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16 मार्च 2026

पिताजी के बाद का समय

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 

आज बहुत सी घटनाओं के समय लगता है कि समय ने बहुत कुछ दिया मगर उससे ज्यादा कष्ट दिया है. बावजूद इसके कोशिश यही रहती है कि कहीं से कमजोर न पड़ें. आपकी उपस्थिति को अपने आसपास महसूस करते हुए जीवन में आई दिक्कतों, उलझनों से निपटने, निकलने का रास्ता बनाते रहते हैं. 

आपके श्रीचरणों में सादर नमन.

14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


23 फ़रवरी 2026

अइया को याद करते हुए

संसार में आने वाले व्यक्ति को जाना होता ही है, ये विधान है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अईया के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अईया के चले जाने के बाद के पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं मगर एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था.

 

खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अईया की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.


01 जनवरी 2026

मोबाइल से इतर भी है ज़िन्दगी

नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.

 

यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है. यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?

 



वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं. इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही बात न करें, सिर्फ किसी कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.

 

मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों में, कार्यक्रमों में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.

 

मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे हैं.

 

नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

 


18 अक्टूबर 2025

दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो

‘दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो’ यह वाक्य कितना सुन्दर, सार्थक, सशक्त और मनोहारी प्रतीत होता है. चारों ओर दीपों की कतार, मोमबत्तियों-झालरों का सतरंगी प्रकाश, रंग-बिरंगी आतिशबाजी, विविध आवाजों-रोशनियों के साथ फूटते पटाखे... अपने आप में अद्भुत छटा का प्रदर्शन करते हैं. बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी अपनी-अपनी उमंग और मस्ती में दीपावली का आनन्द उठाते नजर आते हैं. नये-नये परिधानों में सजे-संवरे लोग एकदूसरे से मिलजुल कर समाज में समरसता का वातावरण स्थापित करते हैं. दीपावली का पर्व सभी के अन्दर एक प्रकार की अद्भुत चेतना का संचार करता है. घरों की साफ-सफाई, लोगों से मिलना-जुलना, मिठाई आदि घर-परिवार के सभी सदस्यों को समवेत रूप से सहयोगात्मक कदम उठाने में मदद करता है.

 

भारतीय परम्परा, संस्कृति में पर्वों, त्यौहारों का महत्व हमेशा से रहा है. यहाँ की अनुपम वैविध्यपूर्ण संस्कृति में विभिन्न मनमोहक ऋतुएँ हैं, ठीक उसी तरह से विविधता धारण किये पर्व-त्यौहार भी हैं. इन त्यौहारों की विशेष बात यह है कि इन्हें धार्मिकता से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिकता से भी परिपूर्ण बनाया गया है. धार्मिक संदेशों के मध्य से सामाजिक सरोकारों, समरसता, सौहार्द्र, भाईचारे आदि की भी प्रतिस्थापना करते ये पर्व दिखाई देते हैं. किसी भी पर्व का, किसी भी अनुष्ठान का उद्देश्य मात्र स्वयं को प्रसन्न रखने की स्थिति में नहीं होना चाहिए. इनका उद्देश्य सदैव यही हो कि सामाजिकता का विकास हो, सामाजिक सरोकारों की स्थापना हो. व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़े रखने का माध्यम यही पर्व-त्यौहार बनें. दीपावली के संदर्भ में ही देखें तो इसके आने के कई-कई दिनों पूर्व से घर के कार्यों को आपसी सहयोग से सम्पन्न करना, उत्सव के दिन सभी से मिलने-जुलने का उपक्रम किसी भी रूप में असामाजिकता का संदेश देता नहीं दिखता है.

 



वर्तमान में स्थितियों में कुछ परिवर्तन सा महसूस होता है. सहजता और सरलता का प्रतीक पर्व अब बाह्य आडम्बर और चकाचौंध भरी स्थितियों के वशीभूत होता समझ में आता है. यदि हम अपने आसपास के परिदृश्य का अवलोकन करें तो तमाम सारी प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ कृत्रिमता का विकास होता भी समाज में दिखाई देता है. भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगीकरण जैसी भारी-भरकम वैश्विक शब्दावली ने पर्वों-त्यौहारों की सहजता, सरलता को विखण्डित सा कर दिया है. दीपावली का रंगीन-रोशनीपरक उद्देश्य ‘इस दीपावली आप क्या खिला रहे हैं’ की सेल्युलाइड दुनिया के पीछे संकुचित, भयभीत सा खड़ा दिखाई देता है. इसी आभासी दुनिया का दुष्परिणाम है कि अब आकाश को छूने के लिए उड़ते रॉकेट को देखकर बच्चों की तालियाँ, खिलखिलाती हँसी नहीं वरन् उनकी फटी-फटी सी आँखें, अचम्भित से हाव-भाव दिखाई पड़ते हैं. कृत्रिम चकाचौंध और औपचारिकता की भेंट हमारे पर्व ही नहीं चढ़े हैं वरन् हमारे रिश्ते-नाते, हमारे सामाजिक सरोकार भी तिरोहित हुए हैं. बच्चों के हाथों में झूमती रंगीन फुलझड़ी एकाएक मद्विम पड़ जाती है जैसे ही उसके सामने विदेशी आतिशबाजी आकर अपना विस्तार करने लगती है. गरिमामयी रिश्तों की गर्मजोशी अचानक ही हिम प्रशीतक की भांति लगने लगती है जब कि किसी और के हाथों में मंहगे गिफ्ट प्रदर्शित होने लगते हैं.

 

हमारे घरों में आज लक्ष्मी जी के रात में उतर कर आने की संकल्पना कार्य नहीं करती वरन् लक्ष्मी जी के वर्तमान धौंसपरक स्वरूप से अपने आपको प्रतिष्ठित करने की भावना कार्य करती है. मँहगे से मँहगे संसाधनों का उपयोग करके हम दीपावली का त्यौहार नहीं मनाते हैं बल्कि अपने आसपास के वातावरण में अपनी सत्तात्मक स्थिति को स्थापित करने का कार्य करते हैं. ऐसी विद्रूपकारी, हास्यास्पद स्थितियों में अब हँसी भी नहीं आती है बल्कि सरोकारों के संकुचित होते जाने को देखकर आँखों में आँसू अवश्य ही उतर आते हैं. हमारी स्वयं को स्थापित करने की सोच के कारण समाज से समरसता और भाईचारे जैसी स्थितियों का विलोपन सा होता जा रहा है. सौहार्द्र को भी बाजारीकरण का रंग चढ़ जाता है; सद्भावना भी झिलमिलाती पॉलीपैक में बिकने लगती है; भाईचारा भी किसी यूज एण्ड थ्रो जैसी बोतल मे चमकदार पेय पदार्थ सा चमकने लगता है. ऐसे में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दीपमालिके तेरा आना मंगलमय हो?

 

नैराश्य के इस वातावरण के बाद भी; कृत्रिम चकाचौंध के बीच भी; दीपावली का एक ही दीपक अंधियारे को मिटाने हेतु संकल्पित रहता है. हमें भी उसी दीपक की तरह से स्वयं को इन विपरीत स्थितियों के बाद भी, सामाजिक सरोकारों के विध्वंसपरक हालातों के बाद भी दीपमालिके का स्वागत तो करना ही है. बाजारीकरण में गुम सी हो चुकी भारतीयता में भी प्रस्फुटन सा दिखता है जो हमें जागृत करता है कुछ करने को; एक प्रकार के आवरण को गिराने को; असामाजिकता को मिटाने को; सामाजिक सरोकारों की स्थापना को. इसके लिए हमें सर्वप्रथम स्वयं से ही आरम्भ करना होगा. भारीभरकम खर्चों के बीच, मँहगी से मँहगी आतिशबाजी को उड़ाते समय एकबारगी हम उन बच्चों के बारे में भी विचार कर लें जो कहीं दूर सिर्फ इनकी रोशनियाँ देखकर ही अपनी दीपावली मना रहे होंगे. उन बच्चों के बारे में भी एक पल को सोचें जो कहीं दूर किसी कचरे के ढेर से जूठन में अपना भोजन तलाशते हुए अपने पकवानों की आधारशिला का निर्माण कर रहे होंगे. यह नहीं कि हम दीपावली पर अपने उत्साह को, अपनी उमंग को व्यर्थ गुजर जाने दें पर कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कल को एकान्त में, तन्हा बैठने पर हमें स्वयं के कृत्यों से शर्मिन्दा न होना पड़े; हमें अपने एक बहुत ही छोटे से कदम से हमेशा प्रसन्नता का एहसास होता रहे; अपनी खुशी से दूसरे बच्चों में, और लोगों की खुशी में वृद्धि का भाव जागृत होता रहे. हमें दीपमालिके के स्वागत में एक-एक दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इसका प्रकाश सिर्फ और सिर्फ हमारे घर-आँगन तक नहीं अपितु समाज के उस कोने-कोने को भी आलोकित कर दे जिस कोने में अंधेरा वर्षों से अपना कब्जा कायम रखे है. उजाले की एक सकारात्मक किरण ही भीषणतम अंधेरे को मिटाने की शक्ति से आड़ोलित रहती है, बस हम ही संकल्पित हों और पूरे उत्साह से, उमंग से परिवर्तन का, समरसता का दीपक प्रज्ज्वलित करने का विश्वास अपने में कर लें. आप स्वयं एहसास करेंगे कि आपका मन स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से दीपमालिके का स्वागत करने को तत्पर हो उठेगा.


23 जुलाई 2025

नशे की तरफ बढ़ते युवा-कदम

हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया, एक गीत की इस पंक्ति ने युवाओं को बहुत प्रभावित किया है. उनके लिए इस पंक्ति का सन्दर्भ उन्मुक्त रूप से धुँआ उड़ाना भर है. इसके वशीभूत युवाओं की बहुत बड़ी संख्या जगह-जगह कहीं छिपे रूप मेंकहीं उन्मुत भाव से धुआँ उड़ाती नजर आती है. ऐसे युवाओं को गीत की इस पंक्ति ने जितना प्रभावित किया है उतना इसके अगले भाग ने नहीं किया है. धुँए से खेलती इस पीढ़ी को मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गयावाला दर्शन याद नहीं है. रील बनाने में खोयी रहने वाली, अपने आपको स्वतंत्रता से उद्दंडता की तरफ ले जाती पीढ़ी को कतई भान नहीं है कि किसी भी गीत की पंक्तियों का अनुसरण करना और ज़िन्दगी की वास्तविकता को समझना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं. ज़िन्दगी को जीने के अंदाज, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाये रखने की कार्य-शैली से इतर आज का युवा नशे की दुनिया में हँसते-मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहा है. उसके लिए ये किसी खतरे का सूचक नहीं बल्कि एक तरह का एडवेंचर है, जिसे वह किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहता है.

 

सामाजिक रूप से यह स्थिति चिंताजनक है कि जिस उम्र में किशोरों, युवाओं को अपने दैहिक सौष्ठव की तरफ, बौद्धिक विकास की तरफ, अध्ययन की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए उस उम्र में वे नशे का शौक पालने में लगे हैं. शौक-शौक में कभी-कभी ही नशे की तरफ बढ़े कदम कब उनकी मजबूरी बन जाते हैं, उनको इसकी भनक तक नहीं लगती है. शौकिया उठाये गए कदम की मजबूरी में फँसकर वे इसे ज़िन्दगी जीने का तरीका समझने लगते हैं. अपनी मस्तीअपनी दुनियाअपनी स्वतंत्रता में इनको आभास ही नहीं होता है कि वे कब ज़िन्दगी को जीने की कोशिश में ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने लगे हैं.

 



ऐसी स्थितियों के लिए पूरी तरह से युवाओं को अथवा किशोरों को दोष देना भी उचित नहीं है. देखा जाये तो भौतिकतावादी दौड़ में ऐसे बच्चों के अभिभावक भी शामिल हैं. आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अनुशासन का पाठ सिखाने वाले, जीवन की जिम्मेदारियों से परिचय कराने वाले अभिभावक अपने ही बच्चों के मित्र रूप में परिवर्तित हो गए. मैत्री भरे कथित वातावरण में अब बच्चों को किसी भी संसाधन की, उत्पाद की महत्ता समझाने के बजाय उसकी सहज उपलब्धता करवाई जा रही है. अनुशासन-मुक्त लाड़-प्यार में उपलब्ध संसाधनों के चलते ऐसे बच्चों को न तो धन की महत्ता समझ आती हैन समय कीन कैरियर की और न ही अपनी ज़िन्दगी की. इसी मानसिकता के कारण समाज का बहुसंख्यक युवा वर्ग गैर-जिम्मेदारी का परिचय देते हुए उद्दंड नजर आने लगा है. इसी का दुष्परिणाम है कि अधिकांश बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति पनप रही है, वे गलत रास्तों की तरफ बढ़ जाते हैं, नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं.

 

नशा-मुक्त समाज की संकल्पना समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की चाह है. इसके बाद भीनशे के दुष्प्रभाव की जानकारी होने के बाद भी युवाओं में ही नहीं बल्कि समाज में नशे के प्रति आसक्ति लगातार बढती ही जा रही है. शादी-विवाह के समारोहकिसी भी हर्ष-उमंग का अवसर होनायुवाओं की अपनी मस्ती आदि अब बिना नशे के पूरी नहीं हो पाती है. कहीं न कहीं समाज में इस तरह के नशे को स्वीकार्यता मिल चुकी है. किसी भी तरह का आयोजन होछोटे-बड़े स्तर के क्लब या होटल हों सभी में किसी न किसी रूप में नशे की उपस्थिति देखने को मिलने लगी है. बहुत सी जगहों पर खुलेआम या चोरी-छिपे ड्रग्स पार्टियाँहुक्का बार आदि जैसी संकल्पना धरातल पर देखने को मिलती है. दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आयोजनों में बहुतायत में किशोरों का, युवाओं का सम्मिलन रहता है. आधुनिकता के परिवेश में लिपटी ऐसी पार्टियों में सिगरेट, शराब की आड़ में नशीले तत्त्वों, विभिन्न ड्रग्स की सहज पहुँच बनी होती है.  

 

नशा-मुक्त समाज की अवधारणा को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम तो ऐसे नशीले पदार्थों की आवक पर ध्यान देने की जरूरत है; उसके स्त्रोतों को पकड़ने की जरूरत है; इनको बाज़ार में खपाने वाले तत्त्वों को खोजने की जरूरत है. इसके साथ-साथ यह भी समझना होगा कि आखिर नशे की गिरफ्त में विशेष रूप से युवा वर्ग क्यों आ रहा हैइसके लिए समाज में युवाओं कीकिशोरों की समस्याओं पर विचार करने की आवश्यकता है. औद्योगीकरणवैश्वीकरण की परिभाषा इस तरह से चारों तरफ घेर दी गई है कि सिवाय लाखों के पैकेज के युवाओं को और कुछ सूझ नहीं रहा है. आपस में बढ़ती गलाकाट प्रतियोगी भावनाजल्द से जल्द सफलता की अधिकतम ऊँचाइयों को प्राप्त कर लेने की लालसाकम से कम प्रयासों में अधिकतम प्राप्ति की चाह आदि ने युवा वर्ग को अंधी दौड़ में शामिल करवा दिया है. इस दौड़ में एक बार शामिल हो जाने के बाद उनको न तो अपना भान रहता है और न ही सामाजिकता का. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों के युवाओं के समक्ष कार्य के अवसरों के अत्यल्प होने के कारण से अवसाद जैसी स्थिति है. लाभ केउन्नति केसमर्थ कार्य करने आदि के कम से कम अवसरों के कारण यहाँ के युवा निराश तो रहते ही हैं साथ ही महानगरों की चकाचौंध उनको हताश भी करती है.

 

सरकार कोसमाज के जागरूक लोगों को नशा मुक्ति के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसरों की अनुकूलता बढ़ाने की आवश्यकता है. जो युवा वर्ग भौतिकता की अंधी दौड़ में फँस गया है उसको समझाने कीसँभालने की जरूरत है. यदि हम अपनी युवा पीढ़ी को सही-गलत का अर्थ समझा सकेसामाजिकता-पारिवारिकता का बोध करा सकेकर्तव्य-दायित्व को परिभाषित करा सके तो बहुत हद तक नशा-मुक्त समाज स्थापित करने में सफल हो जायेंगे. 

 


16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


13 जून 2025

ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट

मृत्यु अटल सत्य है, जो सम्बंधित व्यक्ति के परिजनों को दुःख-आँसू ही देती है लेकिन अहमदाबाद में 12 जून 2025 को हुई हवाई जहाज दुर्घटना दुखद तो है ही, झकझोरने वाली भी है. इस दुर्घटना से सम्बंधित चित्र, वीडियो, दिवंगत हो गए लोगों के परिजनों के आँसू देखकर मन विचलित है. इनको देखकर जीवन-मृत्यु को संचालित करने वाली शक्ति से इतनी ही प्रार्थना है कि इस दुर्घटना जैसी मृत्यु किसी के जीवन में न लिखे. कारण यह नहीं कि यह दुर्घटना भयावह थी बल्कि इसलिए क्योंकि इस दुर्घटना में हमेशा को चले जाने वाला व्यक्ति वास्तविक में हमेशा को ही चला गया.

 

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह व्यक्ति सदा-सदा को चला जाता है, उसे फिर कभी वापस नहीं आना होता है. इस दुर्घटना में भी मृतकों को कभी वापस नहीं आना है मगर उनके परिजनों के हिस्से में भी न भुलाया जाने वाला दर्द सदा-सदा को आ गया है. उस पल की कल्पना करके ही आँखें नम हो जा रहीं जबकि हँसकर परिवार वालों ने अपनों को विदा किया होगा. एक पल को भी किसी को आभास भी नहीं हुआ होगा कि वे उनको अंतिम विदाई दे रहे हैं. हँसते-मुस्कुराते विदा करते लोगों से फिर मिल पाना सम्भव न होगा, उनको कुछ पलों बाद पहचान पाना भी सम्भव न होगा.

 



सामान्य मृत्यु की स्थिति में परिजन साथ होते हैं. आँखों में दुःख होने के साथ-साथ एक संतोष का भाव होता है. अंतिम संस्कार को पावन कृत्य के रूप में स्वीकार्य मानने के पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि परिजन अपने जाने वाले सम्बंधित व्यक्ति को संतोषी भाव से मुक्त करें, उसे अनंत यात्रा के लिए प्रस्थान करने दें. इस हवाई जहाज दुर्घटना में किसी को भी एक पल के लिए झूठे भी ख्याल नहीं आया होगा कि ये उसकी अंतिम यात्रा है. किसी के परिवार वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि वे अपने प्रिय को अंतिम यात्रा के लिए हँसते हुए विदा कर रहे हैं. आँखों में कितने सपने होंगे. दिल में कितनी खुशियाँ होंगी. भविष्य के लिए बहुत सारी आशाएँ सजा रखी होंगी. सबकुछ एक झटके में स्वाहा हो गया.

 

परिवार वाले दूर जाते परिजन का हाथ थाम कर उससे कुछ कह न सके. हमेशा के लिए सबसे दूर जाता व्यक्ति आँखों में संतोष लेकर नहीं जा सका. पता नहीं उस चले गए व्यक्ति की अपने ही किसी परिजन से लम्बे समय से मुलाकात न हुई होगी. न जाने कितने परिजनों, मित्रों, सहयोगियों से अगली यात्रा में आकर मिलने का वादा किया होगा. न जाने कितने परिजनों ने अगली बार अपने घर आने का न्यौता दिया होगा. न जाने क्या-क्या, बहुत कुछ आपस में तय किया गया होगा, निर्धारित किया गया होगा मगर नियति को कुछ और ही निर्धारित करना था. उसने सब एक झटके में निर्धारित करके सबकी आँखों के सपने छीन लिए, परिवार की खुशियाँ मिटा दीं, भविष्य की आशाओं पर पानी फेर दिया.

 

जाने वाला तो चला ही गया, शेष रह गया परिजनों के हिस्से में आया दुःख, आँसू, खाली हाथ, अफ़सोस और ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट.




09 जून 2025

मानसिकता के संक्रमणकाल में समाज

हत्या तो हत्या है और जिसने भी की है उसे सजा मिलनी ही चाहिए. यह केवल किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देना मात्र नहीं होता बल्कि एक हँसते-खेलते इन्सान को हमेशा के लिए शांत कर देना होता है. एक परिवार को ज़िन्दगी भर के लिए न भरने वाला घाव देना होता है. समाज के बीच खुद हत्यारे के परिवार को भी शर्मिंदगी से जीवन गुजारने की सजा देना होता है. अभी हाल के चर्चित राजा-सोनम रघुवंशी मामले में इंदौर के इस नवदम्पत्ति जोड़े के अचानक से गायब हो जाने की खबर के बाद पति राजा का शव मिलना और पत्नी सोनम का गायब होना शासन-प्रशासन पर, मेघालय के पर्यटन पर, पर्यटकों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा रहा था. राजा की लाश मिलने के सत्रह दिन बाद अचानक से सोनम पुलिस को मिली. उसकी गिरफ्तारी हुई अथवा उसने आत्मसमर्पण किया, ये बाद की बात है. उसी के ऊपर अपने पति की हत्या करवाने का शक जताया जा रहा है,  हत्या उसी ने की या करवाई इस बारे में अंतिम सत्य तो बाद में पता चलेगा मगर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे समाज, परिवार, विवाह संस्था रसातल में पहुँचने ही वाले हैं. मीडिया, सोशल मीडिया में इस तरह से बयानबाजी हो रही है मानो पति-पत्नी संबंधों में हत्या जैसा ये पहला और आश्चर्यजनक मामला हो.

 



इस एक घटना के साथ कुछ महीने पहले हुए नीले ड्रम कांड को, पॉलीथीन में पति के टुकड़े भरने वाले कांड को जोड़ा जा रहा है. पुरुष समाज को, पतियों को एकदम से डर के साये में देखा जाने लगा है. ऐसा लगने लगा है जैसे कि हर पत्नी हत्यारिन हो और हर पति तलवार-चाकू की नोंक पर. सोचिएगा एक पल को कि इस घटना से सारा समाज सदमे में क्यों है? क्या इसलिए कि पत्नियाँ अब पतियों की हत्या करने-करवाने लगीं? क्या इसलिए कि महिलाओं ने इस हत्याकारी क्षेत्र में पुरुषों/पतियों के एकाधिकार पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया? क्या इसलिए कि पत्नी के रूप में एक महिला का इस तरह का स्वरूप समाज ने इक्कीसवीं सदी में भी नहीं सोचा था? कहीं इसलिए तो सदमे जैसी स्थिति नहीं कि एक सेक्स सिम्बल के रूप में, एक उत्पाद के रूप में, विज्ञापन के लिए नग्न-अर्धनग्न अवस्था में सुलभ रूप में समझ आने वाली आधुनिक महिला अब साजिश रचती, हत्या करती-करवाती नजर आने लगी है? इस छवि में भी आश्चर्य कैसा, सदमा कैसा? टीवी के माध्यम से ऐसी स्त्रियाँ पहले ही आपके घर में, आपके बेडरूम में, आपके बच्चों के बीच स्थापित हो चुकी हैं. इन तथाकथित आधुनिक जीवन-शैली जीने वाली महिलाओं को करोड़ों-अरबों रुपयों का व्यापार करने के साथ-साथ साजिश रचते भी दिखाया जाता है. परिवार में विखंडन करवाती इस धारावाहिक स्त्री को बाहर हत्या करते, हत्या की साजिश रचते भी दिखाया जा रहा है. आखिर इस क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही है.

 

यदि समाज इस कारण सदमे में है कि एक महिला सामान्य भाव से, बिना किसी घबराहट-भय के एक हत्याकांड में शामिल है तो गौर करिएगा, ससुराल में एक बहू-पत्नी की हत्या में पति रूपी पुरुष के साथ सास, जेठानी, ननद जैसी स्त्रियाँ भी शामिल रही हैं. एक महिला को जलाते समय, उसका गला घोंटते समय जब एक महिला के रूप में उनके हाथ नहीं काँपे तो फिर सोनम के हत्यारी होने की आशंका पर इतनी हलचल क्यों? वैसे यहाँ याद रखने वाली एक बात ये भी है कि इसी देश में बरसों तक जन्मी-अजन्मी बेटियों को मौत की नींद में सुलाने वाले हाथों में ज्यादातर हाथ महिलाओं के ही रहे हैं. हाँ, एक सत्य ये अवश्य है कि पिछले कुछ सालों में ख़ुद महिलाओं ने ही महिलाओं के पक्ष में बने क़ानूनों का जिस तरह दुरुपयोग किया है, उससे आज जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ, पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध को समझने वाली महिलाओं ने भी ऐसी महिलाओं का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है.

 

समाज की बहुतायत महिलाओं का ऐसी हत्यारी महिलाओं के विरोध में खड़े होने का कारण समाज में व्याप्त सकारात्मकता का होना है. देखा जाये तो समाज कई-कई मानसिकता वालों से, अनेक प्रकार की मनोदशा वालों से मिलकर संचालित होता है. समाज में दोनों तरह के स्त्री और पुरुष हैं. हत्यारी मानसिकता स्त्री और पुरुष दोनों में है, संस्कारी मानसिकता भी दोनों में है. ऐसा नहीं है कि समाज के सभी स्त्री और पुरुष समाज का भला करते घूम रहे हों, उनमें कोई बुराई न हो और ऐसा भी नहीं है कि समाज में स्त्री-पुरुष सिर्फ हत्या, साजिश ही करने में लगे हों. स्व-मानसिक स्थिति के चलते इन्सान अपने क़दमों को उठाता है और घटना को अंजाम देता है. ये और बात है कि इंटरनेट की, रील की, आधुनिकता की चकाचौंध में रची-बसी दुनिया ने संस्कारों को, संस्कृति को, जीवन-मूल्यों को, परिवार को, समाज को, यहाँ के व्यवस्थित ताने-बाने को तिलांजलि दे दी है. संबंधों का, रिश्तों का कोई मोल अब जैसे दिखता ही नहीं है. आधुनिकता के चक्कर में सिर्फ और सिर्फ विखंडन, ध्वंस, परित्याग आदि ही देखने को मिल रहा है. ऐसी मानसिकता के बीच भी यदि सामाजिक संरचना की, पारिवारिक ढाँचे की, विवाह संस्था की परवाह करने वाले लोग हैं, महिलाएँ हैं, पुरुष हैं तो निश्चित रूप से परिदृश्य अभी पूरी तरह से काला नहीं हुआ है, पूरी तरह से अंधकारमय नहीं हुआ है. रौशनी की एक सम्भावना अभी भी है. अब इस सम्भावना में रील की इस आभासी दुनिया में झूमते मम्मी-पापा-बच्चों को तय करना होगा कि वे किस तरह की मानसिकता के इंसान बनना चाहते हैं. किस तरह की मानसिकता का समाज बनाना चाहते हैं.

 


13 मई 2025

समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार रहें

पहलगाम में आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे रही थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक पाकिस्तान को, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.

 

दरअसल जनता का मनोविज्ञान तुरंत बदला लेने का होता है. उसके लिए रणनीति, कूटनीति आदि का कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट सरकार के लिए युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष में ले जाना होता है. सरकार की मंशा कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है.

 



सरकार ने अपनी नीति, अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हुए ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों, प्रशिक्षण शिविरों पर आधी रात में मिसाइल स्ट्राइक करके उनको ध्वस्त कर दिया. जानकारी होते ही आक्रोशित जनमानस उत्साह, जोश से भर गया. बहुसंख्यक नागरिक वर्ग खुद को इस ऑपरेशन से जुड़ा हुआ महसूस करते हुए पाकिस्तान से निर्णायक मोर्चा खोलने की मंशा बनाने लगा. पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के खिलाफ भारत सरकार की सैन्य कार्यवाई से भारतीय जनमानस का जोश अचानक से उस समय शांत कर दिया गया जबकि खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम होने जा रहा है. युद्ध विराम की घोषणा होते ही वो जनमानस जो पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये जाने के, उसके कई हिस्सों में टूट जाने के, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुक्त हो जाने की बात करते हुए सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहा था, वही एकदम से सरकार के विरुद्ध हो गया.

 

बहरहाल, मुद्दा यह नहीं कि सरकार ने आतंक के खिलाफ कार्यवाही देर से क्यों शुरू की? मुद्दा यह भी नहीं कि सम्पूर्ण ध्वंस किये बिना आखिर सरकार ने युद्ध विराम पर सहमति क्यों दी? यहाँ विचार करना होगा कि बहुतायत लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाह रहे थे, आतंकियों का सर्वनाश चाह रहे थे उन बहुतायत लोगों के परिवारों से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या कितनी है? इस बिन्दु पर आकर माना जा सकता है कि चलिए सभी को सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता है; सभी को सैनिक नहीं बनाया जा सकता है; सभी को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा जा सकता है. इन्हीं स्थितियों के बीच से एक स्थिति यह निकलती है कि देश के दुश्मन को मिट्टी में मिला देने की हुँकार भरने वाले, आतंकियों का नामोनिशान मिटाने की बात करने वाले लोग समाज के दुश्मन से, समाज के आतातायियों से लड़ने सामने क्यों नहीं आते हैं? महिलाओं-बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले, खुलेआम हत्या करने वाले, चेहरे पर तेजाब फेंक देने वाले, चलती गाड़ी में गैंग-रेप जैसा जघन्य कृत्य करने वाले, सरेआम लूटमार करने वाले भी किसी रूप में आतंकवादियों से कम नहीं हैं. जैसे देश के दुश्मन बड़े रूप में देश को नुकसान पहुँचाते हैं, वैसे ही ये लोग समाज को नुकसान पहुँचाते हैं.

 

ऐसे अपराधियों के मनोबल बढ़ने का कारण कहीं से इनका विरोध नहीं होना है. शांति मार्च निकाल देने, मोमबत्तियाँ जला देने, भाषणबाजी कर लेने से अपराधियों के हौसले पस्त नहीं होते. जनसामान्य की एक आम सोच है कि समाज में क्रांतिकारी तो पैदा हो मगर पड़ोसी के घर में. ऐसी सोच के चलते एक सामान्य नागरिक खुलेआम होते अपराध का सीधा विरोध नहीं करता है. किसी अपराधी का सीधा विरोध न होने से ही वह निरंतर अपराध को अंजाम देता रहता है. सोचिए, जिस तरह से हम किसी भी विरोध से पहले अपने परिजनों का, अपने परिवार का  स्मरण करने लगते हैं, उनके भविष्य के प्रति चिंतातुर होने लगते हैं ठीक वैसे ही सीमा पर तैनात सैनिक का परिवार है, परिजन हैं; वे भी किसी का परिवार हैं, परिजन हैं. उनके दुश्मन देश में सीमा पार घुसकर हमला करने को हम सभी अपना जोश, अपना उत्साह, अपनी वीरता मान लेते हैं मगर असल में यह हमारी वही मानसिकता होती है जिसमें क्रांतिकारी पड़ोस में जन्मा होता है.

 

देश के वीर सैनिक तो सीमा पर दुश्मन के खिलाफ डटे खड़े रहते हैं, अपनी जान की बाजी लगाये रहते हैं. हमें भी समाज के दुश्मनों के खिलाफ, अपने सभ्य नागरिकों के अपराधियों के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होने की आवश्यकता है. स्मरण रखना होगा कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ युद्ध होता है, वह चाहे देश के दुश्मन के साथ हो या समाज के दुश्मन के साथ. इसमें जानें ही जाती हैं, क्षति होती है, दुश्मन की और अपनी भी. सोचियेगा, क्या आप समाज के दुश्मन से लड़ने को तैयार हैं?


22 मार्च 2025

कामुकता, नग्नता का बाज़ार न बन जाये ये समाज

अवैध संबंधों में बाधक बनती पत्नी की हत्या कर लाश को ब्रीफकेस में भरा, प्रेमी के साथ मिलकर पत्नी ने पति की हत्या कर लाश के टुकड़े-टुकड़े करके ड्रम में छिपाया, रील बनाने से मना करने पर माँ ने बेटे की हत्या कर दी, आपत्तिजनक स्थिति में देख लेने पर बेटे ने माँ-बाप को मौत के घाट उतारा जैसी अनेक खबरों से नित्य ही हम सबका सामना होता है. ये दो-चार पंक्तियाँ बानगी हैं आज के समाज की जहाँ ऐसा लग रहा है कि न तो रिश्तों का कोई महत्त्व रह गया है और न ही मर्यादा का कोई स्थान बचा है. बहुसंख्यक लोगों की आँखों से शर्म-लिहाज पूरी तरह से समाप्त हो गई है. ऐसे लोगों द्वारा सगे रक्त-सम्बन्धियों के साथ, अपने परिजनों के साथ दुराचार करने, उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने का अपराध सहज रूप में किया जाने लगा है. ऐसा महसूस होने लगा है जैसे लोगों के लिए शारीरिकता का, यौन संबंधों का ही महत्त्व रह गया है. उनके लिए जीवन की पूर्णता यौन संतुष्टि प्राप्त करने में ही है. 


समाज का बौद्धिक वर्ग आये दिन ऐसी घटनाओं पर मंचों के माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा चर्चा कर लेता है किन्तु इसके मूल में जाने का, उसके समाधान का प्रयास नहीं करता है. गौर करिए इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होने के कुछ वर्ष पूर्व से ही, जबकि आधुनिकता, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण शब्द सामाजिक आसमान पर तैरने में लगे थे. कालांतर में विकास के नाम पर चली आई तकनीकी क्रांति ने, मोबाइल क्रांति ने समूचे सामाजिक ढाँचे को हिला कर रख दिया. स्त्री-पुरुष संबंधों, पति-पत्नी के आंतरिक संबंधों की गोपनीयता एकदम से फटकर परदे से बाहर आ गई. आधुनिकता के नाम पर, पश्चिमीकरण के नाम पर, वैश्वीकरण के नाम पर नग्नता को, अश्लीलता को, यौन-संबंध को, दैहिक आकर्षण को प्रमुखता दी जाने लगी. किसी समय पारिवारिक नियोजन के लिए अपनाए गए निरोध का परिवर्तनीय उपयोग अवैध संबंधों में अनचाहे गर्भ से बचने के लिए, एचआईवी से सुरक्षित रहने के लिए होने लगा. उस सुरक्षित समझे जाने वाले उपाय के शालीन, शर्म भरे विज्ञापन उन्मुक्त, कामपिपासु मानसिकता का प्रदर्शन करते दिखने लगे.




दैहिक उन्मुक्तता का, वैचारिक फूहड़ता का, कामुकता का चित्रण इसी एक कदम के रूप में सामने नहीं आया बल्कि बहुसंख्यक विज्ञापनों में नजर आने लगा. उत्पाद स्त्रियों का हो या फिर पुरुषों का, वृद्धजनों का हो या फिर बच्चों का, घरेलू सामान हो या फिर पूजा की सामग्री, वस्त्र हों या फिर अधोवस्त्र, शैक्षिक सामग्री हो या फिर सौन्दर्य प्रसाधन सभी के किसी न किसी रूप में स्त्रियों की कामुक, अर्धनग्न छवि को उकेरा जाने लगा. इनके अलावा लाइव शो हों, कॉमेडी शो हो, संगीत का कार्यक्रम हो, बच्चों की नृत्य प्रस्तुति हो ये सब भी द्विअर्थी संवाधों, फूहड़ भाव-भंगिमा का प्रदर्शन करने लगे. ऐसा लगने लगा कि बिना सेक्स के, बिना यौनेच्छा के व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है. इस मानसिकता को और अधिक विकृत बनाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट का साथ मिल गया. अब हर हाथ में समूची दुनिया घूम रही थी. बच्चे उम्र के बहुत पहले ही स्त्री-पुरुष देह के अगोपन को गोपन कर रहे थे. बंद कमरे से भीतर पति-पत्नी के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंधों की दैहिक क्रिया को शिक्षण संस्थानों, पार्कों, खेतों आदि के सुनसान में क्रियान्वित किया जाने लगा. इस उच्छृंखल, अशालीन, अमर्यादित जीवन-शैली ने न केवल विवाह संस्था को कमजोर किया बल्कि समूची सामाजिक, पारिवारिक संरचना को ही ध्वस्त सा कर दिया.


परिवार में आपस में ही अविश्वास का माहौल दिखाई देने लगा. आपसी संबंधों में भी संदेह नजर आने लगा. रिश्तों की मर्यादा को तिलांजलि सी दे दी गई. संस्कारों का कहीं अंतिम संस्कार सा कर दिया गया. बहुतेरी सामाजिक गतिविधियाँ देह के इर्द-गिर्द ही घूमने लगीं. वैवाहिक समारोह में संगीत समारोह के नाम पर नग्नता, फूहड़ता ठुमके लगाने लगी तो खेलों में चियर्स लीडर के नाम पर दैहिक प्रदर्शन को थिरकने का अवसर दिया जाने लगा. सोचने वाली बात है कि समाज में देह, यौन सम्बन्ध को केन्द्र-बिन्दु कब, कैसे और क्यों बनाया जाने लगा? क्यों प्रतिभा को शारीरिक आकर्षण के पीछे धकेल दिया गया? क्यों अवैध शारीरिक संबंधों ने मर्यादित रिश्तों को निगल लिया? क्यों देह के आकर्षण ने संस्कारों की बुनियाद को खोखला कर दिया? सेल्युलाइड परदे के विकल्प के रूप में हर हाथ में सिमटी छोटी सी स्क्रीन में चमकते ओटीटी चैनल्स, सोशल मीडिया की रील्स आदि में थिरकती, चमकती, लहराती कामुक नग्न/अर्धनग्न देह पर सामाजिक चिंतन, विमर्श के द्वारा कोई ठोस कदम उठाना होगा. ऐसा न कर पाने की स्थिति में यह समाज संवेदनहीनता, फूहड़ता, कामुकता, नग्नता, अशालीनता का बाज़ार बना नजर आयेगा. 


16 मार्च 2025

आपके बिना दो दशक का सफ़र

 दो दशक की यात्रा, आपके बिना. 

कुछ घटनाएँ कभी भूलती ही नहीं, भुलाई भी नहीं जाती. कोशिश करने पर भी दिल-दिमाग से वे पल नहीं हटते. आपका जाना अनायास हुआ. ज़िन्दगी भर एक मलाल रह गया की कि आपसे न कुछ कह सके, आपसे बात भी नहीं कर सके, आपके लिए जब कुछ करने लायक स्थिति में आये तो कर भी न सके. इन बीस सालों में हर कदम आपके ही कामों को पूरा करने का प्रयास किया, आपकी ही तरह बनने की कोशिश की, सभी को एकसूत्र में बाँधे रखने की कोशिश की. कहाँ तक और कितने सफल हुए, इसका आकलन आप ही करियेगा. 


15 फ़रवरी 2025

मौत की राह जाते बच्चे

सॉरी मम्मी-पापा, मेरा समय ख़त्म, माता रानी ने मुझे अठारह साल के लिए ही भेजा था. आत्महत्या करने के पूर्व लिखे पत्र में अदिति मिश्रा की ये भावनात्मक पंक्ति हृदय को हिला देने वाली है. जेईई परीक्षा में कम अंक आने से चयनित न होने के कारण निराश अदिति ने ऐसा कदम उठाया. समाज में इस तरह का न तो ये पहला मामला है और निश्चित रूप से अंतिम भी नहीं है. देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के द्वारा परीक्षाओं में असफल रहने पर, कम अंक आने पर आत्महत्या करने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं. आत्महत्या एक ऐसा शब्द है जो झकझोरने के अलावा और कोई भाव पैदा नहीं करता. यह एक शब्द नहीं बल्कि अनेकानेक उथल-पुथल भरी भावनाओं का, विचारों का समुच्चय है. इसके अलावा न जाने कितनी त्रासदी, न जाने कितना कष्ट, न जाने कितने आँसू, न जाने कितने सवाल भी इसमें छिपे होते हैं. ये सवाल उस समय और अधिक हृदय विदारक हो जाते हैं जबकि मौत की नींद सोने वाला हमारा भविष्य होता है, कोई नौनिहाल होता है.

 

प्रथम दृष्टया ऐसी घटनाओं में परीक्षा प्रणाली, नंबर गेम, भारी-भरकम पाठ्य-सामग्री आदि जिम्मेदार लगती है किन्तु यदि गम्भीरता से सम्पूर्ण सामाजिक परिदृश्य का अवलोकन किया जाये तो इसके पीछे वर्तमान सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था का यांत्रिक होना नजर आता है. इस यांत्रिक जीवन-शैली ने बचपनशिक्षाघर, परिवार आदि को प्रभावित किया है. ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादेथके-हारेमुरझाये बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतोंशैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमासोच-विचार दिखाई देता है. उन्मुक्त खेलते बच्चों को कमरों में बंद कर दिया गया है और उनके हाथों में लैपटॉपमोबाइल थमा दिए गए हैं. बच्चे स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं.

 



यांत्रिक जीवन के लिए अनिवार्य बना दिए धन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना उनको अपने ही बच्चों से दूर कर रहा है. उनके लिए भौतिकतावादी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को बहुतायत अभिभावकों द्वारा अपनी सफलता मान लिया गया है. तकनीक, भौतिकता की उन्नति को विकास का सूचक मानने का दुष्परिणाम यह हुआ कि अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं ने अनियमित राह पकड़ ली. इस अंधाधुंध दौड़ में उनके द्वारा बच्चों से न सिर्फ अच्छे अंक लाने की जबरदस्ती की जा रही है वरन दूसरे बच्चों से गलाकाट प्रतियोगिता सी करवाई जा रही है. बच्चों में आपसी सहयोग की, समन्वय की भावना विकसित करने के स्थान पर आपस में चिर-प्रतिद्वंद्विता पैदा की जा रही है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता पैदा की जा रही है. ज्ञान को आपस में बाँटने की जगह उसे अपने में ही कैद करके रखने की मानसिकता विकसित की जा रही है. बच्चों को किसी अन्य विद्यार्थी की असफलता के समय, उसकी आवश्यकता के समय उसकी मदद करने के बजाय उससे दूर रहने, उससे बचने की सलाह दी जा रही है. अपने चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सफलता प्राप्त करने का शोर, दूसरे से आगे ही आगे बने रहने की होड़, किसी भी कीमत पर सबसे आगे आने और फिर सदैव आगे ही बने रहने का दबाव बच्चों को भीतर से खोखला बना रहा है. यही खोखलापन उनकी असफलता में, असफलता की आशंका में उन्हें सबसे दूर कर देता है. एक पल को विचार करिए कि कुछ अंकों के कारण एक हँसता-खेलता बच्चा सदैव के लिए खामोश हो जाये. विचार करिए उस बच्चे के अन्दर भय का, अविश्वास का वातावरण किस कदर भर गया होगा जो कम अंक आने के भय से दुनिया छोड़ देता है मगर अपने अभिभावक से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है.

 

किसी भी परिवार के लिए उसके किसी भी सदस्य का चले जाना कष्टकारी होता है. ये कष्ट उस समय और भी विभीषक हो जाता है जबकि ऐसा किसी बच्चे के साथ हुआ हो. बच्चों द्वारा असफलता के भय से, कुछ प्रतिशत अंक कम आने से मौत की राह चले जाना समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है. इक्कीसवीं सदी में जहाँ एक तरफ विमर्शों, स्वतंत्रता, फ्री सेक्स, हैप्पी टू ब्लीड, लिव-इन-रिलेशन आदि अतार्किक चर्चाओं में बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक निमग्न रहती है वहाँ बच्चों पर लादे जाने वाले अनावश्यक, अप्रत्यक्ष बोझ को दूर करने के लिए कोई चर्चा नहीं होती है. समाज के विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न विषयों में अपनी सक्रियता दिखा रहे समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इस दिशा में संज्ञाशून्य से दिख रहे हैं. घर से लेकर स्कूल तक, अभिभावकों से लेकर शिक्षक तक सभी अपनी-अपनी मानसिकता का बोझ बच्चों के मन-मष्तिष्क पर लाद रहे हैं. अपने अतृप्त सपनों को, अपने उस कैरियर को जो वे नहीं बना सके, बच्चों के माध्यम से पूरा करने का जोर लगाये हैं. अपने बच्चों को साक्षर, शिक्षित, संस्कारित बनाये जाने से ज्यादा ध्यान इस तरफ है कि वे कैसे अधिक से अधिक अंकों से सफलता प्राप्त करें. वे बच्चों की शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने के स्थान पर उनके मन में अधिकाधिक पैकेज वाली जॉब को पाने का लालच भरने में लगे हैं.

 

ऐसे माहौल में जबकि बच्चे को अपनी परेशानीअपनी निराशाअपनी हताशाअपनी समस्या के निपटारे के लिए कोई रास्ता नहीं दीखता हैकोई अपना नहीं दिखता है तब वह घनघोर रूप से एकाकी महसूस करता हुआ खुद को जीवन समाप्ति की तरफ ले जाता है. अपने बच्चों के बीच बिना बैठेउनके साथ बिना खेलेउनके मनोभावों को बिना बाँटे हम बच्चों को बचाने में लगभग असफल ही रहेंगे. अच्छा हो कि अपना समय हम अपने बच्चों के साथ शेयर करें जिससे हम उनके हँसते-खेलते बचपन में अपना बचपन देख सकें, अपने बच्चों का जीवन सुरक्षित रख सकें.


08 जनवरी 2025

सोशल मीडिया की कैद में बच्चे

इंटरनेट के युग में कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया जैसे शब्द की अवधारणा नहीं थी. समय के साथ जैसे-जैसे इंटरनेट तकनीक ने विकास-गति को पकड़ा, अनेक नए-नए शब्द जुड़ते चले गए. सोशल मीडिया ऐसे ही शब्दों में से एक है. आज स्थिति यह है कि लोगों का अधिकतम समय सोशल मीडिया पर बीत रहा है. ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि किसी दिन एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जिसके माध्यम से अपने मित्रों से बातचीत की जा सकेगी, जहाँ से अपने मन की खरीददारी भी हो सकेगी. पढ़ने-लिखने का माध्यम भी यह मंच बनेगा. आज सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है. इस महत्त्वपूर्ण मंच के सुखद पहलुओं के बीच एक दुखद पहलू यह भी सामने आया कि सोशल मीडिया की गिरफ्त में बच्चे बहुतायत में हैं. उनके द्वारा दिन का बहुत सारा समय सोशल मीडिया पर गुजारा जा रहा है.

 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ पीडियाट्रिक रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं. इनमें से लगभग 81 प्रतिशत व्हाट्सएप का और लगभग 55 प्रतिशत फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं. देश में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग आदि का उपयोग करने वाले बच्चे नौ से सत्रह वर्ष की उम्र के हैं, जो प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक समय यहाँ बिताते हैं. डिजिटल युग में तेजी से उभरते इन आँकड़ों को सुखद तो नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में जबकि कोरोनाकाल की ऑनलाइन शैक्षिक व्यवस्था के बाद से लगभग प्रत्येक बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन, इंटरनेट की सुविधा सहज रूप में उपलब्ध है तो उसका सोशल मीडिया पर आना भी सहज ही है. सोशल मीडिया पर आने की सहजता और सोशल मीडिया का नियंत्रण मुक्त होना निश्चित रूप में बाल-मन, किशोर-मन के लिए घातक है. ऑनलाइन शिक्षा की आड़ में वे क्या देख रहे हैं, किस वेबसाइट पर जा रहे हैं इसे देखना-समझना आवश्यक है. इंटरनेट की दुनिया में मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका नकारात्मक असर बच्चों परकिशोरों पर देखने को मिल रहा है. ओटीटी की वेबसीरीज की अश्लीलता को, गालियों को, अश्लील भाव-भंगिमा को सोशल मीडिया में तैरती बहुतायत रील्स में देखा जा सकता है. गालियों, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्मलिहाज बना हुआ थावह लगभग समाप्त हो गया है. इसके चलते इनके स्वभाव में, दैनिक-चर्या में फूहड़ता, अश्लीलता, हिंसा, क्रूरता आदि दिखने लगी है.

 



बच्चों के सोशल मीडिया पर बढ़ते चलन को देखते हुए पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित करने सम्बन्धी एक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के आने के बाद ऑस्ट्रेलिया के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक आदि जैसे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इस विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि सोशल मीडिया कम्पनियाँ बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा पाती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा. ऐसा वैश्विक रूप में किसी देश द्वारा पहली बार किया गया है. इस विधेयक के पारित होने के बाद बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को प्रतिबंधित किये जाने सम्बन्धी बहस भी छिड़ी. सैद्धांतिक रूप में यह कदम भले ही सार्थक लगता हो मगर व्यावहारिक रूप में इसे अमल में लाना मुश्किल ही है. आखिर किसी सोशल मीडिया कम्पनी-एजेंसी द्वारा यह कैसे निर्धारित किया जायेगा कि सम्बंधित सोशल मीडिया मंच का इस्तेमाल सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा नहीं किया जा रहा है? तकनीकी ज्ञान में पूर्णतः सक्षम आज के सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए छद्म नाम, जन्मतिथि आदि के द्वारा सोलह वर्ष से अधिक का होने में कितना समय लगेगा.

 

ऐसे में यदि समाज, सरकार वाकई इसे लेकर गम्भीर है कि बच्चों का बहुतायत समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है तो उसे किसी विधेयक जैसी सैद्धांतिक स्थिति के साथ-साथ कुछ व्यावहारिक कदमों को भी उठाना होगा. स्मार्टफोन की पैरेंटल कंट्रोल सुविधा को और सशक्त करना होगा. इसके द्वारा अभिभावकों को भी अपने बच्चों के स्मार्टफोन में तमाम वेबसाइट को, सोशल मीडिया मंचों को प्रतिबंधित करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया से, इंटरनेट से होने वाले नुकसान के बारे में भी समझाया जाना होगा. आपराधिक दुनिया की जानकारी देते हुए उनके डिजिटल अरेस्ट, साइबर क्राइम, चाइल्ड पोर्नोग्राफी आदि जैसी नकारात्मकता से भी परिचित करवाना होगा. जरा-जरा सी बात को, घटना को सोशल मीडिया पर अपलोड करने, अपने दोस्तों, परिजनों के साथ शेयर करने की हानियों से परिचित करवाना होगा. उनकी इस प्रवृत्ति को रोकने का कार्य भी करना होगा. इसके साथ-साथ बच्चों को सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से इतर वास्तविक दुनिया की तरफ ले जाना होगा. उनको परिवार के साथ अधिक से अधिक समय बिताने को प्रोत्साहित करना होगा. मोबाइल, कम्प्यूटर, ऑनलाइन गेमिंग के स्थान पर मैदानों में खेलने को वरीयता देनी होगी. इस तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम से कम उपयोग करने का कदम उठाना होगा. शिक्षा, संस्कारों को मोबाइल, कम्प्यूटर के स्थान पर परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा, शैक्षिक संस्थानों के माध्यम से दिए जाने का कार्य पुनः करना होगा. पारिवारिक वातावरण को सकारात्मक, संस्कारित बनाते हुए बच्चों को सोशल मीडिया के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

 


01 जनवरी 2025

संकल्प लें परिवार बचाने का

पूरे हर्ष-उल्लास के साथ जिस वर्ष का स्वागत किया गया था, वो वर्ष हम सबसे विदा ले चुका है. अनेक खट्टी-मीठी घटनाओं, हँसाती-रुलाती यादों के साथ वह वर्ष भी इतिहास बन गया है. नया वर्ष अनेकानेक संभावनाएँ, आशाएँ, योजनाएँ आदि लेकर पूरे हर्षोल्लास से हम सबके जीवन में प्रवेश कर चुका है. पुराने को अलविदा और नए के स्वागत के बीच की बारीक रेखा पर बहुतायत लोगों द्वारा गए वर्ष में अपने उपलब्धियों, नाकामियों का स्मरण किया जायेगा, उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जायेगा. इसी तरह से नव वर्ष के लिए बहुत सारे संकल्प, नवीन कार्य मन-मष्तिष्क में बन-बिगड़ रहे होंगे.

 

नव-वर्ष के लिए संकल्पों का निर्धारण करना व्यक्ति के मनोभावों का एक हिस्सा रहा है. उसके द्वारा अपने व्यवहार, अपनी कार्य-क्षमता, अपनी जीवन-शैली, अपनी आदत आदि को लेकर किसी न किसी नए संकल्प का निर्माण करके उसी के सादृश्य कार्य करते रहने का वादा खुद से किया जाता है. इस बार भी बहुत सारे संकल्प किये गए होंगे, बहुत से कार्यों को संपन्न किये जाने का आश्वासन खुद से किया गया होगा. आइये, इस बार हम सभी लोग मिलकर परिवार को बचाने का, परिवार के पुनर्निर्माण का, परिवार के सशक्तिकरण का संकल्प लें. संभव है कि इस संकल्प प्रस्ताव को उतनी गंभीरता से विचारार्थ न लिया जाये, जितनी गंभीरता की आवश्यकता आज परिवार बचाने को लेकर होनी चाहिए. पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, जल-वायु आदि को बचाने की मुहिम चलाते-चलाते समाज बेटियों को बचाने की स्थिति में आ गया है. एक पल को विचार करिए कि क्या कभी सोचा गया था कि ‘बेटी बचाओ’ जैसा नारा समाज में देना पड़ेगा? इसी के साथ सोचिए कि वर्तमान स्थितियाँ ऐसी नहीं बन चुकी हैं कि कल को ‘परिवार बचाओ जैसी मुहिम भी चलानी पड़ेगी?

 

वर्तमान परिदृश्य में रोजमर्रा में बेटियों के यौन-शोषण की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. अनेकानेक घटनाओं में परिवार के सदस्य ही संलिप्त पाए जा रहे हैं. बचपन एकाकी, गुमसुम होने के साथ-साथ शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है. खेलने-कूदने की उम्र में उसका भी हताश-निराश होना दिख रहा है. नंबर-गेम के चलते उसके मन-मष्तिष्क पर एक तरह का दबाव बना ही रहता है. इसके चलते एकाधिक घटनाओं में बच्चों के द्वारा भी गलत कदम उठा लिए जाने का कृत्य सुनाई पड़ता है. चिंता ये दिखाई पड़ती है कि आज के बच्चे हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते जा रहे हैं. खेलकूद के दौरानस्कूल में आपसी प्रतिद्वंद्विता के समयकिसी भी बात पर एक-दूसरे से झगड़ जाना बचपन की आम प्रवृत्ति है. ऐसा न केवल दोस्तों में वरन सगे भाई-बहिनों के बीच भी देखने को मिलता है. अब स्थिति इस स्वाभाविक, बाल-सुलभ झगड़े से कहीं आगे पहुँच चुकी है. अब बालमन हत्यारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का होता जा रहा है.

 

युवाओं का हाल भी सशक्त अथवा सहज नहीं कहा जा सकता है. जरा-जरा सी बात पर अवसाद में घिर जाना उनके लिए आम बात होती जा रही है. नशे की गिरफ्त में चले जाना, आपराधिक कृत्यों की तरफ मुड़ जाना, आत्महत्या कर लेना आदि ऐसे युवाओं का अंतिम लक्ष्य होता जा रहा है. दरअसल समाज ने आधुनिक बनने की कोशिश में पहनावारहन-सहनशालीनतासंस्कृतिभाषारिश्तोंमर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया है. आधुनिक संस्कारों में घुलमिल जाने की चकाचौंध में हमारे परिवारों की दिव्यता कहीं गायब ही हो गई है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार के बुजुर्गों का व्यक्तित्व सिमटने सा लगा है. पश्चिमी सभ्यतासंस्कारों को अपनाने की कोशिशों में हमें अपने मूल को नहीं भूलना चाहिए. बुजुर्गों की अहमियत को विस्मृत नहीं करना चाहिए. हम बुजुर्गों के प्रति अनभिज्ञता जैसा भाव अपनाने लगे हैं, इससे भी पारिवारिकता पर संकट दिखाई देने लगा है.

 

ऐसी स्थितियों में परिवार के सभी सदस्यों को एकाकी परिवार के स्थान पर संयुक्त रूप में रहने पर विचार करना होगा. वर्तमान समय में जबकि आर्थिक स्थितियाँ इन्सान को बुरी तरह से अकेलेपन की तरफ धकेलने में लगी हैं तब न सही संयुक्त परिवार की तरह किन्तु हफ्ते-दस दिन में बुजुर्गों, बच्चों के साथ दोस्ताना माहौल में रहने का प्रयास किया जा सकता है. घर के छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगेउनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. नए वर्ष में कोई भी संकल्प लें मगर साथ में परिवार को एकजुट रखने का, परिवार को बनाये रखने का, बचाए रखने का भी संकल्प लेना होगा. इससे पहले कि हमारे परिवार के बीच में अकेलेपन का भयावह साया किसी सदस्य को अपनी गिरफ्त में लेकिसी बच्चे को अवसाद की तरफ ले जायेकिसी युवा को अपराध की तरफ धकेलेहम सबको एकजुटता की आवश्यकता है. हम सभी को सहयोग कीअपनत्व की महफ़िल सजाकर अपने लोगों को अपने लोगों के बीच उपस्थित करना होगा. एक-दूसरे से करते हैं प्यार हम, एक-दूसरे के लिए बेक़रार हम या फिर साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जायेगा... आदि गीतों की पंक्तियाँ स्मृति में बसाकर सबको एकसाथ गाना-गुनगुनाना होगा.

13 नवंबर 2024

अपने-अपने दायरे में सिमटता समाज

एक कारोबारी ने पत्नी की सहमति के बाद अपने पूरे परिवार को मार डाला. पत्नी, बेटे और दो बेटियों को उसने नींद की गोलियाँ खिलाईं फिर रस्सी से गला कसकर मार डाला. कारोबारी स्वयं भी आत्महत्या की कोशिश करते समय पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. समाज में आये दिन आत्महत्या किये जाने की अनेकानेक खबरें, घटनाएँ हम सभी के सामने आती रहती हैं. कभी गरीबी के चलते, कभी पारिवारिक कलह के चलते, कभी क़र्ज़ के चलते, कभी किसी अन्य कारण से इस तरह के दर्दनाक कदम उठाये जाते हैं. कहीं एक व्यक्ति अकेले इस तरह के कदम उठाता है, कहीं पूरा परिवार एकसाथ मौत के आगोश में चला जाता है.

 

इस तरह की घटनाओं के साथ-साथ समाज में अनेक तरह के आपराधिक कृत्य सामाजिक ढाँचे पर, इंसानों की मानसिकता पर, इंसानियत पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं. कहीं बहुत ही मामूली सी बात पर हत्या, कहीं किसी महिला की हत्या के बाद उसके टुकड़े-टुकड़े कर देना, कहीं किसी अबोध बच्ची के साथ बलात्कार, कहीं गैंग-रेप और हत्या जैसे जघन्य कृत्य दिल दहलाते रहते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हम और हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? मशीनों, रोबोटों, तकनीक भरे दौर में लगने लगा है कि समाज भी मशीन होता जा रहा है. आज के मशीनी युग में व्यक्ति भी मशीन की तरह व्यवहार करने लगा है. समाज का निर्माण इंसानों के समुच्चय द्वारा ही होता है ऐसे में समाज भी व्यक्तियों की मशीनी मानसिकता से अछूता नहीं है. धनोपार्जन की अंधी दौड़ में और उसके चलते दिमाग पर हावी किये मानसिक व्यस्तता के चलते अपने आसपास के वातावरण, माहौल से परिचित होने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की जा रही है. हमारे बगल वाले घर-परिवार में क्या चल रहा है, इससे किसी तरह का कोई सरोकार नहीं है.

 



भौतिकतावादी सोच के चलते इंसान संवेदनहीन होता जा रहा है. कुतर्कों के द्वारा वह खुद को बुद्धि, ज्ञान से ऊपर समझते हुए केवल स्वार्थमय सोच में संलिप्त है. ऐसा महसूस होने लगा है कि स्वार्थ में संलिप्त होते जा रहे समाज में किसी को भी दूसरों के हित की, दूसरों के अधिकारों की कोई चिंता नहीं है. इस गम्भीर स्थिति के चलते आए दिन होती वारदातें समाज की संवेदनहीन प्रकृति को ही परिलक्षित करती हैं. यदि कहा जाये कि समाज में संवेदना, मानवता मर चुकी है तो इसमें किसी तरह की अतिश्योक्ति नहीं होगी. अब समाज में सरेआम वारदात ही नहीं हो रही हैं बल्कि उन घिनौने कृत्य को रोकने के स्थान पर उसके वीडियो बनाकर वायरल किये जा रहे हैं. अपराधी बेख़ौफ़ अपने आपराधिक कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं. दिन-दहाड़े सड़क चलते हत्या कर देना, खुलेवाम दुकान में घुसकर गला रेत देना, भीड़ भरे स्थान पर किसी पर गाड़ी चढ़ाकर उसकी हत्या कर देना अपराधियों के बुलंद हौसलों को ही दर्शाता है.

 

समाज में इस तरह की स्थितियाँ उत्पन्न होने के कारणों का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. आखिर क्या कारण है कि हमारी युवापीढ़ी इतनी आक्रामक और संवेदनहीन हो गई है? क्या कारण है कि कोई पूरे परिवार सहित आत्महत्या करने को विवश हो जाता है मगर समाज से सहयोग की उम्मीद नहीं करता है? क्या कारण हो सकते हैं कि सड़क किनारे किसी बेटी पर चाकू से वार पर वार करते हुए उसकी हत्या कर दी जाती हो और कोई विरोध के लिए आगे नहीं आता है? क्या लालच, लोभ, स्वार्थ और दिखावे में हम सभी ने एक दूसरे की पीड़ा को समझना बंद कर दिया है? क्या सामाजिक सरोकारों से हम सभी ने अपने आपको अलग कर लिया है? क्या पड़ोस का परेशान परिवार अब हमें एक बोझ के समान नजर आने लगा है? यदि वाकई ऐसा है तो ये समाज में संवेदनहीनता बढ़ने का परिचायक है और ये हम सभी को समझना होगा कि बढ़ती संवेदनहीनता देश, समाज और भावी पीढ़ी के लिए हानिकारक है.

 

सामाजिक सरोकारों के लिए समाज में संवेदनशीलता आवश्यक है. संवेदनाएँ, इंसानियत, समन्वय, सहयोग  ही समाज में सामाजिक सौहार्द्र को बनाये रखती है. इसे ध्यान में रखते हुए समाज में सामाजिक कार्यक्रमों का, आयोजनों का, पर्वों-त्योहारों का आयोजन होते रहना चाहिए. समाज के जिम्मेदार नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन द्वारा यथासंभव प्रयास किये जाने चाहिए कि इस तरह के आयोजनों में नागरिकों की भागीदारी तथा सहयोग हो. समाज के प्रत्येक वर्ग को उसकी सामूहिकता का बोध कराते हुए उसके कर्तव्यों से परिचित कराते हुए उसमें पारस्परिक संवेदनाओं के प्रति उत्तरदायित्व का बोध जीवंत किया जाये. परिवार में भी सभी सदस्यों के बीच सहयोग, समन्वय की भावना को विकसित करते हुए उनमें परोपकार की भावना का विकास करना चाहिए. शैक्षणिक संस्थाओं के माध्यम से विद्यार्थियों में सामाजिकता की भावना का विकास करते हुए उनको इंसानियत का, मानवता का बोध कराया जाये.

 

आज की पीढ़ी को ये समझना होगा कि एकाकी भावना के साथ, स्वार्थलिप्सा के द्वारा न तो समाज का वर्तमान सँवारा जा सकता है और न ही भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है. अपने-अपने दायरे में सिमटते जा रहे व्यक्तियों, परिवारों के कारण समाज में विकृतियाँ बढती जा रही हैं, अपराध बढ़ते जा रहे हैं, अपराध-बोध का जन्म हो रहा है. ऐसी स्थिति किसी भी समाज के लिए सुखद नहीं कही जा सकती है.