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21 अक्टूबर 2025

राजनीति में स्वच्छ छवि का स्वागत हो

चर्चित लोकगायिका मैथिली ठाकुर को भाजपा की सदस्यता लेने के अगले दिन ही बिहार विधानसभा चुनाव में अलीनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया. उनको प्रत्याशी बनाये जाने को लेकर अनेक तरह के तर्क-वितर्क शुरू हो गए. कोई उनकी उम्र को लेकर टिप्पणी कर रहा है, कोई राज्यसभा में भेजे जाने की बात कर रहा है. किसी के द्वारा उनके राजनैतिक अनुभवशून्यता का उदाहरण दिया जा रहा है तो किसी के द्वारा इसे कला के प्रति अन्याय बताया जा रहा है. सदस्यता लेने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाये जाने को जहाँ पैराशूट प्रत्याशी से तुलना की जा रही है वहीं स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ पक्षपात करना बताया जा रहा है. इन तमाम सारी चर्चाओं के बीच मैथिली ठाकुर के चरित्र हनन करने सम्बन्धी तमाम मीम्स, चुटकुले सोशल मीडिया कुत्सित मानसिकता वालों द्वारा फैलाये जाने लगे.

 

इन चर्चाओं के सापेक्ष कुछ बातों पर ध्यान देना ही होगा. किसी व्यक्ति के राजनैतिक रूप से अनुभवहीन होने के तात्पर्य यह तो कतई नहीं है कि वह राजनीति में असफल हो जायेगा. वह समाजहित में, जनहित में कार्य नहीं कर सकेगा. देखा जाये तो ये सारी बातें मैथिली की उम्र, कला, अनुभवहीनता आदि के कारण नहीं उपजी हैं बल्कि इनके पीछे भाजपा द्वारा स्थानीय कार्यकर्ताओं को, जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करना है. यह सही हो सकता है कि किसी नए व्यक्ति को पार्टी का सदस्य बनने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाकर उन तमाम पुराने कार्यकर्ताओं, नेताओं की उपेक्षा ही है जो विगत लम्बे समय से अपनी प्रत्याशिता की राह बना रहे थे.

 



एकबारगी मान भी लिया जाये कि यह भाजपा का गलत कदम है कि एकदम नए व्यक्ति को पुराने कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों पर प्रभावी बना दिया गया तो क्या इस बात पर ही किसी भले व्यक्ति को, कलाकार को सक्रिय राजनीति में नहीं उतरने दिया जाना चाहिए? राजनैतिक क्षेत्र को लेकर समाज की विडम्बना यही हो गई है कि एक तरफ लोग राजनीति के गन्दी होने की चर्चा अनेकानेक मंचों से करते हैं मगर उसी के सापेक्ष भले, योग्य व्यक्तियों को सक्रिय राजनीति में देखना भी नहीं चाहते. राजनीति गन्दी है, संसद डाकुओं-लुटेरों से भर गई है, संविधान में हमारा विश्वास नहीं जैसे जुमले आये दिन सुनने को मिल जाते हैं. कविता का मंच होसाहित्य-विमर्श हो या धारावाहिक-फ़िल्मी कार्यक्रम हो सभी में राजनीति को बेकार बताया जाता है. आज राजनीति को गाली देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता हैखुद को जागरूक बुद्धिजीवी समझना होता है.

 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान में बहुतायत जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों से मुकरते जा रहे हैं. राजनीति में पदार्पण करने वाला अत्यंत अल्पसमय में ही बलशाली होकर सामने आ जाता है. कई-कई अपराधों में लिप्त लोग भी माननीय की श्रेणी में शामिल होकर जनता के समक्ष रोब झाड़ते दिखाई देते हैं. राजनीति की वर्तमान व्यवस्था को दोष देने के पूर्व यदि हम अपने क्रियाकलापोंअपनी जागरूकता पर निगाह डालें तो हम ही सबसे बड़े दोषी नजर आयेंगे. हमारे देश की संसद और तमाम विधानसभाओं में एक निश्चित समयान्तराल के बाद चुनाव होता है. चुनाव का निर्धारित समय किसी लिहाज से टाला नहीं जा सकता है और सदन की निर्धारित सीटों को अपने निश्चित समय पर भरा ही जाना है. ऐसे में यदि अच्छे लोग उन्हें भरने को आगे नहीं आयेंगे तो जो भी सामने आयेगा वही आने वाले निर्धारित समय के लिए सदन का निर्वाचित सदस्य होगा. ऐसी स्थिति में दोष हमारा ही है कि हमने स्वयं अपने को अच्छा माना भी है और राजनीति से पीछे खींचा भी है. 

 

देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति के विरुद्ध नकारात्मक माहौल बना दिया है.

 

आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. इस तरह की चर्चाओं के चलते ही अच्छे लोग न राजनीति में आते हैं न ही चुनावों में उतरते हैं. इस तरह की स्थिति के धीरे-धीरे बढ़ने से भले लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सहीकल के लिए; अपने लिए न सहीअपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा.

 

हाँ, मैथिली ठाकुर जैसे लोगों का राजनीति में, चुनावों में उतरना सुखद संकेत है लेकिन ऐसे व्यक्तियों को और राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि ऐसे भले लोग, स्वच्छ छवि के लोग, कलाकार आदि पहले कुछ वर्ष जनता के बीच गुजारें, जनहित के कार्यों में अपना समय दें. इससे जहाँ नागरिकों के बीच उनकी छवि पुष्ट तो होगी ही, अपने दल में भी उनके प्रति एक विश्वास पैदा होगा.


12 जून 2021

बाल श्रम के प्रति सामाजिक नजरिया ही सही नहीं

बाल श्रम की जब भी बात होती है तब हम सभी सार्वजनिक रूप से अपने आदर्श स्वरूप में दिखने लगते हैं. जैसे ही बाल श्रम की बात ख़त्म होती है वैसे ही तुरंत सबकुछ भूल कर हम भी एक सामान्य इंसान की तरह पेश आने लगते हैं. हमारा एक मानना ये है कि यदि हम किसी भी तरह से कोई सकारात्मक काम कर सकें तो उसे कर देना चाहिए क्योंकि वर्तमान में सकारात्मकता की कमी देखने को मिल रही है. कुछ ऐसी ही स्थिति में बाल श्रम भी आता है. आवश्यक नहीं कि बाल श्रम में किसी बालक का काम करना ही शामिल किया जाये. उसके द्वारा किसी भी तरह का ऐसा काम जो उसकी आयु, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार सही नहीं वह उसके व्यक्तित्व विकास में बाधक है, अपने आपमें बाल श्रम की स्थिति में आता है.


इधर बहुत लम्बे समय से सामाजिक जीवन में सहभागिता करने के कारण, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण, किसी न किसी रूप में मीडिया के संपर्क में बने रहने के कारण और उससे अधिक घूमने की प्रवृत्ति होने के कारण आये दिन ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ जाता है जबकि वहाँ बाल श्रम जैसी स्थिति दिखाई देती है. आज के सन्दर्भ में एक घटना याद आ रही है जो लगभग छह-सात साल पुरानी होगी.


हमारे उरई के एक गेस्ट हाउस में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. हम अपनी आदत के अनुसार पीछे बैठे हुए फोटो खींचने में लगे हुए थे. उसी समय हमने देखा कि हॉल में पहली पंक्ति में बैठे लोगों को पानी पिलाने का काम दो बच्चे कर रहे हैं. दोनों की उम्र लगभग आठ-दस साल की रही होगी. जितना आश्चर्य उनकी उम्र को देखकर हुआ उतना ही आश्चर्य पहली पंक्ति में बैठे अतिथियों को देखकर हुआ. उसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी बैठे हुए थे. उनके पीछे की पंक्तियों में मीडिया के लोग, जनपद के गणमान्य नागरिक बैठे हुए थे मगर किसी की तरफ से उन बच्चों के काम करने पर सवाल नहीं किया गया.


उन बच्चों के पानी पिलाने के बाद बाहर निकलने पर उनके पीछे हमने जाकर उनकी जानकारी ली. उन दोनों में बड़ी उम्र की एक लड़की थी. हमारी किसी भी बात का जवाब दिए बिना वह अपने साथ के छोटे लड़के को लेकर उस तरफ चली गई जहाँ नाश्ता, खाना बन रहा था. लगभग दस मिनट बाद एक आदमी हमारे पास आया. उसने जरा गम्भीर सी स्थिति बनाते हुए कारण जानना चाहा उन बच्चों से पढ़ाई के बारे में, उनकी उम्र के बारे में, उनके परिवार के बारे में पूछने को लेकर.


हमने उस व्यक्ति को आश्वस्त किया कि कोई पुलिस जैसा मामला नहीं है, बस हम सामान्य रूप से पूछ रहे थे. जब उस व्यक्ति को लगा कि हम उनका अनिष्ट नहीं करना चाहते हैं तो उसने बताया कि वह उन दोनों बच्चों का मामा है. उन दोनों बच्चों की माँ उसके साथ खाना बनाने का काम करती है. उन बच्चों के पिता का कुछ साल पहले निधन हो गया है. ऐसे में वह अपनी बहिन को अपने साथ इस खाना बनाने वाले काम में लगाये है. इसी के साथ इन बच्चों को काम करने के बदले सौ रुपये देता है. उनकी पढ़ाई के बारे में उसने जानकारी दी कि वे दोनों स्कूल में पढ़ते हैं. रात के समय का खाना होने की दशा में अथवा स्कूल की छुट्टी होने पर उनको भी साथ ले आता है.


अब इसे लेकर वह कितना सही बोला या कितना गलत ये तो वही जाने मगर जब चाय-नाश्ते के समय में उन प्रशासनिक अधिकारियों से, जनप्रतिनिधियों से उन बच्चों के बारे में सवाल किये तो कोई संतुष्टि देने वाला जवाब तो नहीं मिला बल्कि ये सुनने को मिला कि उनकी फोटो कहीं छपवा न देना. सोचा जा सकता है कि जब आँखों देखते हुए हमारे तंत्र की ऐसी स्थिति है तो परदे के पीछे कैसे-कैसे खेल न होते होंगे.


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27 सितंबर 2019

लोकतान्त्रिक तानाशाही का प्रत्यक्ष उदाहरण


हाल ही में एक मामला संज्ञान में आया जो पुलिस से संदर्भित था. पुलिस का नाम सामने आते ही पसीने छूट जाते हैं लोगों के, हमारे भी छूट जाते हैं. अक्सर हम अपने मित्रों से कहते भी हैं कि हमारा और पुलिस का सम्बन्ध उतना ही है जितना हमारा और चंद्रमा का. हम उसे देख सकते हैं, महसूस कर सकते मगर उसे छू नहीं सकते, वो भी हमें न देख सकता है, न महसूस कर सकता है. बहरहाल, इस मामले में अनावश्यक रूप से तूल दिया गया. कई बिन्दुओं पर लगा कि मामले को जबरिया आपराधिक मोड़ दिया जा रहा है. रात का समय था और पुलिस के लोग भी जानते हैं कि एक समय विशेष के बाद आला अधिकारीयों से संपर्क न तो फोन पर संभव होता है और न ही व्यक्तिगत रूप से. रात के मामले या तो निपट ही जाते हैं या फिर वे सलाखों के भीतर रात गुजारने के साथ ही निपटते हैं. इधर ऐसा लग रहा था जैसे सारी प्लानिंग पहले से कर रखी गई हो. दोषी कोई और मगर पकड़ा किसी और को. किसी तरह से कोई हस्तक्षेप न हो सके इसलिए एक संवेदनशील कहानी जोड़ी गई. निर्दोष मामले को संवेदनशील बनाने और राजनैतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए मामले को लड़की छेड़ने से जोड़ दिया गया. लड़की कौन, ये उनको भी न पता था जो मामले की पैरवी कर निर्दोषों को फँसाने में लगे थे.


एक बार मामला पुलिस के पक्ष में आया कि दोनों तरफ से अपनी-अपनी कवायद शुरू हुई. खाकी के पास असीमित कानूनी अधिकार और जनता के पास उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का सहारा. यहाँ समस्या और विकत थी. प्रशासन के आला अधिकारी या तो सोये हुए थे या फिर उनके मोबाइल को उन तक पहुँचाया ही नहीं गया. अब ले-देकर मामला जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाने का समझ आया. यहाँ स्थिति तो बद से बदतर निकली. सत्ता पक्ष के एड़ी से चोटी तक के नेतागीरी करने वालों को, जनप्रतिनिधि कहलाने वालों को, प्रतिनिधि कहलाने वालों को, पदाधिकारी कहने वालों को सिसियाते-मिमियाते देखा. बजाय निर्दोष लोगों की पैरवी करने के वे लोग भी खाकी की कहानी में अपना सिर मटकाते नजर आये. ऐसी घटना जो हुई न हो, ऐसी बात जिसका कोई ओर-छोर न हो उस पर भी जनप्रतिनिधि किसी तरह से अपनी बात को मजबूती के साथ नहीं रख सके. मामला हाथ से सरकता हुआ वापस फिर जनता के हाथ आ गया. निर्दोष व्यक्तियों के परिवारों के पास आ गया. रात करवटें बदलते रहने के अलावा कोई काम न था क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधि सुनी-सुनाई, बनी-बनाई कहानी को सुनकर मस्त-मगन लेटे थे.

ऐसी घटना जो हुई ही नहीं, जिसका कोई प्रमाण नहीं, जिसका कोई गवाह नहीं उसमें भी सत्ताधारी कुर्तेबाज़ बस हाथों की कठपुतली बने नज़र आए. बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीं पहुँच गई. अपना-अपना शेयर सेट करने के माहिर लोगों ने किसी तरह से अपना दायित्व न निभाया. वोट लेने के समय चरणों में लोटने वाले वही चरण सम्बंधित पक्ष के सिर पर मारते समझ आये. अंततः जिसका डर था वही हुआ. बातचीत के सारे रास्ते बंद करते हुए कानूनी रास्ता न चाहते हुए भी अपनाना पड़ा. एक ऐसी गलती की सजा मानने को मजबूर करना पड़ा जो किसी ने की ही नहीं. फ़िलहाल तो पूरी रात और पूरे दिन के बाद घटनाक्रम एक बिंदु पर आकर रुका मगर सबकी असलियत सामने आ गई. अब बड़ी-बड़ी गाड़ियों की बड़ी-बड़ी नेम प्लेट्स और हूटर की हनक में सड़कों, विभागों में तैरते इन (अ)राजनेताओं को प्रत्यक्ष मिलकर नमन किया जाएगा, किसी दिन.

25 अप्रैल 2019

राजनीति को स्वच्छ करना है तो जागना होगा


आजकल लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये? यह स्थिति किसी आम आदमी की अकेले नहीं है, यह समस्या हर वर्ग के साथ है। जो सम्पन्न हैं उनके साथ समस्या है कि अपनी सम्पन्नता को और कैसे बढ़ाया जाये। कैसे अपनी सम्पन्नता और वैभव के दम पर चारों ओर अपनी हनक को जमाया जाये। किस तरह अपनी इस हनक के सहारे से सत्ता को प्राप्त किया जाये। इसी तरह जो सम्पन्न नहीं हैं और सम्पन्नता को पाना चाहते हैं वे भी कोई न कोई जुगत भिड़ाने में लगे रहते हैं। रोजी-रोटी की जुगाड़ में लगे रहते हैं। सम्पन्नता और अभाव से अलग एक और वर्ग है जिसे पिछले कुछ समय से देश में सर्वाधिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है। इस वर्ग में राजनीतिक लोगों को रखा जा सकता है, ऐसे राजनीतिज्ञों को जो किसी न किसी रूप से सत्ता के आसपास मंडराते रहते हैं। यह वह वर्ग है जो किसी न किसी रूप से सत्ता का दुरुपयोग करके स्वार्थ पूर्ति में लगा रहता है। यही वह वर्ग है जो देशहित की बात बड़े-बड़े मंचों से करता है किन्तु मौका आने पर देश विरोधी कार्यों में संलिप्त हो जाता है। ऐसे वर्ग के लिए किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है।


भ्रष्टाचार और घोटालों की दुनिया में किससे साफगोई की उम्मीद की जाये। एक अपने कॉलर को खड़ा करके दूसरे को दोष देना शुरू करता ही है कि अगले ही क्षण उसके कॉलर में भी कालिख दिखनी शुरू हो जाती है। कालिख को पोते एकदूसरे को गाली देने, दोष लगाने के बीच देश के आम आदमी का कितना धन बर्बाद हो रहा है इस बात की कोई फिक्र किसी को भी नहीं रही। राजनीतिक केंद्र के चारों तरफ घूमा-फिरी करने वाला ऐसा वर्ग खुद किसी न किसी तरह इसी केंद्र में शामिल होना चाहता है। उसके लिए राजनीति करना देशहित के लिए नहीं, नागरिकों के लिए, जनता के लिए नहीं, समाजहित के लिए नहीं वरन राजनीति के द्वारा मिलने वाले लाभों की प्राप्ति के लिए है। इसके लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है। यही कुछ कर गुजरने की स्थिति ही राजनीति में नकारात्मकता पैदा कर रही है। जिनका किसी भी रूप में सामाजिक कार्यों से लेना-देना नहीं है वे खुद को वरिष्ठ समाजसेवी बताते हुए राजनीति में घुसने का रास्ता तलाशते हैं। इसी रास्ते के द्वारा वे कालांतर में अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में लग जाते हैं। 

राजनीति में निरन्तर आ रही गिरावट का कारण राजनीति नहीं वरन उसमें शामिल होने वाले लोग हैं। इनके कुकृत्य ही राजनीति को कलंकित कर रहे हैं। राजनीति में से यदि धन को निकाल दिया जाये तो संभव है कि राजनीति में वह संख्या आधी से भी कम रह जाए जो आज राजनीति के नाम पर इधर-उधर से धन-उगाही करती घूमती है। इसके लिए सबसे पहले तो सांसद निधि, विधायक निधि को समाप्त किये जाने की आवश्यकता है। सोचना चाहिए कि ये जनप्रतिनिधि नीतियाँ बनाने के लिए हैं, नीति-निर्धारण के लिए हैं आखिर इनको कार्यों के संपादन के लिए क्यों लगाया जाता है? प्रशासन इसी कार्य के लिए पहले से दत्तचित्त होता है। विधायकों का, सांसदों का काम सदन में बैठकर नीतियां बनाना है साथ ही अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सुनकर उसके लिए लाभार्थ योजनाओं का निर्धारण करना है। इसके बजाय आज के जनप्रतिनिधि हैण्डपम्प, नालियां, सड़कें, खडंजा आदि के निर्माण के लिए निधियों की संस्तुति करते घूम रहे हैं। ऐसी स्थितियों के बीच वे लोग फायदा उठा ले जाते हैं जो राजनीति के नाम पर बस धन-उगाही में लगे हुए हैं।

राजनीति का स्तर, कलेवर अब बहुत बदला है। तकनीक ने, सोशल मीडिया ने किसी भी घटना को, किसी भी घटनाक्रम को एक व्यक्ति या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने दिया है। अब वह वैश्विक स्तर तक अपनी पहुँच बना चुकी है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि और उनके आसपास डोलने वाले लोग अपने पर संयम न रखकर इसी तरह राजनीति करते रहेंगे तो आने वाले समय में ऐसे लोगों का ही जमावड़ा राजनीति में दिखाई देगा जो बस स्वार्थ-पूर्ति में यहाँ आये हुए हैं। ऐसे लोगों से किसी भी प्रकार से देशहित की उम्मीद नहीं की जा सकती है। स्पष्ट है कि तब भी बात को समझे बिना राजनीति को ही दोष दिया जायेगा, जैसे कि आज दिया जा रहा है।

12 मई 2018

वर्तमान जनप्रतिनिधियों के स्वभाव को आईना दिखाता पत्र


आज आपके साथ एक पत्र शेयर कर रहे हैं, जो सन 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रहे श्री ध्रुव नारायण सिंह वर्मा जी ने हमारे पिताजी श्री महेन्द्र सिंह सेंगर को लिखा था. पत्र दन की तरफ से जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जाने वाली डाक-सामग्री में लिखा गया था क्योंकि विधान परिषद् सदस्य होने सम्बन्धी उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी चिन्ह उस पर अंकित है.  यहाँ उस पत्र को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह नहीं कि उसे किसी विधान परिषद् सदस्य द्वारा हमारे पिताजी को लिखा गया था. यह किसी और के लिए भले ही विशेष हो किन्तु हमारे लिए इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि पिताजी के राजनैतिक रूप से सक्रिय रहने के कारण ऐसे अनेकानेक पत्रों से हमारा परिचय होता रहता था. इस पत्र को यहाँ देने के पीछे का उद्देश्य इस पत्र में विधान परिषद् सदस्य की मानसिकता का परिचय देना है, उनकी इसी विशेषता का परिचय देना है.


उन्होंने पत्र में तत्कालीन समाचार-पत्र स्वतंत्र भारत का जिक्र किया है. हम लोगों के घर में यह पत्र नियमित रूप से आया करता था. पिताजी समय-समय पर कभी खबरों के रूप में, कभी सम्पादक के पत्र के रूप में समाज की समस्याओं को उठाते रहते थे. जिस पत्र का जिक्र विधान परिषद् सदस्य ध्रुव नारायण जी ने किया उसमें भी पिताजी द्वारा एक समस्या को उठाया गया था. पिताजी ने स्वतंत्र भारत समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम पत्र में बेतवा नहर प्रखंड की कुठौंद शाखा की कैलोर माइनर की टेल-गूल सम्बन्धी समस्या को उठाया था, जिसे ध्रुव नारायण जी ने पढ़ा. यही इस पत्र की विशेष बात है कि वे उस समस्या को पढ़कर शांत नहीं रहे. उन्होंने उस समस्या, समाचार-पत्र को इंगित करते हुए पिताजी को लिखा कि वे उन्हें इस विषय में लिखें. इसके पीछे ध्रुव नारायण जी का उद्देश्य सम्बंधित समस्या को विधान परिषद् में उठाने की इच्छा रखना था.

आज कुछ कागजात खोजते समय जब इस पत्र को अचानक देखा तो लगा कि आज के और उस दौर के जनप्रतिनिधियों में कितना अंतर आ गया है. एक तबके ऐसे जनप्रतिनिधि थे जो समाचार-पत्र में सम्पादक के नाम पत्र कॉलम में प्रकाशित किसी समस्या का संज्ञान स्वतः लेकर उसे सदन में उठाने की इच्छा व्यक्त करते थे. एक आज के दौर के जनप्रतिनिधि हैं जो बार-बार ज्ञापन देने, प्रार्थना-पत्र देने, याद दिलाने के बाद भी समस्या के निस्तारण की पहल नहीं करते. आज के ऐसे जनप्रतिनिधियों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ मालूम होता है कि वे स्वयं किसी समस्या का संज्ञान लेकर उसे सदन में उठाएंगे. फ़िलहाल, ऐसे पत्र हमारी पीढ़ी की थाती तो हैं ही आज के जनप्रतिनिधियों के लिए कुछ सीख लेने का पाठ भी हैं. काश कि वे कुछ सीख पाते अपे वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों से.