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27 जनवरी 2020

जन्मदिन का उपहार - (एक प्रेरक कथा)

कुछ दिनों पहले हमारी बड़ी बहिन के द्वारा whatsapp पर यह सन्देश मिला. यूँ तो दिन भर में सैकड़ों तरह के सन्देश सोशल मीडिया के माध्यम से मोबाइल पर अपनी पहुँच बनाते रहते हैं मगर इक्का-दुक्का सन्देश ही ऐसे होते हैं जो दिल को छू जाते हैं. ऐसा ही कुछ इस सन्देश ने किया. उस सन्देश को ज्यों का त्यों यहाँ आप सबके लिए, आप सबके बीच प्रसारित कर रहे हैं. पढ़िए और विचार करियेगा. 

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किन्ही अरुण कुलकर्णी द्वारा अंग्रेजी से मराठी में अनुवादित यह प्रेरक कथा मुझे प्राप्त हुई। जिसका, हिंदी भाषियों के लिए मैंने हिंदी में अनुवाद किया। मुझे पूर्ण विश्वास है कि, आप अवश्य पसंद करेंगे।
- शरद कुमार दुबे (गोंदिया, महाराष्ट्र)
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जन्मदिन का उपहार
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मैं सुचित्रा। आज मेरा जन्मदिन है।
सचिन ने सुबह ही कहा : "आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे। तुम्हारे जन्मदिन पर आज तुम्हें एक अनोखी ट्रीट मिलेगी।"
10 साल हो गए हमारी शादी को। मैं सचिन को बहुत अच्छे से जानती हूँ। जीवन के अनोखे अनुभव देना, दुनिया से अलग कुछ मजेदार करना उसकी आदत में शुमार है।
दोनों बच्चे शाम 4 बजे स्कूल से लौटेंगे यानी लंच पर मैं और सचिन ही जाएँगे और बच्चों के आने से पहले लौट भी आएँगे।
दोपहर 12 बजे हम घर से निकले।
एक नए बने मॉल की पार्किंग में हमारी गाड़ी पहुँची। पार्किंग की लिफ्ट में हम दाखिल हुए और सचिन ने 5 वीं मंजिल का स्विच दबाया।
इस मंजिल पर खाने पीने के ढेरों स्टॉल्स थे लेकिन सचिन मेरा हाथ थामे उन सारे स्टॉल्स के सामने से आगे बढ़ता गया। फाइनली एक बंद द्वार पर हम पहुँचे। द्वार पर एक बोर्ड लगा था, जिसपर लिखा था : Dialogue in the dark
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। अंधेरे में संवाद ये कैसा नाम है, रेस्टॉरेंट का?
द्वार ठेलकर हम अंदर पहुँचे। वो एक मध्यम आकार बिना चेयर टेबल्स वाला कमरा था। रिसेप्शन काउंटर के पीछे से तुरंत एक सूटबूटधारी बाहर आया और स्वागत भरे स्वर में हमसे बोला : "वेलकम मिस्टर सचिन। हैप्पी बर्थडे टू यू मैडम।"
मैं समझ गई कि सचिन पहले ही सारी व्यवस्था कर चुका है। फिर सूटबूटधारी बोला : "सर, मैडम, यू आर अवर स्पेशल गेस्ट टुडे। कहिए क्या लेंगे आप?"
उसने काउंटर पर से उठाकर एक मैनू कार्ड हमें दिया। सचिन ने कार्ड मुझे थमाया। मुझे अजीब लगा। टेबल पर बैठने से पहले ही ऑर्डर देने की प्रथा मैंने पहली बार अनुभव की। बड़ा विचित्र लग रहा था सब कुछ। मुस्कुराते हुए सचिन, मेरे चेहरे पर आते जाते भावों को पढ़ जैसे आनंदित हो रहा था। फिर मैंने ऑर्डर दिया और वह आदमी हमें कमरे के एक अन्य दरवाजे पर ले गया और उसे खोला।
सामने एक संकरा गलियारा नजर आया जिसपर 3 लोग एक साथ नहीं चल सकते थे। वो आदमी आगे बढ़ा और हम उसके पीछे। कुछ कदम बाद गलियारा दाएँ मुड़ गया। हम भी मुड़े। पीछे कमरे की जो थोड़ी बहुत रोशनी आ रही थी, वो भी खत्म हो गई। उस गलियारे में प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी। अगले मोड़ के बाद इतना अंधेरा हो गया कि, मैंने सचिन का हाथ पकड़ लिया और दूसरे हाथ को गलियारे की दीवार को महसूस करती आगे बढ़ती रही। सचिन मेरे हाथ पर दबाव बढ़ाकर जैसे मुझे सांत्वना दे रहा था। अगले मोड़ के बाद हाथ को हाथ सुझाई देना भी बंद हो गया। आँखें फाड़ फाड़कर देखने के बाद भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन हवा ठंडी और खुशबूदार थी। फिर शायद हम एक हॉल में पहुँचे।
उस आदमी ने किसी को आवाज लगाई : "संपत।"
यस सर।अंधेरे में ही जवाब मिला। फिर किसी के करीब आते कदमों की आवाज आई।
ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। आज मैडम का बर्थडे है। गिव देम स्पेशल ट्रीट। ऑर्डर मैंने ले लिया है, तुम इन्हें इनकी टेबलपर लेकर जाओ।"
यस सर।” : अंधेरे में फिर वही आवाज एकदम करीब सुनाई दी।
अब उस दूसरे आदमी संपत ने हमारे हाथ थामे और हमें टेबल पर पहुँचाया। फिर चेयर सरकाने की आवाज आई और उसने मेरा हाथ चेयर की पीठ पर रखा। वैसे ही जरूर सचिन के साथ भी किया होगा।
हम बैठ गए। मैंने सामने टेबल पर हाथ फिराया। जब टेबल ही नहीं दिख रहा तो खाना कैसे दिखेगा ? हम खाना कैसे खाएँगे ? ये सचिन की कैसी जग से निराली पार्टी है ? ये कैसा जन्मदिन का उपहार है ? ऐंसे न जाने कितने प्रश्न मेरे दिमाग में घुमड़ रहे थे। लेकिन मुझे सचिन पर भरोसा था। आज जरूर उसने मेरे लिए कुछ अलग, कुछ आश्चर्यजनक कर रखा है।
फिर कोई आया और उसने हमारे हाथ धुलवाए। फिर टेबल पर प्लेट्स आदि सजाए जाने की आवाजें आने लगीं। वेटर्स का आना जाना समझ में आ रहा था। फिर संपत ने मेरे हाथ प्लेट्स पर छुआए और उनकी पोजीशन बताई। चम्मच मेरे हाथ में पकड़ाया। फिर वो प्लेट्स में खाना सर्व करने लगा।
सबकुछ सर्व होने के बाद वो बोला : "मैंने परोस दिया है। अब आप लोग शुरू कीजिए। आपको कुछ दिखेगा नहीं लेकिन मुझे विश्वास है कि, स्पर्श और खुशबू से आपको खाने में एक अलग ही आनंद प्राप्त होगा।"
उस घनघोर अंधेरे में मैंने रोटी तोड़ी, प्लेट में रखी सब्जी को लपेटा और पहला निवाला लिया। फिर ऐसे ही अंदाज से 4-5 निवाले और खाए। उल्टे हाथ से मैंने प्लेट पकड़ी हुई थी अतः प्रत्येक पदार्थ की जगह सीधे हाथ के स्पर्श से मुझे ज्ञात हो रही थी।
और फिर आहा... अंधेरे में भी मैं बड़ी सहजता से भोजन कर पा रही थी। खाने के पदार्थ तो अपने स्वाद का मजा दे ही रहे थे लेकिन साथ ही इस अनोखे खेल में एक अलग ही आनंद की अनुभूति हम दोनों को ही हो रही थी।  सचिन ने किस पदार्थ का निवाला लिया ये मैं पूछ रही थी और ऐंसे ही सचिन मुझसे पूछता जा रहा था। कभी कभी हम दोनों का जवाब एक ही होता था तो कभी अलग। बहुत मजा आ रहा था।  उस स्याह अंधकार में, खुशबू, स्पर्श और आवाज बस यही काम कर रहे थे। बीच बीच में संपत, सब्जियाँ या अन्य कुछ और परोस देता।
हमें खुद नहीं समझ आ रहा था कि प्लेट में कौन सा पदार्थ खत्म हुआ लेकिन संपत को शायद दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, जो वो तुरंत समझ जाता और पुनः वह पदार्थ परोस देता।
आखिर में संपत स्वीट डिश लाया जो उसने हमारे हाथों में थमा दी।
मेरा जन्मदिन, अंधेरे में लंच, एक अनोखा आनंद दे गया। कदाचित कैंडल लाइट डिनर से भी अधिक आनंददायक रहा।
"आप जब, बाहर जाना चाहें तो बताइएगा। मैं आपको बाहर छोड़ आऊँगा।" संपत ने कहा।
तो सचिन बोल पड़ा : "हाँ.... हाँ.... अब चलो। बिल भी तो बाहर ही पे करना है। चलो संपत, ले चलो हमें।"
फिर संपत ने हम दोनों के हाथ थामे और हमें बाहर को ले चला। अंधेरे हॉल से बाहर निकल हम गलियारे में पहुँचे तो दूसरा खाली हाथ स्वतः ही दीवार को छूने लगा।
दो मोड़ों के बाद प्रकाश दिखने लगा और हम संपत का हाथ छोड़ उसके पीछे चलते रहे।
फाइनली रिसेप्शन काउंटर वाले रूम में हम पहुँचे। सचिन बिल देने काउंटर पर पहुँचा और संपत लौटकर गलियारे की ओर बढ़ा। उसका आभार मानने के लिए मैंने उसे आवाज लगाई तो संपत पलटा और मेरी ओर देखने लगा।
तब कमरे के प्रकाश में मैंने संपत का चेहरा देखा और मैं जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई, मेरे मुँह से हल्की चीख निकल गई क्योंकि संपत की आँखों की जगह दो अंधेरे गढ्ढे नजर आ रहे थे। वो पूर्ण रूप से अंधा था।
संपत बोला : "यस मैडम?"
मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहूँ? फिर मैंने कहा : "संपत, अपनी ऐसी हालत में भी तुमने हमारी खूब और दिलखुश सेवा की, इतनी बढ़िया खातिरदारी की। मैं ये बात सारी जिंदगी नहीं भूलूँगी।"
संपत : "मैडम, आपने जिस अंधेरे को आज अनुभव किया है वो तो हमारा रोज का ही है। लेकिन हमने उसपर विजय पा ली है। We are not disabled, we are differently able people. We can lead our life without any problem with all joy and happiness as you enjoy.”
मुझे अपने सहानुभूति पूर्ण बोले गए शब्दों पर खुद ही लज्जा आई। बिना किसी की सहानुभूति के मोहताज एक सशक्त व्यक्ति से आज सचिन ने मुझे मिलवाया। ऐसा जन्मदिन मुझे कभी नहीं भूलेगा। मुझे अभिमान है अपने सचिन पर।
सचिन बिल देकर मेरे पास आया और बिल मेरे हाथ में पकड़ाया। हमेशा सचिन को उसकी फिजूलखर्ची के चिल्लाने वाली मैंने, बिल को देखा तो मेरी नजर बिल पर सबसे नीचे लिखे प्रिंटेड शब्दों पर ठहर गई,
लिखा था : We do not accept tips, Please think of donating your eyes, which will bring light to somebody’s life.
(हम टिप्स स्वीकार नहीं करते। कृपया अपने नेत्रदान के बारे में सोचें, जो किसी के जीवन में रोशनी ले आएगा)



29 अगस्त 2018

नेत्रदान के संकल्प से समाज को रौशनी दें


एक समाचार पढ़ने को मिला कि मात्र छत्तीस घंटे जीवित रहे शिशु द्वारा दो नेत्रहीन व्यक्तियों को नेत्रदान करके रौशनी दी गई. किसी गंभीर इन्फेक्शन के चलते नवजात शिशु चंद घंटे ही इस दुनिया में रहा. उसके इलाज के भागदौड़ में लगे परिजन उसका नाम तक न सोच पाए थे. बाद में उसको दफनाये जाने के दौरान ही श्मशान घाट में उसका नामकरण कर शिवा नाम से पुकारा गया. उसी समय कुछ जागरूक समाजसेवियों की पहल पर उसके परिजनों को नेत्रदान के लिए समझाया गया. परिजनों ने उनकी बात स्वीकारते हुए नेत्रदान की प्रक्रिया पूर्ण करके नन्हे शिवा को इस संसार से भले ही अलविदा कर दिया गया हो मगर उसकी आँखों के सहारे दो व्यक्ति इस दुनिया को देख सकेंगे. इस घटना को जानने के बाद दिल-दिमाग अपने देश में नेत्रदान सम्बन्धी फैले अनावश्यक अंधविश्वासों की तरफ दौड़ गया. उस नवजात के द्वारा किये गए नेत्रदान से दो लोग ये दुनिया देख सकेंगे किन्तु अभी भी बहुत से लोग हैं जो देख नहीं सकते. कई लोग जन्म से नेत्रहीन हैं तो कुछ लोग हादसों में अपनी आंखें गंवा चुके हैं. आँखें हमें जीवित रहने के दौरान रोशनी देती ही हैं और यदि हम चाहें तो मृत्यु के बाद भी वे किसी दूसरे को रौशनी दे सकती हैं. जब भी नेत्रदान की चर्चा की जाती है तो अनेक लोग इस अन्धविश्वास में पड़ जाते हैं कि नेत्रदान के बाद वे अगले जन्म में नेत्रहीन पैदा होंगे.


विश्व के विभिन्न देशों में नेत्रदान की महत्ता को समझते हुए प्रतिवर्ष 10 जून को विश्व नेत्रदान दिवस मनाया जाता है. इसके द्वारा लोगों में नेत्रदान के प्रति जागरूकता लाने का कार्य किया जाता है. हमारे देश में भी इसके अलावा जागरूकता लाने के लिए प्रतिवर्ष 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है. हमारे देश में करीब ढ़ाई लाख लोग हैं जो कि कर्निया की समस्या से पीड़ित हैं. यदि ऐसे लोगों को किसी मृत व्यक्ति का कार्निया लगा दिया जाये तो इनको दृष्टि मिल सकती है. ऐसा उसी दशा में संभव है जबकि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान की घोषणा लिखित रूप में ना कर दे. नेत्रदान की आवश्यकता और समाज के प्रति उसके योगदान को देखते हुए यह भी प्रावधान किया गया है है कि परिजनों की इच्छानुसार किसी भी मृत व्यक्ति की आंखों को दान दिया जा सकता है, चाहे उसने नेत्रदान के लिए अपना पंजीकरण नहीं भी कराया हो. ऐसे किसी भी व्यक्ति जो नेत्रदान करने की इच्छा रखता हो, उसकी मृत्यु के छह घंटे के भीतर ही उसका कार्निया निकाल कर चौबीस घंटे के भीतर नेत्रहीन व्यक्ति को लगाया जा सकता है.

यदि राष्ट्रीय स्तर पर अन्धता सम्बन्धी आँकड़ों पर नजर डालें तो पायेंगे कि हमारे देश में प्रत्येक एक हजार व्यक्तियों में से पच्चीस व्यक्ति दृष्टिहीन हैं. यह आँकड़ा हमारे देश की बुरी स्थिति को दर्शाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि विकसित देशों में यह आंकड़ा प्रति एक हजार व्यक्तियों पर मात्र तीन व्यक्तियों का है. देश में लगभग  पचास लाख व्यक्ति कार्निया की खराबी के कारण दृष्टिहीन हैं. यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि इनमें से बहुत से लोगों को उपयुक्त इलाज ही नहीं मिल पाता है. इसके अलावा नेत्रदान करने सम्बन्धी उनको उपयुक्त कार्निया की उपलब्धता नहीं हो पाती है.


नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के सरकारी, गैर-सरकारी प्रयासों के बाद भी नेत्रदान करने वालों का आंकड़ा उत्साहित नहीं करता है. यही कारण है कि आज भी देश में पच्चीस लाख लोगों से अधिक व्यक्ति अभी भी दृष्टिहीनता का शिकार हैं. अन्धविश्वास, जागरूकता में कमी, लोगों का अपने-अपने संस्कारों के चलते नेत्रदान के प्रति सजग न होना, ग्रामीण अंचलों तक नेत्रबैंक की आसान पहुँच न होना आदि ऐसे कारण हैं इनके चलते नेत्रदान बहुत ही कम हो पाता है. इस सम्बन्ध में एक आँकड़ा चौंकाने वाला हो सकता है कि देश में प्रतिवर्ष लगभग नब्बे लाख लोगों की मृत्यु होती है जबकि नेत्रदान करने वालों की संख्या लगभग पच्चीस हजार है.

नेत्रदान के बारे में सामान्य सी जानकारी ये है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी उम्र, लिंग, रक्तसमूह और धर्म का हो, नेत्रदान कर सकता है. लेंस या चश्मे का उपयोग करने वाले व्यक्ति, जिनकी आँखों की सर्जरी हुई हो वे व्यक्ति भी नेत्रदान कर सकते हैं. बीमारी की दशा में एड्स, हेपेटाइटिस बी/सी, रेबीज, टिटनेस, मलेरिया आदि जैसे संक्रमण से पीड़ित व्यक्ति नेत्रदान नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा मधुमेह, रक्तचाप, अस्थमा आदि से पीड़ित व्यक्ति नेत्रदान कर सकते हैं. यहाँ तक कि मोतियाबिंद से पीड़ित रोगी भी नेत्रदान कर सकता है, हाँ यहाँ एक सावधानी बरती जाती है कि पानी में डूबकर मरने वाले व्यक्ति की आंखें दान नहीं की जा सकतीं हैं.

नेत्रदान एक नेक काम है. कोई भी व्यक्ति अपनी आंखें दान करके दो व्यक्तियों के जीवन में उजाला ला सकता है. आइये संकल्प लें नेत्रदान का और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें. अपने समाज के नेत्रहीन व्यक्तियों को रौशनी प्रदान करें, उनकी आँखों के सहारे इस दुनिया को आजीवन देखें.