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28 फ़रवरी 2026

18 जून 2024

सौवीं बार रक्तदान

अबकी बार, सौवीं बार


प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान का स्वयं से किया गया वादा अभी तक निरंतरता, नियमितता के साथ निभाया जा रहा है.


मार्च, जून, सितम्बर, दिसम्बर में स्वयं से जुड़ी कुछ विशेष तारीखों पर रक्तदान करना होता है. विगत कुछ वर्षों से नियति के चलते 10 जून को रक्तदान करने की नियमितता में कतिपय कारणों से अवरोध आया लेकिन रक्तदान में अनियमितता नहीं आने देना था.


इसी कारण से रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस, 18 जून 2024 को रक्तदान का शतक पूरा किया. यह रक्तदान रानी झाँसी के साथ-साथ हमारी पारिवरिक सदस्य श्वेता को समर्पित.






10 जून 2021

रक्त-सम्बन्ध से ज्यादा गहरा रिश्ता - 2050वीं पोस्ट

कुछ घटनाएँ संयोग रूप में हमारे साथ जुड़ सी गई हैं. ऐसी तमाम घटनाओं में एक घटना रक्तदान करने की है. संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसके द्वारा किये गए पहले रक्तदान की स्मृतियाँ गहरे से जुड़ी हों क्योंकि ये कार्य है ही ऐसा. हमारे साथ भी पहले रक्तदान की घटना आज भी गहरे से जुड़ी हुई है. इस गहराई से जुड़े होने के पीछे कोई विशेष घटना नहीं बल्कि पहली बार 1990-91 में नकली नाम से रक्तदान करना जुड़ा है. इस बारे में बहुत न लिखेंगे क्योंकि कई बार पहले भी लिख चुके, इस बारे में. इसे आप यहाँ से पढ़ सकते हैं.


रक्तदान करने से लेकर एक और घटना जुड़ी है जो स्मृति-पटल पर सदैव को अंकित हो गई है. आज श्वेता की स्मृति में पूर्व की भांति रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था. श्वेता-अंकुर से पारिवारिक घनिष्टता होने के कारण स्वाभाविक था कि इस आयोजन में सक्रिय उपस्थिति रहनी ही थी. अब पता नहीं इसे संयोग कहा जाये कि दुर्योग कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उससे अपना परिचित न होना बताया. हमारी उसी मित्र ने जानकारी देते हुए बताया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी हैं. हमने अंकुर के नाम पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान हॉस्पिटल जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी प्रसिद्द हो चुके थे. ऐसे में हमें इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.


हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली, सबकी सहायता को तत्पर रहने वाली श्वेता के साथ हमें अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 


फ़िलहाल, आज के आयोजन में हमेशा की तरह अपने दायित्व को पूरा किया. हमारे साथ हमारे छोटे भाई हर्षेन्द्र ने भी रक्तदान किया. पिछले कई सालों से प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान करने का नियम बना रखा है. हर बार एक सवाल किया जाता है कि कितने बार रक्तदान कर चुके हैं? इसके जवाब में हम हर बार उनको अपनी मर्जी की संख्या भरने के लिए बोल देते हैं. हर बार खुद से एक सवाल करते हैं, कई बार चिकित्सा अधिकारियों से भी किया मगर उचित जवाब न मिला कि आखिर रक्तदान करने वाले से उसके द्वारा किये जाने वाले रक्तदान की संख्या क्यों पूछी जाती है? विगत वर्षों का जितना अनुभव हमें है ये स्थिति आपस में सिर्फ प्रतिद्वंद्विता बढ़ाती है, एक तरह के अहंकार को बढ़ाती है.




हर्षेन्द्र, अंकुर, श्वेता, हम 


(आज, 10 जून 2021 की कुछ फोटो)

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(यह हमारे इस ब्लॉग की 2050वीं पोस्ट है)

22 जून 2020

रक्तवीर से सम्मानित रक्तदाता भी हो रहे अपमानित कोरोना जाँच में

सुबह-सुबह खबर मिलती है कि आपने जहाँ रक्तदान किया था वहाँ रक्तदान करने वाला एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव निकला है. इसके बाद भी हम संयम बनाये रखते हैं क्योंकि जो नाम हमें बताया गया वह हमारे रक्तदान करने के पहले नहीं था. दूसरी बात कि हमने वहाँ किसी से कोई संपर्क नहीं रखा था. ये बात बताने के बाद भी दोपहर दो बजे फोन पर खबर दी जाती है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर उन सभी को अपना सैम्पल देना है जिन्होंने रक्तदान किया है. अपने स्वास्थ्य और अपने पर विश्वास था इस कारण इस आदेश को स्वीकारते हुए विगत आठ दिनों के अपने संपर्कों पर निगाह दौड़ाई.


इसमें भी सबसे पहले अपने परिवार को ही देखा. न बिटिया को, न श्रीमती जी को खाँसी, बुखार अथवा किसी तरह की अन्य समस्या थी. इसके बाद अन्य लोगों पर भी गौर किया. माना कि एक हम ऐसे व्यक्ति हों जिस पर कोरोना के लक्षण प्रदर्शित न हों मगर ऐसा सबके साथ नहीं हो सकता था. दस जून से लेकर अठारह जून तक की अपनी संपर्क सूची को खुद से खंगाला. इसमें किसी भी एक व्यक्ति को नाममात्र का न तो बुखार आया और न ही जुकाम-खाँसी जैसी कोई स्थिति सामने आई. इस बारे में पूरी तरह से संतुष्ट थे कि हम पॉजिटिव नहीं हैं और न ही हमारे संपर्क में आया कोई व्यक्ति पॉजिटिव है. इसके बाद भी जैसा कि प्रशासन की मंशा थी, अपनी सैम्पलिंग के लिए जिला चिकित्सालय पहुँच गए. जिला स्वास्थ्य विभाग अथवा प्रशासन इस कारण भी इस मामले में तत्परता दिखा रहा था क्योंकि रक्तदान शिविर का आयोजन प्रशासन की अनुमति से हुआ था. इसके साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी का, मीडिया का, समाज के प्रबुद्धजनों का भी इसमें भी सम्मिलिन हुआ था.


शाम को लगी भीड़, सैम्पल देने के लिए 

निश्चित समय पर जिला चिकित्सालय पहुँचना हुआ. सैम्पल लेने के पहले पंजीकरण करवाना था. उस समय ऐसा लग रहा था जैसे सामने जानकारी लेने वाला व्यक्ति कोई अपार विद्वान हो और जानकारी देने वाला निपट निरक्षर. जानकारी लेने के आसपास लगी बाँस-बल्लियों को लेकर धमकी भरे स्वर में डराया भी जा रहा था. डराने के साथ-साथ लगभग धमकाने जैसा स्वर भी दिखाई दे रहा था. हम लोग प्रशासन की तरफ से सैम्पल के लिए भेजे गए थे इसके बाद भी वहाँ तैनात स्वास्थ्य कर्मियों की तरफ से ऐसा व्यवहार किया जा रहा था जैसे कि हम सभी कोरोना वायरस के सीधे कैरियर हैं. खड़े होने, बैठने, बातचीत करने आदि को लेकर जिस तरह से उपेक्षित रवैया वहाँ के कर्मियों का दिखा उससे लगा कि केन्द्र सरकार द्वारा फोन पर सुनाई जा रही कॉलर ट्यून का कोई मतलब नहीं जिसमें कहा जा रहा है कि बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं. यहाँ तो उस व्यक्ति को उपेक्षित किया जा रहा है जो अभी अपना सैम्पल देने आया है.

अति-सक्रिय स्वास्थ्य कर्मी 

इसके अलावा एक और दुखद बात सामने आई वो यह कि जिनको भी सैम्पल के लिए प्रशासन ने बुलाया था वे सब प्रशासन की शब्दावली में रक्तवीर थे. ऐसे लोगों को दो-तीन दिन पहले ही जिला प्रशासन ने सम्मानित भी किया था. इसके बाद भी प्रशासन और रक्तदान करवाने वाले तमाम स्वयंभू अपनी-अपनी जाँच जनपद में लगी ट्रू नेट मशीन से करवा कर फुर्सत पा गए, शेष लोगों को भटकने को छोड़ दिया गया. यहाँ भी पिछला दरवाजा मौजूद रहा. जुगाड़ वालों को इसी मशीन के सहारे जाँचने पर सहमति दिख रही थी मगर सबके लिए नहीं. ऐसे में सभी ने इसे नकारते हुए अपना सैम्पल देने का मन बनाया.

अपनी बारी का इंतजार करते रक्तवीर 

ये सुखद रहा कि दो दिन बाद सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई मगर यहाँ एक बात सोचने वाली है कि एक तरफ प्रशासन की मंशा से, स्वैच्छिक संस्थाओं की मंशा से लोग रक्तदान करने के लिए स्वेच्छा से सामने आते हैं, उसके बाद ऐसी किसी भी घटना पर ऐसे लोगों का साथ न मिलना मनोबल को तोड़ता है. उस दिन अनुभव किया कि सैम्पल देने वालों में कुछ लोग तो ऐसे थे जो मानसिक रूप से कमजोर थे. सोचने वाली बात है कि एक तरफ वे रक्तदान करके रक्तवीर बनते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक उपेक्षा के चलते दो दिन मानसिक रूप से पशोपेश में रहते हैं. आखिर प्रशासन को इस तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

10 जून 2020

हर बार लगता जैसे सामने खड़ी खिलखिला हँस रही है

किसी व्यक्ति के साथ गुजारा समय जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे महत्त्वपूर्ण होता है उन पलों में उस व्यक्ति का व्यवहार. यही व्यवहार उस व्यक्ति की स्मृतियों को चिर-स्थायी करता है. यही स्मृतियाँ उस व्यक्ति को सदैव दिल में जीवित बनाये रखती हैं. श्वेता के साथ की कुछ ऐसी अल्प-स्मृतियाँ चिर-स्थायी बनकर दिल में सदैव के लिए बस गईं हैं. ऐसा आज अकेले हमें अपने साथ ही नजर नहीं आया बल्कि कई लोगों की निगाहों में, उनके स्वर में, उनकी भावनाओं में ऐसा परिलक्षित हुआ.


श्वेता 

आज, 10 जून श्वेता की तीसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ऐसे कई लोगों से मिलना हुआ जो भावनात्मक रूप से खिंचे आ रहे थे. हर बार की तरह इस बार भी रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था मगर सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए अत्यंत सीमित रूप में. पहले विचार बना था कि महज दस लोगों के द्वारा रक्तदान करवाकर श्वेता को श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायेंगे लेकिन यह विचार बस विचार ही बन गया. ऐसा इसलिए क्योंकि भावनात्मकता पर किसी तरह की औपचारिकता का पहरा नहीं होता है, किसी तरह की बंदिश नहीं होती है. इसी के चलते कुछ लोगों में श्वेता की स्मृति में रक्तदान करने की भावनात्मक जिद भी देखी गई.


श्रद्धा सुमन अर्पित करते अपर जिलाधिकारी प्रमिल कुमार सिंह 

इस भावनात्मक जिद में अंततः मेडिकल टीम को अपनी हार मानने पर एक व्यक्ति ने विवश कर दिया. 72 वर्षीय शिव सिंह सेंगर रक्तदान के लिए बार-बार आत्मीय रूप से लगातार निवेदन करते रहे. हर बार मेडिकल टीम रक्तदान सम्बन्धी नियमावली का सहारा लेकर उनके निवेदन को इंकार में बदल देती. एक तरफ भावनात्मकता थी और दूसरी तरफ नियम मगर अंततः भावनाओं की, आत्मीयता की विजय हुई. आवश्यक स्वास्थ्य जाँचों को करने के बाद शिव सिंह जी ने इस तरह चहकते हुए रक्तदान किया जैसे कोई अपने बच्चे का जीवन सींच रहा हो. कहीं न कहीं यह सही भी था. शिव सिंह जी का ही नहीं वरन श्वेता का रिश्ता जिससे भी बना अत्यंत अपनत्व भरा रहा. अपनी मधुर मुस्कान के द्वारा एक पल में सभी को अपने परिवार में शामिल कर लेने वाली श्वेता की चाह भगवान को भी रही होगी. तभी उस उम्र में जबकि लोग अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, अपने बच्चों के साथ खेलते-कूदते हैं, श्वेता हम सबको अपनी यादों के बीच छोड़ गई.

रक्तदान करते शिव सिंह सेंगर (72 वर्ष)

डॉ० अंकुर शुक्ला 

इसे संयोग ही कहा जायेगा कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता को चुप रहने का इशारा करते हुए उसे पहचानने से इंकार कर दिया. तब हमें बताया गया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी है. हमने उस पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक अंकुर और मुस्कान जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी विख्यात हो चुके थे. ऐसे में हमारे जैसे दिन भर घूमने वाले, सामाजिक प्राणी को इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.

हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली श्वेता के साथ अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं मिलेगा. 

ये हैं हम 

आज से पहले भी दो बार उसकी स्मृति में रक्तदान किया और हर बार यही लगता है जैसे वह सामने खड़ी होकर उसी तरह खिलखिलाकर हँस रही है और कह रही है कि ये हमारे बड़े भाई हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 जून 2019

संकल्प करें रक्तदान करने का


आज विश्व रक्तदान दिवस है. खून की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से तथा रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष 14 जून को यह दिन मनाया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्व रक्तदान दिवस का आरम्भ वर्ष 2004 से किया गया. आज ही के दिन ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम खोजने के चलते नोबल पुरस्कार विजेता कार्ल लैंडस्टेनर की जन्मतिथि भी मनाई जाती है.


रक्तदान करने के फायदे
1. रक्तदान से दिल का दौरा पड़ने की संभावनाएं कम होती हैं. नियमित रक्तदान करने से खून का थक्का नहीं जमता, इससे खून कुछ मात्रा में पतला हो जाता है जिसके चलते हार्ट अटैक का खतरा टल जाता है.
2. खून का दान करने से वजन कम करने में मदद मिलती है. इसीलिए एक स्वस्थ व्यक्ति को साल में कम से कम दो बार रक्तदान अवश्य करना चाहिए.
3. रक्तदान के बाद नए ब्लड सेल्स बनते हैं, जिससे शरीर में तंदरूस्ती आती है साथ ही एनर्जी भी मिलती है.  
4. लीवर से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है. शरीर में ज़्यादा आइरन की मात्रा लिवर पर दवाब डालती है और रक्तदान से आइरन की मात्रा बैलेंस हो जाती है.

रक्तदान से पहले ध्यान रखने योग्य बातें
1. रक्तदान 18 साल की उम्र के बाद ही करें.
2. रक्तदाता का वज़न 45 से 50 किलोग्राम से कम ना हो.
3. खून देने से 24 घंटे पहले से ही शराब, धूम्रपान और तम्बाकू का सेवन ना करें.
4. खुद की मेडिकल जांच के बाद ही रक्तदान करें और डॉक्टर को सुनिश्चित करें कि आपको कोई बीमारी ना हो.
5. खून के दान करने से पहले अच्छी नींद लें. तला हुआ भोजन खाना और आइसक्रीम से परहेज करें.
6. शरीर में आयरन की मात्रा भरपूर रखें. इसके लिए रक्तदान से पहले खाने में मछली, बीन्स, पालक, किशमिश या फिर कोई भी आयरनयुक्त चीज़ खाएं.

एक व्यक्ति के द्वारा किया गया रक्तदान किसी जरूरतमंद व्यक्ति का जीवन बचा सकता है. बिना भयभीत हुए हम सभी को रक्तदान करना चाहिए. आइये संकल्प करें कि वर्ष में कम से कम दो बार और जरूरत पड़ने पर अवश्य ही रक्तदान करेंगे.

14 जून 2018

संख्याबल की दौड़ से इतर सिर्फ रक्तदान


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है. संगठन ने विख्यात ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद कार्ल लेण्डस्टाइनर (जन्म 14 जून 1868) की स्मृति में उनके जन्मदिन को रक्तदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया. उन्होंने रक्त में अग्गुल्युटिनिन की उपस्थिति के आधार पर इसे अलग-अलग रक्त समूहों - , बी, में वर्गीकृत किया था,  जिसके लिए उन्हें वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था. वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति शुरू की. इसी वर्ष संगठन ने लक्ष्य रखा था कि देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा दें. इसका उद्देश्य यह था कि ज़रूरत पड़ने पर रक्त के लिए पैसे देने की ज़रूरत न पड़े. अब तक लगभग 49 देशों ने ही इस पर अमल किया है. ये दुर्भाग्य का विषय है कि आज भी कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, रक्तदाता पैसे लेता है. ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते.


हमारे देश में आज भी ऐसी धारणा है कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर हो जाता है. रक्त की भरपाई होने में महीनों लग जाते हैं. यह ग़लतफहमी भी बहुत से लोगों में है कि नियमित रक्त देने से रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं. ऐसे अनेक भ्रमों के चलते लोग रक्तदान का नाम सुनकर ही काँप जाते हैं. विश्व रक्तदान दिवस का उद्देश्य ऐसी भी भ्रांतियों को दूर करके लोगों को रक्तदान को प्रोत्साहित करना है. भारतीय रेडक्रास के राष्ट्रीय मुख्यालय के अनुसार देश में रक्तदान को लेकर भ्रांतियाँ कम हुई हैं पर अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है. संभवतः ऐसा बहुत कम लोगों को मालूम है कि मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है. इससे रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता. रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जिसका वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो, जिसे एचआईवी, हेपेटाटिस जैसी बीमारी न हुई हो वह रक्तदान कर सकता है. एक बार में जो 350 मिलीग्राम रक्त दिया जा सकता है उसकी पूर्ति शरीर चौबीस घण्टे के अन्दर कर लेता है. पूर्ति के बाद रक्त सम्बन्धी गुणवत्ता की 21 दिनों में पूर्ण हो जाती है. चिकित्सा विज्ञान ये भी कहता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम होती हैं. इसके अलावा सबसे ख़ास बात ये है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी होती है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में अपने आप ही ख़त्म हो जाते हैं इस दृष्टि से भी प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है.

जब भी रक्तदान करने की बात आती है तो हमारे द्वारा सबसे पहली बार किया गया रक्तदान याद आ जाता है. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट का डर सता रहा था. सन 1991 का जनवरी माह, घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ऐसे में लगा कि कहीं समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो हॉस्टल के नजदीक बने हॉस्पिटल पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का देख न ले. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. उस दिन नियमित रूप से रक्तदान करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय के चलते पिछली बार डांट भी खा चुके हैं अपनी बड़ी बहिन जी से. ये उनका स्नेह है हमारे प्रति जो हमारी शारीरिक स्थिति, हमारी भागदौड़, हमारे काम को देखते हुए अब रक्तदान करने को प्रोत्साहित नहीं करती हैं. इसके बाद भी उनका और सभी बड़ों का आशीर्वाद हमें इस लायक बनाये रखेगा कि जरूरत पर मदद कर सकें. वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके.


अभी 29 सितम्बर 2016 को अपने महाविद्यालय में संपन्न रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के एक सदस्य ने जानकारी चाही और पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो. हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए. संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद रखने की कोई मंशा नहीं है. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

28 फ़रवरी 2018

समाजोपयोगी कार्य से अपने सदा रहेंगे दिल में


किसी समय हॉस्टल में सर्वाधिक प्रिय रहे और हॉस्टल छोड़ने के बाद भी बराबर अपने साथियों, अपने बड़े-छोटे भाइयों में लोकप्रिय रहे श्री सोमेन्द्र सिंह को आज भी कोई भूल नहीं पाया है. हो सकता है कि आज उनके साथ पढ़े, साथ खेले, साथ शरारतें करने वाले उनके साथी सहजता से न पहचान पायें मगर जैसे ही जिसको भी कुक्कू शब्द सुनाई देता है उसकी स्मृति में तुरंत ही एक मनमोहक सी, सुन्दर सी, अपनी सी छवि बन जाती है. एक नजर में सबको मोहित कर लेने वाले, एक आवाज़ पर सबके लिए खड़े हो जाने वाले, एक बार खुद से जोड़कर कभी न छोड़ने वाले कुक्कू भैया अचानक ही बिना किसी से कुछ कहे-सुने वर्ष 2016 में हम सबको छोड़कर चले गए. वर्ष 2016 का फरवरी माह का अंतिम दिन. कुक्कू भैया अस्वस्थ अवश्य चल रहे थे किन्तु ये भान किसी को नहीं था कि ऐसी बुरी खबर सुनने को मिलेगी. बहरहाल, जो लिखा था वो हुआ. सबके साथ अपने आपको जोड़ लेने वाले कुक्कू भैया एकदम वर्तमान से अतीत बन गए. कुक्कू भैया को उनके हॉस्टल के साथियों ने, भाइयों ने अतीत नहीं होने दिया. कभी न कभी, कहीं न कहीं उनके साथ के भाइयों से जब भी मुलाकात होती तो कुक्कू भैया जाने कितने-कितने संस्मरणों के सहारे सबके साथ आकर खड़े हो जाते. अतीत को वर्तमान में उतार लाने की इसी एकजुटता और संवेदनशीलता ने हर बार कुक्कू भैया की अनुपस्थिति को शिद्दत से महसूस किया. भाइयों की आँखों को नम किया. आवाज़ में लरजन पैदा की. 



आज फिर वही दिन आया. फरवरी का अंतिम दिन, 28 फरवरी. पूरे दो साल होने को आये मगर ऐसा लगता जैसे कल की ही बात हो. दो साल की समयावधि बहुत लम्बी नहीं होती किसी दुःख को कम करने के लिए. कम से कम परिजनों के लिए तो बिलकुल भी नहीं होती. इसके बाद भी कुक्कू भैया के परिजनों ने आँसू बहाने के बजाय कुछ लोगों के आँसू पोंछने का विचार बनाया. 28 फरवरी यद्यपि समूचे परिवार के लिए कष्टप्रद दिन है मगर इसके बाद भी कुक्कू भैया की धर्मपत्नी शशि भाभी ने और उनके बेटे सोमेश ने अपने दुःख को अपने में समेट समाज के जरूरतमंद लोगों के दुःख को दूर करने वाला कार्य किया. सबकी सहायता के लिए दिन-रात एक कर देने वाले कुक्कू भैया की दूसरी पुण्यतिथि पर उनकी धर्मपत्नी शशि सिंह भाभी और बेटे ने रक्तदान शिविर का विचार साकार किया. जनपद जालौन में कार्य कर रही कई सामाजिक संस्थाओं से संपर्क करने के बाद उनका विचार मूर्त रूप में सामने आया.




कुक्कू भैया अपने सामने जिस स्कूल ऑक्सफोर्ड एकेडमी की स्थापना कर गए थे, उसके तत्त्वावधान में रक्तदान शिविर का आयोजन इंद्रा पैलेस नामक उस जगह हुआ जिसे कुक्कू भैया ने अपनी दादी के नाम पर सजाया-संवारा था. मेडिकल कॉलेज, झाँसी की टीम उरई उपस्थित हुई और कुक्कू भैया की पुण्यतिथि में बनाई गई पुनीत योजना में सहयोगी बनी. उरई शहर के लोग कुक्कू भैया के नाम से बहुत गहरे से परिचित रहे हैं. उनकी अनुपस्थिति के दो वर्षों ने भी उनकी छवि को धूमिल नहीं होने दिया है. यही कारण है जब नागरिकों को उनकी पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर आयोजन की जानकारी हुई तो न केवल कुक्कू भैया और उनके परिवार से जुड़े परिवार वहां उपस्थित हुए वरन जनपद के प्रशासनिक अधिकारी सहित अनेक वर्तमान और पूर्व प्रतिनिधि भी उपस्थित हुए. रक्तदान शिविर में कुल 95 लोगों ने अपना पंजीकरण करवाया. इसमें से 47 लोगों ने रक्तदान किया. इस रक्तदान की विशेष बात यह रही कि सुबह ये खबर जब हॉस्टल से सम्बंधित अपने ग्रुप में लगाई तो छोटे भाई ललित तोमर कुक्कू भैया को समर्पित करते हुए ग्वालियर में रक्तदान किया. ये हम सभी हॉस्टल भाइयों की संवेदनशीलता और एक अदृश्य डोर से बंधे होने का परिचायक ही है.




कुक्कू भैया के स्मृति दिवस को यादगार बनाकर उनके परिवार ने समाज को एक सीख दी कि यदि हमें अपने परिजनों को बराबर अपने बीच महसूस करना है, उनकी उपस्थिति का आभास सबको करवाना है तो उनके जाने के बाद भी उनको सामाजिक रूप से याद करते रहना चाहिए. एक सार्थक कदम के साथ, समाजोपयोगी कदम के साथ अपने परिजनों को याद करना उनको अपने दिल में ही नहीं वरन सभी के दिलों में बराबर जीवित बनाये रखता है. ऐसा करके कुक्कू भैया के परिवार ने एक नई मिसाल कायम करते हुए नए मानक की स्थापना की है, जो भविष्य में बहुत से लोगों को राह दिखायेगा, समाजोपयोगी कार्य करने को प्रेरित करेगा. 

01 अक्टूबर 2016

रक्तदान का निश्चय और पहचान का डर

जब भी रक्तदान करने की बात आती है तो सबसे पहली बार किया गया रक्तदान याद आ जाता है. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट का डर सता रहा था. सन 1991 का जनवरी माह, घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ग्वालियर में चाचा, मामा रह रहे थे. ऐसे में लगा कि कहीं समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी. उस समय ऐसा लगता था जैसे रक्तदान करने के बाद महीनों की दिक्कत हो जाएगी. न जाने कितनी कमजोरी आ जाएगी. हमको ऐसी किसी भ्रान्ति की समस्या नहीं थी. थोड़ा बहुत पढ़ रखा था, थोड़ा बहुत समझ लिया था. एक बात समझ आ चुकी थी कि समय-समय पर, नियमित अन्तराल पर रक्तदान करने से शरीर में रक्तकणों, प्लाज्मा आदि के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. रक्त की रवानी, शुद्धता बढ़ जाती है. शरीर में ताकत, स्फूर्ति आ जाती है. चूँकि आरम्भ से ही एथलेटिक्स में विशेष रुचि रही, इस कारण भी रक्तदान के लिए लोभ था.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो हॉस्टल के नजदीक बने जयारोग्य हॉस्पिटल पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. शरीर दुबला-पतला था किन्तु उनके अपेक्षित वजन को पार कर लिया. अपने पहली बार रक्तदान में एक दिक्कत वजन को लेकर भी लग रही थी. बाकी सब बातें दुरुस्त पायी गईं और हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का देख न ले. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. साथ ही संतोष इसका हुआ कि किसी को पता भी नहीं चला. उस दिन से आज तक नियमित रूप से वर्ष में दो बार रक्तदान करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय को तब और बल मिला जबकि खबर पढ़ने को मिली कि विश्वस्तरीय एथलीट अपनी किसी प्रतिस्पर्द्धा में जाने के कुछ घंटे पहले अपना ही रक्त निकलवा कर पुनः चढ़वा लेते हैं. ऐसा करने से उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उनमें सक्रियता भर देता है.


वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके. आश्चर्य की एक और बात आपको बताएँ कि हमने अपनी मूल पहचान के साथ पहली बार सन 1996 में रक्तदान किया था जबकि हम परास्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके थे. आज की तरह रक्तदान शिविरों का आयोजन तब नहीं हुआ करता था. तब शिक्षकों, चिकित्सकों आदि की तरफ से भी बहुत ज्यादा कुछ बताया-समझाया नहीं जाता था. तकनीकी भरा दौर उस समय ऐसा नहीं था कि जानकारी सहजता से हर हाथ को मिल जाए. इसके बाद भी बहुत से मित्रों को, नागरिकों को रक्तदान करते देखा था. उनसे ही प्रेरणा मिली थी. लोगों के लिए, समाज के लिए कुछ करने की भावना ने भी इस तरफ आगे बढ़ने को प्रेरित किया.

अभी 29 सितम्बर 2016 को अपने महाविद्यालय में संपन्न रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के सदस्य ने जानकारी चाही और पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो. हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए. संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. पता नहीं कैसे याद रह जाती है गिनती? कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं. हाँ, एक बात अवश्य है कि ऐसे किसी कैम्प में हम रक्तदान करने से बचते हैं. इसके पीछे हमारा मानना है कि एक बार रक्तदान आपको कम से कम तीन माह के लिए प्रतिबंधित कर देता है. ऐसे में किसी जरूरतमंद को आवश्यकता पड़ने पर मजबूर होने के सिवाय कुछ हाथ नहीं रह जाता.


फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद भी नहीं और न ही कोई मंशा है याद रखने की. इसके पीछे हमारा मानना है कि यदि दान किया जा रहा है तो गिनती करके उसके महत्त्व को कम नहीं करना है. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.