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26 जुलाई 2026

ध्यान देना कि तुम्हारा कोई मित्र अकेला न हो जाए

नीट के कारण प्रोटेस्ट शुरू हुआ,

नीट पेपर लीक के चलते जान गँवाने वाले बच्चों के लिए प्रोटेस्ट किया गया,

इस्तीफ़ा भी हो गया.

 

अभी नीट का रिजल्ट आया है, सफल बच्चों को प्रवेश नहीं मिला है. NTA द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार NEET UG 2026 में कुल 11.21 लाख (11,21,185) बच्चों ने क्वालीफाई किया है. इन सभी बच्चों को MBBS में प्रवेश तो नहीं ही मिलेगा क्योंकि इसकी सीटें एक-सवा लाख के आसपास हैं.

 

अब प्रोटेस्ट समर्थक लोग सजग होकर इस तरफ़ ध्यान दें कि प्रवेश न मिल पाने के कारण कोई बच्चा अपनी जान न गँवाए. अभी पेपर लीक जैसे राक्षस ने कुछ बच्चों को निगल लिया, अब दूसरा राक्षस मुँह खोले खड़ा है. आरक्षण के चलते बहुत से योग्य बच्चे प्रवेश से वंचित होंगे, अब इनकी सुरक्षा करनी होगी, उनके आत्मबल को बढ़ाना होगा.

 

प्रोटेस्ट में उछलते, कूदते, सरकार को गाली देते, सुरक्षा कर्मियों को पीटते बच्चो…. अब अपने साथियों पर ध्यान देना. नेतागीरी करने वाले अपनी रोटियाँ सेंककर निकल लिए. ध्यान देना कि तुम्हारा कोई मित्र अकेला न हो जाए; हताश-निराश होकर कोई ग़लत कदम न उठा ले


25 जुलाई 2026

बात को समझो

आरक्षण विरोधी नेताओ, तुमको एक रास्ता दिखा दिया गया है इस उत्पाती आन्दोलन के द्वारा निकले इस्तीफे से. सरकार ने एक इशारा कर दिया है कि उत्पात के द्वारा भी समाधान हो सकता है. यदि एक इस्तीफ़ा हो सकता है तो आरक्षण भी हट सकता है. यदि नीट पेपर लीक के कारण जान गँवाने वाले बच्चों को इस्तीफ़े का आधार बनाया जा सकता है तो बहुत से प्रतिभाशाली बच्चों ने आरक्षण के कारण जान गँवाई है, इसे भी आरक्षण समाप्ति का आधार बनाया जा सकता है.

 

जंतर-मंतर के हंगामे से, इस इस्तीफे से न तो पेपर लीक की घटनाएँ रुकनी हैं, न शिक्षा व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा सुधार होने वाला है. हाँ आरक्षण को लेकर एक और आन्दोलन शुरू करने का अवसर मिल गया.

विचार करो अब पूरे घटनाक्रम पर, पिछले कुछ बयानों पर तब दिखाई पड़ेगा कि जहाँ तुम लोगों का सोचना बंद होता है, उससे कहीं आगे जाकर अगले का सोचना शुरू होता है.

 

समझे…???

 


23 जुलाई 2026

मिली भगत की आशंका

जंतर मंतर पर सीजेपी का धरना-अनशन कार्यक्रम शुरू होने के तीन-चार दिन बाद से ही हम ये विचार कर रहे थे कि यहाँ सबकुछ हो रहा है पर इनका हुल्लड़ नहीं हो रहा है. हमें इसलिए ऐसा लग रहा था क्योंकि हमारा व्यक्तिगत विचार ये है कि यह सब कुछ तमाम राजनैतिक दलों और सरकारी तंत्र की मर्जी से ही हुआ है.

 

ग़ौर करिए, अनशन करते वांगचुक को हॉस्पिटल भेजना रहा हो, संसद तक मार्च करना रहा हो आदि संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले हुआ. मिलीभगत से चलने वाले आन्दोलन से राजनैतिक शून्यता की तरफ़ जाते नेताओं को संजीवनी मिली, एथेनॉल, मंदिर चढ़ावा चोरी से लोगों का ध्यान भटका, नेता जी और चढ़ावा चोरी अभियुक्त के बीच 900 से अधिक कॉल का मामला छिप गया, दल-बदल को लेकर किसी तरह का कोई मसला न रहा, हंगामे के बीच पेपर लीक और इस्तीफ़ा भी बौना नजर आने लगा.

 

हमारे व्यक्तिगत विचार में बहुत सी बातें हैं जिन पर यहाँ की बजाय अपने ब्लॉग पर लिखेंगे. अब ये मंच जोकरों का, बददिमाग़ों का, संकुचितों का अड्डा बनता जा रहा है, जहाँ सबके सब अपनी ही व्यक्तिगत कुंठित सोच के सहारे प्रत्येक परिदृश्य को देखने लगे हैं. यदि आप लोगों ने ग़ौर किया हो तो हंगामा करने वाले नेतागीरी करते हुए पुलिस बल पर हावी हुए और पिट गए वे मासूम बच्चे जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारे जाने का ख्वाब लेकर आए थे. आंदोलनकारियों का एक मुखिया सेहत के नाम पर हॉस्पिटल में, एक बर्गर खाने के आरोप में बाहर, एक मंत्री से मिलने की बेताबी में अलग.

 

बात इतनी भी नहीं, यदि विपक्षी दल वाक़ई में कोई बदलाव चाहते तो एकजुट रहते मगर नहीं. सभी इस आन्दोलन का लाभ लेने की मंशा में एकदूसरे पर ही आरोप लगाने लगे. दो दलों ने तो इसे भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत बता दिया क्योंकि युवराज ने आकर सबको पीछे कर दिया. सोचिए आप लोग ख़ुद के व्यवहार पर. हम-आप इन राजनैतिक दलों की कठपुतली मात्र हैं. हमारी-आपकी सोच से कहीं आगे जाकर ये सोचते-काम करते हैं. ये सब एक हैं और यदि आपस में कोई दुश्मन है तो हम और आप ही.

 

विचार करियेगा.


30 मई 2026

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....

 

क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का है या लड़की?

 

क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?

 

क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों के नंबर बढ़वा देगा?

 

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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा के दौरान ही 'कुछ देख लेने' का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के साथ आते हैं.  ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं, उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.

 

किसी भी सरकार को, किसी भी व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक ग्राहक  के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं कि क्रांति हो, आन्दोलन हो, व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद, कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.

 

अपनी सोच बदलिए साहब, बिना सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो सकता है क्या?'