सरकार हो या आम आदमी, सरकारी संगठन हों या फिर निजी संस्थान, व्यापार हो या फिर नौकरी, शिक्षा हो या समाजसेवा सभी क्षेत्र आज इंटरनेट का लाभ उठा रहे हैं. इन तकनीकी उपकरणों के आरंभिक उपयोग में लोगों द्वारा, समाजशास्त्रियों द्वारा, मनोविज्ञानियों  आदि द्वारा इसके नुकसान बताते हुए इनके कम से कम उपयोग के लिए जोर दिया जाता था. सलाहों को बहुत हद तक स्वीकारा भी गया, बहुद हद तक अस्वीकार भी किया गया. जहाँ-जहाँ आवश्यकता समझ आई वहाँ इस तकनीक का उपयोग किया गया.

 

विगत दो वर्षों में, जबकि कोरोना ने अपना कहर मचाया, ज्यादातर समय में लोगों को लॉकडाउन जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा हो, संस्थानों को बंद करके उनके कर्मचारियों को घर से ही काम करने के निर्देश दिए गए हों तब इस तकनीक की महत्ता और भी निखर कर सामने आई. न केवल संस्थानों में बल्कि शैक्षिक संस्थाओं में भी इस तकनीक के द्वारा पठन-पाठन का काम आरम्भ किया गया. जनमानस को इस तकनीक में लाभ दिखाई देने लगा. लॉकडाउन जैसी स्थिति में लोगों के काम भले ही सामान्य गति से न चले हों मगर इस तकनीक के माध्यम से बहुत से कामों में गति बनी रही.

 

इस लाभ के साथ अनचाहे ही बहुत से नुकसान भी समाज में दिखाई देने लगे हैं. इंटरनेट जहाँ एक तरफ लोगों को लाभान्वित कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वह नुकसान भी पहुँचा रहा है. इस तरह के तमाम सारे नुकसान को साइबर क्राइम या फिर साइबर अपराध के नाम से जाना जाता है. सामान्य रूप में इंटरनेट पर किया जाने वाला कोई भी अपराधिक कार्य साइबर अपराध के अंतर्गत आता है. इस तरह के अपराध में हैकिंग तो शामिल है ही साथ ही बैंकिंग धोखाधड़ी, किसी का डाटा, जानकारी का चुराया जाना, किसी तरह की धोखाधड़ी करके किसी दूसरे के एकाउंट, ईमेल आदि को हैक कर लेना भी साइबर अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है. कोरोना के चलते इंटरनेट का उपयोग बहुतायत में हो रहा है. ऐसे में साइबर अपराधियों को भली-भांति जानकारी है कि ऐसे समय में साइबर क्राइम करना सहज हो सकता है.

 

साइबर अपराध में जिस तरह के कार्यों को मुख्य रूप से शामिल किया गया है, उनमें वित्तीय अपराधअवैध सामग्रियों को बेचनाअश्लील सामग्री का प्रसार-प्रचार, बौद्धिक संपत्ति की चोरीजालसाजीआदि हैं. साइबर अपराध की श्रेणी में मुख्य रूप से हैकिंग को शामिल किया गया है. इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जानकार व्यक्ति द्वारा किसी कंप्यूटर को लक्ष्य करके उसके लिए सम्बंधित प्रोगाम का निर्माण किया जाता है. इसके बाद वे उस लक्ष्य कंप्यूटर में अपने प्रोग्राम के द्वारा एंट्री करके उस सम्बंधित कंप्यूटर से डाटा चोरी करते हैं. ऐसे हैकर्स का मुख्य लक्ष्य आर्थिक लाभ उठाना होता है. वे इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के कंप्यूटर में अवैध प्रवेश करके उसके कंप्यूटर से बैंक, क्रेडिट कार्ड, एटीएम आदि की सूचनाएँ हासिल कर लेते हैं. किसी व्यक्ति की आर्थिक सूचनाओं को चोरी करने के साथ-साथ ऐसे लोग बड़े-बड़े संस्थानों में भी सेंध लगाते हैं.

 

आर्थिक चोरी के साथ-साथ वर्तमान में इंटरनेट पर बहुत बड़ा बाजार पोर्नोग्राफी का है. बहुत सी वेबसाइट इसके लिए वयस्कों से सम्बंधित बने नियम-कानूनों का इस्तेमाल करके अपना कारोबार करती हैं मगर बहुत सी वेबसाइट ऐसी हैं जो बाल यौन सम्बन्धी सामग्री का प्रसार करती हैं. देखा जाये तो वैश्विक स्तर पर बाल यौन सामग्री का सर्वाधिक प्रसार इंटरनेट के माध्यम से हो रहा है. इंटरनेट पर अश्लील सामग्री अत्यंत सुलभ है. आजकल हर हाथ में मोबाइल होने से औ हर हाथ में इंटरनेट होने से इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को किसी तक पहुँच बनाना कठिन काम नहीं रह गया है. बच्चे भी अब इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से दूर नहीं रह पाते हैं. यौन अपराध में लिप्त लोग इसी कारण से यौन अपराध के लिए बच्चों को लक्ष्य करते हैं. इसके लिए वे बच्चों में अश्लील सामग्री, वीडियो, फोटो आदि प्रसारित कर उन्हें बहकाते हैं. ऐसी सामग्री को देखने के बाद बहुत से बच्चे भटक जाते हैं. यही बच्चे इन यौन अपराधियों के द्वारा जबरन यौन अपराध में लिप्त कर दिए जाते हैं.  

 

इन दो मुख्य अपराधों के अलावा साइबर अपराधी भ्रामक ईमेल भेजने के कार्य करता है, जिससे कि यूजर से निजी सूचना लेकर उसके एकाउंट से चोरी करने का प्रयास किया जाये. ईमेल के द्वारा सम्बंधित यूजर को बताया जाता है वह किसी और वेबसाइट में जाकर अपने बैंक की, अपने आधार कार्ड की, अपने पैन कार्ड की, अपने एटीएम की, अपने अन्य किसी दस्तावेज़ की जानकारी भर कर उसे अपडेट करवा ले. ऐसा करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यूजर की समस्त जानकारियों को प्राप्त करना होता है. ऐसा करके साइबर अपराधी सम्बंधित यूजर के साथ धोखाधड़ी कर लेता है. इसके लिए साइबर अपराधी कई बार फोन कॉल करके ओटीपी अथवा अन्य गुप्त कोड को बताने की बात करता है. अब जबकि इंटरनेट का उपयोग सर्व-सुलभ रूप से किया जाने लगा है और यह उपयोग हमारे दैनिक जीवन की दैनिक क्रियाओं की तरह हो गया है तो हम सबको इसके उपयोग में सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है. यहाँ हमें ध्यान रखना होगा कि अपने किसी भी इंटरनेट खाते का पासवर्ड सरल नहीं बनाना चाहिए. हमें अपने खातों का पासवर्ड ऐसा बनाना चाहिए जिसे हैक करना सहज न हो. कभी भी अपने नाम, अपनी जन्मतिथि, अपने मोबाइल नंबर, अपने परिजनों के नाम आदि से सम्बंधित पासवर्ड नहीं बनाना चाहिए. ऐसे पासवर्ड को डिकोड करना आसान होता है.

 

इसके अलावा किसी को भी फोन पर अपने किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड का ओटीपी, पिन आदि नहीं बताना चाहिए. कई बार साईबर अपराधी स्वयं को सम्बंधित बैंकिंग संस्थान का व्यक्ति बताकर गुप्त कोड की जानकारी कर लेता है. इसके लिए ऐसी किसी भी तरह की कॉल आने पर पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए. इसी तरह से अपने सोशल मीडिया खातों के लिए, अपने बैंक खातों के लिए, अपने व्यापारिक खातों के लिए डबल स्टेप सुरक्षा व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए. इस व्यवस्था में लॉग इन करने पर मोबाइल पर एक गुप्त कोड तत्काल प्राप्त होता है. इस तरह की टू वे वेरिफिकेशन प्रक्रिया अपनाये जाने से भी बहुत हद तक साइबर अपराध को रोका जा सकता है.

इधर देखने में आ रहा है कि साइबर अपराधियों ने कोरोना महामारी को भी अपनी धोखाधड़ी के लिए हथियार बना लिया है. उन्होंने कोरोना सम्बन्धी वैक्सीनेशन को भी अपनी धोखाधड़ी का माध्यम बना लिया है. ये अपराधी कहीं वैक्सीनेशन के नाम पर, कहीं उसको प्रमाणित करने के नाम पर धोखा फर्जी वेबसाइट के द्वारा आर्थिक धोखाधड़ी कर रहे हैं. इसी तरह कोरोना के नाम पर सरकारी सहायता देने के नाम पर, राशन वितरण के रूप में, कहीं बैंक खातों में धनराशि पहुँचाये जाने का लालच देकर जनमानस के बैंक खातों की जानकारी प्राप्त करके धोखाधड़ी कर रहे हैं.

 

इसके अलावा सबसे ऊपर जो बात है, वो ये कि हम सभी को सजग रहने की आवश्यकता है. हम इंटरनेट पर जो भी काम कर रहे हैं, उनसे सम्बंधित सुरक्षा उपायों को, क़दमों को अपनाते हुए ही आगे बढ़ें. किसी भी तरह के इंटरनेट कार्य को करने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वह सुरक्षित है और साथ ही उस इंटरनेट सम्बन्धी कार्य से हम भी तो अनजाने में कोई साइबर अपराध तो करने नहीं जा रहे. ध्यान रखें कि सावधानी ही बचाव है.



(उक्त आलेख आज दिनांक, 25 जनवरी 2022 के बीपीएन टाइम्स समाचार-पत्र में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.)
 

15 नवंबर 2021

हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची आ गई है. प्रसन्नता की बात है कि आप सभी के पढ़ते रहने के कारण, लेखन हेतु प्रोत्साहित करने के कारण हमारा ब्लॉग रायटोक्रेट कुमारेन्द्र भी इस सूची में है.

कुल 107 ब्लॉग को इस सूची में सम्मिलित किया गया है. पूरी सूची आप इस लिंक से देख सकते हैं.



सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग सूची में आये अन्य ब्लॉग-लेखकों को भी बधाई-शुभकामनाएँ.

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ब्लॉग लेखन वर्ष 2008 से नियमित रूप से चल रहा है. लेखन एक बात है, उससे बड़ी बात है कि आप सुधिजनों, शुभेच्छुओं द्वारा लगातार इसे पढ़ा भी जा रहा है. यहाँ कहें कि महज पढ़ा ही नहीं जा रहा है, उससे एक कदम आगे आकर हमें सराहा जा रहा है, प्रोत्साहित किया जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि आये दिन हमारे मित्र, हमारे सहयोगी, हमारे शुभचिंतक, हमारे पाठक, हमारे परिजन आदि विषय, मुद्दे बताते, सुझाते हैं लिखने के लिए. आप सभी के इस स्नेह, प्यार, हमारे लेखन के प्रति आपके विश्वास ने लगातार लिखने को प्रेरित किया है. ऐसे में ब्लॉग को मिलने वाला सम्मान आपका सम्मान है, आपका स्नेह है.

हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची में आपका यह ब्लॉग विगत कई वर्षों से लगातार सम्मिलित हो रहा है. इसके लिए आप सभी की शुभकामनायें हमारी शक्ति बनी हैं. आप सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने योग्य न तो हम हैं और न ही हमारे पास शब्द हैं. यही कामना है, आकांक्षा है कि आप अपना यह स्नेह, प्यार, विश्वास लगातार, सदैव हम पर, हमारे लेखन पर, हमारे ब्लॉग पर बनाये रहिएगा.

हमारे मीडिया के मित्रों ने ब्लॉग की इस उपलब्धि को अपने-अपने मंचों पर स्थान दिया है. उनके स्नेह और सहयोग की अपेक्षा सदैव के लिए है.








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30 सितंबर 2021

विश्वास से निकलती विकास की राह

किसी भी देश की, समाज की मजबूती के लिए आर्थिक पक्ष का, सामरिक पक्ष का सशक्त होना जितना महत्त्वपूर्ण है उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण वहाँ के नागरिकों के मध्य आपसी सामंजस्य का बना होना है. नागरिकों की सामंजस्यता, समन्वय से ही सफलता-उन्नति के मानक निर्धारित होते हैं. विदेशी संबंधों में भी किसी भी देश की साख उसके नागरिकों की जीवन-शैली, उनकी सामाजिकता, उनके आपसी व्यवहार, सद्भाव पर भी निर्भर करती है. देश के मानवीय और समन्वयपूर्ण माहौल को देखकर ही न केवल आंतरिक सशक्त बढ़ती है वरन विदेशी निवेश, पर्यटन को बढ़ावा मिलता है. इससे जहाँ देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, वहीं देश के नागरिकों को रोजगार के अवसर मिलते हैं.


नागरिकों के आपसी समन्वय, भाईचारे की भावना को एकसूत्र में बाँधने का कार्य उनके बीच का विश्वास करता है. इधर देखने में आया है कि मानवीय समाज जितनी तेजी से उन्नति करता जा रहा है उसी तेजी से उनके बीच अविश्वास का माहौल बढ़ता जा रहा है. इस अविश्वास के कारण लोगों को आपस में बातचीत करने में डर लगने लगा है. साथ जाने का डर, साथ बैठने का डर, बाज़ार जाने में डर, ऑफिस में डर, बस में डर, घूमने में डर, घर में डर. हर तरफ बढ़ते इस डर-भय का कारण हम सभी के बीच पनपता अविश्वास है.


भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल समाज रिश्तों की मर्यादा को भुलाता जा रहा है. प्रगतिशीलता के नाम पर कुतर्कों को रखा जा रहा है. फैशन के नाम पर अश्लीलता फैलाई जा रही है. मनोरंजन के नाम पर नग्नता को दिखाया जा रहा है. अभिभावकों और बच्चों के बीच विश्वासपूर्ण सम्बन्ध में नकारात्मकता आई है. पति-पत्नी के आपसी विश्वास में गिरावट आ रही है. शासन-प्रशासन, सरकार-जनता, चिकित्सक-मरीज, शिक्षक-शिक्षार्थी आदि के साथ विभिन्न ताने-बाने को अविश्वास का शिकार होना पड़ रहा है. यही अविश्वास रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर रहा है. महिलाओं-बच्चियों के प्रति आपराधिक प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है. युवाओं में भटकाव पैदा कर उनको अपराध की दिशा में ले जा रहा है.


ऐसे अविश्वास के माहौल में जहाँ व्यक्ति कमजोर होता है वहीं समाज और देश भी कमजोर होता है. ऐसे में आपसी विश्वास को बढ़ाने की जरूरत है जिसके लिए किसी बिल की नहीं, किसी अध्यादेश की नहीं वरन भाईचारे की, स्नेह की, प्रेम की, विश्वास की आवश्यकता है. आने वाली पीढ़ी को यदि सभ्य समाज देना है; भविष्य को स्वर्णिम बनाये रखना है; रिश्तों के मध्य तनावरहित सम्बन्ध स्थापित करना है; सामाजिक मान्यताओं को बचाए रखना है, देश को सशक्त बनाना है तो बहुत तेजी से फैलते जा रहे अविश्वास को जड़ से समाप्त करना ही होगा.



दिनांक 30 सितम्बर 2021 के दैनिक जागरण, कानपुर के संस्कारशाला कॉलम में उक्त विचार प्रकाशित किये गए.

14 सितंबर 2021

अपनी भाषा का सम्मान रहे

हिन्दी दिवस का आयोजन बहुत से लोगों के लिए महज एक औपचारिकता सी है. इस औपचारिकता में लोग भूल जाते हैं कि यह दिवस हिन्दी के लिए है न कि हिन्दी साहित्य के लिए. आज सुबह-सुबह ही एक सज्जन मिल गए. उन्होंने हिन्दी दिवस की शुभकामनायें दी तो हमने भी जवाब में उनको शुभकामना बोल दिया. इस पर वे बड़े ही आत्ममुग्ध भाव से बोले कि न, ये हमारा दिन नहीं बल्कि आपका दिन है. हम तो साइंस वाले आदमी हैं. हमारा हिन्दी से क्या काम?


उनको ये बताते हुए कि हम भी साइंस वाले आदमी हैं, समझाया कि आपने अभी जो गर्वोक्ति की है वो किस भाषा में की? बस इसी भाषा को बोलने वालों का दिन है ये.


इस पर उनको ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि किसी बहुत बुरी स्थिति में ला खड़ा कर दिया हो. उनके चेहरे की भाव-भंगिमा से लगा कि वे अपने आपको हिन्दी वाला आदमी बताये जाने पर अपमानित महसूस कर रहे हैं.


जब भी हिन्दी भाषी व्यक्तियों के साथ में इस तरह की मानसिकता जन्म लेगी, हिन्दी का विकास नहीं हो सकता. हिन्दी ही क्या किसी भी भाषा को बोलने, लिखने, पढ़ने वाले जब निम्न स्तर की मानसिकता लेकर समाज में कार्य करेंगे, उस भाषा का विकास होना कठिन है.


बहरहाल, हिन्दी दिवस पर हमारे कुछ विचार अपने मित्रों सहित प्रकाशित हैं. उनको पढ़िए और प्रयास करिए कि हिन्दी के विकास में अपना कुछ योगदान कर सकें.




12 मार्च 2021

सामाजिक क्षेत्र के पिस्सू

किसी भी व्यक्ति का जीवन विविध क्षेत्रों से गुजरता हुआ पल्लवित, पुष्पित होता रहता है. इन क्षेत्रों में जहाँ प्राथमिक वरीयता में उसका पारिवारिक क्षेत्र आता है इसके बाद सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, साहित्यिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में उसके जीवन का गुजरना होता है. जीवन के इन क्षेत्रों से गुजरते हुए व्यक्ति बहुत कुछ सीखता भी है और बहुत कुछ सिखाता भी है. पारिवारिक क्षेत्र का सम्बन्ध नितांत व्यक्तिगत होता है और इसमें अत्यंत निकटवर्ती लोगों को ही प्रवेश मिलता है. इसके उलट शेष क्षेत्रों की गतिविधियाँ सार्वजनिक ही कही जा सकती हैं. राजनीति हो, समाजसेवा हो, साहित्य गतिविधि हो सभी में व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन उभर कर सामने आता है.


ऐसी स्थिति में भी बहुतायत रूप में सामाजिक क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति की सक्रियता उसके व्यक्तित्व का वास्तविक स्वरूप का परिचायक बनती है. कहा जा सकता है कि सामाजिक क्षेत्र की गतिविधियाँ व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप, चरित्र को उद्घाटित करती हैं. सामाजिक क्षेत्र के अनुभवों से सहज रूप में देखने में आया है कि पारिवारिक क्षेत्र को जिम्मेवारी के भाव से सँवार दिया गया है और इस क्षेत्र को जीवन के किसी भी अन्य दूसरे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा पावन माना-समझा गया है. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को अत्यंत सम्मान के भाव से देखा जाता है. उनके बारे में ऐसी धारणा बनी होती है कि वे लोग अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा निस्वार्थ भाव से दूसरे के लिए व्यतीत कर रहे हैं. समाज में आने वाली अनेक आपदाओं के समय में ऐसे सामाजिक लोगों कि सक्रियता ने अनेक बार उनको देवतुल्य भी माना है.


मानव के विकास के क्रम में जहाँ उसका शैक्षिक विकास हुआ, आर्थिक विकास हुआ, तकनीकी विकास हुआ वहीं कुछ क्षेत्रों में विकास का उलटा स्वरूप देखने को मिला. सामाजिक क्षेत्र में इसका बहुत ज्यादा असर देखने को मिला. अब इस क्षेत्र में ऐसे लोग बहुतायत में सक्रिय होते जा रहे हैं जिनका समाजसेवा से अथवा सामाजिक क्रियाकलापों से कोई लेना-देना नहीं. ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के उन लोगों से एकदम अलग होते हैं जो निस्वार्थ भाव से काम करने में विश्वास करते हैं. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों का एकमात्र उद्देश्य, सामाजिकता का अर्थ किसी भी तरह से मंच, माइक और सम्मान प्राप्त कर लेना है. सामाजिक क्षेत्र में समय के गुजरते रहने के साथ-साथ ऐसे लोगों का कारवां बढ़ता ही रहा है. ऐसे नए उभरते सामाजिक लोगों द्वाराजोड़-तोड़ करके मंच हासिल करना, सम्मान प्राप्त करना और ऐसा न हो पाने की दशा में कलह मचा देना, आयोजकों के चरित्र तक पर उँगली उठा देना ऐसे लोगों का सामान्य स्वभाव बनता जा रहा है. यही कारण है कि सामाजिक क्षेत्र में अब वास्तविक सामाजिक लोगों की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन होता जा रहा है.


ये नए उभरते हुए सामाजिक या कहें कि असामाजिक प्राणी न केवल मंच को अपने कब्जे में करने की कोशिश करते हैं बल्कि कार्यक्रम आरम्भ होने के पहले ही ये तथाकथित सामाजिक लोग आयोजकों को निर्देशित करते हैं कि उनको फलां के पहले बोलने को बुलाया जाये. उनको सम्मान दिया जाये तो फलां के पहले. ऐसे लोगों की कोशिश यह भी रहती कि दूसरे को सम्मान मिलने ही न पाए.


समय व्यतीत करते जाने के साथ-साथ ऐसे लोग खुद को ताकतवर भी बनाते जाते हैं. स्थानीय होने के कारण ऐसे लोग ऐसे लोग मंच के लिए, मंच की कुर्सियों पर बैठने के लिए, सम्मान, पुरस्कार जबरिया माँग कर हड़पने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्थानीय स्तर पर नाम होने के बाद भी ऐसे लोग अपने उपद्रवी स्वभाव, जबरन कब्ज़ा करने की मानसिकता के चलते एकाधिक बार बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये मंचासीन होते देखे गए हैं. बहुत बार सम्मान, पुरस्कार के लिए जोड़-तोड़ करते, डराते-धमकाते भी देखे गए हैं. यह समझ से परे है कि आखिर मंच की तृष्णा क्यों? आखिर हर मंच से सम्मान पाने की लालसा क्यों? आखिर बिना काम किये खुद को प्रतिस्थापित करने की कुंठित मनोभावना क्यों? आखिर सम्मान न मिलने पर, मंचासीन न किये जाने पर आयोजक के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर देने की कुत्सित सोच क्यों?


जहाँ तक अनुभव की, सामाजिकता की बात है तो सामाजिक क्षेत्र भी किसी वृक्ष की तरह से होता है, जहाँ पुराने पत्तों को डाली से स्थान छोड़ना होगा और नए पत्तों के खिलने को जगह देनी होगी. सामाजिक क्षेत्र किसी परिपक्वता की माँग करता है जहाँ आपको अपनी जगह स्वयं बनानी पड़ती है. अतीत के अपने कुछ कामों, अपने नाम, मीडिया में अपने परिचय, परिवार के रसूख के बल पर आखिर कब तक नए लोगों से प्रतिस्पर्द्धा की जाती रहेगी? मंच पर जगह, लोगों के दिलों में सम्मान स्वतः पैदा होता है. किसी हनक के चलते, अपने उपद्रवी स्वभाव के चलते, कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने की मानसिकता रखने के चलते सिर्फ बदनामी ही पायी जा सकती है. संभव है कि ऐसे लोगों के स्वभाव के चलते आयोजक ऐसे लोगों को मंच प्रदान कर दे, माइक दे दे, सम्मान भी प्रदान कर दे मगर ऐसे लोग समाज में, नागरिकों में, प्रशासन में, मीडिया में स्थायी रूप से जगह नहीं बना पाते हैं. क्षणिक प्रतिष्ठा की चाह में, क्षणिक प्रचार की चाह में ऐसे लोग सिर्फ बदनामी ही पाते हैं. बिना किसी श्रम के, बिना किसी उल्लेखनीय कार्य के मंच, माइक, मंचासीन होने, सम्मान पाने की लालसा ऐसे लोगों के कमजोर व्यक्तित्व का ही परिचायक होता है. देखा जाये तो ऐसे लोग सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तित्व नहीं बल्कि पिस्सू होते हैं जो सामाजिक क्षेत्र में उभरते हुए वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वों का लहू पी रहे होते हैं.

 


उक्त लेख बीपीएन टाइम्स, दिनांक - 12.03.2021 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

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वंदेमातरम्

14 दिसंबर 2020

कोरोनाकाल की नकारात्मकता में सकारात्मकता

नववर्ष के उल्लास के बीच से निकल कर सामने आया यह वर्ष अब अपने अंतिम चरण में है. कोरोना वायरस की मारक उपस्थिति के बीच इस वर्ष ने नितांत खालीपन पैदा करने के साथ-साथ बहुत कुछ सिखाने का काम भी किया है. आर्थिक दृष्टि से, रोजगार की दृष्टि से, कामगारों, गरीबों, मजदूरों आदि के नजरिये से देखें तो इस वर्ष में अत्यंत कठिनाई भरे दौर देखने को मिले हैं. बहुत से परिवारों ने अपने प्रियजनों को हमेशा-हमेशा के लिए खोया है तो बहुत से परिवारों में इसका खौफ बना रहा. इस वर्ष को बहुत सारी नकारात्मकता के साथ गुजरने वाला वर्ष कहा जा सकता है.


जैसा कि प्रकृति का नियम है तथा सामान्य जीवन में भी देखने को मिलता है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. प्राकृतिक रूप से भी सुख-दुःख, दिन-रात, धरती-आकाश, माता-पिता, पति-पत्नी आदि जैसी युगल अवधारणा हमारे समाज में उपस्थित है. यही वह अवधारणा है जो सामान्य दिनों में, कष्ट के समय में लोगों का विश्वास बढ़ाती है, उनको संयम प्रदान करती है. इस अवधारणा की सशक्तता को यह जाता हुआ वर्ष भी समझाता हुआ समझ आता है.


कोरोना की उपस्थिति होने के बाद जब सरकार द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई, उस समय संभवतः किसी को भी इसका भान नहीं था कि यह कुछ दिनों की नहीं बल्कि महीनों तक चलने वाली स्थिति होगी. लॉकडाउन के प्रथम चरण के आगे बढ़ने के बाद ही लोगों में अपने परिवार, अपने परिजनों के प्रति चिंता का भाव बहुत गहराई से दिखाई दिया. जिन परिवारों के बच्चे बाहर शिक्षा में थे अथवा किसी रोजगार में थे उनको वापस घर लाने की कवायद होने लगी. जिन परिजनों में बुजुर्ग लोग थे, कहीं तन्हा रह रहे थे उनके प्रति भी एक तरह की चिंता देखने को मिली थी. परिवार के सक्षम लोग जहाँ एक तरफ अपने बच्चों के सकुशल घर वापसी की कामना कर रहे थे तो वही लोग दूसरी तरफ अपने घर के बुजुर्गों के स्वास्थ्य का, उनकी सेहत का ख्याल रख रहे थे.


बुजुर्गों के मामले में बहुतायत में एक अलग तरह की स्थिति इधर विगत कई वर्षों से देखने को मिल रही थी. जन-जीवन सामान्य रूप से गुजरते रहने के कारण परिवार संयुक्त से एकल और फिर एकल से नाभिकीय रूप में परिवर्तित होने लगे थे. इससे भी परिवार के बुजुर्ग व्यक्तियों को अकेलेपन का सामना करना पड़ रहा था. भौतिकता, आधुनिकता, धन की अंधाधुंध दौड़ में बहुसंख्यक लोगों में परिवार के प्रति, अपने बुजुर्ग परिजनों के प्रति उपेक्षा का भाव भी पनपने लगा था. कोरोना की भयावहता के चलते घरों में कैद रहने के कारण लोगों ने अचानक से परिवार के सदस्यों की अहमियत को समझना शुरू किया.


अधिकांशतः देखने में आता है कि जब कोई हमारे साथ होता है, हमारी नज़रों के सामने होता है, हमारी पहुँच में होता है तब हमें उसकी कदर नहीं होती है. यह स्थिति व्यक्ति, वस्तु, समय आदि सभी के लिए एकसमान रूप से प्रभावी होती है. हमारे पास जिसकी उपलब्धता होती है, उसकी फ़िक्र हम नहीं करते हैं. ऐसा अपने घर-परिवार के बुजुर्गों के मामले में बहुत होता है. उनके हमारे साथ रहने की स्थिति में हमें उनके अनुभवों का, उनके ज्ञान का, उनके कार्यों का भान होते हुए भी उसके बारे में विचार करने का, उनसे सीखने का जरा भी एहसास नहीं होता है. उम्र, समय, कार्यों, अनुभव आदि से बहुत अधिक सक्षम हमारे बुजुर्ग हमारे लिए एक अनमोल खजाना होते हैं, एक परिपक्व संस्थान की भांति हमारे साथ होते हैं मगर हम अपने में मगन उनसे लाभ नहीं ले पाते हैं.


आधुनिकता, भौतिकता की दौड़ में शामिल होकर बुजुर्गों के प्रति एक तरह का उपेक्षा का भाव समाज में दिखाई देने लगा था. भले ही घर-परिवार में बुजुर्गों को यथोचित सुख-सुविधाओं का ढेर लगा दिया जाये मगर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने-जुलने, उनके साथ समय बिताने के मामले में कमी आई थी. लॉकडाउन अवधि ने परिवार के सभी सदस्यों को एकसाथ रहने पर विवश किया. इस दौरान नई पीढ़ी के लोगों ने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करती पीढ़ी ने भले ही वर्क फ्रॉम होम के द्वारा अपने काम की पूर्ति की हो मगर उंनका सम्बन्ध अपने परिजनों से बना रहा. वीकेंड जैसी शब्दावली में उनका सामना इस दौरान बाजार से नहीं बल्कि घर के लोगों से हुआ, परिवार के अनुभवी बुजुर्गों से हुआ. यह इस नकारात्मक अवधि की सकारात्मकता ही कही जाएगी.


अब जबकि लॉकडाउन के कारण घर में एकसाथ रहने पर लोगों में, विशेष रूप से आधुनिक जीवन-शैली के प्रति दीवानगी की हद तक पागल होकर भागती पीढ़ी ने भी संबंधों का, रिश्तों का महत्त्व समझा है. इस पीढ़ी को घर के बुजुर्गों के अनुभवों, उनकी शिक्षाओं, कार्यों के प्रति सजग बनाये रखने की आवश्यकता है. कोरोना का भयावह काल आज नहीं तो कल समाप्त होगा ही किन्तु इस अवधि में जिस तरह की आत्मीयता परिवारों में बनती दिखाई दी, बुजुर्गों के प्रति सकारात्मकता दिखाई दी, उसे निरंतरता दिया जाना समय की माँग है. विचार इसी बात पर किया जाना चाहिए कि घर के बुजुर्ग स्वयं को अकेला न महसूस करें. परिजनों को भी चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ अपनी जीवन-शैली को सरल बनाने में, अपने कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने में लेने का प्रयास करें. जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं जबकि व्यक्ति के सामने असमंजस की स्थिति होती है. ऐसी स्थिति में बहुत बार बुजुर्गों के अनुभव ही सहायक बनते हैं. यह हम सभी ने अनुभव कर लिया है कि आप कुछ भी क्यों न हो जाएँ मगर आपको मानसिक संबल परिजनों द्वारा ही प्राप्त होता है. ऐसे में समय के साथ इस शक्ति को बचाए रखा जाना चाहिए.


आज समय की, समाज की जैसी माँग है उसके अनुसार खुद को आधुनिक बनाना अपराध नहीं, खुद के लिए भौतिकता के संसाधनों का इस्तेमाल करना, उनका जुटाना दोष नहीं है मगर इसमें ध्यान इसका रखा जाना चाहिए कि संसाधनों के जुटाने में कहीं परिवार की असल सम्पदा तो नष्ट नहीं हो रही. घर का वास्तविक खजाना तो बेकार नहीं हो रहा.




(उक्त लेख आज, 14-12-2020 के बीपीएन टाइम्स समाचार पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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वंदेमातरम्

29 नवंबर 2020

बुन्देलखण्ड के कुछ समाचार-पत्र

कुछ साल पहले बुन्देलखण्ड में पत्रकारिता से सम्बंधित एक प्रोजेक्ट में सहयोग किया था. उस समय सम्बंधित साहित्य का अध्ययन करने और क्षेत्र के समाचार-पत्रों पर समीक्षात्मक टिप्पणी करने की दृष्टि से कुछ समाचार-पत्रों की प्रतियाँ, कुछ की फोटो-प्रतियाँ हमें देखने को मिली थीं. उनकी फोटोकॉपी हमने करवा कर रख ली थी. आज एक कागज़ खोजते समय वे सारी फोटो-प्रतियाँ देखने को मिल गईं. सोचा आपको भी उनके दर्शन करवाते चलें. 
 



































वंदेमातरम्