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03 मार्च 2026

होली पर नए संकल्प

इस होलिका दहन पर अपनी
पुरानी दुश्मनी, पुराने मतभेद,
पुरानी रंजिश, पुराने विवाद,
पुरानी लड़ाई, पुराने झगड़े आदि
जला देंगे, भुला देंगे, मिटा देंगे....

+

अगले दिन से
नई दुश्मनी, नये मतभेद,
नई रंजिश, नये विवाद,
नई लड़ाई, नये झगड़े आदि
याद रखे जायेंगे, निपटाये जायेंगे....

+

#छीछालेदर_रस में भीगने वाले तैयार रहें.





23 अक्टूबर 2024

लला तुम फिरऊ न माने

कॉलेज टाइम की एक लय याद आ गई...

++++

लला के बब्बा बोले

होए

लला की दादी बोली

होए

लला की अम्मा बोली

होए

लला के बाप बोले

होए

लला बवाली से बचियो

होए

लला तुम रगड़े जैहो

होए

लला तुम फिरऊ न माने

होए

लला तुम अपनी पे अड़ गए

होए

लला तुमने अत्तई धर लई

होए

लला फिर बवाली न मानो

होए

लला वो अपनी पे आ गओ

होए

लला तुम गाली खा गए

होए

लला तुमाई कनपटी सिक गई

होए

लला तुम रगड़ के धर दए

होए

लला तुम चीं न कर पाए

होए

लला तुमाई ऐसी-तैसी

होए

लला अब जूते खैहो

होए

लला तुम अभऊँ मान जाओ

होए

लला तुम हार गए

होएएएएए

++++++++++++++

अब रगड़ाई रोज के रोज


20 जुलाई 2024

एक पौधा माँ के नाम

एक पौधा ‘माँ’ के नाम लगाकर, फ़ोटो-वीडियो बनवा कर, सोशल मीडिया में लाइव चलवा कर, हाथ-पैर फटकार कर महाशय जैसे ही आगे बढ़े वैसे ही हल्की-हल्की हवा चलने लगी. महाशय मुस्कुराए कि माँ ने पौधा स्वीकार लिया.


तभी कहीं से उड़ती हुई एक चप्पल उनकी पीठ पर पड़ी. हल्की हवा आँधी में बदलती सी लगी. आसमान में गड़गड़ाहट सी समझ आई. पलट कर अभी तुरंत लगाये पौधे की तरफ़ देखा.


पीठ पर पड़ी चप्पल की जलन, हवा की तेज़ी, बादलों की गड़गड़ाहट में जैसे ‘माँ’ की तेज आवाज़ सुनाई दी- “पौधा तो लगा दिया, पानी क्या तेरा ‘बाप’ डालेगा?”


पीठ को सहलाते हुए लपक कर पौधे में पानी डालते हुए महाशय अपने बचपन को याद करने लगे. साथ ही अग़ल-बग़ल देखते जा रहे थे कि कहीं से झाड़ू, डंडा तो आकर उन पर न चिपक जाए.

😄

#छीछालेदर_रस भरा मात्र व्यंग्य ही.

 


03 दिसंबर 2023

डाइट का छीछालेदर रस

कम खाने के बाद भी वजन लगातार बढ़ने के कारण डॉक्टर से मिलकर बताया,

डॉक्टर साहब, दिन में दो-तीन बजे क़रीब भोजन करते समय सिर्फ़ एक ही रोटी खाता हूँ फिर भी वजन लगातार बढ़ रहा है.


डॉक्टर ने कहा,

दिन भर में एक ही रोटी खाना सही नहीं. सुबह नाश्ता किया करो. अन्यथा दिक़्क़त हो जाएगी.


इस पर डॉक्टर को बताया,

नाश्ता तो करते हैं. चार अंडे का आमलेट, दो पराठे, आधा लीटर दूध. पिछली बार आपने कम रोटी खाने को बोला था तो अब एक ही खाते हैं.

 

डॉक्टर भी इस डाइट के छीछालेदर रस को समझ न सका.


11 अक्टूबर 2020

तीन रुपए की उधारी ने रोका रिश्ते का रास्ता

फिल्मों के सीक्वेल बनने के दौर में बर्थडे का सीक्वेल बनाया जाना वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है. इसके लिए सारिका को और धर्मेन्द्र को ही श्रेय दिया जाना चाहिए. आपको आश्चर्य लग रहा होगा न? लगना भी चाहिए आखिर अवसर भी ऐसा है. अमिता दीदी के स्नेहिल सान्निध्य में सारिका की बर्थडे के अवसर पर धर्मेन्द्र द्वारा सप्रेम प्रदान किया गया गिफ्ट सभी के लिए सरप्राइज बना हुआ था. इस सरप्राइज को दूर करने के लिए ही बर्थडे का सीक्वेल बनाया गया.



अब पार्टी के नाम पर जो-जो होना था वो तो हुआ ही. लज़ीज़
, सुस्वादु व्यंजन की तस्वीरें भोजनात्मक हिंसा को रोकने की दृष्टि से सार्वजनिक नहीं की जा रही हैं. बस अदरख वाली मजेदार चाय की चुस्की, वो भी कुल्ल्हड़ की सोंधी महक और स्वाद के संग, वाली तस्वीरें ही सार्वजनिक करने के अधिकार दिए गए हैं. इस चुस्की के बीच तीन रुपये की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ना, चुहलबाजी करते हुए मित्र की ससुराल में देर रात अपने बेधड़क अंदाज़ से ग्रामवासियों में अनजाना सा भय भर आना, मित्र के सम्बन्धी संग षड्यंत्रकारी विवाह के अवसर को पैदा करवाने की असफल कोशिशों के साथ न जाने कितनी-कितनी कहानियों ने ड्राइंग रूम को ठहाकों से भर दिया.




सीक्वेल को सफल बनाने में मिलनसार
, हँसमुख विवेक जी अपने जोशीले-फुर्तीले अंदाज में उसका निर्देशन करने से नहीं चूके. मुन्नू भाईसाहब और चच्चू की जुगलबंदी सदैव की तरह माहौल को जीवंत बनाती रही. राकेश द्विवेदी जी और सत्येन्द्र पस्तोर जी उसमें अपना तड़का लगाकर वहाँ की फिजाओं में बिखरती कहानियों के क्रम को और विस्तार देते रहे. शेष लोग तो फोटो में दिख ही रहे हैं, जो नहीं दिख रहे वे इस सीक्वेल में अपनी-अपनी भूमिका निभा कर निकल लिए. इसमें अपने दायित्व बोध का ईमानदारी से निर्वहन करने वाले शिवेश भाईसाहब के साथ अंकुर शुक्ला का नाम लिया जा सकता है. धर्मेन्द्र भी अपनी भूमिका को निभाते हुए गायब हो गए. उनसे अगली पार्टी में आपसे मुलाक़ात करवाई जाएगी क्योंकि अभी तो पार्टी शुरू हुई है.


अब आज की सबसे अधिक पसंद की गई कहानियों में तीन रुपए की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ पाने की कुछ चर्चा. हम सबके बीच के, सबके चहेते भाईसाहब की युवावस्था के दिन थे. उरई के प्रसिद्द व्यंजन का स्वाद उनको किशोरावस्था में लग गया था. यह व्यंजन ऐसा है जिसका आनंद बहुतायत नागरिक उठा रहे हैं और बहुत से ऐसे हैं जो दीवारों, सड़कों, कपड़ों आदि को लाल भी करने की कलाकारी दिखाते रहते हैं.


फिलहाल, आगे की मूल चर्चा. उनकी उम्र हो गई थी विवाह योग्य सो एक परिवार खोजबीन करते हुए उनके घर तक पहुँचा. अब पता नहीं उनका सम्बन्ध वहाँ नहीं होना था अथवा हम लोगों को एक मजेदार संस्मरण प्राप्त होना था सो लड़की वालों की मुलाकात सीधे उन्हीं भाईसाहब से हो गई. घर में कोई और बड़ा न होने के कारण बातचीत का अगला क्रम चलता उसके पहले ही तीन रुपये की उधारी का धमाका हो गया.


मेहमाननवाजी के क्रम में पानी वगैरह के साथ बात आगे बढ़ने से पहले ही उरई के प्रसिद्द व्यंजन को खाने की इच्छा व्यक्त की गई. उनके खुद के और उनके अभिन्न मित्र के पास न तो वह व्यंजन पुड़िया निकली और न ही उसे मँगवाने के लिए समुचित धन निकला. समुचित धन से तात्पर्य आप लोग हजार-लाख रुपयों से न लगा लीजिएगा. व्यंजनविहीन और धनविहीन जेबों को देखने के बाद घर आये हुए सम्बन्धियों ने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाल कर व्यंजन मँगवाने की आतुरता दिखाई.


बस, अब आप समझे समुचित धन. ये उस दौर की बात चल रही है जबकि व्यंजन-पुड़िया चवन्नी-अठन्नी के भाव मिला करती थी. भावी दूल्हा बनने का ख्वाब आँखों में लगभग सजा चुके भाईसाहब ने अपने किसी चेले लला को रुतबे सहित आवाज़ दी. लला प्रकट हुए तो मेहमानों की जेब से निकले पाँच रुपये भाईसाहब के हाथों से गुजरते हुए लला की हथेलियों तक पहुँच गए. भावी दूल्हे ने लला को आदेश सुनाया, दुकान पर जाकर दो रुपइया के मौनी गुटका ले अइयो और तीन रुपइया उधार हैं बे चुका दइयो.


समझ सकते होंगे आप, मेहमान के पाँच रुपयों से ही उनके लिए व्यंजन-पुड़िया (अब तो आप समझ ही गए होंगे इसे, ये है गुटखा) मँगवाना और अपने तीन रुपए उधार चुका देना संबंधों को आगे न ले जा सका. हमें तो लगता है कि बेचारे लड़की वाले यहाँ चूक कर गए. उन भाईसाहब ने जिस अधिकार से पाँच रुपयों से खातिरदारी और अपनी उधारी को निपटा दिया, वैसा अधिकार जताने वाला लड़का मिलना गौरव की बात होती उन लड़की वालों के लिए. बहरहाल, वे लोग इस गौरव से वंचित रह गए और हम लोगों को एक रोचक संस्मरण के साथ ठहाके लगाने का मौका अवश्य दे गए.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

04 अक्टूबर 2020

ईर, बीर, फत्ते की सोशल मीडिया की कहानी

एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
बीर ने कहा चलो शिकार कर आबें,
फत्ते बोले चलो शिकार कर आबें,
हमऊँ बोले हाँ चलो शिकार कर आबें.

ईर ने मारी एक चिरैया,
बीर ने मारी दो चिरैयाँ,
फत्ते मारे तीन चिरैयाँ,
और हम???? हम मारे एक चुखरिया.


हा हा हा....हा हा हा.... हा हा हा...
अबे चुप......... का समझे हो, चुखरिया मारबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.



समय बदलाईरबीरफत्ते की कहानी भी बदली. एक दिन ईरबीरफत्ते ने कुछ अलग ही कहानी गढ़नी शुरू कर दी. 


एक रहिन ईरएक रहिन बीरएक रहिन फत्तेएक रहिन हम.


ईर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
बीर कहें चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
फत्ते बोले चलो सोशल मीडिया पर आया जाए,
हमऊ कहा चलो सोशल मीडिया पर आया जाए.

ईर बनाए अपना प्रोफाइल,
बीर बनाए अपना प्रोफाइल,
फत्ते बनाए अपना प्रोफाइल,
और हम???? हम तो अभै साइनइन करबे में लगे रहे.

हा हा हा..... हा हा हा...... हा हा हा....
अबे चुप..........दूसरे की आई डी हैक कर साइन इन करबो आसान है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो कछु लिखो जाए,
बीर कहें चलो कछु लिखो जाए,
फत्ते बोले चलो कछु लिखो जाए,
हमऊ कहा चलो कछु लिखो जाए.

ईर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
बीर लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
फत्तेऊ लिखे चौकस फोटो वाली पोस्ट,
और हम???? हम लिखे खाली टाइटिल.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप..........पूरी पोस्ट पढ़ता कौन है, सबईं टाइटिलई तो देखत हैं.


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.

ईर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
बीर कहें चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
फत्ते बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ,
हमऊ बोले चलो लाइक-कमेंट तो देख लेओ.

ईर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
बीर बटोरें खूबईं लाइक-कमेंट,
फत्तेऊ ने बटोरी खूबईं लाइक-कमेंट,
और हम???? हमाई पोस्ट रह गई निपट खाली-छूँछी.

हा हा हा..... हा हा हा..... हा हा हा....
अबे चुप.......बिना लाइक-कमेंट मिले भी बराबर लिखत रहबो सरल है का?


एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते, एक रहिन हम.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

06 जुलाई 2020

मुंडी न मटके और काम भी हो जाए

कुछ लोग नमस्कार करते समय अपनी गर्दन, सिर को इतना ही हिलाते हैं कि बस उसके मन को मालूम चलता है कि नमस्कार की गई।


बेचारी गर्दन और बेचारे सिर को तो पता ही नहीं चल पाता कि उनके मालिक ने किसी को नमस्कार करने में उनका दुरुपयोग कर लिया।

जिसको नमस्कार की गई उसकी जानकारी की बस कल्पना करिए।


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

(आज मूड नहीं कुछ लिखने का, गंभीर टाइप, सो बस इतना ही... शेष कल)

21 मई 2020

वेबिनार के रूप में बन्दर को मिला उस्तरा-आईना : व्यंग्य

लॉकडाउन में कहीं आना-जाना तो हो नहीं रहा है सो दिन-रात मोबाइल, लैपटॉप की आफत बनी हुई है. शुरू के कुछ दिन तो बड़े मजे से कटे उसके बाद इन यंत्रों के सहारे दूसरे लोग हमारी आफत करने पर उतारू हो गए. सुबह से लेकर देर रात तक मोबाइल की टुन्न-टुन्न होती ही रहती है मैसेज के आने की सूचना देने के लिए. समस्या इस मैसेज की टुन्न-टुन्न से नहीं बल्कि आने वाले मैसेज से है. मैसेज भी ऐसे कि बस अभी के अभी विद्वान बना देंगे. सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर जाओ, इसी तरह का ट्रैफिक देखने को मिल रहा है. अरे लॉकडाउन में अपने घर बैठे हो तो काहे जबरिया ट्रैफिक बढ़ाने में लगे हो?


अभी भी नहीं समझे क्या? कहाँ से समझेंगे आप क्योंकि अभी बताया ही नहीं हमने कि मैसेज काहे के आते हैं. असल में दिन भर में करीब पंद्रह-बीस मैसेज आते हैं वेबिनार के. एक फॉर्म भरकर आप तैयार होकर अपने घर पर ही बैठे रहें. कहीं जाना नहीं, किसी जगह जाने की, रुकने की चिंता नहीं. समस्या तो अब पूरी तरह से तैयार होने की भी नहीं. ऊपर शर्ट अकेले डाल लो और बैठ जाओ कैमरे के सामने जाकर. शुरू में इसके बारे में जानकारी हुई तो लगा कि चलो कुछ लोगों को बैठे-बैठे समय बिताने का अवसर मिल जायेगा. इसके बाद तो जैसे-जैसे दिन गुजरने शुरू हुए तो लगा जैसे बन्दर के हाथ अकेले उस्तरा नहीं पकड़ाया गया है बल्कि उसके साथ में आईना भी थमा दिया गया है. अब आईना देख-देख कर उस्तरा घुमाया जा रहा है. ज़िन्दगी में पहली बार इस तकनीक से सामना, परिचय होने के कारण वे इसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहते हैं. इनका वश चले तो इसी तरह कोरोना को निचोड़ डालें. 


आज इसी वेबिनार (बेबी-नार नहीं) के मारे एक बेचारे मिले. वे पहले से ही अपनी नार के मारे तो थे ही अध्यापन के दौरान सेमी-नार से भी परेशान होने लगे. सेमी-नार में आनंद आने लगा और बजाय पढ़ाने के वे उसी के विशेषज्ञ बन गए. कालांतर में जब उनके बाल सफ़ेद होने लगे, घुटने कांपने लगे, चश्मे का नंबर लगातार बढ़ने लगा तो उन्हें अपने विषय का विशेषज्ञ भी मान लिया गया. अब वे सेमीनार करवाने के बजाय उसमें कुर्सी चपेट की भूमिका में आने लगे. उद्घाटन सत्र से लेकर समापन सत्र तक किसी न किसी रूप में वे मंच पर ही दिखते.

आज मिलते ही बातों-बातों में वेबिनार की चर्चा निकल आई. बस वे अपने लड़खड़ाते हत्थे से उखड़ गए. हाँफते-थूक निकालते उन्होंने वेबिनार संस्कृति को समूची सभ्यता के लिए, मान-मर्यादा के लिए, सम्मान के लिए खतरा बता दिया. उन्हें इसमें अपने जैसे बड़े-बूढ़े विशेषज्ञों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा. कुर्सी के साथ-साथ जेब में आती सम्पदा पर भी संकट आते दिखा. समाचार-पत्रों में छपने, लोकल चैनल पर चेहरे के चमकने का टोटा दिखाई दिया. उन्होंने इसे सीधे-सीधे युवाओं के द्वारा बुजुर्गों के खिलाफ साजिश बता दिया. इस कदम को बुजुर्गों के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर दिया. उनके अन्दर का सारा गुबार थूक, लार के रूप में उनके साथ-साथ आसपास वालों को भी अपने चक्रवाती तूफ़ान में लेने की कोशिश करने लगा.

उनकी हाँफी-खाँसी-थूक-लार से खुद को बचाते हुए कथित कोरोना को भी दूर किया. उनके हाँफने से प्रभावित अपने हाँफने को नियंत्रित करके हमने उनकी बातों पर विचार किया तो लगा कितनी व्यापक चिंता कर गए वे तो. अब ऊपर से मिलने वाली ग्रांट पर भी रोक लग सकती है. स्थानीय स्तर पर हनक की दम पर वसूले जाने वाले विज्ञापनों से होने वाली आय भी समाप्त हो सकती है. अनावश्यक छपाई कार्यक्रम से होने वाले अपव्यय को रोका जा सकता है. अंधा बांटे रेवड़ी, चीन-चीन के दे के आधार पर परिचितों की जेब में जाने वाले धन का रास्ता भी अवरुद्ध हो सकता है. फिर सिर झटका कि ये सब ठीक है मगर ये रोज-रोज के दर्जन भर लिंक से कौन जूझेगा? गली-गली विद्वता प्रदर्शित करने वालों से कौन, कैसे निपटेगा?

इसी निपटने में याद आयी एक और समस्या. वेबिनार के साथ-साथ उस्तरा थामे महानुभाव आपसे एक लिंक के द्वारा बस एक फॉर्म भरने का निवेदन करेंगे. इसके भरते ही और उसमें दिए गए कुछ विशेष, रटे-रटाये सवालों के जवाब देकर आप विशेषज्ञ हो जायेंगे कोविड-19 के, कोरोना के. इसके लिए आप अपने को कोरोना योद्धा भी कह सकते हैं. जिन खबरों से बचने के लिए टीवी बंद करवा दिया, समाचार-पत्र बंद करवा दिया, इंटरनेट पर भी समाचार चैनलों को, लिंक को खोलना-देखना बंद कर दिया वही विषय सिर खाने के लिए मोबाइल से झाँकने लगा है.

समझ नहीं आ रहा कि सरकार ने लॉकडाउन कोरोना संक्रमण से बचने के लिए किया है या कोरोना विशेषज्ञ बनाये जाने वालों की पैदाइश के लिए? सरकार को इस अनावश्यक टॉर्चर किये जाने को भी लॉकडाउन का उल्लंघन माना जाना चाहिए. वैसे भी उच्चीकृत मास्टर इस समय या तो मूल्यांकन कार्य में छपाई कर रहा होता या फिर घूमने में गँवाई. ऐसे में उन नवोन्मेषी वेबिनार वालों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए जो न केवल लिंक भेजने का कार्य करते हैं बल्कि असमय फोन करके लॉकडाउन की शांति भंग करने का प्रयास भी करते हैं.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

20 मई 2020

छीछालेदर रस से सराबोर सम्मान और उपाधि ले लो रे

चीनी उत्पादों के जैसे इसकी तासीर न निकली. जैसे सारे चीनी उत्पाद सुबह से लेकर शाम तक वाली स्थिति में रहते हैं ठीक उसी तरह से इस कोरोना वायरस को समझा गया था. हर बार की तरह इस बार भी चीन को समझने में ग़लती हुई और कोरोना हम सबके गले पड़ गया. कोरोना का इधर गले पड़ना हुआ उधर सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया. कहा जा रहा था कि इस आपदा में भी अवसर तलाशने चाहिए. आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश करनी चाहिए. बस, इसे गाँठ बांधते हुए बहुत से अति-उत्साही अवसर बनाने निकल आये. कुछ खाना बनाने में जुट गए तो कुछ ने जलेबी बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली.


इसके साथ ही बहुतेरे लोग ऐसे थे जो स्वयंभू रूप में कोरोना योद्धा बने युद्ध करने में लगे थे. इनका युद्ध किसी को नहीं दिख रहा था. जैसे युद्धनीति में एक कौशल छद्म युद्ध की मानी जाती है, गुरिल्ला युद्ध तकनीक मानी जाती है, कुछ ऐसा ही ये योद्धा कर रहे थे. बिना किसी की नजर में आये, बिना किसी को हवा लगने के ये युद्ध किये जा रहे थे. अब चाहे जितना छद्म युद्ध लड़ लो, चाहे जितना गुरिल्ला युद्ध लड़ लो, चाहे जितना छिपकर काम करो मगर तकनीक के आगे किसी की नहीं चलती. तकनीक से सारी गोपनीयता उजागर हो जाती है. तो इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बहुत से तकनीकबाजों ने पता लगा ही लिया कि कौन-कौन कथित योद्धा है. बस, इस खोज को उनके द्वारा उजागर भी कर दिया गया.

इन तकनीकबाजों ने सभी को अपने-अपने स्तर से सम्मानित करना शुरू कर दिया. सम्मान भी वैसा जैसे कि योद्धा थे. न योद्धा दिखाई दिए, न सम्मान करने वाले. लॉकडाउन में योद्धा अपना काम करते रहे, सम्मान देने वाले अपना काम करते रहे. उन्होंने हवा में कलाबाजियाँ दिखाईं तो इन्होंने भी कलाकारी दिखाई. इसी कलाकारी में कई कलाकार रह गए. अब जो रह गए उनके प्रति भी समाज का कुछ कर्तव्य बनता है. उनके लिए भी कुछ कलाकारी दिखाने की आवश्यकता तो है ही. यही विचार जैसे आया तो लगा कि ऐसे लोगों के हौसले को टूटने नहीं देना है. आखिर बिना किसी को भनक लगे, बिना किसी काम के योद्धा बन जाना सहज नहीं होता. तो ऐसी सहजता वालों को भी सामने लाने का दायित्व समाज का है.  


इस तरह की बात मन में आई और एक योजना बना दी गई. रह गए अदृश्य योद्धाओं को सम्मानित करने की पुनीत योजना का शुभारम्भ जल्द ही किया जाना है. इसमें योद्धाओं जैसे लोगों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सम्मानोपधियाँ देने का अति-पुनीत कार्य किया जायेगा. अब समस्या यही कि ऐसे छिपे लोगों को खोजा कैसे जाए क्योंकि तकनीकबाजों जैसी तकनीक यहाँ उपलब्ध नहीं. इसके लिए एक उपाय खोजा गया. इस योजना को सोशल मीडिया पर डाला गया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सभी तरह के योद्धा सोशल मीडिया पर उपस्थित हैं. सुस्त रूप में भी, सक्रिय रूप में भी. ऐसे में जो स्वयंभू योद्धा किसी अन्य तकनीकबाज से सम्मानित न हो सके हैं, और यदि वे सम्मानित होने के इच्छुक हैं तो ऐसे सुसुप्त जागरूक लोग अपना नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि (इसे वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया है), पता हमें भेजें. 

यहाँ विवरण भेजते समय विशेष रूप से ध्यान रखें कि अपनी कार्य सम्बन्धी जानकारी का कोई विवरण नहीं भेजना है. ऐसा करने पर आवेदन निरस्त माना जायेगा. कार्य विवरण की अपेक्षा इसलिए नहीं क्योंकि इसे किसी गुप्त तकनीक की सहायता से खोद कर निकाल कर सामने लाया जायेगा. अभी इच्छुक बस अपना सम्मान, प्रमाण, उपाधि प्राप्त करें. हाँ, किसी को यदि कोई विशेष उपाधि, सम्मान की मनोकामना है तो उसे अवश्य बताएँ.  सभी की मनोकामना पूर्ण की जाएगी. ऐसा किये जाने के पूर्व छीछालेदर रस में सराबोर सम्मान आपको ससम्मान प्रदान करने की शपथ ली जाती है. जिनको सम्मान, उपाधि प्रदान की जाएगी, उनसे भी अपेक्षा रहेगी कि वे इस कोरोना काल में लॉकडाउन समय जैसा छीछालेदर रस सदैव बहते रहेंगे.

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18 मई 2020

गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा

संभव हो आप सभी ने ये चुटकुला सुन रखा हो. अरे, सुन भी रखा हो तो एक बार सुनकर हँसने में क्या समस्या है. आखिर हम किसी एक दुःख पर को जितनी बार देखते-सुनते हैं, उदास हो जाते हैं तो एक चुटकुला कई-कई बार सुन कर हँस नहीं सकते. इधर कुछ दिनों से लोगों ने माहौल को बद से बदतर बनाने की कोशिश करनी शुरू कर दी है. बेवजह की समस्याओं का अम्बार लोगों के घरों में ठूँसना आरम्भ कर दिया है. इससे लोगों में निराशा, हताशा देखने को मिलने लगी है. बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी कहानी है. हम सबकी कोशिश इस समय छोटी-छोटी बातों से भी बड़ी-बड़ी खुशियाँ निकालने की होनी चाहिए मगर कुछ लोग हैं जो सिर्फ समस्याओं का, दुखों का, निराशा का, हताशा का ही रोना रोते रहते हैं. खैर, आगे बढ़ते हैं.


++


एक लड़का था जो ऐसी ही किसी घनघोर बंदी का शिकार हो गया और उसके बाद एक ही बात की रट लगाए रहता, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा. उसकी इस रट को दूर करने का बहुत प्रयास किया गया. कई-कई बार सेनेटाइज किया गया, कई-कई दिन के लॉकडाउन में रखा गया, क्वारंटाइन किया गया मगर नहीं उसकी यही एक रट लगातार बनी रही, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

घर वालों ने बहुत इलाज करवाया. तमाम जगह उसके सैम्पल भेजे गए मगर हर बार रिपोर्ट पॉजिटिव ही आ जाती. हर बार लगता कुछ सही हो रहा है मगर दिमागी संक्रमण फिर बढ़ जाता और वही एक बात, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

कहते हैं न कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, सो एक दिन घरवालों को एक बेहतरीन डॉक्टर का पता चल गया. मालूम चला कि उसके पास कोई इलाज है जो इस संक्रमण को ख़त्म कर सकता है. मरता क्या न करता वाली स्थिति में घरवाले उस लड़के को लेकर उस डॉक्टर के पास पहुँचे. डॉक्टर ने लड़के का पूरा मौका-मुआयना किया और फिर चौदह दिन के इलाज के बाद एकदम ठीक हो जाने का दावा किया. घर वालों को विश्वास तो न हुआ मगर यही सोचकर कि शायद लाभ हो जाये, लड़के को डॉक्टर के नर्सिंग होम में भर्ती करवा दिया.

चौदह दिन बाद घरवाले आये. डॉक्टर ने कहा कि अब आपका लड़का एकदम सही है. इसका दिमागी संक्रमण ठीक हो गया है. अब कोई समस्या नहीं.

घर वालों ने अपनी तसल्ली के लिए डॉक्टर के सामने ही इसका परीक्षण करना चाहा. उन्होंने लड़के से पूछा, अब कैसा लग रहा है?

लड़के ने जवाब दिया, अब अच्छा महसूस हो रहा है.

बहुत दिनों बाद लड़के के मुँह से किसी बात का सही जवाब मिले पर घरवाले ख़ुशी से झूम उठे न तो अभी तक वह हर बात का एक ही जवाब देता था, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

लड़का बोला, मुझे घर ले चलो.

घरवालों ने उसके ठीक होने को और जाँचने के लिए पूछा, घर जाकर क्या करोगे?

लड़का बोला, अब अपनी छूटी पढ़ाई करूँगा.

लड़के के मुँह से ऐसी बातें देख घरवालों का हौसला बढ़ा. वे बड़े खुश हुए. वे लड़के की बात को आगे पूछते जाते और लड़का जवाब देता जाता. (अब घरवालों के सवालों के बजाय सीधे लड़के की कही बातें लिखते हैं. क्योंकि जिनको ये चुटकुला मालूम है, वे बोर होने लगेंगे और जिनको नहीं मालूम वे भी बोर होंगे)


घरवालों की बातों का जवाब देते हुए लड़का बोलता रहा, खूब पढ़ाई करूँगा. उसके बाद विदेश जाऊँगा. वहाँ कोई नौकरी करूँगा या फिर अपना बिजनेस करूँगा. उससे खूब पैसा कमाऊँगा. फिर खूब बड़ा घर खरीदूँगा. बड़ी सी कार खरीदूँगा. जब सब चीजें हो जाएँगी तो फिर एक विदेशी मेम से शादी करूँगा.

घरवाले झूम-झूम जा रहे थे कि लड़का अब इतनी बातें करने लगा. पढ़ाई से लेकर शादी तक आ गया. उधर डॉक्टर भी अपने इलाज पर इतरा रहा था.

लड़के से घरवालों ने पूछा, शादी के बाद?

लड़का चुप रहा फिर बहुत धीरे से बोला, शादी के बाद पार्टी होगी. सब लोग आयेंगे. गिफ्ट लायेंगे, पार्टी करेंगे. फिर हम लोग रात को घर आ जायेंगे. उसके बाद हम दोनों सुहागरात मनाएंगे.
इसके बाद लड़का शरमाते हुए बोला, फिर कमरे की लाइट बंद कर दूंगा. उसके बाद मैं उस गोरी मेम के एक-एक करके कपड़े उतारूँगा. फिर... फिर...

घरवालों ने सोचा कि आगे की बात बताने में शरमा रहा है. उन्होंने डॉक्टर का बहुत-बहुत आभार व्यक्त किया और लड़के से घर चलने को कहा.

लड़के ने जोश में कहा, पूरी बात तो सुन लो. गोरी मेम के कपडे उतारने के बाद उसके अंडरगारमेंट्स में से इलास्टिक निकालूँगा. उससे गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

अब घरवाले भौचक्के से कभी लड़के को देखते, कभी डॉक्टर को. डॉक्टर भी अब इलाज को अगले चौदह-इक्कीस दिन बढ़ाने पर विचार करने लगा.

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कहिये, कुछ लोगों का हाल ऐसा ही है न? चाहे कितना भी इलाज करो, करवाओ मगर रट एक बात की ही मचाए हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग