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10 अप्रैल 2021

निर्वाचन आयोग की चुप्पी समझ से परे है

हम सभी आये दिन अपने लेखन में, अपने भाषणों में, अपनी सामान्य सी बातचीत में बड़े ही गर्व के साथ कहते हैं, बताते हैं कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के वासी हैं. क्या हम सिर्फ इतना कह कर ही अपनी जिम्मेवारी को पूरा मान लें? क्या महज इतने से ही हमारे सारे दायित्व पूरे हो जाते हैं? संभव है कि ये सवाल से आपको संशय हो इसलिए यदि वर्तमान परिस्थितियों के साथ आपको आगे ले चलें तो शायद बहुत कुछ समझ में आए. लोकतंत्र के वासी होने का अर्थ महज अपनी बात को कहने की आज़ादी नहीं है. लोकतंत्र के अर्थ महज यह नहीं कि हमें कुछ भी करने की स्वतंत्रता है. लोकतंत्र का सीधा सा सम्बन्ध अपनी आज़ादी के साथ-साथ हमारे साथ वाले की आज़ादी से भी है.


बहरहाल, लोकतंत्र क्या है, क्यों है की चर्चा से इतर कुछ चर्चा उस पर जिसके लिए इस पोस्ट को लिखना शुरू किया. इस समय देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर देखने को मिल रही है. लोग परेशान हैं, बीमार हैं और इसी के साथ देश के बहुत से हिस्सों में चुनावी लहर भी दिखाई दे रही है. बहुत सारे नागरिक इसका विरोध करते भी नजर आ रहे हैं. इसके साथ-साथ राजनैतिक दल, जनप्रतिनिधि लगातार बड़ी-बड़ी रैलियाँ करने में लगे हुए हैं. लोग सवाल उठा रहे हैं कि कोरोना के इस काल में जबकि शैक्षिक संस्थान बंद हैं, बहुत से कार्यालयों में घर से काम करने की छूट मिली हुई है तो चुनावों का करवाना इतना जरूरी क्यों?




हो सकता है कि पहली नजर में यह सवाल एकदम सही लगे मगर यदि लोकतान्त्रिक दृष्टि से इर पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि संवैधानिक प्रक्रिया में एक स्थिति ऐसी भी होती है जबकि निर्वाचन का करवाया जाना अनिवार्य जैसा ही हो जाता है. लोकतान्त्रिक व्यवस्था सिर्फ कहने मात्र से नहीं बनती है वरन उसके लिए प्रयास भी करने होते हैं. उसी प्रयास का परिणाम होता है निर्वाचन. यहाँ उसी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की मजबूती के लिए देश के बहुत से हिस्सों में बहुत से चुनाव संपन्न हो रहे हैं. लोगों को लग रहा है जैसे चुनाव करवाना सरकार के आदेश पर हो रहा है. इस देश में अभी बहुतायत लोगों को जानकारी ही नहीं कि चुनाव कौन करवाता है, चुनाव में सरकार की क्या भूमिका रहती है.


चलिए, लोकतान्त्रिक दृष्टि से मान भी लिया जाये कि चुनाव लगभग अनिवार्य जैसी स्थिति में थे तो निर्वाचन आयोग को इसके संपन्न करवाने की स्थिति पर, प्रक्रिया पर संवैधानिक रूप से विचार किया जाना था. निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक स्वतंत्र निकाय है, जिसे उसकी निष्पक्षता बनाये रखने के लिए सरकार के नियंत्रण से मुक्त रखा गया है. ऐसे में जबकि चुनाव करवाया जाना आवश्यक था तो निर्वाचन आयोग को कुछ नियम ऐसे बनाने थे जिनसे चुनाव भी संपन्न हो जाते और कोरोना वायरस से बचाव भी बना रहता. इसके लिए एक-दो उदाहरणों से बात को ऐसे समझा जा सकता है कि किसी भी तरह की रैलियों, जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए था. यदि किसी विशेष परिस्थिति में रैली की आवश्यकता होती भी तो महज पचास-सौ लोगों की उपस्थिति की अनुमति दी जानी थी. यदि वैवाहिक कार्यक्रम कम से कम संख्या में हो सकते हैं तो चुनावी रैलियाँ इस तरह से कम संख्या में क्यों नहीं हो सकती थीं?


इसके साथ-साथ चुनाव प्रचार पर भी सीमित संख्या का प्रतिबन्ध होना चाहिए था. किसी भी उम्मीदवार के लिए समर्थन, वोट मांगते समय एक टोली में अधिकतम चार-पाँच लोग ही होने चाहिए थे. सभी को कोविड के नियमों का पालन करना अनिवार्य किया जाना था. यदि कार के अन्दर अकेले चल रहे व्यक्ति के लिए मास्क लगाना अनिवार्य हो सकता है, यदि सड़क पर बिना मास्क के अकेले चल रहे व्यक्ति का चालान काटा जा सकता है तो फिर चुनाव प्रचार के लिए यह प्रतिबन्ध क्यों नहीं?


एक तरफ प्रधानमंत्री जी दो गज दूरी, मास्क है जरूरी; दवाई भी, कड़ाई भी का नारा लगाते हैं और खुद उनकी ही रैलियों में लाखों लोग एक-दूसरे के ऊपर चढ़े जा रहे हैं. क्या इस तरह से कोरोना फैलने का डर नहीं होता है? क्या चुनावी रैलियों की भीड़ कोरोना वायरस के प्रसार को बढ़ाती नहीं? यदि चुनावी रैलियों, प्रचार से कोरोना नहीं फैलता है तो फिर ये चुनाव पूरे वर्ष भर के लिए कर देने चाहिए. इससे कोरोना से लोग बचे रहेंगे और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया भी सुगमता से चलती रहेगी. समझ से परे है निर्वाचन आयोग का वर्तमान रवैया. आखिर राजनैतिक दलों को तो अपना बाजार सजाना है मगर निर्वाचन आयोग की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो वह कोरोना के खतरे को देखने के बाद भी अपनी आँखें बंद किये है?


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वंदेमातरम्

01 मई 2019

मोदी की कूटनीतिक वैश्विक सोच को दर्शाती है ये विजय


इस बार विचार किया था कि अपने संसदीय क्षेत्र के निर्वाचन होने तक राजनैतिक पोस्ट लिखने से बचा जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में सभी लोग, उसमें हम भी शामिल हैं, पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. सभी का किसी न किसी दल, विचारधारा के प्रति एक तरह का पूर्वाग्रह बना हुआ है. इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो खुद को निरपेक्ष मानते, बताते हैं. कहने को ऐसे लोग खुद को भले ही निरपेक्ष कहते हों, भले ही वे किसी दल के समर्थक न होते हों मगर विरोधी अवश्य होते हैं. ऐसे लोगों का विरोध सिर्फ और सिर्फ भाजपा से होता है. भाजपा के विरोध में वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, किसी के साथ भी जा सकते हैं. ऐसा इस चुनाव में होते दिख भी रहा है. टुकड़े गैंग का सदस्य खड़ा हुआ है तो भाजपा विरोधी तत्त्व उसके समर्थन में उपस्थित हो गए. देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दम मारने वाले भी ऐसे गैंग का सहारा अपने वरिष्ठ सदस्य के प्रचार के लिए ले रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए आतंकवादियों को मारने के सबूत चाहिए होते हैं. ऐसे लोगों के लिए एक आतंकी के पक्ष में अदालत खुलवाने की कोशिश होती है. ऐसे लोगों द्वारा ही हिन्दू आतंकवाद की कहानी गढ़ी जाती है. 


फ़िलहाल, कहने को बहुत कुछ है मगर लिखना इसलिए नहीं क्योंकि आज की पोस्ट का सन्दर्भ उससे कतई नहीं है. आज, एक मई को दो घटनाएँ अपने आपमें अभूतपूर्व कही जा सकती हैं, वे घटित हुईं. इनमें एक घटना आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने सम्बन्धी रही. चीन की तरफ से विगत कई मौकों पर वीटो लगाकर ऐसा करने में अड़ंगा लगाया जाता रहा मगर इस बार उसके द्वारा ऐसा नहीं किया गया. पिछले लम्बे समय से संयुक्त राष्ट्र की तरफ से उसे वैश्विक आतंकी घोषित करवाने सम्बन्धी भारत के कूटनीतिक प्रयासों को उस समय सफलता मिली जबकि चीन ने अपना वीटो पावर हटा कर इसका समर्थन कर दिया. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा संसद, पठानकोट और पुलवामा जैसे हमलों को अंजाम देने वाले आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया गया है. यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है. इस जीत के कुछ दिनों पूर्व पाकिस्तान से हमारे जांबाज अभिनंदन का सुरक्षित वापस आना भी एक कूटनीतिक सफलता थी. दोनों मामलों में विश्व समुदाय ने भारत का खुलकर साथ दिया और उसी का परिणाम रहा कि पाकिस्तान और चीन दवाब में आये. इस घटना पर वर्तमान केंद्र सरकार को जिस तरह से उसके अन्य राजनैतिक साथी दलों की तरफ से बधाई, शुभकामनायें मिलनी चाहए थीं वे नहीं मिली हैं.

इस घटना के अलावा आज की एक घटना वाराणसी से बीएसएफ के बर्खास्त जवान का नामांकन पत्र का खारिज होना है. यह सामान्य अर्थों में बहुत बड़ी घटना समझ न आ रही हो मगर इसके सन्दर्भ बहुत गहरे हैं. संदर्भित व्यक्ति बीएसएफ से बर्खास्त जवान है, जिसका विगत महीनों में एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उसके द्वारा सेना में भोजन सम्बन्धी समस्या को उठाया गया था. फिलहाल, मुद्दा यहाँ यह नहीं वरन यह है कि उस व्यक्ति के द्वारा पहले निर्दलीय नामांकन किया गया, बाद में उसे गठबंधन ने अपना प्रत्याशी बनाया. दोनों नामांकन पत्रों में जानकारियों में अंतर होने के साथ-साथ जो सबसे बड़ी बात है वह उसका बर्खास्त होना. क्या कोई बर्खास्त जवान चुनाव लड़ सकता है? वाराणसी से किसी बर्खास्त जवान का चुनाव क्षेत्र में उतारना, वो भी मोदी के खिलाफ एक सोची-समझी योजना थी. यदि वाकई वह जवान अथवा बीएसएफ के बहुत सारे जवान सेना के सम्मान में ही मैदान में उतर रहे थे तो उनको उस व्यक्ति के खिलाफ चुनाव में उतरना चाहिए था, जिसने खुलेआम सेना को रेपिस्ट कहा था. मगर ऐसा नहीं हुआ, न ऐसा होने जा रहा है क्योंकि इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ भाजपा का विरोध, मोदी का विरोध है.

फिलहाल तो भाजपा विरोधी और मोदी विरोधी संज्ञाशून्य जैसी स्थिति में होंगे. वे किसी भी रूप में रहें, खुश रहें क्योंकि अभी सम्पूर्ण देश वर्तमान केंद्र सरकार की वैश्विक कूटनीतिक विजय की ख़ुशी मना रहा है. मोदी जी की अंतर्राष्ट्रीय स्तर यात्राओं का यह सुफल निकला है.



04 नवंबर 2018

त्योहारों पर पक्षपाती निर्णय


समय के साथ किस तरह स्थितियाँ बदल जाती हैं या कहें कि बदल दी जाती हैं, इसका एहसास किसी को नहीं होता. एक समय था जबकि हमारा बचपन था तब मैदान बच्चों से भरे रहते थे. शाम को घर बैठे रहना डांट का कारण बनता था. हरहाल में शाम को थोड़ी देर मैदान में जाकर कुछ न कुछ खेलना अनिवार्य हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट है. अब मैदान एकदम खाली हैं. शाम को घर से बाहर निकलना बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं है. अब वे बाहर हाथ-फिर चलाने के बजाय या तो मोबाइल पर उंगलियाँ चलाते हैं या फिर टीवी पर आँखें. इसी तरह हमें अच्छे से याद है कि पहले नियमित रूप से मिलना-जुलना हुआ करता था. सम्बन्ध कभी भी दो पर दो के नहीं रहे वरन पारिवारिक रहे. बिना किसी औपचारिकता के बेधड़क एक-दूसरे के घर आना-जाना हुआ करता था. न केवल आना-जाना वरन खाना-पीना भी. ऐसा एक-दो दिन का हाल नहीं हुआ करता था बल्कि बहुतायत में यही हुआ करता था. अब स्थिति इसके ठीक उलट हो गई है. अब बाहर जाना होता है तो किसी के घर नहीं वरन किसी होटल में, रेस्टोरेंट में. अब यदि किसी के घर जाना होता भी है तो अकेले, पारिवारिक आना-जाना न के बराबर दिखाई देता है. इसमें भी किसी के घर जाने के पहले उसकी अनुमति सी चाहिए होती है. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके घर जाने पर उसके न मिलने पर समय की बर्बादी होगी वरन इसलिए कि जिस समय मिलने जाना है उस समय वह अपने किसी टीवी कार्यक्रम को देखे में तो व्यस्त नहीं. किसी लाइव शो को देखने में, किसी मैच में चिल्लाने में, किसी रोने-ढोने वाले सीरियल देखने में तो मगन नहीं.


कुछ ऐसे ही हालात त्योहारों को लेकर सामने आ रहे हैं. उसमें भी विशेष रूप से हिन्दुओं के त्यौहार को लेकर. इस्लाम में ताजिया कितना भी बड़ा बनाया जाने, सड़क पर निकाला जाये कोई दिक्कत नहीं. हाँ, दही-हांडी की ऊँचाई निर्धारित होगी. बकरीद में कितने भी बकरे काट दिए जाएँ कोई प्रदूषण नहीं फैलना उसके खून, खाल, मांस से न पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होना है, ऐसा बस उतनी देर में ही होगा जबकि दीपावली के पटाखे फोड़े जायेंगे. हाईवे का निर्माण होना है तो मंदिरों के हटाये जाने पर विकास-कार्य का हवाला दिया जायेगा मगर यदि मामला किसी मस्जिद के, मजार के हटाने का आता है तो वहां मजहबी भावनाएं घायल होने लगती हैं. मंदिर में प्रवेश की बात आती है तो यह सभी का अधिकार होता है मगर यदि बात मस्जिद में प्रवेश की आ जाये तो वहां मजहबी भावनाओं में अदालत हस्तक्षेप नहीं करती. इन विकट स्थितियों के बीच यदि बचपन याद करते हैं तो याद आता है दीपावली का निबंध. जिसमें कि हम पढ़ा करते थे कि दीपावली दीपों, आतिशबाजी, रौशनी का पर्व है. इसके पटाखों के धुंए से कीड़े-मकोड़े-मच्छर आदि मर जाते हैं. अब देख रहे है कि पटाखों के चलाये जाने पर भी कानूनी पकड़ बनाई जाने लगी है.

संभव है कि आज की स्थितियों में इन्सान ने अपने लाभ के लिए पटाखों को पहले के मुकाबले अधिक हानिकारक बना दिया हो मगर क्या पूरे साल में बस एक रात में कुछ घंटे पटाखे चलाना ही प्रदूषण को बढ़ाता है? यदि निष्पक्ष ढंग से देखा जाये तो चौबीस घंटे मकानों, कार्यालयों, बाजारों, दुकानों आदि में चलते एसी, सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ती एसी कारें, कारखानों से निकलना धुआँ आदि क्या पर्यावरण को संरक्षित कर रहा है? क्या इन सबसे प्रदूषण नहीं फैलता है? ऐसे में महज एक रात में कुछ घंटों को कानूनी शिकंजे में कसने की जो नीति अपनाई जा रही है वह एक दृष्टि से भले ही तार्किक समझ आ रही हो मगर जबकि एक-एक आदमी, निर्णय देने वाले लोग भी उसी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं जो प्रदूषण फैला रहा है तब आतिशबाजी नियंत्रण सम्बन्धी निर्णय पक्षपातपूर्ण समझ आते हैं. एक तरह की शिगूफेबाजी ही नजर आती है.

कोई भी पर्व, त्यौहार हो सभी के लिए सुखदायी हो, ऐसी कामना है मगर यदि धर्म-मजहब देखकर उनके कृत्यों पर निर्णय दिए जायेंगे तो यह सामाजिक विभेद की स्थिति पैदा करेगा. ऐसे में सुखदायी स्थिति, सौहार्द्र बनना कहीं से भी सहज नहीं समझ आता.

05 नवंबर 2016

चैनल प्रतिबन्ध और राजनीति

पठानकोट पर हुए आतंकी हमले के समय देश की आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में न रखते हुए किये गए प्रसारण के लिए एनडीटीवी पर एक दिनी प्रतिबन्ध लगाया गया है. केबल टीवी नेटवर्क कानून के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने प्रतिबन्ध लगाये जाने का आदेश दिया है. इस खबर के आते ही तमाम विपक्षी दल केंद्र सरकार पर हमलावर की भूमिका में आ गए हैं. उनके द्वारा इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसी स्थिति बताया जाने लगा है. राजनैतिक दलों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर इस प्रतिबन्ध के पक्ष, विपक्ष में बहस छिड़ गई है. कदाचित प्रथम दृष्टया देखने पर ऐसा ही महसूस होता है कि सरकार द्वारा तानाशाही रवैया अपनाते हुए चैनल पर एक दिन का प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसके साथ-साथ यदि चैनलों की, मीडिया की, सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाये तो इस प्रतिबन्ध के पीछे बहुत से बिंदु ऐसे निकल कर सामने आयेंगे जो ऐसे क़दमों के उठाये जाने की अनुशंसा करेंगे. 


चैनल पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के पीछे का कारण पठानकोट हमले के समय के प्रसारण को आधार बनाया गया है. ये कोई पहली बार नहीं हुआ है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से कि देश की आंतरिक सुरक्षा को उन्होंने ताक पर रख दिया हो. अभी विगत दिनों सेना द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक की सूचना के बाद जिस तरह से मीडिया द्वारा सीमा पर जाकर वहाँ सेना की स्थित, जवानों की लोकेशन, वहाँ के सुरक्षा इंतजाम, बंकरों की स्थिति, सीमा से लगे हुए गाँवों के नागरिकों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए उठाये गए क़दमों का प्रसारण किया गया वो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता है. मीडिया की, इलेक्ट्रॉनिक चैनल की कुछ इसी तरह की अतिशय उत्साहित स्थिति का खामियाजा देश के जवानों को उस समय भुगतना पड़ा था जबकि वे मुंबई हमले के समय आतंकियों को काबू में करने के लिए जूझ रहे थे. उस समय भी अनेकानेक चैनलों द्वारा समूचे ऑपरेशन का सीधा प्रसारण करके खुद को सबसे तेज, सबसे आगे रखने की तृष्णा में समूची रणनीति को दुश्मनों तक पहुंचा दिया था.

देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का कार्य अकेले इलेक्ट्रॉनिक चैनल ही नहीं कर रहे हैं, कई बार ऐसा काम प्रिंट मीडिया द्वारा भी कर दिया जाता है. आये दिन मीडिया द्वारा सेना की, पुलिस की जानकारी रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित कर दी जाती है. कहाँ-कहाँ हमारे जवान तैनात हैं, कहाँ-कहाँ कितना असलहा है, कितना गोला-बारूद है, कहाँ-कहाँ किस तरह की कमियां हैं, कहाँ-कहाँ खामियां हैं आदि-आदि को दिखाकर, प्रकाशित करके मीडिया चैनल अथवा पत्र-पत्रिकाएं जागरूक किस्म की पत्रकारिता न करके देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ ही कर रही हैं. आज भी देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका की एक रिपोर्ट दिमाग से हटती नहीं जबकि विमान अपहरण के बाद एक आतंकी को छोड़ने की शर्त आतंकियों द्वारा केंद्र सरकार के सामने रखी गई थी. उस समय उस पत्रिका ने उस आतंकी के रिहा किये जाने के पहले ही सम्बंधित जेल के नक़्शे सहित एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें जेल की दीवारों की ऊँचाई, बैरकों की स्थिति, उस आतंकी के कैद किये जाने की स्थिति, वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था आदि को लेकर ग्राफिक्स सहित जानकारी प्रकाशित की गई थी. सोचने वाली बात है कि उस रिपोर्ट का फायदा उठाकर आतंकी यदि अपने साथ को छुड़ा ले जाते और फिर किसी दूसरे आतंकी को छोड़े जाने की माँग करने लगते तो इसका जिम्मेवार कौन होता? दरअसल मीडिया हो अथवा सोशल मीडिया, सभी ने स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है. उनके लिए अपने-अपने खेमे बना लिए गए हैं. इस कारण उनका उद्देश्य अपने खेमे को सबसे आगे रखना, उसको तमाम खूबियों से परिपूर्ण दिखाना और विपक्षी खेमे को नीचा दिखाना, उसकी कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर सामने लाना बन गया है. ऐसे में अक्सर देश की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ भी हो जाता है. कई-कई गोपनीय जानकारियाँ सार्वजनिक हो जाती हैं.


ऐसी स्थिति में अब जबकि केंद्र सरकार द्वारा चैनल पर एक दिन के प्रसारण रोक का प्रतिबन्ध लगाया गया है तो इसे सम्पूर्ण मीडिया पर प्रतिबन्ध न समझा जाये. इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसा घोषित करके विपक्षियों द्वारा देशवासियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की जा रही है, जो खतरनाक है. वैसे भी ये कोई पहला अवसर नहीं है जबकि केंद्र सरकार ने किसी चैनल पर प्रतिबन्ध लगाया है. इससे पहले खुद कांग्रेसनीत पिछली सरकार में बीस से अधिक बार प्रतिबन्ध की कार्यवाही की जा चुकी है. तब ये कार्यवाही अश्लील सामग्री, एडल्ट सामग्री दिखाए जाने को लेकर की गई थी, जो कई-कई सप्ताह, महीनों की थी. ऐसे में ये भी सोचना लाजिमी है कि अश्लील, पोर्न सामग्री को दिखाए जाने पर महीनों के हिसाब से लगाया गया प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट नहीं था, मगर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सार्वजनिक करने पर मात्र एक दिन का प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट हो गई. ये भी विचार करना होगा कि असीम त्रिवेदी के द्वारा बनाये गए कार्टून पर उसे हिरासत में लेना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन नहीं था मगर सेना की ख़ुफ़िया जानकारियों को सार्वजनिक करने पर लगी रोक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन है. सोचना होगा कि अनशन करने के दौरान रात को सोते हुए अनशनकारियों पर लाठीचार्ज करवा देना आपातकाल की आहट नहीं था मगर देश की सुरक्षा से लगातार खिलवाड़ पर सख्त कदम का उठाया जाना आपातकाल जैसा हो गया. विडम्बना ये है कि आज देशहित से आगे स्वार्थ हो गया है. जिसके चलते विरोध के लिए विरोध करना अनिवार्य सा हो गया है और यही कारण है कि चैनल पर एक दिनी प्रतिबन्ध पर सार्थक बहस के स्थान पर जबरिया विरोध की राजनीति की जाने लगी है. ये स्थिति किसी भी रूप में देश के सुखद भविष्य की राह निर्मित नहीं करती है.