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29 जून 2023

स्मृतियों को जीवित रखता है कैमरा

प्रत्येक वर्ष 29 जून को राष्ट्रीय कैमरा दिवस मनाया जाता है. इस दिन को कैमरे और उसके आविष्कार की याद में मनाया जाता है. कैमरा एक अपूरणीय उपकरण है जो किसी व्यक्ति, स्थान, कार्यक्रम आदि की छवियों को चित्र में कैद करने में सहायक है. जॉर्ज ईस्टमैन, जिनको फ़ोटोग्राफ़ी का जनक माना जाता है, ने कैमरे को जन-जन तक पहुँचाया. यद्यपि उन्होंने कैमरे का आविष्कार नहीं किया था तथापि कैमरे के उपयोग में सहजता और उसके उत्पादन में सुधार हेतु कई अतिरिक्त चीजें विकसित की. उनके प्रयासों ने कैमरे को सहजता प्रदान की और उसे जन-जन तक व्यापक रूप से पहुँचाया.


आरंभिक दौर में कैमरे बड़े-बड़े और वजनदार थे. कालांतर में इस क्षेत्र में भी विकास हुआ और अनेक तरह के कैमरे विकसित हुए. वर्तमान में डिजिटल कैमरों में अनेक प्रकार की विशेषताएँ पाई जाती हैं. डिजिटल कैमरों के आने के बाद से न केवल व्यावसायिक फोटोग्राफी आसान हो गई बल्कि शौकिया फोटोग्राफर्स के लिए भी बहुत सुविधा हो गई. अब फोटोग्राफी सभी उम्र के लोगों के लिए आकर्षक हो गई है. अब सभी लोगों के लिए फ़ोटो खींचना बहुत आसान हो गया है. बिजनेस इनसाइडर के अनुसार वर्ष 2017 में लोगों ने 1.2 ट्रिलियन से अधिक डिजिटल तस्वीरें खींचीं. 




राष्ट्रीय कैमरा दिवस के बहाने कुछ कैमरों के बारे में आपको जानकारी देते चलें. पहले कैमरे से लेकर आधुनिक डीएसएलआर कैमरे तक का सफर सदियों पुराना है. बड़े-बड़े, भारी-भरकम कैमरों से लेकर मोबाइल में समाहित कैमरों तक का अपना ही रोचक इतिहास है.


कैमरों के संसार में जो सबसे शुरुआती कैमरा आया उसे इतिहास का पहला कैमरा कहा जाता है. कैमरा ऑब्स्क्युरा नाम के कैमरे का वैचारिक विवरण 400 ईसा पूर्व की चीनी पांडुलिपियों में मिलता है. अरब के एक विद्वान इब्न अल-हेथम ने 1000 ईस्वी के आसपास ऑब्स्कुरा कैमरा का विचार प्रस्तुत किया था. यह कैमरा चित्र नहीं लेता था बल्कि इसके स्थान पर यह एक छोटे से छेद के माध्यम से प्रकाश को एक स्क्रीन पर प्रोजेक्ट करता था. इससे सामने की वस्तु का चित्र स्क्रीन पर उभरता था. इसे संरक्षित, सुरक्षित नहीं रखा जाता था.


एक जर्मन लेखक जोहान ज़हान ने सन 1685 में कैमरे का एक डिज़ाइन प्रस्तावित किया जिसे बाद में हैंडहेल्ड रिफ्लेक्स कैमरा के नाम से जाना गया. इसके बाद फोटोग्राफिक कैमरा सबके सामने आया. पहला फोटोग्राफिक कैमरा सन 1816 में फ्रांसीसी जोसेफ निसेफोर नीपसे द्वारा बनाया गया. नीपसे ने सिल्वर क्लोराइड-लाइन वाले कागज पर फोटोग्राफिक चित्र निकाले. आज भी उस कैमरे की सबसे पुरानी मौजूदा तस्वीर सन 1826 के आसपास उन्हीं के द्वारा निकाली गई थी. उसका ऑरिजिनल शॉट आज भी ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय में सुरक्षित रखा हुआ है. जैसे-जैसे तकनीक विकसित होती गई, लोगों को कैमरे का महत्त्व, उपयोग समझ आता रहा वैसे-वैसे कैमरे और विकसित रूप में सामने आते रहे. कालांतर में डगुएरियोटाइप्स कैमरा, मिरर कैमरा, कोडक कैमरा आदि का आना हुआ. वर्ष 1905 और 1913 के बीच कैमरा निर्माताओं ने 35 मिमी फिल्म की रोल के साथ कैमरे के उपयोग पर जोर दिया. इसमें फिल्म रोल को कैमरे में लगाया जा सकता था और निकाला भी जा सकता था. जर्मन वैज्ञानिक और फोटोग्राफर ऑस्कर बार्नैक को इस फ़िल्म कैमरे को प्रस्तुत करने वाले के रूप में जाना जाता है.




रील वाले कैमरे आने के बाद फोटोग्राफी की दुनिया में एक तरह का बदलाव देखने को मिला. अब खींचे गए चित्र को र्सुरक्षित रखना आसान हो गया था. लोगों को अपनी स्मृतियों को संजोने का अवसर मिलने लगा था. बावजूद इसके अभी कैमरा के क्षेत्र में, फोटोग्राफी के क्षेत्र में क्रांति आनी शेष थी. इसका आगमन हुआ सन 1999 में जब पहली बार पहला एसएलआर कैमरा निकाला गया. इस सिंगल लेंस कैमरा (एसएलआर) ने कुछ वर्षों के बाद ही पूरी तरह से सिंगल-लेंस रिफ्लेक्स कैमरों की जगह ले ली. बाद में इसी का डिजिटल संस्करण आ जाने के बाद इस डिजिटल सिंगल-लेंस रिफ्लेक्स कैमरा (डीएसएलआर) के द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली फोटोग्राफी सहज हुई. आज यह कैमरा शौकीन और पेशेवर फोटोग्राफर्स के बीच जबरदस्त रूप सेलोकप्रिय है. 


कैमरे की इस विकास यात्रा में अब लगातार बेहतरीन डिजिटल कैमरों का आगमन बना हुआ है. बेहतरीन क्षमता और गुणवत्ता वाले लेंसों के द्वारा भी कैमरों ने अपना रूप और अधिक विकसित कर लिया है. इनके आने से फोटोग्राफी सहज हुई थी मगर बाद में मोबाइल में कैमरा आने से फोटोग्राफी सर्वसुलभ और अत्यंत आसान हो गई. निश्चित ही कैमरों की दुनिया ने व्यक्तियों को अपने अतीत के साथ, अपनी यादों के साथ जीना सिखाया है, उसकी स्मृतियों को सुरक्षित रखा है, उसके यादगार पलों को जिंदा बनाये रखा है. 





 

24 अगस्त 2022

डायरेक्ट रील वाले कैमरे से आज का फोटोशॉप



इन फोटो को देखकर आपको आश्चर्य नहीं हुआ होगा? होना भी नहीं चाहिए क्योंकि आज की कम्प्यूटर तकनीक वाले ज़माने में, फोटोशॉप वाले युग में ऐसी फोटो तो बहुत ही आम हैं. आये दिन इस तरह की फोटो सोशल मीडिया के द्वारा हम सबके सामने आती हैं. ऐसे में इन दोनों फोटो को देखकर आश्चर्य न होना आम बात है मगर यदि आपसे कहा जाये कि ये फोटो उस समय की हैं जबकि कैमरा रील वाला हुआ करता था, किसी भी तरह की एडिटिंग के लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल नहीं होता था, तो शायद आश्चर्य लगे. ये दोनों फोटो सन 1998 की हैं. उस समय कम्प्यूटर का चलन भले ही देश के बड़े-बड़े शहरों में होने लगा हो मगर उरई जैसे कस्बेनुमा शहर में कल्पना ही थी. डिजिटल कैमरे भी उस समय उरई के किसी स्टूडियो में दिखाई नहीं पड़ते थे.  ऐसे में इस तरह की फोटो का निकाला जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं. 


इस तरह की फोटो को अक्सर पत्रिकाओं में देखा करते थे. मन बहुत होता था कि ऐसी फोटो हम भी खिंचवाएँ मगर समझ नहीं आता था कि ऐसी फोटो कैसे खिंचे? जो मित्र हमारे ब्लॉग से पूर्व परिचित हैं या फिर हमसे बहुत लम्बे समय से जुड़े हैं, वे सभी हमारे फोटोग्राफी के शौक के बारे में भली-भांति परिचित हैं. एक दिन पुराने एल्बम देखते समय कुछ ब्लैक एंड व्हाइट फोटो ऐसी दिखीं, जिनमें एक फोटो में दो दृश्य दिख रहे थे. ऐसी कुछ फोटो वे भी थीं जिनको हमने अपने क्लिक थर्ड कैमरे से निकाला था. उन फोटो को देखकर दिमाग में एक ख्याल आया कि यदि एक ही निगेटिव पर दो शॉट ले लिए जाएँ तो शायद फिल्म ओवरलैप कर जाने के कारण एक ही फोटो में दो अलग-अलग दृश्य दिखाई पड़ें?


चूँकि यह हमारे दिमाग की कल्पना भर थी, इसे साकार करने के लिए कैमरा चाहिए था. अपने एक मित्र के जिस कैमरे से हम उन दिनों फोटोग्राफी का शौक पूरा कर रहे थे, उस कैमरे में रील डलवा कर अपनी कल्पना को साकार करने का काम किया. अब आश्चर्य करने की बारी हमारी थी, जैसा सोचा था वैसा हुआ भी. एक निगेटिव की जगह पर दो शॉट लेने पर ओवरलैप जैसी स्थिति बनी और एक ही फोटो में दो दृश्य निगेटिव डेवलप करने के बाद सामने आ गए. अब जैसा सोचा था फोटो निकलवाने के बारे में, उसे साकार रूप देने का मौका आ गया था. ये समझ आ चुका था कि एक निगेटिव से ही एक फोटो में दो दृश्य आ सकते हैं. बस जो सेटिंग अपने कैमरे में करके ऐसा किया था, उसे दिमाग में लेकर एक दिन पहुँच गए अपने जीजा जी के स्टूडियो.


उरई में हमारे जीजा जी का स्टूडियो बहुत पुराना है और उनको खुद फोटोग्राफी की बहुत अच्छी जानकारी है. उनको अपनी कल्पना और उसे कैसे साकार किया है, इस बारे में बताया तो वे सहर्ष तैयार हो गए हमारी फोटो निकालने को. अब ये हमें जानकारी नहीं कि उनको उस तकनीक का ज्ञान पहले से था या उन्होंने हमारा मन रखने के लिए ऐसा दिखाया जैसे उनको पहली बार उस तकनीक की जानकारी हुई है. बहरहाल, जीजा जी ने स्टूडियो में आवश्यक लाइट इफेक्ट बनाए और फिर उसी तकनीक से फोटो खींची जैसी कि हमने अपनाई थी. उन दो खींची हुई फोटो का रिजल्ट आपके सामने है.


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असल में रील वाले कैमरे से एक क्लिक करने के बाद निगेटिव को आगे बढ़ाना पड़ता था. कैमरे की सेटिंग ऐसी हुआ करती थी कि यदि रील को आगे नहीं बढ़ाया जायेगा तो फिर अगली फोटो नहीं खिंच सकती थी. ऐसे में वापस उसी निगेटिव पर क्लिक करने के लिए आवश्यक था कि वही निगेटिव वापस शटर के सामने रहे. कैमरे के नीचे एक बटन लगा हुआ करता था, जिसे दबाकर पूरी रील को वापस उसके बॉक्स में बंद कर दिया जाता था, जबकि पूरी फोटो खिंच जाया करती थीं. एक शॉट में दो दृश्य निकालने के लिए इसी तकनीक का प्रयोग किया गया. कैमरे के उसी बटन को दबाकर रील को उतना ही वापस किया गया, जितना वह एक फोटो को क्लिक करके आगे बढ़ा था. वही निगेटिव वापस लेंस के सामने था. अब दोबारा हमारी जगह बदली गई, क्लिक किया गया. ऐसे एक फोटो में हम दो दिखाई देने लगे.


ये फोटो निश्चित ही आज की उस पीढ़ी के लिए आश्चर्य का विषय होगी जिन्होंने डिजिटल कैमरे ही देखे हैं, कम्प्यूटर में होती एडिटिंग देखी है, फोटोशॉप से बदलती फोटो देखी है. ये दोनों वे फोटो हैं जो कैमरे की तकनीक का लाभ उठाकर सीधे कैमरे में ही फोटोशॉप कर दी गईं. 






 

11 जुलाई 2022

फोटोग्राफी के प्रकार

फोटोग्राफी अपने आपमें एक कला है. यह अनेक प्रकार की विविधताओं के साथ हम सबके जीवन से जुड़ी हुई है. जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता रहा, वैसे-वैसे फोटोग्राफी के प्रकार में भी विकास, परिवर्तन आते रहे. फोटोग्राफी के अनेकानेक प्रकार हैं. यहाँ कुछ मुख्य प्रकार के बारे में संक्षिप्त रूप से आपको बताया जा रहा है. 




पोर्ट्रेट फोटोग्राफी

पोर्ट्रेट फोटोग्राफी में हम किसी व्यक्ति या लोगो के समूह की तस्वीर खींचते है. यह फोटोग्राफी शैली सबसे पुरानी है और इसे पोट्रेचेर भी कहा जाता है.

लोगों के समूह, पालतू जानवर, बच्चों, पारिवारिक गतिविधियों की फोटो इसी श्रेणी में शामिल होती हैं

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फूड फोटोग्राफी

फ़ूड फोटोग्राफी हमारे भोजन को एक खूबसूरत तरीके से प्रस्तुत करने का एक माध्यम है. यह विभिन्न खाद्य पदार्थो की फोटो को कुछ इस ढंग से क्लिक करने की कला है जो दर्शकों को तुरंत अपनी ओर आकर्षित कर लेती है.

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लैंडस्केप फोटोग्राफी

लैंडस्केप फोटोग्राफी द्वारा प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में तस्वीर खींची जाती है.  इसमें प्रकति के सौंदर्य की तस्वीर इस तरह से खींची जाती है ताकि वो दर्शक को अपनी और आकर्षित कर सके.

समुद्र, नदी, तूफ़ान, झरना, जंगल आदि की तस्वीर खींचना लैंडस्केप फोटोग्राफी के अंदर आती है.

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स्ट्रीट फोटोग्राफी

सड़क पर ली गई फोटो को स्ट्रीट फोटोग्राफी में गिना जाता है। यह सड़क पर दिख रहे इंसानों के कार्यों और मनोभावों को दर्शाती है।


05 जुलाई 2022

फोटोग्राफी एक शक्ति है सामाजिक सन्देश हेतु

मोबाइल फोन या कहें कि स्मार्ट फोन आने के बाद से लोगों के लिए फोटोग्राफी करना सामान्य सी बात हो गई है. कहीं भी, कभी भी व्यक्ति अपना स्मार्ट फोन निकाल फोटो खींचने में लग जाता है. कोई अपने सामने दिखाई दे रहे ऑब्जेक्ट की फोटो लेता है तो कोई खुद को ही ऑब्जेक्ट बना कर सेल्फी लेने में व्यस्त रहता है. इतनी सहज-सुलभ-सामान्य फोटोग्राफी होने के बाद भी यदि पूछा जाये कि फोटोग्राफी क्या है तो एक सामान्य सा जवाब आएगा कि कैमरे से फोटो खींचना फोटोग्राफी है. यह सही भी है. तो आज बस एक सामान्य सा परिचय इसी कैमरे से फोटो खींचने वाली फोटोग्राफी का.

 

असल में फोटोग्राफी कोई एक शब्द नहीं है. यह दो शब्दों से मिलकर बना है. ये दोनों शब्द ग्रीक भाषा के हैं. इन दो ग्रीक शब्दों में एक है फोटो (photo) और दूसरा शब्द है ग्राफ (graph). इन दो शब्दों से बने फोटोग्राफी का सामान्य रूप में अर्थ होता है फोटो अर्थात प्रकाश की सहायता से ग्राफ यानि कि चित्र बनाना. आपको बताते चलें कि यहाँ फोटो का अर्थ प्रकाश (light) से है. इस फोटो या लाइट का तात्पर्य ऐसे भी समझना होगा कि कैमरे के सामने वाली किसी भी वस्तु, जिसे फोटोग्राफी की भाषा में ऑब्जेक्ट कहते हैं, से प्रकाश टकरा कर कैमरे के लेंस से गुजरता हुआ भीतर लगी रील तक पहुँचकर सम्बंधित वस्तु का चित्र बनाता है. रील में एक विशेष प्रकार के केमिकल का लेप हुआ करता था. इसी रासायनिक लेप के कारण कैमरे के लेंस से गुजरने वाली प्रकाश किरण से पहले निगेटिव बनता था, उसको साफ़ करके, डेवलप करने पर चित्र का निर्माण किया जाता था.  आजकल तो डिजिटल कैमरे चलने लगे हैं, जिनमें किसी रील का कोई काम नहीं होता है. अब इन डिजिटल कैमरों में सेंसर लगा होता है, जो इलेक्ट्रॉनिक विधि से फोटो खींचता, बनाता है.

 



किसी के लिए भी यह एक सामान्य समस्या होती है कि अच्छी फोटो कैसे खींची जाए? फोटो में चमक, गहरे रंग, आकर्षक वस्तु का दिखाई देना ही एक अच्छी फोटो की पहचान नहीं है. असल में एक बेहतरीन फोटो वही कही जा सकती है जो देखने वाले को आकर्षित करे, उसके मन-मष्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाले. यहाँ इसी बिंदु के सन्दर्भ में समझना चाहिए कि किसी वस्तु की, इंसान की, प्राकृतिक दृश्य की फोटो खींच लेना मात्र ही फोटोग्राफी नहीं है. शौकिया फोटोग्राफी एक अलग बात है किन्तु मूल रूप में किसी फोटो के द्वारा कोई बात कही जाये, किसी तरह का सन्देश दिया जाये तो उसे अच्छी फोटोग्राफी कहा जा सकता है. फोटोग्राफी के द्वारा लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं. किसी घटना, आयोजन को संजोया जा सकता है. यदि कहा जाये कि फोटोग्राफी एक तरह की कला है, आर्ट है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.


अमेरिकी फोटोग्राफर बेरेनिस अबोट का कहना है कि फोटोग्राफी लोगों को देखने में मदद करती है अर्थात वह देखना सिखाती है. यह बहुत बड़ी और गम्भीर टिप्पणी कही जाती है, फोटोग्राफी क्षेत्र में. ऐसा माना जाता है कि मँहगे कैमरों से खींची जाने वाली फोटो ही बेहतरीन फोटोग्राफी का उदाहरण है. असल में किसी भी फोटो में विषय का, उसके द्वारा दिए जा रहे सन्देश का बहुत महत्व है. इसलिए कई बार सामान्य से कैमरे यहाँ तक कि स्मार्ट फोन के द्वारा भी बेहतरीन फोटो निकाली जा सकती है, जो समाज को एक सन्देश दे.


फोटोग्राफी सीखने वालों के लिए, शौकिया फोटो खींचने वालों के लिए ये समझने की बात है कि कैमरा या स्मार्ट फोन में कैमरे का होना महज क्लिक करने के लिए नहीं है. कैमरे को, अपनी फोटोग्राफी के द्वारा बहुत कुछ ऐसा किया जा सकता है, जिसे याद रखा जाये. समाज, शिक्षा, युवाओं, पर्यटन, पर्यावरण, चिकित्सा, स्वास्थ्य आदि-आदि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें फोटोग्राफी के द्वारा न केवल रोजगार प्राप्त किया जा सकता है बल्कि लोगों को सकारात्मक सन्देश भी दिया जा सकता है. यह बात सभी लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए कि फोटोग्राफी बहुत बड़ी शक्ति है जो समाज को एक सार्थक संदेश दे सकती है.


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26 जून 2022

फोटोग्राफी में शटर स्पीड (Shutter Speed)

1. फोटोग्राफी में सबसे अहम चीज है एक्सपोजर (exposure), यानि- फोटो खींचने के लिए जरूरी लाइट. 


2. इस एक्सपोजर को चार कारक निर्धारित करते हैं – 

(i) लेंस का अपर्चर (ii) कैमरे की शटर-स्पीड (iii) कैमरे का ISO (iv) सब्जेक्ट के ऊपर पड़ने वाली लाइट


3. लेंस का अपर्चर, कैमरे की शटर-स्पीड और कैमरे का ISO इन तीनों को एक्सपोजर ट्राएंगल (Exposure Triangle) कहते हैं.


4. शटर कैमरे का मुख्य हिस्सा होता है, जो लेंस और इमेज सेंसर या फ़ोटो फिल्म के बीच में रहता है.


5. फोटो खींचने के लिए कैमरे को फोकस करने के बाद जब हम Shutter Button दबाते हैं तो क्लिक की आवाज होती है, यह शटर के खुलकर बंद होने की आवाज है.


6. शटर के खुलकर बंद होने में जितना समय लगता है उसे शटर स्पीड कहते हैं.


7. सेंसर या फ़िल्म तक रौशनी पहुँचने के लिए शटर जितनी देर के लिए खुला रहता है, उसे ही शटर स्पीड (Shutter Speed) कहा जाता है.


8. फोटोग्राफी की जरूरत के अनुसार इसे कैमरे में सेट किया जा सकता है. इसे s द्वारा व्यक्त किया जाता है और यह सेकेंड के रूप में होता है.


9. जैसे - शटर स्पीड है s = 1/100 तो इसका अर्थ हुआ शटर की खिड़की सेकेंड के सौवें हिस्से के लिए खुली और फिर बंद हो गई. इसका मतलब सेंसर या फ़िल्म तक रौशनी पहुँचने के लिए शटर सेकेंड के सौवें हिस्से तक खुला रहा.



10. शटर स्पीड अर्थात उसके खुलने-बंद होने की स्पीड पर ही रौशनी का अन्दर पहुँचना निर्भर करता है.


11. शटर स्पीड जितनी अधिक होगी, सेंसर तक रौशनी उतनी कम पहुँचेगी क्योंकि शटर खुलकर जल्दी बंद हो जायेगा.


12. शटर स्पीड जितनी कम होगी, सेंसर तक रौशनी उतनी अधिक पहुँचेगी क्योंकि शटर खुलकर देर से बंद होगा.


13. शटर स्पीड जितना फास्ट होगा, एक्सपोजर की ब्राईटनेस उतनी ही कम होगी.


14. शटर स्पीड जितनी स्लो होगी एक्सपोजर उतना ही अधिक ब्राइट होगा. जैसे शटर स्पीड 1/100 की तुलना में शटर स्पीड 1/60 अधिक ब्राइट होगा.


15. फ़ोटोग्राफी में दो तरह की गतिशीलता (motion) होती है.


16. एक होती है, कैमरा का हिलना, जिसे फोटोग्राफी की भाषा में कैमरा शेक (camera shake) कहते हैं.


17. दूसरी होती है, सब्जेक्ट की गति या उसका हिलना जिसे सब्जेक्ट मोशन (subject motion) कहते हैं.


18. इन दोनों तरह की गतियों को शटर स्पीड के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है.


19. कैमरा हिलने के कारण होने वाले फ़ोटो का धुंधलापन, जिसे फोटोग्राफी में ब्लर कहते हैं, को फास्ट शटर स्पीड के द्वारा दूर किया जा सकता है.


20. शटर स्पीड बढ़ा कर, बिना ब्लर वाली तस्वीर ली जा सकती है, मोशन फ्रीज कहते हैं.


21. स्लो शटर स्पीड पर मोशन ब्लर इफेक्ट पाया जा सकता है. जैसे बहते हुए पानी की इफेक्ट वाली फोटो इसी तरह ली जाती हैं.


22. स्मार्टफोन (मोबाइल) के कैमरों में शटर नहीं होता है, इसके बजाय इसमें सेंसर होता है.


23. मोबाइल में सेंसर उसके लेंस के पीछे होता है.





23 जून 2022

कैमरा अपर्चर (Aperture) के बारे में सामान्य जानकारी

1. अपर्चर मोबाईल फोन और DSLR कैमरा दोनों के ही लेंस में लगा होता है. 


2. किसी भी कैमरा के लेंस में एक छेद बना होता है, जिसकी सहायता से सामने की रोशनी सेन्सर तक जा सके उसे अपर्चर कहते हैं.


3. अपर्चर किसी भी कैमरा लेंस का वह छेद होता है, जिसकी सहायता से रौशनी अन्दर जाती है.


4. अपर्चर कई सारी सतहों (लेयर) से मिलकर बना होता है, उसके आधार पर ही तय होता है कि कितनी रौशनी अन्दर जाएगी.


5. अपर्चर को F नंबर में गिना जाता है, जैसे – f/1.4, f/2.0, f/2.8, f/4.0, f/5.6, f/8.0


6. अपर्चर का F नंबर जितना छोटा होगा उसका छेद उतना ज्यादा बड़ा होगा, उससे ज्यादा रौशनी अंदर जाएगी.


7. F नंबर जितना बड़ा और ज्यादा होगा, अपर्चर का छेद उतना ही छोटा होगा. इससे कम रौशनी लेंस से अंदर जा पाएगी.


8. रौशनी के कम ज्यादा होने के कारण ही फोटो की डार्कनेस का निर्धारण होता है.


9. रौशनी के कम, ज्यादा होने की स्थिति में अपर्चर के द्वारा उसको समायोजित किया जा सकता है.


10. किसी भी अपर्चर (Aperture) वैल्यू सेट करने से पहले तीन चीजों पर ध्यान देना चाहिए.

Available Light – रौशनी की स्थिति, Depth of Field और Shutter Speed – शटर की स्पीड





19 अगस्त 2021

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कुछ हमारी क्लिक्स

विश्व फोटोग्राफी दिवस को मनाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेक्स और मेंडे डाग्युरे ने सबसे पहले सन 1839 में फोटो तत्व की खोज की थी. ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने निगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस का आविष्कार किया और सन 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर की खोज करके खींची गई फोटो को स्थायी रूप में रखने में मदद की.  

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था. इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. आपके लिए खुद की क्लिक की गई कुछ फोटो लाये हैं. उनके साथ आज का आनंद लीजिये. 










 

29 जून 2021

यादों को सहेजने वाला साथी है कैमरा

अपनी यादों को हमेशा के लिए यादगार बनाने का बेहतरीन माध्यम कैमरा है. किसी समय में कैमरा में रील डाले जाने के कारण फोटोग्राफी बहुत महँगा शौक हुआ करता था तब बहुत कम लोग कैमरा का उपयोग किया करते थे. आज मोबाइल में कैमरा होने के कारण फोटोग्राफी या कैमरा अब समाज की जीवनशैली का मुख्य भाग हो गया है. कैमरा केवल फोटो खींचने का काम नहीं करता है बल्कि उसके माध्यम से फोटोग्राफर के कौशल को, उसकी बुद्धिमत्ता को, उसके दृष्टिकोण, उसकी कल्पनाशीलता आदि को भी परखा जा सकता है. इस पोस्ट के द्वारा कैमरा के बारे में चर्चा करने का कारण ये है कि आज, 29 जून को कैमरा दिवस मनाया जाता है.


ऐसा माना जाता है कि कैमरे का आविष्कार एक अरब विद्वान इब्न अल-हेथम द्वारा किया गया. उन्होंने इसे कैमरा ऑब्स्कुरा नाम से पुकारा. इसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि कैसे एक सपाट सतह पर किसी दृश्य को प्रोजेक्ट करने के लिए प्रकाश का उपयोग किस तरह किया जाए. कैमरा के द्वारा एक तस्वीर को संरक्षित करने का काम एक तकनीक की सहायता से किया जाता है. इसे हेलियोग्राफ़ कहा जाता है. इसका आविष्कार पहली बार वर्ष 1816 में फ़्रांस के जोसेफ नाइसफोर नीप्स द्वारा किया गया जो वर्ष 1825 में दुनिया की पहचान बना.  इन आविष्कारों के बाद भी कैमरे का वास्तविक आविष्कारक वर्ष 1829 में अलेक्जेंडर वोल्कोट को माना जाता है. इनके द्वारा बनाये गए कैमरा से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जो आसानी से फीकी नहीं पड़तीं.


हमारे पुराने साथी 


इस दिन वे साथी याद आ रहे हैं जिन्होंने क्लिक करने के हमारे शौक को बड़ी गंभीरता से निभाने में अपना पूरा साथ दिया. रील वाला कैमरा हमने बचपन से ही देखा और चलाया है. बाद में मामा जी की तरफ से कक्षा आठ या नौ में गिफ्ट मिला था क्लिक III कैमरा. सादा फोटो की दुनिया से बाहर निकलने पर रंगीन फोटो वाले कई कैमरे उपयोग किये. 110 वाला कैमरा भी, जिसमें एकदम पतली रील पड़ती थी और याशिका के कई कैमरे. डिजिटल कैमरों का युग चाहे जब शुरू हुआ हो मगर हमने पहला डिजिटल कैमरा लिया था वर्ष 2009 में, मुंबई यात्रा के समय. उसके बाद तीन डिजिटल कैमरे और लिए गए. अंतिम रूप से वर्ष 2017 में निकोन का DSLR लिया गया.


इसके साथ-साथ मोबाइल भी अब तुरत-फुरत में कैमरा की भूमिका निभाता है. हमेशा हमारे साथ अथवा शायद किसी के साथ भी कैमरा नहीं रहता होगा, ऐसे में मोबाइल ही सच्चा कैमरा बनकर सामने आता है. ये स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि आकस्मिक रूप से मोबाइल भी फोटोग्राफी में भरपूर साथ दे देता है हमारा.


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08 जून 2021

मोबाइल से ऐसे की जा सकती है बेहतरीन फोटोग्राफी

किसी समय में फोटोग्राफी करना जटिल काम हुआ करता था साथ ही खर्चीला भी. तकनीकी विकास ने बहुत सारे उपकरणों का आविष्कार किया, उन्हीं में से एक आविष्कार डिजिटल कैमरा भी है. डिजिटल कैमरा आने के बाद रील की आवश्यकता नहीं रह गई. डिजिटल कैमरा से फोटो खींचते जाइए और चाहे जितनी फोटो खींचते जाइए. डिजिटल कैमरा फोटोग्राफी के क्षेत्र में एक उपयोगी उपकरण सिद्ध हुआ. इस उपयोगी साधन के आने से फोटोग्राफी सुगम हुई तो इसमें क्रांति लाने का काम मोबाइल ने किया. बेसिक फोन के विकल्प रूप में जन्मे मोबाइल कालांतर में फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन ढंग से उपयोग किये जाने लगे. 


जो लोग फोटोग्राफी के शौक़ीन हैं उनके लिए मोबाइल फोटोग्राफी एक तरह की वरदान साबित हुई है. वे इस उपकरण से बेहतरीन फोटोग्राफी कर ले रहे हैं. शौकिया मोबाइल फोटोग्राफी करने वालों के सामने समस्या रहती है कि मोबाइल के द्वारा कैसे बेहतरीन फोटोग्राफी की जा सके. यद्यपि किसी भी मोबाइल कैमरे के रिजल्ट किसी भी कैमरे के जैसे नहीं हो सकते तथापि कुछ स्थितियों को ध्यान में रखते हुए फोटोग्राफी की जाये तो परिणाम बेहतर आ सकते हैं. इसके लिए किसी विशेष तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, बस कुछ सामान्य से कदम हैं जिनको अपनाये जाने के बाद फोटोग्राफी को बेहतर बनाया जा सकता है.




कैमरा हो मोबाइल, फोटोग्राफी के लिए लेंस का सर्वाधिक महत्त्व होता है. बेहतर फोटो के लिए आवश्यक है कि कैमरा लेंस साफ़ हो. चूँकि मोबाइल का उपयोग बातचीत के लिए होता ही है. हाथों में रहने के कारण पसीने से, उँगलियों के निशानों से, जेब में रखने के चलते अथवा किसी स्थान पर रखने के कारण लेंस पर निशान आ जाते हैं अथवा वह कुछ धुँधला हो जाता है. ऐसे में उस गंदे लेंस से फोटोग्राफी करने पर फोटो साफ़ नहीं आ सकती है. बेहतर हो कि जब भी फोटोग्राफी के लिए मोबाइल का उपयोग किया जाये, उसका कैमरा लेंस साफ़ कर लेने की आदत बना ली जाये.


मोबाइल फोन से फोटो खींचते समय इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसका फ्लैश कम से कम उपयोग में लाया जाये. चूँकि मोबाइल के फ्लैश बहुत अधिक पॉवरफुल नहीं होते हैं. ऐसे में वे अपेक्षित रौशनी तो दे नहीं पाते, जिससे फोटो की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है. ऐसे में इसका भी ध्यान रखा जाये कि जब भी मोबाइल का इस्तेमाल फोटोग्राफी के लिए किया जाये यह जाँच लिया जाये कि फ्लैश ऑन तो नहीं है. हाँ, रात के समय, अँधेरे में, कम रौशनी में फोटोग्राफी करने के लिए फ्लैश का इस्तेमाल किया जा सकता है.




मोबाइल से फोटोग्राफी कर रहे हों अथवा कैमरा से एक बात विशेष रूप से ध्यान दिए जाने योग्य है कि आपके फोकस में क्या-क्या है. बहुत से लोग बिना फोकस में आने वाले ऑब्जेक्ट को देखे बस क्लिक, क्लिक करने में लग जाते हैं. बाद में देखने पर जानकारी होती है कि जिसका फोटो लिया जा रहा है, उसके साथ-साथ बहुत सी ऐसी चीजों की फोटो आ गई है ओ उस पूरी फोटो को बेकार बना दे रही है. ऐसे में फोटो खींचते समय जितना ध्यान इसका रखना है कि फोकस में क्या-क्या लाना है, उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण ये जान लेना है कि फोकस से बाहर क्या रखना है. अनावश्यक वस्तुओं को फोकस से बाहर रखने के बाद सिर्फ अपने ऑब्जेक्ट को ही केंद्र में रखते हुए फोटोग्राफी करेंगे तो बेहतर फोटो सामने आएगी.


दिन में या रात में फोटोग्राफी करते समय इसका ख्याल जरूर रखें कि आपके कैमरे पर, आपके ऑब्जेक्ट पर लाइट कहाँ से आ रही है, कैसी आ रही है. यदि बहुत ज्यादा रौशनी आपके द्वारा निर्धारित ऑब्जेक्ट के पीछे है तो बैकग्राउंड में बहुत ज्यादा सफेदी आने की सम्भावना है. इससे बैकग्राउंड में दिखने वाली तमाम चीजें लगभग गायब हो जायेंगीं. किसी भी फोटो में उसके बैकग्राउंड का बहुत प्रभाव पड़ता है, ऐसे में इसका ध्यान रखना चाहिए कि आपके ऑब्जेक्ट के पीछे बहुत तेज रौशनी न हो. यहाँ ध्यान रखें कि लाइट का जो भी माध्यम हो, जहाँ से लाइट आ रही हो उसे अपने पीछे कर लें. ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह हो कि लाइट सीधे आपके ऑब्जेक्ट पर न पड़े. यदि किसी व्यक्ति की फोटो ले रहे हों तो उसके चेहरे को सीधी रौशनी से बचाने का प्रयास करें. यदि व्यक्ति के चेहरे पर सीधी रौशनी पड़ती है फोटो में उसका रंग गहरा आने की सम्भावना है.


मोबाइल एक सीमित क्षमता वाला उपकरण है, जिसमें कैमरा को एक सीमित उपयोग के लिए बनाया गया है. ऐसे में बहुत सारी बाध्यताओं के साथ एक बाध्यता यह भी है कि मोबाइल कैमरे से फोटोग्राफी करते समय ज़ूम का उपयोग न के बराबर किया जाये. ज़ूम करके फोटोग्राफी करने से बेहतर है कि फोटो खींचने के बाद उसकी एडिटिंग करते समय अपनी फोटो में ऑब्जेक्ट को ज़ूम कर लें.  




इन बातों के साथ-साथ यह भी याद रखें कि वर्तमान में बेहतरीन फोटो के लिए जितना महत्त्वपूर्ण कैमरा है, लेंस है, कुछ सामान्य से नियम हैं उतना ही महत्त्वपूर्ण है खींची गई फोटो की एडिटिंग करना. फोटो को एडिट करने के कुछ बेसिक नियम हैं, उनको सीखकर भी आप अपनी फोटो को बेहतर बना सकते हैं. कुछ सॉफ्टवेयर भी हैं जो फोटो की एडिटिंग करने में सहायक होते हैं, आप उनका भी उपयोग कर सकते हैं.


डिजिटल फोटोग्राफी में एक सुविधा बेहतर फोटोग्राफी के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुई है और वह है रील का न लगना. कैमरा हो अथवा मोबाइल, रील के न उपयोग होने से प्रति रील सीमित फोटो खींचने के बंधन से मुक्ति मिली. इसके साथ ही यह भी स्वतंत्रता मिली कि एक बार में किसी भी ऑब्जेक्ट की, किसी जगह की कितनी भी फोटो खींची जा सकती हैं. बाद में जो फोटो आपकी आशानुरूप हों उन्हें रखते हुए शेष सभी फोटो को डिलीट किया जा सकता है.


इन बातों के अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण है फोटोग्राफी का अभ्यास. अधिक से अधिक फोटो खींचने का अभ्यास करें, उक्त बातों के अलावा भी फोटोग्राफी से सम्बंधित विधान जानने-सीखने का प्रयास करें, फोटो को बेहतर से बेहतर लाने के लिए लगातार फोटोग्राफी करें. फोटोग्राफी के शौक में अपने जूनून को शामिल कर दीजिये फिर देखिये एक न एक दिन आपकी फोटो बेहतरीन नजर आने लगेगी.


(मोबाइल से खींची गई कुछ फोटो)

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06 जून 2021

फोटो खिंचवाने की आतुरता और रील का ख़त्म हो जाना

कैमरा बचपन से ही घर में देखते आ रहे थे इसलिए वह हमारे लिए कोई नई चीज नहीं थी. इसके अलावा जब हम कक्षा आठ में थे, उन दिनों हमारे डॉक्टर मामा ने हमें एक कैमरा गिफ्ट किया. उस समय तो इतना जेबखर्च भी नहीं मिलता था कि कैमरे में रील डलवा कर अपना शौक पूरा कर पाते इसके बाद भी कुछ महीनों तक पाई-पाई जोड़कर कभी-कभार रील डलवा कर शौक पूरा कर लिया जाता था. उन्हीं दिनों विज्ञान प्रगति में अथवा आविष्कार पत्रिका में एक ट्रिक देखने को मिली उस ब्लैक एंड व्हाइट रील से अधिक से अधिक फोटो निकालने की. उस चक्कर में दो-तीन रील बेकार हो गईं, सो अपने फोटोग्राफी शौक को कुछ दिनों के लिए टाल देना उचित समझ आया.


पढ़ाई से लड़ते-जूझते हुए किसी भी बच्चे की सबसे कठिन मानी जाने वाली दोनों परीक्षाओं हाईस्कूल, इंटरमीडिएट को सफलतापूर्वक पार करने के बाद जब हम स्नातक में आ गए तो फोटोग्राफी के शौक ने फिर फड़फड़ाना शुरू किया. अब जेबखर्च की जगह महीने का खर्च मिलना शुरू हो गया था, जिसके चलते पैसे बचाना आसान हो गया था. इसके साथ ही बहुत से मित्र भी सहयोगी बनने लगे सो फोटोग्राफी के शौक की उड़ान तेज होने लगी. स्कूल टाइम में जिस शौक को पूरा करने में कई-कई महीने लग जाते थे, वो अब कॉलेज टाइम में जल्दी-जल्दी पूरा होने लगा. हालाँकि अब कैमरा बदल चुका था. घर में देखा पिताजी वाला कैमरा और मामा जी द्वारा गिफ्ट किया कैमरा अब काम नहीं आ रहा था क्योंकि वे दोनों ब्लैक एंड व्हाईट फोटो के लिए बने थे. अब रंगीन फोटो के लिए रील डलवाई जाती, कैमरा भी मित्रों से ले लिया जाता. हमारे उरई के लंगोटिया यार अश्विनी से उसका कैमरा ले लिए जाता तो महीनों के हिसाब से हमारे पास रहता. ग्वालियर के मित्र वहाँ कैमरे की व्यवस्था कर देते. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके उरई वापस आने के बाद हमने अपने जेबखर्च को बचा-बचाकर अपना पहला कैमरा खरीदा. उसके बाद तो दे दनादन वाली स्टायल में फोटोग्राफी होने लगी. 


उन दिनों जबकि रील वाली फोटोग्राफी ही हुआ करती थी तब आज की तरह अंधाधुंध फोटो नहीं खींची जाती थीं. एक रील में महज 36 फोटो खींचने की सुविधा मिलती थी, जिसे रील को कमरे में लगाते समय की कलाकारी के चलते दो-तीन स्नैप तक और बढ़ा लिया जाता था. एक-एक फोटो का बहुत महत्त्व हुआ करता था. उन दिनों अनावश्यक रूप से क्लिक करने की गुस्ताखी नहीं की जाती थी. एक-एक फोटो खीचने के पहले, खिंचवाने के पहले बहुत सारे तामझाम करने पड़ते थे. सबके अंदाज का, आसपास के माहौल का ध्यान रखना पड़ता था. जब कैमरे में रील का नंबर 32-33 दिखने लगे और उसके बाद फोटो खींचने की माँग हो जाये. ऐसे में एक-एक स्नैप जैसे अनमोल हुआ करता था. सबसे ज्यादा मजा तो तब आता था जबकि रील अपनी निर्धारित संख्या 36 को पार करके भी एक-दो स्नैप खींच दे. इसके बाद किसी समय फोटो खिंचाने को सब तैयारी की गई, सभी लोग एकाग्र भाव से कैमरे के सामने जुटे मगर ये क्या, कैमरे ने फोटो खींचने से इनकार कर दिया क्योंकि अब रील में जगह बाकी नहीं. सोचिये उस समय फोटो खिंचवाने वालों की मनोदशा.


इसके अलावा शादी-विवाह समारोहों में, किसी अन्य कार्यक्रमों में जहाँ कि फोटो खींचने वाली स्थिति की मौज ली जानी हो वहाँ इक्का-दुक्का लोग खाली कैमरा लिए फ्लैश चमकाते दिखते रहते. ऐसे लोग असल कैमरा वालों की रील को बचाने में सहयोग करते रहते थे. इन सबके बाद इंतजार रहता रील के धुलकर आने का, फोटो बनकर आने का, उनको जल्दी से जल्दी देखने का. इसके लिए भी मारा-मारी मचती घर में. लैब से फोटो लाने वाला उस समय शहंशाह हुआ करता था क्योंकि वही सबसे पहले फोटो देखता था. उसके घर में आने पर छीना-झपटी का माहौल हो जाता. फोटो फट न जाएँ, इसका ध्यान रखते हुए सभी गठबंधन करते हुए फोटो को देखने का नंबर लगा लेते.


ये निशानी है हमारी फोटोग्राफी की 


अब ऐसी कोई भी स्थिति नहीं बनती. देखा जाये तो अब फोटो को लेकर कोई क्रेज जैसा नहीं रह गया है. हर हाथ में स्मार्ट फोन होने के कारण हर हाथ में कैमरा है. न पहले जैसी आतुरता, न पहले जैसा रोमांच, न पहले जैसी लालसा. अब बस क्लिक-क्लिक-क्लिक करते जाओ और जो पसंद न आये उसे डिलीट कर दो. न फोटो खींचने का उत्साह, न फोटो खिंचवाने का जोश और न फोटो देखने की उमंग.


इधर अपने सामानों को सहेजने के क्रम में आज पुराने निगेटिव सही करने बैठे तो लगा कि कितनी फोटो ऐसी हैं जो अब हमारे पास नहीं हैं. उन दिनों में फोटो बनने के बाद दोस्तों के बीच बंट गईं. कुछ साल पहले निगेटिव से डिजिटल पॉजिटिव बनवाने सम्बन्धी तकनीक का पता चला था मगर आसपास की सभी फोटो लैब ने ये काम बंद कर रखा है. अब इधर एक तकनीक की जानकारी हुई है. उसी के सहारे कारखाना खोल बैठे हैं, पुँने निगेटिव को डिजिटल पॉजिटिव बनाने का. देखते हैं कितन सफल होते हैं.


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21 जून 2020

कैमरों ने की चश्मा लगाकर फोटोग्राफी - 1800वीं पोस्ट

वर्ष 2019 का अंतिम सूर्यग्रहण घने बादलों की चपेट में चला गया था. ठण्ड भरी सुबह में आधा घंटे टहलने के बाद भी जब समझ आ गया कि बादल अपना रास्ता छोड़ने के मूड में नहीं हैं तो हमने ही अपना रास्ता बदल लिया. छत से उतर कमरे में आ गए और फिर टीवी के सहारे देश में अलग-अलग जगहों के सूर्यग्रहण के दर्शन किये. अबकी मौसम साफ़ समझ आ रहा था मगर कहीं-कहीं बादलों के कारण होने वाले व्यवधान की आशंका के चलते मन में संशय बना हुआ था. सुबह आँख खुली तो दिन भी खिला-खिला दिखाई दिया. अपनी नियमित व्यायाम और योगाभ्यास की दिनचर्या से निपट कर छत पर पहुँच गए.



याद आ गया वर्ष 1995 का खग्रास. उस दिन भी पिताजी, चाचा जी लोगों का आदेश पारित हो चुका था छत पर नहीं जाने का. छोटे भाई-बहिनों के चेहरे उतर गए थे, खुद हम भी पशोपेश में थे कि क्या किया जाए. बाद में निर्णय लिया कि क्या होगा ज्यादा से ज्यादा डांट पड़ेगी, सुन लेंगे मगर इस डायमंड रिंग बनने की घटना के साक्षी अवश्य बनेंगे. सुरक्षा के तमाम तामझाम गोपनीय ढंग से करके यथासमय न केवल हम भाई-बहिनों ने बल्कि समूचे परिवार ने उस दृश्य का आनंद लिया था. बाद में बजाय डांट पड़ने के सबने हमारे कदम की दबे-छिपे तारीफ की ही कि इस बहाने सबको वह अलौकिक दृश्य देखने को मिल गया.


आज भी सूर्यग्रहण संयोग के साथ दिखाई पड़ना था, ऐसे में कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते थे. 21 जून का दिन जो सबसे बड़ा दिन होता है तथा इधर कुछ सालों से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा है. इसके अलावा ऐसा बताया जा रहा था कि इस समय पाँच ग्रह एक सीधी रेखा में है. ऐसा संयोग नौ सौ वर्षों के बाद बन रहा है. ऐसे संयोग का गवाह बनने के लिए हम सारे साजोसामान के साथ छत पर जम गए. दो-दो कैमरे (Nikon का DSLR और Cannon का Power Shot), मोबाइल के साथ जब छत पर आये तो सूर्य भगवान अपनी क्षमता के साथ प्रकाशित थे. कैमरे के लेंस के नफा-नुकसान का दिमाग में न लाते हुए सूर्य को कैद करने की कोशिश की. यद्यपि ग्रहण आरम्भ हो चुका था मगर आरंभिक दशा में होने के कारण सूर्य का तेज अपनी चरम पर ही था. कैमरे क्लिक करते रहे मगर तेज रौशनी में वे लगभग निरर्थक प्रयास ही करते लगे. चकाचौंध से भरी फोटो सामने आती रहीं.

ऐसा पहले भी कई बार हुआ कि फोटोग्राफी से सम्बंधित बहुत सी चीजों की कमी खली मगर आज कैमरे फ़िल्टर का न होना बहुत खला. ट्राईपोड की कमी उतनी नहीं खलती है क्योंकि फोटो खींचने का इतना अभ्यास हो चुका है कि बहुत ज्यादा ज़ूम करने के बाद भी कैमरा हिलता नहीं है या फिर न के बराबर कम्पन होता है. बहरहाल, आज कमी फ़िल्टर की महसूस हुई. अब दिमाग लगाया कि क्या किया जाये? उसी समय प्रकृति को भी शायद हमारी सहायता करने का मन हो आया और आसमान पर बादल दिखाई देने लगे. बादलों की ओट में जाने के बाद सूर्य की रौशनी में कमी तो आती मगर कैमरों के लिहाज से फिर भी ज्यादा ही लगी.

चश्मा लगाये कैमरों ने खींचीं सूर्यग्रहण की तस्वीरें 

समय गुजरता जा रहा था, फोटो बहुत कायदे की नहीं आ रहीं थीं. इसलिए अब देशी जुगाड़ लगाने का विचार किया. हम लोग तो चश्मा लगाये हुए थे, मन में आया कि कैमरों को भी चश्मा लगाकर देखा जाये. बस जुगाड़ के साथ कैमरों पर भी चश्मे लगाये गए. रौशनी में बहुत अंतर आया. इधर बादलों में छिपने के कारण भी रौशनी में कमी आती, उस पर काले-लाल चश्मों ने भी रौशनी को रोकने में अपनी भूमिका निभाई. अब हम भी चश्मा लगाये थे और हमारे कैमरे भी चश्मा लगाये थे. हालाँकि फोटो खींचने में कुछ समस्या आ रही थी मगर कभी बिटिया रानी की सहायता से, कभी श्रीमती की सहायता से इस समस्या को दूर करते रहे. 



बस फोटो निकालते रहे और बादलों का भी इंतजार करते रहे. बादल आते, सूर्य को अपने आँचल में छिपाते और हम फ़टाफ़ट क्लिक करते जाते. इसमें भी बहुत से फोटो साफ़ न आये मगर इतने फोटो निकल आये जिनके साथ इस दिन को धरोहर के रूप में सुरक्षित कर लिया. उरई में और जगहों की तरह से छल्ला नहीं बना मगर इस अलौकिक खगोलीय घटना के साक्षी अवश्य बन गए. आप भी चश्मा चढ़ाए कैमरों से खींची गई तस्वीरों का आनंद लीजिये. 






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(यह इस ब्लॉग की 1800वीं पोस्ट है)
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 फ़रवरी 2020

सूरज आ गया पकड़ में, अइया को याद करते हुए

बहुत से दिन, तिथियाँ भुलाए नहीं भूलतीं, ये और बात होती है कि हम सभी अपनी-अपनी व्यस्तता में उन्हें याद न कर पायें. ऐसी तारीखें स्मृति-पटल पर अंकित रहती हैं और वक्त-बेवक्त सामने आ खड़ी होती हैं. हरेक व्यक्ति के जीवन में ऐसी बहुत सी तारीखें होंगी, बहुत सी स्मृतियाँ होंगी जिनको वह चाह कर भी भुला न पाया होगा. ऐसी की अनेक तारीखों में एक तारीख आज की, हमारे जीवन में भी है. न सिर्फ आज की वरन गुजरे कल की तारीख भी आज की तारीख से जुड़ी हुई है. कल यानि कि 23 फरवरी और आज यानि कि 24 फरवरी, ऐसी तारीखें हैं जिसमें परिवार के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति को हम सबने खो दिया था. अपनी अइया को एक दिन पहले हमने अपनी आँखों के सामने अंतिम साँस लेते देखा था और आज अपनी आँखों के सामने ही उनको पंचतत्त्व में विलीन होते देखा था.

ये भी तारीखों का अपना मनोविज्ञान होता होगा. कल से ही मन कुछ उदास है. आज भी कुछ लिखने-पढ़ने का मन नहीं हुआ. पहले सोचा कि अपनी अइया के बारे में कुछ लिखें फिर इसका भी मन न हुआ. असल में व्यक्तिगत हमारे लिए अइया एक इन्स्टीट्यूट जैसी रहीं. उनकी शिक्षा-दीक्षा डिग्रियों के सापेक्ष बहुत नहीं रही हो मगर उनके व्यावहारिक अनुभव बहुत ही गंभीर और सीख देने वाले थे. उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. (इस बारे में फिर कभी)

बस, आज मन न किया तो इधर-उधर का पिटारा खोलकर बैठ गए. कई बार कुछ भी लिखने-पढ़ने का मन नहीं होता. उस समय हम अपने चित्रों को खोलकर बैठ जाते हैं. बहुत सुकून मिलता है. ऐसे ही सुकून के क्षणों में ये चित्र सामने आये. आप भी देखिये.