15 May 2018

सियासी दाँव-पेंचों में उलझा कर्नाटक


कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुतेरे मीडिया केन्द्रों ने लगभग साबित सा कर दिया था कि वहां भाजपा को कोई लाभ होने वाला नहीं है. इस तरह के आकलन करने के पीछे उनके पास कोई ठोस नजरिया नहीं था और न ही कोई ठोस तथ्य मौजूद थे. कर्नाटक चुनाव का आकलन चुनाव विश्लेषकों द्वारा, मोदी-विरोधियों द्वारा, भाजपा-विरोधियों द्वारा उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए गोरखपुर एवं फूलपुर लोकसभा उपचुनावों को आधार बनाकर किया जा रहा था. इन दोनों चुनावों में भाजपा हार गई थी और इनमें सपा-बसपा का गठबंधन विजयी रहा था. ऐसे में सभी ने ये स्वीकार सा कर लिया था कि यदि सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो जाये तो भाजपा को हराया जा सकता है. इसके साथ-साथ 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. इस आधार को ऐसे लोग इस बार दरकता हुआ बताने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. इसके अलावा जिस तरह से केंद्र सरकार ने नोटबंदी के तुरंत बाद जीएसटी को लागू किया, उससे ऐसा लगने लगा था कि देश का व्यापारी अवश्य ही केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करेगा. इन दो जगहों पर केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. मोदी-विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार की किसी भी योजना की, किसी भी कदम की सराहना करते नहीं दिखाया गया. देश भर में चलने वाले तथाकथित विरोध को कैसे न कैसे करके कर्नाटक चुनाव से जोड़ने की कोशिश करते हुए ये साबित किया जा रहा था कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.


आर्थिक स्तर पर ऐसी स्थितियों को बार-बार दिखाने वाले मोदी-विरोधियों द्वारा सफलता न मिलते देख कर कठुआ काण्ड की इबारत लिखी गई, जिन्ना तस्वीर का प्रकरण उठाया गया. इस तरह के मामले किसी न किसी तरह से भाजपा-विरोध में, मोदी-विरोध में उठाकर जनता के बीच लाया जा रहा था. इन सबके केंद्र में मुख्य रूप से कर्नाटक चुनाव ही बना हुआ था. ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इसके उलट असलियत ये है कि कर्नाटक में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का रुख भाजपा की तरफ हुआ. किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं हों, वहाँ पर भ्रष्टाचार होने का मुद्दा हो, राज्य का अलग झन्डा बनाये जाने का विचार हो, पेयजल की समस्या का होना हो या फिर चुनाव के ठीक पहले लिंगायत मुद्दे को हवा देना का मामला हो, सभी ने कांग्रेस को कई पायदान पीछे कर दिया था.

चुनाव रैलियों के दौरान जिस तरह से दोनों तरफ से बयानों के तीर छोड़े गए, उसमें अपनी उपलब्धियाँ कम बल्कि दूसरे की नाकामियां अधिक बताई गईं. मोदी के पक्ष में कहीं न कहीं केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजनायें, स्वच्छ भारत अभियान, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, स्टार्ट अप योजना, फसल बीमा योजना आदि भी काम करती दिख रही थीं. हाल ही में देश भर में विद्युतीकरण ने भी आम नागरिकों के मन में केंद्र सरकार की विकास नीति को गहरे से बैठा दिया था. इन योजनाओं के सहारे और मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही सरकार न बना सके किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सकेगी. इसके अलावा कांग्रेस प्रचारकों के पास वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री की सफलता गिनाने को भी नहीं थीं. ये स्पष्ट संकेत कर रहा था कि इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में अपनी सफलता की कहानी को दोहरा नहीं सकेगी. अपनी-अपनी योजनाओं की सफलता-असफलता के रथ पर चढ़कर चुनाव प्रचार में निकले मोदी के प्रति युवाओं के मन में अधिक आकर्षण, अधिक सम्मान देखने को मिल रहा था. कर्नाटक का आम मतदाता कर्नाटक की सरकारों के कार्यों का आपस में तुलनात्मक अध्ययन नहीं कर रहा था वरन उसके सामने वर्तमान कांग्रेस सरकार के पांच वर्षों के मुकाबले भाजपा के केंद्र में चार सालों का कार्य था. स्पष्ट है कि वे कार्य राज्य के कार्य पर भारी पड़े.

चुनाव परिणामों का आना अभी भी बना हुआ है. देर रात तक स्थिति स्पष्ट होगी कि कौन सरकार बनाएगा किन्तु चुनाव परिणामों से इतना स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आ रही है. बाकी सरकार बनाना इसी आँकड़ेबाजी के अधीन है. इसमें जो भी जादुई 113 का आँकड़ा छू लेगा वही जनता का प्रतिनिधित्व करने आगे आ जायेगा.  

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