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17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


18 फ़रवरी 2026

धार्मिक विरासत का विकास मॉडल - अयोध्या

जय श्रीराम और रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे जैसे नारों के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर विरोधी श्रीराम मंदिर निर्माण को सवालों के घेरे में खड़ा करते थे. उनका मानना था कि मंदिर निर्माण से आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं होने वाला. विरोधियों द्वारा मंदिर के स्थान पर चिकित्सालय बनवाए जाने के, विद्यालय बनवाए जाने के सुझाव दिए जाते. न्यायिक प्रक्रिया पश्चात् श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला और मंदिर निर्माण होने के साथ-साथ प्राण प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हुई. अब जबकि अयोध्या में श्रीराम मंदिर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, अयोध्या में बढ़ते पर्यटकों की संख्या अपनी ही अलग कहानी कह रही है तब भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) लखनऊ से श्रीराम मंदिर अर्थव्यवस्था मॉडल को अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई है. संस्थान की एक अध्ययन रिपोर्ट ने श्रीराम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् अयोध्या में आई व्यापक आर्थिक सक्रियता, निवेश प्रवाह और रोजगार सृजन पर प्रकाश डाला है. अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल आया है.

 



आईआईएम लखनऊ ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में मंदिर निर्माण से पहले और उसके बाद की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि मंदिर निर्माण से पहले अयोध्या की पहचान हिन्दुओं के एक पवित्र तीर्थस्थान के रूप में ही बनी हुई थी. मंदिर निर्माण के पहले यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं, पर्यटकों की वार्षिक संख्या लगभग 1.7 लाख के आसपास थी. अयोध्या के स्थानीय बाजारों का सञ्चालन भी बहुत छोटे स्तर पर होता था, जिसके चलते यहाँ की आर्थिक गतिविधियाँ भी संकुचित थीं. मंदिर निर्माण के बाद यहाँ लगभग छह हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) स्थापित हुए. अयोध्या के स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की माँग में उछाल से कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है. छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये तक पहुँच गई. यहाँ की बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने पिछले वर्ष लगभग 400 करोड़ रुपये का जीएसटी योगदान दिया है.

 

किसी भी स्थान के पर्यटन को लेकर वहाँ की यातायात व्यवस्था, रुकने के स्थानों आदि का गुणवत्तापूर्ण होना बहुत अधिक महत्त्व रखता है. मंदिर निर्माण से पूर्व राष्ट्रीय स्तर के होटलों से सम्बंधित व्यावसायियों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. यातायात की सुविधाएँ भी सीमित रूप में देखने को मिलती थीं. मंदिर निर्माण पश्चात् आधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी सड़कों, नदी तट सौंदर्यीकरण और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीन स्वरूप प्रदान किया है. इन परियोजनाओं ने अयोध्या को नवीनतम स्वरूप प्रदान करने के साथ-साथ निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करके स्थानीय युवाओं को काम के अवसर भी प्रदान किये. श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में सेवा-भाव, आतिथ्य सत्कार, निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तेजी से विस्तार हुआ है. इससे यहाँ की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से पर्यटन आधारित राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है. अध्ययन के अनुसार अयोध्या में प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन के परिणामस्वरूप 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे अस्तित्व में आये हैं. यहाँ पर्यटन से जुड़ी संभावनाओं को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित होटल व्यावसायियों ने अयोध्या में अपनी योजनाओं को विस्तारित किया है. अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अगले चार-पाँच वर्षों में पर्यटन, परिवहन, होटल, खान-पान और आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन सम्भव है.

 

इसी के साथ महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा संचालन से देश के विभिन्न महानगरों से सीधी हवाई सम्पर्क स्थापित होने से भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई. आईआईएम के अध्ययन के अनुसार जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पश्चात् पहले छह महीनों में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन अयोध्या में हुआ. इस स्थिति के चलते अयोध्या के स्थानीय बाजार, परिवहन और आतिथ्य क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार देखने को मिला. ऐसी सम्भावना दर्शायी गई है कि अब अयोध्या में वार्षिक स्तर पर 5 से 6 करोड़ लोगों का आना हो सकता है. पर्यटकों, आगंतुकों की अनुमानित संख्या अयोध्या को देश के प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्रों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा करती है. वर्तमान में अयोध्या में लगभग 85000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं. इनका प्रभाव केवल आधारभूत ढाँचे तक ही नहीं बल्कि निवेश और सेवा क्षेत्र तक विस्तीर्ण है. सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया जा रहा है. अयोध्या को मॉडल सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं.

 

प्रवासी भारतीयों, देशी-विदेशी शोधकर्ताओं, वैश्विक श्रद्धालुओं का अयोध्या के प्रति आकर्षित होना सिद्ध करता है कि अयोध्या ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में नई पहचान प्राप्त की है. अध्ययन के अनुसार धार्मिक विरासत आधारित विकास मॉडल यदि सुव्यवस्थित निवेश, प्रशासनिक समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ लागू किया जाए तो वह स्थानीय अर्थव्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन कर सकता है. अयोध्या का अनुभव दर्शाता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के योजनाबद्ध क्रियान्वयन से पर्यटन, रोजगार और निजी निवेश से बहुस्तरीय आर्थिक वृद्धि का आधार निर्मित किया जा सकता है. यहाँ की आधारभूत संरचना, पर्यटन सुविधाओं और निवेश माहौल में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसने इस तीर्थनगरी को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर दिया है.

 

 


07 अक्टूबर 2025

एनपीएस का लाभ तभी जब समय से धनराशि खातों में पहुँचे

एनपीएस को लेकर जो संघर्ष जुलाई 2024 में शुरू किया था, वह आज तक चल रहा है. मौखिक और लिखित निवेदनों के बाद भी असर न हुआ तो उच्चाधिकारियों को, मंत्रालयों को लिखा गया. इसके बाद भी कान में जूँ न रेंगने जैसी स्थिति दिखाई पड़ने के बाद नवम्बर 2024 में लीगल नोटिस का सहारा लिया गया. इसके परिणामस्वरूप दिसम्बर 2024 में एनपीएस की धनराशि सम्बंधित खातों में प्रदर्शित होने लगी. ये और बात है कि मई 2017 से होती आ रही कटौती वाले समय से लेकर मई 2023 तक की धनराशि खातों में प्रदर्शित होने लगी.

 

इस पूरी लिखा-पढ़ी के दौरान विपक्षी गुट की तरफ से हर तरफ यही कहा जाता रहा कि सरकारी पैसा है, जब काटा जा रहा है तो एक न एक दिन मिलेगा ही, कुमारेन्द्र अनावश्यक रूप से प्राचार्य को परेशान कर रहे हैं. ऐसा ही कुछ अब फिर कहा जाने लगा है क्योंकि अब हमारे द्वारा फिर से मई 2023 के बाद की एनपीएस धनराशि की बात की जाने लगी है. पिछले संघर्ष की आंशिक सफलता के बाद बहुत से लोग सम्पर्क में आये और बहुत से लोगों से हमने भी सम्पर्क किया जो अभी तक एनपीएस से वंचित बैठे हैं. ऐसे लोग इसलिए संघर्ष, लिखा-पढ़ी नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनका भी मानना है कि सरकारी कटौती हो रही है, किसी न किसी दिन तो पैसा मिलेगा ही या फिर वे सीधे-सीधे प्राचार्य से नहीं टकराना चाह रहे.

 


इस विषय में अपने यहाँ के ऐसे लोगों को और बाहरी लोगों को जो ये समझते हैं कि सरकारी धन है किसी न किसी दिन मिलेगा ही, वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. पिछले दिनों इसी सन्दर्भ में जब वर्तमान की कटौती का लोगों की सेवा-अवधि के सन्दर्भ में वापसी वाला धन दिखाया तो बहुतेरों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थीं. ये सभी को स्पष्ट है कि एनपीएस कटौती वाली धनराशि को शेयर बाजार में लगाया जाता है. शेयर बाजार के अनुसार ही इसमें भी लाभ-हानि मिलना है. इसका लाभ उसी स्थिति में मिलना है जबकि धनराशि उचित समय पर शेयर बाजार में लगती रहे. अभी बहुत सी जगहों पर हो ये रहा है कि या तो लोगों की एनपीएस कटौती वाली धनराशि ट्रेजरी में ही रुकी पड़ी है या फिर वे बहुत ज्यादा देरी से उचित खातों में पहुँच रही है.

 

ये पोस्ट विशेष रूप से उन्हीं लोगों के लिए है जो अपने-अपने यहाँ के प्राचार्यों के पक्ष में खड़े होकर शोशेबाजी करने में लगे हैं कि सरकारी पैसा है एक न एक दिन मिलेगा ही. सोचिए यहाँ एक पल को रुककर कि मई 2023 के बाद की धनराशि यदि अपने समय पर प्राप्त हो गई होती तो उसका उचित मूल्य शेयर बाजार की स्थिति को देखते हुए मिल गया होता. जून 2023 की धनराशि अब नवम्बर 2025 में मिलेगी तो इस बीच की अवधि का मिलने वाला लाभ तो मारा ही गया. याद रहे कि यहाँ पर जो भी बढ़ोत्तरी होती है वह चक्रवृद्धि ब्याज के रूप में होती है. अपने घाटे का आकलन आप सभी लोग स्वयं करें.

 

 

29 मई 2025

चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का उत्साह??

22 अप्रैल 2025 को प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है. भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इस बड़ी छलांग को लगाते हुए जापान को पीछे छोड़ दिया है. आईएमएफ की रिपोर्ट के बाद इसकी पुष्टि करते हुए नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने बताया कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वर्तमान में चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक का हो गया है. इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई ही. आईएमएफ की रिपोर्ट की पुष्टि करने के साथ-साथ उन्होंने बताया कि यदि देश की नीतियाँ ऐसे ही काम करती रहीं तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारा देश जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.

 



जीडीपी के आधार पर वर्ष 2023 के आँकड़ों में विश्व की प्रथम दस अर्थव्यवस्थाओं में देश की अर्थव्यवस्था पाँचवें स्थान पर थी. तब हमारे देश की अर्थव्यवस्था 3.56 ट्रिलियन डॉलर थी. तत्कालीन आँकड़ों के अनुसार भारत से आगे विश्व अर्थव्यवस्थाओं में चार देश अमेरिका (27.72 ट्रिलियन डॉलर), चीन (17.79 ट्रिलियन डॉलर), जर्मनी (4.52 ट्रिलियन डॉलर) और जापान (4.20 ट्रिलियन डॉलर) ही थे. इस वर्ष जारी की गई रिपोर्ट में आईएमएफ का कहना यह भी है कि वर्ष 2025 में भारत की विकास दर 6.2 प्रतिशत और वर्ष 2026 में 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है. इन आँकड़ों का आईएमएफ की तरफ से जारी होने के कारण भी देश के आर्थिक क्षेत्र में तथा सत्ता पक्ष में उत्साह दिखाई दे रहा है.

 

वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का प्रभाव न केवल देश की आंतरिक स्थिति पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई देगा. ऐसी स्थिति के चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक मंचों जैसे जी-20, विश्व बैंक, आईएमएफ आदि में भारतीय छवि का सकारात्मक स्वरूप नजर आएगा. इसके चलते विदेशी निवेश बढ़ने की भी सम्भावना है. विश्व स्तर की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ वैसे भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों के लिए ग्राहकों को लगातार तलाशती रही हैं. अब उनको भारत में एक आकर्षक बाजार नजर आ रहा होगा. देखा जाये तो भारत दक्षिण एशिया में लम्बे समय से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में रहा है और विगत कुछ वर्षों में उसके क्षेत्र और विश्वास में भी वृद्धि हुई है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक मंचों पर, महाशक्ति समझे जाने वाले देशों में भारत की सकारात्मक एवं सशक्त छवि बनी है. देश की वर्तमान आर्थिक उपलब्धि के बाद उसके आर्थिक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता दिखता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के चौथे स्थान पर आने के अपने-अपने सन्दर्भ तलाशे जा रहे हैं. इनको तलाशा भी जाना चाहिए, आखिर आम जनमानस को भी इसके सन्दर्भों से परिचित होने की आवश्यकता है. एक तरफ आर्थिक क्षेत्र में, सत्ता के गलियारों में उत्साह दिख रहा है, दूसरी तरफ आम नागरिक अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, मँहगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि से जूझ रहा है.

 

देश के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी क्या भारतीय समाज की, सामान्य जन-जीवन की, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकता से मुँह मोड़ा जा सकता है? अर्थव्यवस्था सम्बन्धी आँकड़ों को सामने लाने का कार्य मुख्य रूप से जीडीपी को आधार बनाकर किया जाता है. जीवन-शैली और आर्थिकी के सन्दर्भ में जीडीपी और जन-जीवन दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं, दोनों के अलग-अलग स्वरूप हैं. जीडीपी से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तो मापा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा सामान्य जनजीवन के बारे में, आय और संपत्ति के वितरण के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी प्रति व्यक्ति आय के सन्दर्भ में देश वैश्विक स्तर पर 144वें स्थान पर आता है. यह विडम्बनापूर्ण ही है कि अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत से आगे मात्र तीन देश हैं लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में 143 देश हमसे आगे हैं. यदि जापान के सन्दर्भ में ही आँकड़ों को देखें तो भारत में प्रति व्यक्ति आय तीन हजार डॉलर से कम है जबकि जापान की प्रति व्यक्ति आय 34 हजार डॉलर है. जीडीपी के सन्दर्भ में हम भले ही जापान से आगे निकल आये हों किन्तु प्रति व्यक्ति आय, जीवन प्रत्याशा, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, तकनीक आदि जैसे क्षेत्रों में जापान हमसे बहुत आगे है.

 

किसी भी देश के विकास में शिक्षा की गुणवता, नागरिकों का स्वास्थ्य, उनकी जीवन प्रत्याशा, जीवन-शैली, प्रति व्यक्ति आय आदि का बहुत बड़ा योगदान होता है. इनका सकारात्मक रूप और इसका स्तर किसी भी देश के सामाजिक जीवन में नवाचार को दर्शाता है. अपने देश की साक्षरता दर भले ही 75 प्रतिशत से अधिक की है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास में कमी बनी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यंत जटिल है. इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी सुखद नहीं कही जा सकती है. आय और सम्पत्ति के वितरण में भी व्यापक असमानता दिखाई देती है. देश के संसाधनों की बहुलता मुट्ठी भर लोगों के पास है और अधिसंख्यक नागरिकों के पास अत्यल्प संसाधन हैं. ऐसे में आँकड़ों के सन्दर्भ में, जीडीपी के आधार पर, वैश्विक स्थिति में वृद्धि होने को लेकर भले ही उत्साह दिखा लिया जाये मगर सामाजिक स्थिति के सन्दर्भ में, आम जनमानस के आधार पर आईएमएफ की इस रिपोर्ट पर अत्यधिक उत्साहित होने की, गर्वोन्नत होने की आवश्यकता नहीं है.

 

09 अप्रैल 2025

टैरिफ वॉर की चपेट में वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये गए टैरिफ वॉर से वैश्विक व्यापारिक जगत में हाहाकार मचा हुआ है. दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम नजर आ रहे हैं. यदि सिर्फ अमेरिकी शेयर बाजार की चर्चा करें तो टैरिफ लगाने के बाद से यहाँ लगभग छह ट्रिलियन डॉलर अर्थात लगभग 516 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं. यदि भारतीय बाजार के सन्दर्भ में देखा जाये तो यह रकम भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के आकार से दोगुनी है. सोचा-समझा जा सकता है कि टैरिफ लगाये जाने की घोषणा से बाजार का जो हाल हुआ है, उससे आगे क्या हाल होने वाला है. बाजार की ऐसी स्थिति के स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बाद भी ट्रम्प अपने फैसले को जबरिया सही सिद्ध करने पर उतारू हैं. दुनिया भर के 60 देशों पर टैरिफ लगाने के बाद अमेरिका सहित एशिया, यूरोप के बाजारों में भयंकर गिरावट दिख रही है, बावजूद इसके ट्रम्प इसकी तरफ से आँखें मूँद कर इसे एक दवा बता रहे हैं. जहाँ एक तरफ वैश्विक स्तर पर तमाम विशेषज्ञ ट्रम्प के इस टैरिफ वॉर की आलोचना कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्‍ट्रपति एक सवाल के जवाब में दो टूक भाषा में टैरिफ विरोध को दरकिनार करते हुए कहते हैं कि मैं किसी चीज में गिरावट नहीं चाहता लेकिन चीजें ठीक करने के लिए दवाई देनी पड़ती है.

 



आखिर ये समझने का विषय है कि किस कारण से ट्रम्प टैरिफ लागू किये जाने की जिद पकड़े हैं? ये भी जानने-समझने का विषय हो सकता है कि आखिर किस कारण से ट्रम्प को टैरिफ एक तरफ दवाई नजर आ रही है तो दूसरी तरफ खूबसूरत चीज दिखाई दे रही है. ट्रम्प ने सोशल मीडिया के एक मंच पर लिखा भी है कि चीन, यूरोपीय संघ और कई अन्य देशों के साथ हमारा विशाल वित्तीय घाटा है. इस समस्या का समाधान सिर्फ टैरिफ़ से ही संभव है. इससे अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं. क्या वाकई टैरिफ की नई दरों से अमेरिका में अरबों डॉलर आ रहे हैं या फिर यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनी बात को पुख्ता किये जाने के लिए कहा गया है? यदि बाजार के सन्दर्भ में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर नजर डालें तो साफ़ समझ आ रहा है कि अमेरिकी सरकार पर कर्ज का बहुत बड़ा बोझ है. आँकड़े बताते हैं कि अमेरिकी सरकार वर्तमान में 36.1 ट्रिलियन डॉलर क़र्ज़ की सर्वोच्च सीमा पर है. इसके अलावा अमेरिका के लिए आर्थिक स्तर पर जो बुरी खबर है वो यह कि वर्तमान में अमेरिकी सरकार प्रतिवर्ष लगभग 900 बिलियन डॉलर से एक ट्रिलियन डॉलर के आसपास ब्याज का भुगतान करती है. टैरिफ के कारण अमेरिकी बॉण्ड यील्ड में आई गिरावट हाल-फिलहाल ट्रम्प सरकार के लिए राहत जैसी समझ आ रही. टैरिफ के कारण अमेरिका के दस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसी तरह से बीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.25 प्रतिशत और तीस वर्षीय बॉण्ड यील्ड में 4.3 प्रतिशत की गिरावट आई है. यह गिरावट इसलिए राहत का विषय हो सकती है क्योंकि इससे ब्याज देनदारी में कमी आएगी. ऐसी विषम स्थिति में ट्रम्प सरकार को राहत दिलाने का यह काम भले टैरिफ के माध्यम से होता दिखे मगर वह क्षणिक है और दीर्घकाल में समूचे विश्व में इसका नकारात्म्मक असर दिखने की आशंका है.

 

ट्रम्प के टैरिफ वॉर का असर वैश्विक स्तर पर तो पड़ेगा ही उसका अमेरिका पर भी काफी बुरा असर पड़ेगा. तात्‍कालिक प्रभाव से शेयर बाजार में छह लाख करोड़ डॉलर तो डूब ही चुके हैं जो अमेरिका की अर्थव्‍यवस्‍था का लगभग 20 प्रतिशत है. इसके साथ-साथ एशिया, यूरोपीय बाजारों में यह आँकड़ा सोच से कहीं अधिक बुरी कहानी बयान करता है. ऐसी स्थिति के चलते अमेरिका में मंदी की आशंका जताई जा रही है. विश्व की अनेक कम्पनियाँ जो अमेरिका को अपने उत्पाद, सेवाएँ भेजती हैं, उनके कारोबार और बाजार मूल्‍यांकन में तगड़ी गिरावट देखी जा रही है. इससे नौकरियों पर भी संकट आ गया है. यदि यश स्थिति वैश्विक रूप में मंदी के रूप में सामने आती है तो छोटी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के लिए इससे उबरना मुश्किल हो जाएगा.

 

ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ने भले ही दो अप्रैल को अपना नया लिबरेशन दिवस घोषित करते हुए अमेरिका के अनेक व्यापारिक साझेदारों पर जवाबी शुल्क लगा दिया हो मगर इससे अमेरिका की स्थिति में सुधार होने की सम्भावना हाल-फिलहाल तो नजर नहीं आती है. बजाय किसी तरह के सुधार के एक सम्भावना यह बनती दिख रही है कि कहीं वैश्विक व्यापारिक क्षेत्र में अमेरिका शेष विश्व से अलग न हो जाये. ट्रम्प ने भले ही अमेरिका को अपने ही आर्थिक झंझावातों से बाहर निकालने के लिए, अमेरिका को कर्ज के मकड़जाल से मुक्त करवाने के लिए टैरिफ लगाये जाने का निर्णय लिया मगर इससे एशिया, यूरोप की अर्थव्यवस्था में अलग तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं. विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका से इतर एक नई व्यापारिक व्यवस्था को स्वीकार कर सकती हैं. निश्चित ही ऐसा होना वैश्वीकरण की व्यवस्था को पूरी तरह से उलट देने जैसा होगा. टैरिफ की घोषणा के आने मात्र से होने वाली उठापटक के बाद इसके दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सुखद कल्पना तो कदापि नहीं की जा सकती है. देखना यह है कि आने वाले समय में ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया टैरिफ वॉर क्या अंतिम परिणाम सामने लाता है?


06 नवंबर 2024

भारतीय सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रंप की जीत

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने जीत हासिल की. उन्होंने अपनी प्रतिद्वन्द्वी कमला हैरिस को पराजित किया. राष्ट्रपति पद की जीत के लिए आवश्यक 270 इलेक्टोरल वोट के आँकड़े को पार करते हुए इस जीत को हासिल किया. इस जीत से उन्होंने अमेरिका में 132 वर्ष पूर्व हुए राष्ट्रपति चुनाव परिणाम की बराबरी कर ली है. दरअसल ट्रंप 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जो 2020 में हुए अगले राष्ट्रपति चुनाव में हार गए थे. इस हार के बाद वे अब 2024 में पुनः विजयी हुए हैं. अमेरिका में ऐसा 132 साल बाद हुआ है जब कोई व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति बना हो मगर उसने चुनाव लगातार न जीता हो. डोनाल्ड ट्रंप के पहले ग्रोवर क्लीवलैंड 1884 में और फिर 1892 में राष्ट्रपति बने थे.

 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत को लेकर भारत में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. उनकी जीत से भारतीय शेयर बाजार पर भी प्रभाव पड़ता दिखा है. इसका एक कारण है कि अमेरिकी चुनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. भारत का व्यापार अमेरिका के साथ वैश्विक स्तर पर अपना महत्त्व रखता है. भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों की दृष्टि से देखा जाये तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021-2022 में 119.42 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हुआ था, जबकि इसके पूर्व 2020-21 में यह 80.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. इस व्यापारिक संबंधों का प्रभाव निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा. ट्रंप के आने का सबसे ज्यादा फायदा उन उद्योगों को होने वाला है जो निर्यात से जुड़े हैं. इसमें चाहे मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियाँ हों या इन कम्पनियों के उत्पादों को बाहर भेजने वाली कोई तीसरी कम्पनी. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ऑटोमोबाइल, मशीनरी, टेक्सटाइल और कैमिकल आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है. ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है कि ट्रंप की नीतियाँ अमेरिकी कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं. इस कारण से भी भारत-अमेरिका के बीच पारस्परिक सह-संबंधों में जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकते हैं.

 



भारतीय निर्यात को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद के साथ-साथ ट्रंप द्वारा पूर्व में चीनी उत्पादों पर हाई टैरिफ लगाए जाने का सकारात्मक असर भारतीय व्यापारिक नीति में दिखाई पड़ सकता है. ट्रंप ने चीन से आने वाले सोलर पैनल, वॉशिंग मशीन, स्टील और एल्युमीनियम समेत अनेक उत्पादों पर टैरिफ्स लगाए थे. इससे अमेरिका में उनका निर्यात बहुत मुश्किल हो गया था. वहाँ की कम्पनियाँ इन उत्पादों की माँग की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्पों की ओर देखने लगी थीं. इन विकल्पों में एक नाम भारत का भी शामिल था. ऐसा माना जा रहा है कि वर्तमान जीत के बाद भी ट्रंप का रवैया या नजरिया चीन के प्रति कोई खास बदलने वाला नहीं है. यदि ऐसा रहा तो निश्चित ही माल की आपूर्ति के लिए वहाँ की कम्पनियों को दूसरे देशों को विकल्प के रूप में स्वीकारना होगा. ऐसी स्थिति में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और अमेरिका के साथ इसके संबंध देश को चीन का विकल्प बनने के लिए प्रबल दावेदार बनाते हैं. इससे अमेरिकी बाजार में ऑटो पार्ट, सौर उपकरण और रासायनिक उत्पाद आदि भारतीय निर्माताओं को स्थान मिल सकता है.

 

निर्यातक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलता मिलने की एक उम्मीद के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा क्षेत्र में ट्रंप की नीतियों का लाभ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में तेजी ला सकता है. अमेरिकी इन क्षेत्रों को मजबूत बनाने के लिए भारतीय रक्षा कम्पनियों के साथ बेहतर सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं. भारत-अमेरिका के बीच रक्षा और सैन्य सहयोग पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुआ है. क्वाड समूह के द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को कम करने सम्बन्धी कदम उठाया था. ट्रंप के पिछले कार्यकाल में हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्वाड समूह के द्वारा सुरक्षा साझेदारी को मजबूत किया गया था.  ऐसी स्थिति में वर्तमान में ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को बेहतर तथा मजबूत बनाये जाने की प्रबल सम्भावना है.

 

इन व्यापारिक, रक्षा सम्बन्धी मामलों के साथ-साथ ऐसा माना जा रहा है कि ट्रंप की जीत से रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति आने की सम्भावना है. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार यह कहते नजर आये हैं उनके जीतने का सुखद परिणाम रूस-यूक्रेन युद्ध रुकने के रूप में सामने आएगा. यद्यपि अमेरिका और भारत की नीति एवं वैचारिक रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग रही है किन्तु जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों पर कहते नजर आये हैं कि ये युद्ध का समय नहीं है, ऐसे में संभव है कि ट्रंप की पहल से यह युद्ध रुक जाये. युद्ध का रुकना भारतीय सन्दर्भों में भी लाभकारी है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ-साथ ट्रंप बांग्लादेश मामले में भी वहाँ हिन्दुओं पर हो रही हिंसा का विरोध करते रहे हैं. ऐसे में जबकि माना जा रहा है कि बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार में अमेरिका का हस्तक्षेप बना हुआ है. ऐसे में ट्रंप के आने से एक उम्मीद यह भी है कि बांग्लादेश के हालात और वहाँ हिन्दुओं की हालत में सुधार होगा. यदि ऐसा होता है तो यह भी निश्चित रूप से भारत के लिए लाभकारी होगा.

02 अक्टूबर 2024

इजरायल-ईरान संघर्ष के भारतीय सन्दर्भ

हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद भी इजराइल ने लेबनान में चरमपंथी समूह के ठिकानों पर बमबारी जारी रखी. उसने साफ कहा था कि वह हमले बंद नहीं करेगा और इजराइल के हितों पर हमला करने वाले किसी भी देश को नष्ट कर देगा. इजरायल द्वारा हिजबुल्लाह पर ताबड़तोड़ हमलों के बाद आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कहीं इसकी परिणति ईरान द्वारा इजरायल पर हमला करने के रूप में न हो. यह आशंका मंगलवार शाम को सच साबित भी हुई जबकि ईरानी सेना ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर दी. उसकी सेना द्वारा हमले में मुख्‍य रूप से सेना और सुरक्षा एजेंसी को निशाना बनाया गया. हमले के बाद इजरायली मीडिया ने बताया कि ईरान ने इजरायल पर 180 के आसपास बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. इस हमले के तुरंत बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान ने उस पर हमला करके बहुत बड़ी गलती की है. उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. नेतन्याहू के इस बयान के बाद दोनों देशों के मध्य सीधे युद्ध की आशंका तीव्र हो गई है. माना जा रहा है कि इजरायल किसी भी वक्त ईरान पर सीधा हमला कर सकता है.  

 

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष का वर्तमान दौर के चलते सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय महत्वपूर्ण मोड़ पर है क्योंकि इस संघर्ष में अब ईरान के शामिल हो जाने से भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ गई हैं. ईरान की यौद्धिक स्थिति पर विचार करते समय सावधानी बरतना जरूरी है. इजराइल के पास बड़ी सैन्य शक्ति है और उसे अमेरिका से समर्थन प्राप्त है. ईरान के साथ इजरायल की युद्ध स्थिति यदि बढ़ती है तो इसके परिणाम को और वर्तमान को भारतीय हितों के सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है. जहाँ तक भारत के हितों का सवाल है, पश्चिम एशिया, विशेष रूप में खाड़ी देशों में भारतीय नागरिकों के लिए यह संघर्ष एक तरह का जोखिम पैदा कर ही सकता है.

 



यदि भारतीय सन्दर्भों में इजरायल और ईरान को देखें तो किसी समय भारत की नीति फिलिस्तीन को समर्थन देने की रही है मगर पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत और इजरायल के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए हैं. सैन्य सम्बन्धों, उपकरणों, तकनीकी, ख़ुफ़िया तंत्र आदि के विकसित स्वरूप के लिए इजरायल बराबर भारत का साथ दे रहा है. पिछले दशक में 2.9 अरब डॉलर मूल्य की मिसाइलें, रडार, निगरानी और लड़ाकू ड्रोन का निर्यात इजरायल से किया गया है. इजरायल के साथ-साथ भारत के सम्बन्ध ईरान के साथ भी महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं. देश का चाहबार पोर्ट उन्हीं के क्षेत्र में हैं, जिसके माध्यम से यूरोप को जोड़ने की कल्पना को साकार किया जा सका है. भारत ने 2016 में चाबहार को विकसित करने के लिए 8.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया था और तेहरान को 15 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी थी. इसके साथ-साथ ईरानी तेल-गैस भी भारत के लिए हाइड्रोकार्बन के निकटतम स्रोत हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत ईरानी तेल का बड़ा खरीदार था. ऐसे में इजरायल और ईरान का संघर्ष बढ़ने पर भारत के सामने नई चुनौती आएगी.

 

ईरान युद्ध में शामिल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि वह तेल की आपूर्ति को बाधित कर सकता है या फिर यह बाधा युद्ध के कारण स्वतः बन सकती है. दोनों ही स्थितियों में तेल की कीमतों का बढ़ना तय है. भारत कच्चे तेल के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसे अपनी ऊर्जा-आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में तेल कीमतों की वृद्धि से भारतीय आर्थिक विकास दर के नकारात्मक स्थिति में जाने की आशंका भी बनती है. यह देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से उचित नहीं. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करते भारतीयों पर भी इस युद्ध का नकारात्मक असर पड़ने की सम्भावना है. एक अनुमान के अनुसार नब्बे लाख के आसपास भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं. ईरान के हमले के बाद यदि इजरायल सीधे-सीधे युद्ध की स्थिति में उतर आया तो ऐसी स्थिति में ये भारतीय खाड़ी देशों से वापस अपने देश को आने लगेंगे. इससे भी मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत के लगभग 195 बिलियन डॉलर के बाईलेटरल व्यापार पर भी असर पड़ेगा.

 

यद्यपि भारत द्वारा इजरायल-हमास संघर्ष के आरंभिक दौर से ही इस संघर्ष को शांत करने के प्रयास किये जाते रहे तथापि उसे इसमें सफलता नहीं मिली. इजराइल पर हमास के आतंकवादी हमले के बाद से ही भारत ने मध्य-पूर्व क्षेत्र के सऊदी अरब, ईरान, मिस्र, फिलिस्तीन सहित अनेक यूरोपीय नेताओं से वार्ता की. लगातार चर्चाओं, वार्ताओं के बाद भी संघर्ष बढ़ता ही गया और अब वह एक युद्ध के रूप में नजर आ रहा है. भारत के ईरान के साथ लम्बे समय से रणनीतिक संबंध हैं, वहीं मोदी सरकार ने इजराइल के साथ भी गहरे सम्बन्ध विकसित किए हैं. ऐसे में भारत को आतंकी संगठनों, आतंकवादियों के समूल नाश किये जाने के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ रहते हुए भविष्य और तमाम आशंकाओं के सन्दर्भ में दोनों देशों के साथ कूटनीतिक स्तर पर कदम बढ़ाते हुए युद्ध जैसी स्थिति को न बनने देने के प्रयास करने चाहिए.


14 मार्च 2024

आर्थिक सम्पन्नता से होगी वैतरणी पार

लोकसभा चुनावों की सुगंध चारों तरफ फैलने लगी है. इस बार का लोकसभा चुनाव जहाँ एक तरफ विपक्षी गठबंधन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है वहीं भाजपा के लिए खुद को निखारने जैसा है. विगत दस वर्षों के कार्यों को देखने के बाद शायद ही किसी राजनैतिक विश्लेषक को केन्द्र में भाजपानीत सरकार के प्रति संशय हो. इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए प्रतिद्वंद्विता स्वयं से ही है, निखारना भी स्वयं को है, साबित भी स्वयं को करना है. विगत दस वर्षों के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गए कार्यों, उनके द्वारा लिए गए अनेक साहसिक निर्णयों के द्वारा यह निर्धारित हो चुका है कि वे देशहित में किसी भी तरह का साहसिक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते हैं.

 

उनके इन्हीं कार्यों, निर्णयों के आधार पर सहज स्वीकार्यता बनी हुई है कि इस लोकसभा चुनाव में जनादेश प्राप्त करने के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे. देश में अभी तक हुए सत्रह लोकसभा चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी को भी लगातार तीन बार जनादेश नहीं मिला है. नेहरू जी के नेतृत्व में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस विजयी हुई थी. भाजपा द्वारा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का नारा ऐसे ही नहीं दिया जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि नरेन्द्र मोदी अपने तमाम कार्यों, निर्णयों के आधार पर कांग्रेस के एक और कीर्तिमान पर अपनी नजर बनाये हुए हैं. अभी तक के लोकसभा चुनावों में वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उसी वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने कीर्तिमान रचते हुए ऐतिहासिक 415 सीटों के साथ केन्द्र में सरकार बनायी थी. नरेन्द्र मोदी और भाजपा का पूरा प्रयास रहेगा कि अपने कार्यों के चलते वे इस ऐतिहासिक संख्या को छू सकें.

 



जिस तरह की राजनैतिक हलचल मची हुई है, जिस तरह से विपक्ष के क्रियाकलाप हैं, जिस तरह से उनके द्वारा बयानबाजी की जा रही है, जिस तरह से मतदाताओं का रुख है उसे देखकर इस लोकसभा में भाजपा को जनादेश मिलना मुश्किल नहीं लग रहा है. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी के वे तमाम कार्य और निर्णय हैं जो उन्होंने पूरे साहस के साथ पूरे किये हैं. इन कार्यों में चाहे नोटबंदी हो, 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक का मामला हो, राममंदिर निर्माण हो, नारी शक्ति वंदन अधिनियम हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम हो या फिर समान नागरिक संहिता जैसा मुद्दा हो. असल में इन कार्यों को भाजपा के थिंक टैंक द्वारा, उनके सहयोगियों द्वारा तो खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया मगर उन अनेकानेक कार्यों पर विषद चर्चा कभी नहीं की गई जो जनहित से जुड़े रहे, जो आर्थिक नीतियों से जुड़े रहे. उक्त तमाम विषयों को विरोधियों द्वारा बार-बार आलोचनात्मक रूप में उठाते हुए सरकार की आलोचना की गई कि उसके द्वारा गरीबी, स्वास्थ्य, मंहगाई, रोजगार आदि के लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं किया गया. इन बिदुओं पर भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा भी जनमानस के बीच जाने का प्रयास नहीं किया गया. आम जनता को यह समझाने का प्रयास ही नहीं किया गया कि मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा महज जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, वाराणसी आदि पर ही कार्य नहीं किया गया बल्कि आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, बालिका समृद्धि योजना, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि के द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने का कार्य किया है.

 

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अद्यतन भारतीय राजनीति को दो-दो दशकों के तुलनात्मक रूप में देखा जाने लगा है. इसमें पहला मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाला 2004-2014 का संप्रग कार्यकाल और दूसरा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाला 2014-2024 का राजग कार्यकाल है. यहाँ इन दो-दो दशकों के एक-एक पक्ष को विश्लेषित कर पाना संभव नहीं है मगर कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को अवश्य ही दर्शाया जा सकता है. जब भी किसी सरकार के कार्यों का आकलन किया जाता है तो मंहगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना आदि पर विशेष नजर रखी जाती है. तुलनात्मक रूप में देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने प्रति व्यक्ति वार्षिक आय, रसोई गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, शिक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार, आधारभूत संरचना, मातृत्व सेवाओं आदि में जबरदस्त उपलब्धि प्राप्त की है. उज्ज्वला योजना, सस्ते आवास योजना, शौचालय निर्माण के द्वारा मोदी सरकार ने जन-जन में, गरीब तबके में अपनी पैठ बनाई है. 2004 में रसोई गैस कनेक्शन की संख्या 14.5 करोड़ थी जो 2023 में 31.4 करोड़ हो गई. स्वच्छता के प्रति गम्भीर मोदी सरकार ने शौचालय के निर्माण में सकारात्मकता दिखाई. अपने दोनों कार्यकाल में 11.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करके मोदी सरकार ने महिलाओं, बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की शर्मिंदगी, मुसीबत से छुटकारा दिलवाया. आश्चर्य की बात है कि संप्रग सरकार के दो दशकों में महज 1.8 करोड़ शौचालयों का ही निर्माण करवाया जा सका था. महिलाओं के प्रति संवेदनशील मोदी सरकार ने मातृत्व लाभार्थियों के प्रति विशेष जागरूकता दिखाई है. उनके कार्यकाल में ऐसे लाभार्थियों की संख्या 9.9 लाख के मुकाबले 559 लाख तक पहुँची.

 

भाजपा, मोदी विरोधियों द्वारा आये दिन मँहगाई, आर्थिक स्तर आदि को लेकर हमलावर रुख अपनाया जाता है. बयानबाजियों के लिए किसी भी स्तर तक जाकर जनमानस को बरगलाया जा सकता है किन्तु यदि तथ्यों की, आँकड़ों की बात की जाये तो कुछ अलग ही परिदृश्य नजर आता है. संप्रग सरकार के अंतिम दिनों में विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति अत्यंत ही दयनीय बनी हुई थी. मँहगाई की औसत दर भी अपने चरम पर थी. मोदी सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास किये गए. दूसरे देशों से लगातार संपर्क, खाड़ी देशों से दोस्ताना सम्बन्ध आदि के चलते समय के साथ आर्थिक स्थिति में सुधार आया. विदेशी मुद्रा इस जनवरी में 617 अरब डॉलर था और मंहगाई की औसत दर वर्ष 2023 में 5.1 प्रतिशत रही. इस तरह के आर्थिक माहौल के चलते ही अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारत का रुख किया. निवेश की जबरदस्त स्थिति के चलते ही देश ने पहली बार भारतीय वस्तुओं के निर्यात को 400 अरब डॉलर के पार किया. इस तरह की आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में देश की जीडीपी 3.7 लाख करोड़ हो गई है और इसके 2024 में 4.1 लाख करोड़ रहने का अनुमान है.

 

वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के कार्यों-निर्णयों ने उनके कद को अत्यंत विराट स्वरूप दे दिया है. मुद्दा चाहे राष्ट्रीय महत्त्व का हो या फिर क्षेत्रीय महत्त्व का प्रत्येक स्तर पर मोदी सरकार की सहभागिता दिखाई देती है. जहाँ उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास आदि की समस्या को दूर करते हुए 24.8 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का कार्य किया गया वहीं विदेशी मुद्रा भंडार, टैक्स संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बिजनेस रैंकिंग आदि में बहुआयामी परिवर्तन  करके देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई है. आज जिस तरह से देश का आर्थिक, सामाजिक ढाँचा सुधारात्मक मोड में है, लोगों की क्रय-क्षमता बढ़ी है, ग्रामीण अंचलों तक बिजली ने अपनी पहुँच बनाई है, मूलभूत सुविधाओं ने महिलाओं की जीवन-शैली को सहज बनाया है उससे जनमानस में नरेन्द्र मोदी के प्रति, सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. निश्चित ही यही विश्वास भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को इस लोकसभा चुनावी वैतरणी सफलतापूर्वक, सहजतापूर्वक पार करवा देगा. 





 

01 मार्च 2024

डिजिटलाइजेशन के बढ़ते कदम

वर्ष 2016 में जब देश में नोटबंदी या विमुद्रीकरण जैसी आर्थिक प्रक्रिया को लागू किया गया था, उस समय देश के समस्त क्षेत्रों में इस बात को लेकर एक तरह का प्रश्न उभरा था कि सरकार द्वारा इसके सापेक्ष जिस तरह से डिजिटलाइजेशन की पैरवी की जा रही है, वह कितनी सफल रहेगी. यदि उन दिनों की स्थिति का आज आकलन किया जाये तो डिजिटलाइजेशन की सफलता से ज्यादा उसकी स्वीकार्यता को लेकर संशय बना हुआ था. देश के बहुतायत ग्रामीण अंचलों में इंटरनेट की अनुपस्थिति, इंटरनेट होने की स्थिति में उसकी गति का कम होना, डिजिटलाइजेशन के प्रति जनमानस के विश्वास को लेकर भी एक तरह का संशय बना हुआ था. समय के साथ देश की स्थिति में परिवर्तन होता रहा, राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में बदलाव के साथ-साथ आर्थिक बदलाव के दौर को भी देश ने देखा और अर्थव्यवस्था को गति देने में डिजिटल मुद्रा ने अपना प्रभाव दिखाया. सुखद यह है कि देश की आर्थिक गतिविधियों को डिजिटलाइजेशन ने, डिजिटल मुद्रा ने, डिजिटल लेनदेन ने सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है.

 



विमुद्रीकरण के पश्चात् डिजिटल अर्थव्यवस्था की गति सकारात्मक रूप से बढ़ी है. डिजिटलाइजेशन के कारण देश के विभिन्न वर्गों को, विभिन्न क्षेत्रों को, युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी मिला. देश में डिजिटल सिस्टम का विकास के पीछे अनेक तत्त्व प्रभावी भूमिका में रहे हैं. इसके लिए सर्वप्रथम सरकार द्वारा ही डिजिटलाइजेशन के लिए लगातार प्रयास करना रहा है. इंटरनेट को बढ़ावा देना, सुदूर क्षेत्रों में इसकी पहुँच बनाना, विद्यार्थियों, युवाओं तक स्मार्टफोन का पहुँचाना भी महत्त्वपूर्ण कदम रहा है. इंटरनेट एण्ड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2025 तक 900 मिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है. इसके साथ-साथ डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे प्रयासों से भी डिजिटल प्रौद्योगिकी बढ़ावा मिला. देश में डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए यूपीआई, यूएसएसडी, भीम आधार, भीम यूपीआई, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, आईएमपीएस, एनईएफटी, आरटीजीएस आदि को सरकारी स्तर पर लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसका एक सकारात्मक प्रभाव यह देखने को मिला है कि न केवल बड़े-छोटे दुकानदार इसका प्रयोग कर रहे हैं बल्कि रेहड़ी वाले, दिहाड़ी रूप में अपना व्यापार करने वाले, ऑटो रिक्शा आदि जैसी सेवाएँ देने वाले भी डिजिटल लेनदेन के द्वारा अपना काम चला रहे हैं.

 

देश में मात्र डिजिटल लेनदेन ने ही यहाँ के डिजिटल सिस्टम को मजबूत अथवा प्रभावी नहीं बनाया है बल्कि सरकार द्वारा डिजिटल क्षेत्र में किये गए सुधारों ने भी यहाँ के डिजिटल तंत्र को सशक्त बनाया है. इसी सशक्त डिजिटल तंत्र की सफलता के कारण ही गत वर्ष अमेरिका और भारत के साथ महत्त्वपूर्ण समझौते हुए थे. इनमें एआई, सेमीकंडक्टर, हाई-परफोर्मेंस कम्प्यूटिंग सहित अनेक क्षेत्र सम्मिलित हैं. यह देश की डिजिटल क्षमताओं का ही प्रभाव है कि अमेरिका की प्रसिद्ध चिप निर्माता कंपनी द्वारा गुजरात में लगभग तीन अरब डॉलर की लागत से चिप असेम्बिलंग, टेस्टिंग, पैकेजिंग आदि का प्लांट लगाया जा रहा है. इसके साथ-साथ भारत की अध्यक्षता में संपन्न जी-20 शिखर सम्मलेन के दौरान सम्पूर्ण विश्व ने डिजिटल इंडिया की क्षमता को, विश्वसनीयता को, प्रतिभा को नजदीक से न केवल महसूस किया बल्कि उसकी सराहना भी की. सरकार के डिजिटलाइजेशन के प्रति गंभीर होने का भाव इसी से समझ आता है कि उसके द्वारा लगातार इस क्षेत्र में सक्रियता के साथ काम किया जा रहा है. गत वर्ष पीएलआई स्कीम-दो को मंजूरी देकर सरकार ने देश में ही कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, टैबलेट आदि के विनिर्माण को प्रोत्साहित किया है.

 

देश में इन उत्पादों के विनिर्माण से निश्चित ही एक तरफ कीमतों में कमी देखने को मिलेगी, दूसरी तरफ डिजिटलाइजेशन के प्रति भी गतिविधियों में तेजी दिखाई पड़ेगी. डिजिटल लेनदेन से जहाँ एक तरफ नकद लेनदेन की निर्भरता कम हुई है वहीं दूसरी तरफ नकली करेंसी से भी बचना हो सका है. इसके बाद भी अभी भी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा नकद लेनदेन पर निर्भर है. सरकार का निरन्तर प्रयास यही है कि देश के नागरिक डिजिटल लेनदेन का अधिक से अधिक उपयोग करें. इसके लिए सरकार को कुछ और कदम भी इस तरफ उठाने की आवश्यकता है. व्यापारियों, नागरिकों को डिजिटल भुगतान के तरीकों को अपनाने के लिए उनको प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है. ऑनलाइन भुगतान करने पर व्यापारियों, नागरिकों को कुछ छूट, लाभ दिए जा सकते हैं. व्यापारियों को पॉइंट-ऑफ-सेल टर्मिनल खरीदने के लिए सब्सिडी प्रदान की जा सकती है. अपना बहुतायत भुगतान डिजिटल माध्यम से करने वाले नागरिकों को भी किसी न किसी रूप में लाभान्वित किया जाये. फिलहाल तो देश में डिजिटल लेनदेन अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ रहा है. निकट भविष्य में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या और ई-कॉमर्स बाजार में वृद्धि के चलते देश में डिजिटलाइजेशन का भविष्य उज्ज्वल समझ आता है. 





 

22 फ़रवरी 2023

हिंडनबर्ग रिपोर्ट और अडानी ग्रुप

जनवरी में हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी ग्रुप पर एक रिपोर्ट सार्वजानिक की थी. इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी. उस दिन से आज तक संसद से लेकर सड़क तक इसी रिपोर्ट की चर्चा हो रही है. रिपोर्ट आने के बाद से अडानी के शेयरों में काफी गिरावट आई और इस ग्रुप की मार्केट वैल्यू भी गिर गई. इसके साथ ही निवेशकों को भी नुकसान सहना पड़ रहा है. हिंडनबर्ग एक अमेरिकन इन्वेस्टमेंट कंपनी है जो फोरेंसिक वित्तीय अनुसंधान का काम करती है. हिंडनबर्ग रिसर्च की वेबसाइट के अनुसार यह कंपनी किसी भी अन्य कंपनी के निवेश, इक्विटी, क्रेडिट और डेरिवेटिव पर शोध करती है. इसके साथ-साथ कंपनी शेयर मार्केट की बारीकियों का विश्लेषण करके, कई सूत्रों की मदद से किसी कंपनी में हो रही धोखाधड़ी को सबसे सामने लेकर आती है. 


हिंडनबर्ग रिसर्च की स्थापना सन 2017 में नाथन एंडरसन ने की थी. इंटरनेशनल बिजनेस में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद एंडरसन ने एक डाटा कंपनी में रिसर्च सिस्टम्स का काम शुरू किया. इसी वर्ष एंडरसन द्वारा अपनी शॉर्ट-सेलिंग कंपनी को शुरू किया गया. हिंडनबर्ग रिसर्च नाम से शुरू इस कंपनी का मुख्य कार्य अकाउंटिंग में अनियमितताओं को देखना, अहम पदों पर अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति, अघोषित लेन-देन, किसी तरह की ग़ैर-क़ानूनी, अनैतिक व्यापार या वित्तीय रिपोर्टिंग को तैयार करना रहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार सन 2020 के बाद से हिंडनबर्ग द्वारा तीस कंपनियों की रिसर्च रिपोर्ट को प्रस्तुत किया है. यह कोई संयोग नहीं कि उसकी रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद से सम्बंधित कंपनी के शेयर औसतन पंद्रह प्रतिशत तक गिए गए. शेयरों का गिरना मात्र इतने तक ही नहीं रहा. आने वाले छह महीने में उन कंपनियों के शेयरों में औसतन पच्चीस प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जिनकी रिपोर्ट को हिंडनबर्ग द्वारा प्रस्तुत किया गया.




यदि इस कंपनी के मूल में जाकर देखा जाये तो यह एक तरह की शॉर्ट सेलर है. शॉर्ट सेलर से तात्पर्य ऐसे शेयर निवेशक से है जो शेयरों की खरीद और बिक्री तब करता है जब शेयरों के दामों के भविष्य में गिरने की संभावना होती है. ऐसी स्थिति में कई बार शॉर्ट सेलर अपने पास शेयर न होते हुए भी इन्हें बेचता है. ऐसा वह शेयर खरीदने के बजे उनको उधार लेकर बेचता है. यह एक तरह का जुआ कहा जा सकता है. यदि शेयरों की गिरावट का और उनके बढ़ने का अंदाजा सही निकला तो शॉर्ट सेलर को लाभ ही लाभ होता है. हिंडनबर्ग पर इसी तरह का शेयर कारोबार करने का आरोप लगता रहा है. कहा जाता रहा है कि हिंडनबर्ग द्वारा अपनी रिसर्च रिपोर्ट सम्बंधित कंपनी के शेयर खरीदने के लिए ही सार्वजनिक की जाती है. हिंडनबर्ग उस कंपनी के शेयर गिराकर इसी तरह से लाभ लेती है.


हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अडानी ग्रुप पर कुछ सवाल उठाए हैं. इस रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि गौतम अडानी के छोटे भाई राजेश अडानी को ग्रुप का प्रबंध निदेशक क्यों बनाया गया है जबकि उनके ऊपर कस्टम टैक्स चोरी, फर्जी इंपोर्ट डॉक्यूमेंटेशन और अवैध कोयला आयात करने का आरोप है. इसके अलावा और भी कई सवाल हैं, जिनके बारे में अडानी ग्रुप द्वारा किसी भी तरह का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है. हिंडनबर्ग द्वारा रिपोर्ट सार्वजनिक किये जाने के बाद से अडानी ग्रुप को भारी गिरावट देखनी पड़ी है. मात्र दो दिनों उसका 4.1 लाख करोड़ का मार्केट कैप साफ हो गया. इस ग्रुप के शेयरों में लगभग बीस प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली.


हिंडनबर्ग के द्वारा सार्वजनिक की गई रिपोर्ट से अडानी ग्रुप पर सकारात्मक या नकरातमक क्या परिणाम पड़ेगा ये एक अलग बात है मगर उस रिपोर्ट से भारत सरकार की बहुत सी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. लगभग बीस हजार करोड़ रुपये की धारावी पुनर्विकास परियोजना के द्वारा साढ़े छह लाख झुग्गीवासियों के पुनर्वास का काम अगले सात साल में पूरा करना अडानी ग्रुप की मुख्य योजना है. इसके अलावा अगले एक दशक में सौ अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा, जिसमें से सत्तर प्रतिशत ग्रीन एनर्जी पर खर्च करने का वादा, अडानी डिफ़ेंस एंड एयरोस्पेस के द्वारा ड्रोन सहित अपने रक्षा उत्पादों का निर्यात भी उनकी परियोजनाओं में शामिल है. भारतीय वायु सेना के विमानों की समय-समय पर देख-रेख का काम भी अडानी ग्रुप की कंपनी द्वारा किया जाता है. इन परियोजनाओं के साथ-साथ अन्य कई योजनायें ऐसी हैं जिनके बीच में रुकने पर अथवा उनकी गति में अवरोध आने पर देश के विकास में भी प्रभाव देखने को मिल सकता है.


यदि अडानी ग्रुप के व्यवसाय को देखा जाये तो इसकी कंपनियों को भारतीय स्टेट बैंक सहित देश की अनेक बैंकों ने 81,200 करोड़ रुपये का ऋण अडानी ग्रुप को दे रखा है. भारतीय रिजर्व बैंक को भारतीय स्टेट बैंक ने बताया है कि उसके द्वारा अडानी ग्रुप को 23000 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया है. इसी तरह से पंजाब नेशनल बैंक द्वारा 7000 करोड़ का ऋण दिया गया है. हिंडनबर्ग की रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद से जहाँ एक तरफ निवेशकों में घबराहट का माहौल बना वहीं शेयर बाजार में भी गिरावट देखने को मिली. इस हड़बड़ी के बीच भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन की ओर से कहा गया कि अडानी ग्रुप को दिए गए ऋण को लेकर लोगों को डरने की जरूरत नहीं है. अडानी ग्रुप में उनका निवेश सुरक्षित है.


अडानी ग्रुप द्वारा बाद में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के जवाब में कहा कि यह सुनियोजित हमला है जिसके द्वारा अमेरिकी कम्पनियों को मदद की जा रही है. यहाँ भले ही हिंडनबर्ग को एक शॉर्ट सेलर के रूप में देखा जाता हो, भले ही अनेक विशेषज्ञों द्वारा कहा जा रहा हो कि उसकी रिपोर्ट अन्य दूसरी कम्पनियों को लाभ देने के लिए सार्वजनिक की गई है फिर भी भारत सरकार को, भारतीय रिजर्व बैंक को इस पर गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है. आखिर देश की बैंकों का बहुत सारा धन अडानी ग्रुप में लगा है, बहुत सारे निवेशकों का धन इस ग्रुप की कम्पनियों के शेयरों में लगा है. हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट सही है अथवा गलत इस पर बन रहे असमंजस भरे माहौल को दूर करना सरकार और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेवारी है. 






 

03 फ़रवरी 2023

लाभदायक है मोटा अनाज

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट में मोटा अनाज के सम्बन्ध में कहा गया, ‘मोटे अनाज को लेकर श्रीअन्न योजना की शुरुआत की जाएगी. भारत में मोटा अनाज खाने की परम्परा रही है, यह इंसान को सेहतमंद रखता है. भारत यही परम्परा अब दुनिया तक पहुँचाना चाहता है. मोटे अनाज को श्रीअन्न नाम दिया गया है.’ श्रीअन्न योजना के अंतर्गत भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद को एक उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के मोटे अनाज को स्थापित करेगा. ज्वार, बाजरा, रागी, सावां, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी और कुट्टू मोटे अनाज की आठ फसलें हैं. प्रधानमंत्री द्वारा देश की हर थाली में इसकी उपस्थिति के लिए वर्ष 2018 में खास अभियान चलाया गया. इसे लेकर भारत की तरफ से संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव रखा गया. इस प्रस्ताव पर 72 देशों के समर्थन के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया. संयुक्त राष्ट्र संघ और भारत की इस भागेदारी का उद्देश्य मोटे अनाज को पुनः मुख्यधारा में लाना है.


पिछले वर्ष दिसम्बर माह में इटली की राजधानी रोम में अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष - 2023 के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष सन्देश भेजा, ‘भारत मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहित करेगा. देश में पोषक तत्वों से भरपूर ऐसे अनाजों के सेवन के लिए लोगों में जागरूकता लाने के लिए खास अभियान भी चलाया जाएगा.’ उनके भेजे गए सन्देश को अमल में भी लाया गया. उसी माह संसद परिसर में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने दोपहर का भोज आयोजित किया. इसमें देश के उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसदों और अन्य नेताओं ने मोटे अनाज का स्वाद लिया. सरकार की पहल पर ही संसद की कैंटीन में मोटे अनाज से बने व्यंजनों की शुरुआत हुई. यहाँ देश के विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध मोटे अनाज से बने व्यंजन को खाने की सूची में शामिल किया गया है. इतना ही नहीं, इस साल भारत में आयोजित होने वाले जी-20 कार्यक्रम में मोटे अनाज से बने पकवानों को विदेशी मेहमानों और वैश्विक नेताओं के सामने पेश किया जाएगा.




मोटा अनाज को पोषक तत्वों का भंडार माना जाता है. बीटा-कैरोटीन, नाइयासिन, विटामिन-बी6, फोलिक एसिड, पोटेशियम, मैग्नीशियम, जस्ता आदि से भरपूर इन अनाजों को सुपरफूड भी कहा जाता है. गेहूं और धान की फसलों के मुकाबले इसमें सॉल्युबल फाइबर, कैल्शियम और आयरन की मात्रा अधिक होती है. इसके सेवन से अनेक तरह की बीमारियों से बचा जा सकता है. आज बहुसंख्यक इंसान संक्रामक बीमारियों की चपेट में है. इस कारण लोगों का ध्यान संतुलित और पोषक आहार की तरफ जाने लगा है. इस मामले में मोटे अनाज का कोई मुकाबला नहीं है. इससे शरीर को उचित पोषण मिलता है जो आमतौर पर अन्य अनाजों से नहीं मिल पाता. आसानी से पचने वाले जौ यानि ओट्स में अत्यधिक मात्रा में फाइबर होता है. इसके द्वारा ब्लड कोलेस्ट्रोल काबू में रहता है.


स्वास्थ्य सम्बन्धी इन कारणों के साथ-साथ मोटा अनाज के व्यापारिक लाभ भी हैं. भारत दुनिया के उन सबसे बड़े देशों में शामिल है जहाँ सबसे ज्यादा मोटा अनाज पैदा होता है. दुनियाभर में पैदा होने वाले मोटे अनाज में भारत का हिस्सा 41 प्रतिशत तक है. खाद्य एवं कृषि संगठन जो एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, के अनुसार वर्ष 2020 में मोटे अनाजों का विश्व उत्पादन 30.464 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हुआ. अकेले भारत में 12.49 एमएमटी मोटे अनाज का उत्पादन हुआ. भारत दुनिया के कई देशों को मोटे अनाज का निर्यात करता है. इसमें यूएई, नेपाल, सऊदी अरब, लीबिया, ओमान, मिस्र, ट्यूनीशिया, यमन, ब्रिटेन तथा अमेरिका शामिल हैं. निश्चित ही देश में मोटा अनाज उत्पादन में वृद्धि से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत को लाभ मिलेगा.


इसके साथ ही मोटा अनाज को प्रोत्साहित करके भारत जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने का रास्ता भी दिखा रहा है. मोटे अनाज को पैदा करने के कई लाभ हैं. ये न्यूनतम उर्वरक के उपयोग के साथ पैदा होने वाली फसल है. कीटनाशकों का इस्तेमाल न किये जाने के कारण ये हानिकारक भी नहीं होते. मोटे अनाज के उत्पादन से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है, जो पर्यावरण के अनुकूल है. आज जिस तरह से संक्रामक रोग बढ़ रहे हैं, लोगों के जीवन में खानपान का ढंग बदलता जा रहा है, जलवायु परिवर्तन का संकट दिनों-दिन बढ़ रहा है, ऐसे में समय है मोटे अनाज के उपयोग को बढ़ावा देने का. इसके लिए इसके पोषण के गुणों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि लोगों की खाने-पीने की पसंद में बदलाव हो सके.

 






 

30 जनवरी 2023

पाकिस्तान के आर्थिक संकट पर भारत को सजग रहने की आवश्यकता

भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. वहाँ की आर्थिक स्थिति एकदम खस्ताहाल हो चुकी है. बढ़ते कर्ज, बढ़ती मँहगाई, घटता विदेशी मुद्रा भंडार, घटती जीडीपी आदि के चलते पिछले एक साल में पाकिस्तान की हालत बदतर हुई है. रोजमर्रा की वस्तुओं के दामों में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिल रही है. लोगों के लिए आटा-दाल की व्यवस्था करना भी दुष्कर हो रहा है. दूध, प्याज, नमक आदि जैसे जरूरी सामान भी इतने मँहगे हो गए हैं कि लोगों के लिए इनको खरीदना कठिन हो रहा है.


पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 6.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर की गिरावट आई है, जो फरवरी 2014 के बाद सबसे निचले स्तर पर है. इसमें मात्र 4.3 अरब डॉलर बचे हैं जबकि वाणिज्यिक बैंकों के पास 5.8 अरब डॉलर हैं. इस प्रकार पाकिस्तान के पास कुल 10.1 अरब डॉलर ही हैं, जो आयात बिल के भुगतान हेतु पर्याप्त नहीं हैं. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि उसके पास केवल तीन सप्ताह के भुगतान हेतु ही विदेशी मुद्रा शेष है. इस कमी के चलते पाकिस्तान खाना पकाने के तेल जैसे जरूरी सामानों का आयात भी नहीं कर पा रहा है. विदेशी मुद्रा की कमी के कारण भुगतान न होने से बंदरगाहों पर बहुत सारा आवश्यक सामान अटका पड़ा है.


पाकिस्तान की आंतरिक दशाएँ भी उसके बिगड़ते हालात के लिए उत्तरदायी हैं. वहाँ की राजनैतिक स्थितियाँ किसी से छिपी नहीं हैं, रही सही कसर वर्ष 2022 में आई भीषण बाढ़ ने पूरी कर दी. वर्ष 2022 में जून से अक्टूबर के बीच एक तिहाई पाकिस्तान बाढ़ की चपेट में था. इससे करीब साढ़े तीन करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. अभी भी 80 लाख लोग विस्थापित स्थिति में हैं, 1700 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, 22 लाख से ज्यादा घर तबाह हो गए हैं, स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गई हैं, इसके साथ-साथ दूसरी बुनियादी सेवाएँ भी ध्वस्त हो गई हैं.




आर्थिक स्थितियों की नकारात्मकता का असर केवल पाकिस्तान पर ही नहीं हो रहा है बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. आर्थिक तंगहाली का, मुद्रा अवमूल्यन का, बढ़ती मँहगाई का असर पाकिस्तान की तमाम कम्पनियों पर तो पड़ा ही है, उसके साथ-साथ वे कम्पनियाँ भी नकारात्मकता का शिकार हुई हैं जो भारत से सम्बंधित हैं. बहुतायत कम्पनियाँ घाटे में चल रही है. जिंदल और टाटा पर भी इसका सर्वाधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है. पीटीआई के अनुसार जिंदल ग्रुप का पाकिस्तान में अच्छा खासा व्यापार है. यह ग्रुप स्टील इंडस्ट्री के अलावा एनर्जी सेक्टर में भी सक्रिय है. यदि पाकिस्तान की आर्थिक गतिविधि के कारण वहाँ के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर संकट आता है तो इस कंपनी पर भी वैसा ही असर पड़ेगा. इसी तरह पाकिस्तान के आर्थिक विकास में टाटा ग्रुप टेक्सटाइल मिल्स लिमिटेड का बहुत ज्यादा योगदान है. वहाँ की नकारात्मकता का असर इस कम्पनी पर भी देखने को मिल सकता है.


पाकिस्तान में भारतीय कम्पनियों पर होने वाले नकारात्मक प्रभाव के अलावा वहाँ के आर्थिक संकट का असर भारत से पाकिस्तान भेजे जाने वाले सामानों पर भी हो रहा है. ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार कर्ज में डूबे पाकिस्तान ने साल 2021 में भारत से लगभग 503 मिलियन डॉलर का आयात किया था. इस दौरान भारत से फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स, चीनी, कॉफी-चाय, एल्युमिनियम, प्लास्टिक के सामान पाकिस्तान भेजे गए. यदि इस वर्ष के आँकड़े देखें तो पाकिस्तान में करीब 8 मिलियन डॉलर की कॉफी-चाय, लगभग 190 मिलियन डॉलर के फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, 141 मिलियन डॉलर के ऑर्गेनिक केमिकल्स, 119 मिलियन डॉलर की चीनी सहित अनेक दूसरे सामान भेजे गए. पाकिस्तान की बिगडती आर्थिक दशा से इन सामानों से जुड़ी भारतीय कम्पनियों का कारोबार भी प्रभावित होगा और इनको वित्तीय घाटा उठाना पड़ सकता है. शत्रु संपत्ति विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 577 ऐसी कम्पनियाँ हैं जिनमें पाकिस्तानियों का धन लगा है. इसमें से 266 कम्पनियाँ इंडियन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं, वहीं 318 कम्पनी सूचीबद्ध नहीं हैं. ऐसा अनुमान है कि भारत की इन कम्पनियों में पाकिस्तानी नागरिकों के लगभग 400 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी है. इनमें बिरला, टाटा, फार्मा कंपनी सिप्ला, विप्रो, डालमिया समेत कई प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठान शामिल हैं. ऐसे में अगर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दीवालिया होने की स्थिति में पहुँचती है तो इन कम्पनियों पर भी उसका सीधा असर देखने को मिल सकता है. 


भारत को पाकिस्तान के आर्थिक संकट को लेकर सावधान होने की आवश्यकता है. एशियाई देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका के बाद पाकिस्तान तीसरा देश है जहाँ आर्थिक संकट देखने को मिल रहा है. मँहगाई का असर भारत में भी देखने को मिल रहा है किन्तु यहाँ स्थिति नियंत्रण में है. इसके बाद भी पडोसी देश होने के नाते, एशियाई क्षेत्र में सक्षम देश होने के नाते भारत को एक जिम्मेवार देश के रूप में भी देखा जाता है. ऐसे में उसी तरफ से सहायता की उम्मीद भी रहेगी. इस सहायता की उम्मीद के बीच भारत को अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रखना होगा. संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान में चीन की घुसपैठ बढ़े. नेपाल की सरकार को प्रो-चीन माना ही जा रहा है, ऐसे में पाकिस्तान को सहायता की आड़ में भारत के लिए चीन और नेपाल चुनौती खड़ी कर सकते हैं. पाकिस्तान को मदद के नाम पर चीन भारत के खिलाफ रणनीति बना सकता है. अपने व्यापारिक और सामरिक लाभ के लिए वह पाकिस्तानी क्षेत्र का उपयोग भी कर सकता है. भारत के एक और पड़ोसी देश अफगानिस्तान में इस समय नागरिक अधिकार हनन करने वाली सरकार है. यदि पाकिस्तान को उसकी तरफ से मदद मिलती है तो संभव है कि सीमा पार से संचालित आतंकवाद भारत के लिए मुसीबत बन जाए.


निश्चित ही पाकिस्तान का आर्थिक संकट हाल फ़िलहाल समाप्त होता नहीं दिख रहा है. ऐसे में भारत को उसकी दशा पर और उसके कदमों पर सजग निगाह रखने की आवश्यकता है. पाकिस्तान को मदद के नाम पर भारत विरोधी मानसिकता वाले देशों द्वारा यदि वहाँ अपने कदम जमा लिए गए तो निकट भविष्य में यह भारत के लिए कष्टकारी हो सकता है.

 





 

06 जनवरी 2023

वैश्विक नेतृत्व की राह पर भारत

देश में इस वर्ष सितम्बर में जी-20 सम्मेलन का आयोजन होना है. इस आयोजन का कारण हमारे देश को विश्व के शक्तिशाली समूह जी-20 की अध्यक्षता मिलना है. भारत ने बीस देशों के शक्तिशाली समूह जी-20 का अध्यक्षीय पद ग्रहण किया है. बाली शिखर सम्मेलन में पूर्व अध्यक्ष देश इंडोनेशिया द्वारा भारत को 1 दिसम्बर 2022 को वर्ष 2023 के लिए अध्यक्षता सौंपी गई. अब पूरे एक साल तक भारत जी-20 से जुड़ी दो सौ बैठकों की मेजबानी करेगा. ये आयोजन देश के पचास से अधिक शहरों में किए जाएँगे. नब्बे के दशक में अनेक विकसित और विकासशील देश आर्थिक एवं वित्तीय समस्याओं का समाधान करने के लिए 25 सितम्बर 1999 को औपचारिक रूप से वाशिंगटन डीसी में जी-20 समूह की स्थापना की गयी. यह दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, मैक्सिको, अर्जेंटीना, रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, यूके, ब्राजील, इटली, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, भारत, इंडोनेशिया, जापान, तुर्की, कोरिया, फ्रांस, सऊदी अरब एवं यूरोपीय संघ शामिल हैं. जी-20 को विश्व के आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श एवं आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है.




सितम्बर में होने वाले कार्यक्रम की थीम वसुधैव कुटुम्बकम’ के द्वारा यह संकेत स्पष्ट रूप से दिया गया है कि धरती ही परिवार है. कार्यक्रम का एजेंडा भले ही अभी सदस्य देशों द्वारा तय किया जाना है किन्तु भारत ने इस बात का साफ संकेत दिया है कि ऊर्जा संकट और आतंकवाद को रोकना उसके लिए बड़ा एजेंडा होगा. दुनिया के देशों के सामने भारत इनसे निपटने का रोडमैप भी पेश करेगा जी-20 अपने आपमें एक अनूठी वैश्विक संस्था है, जहाँ विकसित और विकासशील देशों का समान महत्व है. यहाँ विकासशील देश सबसे शक्तिशाली देशों के साथ अपने राजनैतिक, आर्थिक और बौद्धिक नेतृत्व को प्रदर्शित कर सकते हैं. इसी कारण से भारत का दुनिया के सबसे प्रभावशाली बहुपक्षीय समूह का नेतृत्व करना प्रत्येक नागरिक के लिए गौरव का विषय है. अपनी अध्यक्षता के साथ देश अपनी पहली वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका में नई नीतियों के क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करेगा. भारत कमजोर देशों की सहायता करने, विकासशील देशों की आवाज़ को मुखरित करने और उनके मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए जी-20 की प्रमुख भूमिका पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित करने के लिए तत्पर है.


भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिलना दर्शाता है कि देश वैश्विक ताकतों के बीच वैश्विक नेतृत्व के रूप में उभरा है. इसके अलावा अन्य कई मंचों पर भी देश ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शायी है. आर्थिक क्षेत्र में वह ब्रिटेन को पीछे छोड़ कर पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में वह अस्थायी सदस्य बना है. इसके अलावा सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग का रूस और अमेरिका द्वारा समर्थन करने को भी देश की वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जा सकता है. जी-20 में विश्व के वे तमाम विकसित देश शामिल हैं जिनकी वैश्विक जीडीपी में लगभग 85 प्रतिशत की भागीदारी है. ऐसे में प्रत्येक भारतीय को इसके महत्त्व को पहचानते हुए देश के बढ़ते कद को लेकर गौरवान्वित होना चाहिए. हमारे देश के सकारात्मक कार्य हम सभी के सामने हैं और इसी का सुखद परिणाम जी-20 की अध्यक्षता के रूप में मिला है.  


देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उल्लेख भी किया है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों में उम्मीद जगाने के लिए हम बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने और वैश्विक सुरक्षा बढ़ाने पर सर्वाधिक शक्तिशाली देशों के बीच एक ईमानदार बातचीत को प्रोत्साहन प्रदान करेंगे. भारत का जी-20 एजेंडा समावेशी, महत्त्वाकांक्षी, कार्रवाई-उन्मुख और निर्णायक होगा. आइए, हम भारत की जी-20 अध्यक्षता को संरक्षण, सद्भाव और उम्मीद की अध्यक्षता बनाने के लिए एकजुट हों. आइए, हम मानव-केंद्रित वैश्वीकरण के एक नए प्रतिमान को स्वरूप देने के लिए साथ मिलकर काम करें.