बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
बड़े भाई सोमेन्द्र सिंह 'कुक्कू भैया' की पुण्यतिथि पर रक्तदान शिविर में....
28.02.2026
उरई (जालौन) उ०प्र०
अबकी बार, सौवीं बार
प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान का स्वयं से किया गया
वादा अभी तक निरंतरता, नियमितता
के साथ निभाया जा रहा है.
मार्च, जून, सितम्बर, दिसम्बर में
स्वयं से जुड़ी कुछ विशेष तारीखों पर रक्तदान करना होता है. विगत कुछ वर्षों से
नियति के चलते 10 जून को रक्तदान करने की नियमितता में कतिपय
कारणों से अवरोध आया लेकिन रक्तदान में अनियमितता नहीं आने देना था.
इसी कारण से रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस, 18 जून 2024 को
रक्तदान का शतक पूरा किया. यह रक्तदान रानी झाँसी के साथ-साथ हमारी पारिवरिक सदस्य
श्वेता को समर्पित.
कुछ घटनाएँ संयोग रूप में हमारे साथ जुड़ सी गई हैं. ऐसी तमाम घटनाओं में एक घटना रक्तदान करने की है. संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसके द्वारा किये गए पहले रक्तदान की स्मृतियाँ गहरे से जुड़ी हों क्योंकि ये कार्य है ही ऐसा. हमारे साथ भी पहले रक्तदान की घटना आज भी गहरे से जुड़ी हुई है. इस गहराई से जुड़े होने के पीछे कोई विशेष घटना नहीं बल्कि पहली बार 1990-91 में नकली नाम से रक्तदान करना जुड़ा है. इस बारे में बहुत न लिखेंगे क्योंकि कई बार पहले भी लिख चुके, इस बारे में. इसे आप यहाँ से पढ़ सकते हैं.
रक्तदान करने से लेकर एक और घटना जुड़ी है जो
स्मृति-पटल पर सदैव को अंकित हो गई है. आज श्वेता की स्मृति में पूर्व की भांति रक्तदान
शिविर का आयोजन किया गया था. श्वेता-अंकुर से पारिवारिक घनिष्टता होने के कारण
स्वाभाविक था कि इस आयोजन में सक्रिय उपस्थिति रहनी ही थी. अब पता नहीं इसे संयोग
कहा जाये कि दुर्योग कि श्वेता से हमारी अंतिम मुलाकात रक्तदान करने के दौरान ही
हुई थी. किसी को आवश्यकता पड़ने पर उसे कॉल की गई होगी. चिकित्सक परिवार से सम्बन्ध
रखने के कारण उसे रक्त की महत्ता ज्ञात थी. तत्काल उसकी उपस्थिति रक्तदान के लिए
हुई. उस समय तक हम रक्तदान कर चुके थे. श्वेता के रक्तदान करने के बाद हमारी एक
मित्र ने हमसे उसकी तरफ इशारा करते हुए उससे परिचित होने की बात पूछी. हमने श्वेता
को चुप रहने का इशारा करते हुए उससे अपना परिचित न होना बताया. हमारी उसी मित्र ने
जानकारी देते हुए बताया कि ये मुस्कान हॉस्पिटल वाले डॉ० अंकुर शुक्ला की पत्नी हैं.
हमने अंकुर के नाम पर भी अनभिज्ञता दिखाई तो हमारी मित्र चौंकी क्योंकि उस समय तक
अंकुर और मुस्कान हॉस्पिटल जनपद में ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों में भी प्रसिद्द
हो चुके थे. ऐसे में हमें इनके बारे में न मालूम होना आश्चर्य की, चौंकने की बात ही थी.
हमारी मित्र की शक्ल-सूरत देख हम दोनों ठहाका
मार कर हँस दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि अंकुर हमारे छोटे भाई के समान है और उस दिन के
पहले भी कई बार हम लोगों की मुलाकात पारिवारिक माहौल में हो चुकी थी. तब श्वेता ने
ही उन मित्र का संशय दूर करते हुए कहा, ये हमारे बड़े भाई
हैं. तब अंदाजा भी नहीं था कि हँसने-खिलखिलाने वाली, सबकी सहायता को तत्पर रहने
वाली श्वेता के साथ हमें अगला कोई पल किसी भी रिश्ते के रूप में बिताने को नहीं
मिलेगा.
फ़िलहाल, आज के आयोजन में
हमेशा की तरह अपने दायित्व को पूरा किया. हमारे साथ हमारे छोटे भाई हर्षेन्द्र ने भी
रक्तदान किया. पिछले कई सालों से प्रतिवर्ष चार बार रक्तदान करने का नियम बना रखा
है. हर बार एक सवाल किया जाता है कि कितने बार रक्तदान कर चुके हैं? इसके जवाब में हम हर बार उनको अपनी मर्जी की संख्या भरने के लिए बोल देते
हैं. हर बार खुद से एक सवाल करते हैं, कई बार चिकित्सा अधिकारियों
से भी किया मगर उचित जवाब न मिला कि आखिर रक्तदान करने वाले से उसके द्वारा किये
जाने वाले रक्तदान की संख्या क्यों पूछी जाती है? विगत
वर्षों का जितना अनुभव हमें है ये स्थिति आपस में सिर्फ प्रतिद्वंद्विता बढ़ाती है, एक तरह के अहंकार को बढ़ाती है.
![]() |
| हर्षेन्द्र, अंकुर, श्वेता, हम |
(आज, 10 जून 2021 की कुछ फोटो)
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(यह हमारे इस ब्लॉग की 2050वीं पोस्ट है)
किसी समय
हॉस्टल में सर्वाधिक प्रिय रहे और हॉस्टल छोड़ने के बाद भी बराबर अपने साथियों, अपने बड़े-छोटे भाइयों में लोकप्रिय रहे श्री सोमेन्द्र सिंह को आज भी कोई भूल
नहीं पाया है. हो सकता है कि आज उनके साथ पढ़े, साथ खेले,
साथ शरारतें करने वाले उनके साथी सहजता से न पहचान पायें मगर जैसे ही
जिसको भी ‘कुक्कू’ शब्द सुनाई देता
है उसकी स्मृति में तुरंत ही एक मनमोहक सी, सुन्दर सी,
अपनी सी छवि बन जाती है. एक नजर में सबको मोहित कर लेने वाले,
एक आवाज़ पर सबके लिए खड़े हो जाने वाले, एक बार
खुद से जोड़कर कभी न छोड़ने वाले कुक्कू भैया अचानक ही बिना किसी से कुछ कहे-सुने वर्ष
2016 में हम सबको छोड़कर चले गए. वर्ष 2016 का फरवरी माह का अंतिम दिन. कुक्कू भैया
अस्वस्थ अवश्य चल रहे थे किन्तु ये भान किसी को नहीं था कि ऐसी बुरी खबर सुनने को मिलेगी.
बहरहाल, जो लिखा था वो हुआ. सबके साथ अपने आपको जोड़ लेने वाले
कुक्कू भैया एकदम वर्तमान से अतीत बन गए. कुक्कू भैया को उनके हॉस्टल के साथियों ने,
भाइयों ने अतीत नहीं होने दिया. कभी न कभी, कहीं
न कहीं उनके साथ के भाइयों से जब भी मुलाकात होती तो कुक्कू भैया जाने कितने-कितने
संस्मरणों के सहारे सबके साथ आकर खड़े हो जाते. अतीत को वर्तमान में उतार लाने की इसी
एकजुटता और संवेदनशीलता ने हर बार कुक्कू भैया की अनुपस्थिति को शिद्दत से महसूस किया.
भाइयों की आँखों को नम किया. आवाज़ में लरजन पैदा की.