13 May 2018

मदर्स डे की सेल्फ़ी

मदर्स डे की सेल्फ़ी - लघुकथा 
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“मम्मी, तुमसे दो सेकेंड आँखे खुली नहीं रखी जा सकती..?” मोबाइल में फ़ोटो देखते बेटे की आवाज़ में तेज़ी आई.

“ओफ़्फ़ो, क्या मम्मी तुम भी, अब आँखें खोली तो नीचे देखने लगी. ये-ये-ये दिख रहा, गोल-गोल, काला निशान... इसे देखो, इसे...” ऊँगली से मोबाइल में कैमरे के लेंस को दिखाते हुए बेटे की आवाज़ में झल्लाहट, खीझ, ग़ुस्सा स्पष्ट दिखाई दे रहा था. 

“अबकी आँखें खोले रखना देवी माँ और इसी काले गोले को देखती रहना, बस...” हाथ जोड़ते हुए बेटे ने माँ को कड़े शब्दों में समझाया. 

“वो बेटा... क्या है न... वो... इसकी सफ़ेद चमक में आँखें चौंधिया जाती हैं.... अपने आप... बंद हो जाती हैं.” माँ ने हकलाते हुए, बहुत धीमे से आवाज़ निकाली. 

“ठीक है, ठीक है...” बेटा अपने मोबाइल का एंगल सेट करते हुए बोला. 

“जे बात, अब एकदम चौकस फ़ोटो आई है.” चेहरे पर ख़ुशी और होंठों पर मुस्कान बिखेर बेटे ने माँ की तरफ़ देखे बिना कहा और मोबाइल में कुछ खिट्ट-पिट्ट करने लगा. 

“बेटा वो....” इससे पहले कि माँ कुछ पाती बेटे ने फ़रमान सा जारी कर दिया, “हो गया काम, अब जाओ अपने कमरे में. मुझे अपने ऑफ़िस मीटिंग के कुछ पेपर सेट करने हैं.” 

“चश्मे की डंडी... और खाँसी की दवा....” माँ ने बाक़ी शब्द गले से बाहर निकलने न दिए. 

मोबाइल पर दौड़ती उँगलियाँ थाम बेटे ने घूरते हुए माँ को देखते हुए लगभग फुफकारा, “कहाँ आ रही खाँसी? और क्या चौबीस घंटे चश्मे का काम रहता है? बस पैसे बर्बाद करवाना है और कुछ नहीं.” 

“ऐसा नहीं बेटा....”

“अब जाओ, करते हैं कुछ व्यवस्था दो-चार दिन में.” कह कर बेटे ने उँगलियों को मोबाइल पर दौड़ाना शुरू कर दिया. 

इससे पहले कि माँ कुछ और बोल पाती, बेटे के मोबाइल ने संगीत सुनाना शुरू कर दिया. 

“हाँ, हाँ... माँ है मेरी... हाँ, मेरे ही साथ रहती है.”
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“अरे नहीं यार, वो क्या है न, आज मदर्स डे है न... इसीलिए उसके साथ की फ़ोटो पोस्ट की है.” 
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“अबे, तू भी लगा जल्दी से... अच्छे से कैप्शन के साथ....इम्प्रेशन बढ़िया पड़ता है, सब पर.”
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“उसकी चिंता छोड़, कैप्शन मैं सेंड करता हूँ अभी... चल तू फ़ोटो निकाल पहले. इन बुड्डों के फ़ोटो खिंचवाने में सौ नाटक.” 

दरवाज़े को धीरे-धीरे बढ़ती माँ न तो आज इस तरह  बेटे का लिपट कर फ़ोटो खींचना समझ पाई. न मदर्स डे का अर्थ जान पाई. बस अपनी धोती के पल्लू को मुँह तक ले जाना जान पाई, आख़िर अगले पल उठने वाली खाँसी को उसी में ही तो छिपाना है.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र 

13-05-2018 

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