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05 जुलाई 2025

शौक जिंदा है आज भी दिल में

आज, 05 जुलाई को विश्व बैडमिंटन दिवस का आयोजन किया जाता है. वर्ष 1934 में आठ संस्थापक सदस्यों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन महासंघ की स्थापना की गई. इसकी स्थापना 5 जुलाई 1934 को लंदन में हुई थी. इसके संस्थापक सदस्यों में नाडा, डेनमार्क, इंग्लैंड, फ्रांस, आयरलैंड, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स थे. कालांतर में यही संगठन बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) के रूप में जाना गया. सुखद स्थिति यह है कि आज यही फेडरेशन समूची दुनिया में प्रत्येक देश और महाद्वीप का प्रतिनिधित्व करते हुए वहाँ बैडमिंटन के प्रति सकारात्मक कदम उठा रहा है. वर्ष 2023 में फेडरेशन के द्वारा निर्णय लिया गया कि 5 जुलाई वह दिन होगा जब इसकी स्थापना के लिए सम्पूर्ण दुनिया में बैडमिंटन से सम्बंधित प्रतेक चीज़ के लिए जश्न मनाया जाएगा.

 

बहरहाल, ये तो हुई थोड़ी सी इतिहास की बात अब थोड़ी सी अपनी बात, वो भी बैडमिंटन की. बैडमिंटन का शौक बचपन से ही रहा. जैसा कि इस देश में आम चलन में है कि क्रिकेट को सभी खेलों पर वरीयता दी जाती रही है, हमारे समय में भी ऐसा ही था. इस चाल-चलन के कारण क्रिकेट भी हमारे शौक में था और नियमित खेलने वाले खेलों में भी. इस शौक और नियमितता के बाद भी बैडमिंटन को अनियमित नहीं होने दिया गया. जहाँ कहीं भी, जब कभी भी, जैसे भी मौका मिला, समय मिला, जगह मिली बैडमिंटन की उठापटक शुरू हो जाती रही. उस समय (वर्ष 1990) की बात कहें तो आज के बच्चों की तरह न तो कैरियर की टेंशन थी और न ही सर्वाधिक अंक लाने की दिमागी परेशानी. बोर्ड की परीक्षा देने के पहले तय कर लिया जाता कि शाम को कहाँ मिलना है बैडमिंटन खेलने के लिए.

 



यहाँ एक बात विशेष ये है कि उस समय शहर के प्रतिष्ठित महाविद्यालय के कोर्ट में बैडमिंटन खेलने के साथ-साथ सड़क किनारे तक बैडमिंटन खेली गई. महाविद्यालय कोर्ट में समय के साथ खिलाड़ियों की, प्राध्यापकों की भीड़ बढ़ जाने के कारण हम मित्रों को बैडमिंटन खेलने के लिए नई जगह तलाशना अनिवार्य हो गया. दिमाग दौड़ाया गया. हमारे ही मित्र मंडली के सर्वाधिक सक्रिय और अत्यधिक मिलनसार राहुल ने इस समस्या का समाधान भी कर निकाला. राहुल का निवास जिस जगह पर था वहीं बाद में विधायक-मंत्री रहे एक माननीय की खाली पड़ी जगह का सदुपयोग किया गया. राहुल सहित अभिनव, रवि, ऋषि, संदीप और हम पूरी तन्मयता से पसीना बहाते हुए अपने शौक को पूरा करते.

 

समय बीता, हम सब मित्र अपनी-अपनी पढ़ाई के लिए इधर-उधर हो गए. कॉलेज के समय में भी बैडमिंटन पर हाथ आजमाते रहे मगर किसी टूर्नामेंट में खेलने की हिम्मत न जुटा सके. इसका भी कारण हॉस्टल के अपने एक सशक्त मित्र प्रवीण का इस क्षेत्र में जबरदस्त हस्तक्षेप था. बाद में पढ़ाई के बाद के रोजगार सम्बन्धी संघर्ष के दिनों में क्रिकेट कतिपय कारणों से दूर होते-होते बहुत दूर चला गया किन्तु बैडमिंटन से मोह बना रहा, उसका शौक पूरा होता रहा. शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक और हमारे पारिवारिक सदस्य अखिलेन्द्र जी के आवास पर बने कोर्ट पर अपने बड़े भाई संजय भैया और मित्र अनुज के साथ धमाचौकड़ी मचाई जाती रही.

 



समय आगे बढ़ता रहा, हम भी आगे बढ़ते रहे और फिर एक दिन उसी आगे बढ़ने की जद्दोजहद में वहीं के वहीं रुके रह गए. रुकना भी ऐसा हुआ कि समय हमारे लिए न रुका मगर बाकी सारी गतिविधियाँ रुक गईं. न बैडमिंटन साथ रुका, न क्रिकेट साथ रुका, न समय साथ रुका बस साथ रुके रहे तो मित्र, साथ में बना रहा तो शौक. साथ में मित्र, परिजन तो कुछ रहमदिल बन भी जाते मगर शौक अन्दर ही अन्दर कचोटता, खरी-खोटी सुनाता, दुनिया जहान के उदाहरण देता और आगे बढ़ने को उकसाता रहता. कई बार लगता कि समय के साथ शौक की बात मान ली जाये मगर जिम्मेदारियाँ ने हर बार रोक लिया. कई बार लगा कि जिम्मेदारियों के साथ ही आगे चला जाये तो समय ने साथ न दिया. अपनी शारीरिक स्थिति के बाद भी उरई के एकमात्र स्टेडियम में जाकर वहाँ एक समय की माँग की गई मगर अभ्यास कराने के लिए किसी खिलाड़ी का सहयोग न मिल सका तो बात वहीं की वहीं रह गई. लगा कि सही भी है आखिर हमारे साथ आधे कोर्ट में कोई वो खिलाड़ी क्यों अभ्यास करेगा जिसे पूरे कोर्ट में अपनी प्रतिद्वन्द्वी का सामना करने उतरना है.

 

कोर्ट में भले अपने शौक को पूरा न कर सके किन्तु जब भी मौका मिला अपनी बिटिया रानी अक्षयांशी के साथ छत पर दो-दो हाथ करके मन को तसल्ली दे ली, दिल को दिलासा दे ली. बस, इसी बात के साथ स्टेडियम आज भी जाते हैं, यहाँ के बैडमिंटन क्लब का हिस्सा बने हैं. खिलाड़ियों के जीतने पर उनको प्रोत्साहित करते हैं. कभी-कभी किसी परिचित के महँगे रैकेट से दो-चार हाथ चला लेते हैं. दीर्घकालिक समस्या के साथ अपने शौक को अल्पकालिक रूप में पूरा करके संतुष्टि का एहसास कर लेते हैं. बहरहाल, विश्व बैडमिंटन दिवस की सभी खिलाडियों को शुभकामनायें.

 

12 अगस्त 2024

आक्रामकता और यंत्रणा से जूझते खिलाड़ी

लगभग तीन सप्ताह तक चला पेरिस ओलम्पिक बहुत सारे खिलाड़ियों के लिए खुशियों की बारिश लाया तो बहुत से खिलाड़ियों के लिए निराशा का पल. भारतीय खिलाड़ियों के सन्दर्भ में सभी की अपनी-अपनी दृष्टि है, अपना-अपना नजरिया है. 117 खिलाड़ियों और 140 अधिकारियों-सहायकों की टीम की कुल सफलता मात्र छह पदक प्राप्त करना ही रही. अनेक भारतीय खिलाड़ी पदक की दौड़ में बहुत जल्दी बाहर हो गए, कुछ खिलाड़ी अपना बेहतर प्रदर्शन करते हुए पदकों की दौड़ में भले बने रहे मगर अंतिम रूप से पदक प्राप्त नहीं कर सके.

 

निस्संदेह ओलम्पिक जैसा खेल आयोजन जबरदस्त प्रतिस्पर्धात्मक होने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक दबाव पैदा करने वाला होता है. किसी भी स्पर्धा के अंतिम-अंतिम क्षणों तक खिलाड़ी को अपनी ऊर्जा, अपनी शक्ति, अपना विश्वास बनाये-बचाए रखना ही उसे विजयी बनाता है. देखा जाये तो अब ओलम्पिक ही नहीं किसी भी खेल आयोजन में किसी भी खिलाड़ी के लिए ऊर्जा, विश्वास, संयम बनाये रखना एक चुनौती है. जिस तरह से पढ़ते-सुनते आये हैं कि खेल आपस में समन्वय बढ़ाते हैं, एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देते हैं, सहयोगी भावना का विकास करते हैं वैसा अब बहुत कम या कहें कि न के बराबर देखने को मिलता है. अब खिलाड़ियों में आपस में सहयोग, समन्वय, मैत्री-भाव से ज्यादा शत्रुता, कटुता का भाव देखने को मिलता है. उनके अन्दर विजयी होने की मानसिकता इस कदर हावी है कि वे साथी प्रतिद्वन्द्वी खिलाड़ी का अहित करने से भी नहीं चूकते हैं. इसी पेरिस ओलम्पिक में भारतीय महिला पहलवान निशा दहिया को मैच के दौरान लगी चोट इसी नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता का उदाहरण है. कुश्ती, मुक्केबाजी सहित अनेक खेलों में खिलाड़ियों के बीच अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह आक्रामकता, वैमनष्यता नजर आने लगी है.

 



खेलों में विजयी होने की भावना उचित है मगर विजयी होने के लिए, पदक, ट्रॉफी, सम्मान आदि पाने की चाहत में नकारात्मक प्रतिस्पर्धा ने खेल भावना को ठेस पहुँचाई है. सिर्फ और सिर्फ जीतने की भावना ने खिलाड़ियों को भी यातना, यंत्रणा के दौर से गुजरने को मजबूर किया है. विभिन्न खेलों के कोच द्वारा, ट्रेनर द्वारा अपने खिलाड़ियों को कठिन से कठिनतम अभ्यास करवाए जाने की खबरें समय-समय पर देखने-सुनने को मितली रही हैं मगर इस ओलम्पिक में खिलाड़ियों की शारीरिक, मानसिक यंत्रणा का उदाहरण देखने को मिला. कुश्ती प्रतिस्पर्धा में भारत की महिला पहलवान विनेश फोगाट को फाइनल में सौ ग्राम वजन अधिक होने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया. दो किलो वजन को कम करने के लिए फोगाट रात भर जागकर कसरत करती रहीं, यहाँ तक कि उन्होंने अपना खून भी निकलवाया. यह किसी खिलाड़ी द्वारा अथवा उसके कोच द्वारा एक तरह की यातना है. सेमीफाइनल जीतने के बाद फोगाट ने न कुछ खाया और न ही पानी पिया. रात भर कसरत करने, कुछ न खाने-पीने, खून निकलवाने का दुष्परिणाम यह हुआ कि फोगाट को निर्जलीकरण की स्थिति में अस्पताल में भर्ती करवाया गया.

 

ये दो उदाहरण उस मानसिकता की बानगी भर हैं, जिसमें कोई खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ जीतना चाहता है. वह अपने विरोधी खिलाड़ी को चोट पहुँचाकर जीत रहा है अथवा खुद को शारीरिक-मानसिक कष्ट देकर, इसका उसके लिए कोई अर्थ नहीं. सोचने वाली बात है कि नेहा दहिया को इस तरह की चोट लग जाती कि उनका हाथ, कंधा सदैव के लिए काम करना बंद कर देता तो क्या इसे विरोधी खिलाड़ी की खेल भावना, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कहा जाता? क्या पदक वाकई इतना महत्त्वपूर्ण था कि उसके लिए विनेश फोगाट ने खुद को जोखिमपूर्ण स्थिति में डाला? जीतने के प्रति, पदक के प्रति, सम्मान के प्रति एक तरह की जिजीविषा अवश्य होनी चाहिए मगर उसके लिए आक्रामकता, हिंसात्मक रवैया, बैर-भाव जैसी मानसिकता अपनाने की आवश्यकता नहीं. खेलों के द्वारा स्वस्थ समाज बनाने की परिकल्पना रखने के बाद भी खेलों को, खिलाड़ियों की आपसी स्पर्धा को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे किसी रण में जा रहे हों. ‘महासंग्राम’, ‘क्रिकेट का विश्वयुद्ध’, ‘खिलाड़ियों के बीच जंग’ आदि शब्दावली का उपयोग किया जाना ऐसा लगता है जैसे दो देशों अथवा दो खिलाड़ियों के बीच खेल नहीं बल्कि युद्ध चल रहा हो.

 

खेल में आक्रामकता किसी भी शारीरिक, मौखिक व्यवहार से जुड़ी होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य विरोधी को चोट पहुँचाकर विजय प्राप्त करना होता है. आक्रामकता यदि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के चलते हो तो उससे खिलाड़ी को, खेल भावना को ठेस नहीं पहुँचती है मगर जब यह नकारात्मक रूप में अपनाई जाती है तो इसके नुकसान खेल और खिलाड़ी ही उठाते हैं. आज आवश्यकता इसकी है कि कोच, अधिकारी और खिलाड़ी निष्पक्ष खेल भावना को बढ़ावा दें, खेल के नियमों का सम्मान करें, विरोधी खिलाड़ी के प्रति सद्भाव बनाये रखें. यदि इस तरह का अनुशासन खिलाड़ियों द्वारा नहीं अपनाया जाता है तो निश्चित ही खेलों, खेल भावना को ही क्षति पहुँचेगी और इसका खामियाजा खिलाड़ियों को ही उठाना पड़ेगा.

  


07 फ़रवरी 2024

हमारी परिचित का लॉन टेनिस का मैच

लॉन टेनिस तो आज भी उसी तरह से चल रहा है जैसा कि नब्बे के दशक में चला करता था, इक्का-दुक्का मैचों की अधिकता हो गई हो तो कह नहीं सकते. लॉन टेनिस के साथ-साथ एक क्रिकेट ही ऐसा खेल हुआ करता था, जिसे हम पूरी निष्ठा, ईमानदारी के साथ न केवल खेला करते थे बल्कि उन दिनों में होने वाले मैचों के बारे में पर्याप्त जानकारी रखा करते थे. यहाँ उन दिनों का तात्पर्य नब्बे के दशक से ही है. उस दौर में क्रिकेट के प्रति ये दीवानगी थी कि शायद कभी पढ़ने के लिए सुबह पाँच बजे न उठे हों मगर क्रिकेट खेलने के लिए इस समय जबरदस्त चैतन्य भाव रहता था. घर के सदस्य जाग न जाएँ इस कारण से ‘पिन ड्रॉप साइलेंस वाली अवधारणा का पूरी शिद्दत से पालन किया जाता था. 




बहरहाल, क्रिकेट के प्रति जिस कदर मुहब्बत थी, वो उसी अनुपात में घृणा में बदल गई. ये घृणा क्रिकेट मैच देखने के सन्दर्भ में है. जिस समय हैन्सी क्रोनिये और अन्य लोगों सहित मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया, उसके बाद से आज तक एक भी क्रिकेट मैच हमने नहीं देखा है. आज भले लोग कहते हैं कि सट्टाबाज़ी करना आसान नहीं रह गया है, सब तरफ से खिलाडियों पर नजर रखी जा रही है, टेक्नोलॉजी बदल गई है. हमारा आज भी पूरे विश्वास के साथ मानना है कि जिस तरह से क्रिकेट खेलने का अंदाज बदला है, उसी तरह से सट्टे का भी अंदाज बदला है. जिस तकनीक ने क्रिकेट को बदल दिया है तो वही तकनीक सट्टे को नहीं बदल सकती?


क्रिकेट की दीवानगी की तरह उस समय लॉन टेनिस के प्रति भी दीवानगी हुआ करती थी. इस दीवानगी के लिए सिर्फ और सिर्फ दो-तीन खिलाडी ही जिम्मेवार हुआ करते थे. इनमें एक खिलाडी स्टेफी ग्राफ, दूसरी खिलाडी गैबरीला सबातीनी, एक आंद्रे अगासी. उन दिनों, जबकि हम हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे तब भी कोशिश होती थी कि इन खिलाड़ियों का कोई मैच न छूटने पाए. उस समय एक कोई मैच स्टेफी ग्राफ का था, शायद कोई फाइनल मैच था. हॉस्टल का टीवी ख़राब पड़ा हुआ था, इस कारण वहाँ मैच देख पाना संभव नहीं था. आज के हजारों हजार चैनल के बीच यह आश्चर्य का विषय ही है मगर उन दिनों कुछ-कुछ मैचों का प्रसारण हुआ करता था. फिलहाल, हॉस्टल के टीवी पर तो स्टेफी ग्राफ के मैच के दर्शन होने न थे तो उसी शहर में रह रहे अपने चाचा जी के घर पहुँच गए. बात की बात में चाची ने कुछ कहा तो हमने कहा कि हमारी परिचित का मैच है, वही देखने आये हैं. इसके बाद तो न केवल चाची जी बल्कि हम भी जबरदस्त ठहाके लगा-लगा के दोहरे हो गए.




आज भी कभी-कभी समय निकाल कर लॉन टेनिस के मैच देख लेते हैं. नए-नए खिलाडियों ने तो मैचों का अंदाज बदल रखा है मगर उस दौर के खिलाड़ियों का अपना ही क्रेज था. संभव है कि आज की जबरदस्त फास्ट पीढ़ी को वे मैच कुछ स्लो समझ आएँ मगर हम तो इंटरनेट की सहायता से कभी-कभी उन मैचों को देखकर रोमांचित हो लेते हैं. आखिर हमारी परिचित के मैच जो होते हैं वे. 








 

19 नवंबर 2023

क्रिकेट को लेकर दिमागी उलझन न पालें

पिछले कई दिनों से बहुसंख्यक भारतीय जनमानस पर चढ़ा क्रिकेट बुखार बिना किसी दवाई के आज उतर गया. विश्वकप के इस फाइनल में यदि भारतीय क्रिकेट टीम की जीत होती तो यह बुखार सिर चढ़कर बहुत दिनों तक समूचे भारत को पागल किये रहता. इस पागलपन से बचने का हाल-फिलहाल तो कोई उपाय नजर आता नहीं है क्योंकि अब वो समय नहीं रहा जबकि क्रिकेट के मैच यदा-कदा हुआ करते थे. अब तो हर दूसरे-चौथे दिन किसी न किसी प्रतियोगिता का आयोजन होता रहता है और लगभग पूरे साल क्रिकेट का पागलपन, बुखार बहुतायत लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. इस बुखार में एक जीत जहाँ खिलाड़ी को भगवान बना देती है वहीं अगले ही दिन एक हार उसी खिलाड़ी को राक्षस भी बनाती है. ऐसी स्थिति को सिवाय पागलपन के और कुछ नहीं कहा जा सकता है.




क्रिकेट के इस पागलपन के दौर में एक बात समझने लायक है और जिसे कोई भी क्रिकेट-प्रेमी समझने को तैयार नहीं होता कि क्रिकेट अब महज खेल नहीं रह गया है. क्रिकेट को समझने के लिए उसके गणित को समझना होगा. जिस तरह दस तक पहाड़ा याद कर लेने वाले को, सौ तक की गिनती याद कर लेने वाले को गणितज्ञ नहीं कहा जाता, उसी तरह क्रिकेट के मैच देखने वाले को क्रिकेट का महारथी नहीं कहा जा सकता. आप में से कितने इस तथ्य को जानते हैं कि भारतीय क्रिकेट टीम भारत देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती है? यह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत दिसम्बर 1928 में गठित एवं पंजीकृत निकाय (ट्रस्ट) है. सो कम से कम किसी एक ट्रस्ट को देश के नाम से, उसकी प्रतिष्ठा से न जोड़ें.


आये दिन किसी न किसी खिलाड़ी के देवत्व को स्थापित करते हुए बताया जाता है कि उस खिलाड़ी के अति-निकट परिजन की मृत्यु के बाद भी वो देश के लिए मैच खेलने आया. एक बात समझिये, जो टीम ही देश की नहीं बल्कि एक ट्रस्ट की है उसका कोई खिलाड़ी देश के लिए कैसे खेलने आ सकता है? वह देश के लिए नहीं बल्कि उस ट्रस्ट के लिए खेलने आता है. दूसरी बात, वह किसी देश भावना से नहीं बल्कि ट्रस्ट के साथ हुए समझौते, विज्ञापन कंपनियों के साथ हुए करारनामे के बंधन में जकड़े होने के कारण खेलने आता है. एक अनुबंध के बाद करोड़ों की कमाई करने वाले खिलाड़ी का एक मैच न खेलना उसे आर्थिक चोट ही नहीं पहुँचायेगा बल्कि उसके कैरियर को भी बर्बाद कर देगा. (इसे कपोलकल्पना न मानिये. इसी विश्वकप की एक टीम श्रीलंका को ICC ने निलंबित कर दिया है. जानते हैं क्यों? नहीं जानते तो गूगल पर सर्च कर लीजिये, हाल का मामला है, पूरा का पूरा दिया गया है.) जहाँ पूरी की पूरी टीम का कैरियर ख़राब कर दिया गया है वहाँ एक अकेले व्यक्ति/खिलाड़ी की क्या औकात


और भी बहुत सी बातें हैं मगर बुखार उतरने के बाद आराम करने की आवश्यकता होती है, सो आराम करिए. इसी आराम की घड़ी में अपने परिवार के बच्चों को समझाइये कि ये महज खेल है जहाँ एक सट्टे में, एक विज्ञापन में महान से महान खिलाड़ी बिक जाता है. इसी क्रिकेट के तथाकथित भगवान और उनके कथित अवतार भी इस सट्टे के सामने घुटने टेक चुके हैं. इस क्रिकेट का या किसी भी खेल का उसी तरह आनंद लें जैसे कि किसी फिल्म का लेते हैं, गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों के साथ लेते हैं. अनावश्यक दिमागी उलझन लेंगे तो आप नहीं आपके परिवार के बच्चों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा. लिख लीजिये इस बात को. 





 

27 सितंबर 2023

एशियाड और भारतीय खेल मेधा

इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि क्रिकेट के नशीले तूफ़ान ने बहुत सारे खेलों को लोगों के मन-मष्तिष्क से मिटा दिया है. इसकी अतिशय लोकप्रियता का आलम ये है कि उसका कोई भी संस्करण कहीं भी हो रहा हो, नागरिक पागलपन की हद तक उसे देखता है. क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के प्रति अरुचि को वर्तमान में सहज रूप में देखा जा सकता है. इस समय चीन के हांगझोऊ में एशियाई खेल 2023 का आयोजन हो रहा है मगर इस बारे में नागरिकों के बीच वैसी चर्चा, बहस, विमर्श नहीं दिख रहा जो क्रिकेट आयोजन के दौरान दिखता है. जिस दौर में एशियाई खेलों के बारे में जानने की रुचि लोगों में नहीं है, उस दौर में यह कल्पना करना भी कठिन है कि लोगों को एशियाई खेलों के जनक के बारे में जानकारी होगी. यह आश्चर्य का विषय हो सकता है किन्तु सत्यता यही है कि एशियाई खेलों के जनक भारत के शिक्षाविद और खेल प्रशासक गुरुदत्त सोंधी थे. उन्होंने ही सबसे पहले ओलंपिक खेलों की तरह से एशियाई खेलों के आयोजन का विचार रखा. परिणामस्वरूप सन 1950 से ओलम्पिक खेलों की तरह प्रत्येक चार वर्ष में आयोजित किये जाने वाले एशियाई खेलों की योजना तैयार की गई. इस योजना का व्यावहारिक रूप अगले ही वर्ष 1951 में पहले एशियाई खेलों के रूप में दिखाई पड़ा. 




एशियाई खेलों का आयोजन एशियाई ओलम्पिक परिषद द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक परिषद की देख-रेख में किया जाता है. इसमें केवल एशिया के विभिन्न देशों के खिलाड़ी भाग लेते हैं. यह गर्व का विषय है कि पहले एशियाई खेलों का आयोजन भारत कि राजधानी नई दिल्ली में किया गया था. पहले आयोजन के 1951 में संपन्न होने के बाद दोबारा वर्ष 1982 में इनका आयोजन नई दिल्ली में ही किया गया था. पहले एशियाई खेलों के आयोजन में भारत सहित कुल ग्यारह देशों ने भाग लिया था. शेष दस देशों में अफगानिस्तान, नेपाल, बर्मा (वर्तमान म्यांमार), सीलोन (वर्तमान श्रीलंका), जापान, इंडोनेशिया, सिंगापुर, ईरान, फिलीपींस और थाईलैंड शामिल थे. इस पहले आयोजन में मात्र छह खेलों- एथलेटिक्स, बास्केटबॉल, फुटबॉल, साइकिलिंग, एक्वेटिक्स और वेटलिफ्टिंग को शामिल किया गया था. इन छह खेलों की 57 स्पर्धाओं में इन ग्यारह देशों के कुल 489 एथलीटों ने विभिन्न पदकों के अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी.


पिछले कुछ समय से भारतीय खिलाड़ियों, विशेष रूप से एथलीटों द्वारा शानदार प्रदर्शन किये जा रहे हैं. उनके द्वारा वैश्विक स्तर पर अनेक प्रतियोगिताओं में पदक भी हासिल किये जा रहे हैं. अनेक खिलाड़ी तो विश्व स्तरीय सूची में सर्वोच्च स्थान पर भी हैं. ऐसे सुनहरे समय में भारत की तरफ से 634 खिलाड़ियों द्वारा 38 स्पर्धाओं में चुनौती पेश की जाएगी. इतनी बड़ी संख्या में खिलाड़ियों के उतारे जाने के बाद भी भारतीय दल पदकों की संख्या सौ पार कर लेने की उम्मीद लगाए है. इसका कारण 2018 में जकार्ता में आयोजित एशियाड में भारतीय पदकों की संख्या है. यहाँ भारतीय दल ने 15 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 69 पदक हासिल किये थे. पदकों की संख्या के हिसाब से यह भारत का सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन है. स्वर्ण पदक की दृष्टि से खिलाड़ियों का सर्वोच्च प्रदर्शन 1970 में बैंकाक में आयोजित एशियाड में रहा, जबकि उन्होंने 25 स्वर्ण पदक हासिल किये थे. इसे भारतीय खेल मेधा का असम्मान कहा जाये या दुर्भाग्य कि इतनी बड़ी जनसंख्या के बाद भी हम अपने लिए ही सर्वाधिक पदक पाने की उम्मीद लगाए हैं, न कि उच्च स्थान पाने की.


अभी तक आयोजित हुए एशियाई खेलों में कभी भी भारत पहले स्थान पर नहीं आया है. पहले एशियाई खेलों में वह दूसरे स्थान पर और चौथे एशियाई खेलों में तीसरे स्थान पर रहा था. शेष में उसका प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है. एशियाड के अठारह आयोजनों के पदक और स्थान सम्बन्धी इतिहास में अभी तक सिर्फ जापान और चीन का ही एकछत्र साम्राज्य रहा है. पहले एशियाड 1951 से लेकर आठवें एशियाड 1978 तक पहले स्थान पर जापान का दबदबा रहा. इसके बाद नौवें एशियाड 1982 से लेकर अठारहवें एशियाड 2018 तक चीन पहले स्थान पर बना रहा.


भारतीय खिलाड़ियों से भले ही सौ से अधिक पदक लाने की उम्मीद लगाई जा रही हो मगर सरकार को, सम्बंधित अधिकारियों को, नागरिकों को अपनी-अपनी जिम्मेवारी को गम्भीरता से समझने की आवश्यकता है. किसी एक खेल के प्रति दीवानगी का दुष्परिणाम है कि आज अन्य खेलों में उत्कृष्ट खिलाड़ियों की संख्या उँगलियों पर गिनने योग्य भी नहीं है. अरबों की आबादी में मात्र सौ पदकों की उम्मीद रखना घनघोर निराशाजनक स्थिति है. समय के साथ इसे बदलने की आवश्यकता है.

 

 





 

10 जून 2023

मनोभाव आपस में बाँटते रहें

पिछले दिनों एक कहानी सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है. इसमें एक तैराक को उसके कोच द्वारा बचा लेने का चित्रण किया गया है. पोस्ट को आगे लिखने-पढ़ने के पहले उस कहानी पर निगाह डाल ली जाये. कहानी कुछ इस तरह से है कि


अनीता अल्वारेज, जो अमेरिका की एक पेशेवर तैराक हैं, ने वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान परफॉर्म करने के लिए स्विमिंग पूल में जैसे ही छलांग लगाई, वो छलांग लगाते ही पानी के अंदर बेहोश हो गई. जहाँ पूरी भीड़ सिर्फ़ जीत और हार के बारे में सोच रही थी वहीं उसकी कोच एंड्रिया ने देखा कि अनीता एक नियत समय से ज़्यादा देर तक पानी के अंदर है. एंड्रिया पल भर के लिए भूल गई कि वर्ल्ड चैंपियनशिप प्रतियोगिता चल रही है. एक पल भी व्यर्थ ना करते हुए एंड्रिया ने प्रतियोगिता के बीच में ही स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी.


वहाँ मौजूद हज़ारों लोग कुछ समझ पाते तब तक एंड्रिया पानी के अंदर अनीता के पास थी. एंड्रिया ने देखा कि अनीता स्विमिंग पूल में बेहोश पड़ी है. ऐसी हालत में वो ना हाथ पैर चला सकती ना मदद माँग सकती. एंड्रिया ने अनीता को जैसे बाहर निकाला, मौजूद हज़ारों लोग सन्न रह गए. एंड्रिया ने अनीता को तो बचा लिया.




इस कहानी के बाद इससे जुड़ी दार्शनिकता को, सामाजिकता को सबके बीच चर्चा के लिए छोड़ दिया गया. कहा गया कि एंड्रिया ने अनीता को बचा लिया और हम सबकी ज़िंदगी में बहुत बड़ा सवाल छोड़ दिया! सवाल यह कि हम में से बहुत सारे लोग किसी न किसी रूप में परेशान होकर एक तरह से डूब ही रहे हैं. विशेष बात यह है कि कौन हमारा कोच है जो हमारे बिना बताये, बोले हमें बचाने के लिए आ जाता है.


देखा जाये तो वाकई सवाल बहुत बड़ा है किन्तु इसी सवाल के पीछे एक सवाल और छिपा है कि हम में से कितने लोग ऐसे हैं जो अपने मिलने वालों से, अपने माता, पिता, भाई, बहिन, दोस्त से कुछ भी नहीं छिपाते हैं? उनके साथ सारी बातें बाँटते हैं? जिस कहानी को सोशल मीडिया में एक आदर्श की तरह रखकर किसी कोच को बनाने की बात कही जा रही, उसी कहानी के आलोक में यह भी समझना होगा कि उस कोच और खिलाड़ी के बीच समन्वय, सामंजस्य के बीच किसी तरह का कोई संशय नहीं होगा. पल-पल की स्थिति, उसके आगे की परिस्थिति का आकलन वे दोनों एकसाथ कितनी बार किये होंगे. सामाजिक, पारिवारिक वातावरण में अब ऐसी स्थिति देखने को बहुत कम मिल रही है जहाँ कि लोग अपनी बात को, अपनी परेशानी को, अपनी समस्या को अपने अभिन्न कहे जाने वाले के साथ बाँट रहे हों. आखिर जब तक दो लोगों के बीच आपस में समन्वय नहीं है, वैचारिक सामंजस्य नहीं है, एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की मानसिकता नहीं है तब तक कहानी के कोच और खिलाड़ी जैसा सम्बन्ध मिलना मुश्किल है. 





 

05 दिसंबर 2021

अपने अन्दर के खिलाड़ी को चहकते, उल्लासित होते देखा

जनपद जालौन रचनात्मकता में सदैव आगे रहा है. किसी न किसी रूप में यहाँ की रचनात्मकता सभी आयु वर्ग के माध्यम से चारों तरफ बिखरती रहती है. संस्कृति, साहित्य, कला, संगीत, लेखन, अध्यापन, अध्ययन, पत्रकारिता, खेलकूद, राजनीति, समाज सेवा, व्यापार आदि कोई भी क्षेत्र क्यों न रहा हो यहाँ के सभी नागरिकों ने उसमें रचनात्मकता का परिचय दिया है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस रचनात्मकता में बुजुर्ग आगे रहते हैं या फिर युवा. ये भी नहीं कहा जा सकता कि महिलाएँ आगे हैं या फिर पुरुष. इस बारे में भी कोई निश्चित मानदंड नहीं कि शहरी क्षेत्र के नागरिक आगे रहते हैं या फिर ग्रामीण क्षेत्र के. जनपद की किसी एक तहसील अथवा किसी एक स्थान को ही इसमें महारथ हासिल नहीं बल्कि जब जिसको अवसर मिलता है वह रचनात्मकता को प्रदर्शित कर देता है.


बहुत लम्बी समयावधि बाद ऐसा हुआ होगा जबकि लगभग दो वर्ष का समय बिना किसी सकारात्मक अभिव्यक्ति के गुजर गया. इसके पीछे एक तरफ कोरोना काल के समय लगाया गया लॉकडाउन तो था ही, दूसरी तरफ नागरिकों की सुरक्षा भी सर्वोच्च पायदान पर थी. हालाँकि देखा जाये तो इस कोरोना काल में भले ही साहित्यिक अथवा सांस्कृतिक रचनात्मकता देखने को न मिली हो मगर सामाजिक क्षेत्र में व्यापक रूप से सकारात्मकता देखने को मिली. बहरहाल, लम्बी समयावधि पश्चात् जनपद के एक सक्रिय युवा ने रचनात्मकता को सामने लाने की पहल की. इस पहल को आरम्भ में कुछ राजनैतिक रास्तों से गुजरना भले पड़ा हो मगर इस रचनात्मक पहल के द्वारा जनपद के युवा खिलाड़ियों में उत्साह देखने को मिल रहा है.




जनपद के सक्रिय युवा सुदामा दीक्षित द्वारा कालपी तहसील के अंतर्गत आटा कस्बे में ‘कालपी प्रीमियर लीग के द्वारा क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया जा रहा है. इस लीग में दिन के साथ-साथ रात को कृत्रिम दूधिया रौशनी में भी क्रिकेट मैचों का आयोजन किया जा रहा है. लगभग तीन सौ से अधिक क्रिकेट टीमों ने इसमें भाग लिया है. विशालकाय मैदान के बाहर चार बड़े-बड़े पोल के द्वारा आधिकारिक तरीके से फ्लड लाइट की स्थायी व्यवस्था करवाई गई है.





आज दिनांक, 05 दिसम्बर को हमें भी अपनी बिटिया अक्षयांशी के साथ इन मैचों को देखने का अवसर मिला. सोशल मीडिया के द्वारा इस आयोजन के बारे में वीडियो, चित्र आदि देखने को मिल जाते थे, उससे इसकी भव्यता के बारे में अंदाजा लग रहा था. आज जब स्वयं इसमें उपस्थित होकर देखा तो इस रचनात्मकता पर सुखद एहसास हुआ. एक मैच के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को सम्मानित करने का अवसर मिला. दूसरे मैच के लिए सहभागिता करने आई टीम के खिलाड़ियों को लीग से सम्बंधित ड्रेस प्रदान करने का मौका भी मिला. इसी के साथ-साथ बिटिया रानी को कृत्रिम दूधिया रौशनी में आरम्भ होने वाले एक मैच के लिए टॉस करने का अवसर देकर उसे भी खेल के प्रति, खिलाड़ियों के प्रति प्रोत्साहित किया गया. इस आयोजन में आज सहभागिता करके अपने कॉलेज के दिन याद आ गए. अपने अन्दर के खिलाड़ी को आज फिर चहकते, उल्लासित होते देखा. 


जनपद के एक छोटे से कस्बे में बड़ी सी रचनात्मकता सुखद माहौल में आगे बढ़ रही है. आसपास के ग्रामीण अंचलों के खिलाड़ियों में ऊर्जा भर रही है, उनको खेल के प्रति प्रोत्साहित कर रही है. इस आयोजन, कालपी प्रीमियर लीग (के.पी.एल.) के लिए सुदामा दीक्षित सहित उनके सभी सहयोगियों को शुभकामना, बधाई. 





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29 अगस्त 2021

पैरालम्पिक खेलों के बारे में सामान्य जानकारी

टोक्यो ओलम्पिक के बाद इस समय टोक्यो पैरालम्पिक चर्चा में है. ये और बात है कि ओलम्पिक की तरह मीडिया में इनको बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिल पा रहा है मगर हमारे देश के खिलाड़ी लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करके पैरालम्पिक खेलों की तरफ जनसामान्य का ध्यान खींच रहे हैं. पैरालम्पिक खेल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिता है. इस प्रतियोगिता में मुख्य रूप से वे खिलाडी सहभागिता करते हैं जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दिव्यांग (विकलांग) की श्रेणी में आते हैं.  


यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो जानकारी मिलती है कि पैरालंपिक खेलों को दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था. सन 1948 में दूसरे विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल चोट को ठीक करने के लिए न्यूरोलोजिस्ट गुडविंग गुट्टमान ने रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए खेलों का चयन किया. उस समय इन खेलों को अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स के नाम से पहचान मिली थी. कालांतर में सन 1960 में रोम में पहले पैरालम्पिक खेल हुए. इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिक भी भाग ले सकते थे. इन खेलों में उस समय 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. ब्रिटेन के मार्गेट माघन पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले एथलीट बने. उन्होंने तीरंदाज़ी में स्वर्ण पदक जीता. इस पहले पैरालम्पिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे. समय के साथ पैरालम्पिक खेलों में बदलाव होते गए और सन 1976 में अन्य पैरा खिलाड़ियों को भी इन खेलों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया.




पैरालम्पिक में सहभागिता करने वाले खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है. उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि मुकाबला बराबरी का रहे. जैसे हाथ से विकलांग खिलाड़ियों को एक वर्ग में, पैरों से विकलांग खिलाड़ियों को एक अलग वर्ग में रखा जाता है. इसके अलावा पैरालम्पिक खिलाड़ियों के वर्गीकरण में उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी श्रेणी का निर्धारण किया जाता है.


किसी खिलाड़ी को पैरा खिलाड़ी मानने के दस मानदंड हैं-

1. माँसपेशियों की दुर्बलता

2. जोड़ों की गति की निष्क्रियता

3. किसी अंग में कोई कमी

4. टाँगों की लम्बाई में अंतर

5. छोटा क़द

6. हाइपरटोनिया यानी माँसपेशियों में जकड़न

7. शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी

8. एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी गति

9. नज़र में ख़राबी

10. सीखने की अवरुद्ध क्षमता.


श्रेणीकरण के साथ-साथ खेलों का भी वर्गीकरण किया जाता है. फील्ड की प्रतियोगिताएं एफ कोड के साथ जानी जातीं हैं. इसमें शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो आदि शामिल हैं. विकलांगता के हिसाब से इन खेलों में लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं. ट्रैक की प्रतियोगिताओं को टी से परिभाषित किया जाता है. इसमें दौड़ और कूदने जैसी प्रतियोगिताएँ शामिल हैं. इन खेलों में 19 श्रेणियाँ होती हैं. सभी खेल स्पर्धाओं को विकलांगता के अनुसार अलग-अलग नंबरों में बाँटा जाता है. जैसे फील्ड की स्पर्धाओं में एफ़-32, एफ़-33, एफ़-34 आदि नंबर देखने को मिलते हैं. यहाँ इन्हीं नंबरों के अनुसार विकलांगता की स्थिति को पहचाना जाता है. जिस स्पर्धा में जितना कम नंबर होता है, उसकी उतनी ही अधिक विकलांगता होती है.


फील्ड और ट्रैक की प्रतियोगिताओं के अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर वाले खेल (बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और तलवारबाजी) भी पैरालम्पिक में खेले जाते हैं. व्हीलचेयर पर खेले जाने वाले खेलों की पहचान डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से की जाती है. इन खेलों में भी जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं उनको एस से पहचाना जाता है. इसको भी दो अलग-अलग विकलांगता श्रेणियों में बाँटा गया है. यदि शरीर के ऊपरी हिस्से में विकलांगता होती है तो एस के साथ यू लिखा होगा, जिसका अर्थ है अपर लिंब. इसी तरह यदि एस के आगे एल लिखा है तो इसका अर्थ हुआ कि शरीर के निचले हिस्से (लोअर लिंब) में विकलांगता है.




पैरालम्पिक खेलों में खिलाड़ियों के चयन के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी (आईपीसी) द्वारा मानक का निर्धारण किया गया है. इसमें भी ये आवश्यक नहीं कि किसी खिलाड़ीद्वारा इस मानक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी उसे चयनित नहीं माना जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीसी द्वारा प्रत्येक देश एक निश्चित कोटा है, इस निर्धारित कोटे से ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते. ऐसे में यदि निर्धारित कोटे से अधिक ख़िलाड़ी निर्धारित मानक लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाया जाता है. इसमें चयनित खिलाड़ी ही अंतिम रूप से पैरालम्पिक के लिए चयनित होते हैं. इसके अलावा विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है.


वर्तमान में देश की तरफ से अनेक खिलाड़ी टोक्यो में अपना प्रदर्शन करने के लिए गए हैं. उन सभी को शुभकामनाएँ.

10 जनवरी 2020

जीवट आत्मविश्वास के आगे बौनी बनी शारीरिक अक्षमता


उरई के इंदिरा स्टेडियम में बुन्देलखण्ड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट का आयोजन का आज शुभारम्भ हुआ. पहले दी ही अनेक मैच हुए. उन मैचों सहित पूरे टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग की जिम्मेवारी हमारे ऊपर थी. ऐसे में एक-एक मैच को देखा जा रहा था, उनके परिणामों पर, खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर भी रखी जा रही थी. इसी निगरानी के बीच एक मैच सामने से गुजरा जो कहीं न कहीं हमारी दो-तीन साल पुरानी मांग को पूरा करता दिखा साथ ही आश्चर्य में भी डाल गया. जिला बैडमिंटन क्लब विगत कई वर्षों से टूर्नामेंट का आयोजन करता आ रहा है. अपने शौक और अपनी शारीरिक स्थिति के चलते हर बार आयोजकों से निवेदन किया जाता रहा है कि कम से कम एक मैच पैरा खिलाड़ियों के लिए करवा दिया करें. भले ही ये मैच प्रदर्शनी हो मगर ऐसा होना चाहिए. इससे एक तरफ पूरे समाज में सन्देश जाएगा कि जनपद जालौन का जिला बैडमिंटन क्लब पैरा स्पोर्ट्स के लिए सजग है, साथ ही जनपद में तथा जनपद के आसपास के पैरा खिलाड़ियों में भी उत्साह का संचार करेगा.


बहरहाल विगत कई वर्षों की मांग सिर्फ मांग बनकर ही रह गई. इसके पीछे यहाँ के लोगों का, खिलाड़ियों का आगे न आना भी रहा. आज जब बालिका जूनियर वर्ग में एक मैच चल रहा था. उस मैच को हम महज मीडिया की दृष्टि से देख रहे थे. तभी हमारी नजर में वो खिलाड़ी आई जिसकी चर्चा हमसे क्लब के पदाधिकारियों द्वारा पैरा मैच करवाने के सन्दर्भ में हो चुकी थी. वो खिलाड़ी बहुत ही आत्मविश्वास से अपने मैच का जैसे आनंद ले रही हो. जैसा कि उसके खेलने के ढंग से, उसके शॉट लगाने के हावभाव से लग रहा था कि वह पूरी तरह से अपनी जीत के प्रति आशान्वित है. मैच जैसा कि अपेषित था, उसी ने जीता. मैच के समाप्त होने के बाद तमाम तरह की औपचारिकताओं के करने के बाद, कतिपय मीडियाकर्मियों से बातचीत करने के बाद लगा कि वह फ्री है तो उससे बात करने का समय लिया. ऐसा इसलिए नहीं कि उससे महज बात करनी थी बल्कि इसलिए कि एक खिलाड़ी के रूप में उसका सम्मान बना रहे.


उससे अनुमति लेकर ही उसका वीडियो बनाया, जो फेसबुक पर लाइव भी किया, उसकी अनुमति लेकर. ऐसा इसलिए किया कि महज उसकी शारीरिक अवस्था के चलते उसे किसी तरह का विभेद न महसूस हो. आज के दिन वह एक खिलाड़ी थी और वह भी विजेता. ऐसे में उसके साथ व्यवहार भी एक विजेता की तरह किया जाना था. उसकी अनुमति के साथ ही औपचारिक, अनौपचारिक बातचीत के द्वारा उसके बारे में, उसके खेल के बारे में, उसकी इस खेल में आने की स्थिति के बारे में, उसके परिवार के बारे में जानने का प्रयास किया. स्वाति सिंह, जी हाँ, यही नाम है उस जीवट खिलाड़ी का, जिसका दायाँ हाथ जन्म से पूर्ण नहीं है. कोहनी के आगे का हाथ विकसित ही नहीं हो सका. बहरहाल, उसे किसी भी क्षण ये महसूस नहीं हुआ कि उसका एक हाथ पूर्ण नहीं है. अपनी आँखों से उसे मैच में जहाँ सर्विस लेते देखा वहीं अपने सामने बैठकर उसे जूतों के फीते बांधते देखा. 


स्वाति में जितना आत्मविश्वास अपने खेल के प्रति लगा उतना ही भोलापन उसके स्वभाव में नजर आया. कृषक पिता की सबसे बड़ी संतान के रूप में कबड्डी को तिलांजलि देकर वह पी०वी० सिंधु को अपना आदर्श मानकर बैडमिंटन में उतर आई. दसवीं की परीक्षा एक साल पहले उत्तीर्ण करने के बाद स्वाति वर्तमान में प्राविधिक शिक्षा ग्रहण कर रही है. दो छोटे भाई-बहिन गाँव में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और स्वाति उरई में स्वावलंबी और खिलाड़ी बनने के लिए प्रयासरत है. सबसे बड़ी बात यह कि महज तीन महीने के अभ्यास के बाद उसमें बैडमिंटन के प्रति असीम प्रेम, स्नेह, समर्पण दिखाई देता है. अपने सभी वरिष्ठ साथियों के सहयोग के प्रति वह अभिभूत है. उसका कहना है कि स्टेडियम के सभी साथियों का इतना सहयोग ही है तभी वह आज इस टूर्नामेंट में भाग ले पा रही है. इन्हीं साथियों की बदौलत वह पूरे विश्वास के साथ अपनी तैयारी कर पाई है. ऐसा लगा भी क्योंकि अपने जीवन का पहला मैच, पहला टूर्नामेंट खेलने वाली स्वाति जबरदस्त आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी. वर्तमान में पैरा से इतर खुद को सामान्य वर्ग में सबके सामने उतार कर स्वाति ने खुद को ही साबित किया है. कामना है कि जल्द ही वह अपनी प्रतिभा को समूचे देश के सामने प्रदर्शित करे.