12 May 2018

वर्तमान जनप्रतिनिधियों के स्वभाव को आईना दिखाता पत्र


आज आपके साथ एक पत्र शेयर कर रहे हैं, जो सन 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रहे श्री ध्रुव नारायण सिंह वर्मा जी ने हमारे पिताजी श्री महेन्द्र सिंह सेंगर को लिखा था. पत्र दन की तरफ से जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जाने वाली डाक-सामग्री में लिखा गया था क्योंकि विधान परिषद् सदस्य होने सम्बन्धी उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी चिन्ह उस पर अंकित है.  यहाँ उस पत्र को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह नहीं कि उसे किसी विधान परिषद् सदस्य द्वारा हमारे पिताजी को लिखा गया था. यह किसी और के लिए भले ही विशेष हो किन्तु हमारे लिए इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि पिताजी के राजनैतिक रूप से सक्रिय रहने के कारण ऐसे अनेकानेक पत्रों से हमारा परिचय होता रहता था. इस पत्र को यहाँ देने के पीछे का उद्देश्य इस पत्र में विधान परिषद् सदस्य की मानसिकता का परिचय देना है, उनकी इसी विशेषता का परिचय देना है.


उन्होंने पत्र में तत्कालीन समाचार-पत्र स्वतंत्र भारत का जिक्र किया है. हम लोगों के घर में यह पत्र नियमित रूप से आया करता था. पिताजी समय-समय पर कभी खबरों के रूप में, कभी सम्पादक के पत्र के रूप में समाज की समस्याओं को उठाते रहते थे. जिस पत्र का जिक्र विधान परिषद् सदस्य ध्रुव नारायण जी ने किया उसमें भी पिताजी द्वारा एक समस्या को उठाया गया था. पिताजी ने स्वतंत्र भारत समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम पत्र में बेतवा नहर प्रखंड की कुठौंद शाखा की कैलोर माइनर की टेल-गूल सम्बन्धी समस्या को उठाया था, जिसे ध्रुव नारायण जी ने पढ़ा. यही इस पत्र की विशेष बात है कि वे उस समस्या को पढ़कर शांत नहीं रहे. उन्होंने उस समस्या, समाचार-पत्र को इंगित करते हुए पिताजी को लिखा कि वे उन्हें इस विषय में लिखें. इसके पीछे ध्रुव नारायण जी का उद्देश्य सम्बंधित समस्या को विधान परिषद् में उठाने की इच्छा रखना था.

आज कुछ कागजात खोजते समय जब इस पत्र को अचानक देखा तो लगा कि आज के और उस दौर के जनप्रतिनिधियों में कितना अंतर आ गया है. एक तबके ऐसे जनप्रतिनिधि थे जो समाचार-पत्र में सम्पादक के नाम पत्र कॉलम में प्रकाशित किसी समस्या का संज्ञान स्वतः लेकर उसे सदन में उठाने की इच्छा व्यक्त करते थे. एक आज के दौर के जनप्रतिनिधि हैं जो बार-बार ज्ञापन देने, प्रार्थना-पत्र देने, याद दिलाने के बाद भी समस्या के निस्तारण की पहल नहीं करते. आज के ऐसे जनप्रतिनिधियों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ मालूम होता है कि वे स्वयं किसी समस्या का संज्ञान लेकर उसे सदन में उठाएंगे. फ़िलहाल, ऐसे पत्र हमारी पीढ़ी की थाती तो हैं ही आज के जनप्रतिनिधियों के लिए कुछ सीख लेने का पाठ भी हैं. काश कि वे कुछ सीख पाते अपे वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों से.

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