जंतर मंतर पर सीजेपी का धरना-अनशन कार्यक्रम शुरू होने के तीन-चार दिन बाद से ही
हम ये विचार कर रहे थे कि यहाँ सबकुछ हो रहा है पर इनका हुल्लड़ नहीं हो रहा है. हमें
इसलिए ऐसा लग रहा था क्योंकि हमारा व्यक्तिगत विचार ये है कि यह सब कुछ तमाम राजनैतिक
दलों और सरकारी तंत्र की मर्जी से ही हुआ है.
ग़ौर करिए, अनशन करते वांगचुक
को हॉस्पिटल भेजना रहा हो, संसद
तक मार्च करना रहा हो आदि संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले हुआ. मिलीभगत से चलने वाले
आन्दोलन से राजनैतिक शून्यता की तरफ़ जाते नेताओं को संजीवनी मिली, एथेनॉल, मंदिर चढ़ावा चोरी से लोगों का ध्यान भटका, नेता जी और चढ़ावा चोरी अभियुक्त के बीच 900
से अधिक कॉल का मामला छिप गया, दल-बदल को लेकर किसी तरह का कोई मसला न रहा, हंगामे के बीच पेपर लीक और इस्तीफ़ा भी बौना नजर आने
लगा.
हमारे व्यक्तिगत विचार में बहुत सी बातें हैं जिन पर यहाँ की बजाय अपने ब्लॉग पर
लिखेंगे. अब ये मंच जोकरों का, बददिमाग़ों का, संकुचितों का
अड्डा बनता जा रहा है, जहाँ सबके
सब अपनी ही व्यक्तिगत कुंठित सोच के सहारे प्रत्येक परिदृश्य को देखने लगे हैं. यदि
आप लोगों ने ग़ौर किया हो तो हंगामा करने वाले नेतागीरी करते हुए पुलिस बल पर हावी
हुए और पिट गए वे मासूम बच्चे जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारे जाने का ख्वाब लेकर आए
थे. आंदोलनकारियों का एक मुखिया सेहत के नाम पर हॉस्पिटल में, एक बर्गर खाने के आरोप में बाहर, एक मंत्री से मिलने की बेताबी में अलग.
बात इतनी भी नहीं, यदि विपक्षी
दल वाक़ई में कोई बदलाव चाहते तो एकजुट रहते मगर नहीं. सभी इस आन्दोलन का लाभ लेने
की मंशा में एकदूसरे पर ही आरोप लगाने लगे. दो दलों ने तो इसे भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत
बता दिया क्योंकि युवराज ने आकर सबको पीछे कर दिया. सोचिए आप लोग ख़ुद के व्यवहार पर.
हम-आप इन राजनैतिक दलों की कठपुतली मात्र हैं. हमारी-आपकी सोच से कहीं आगे जाकर ये
सोचते-काम करते हैं. ये सब एक हैं और यदि आपस में कोई दुश्मन है तो हम और आप ही.
विचार करियेगा.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें