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24 सितंबर 2023

नारी शक्ति वंदन द्वारा सशक्तिकरण की पहल

वर्तमान दौर में जब महिला सशक्तिकरण की चर्चा होती है तो उन घटनाओं की स्मृति मन-मष्तिष्क में नहीं उठती है जिनको महिला सशक्तिकरण का आधार कहा जाता है. विश्व स्तर पर ऐसी चार घटनाएँ हैं जिन्होंने स्त्री-विमर्श को सशक्तता, वास्तविकता प्रदान की, इनके परिदृश्य में पुरुष वर्ग का हाथ रहा है. इन घटनाओं में सन् 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, जिसने समानता, स्वतन्त्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया; सन् 1829 का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून, जिसने स्त्री को मानव रूप में स्वीकार करने का अवसर दिया; तीसरी घटना सन् 1848 में ग्रिमके बहिनों द्वारा तीन सौ स्त्री-पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देते हुए नारी सशक्तिकरण की आधारशिला रखना और चौथी घटना के रूप में सन् 1867 में जे.एस. मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का एक प्रस्ताव रखना, जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी एवं संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. विश्व स्तर पर इन चार घटनाओं के सापेक्ष अनेक कार्यों के द्वारा महिला सशक्तिकरण के प्रयास होते रहे. न्याय और समानता के पक्षधर लोगों द्वारा समय-समय पर किये जाने वाले कार्यों से समाज में स्त्री-पुरुष समानता की अवधारणा को बल मिलता रहा.  

 



इसका व्यावहारिक उदाहरण देश के नए संसद भवन में देखने को मिला जबकि महिलाओं के लिए 128वें संविधान संशोधन के द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम नामक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा और प्रदेश की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है. अब लोकसभा की 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से ही सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है. इन्हीं आरक्षित सीटों में एक तिहाई सीटें अब महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. अभी लोकसभा में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं. महिला आरक्षण विधेयक के बाद इन्हीं सीटों में से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएँगी. इस विधेयक को परिसीमन के बाद ही पूरी तरह से लागू किया जा सकेगा. ऐसा माना जा रहा है कि आगामी वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में महिला आरक्षण विधेयक का व्यावहारिक रूप देखने को न मिलेगा क्योंकि अभी परिसीमन होना बाकी है. चूँकि आरक्षण पश्चात् सीटों की गणना वर्तमान परिसीमन पर की गई है, ऐसे में नए परिसीमन पश्चात् इसमें वृद्धि संभव है. लागू हो जाने के बाद महिला आरक्षण केवल 15 साल के लिए ही वैध होगा लेकिन इस अवधि को संसद आगे बढ़ा सकती है. प्रति पाँच वर्ष पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदलती रहेंगी. यह उसी तरह से होगा जैसे कि स्थानीय निकाय चुनावों में होता है. यहाँ भी पंचायत और नगर पालिकाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. इनमें प्रत्येक चुनाव में सीटों का आरक्षण बदलता रहता है.

 

निश्चित ही नए संसद भवन में नारी शक्ति वंदन के रूप में सभी दलों ने महिला शक्ति का वंदन करते हुए उस महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने में समर्थन दिया, जिसका पूर्व में कई बार विरोध किया जा चुका है. 1996 में देवगौड़ा नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार द्वारा इसे लाया गया था. इसके बाद राजग और संप्रग सरकारों ने भी इसे पारित किये जाने का प्रयास किया मगर दोनों सरकारों के अनेक घटक दलों के विरोध के कारण यह पारित नहीं हो सका. वर्ष 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने इसे राज्यसभा में पारित करवा लिया था किन्तु वह लोकसभा में इसे पारित करवा पाने में असफल रही थी. ऐसे में आखिर अब अचानक से ऐसा क्या हो गया कि सभी दल इसे लागू किये जाने पर सहमत नजर आये? इसके लिए नरेन्द्र मोदी नेतृत्व वाली सरकार के विगत वर्षों के वे कार्य प्रभावी रहे जो महिलाओं का सामाजिक स्तर बढ़ाने के लिए किये जाते रहे. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, उज्ज्वला योजना, घर-घर शौचालय, जनधन खातों के लिए महिलाओं की भागीदारी, मुद्रा योजना, तीन तलाक के विरुद्ध कानून बनाना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके द्वारा सरकार का महिलाओं के पक्ष में खड़े होने का देशव्यापी सन्देश गया है. नए संसद भवन में विशेष सत्र के माध्यम से केन्द्र सरकार ने स्पष्ट सन्देश देने का कार्य किया कि महिलाओं का सामाजिक, राजनैतिक उत्थान करना उसकी प्राथमिकता में है.

 

अब जबकि विधेयक पारित हो चुका है और परिसीमन पश्चात् यह अपने व्यावहारिक रूप में भी आ जायेगा तब राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण को देखा-समझा जा सकेगा. पंचायतों में लागू महिला आरक्षण का दूसरा पक्ष किसी से भी छिपा नहीं है जहाँ बड़ी संख्या में महिलाओं के चुने जाने के बाद भी उनकी जगह पर प्रधान-पति, पंचायत-पति सक्रिय रहते हैं. ऐसी निर्वाचित महिलाएँ घर की चहारदीवारी में ही कैद रहने को मजबूर हैं. देखा जाये तो पंचायत चुनावों का कार्यक्षेत्र मूलरूप से ग्रामीण अंचल होने के कारण भी महिलाओं की सक्रियता उतनी खुलकर सामने नहीं आती है जितनी कि लोकसभा-विधानसभा चुनावों में दिखाई देती है. ऐसे में संभव है कि इन चुनावों में वे महिलाएँ ज्यादा सक्रियता से अपना व्यावहारिक रूप देखा सकेंगी जिनको पुरुष मानसिकता के चलते चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिल पाता. भले ही इस विधेयक का पारित होना महिला सशक्तिकरण के लिए वैश्विक रूप से स्वीकार्य चार घटनाओं जैसा न समझा जाये किन्तु महिलाओं के राजनैतिक सशक्तिकरण की नयी कहानी अवश्य ही लिखेगा. 






 

12 जुलाई 2021

बाजार के हाथ में मातृत्व

शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु बन गई है. इसी कारण अब तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्देमहिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों परमामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं. विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा हैकुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्योंवाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहाबहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्नअर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहालस्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता हैसुखद अनुभूति होती है. स्तनपान की अहमियत को एक महिला, जो माँ बन चुकी है, बखूबी समझ सकती है. किसी पत्रिका के कवर पेज के लिए, भले ही उसका मंतव्य किसी न किसी रूप में स्तनपान की अवधारणा को विकसित करना ही क्यों अ रहा हो, स्तनपान को सार्वजनिक करना मातृत्व का परिचायक नहीं है. बहुत सूक्ष्म रूप में इसे न समझ सहज भाव से समझने की आवश्यकता है कि स्तनपान के द्वारा एक माँ न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रहे होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयतासंतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

समझने वाली बात यह भी है कि जो महिलाएं कुछ दिनों पूर्व तक हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर उस मानसिकता से स्वतंत्रता पाना चाहती थीं जो स्त्रियों को माहवारी के दिनों में कैद जैसी स्थिति दे देता है वे आज़ादी के रूप में स्तनपान की सार्वजनिकता चाह रही हैं. यही महिलाएं ब्रा से मुक्ति की चाह में सडकों पर ब्रा की होली जलाती हैं, खुद को बिना ब्रा के प्रदर्शित करती हैं वही महिलाएं अब स्वतंत्रता, सार्वजनिक होने के नाम पर ब्रा-युक्त स्तनपान की अवधारणा पैदा कर रही हैं. आखिर स्वतंत्रता को किस पैमाने पर उतारकर महिलाओं की आजदी के लिए वास्तविक आज़ादी की माँग ये कर रही हैं, इन्हें स्वयं नहीं मालूम. असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएंअपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. बॉडी स्प्रे का विज्ञापन हो तो महिला ऐसे दिखाई जाती है जैसे वह सारी उम्र, सारी शर्म छोड़कर सिर्फ देह की चाह रखती है. एक अगरबत्ती का विज्ञापन ऐसे दिखाता है जैसे उसकी महक किसी भी स्त्री को सेक्स के लिए उत्तेजित कर सकती है. चाय हो, ब्लेड हो, बनियान हो, साबुन हो, सौन्दर्य प्रसाधन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सभी के द्वारा महिलाओं को कामुक, उत्तेजक भूमिका में इसी बाजार ने खड़ा कर दिया है.

वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. जिस तरह से उस मॉडल को स्तनपान कराते प्रस्तुत किया गया है वह बाजारी दृष्टि को ही प्रदर्शित करता है. ऐसे बाजार को न माता से मतलब हैन शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. इसके लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग होंचाहे पैड का नीला-लाल रंग होकंडोम की कामुकता होअगरबत्ती में छिपी मादकता होब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गएबहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?


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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 08-03-2018 को प्रकाशित किया गया था.

24 अगस्त 2020

स्त्री-विमर्श के अपने-अपने भ्रम

इधर कुछ दिन से सोशल मीडिया पर कुछ विशेष लोगों की स्त्री-विमर्श से सम्बंधित पोस्ट देखने को मिल रही हैं. कुछ ब्लॉग पर भी इसी तरह की पोस्ट पढ़ने को मिलीं. समाज में बहुत सारे विमर्शों के बीच आज भी दो विमर्श अपनी-अपनी तरह से जिन्दा रखे जा रहे हैं. इनमें एक स्त्री विमर्श है और दूसरा दलित विमर्श. किसी समय में इन दोनों विमर्शों को एक तराजू पर तौलने की कोशिश भी की गई थी. बहरहाल, देखने में आता है कि इक्कीसवीं सदी में खुद को स्थापित करने के बाद भी यदि कहीं से भी एक भावात्मक बिंदु खोजने की कोशिश की जाती है तो इन्हीं दो विमर्शों के नाम पर. अभी चर्चा स्त्री-विमर्श की. खुद को पुरुषों के बराबर मानने वाली, पुरुषों से कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने वाली, कहीं-कहीं खुद को पुरुषों से आगे भी बताने वाली स्त्री अचानक से स्त्री-विमर्श के द्वारा खुद को ही कमजोर बताने लग जाती है. ऐसी पोस्ट से वह खुद को कमजोर बताने के साथ-साथ अपने समकक्ष और अपने बाद की पीढ़ी में एक तरह का भय पैदा करके अपना अनुनायी बनाने की चेष्टा करने का प्रयास भी करती है.



असल में नारी-सशक्तिकरण, स्त्री-विमर्श को लेकर असल बिंदु या फिर असल स्थिति क्या है, ये स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को भी असलियत में ज्ञात नहीं. स्त्री-विमर्श आज बाजार के हाथों में सिमट चुका है. स्त्री की दशा सुधारने की बात करने वाली, उसकी दशा कमतर बताने वाली स्त्री खुद बाजार के हाथों संचालित हो रही है. नारी की स्थिति को यदि पुरुष द्वारा चित्रित किया जाये तो वो स्त्री को बदनाम करने की साजिश कही जाती है और यदि वही छवि किसी महिला द्वारा दिखाई जाये तो उसे नारी सशक्तिकरण कहा जाता है. नारी के बिना कोई उत्पाद नही बिक सकता. यहाँ नारी को उत्पाद बनाने की बात हो रही है, उसको कम कपडों में उतारने की बात हो रही है तो ये क्या है, नारी-सशक्तिकरण या फ़िर नारी की गरिमा का पतन?

यदि स्त्री-विमर्श, सशक्तिकरण के लिए पिछली सदी की नायिकाओं की बात करें तो महारानी लक्ष्मी बाई को कोई भी नहीं भूला होगा. उस समय परदा-प्रथा आज से अधिक था, महिलाओं की शिक्षा आज से बदतर थी तब भी रानी ने कई राजाओं को संगठित कर अपने झंडे तले, अपने आधिपत्य में लड़वाया था. ये है नारी-सशक्तिकरण का उदहारण. रानी ने तो कम कपडों का सहारा नहीं लिया था, वे तो किसी फैशन शो का हिस्सा नहीं थीं. फिलहाल समझाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि समाज को चलाने वाले नहीं चाहते कि अब ये दो ध्रुव- स्त्री,पुरूष- एक होकर किसी समस्या का हल निकालें. दोनों में संघर्ष बना रहे, बाज़ार चमकता रहे, नारी अपनी झूठी शान में, पुरूष अपने झूठे अहंकार में भटकता रहे. इसी से बिकेंगे अंडरवीयर, शराब, ब्लेड और भी बहुत कुछ पर किसी कम कपडों में बलखाती नारी के साथ. यही तो है आज का नारी-सशक्तिकरण.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 जनवरी 2019

आज़ादी की चाह और बेड़ियाँ पहनने की आतुरता


महिला सशक्तिकरण के दौर में जहाँ कि सभी क्षेत्रों में अपनी हनकदार उपस्थिति का गर्व महिलाओं में दिखाई दे रहा है वहाँ एक मंदिर में किसी भी तरह से प्रवेश को लेकर जद्दोजहद मची हुई है. अदालती आदेश के बाद भी मंदिर प्रबंधकों तथा स्थानीय भक्तों द्वारा महिलाओं के प्रवेश को लेकर बनी स्थिति ज्यों की त्यों रही. कुछ अतिशय क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा लगातार संघर्ष बनाये रखा गया कि कैसे भी मंदिर में प्रवेश करने को मिल जाए. अंततः खबर आई कि अँधेरे में दो महिलाओं ने मंदिर में घुसपैठ करके महिला सशक्तिकरण का इतिहास रच दिया. आये दिन धर्म को इसी बात के लिए कोसा जाता है कि इसने महिलाओं की स्वतंत्रता में अवरोध पैदा किया है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर न जाने कितनी धार्मिक, पौराणिक कथाओं, पुस्तकों, ग्रंथों को गरियाया जाता है. इसके बाद भी ऐसी क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा मंदिर में प्रवेश की आतुरता देखने को मिल रही थी. 


हो सकता है बहुत से लोग, तमाम नारीवादी इसकी वकालत करें कि आखिर मंदिर में प्रतिबन्ध जैसा भेदभाव क्यों? आखिर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित क्यों किया जा रहा है? एक हिसाब से ऐसे सवालों का उभरना सही भी है. आखिर जब समानता, स्वतंत्रता, अधिकारों की बात की जाती है तो फिर भेदभाव क्यों? क्यों किसी भी स्थान पर सिर्फ पुरुष का प्रवेश हो? क्यों महिलाओं को उनकी अपनी प्राकृतिक अवस्था के कारण मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किया जाये? इसी बिंदु पर आकर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर प्रतिबन्ध तोड़ने की प्रतिबद्धता या फिर जिद सिर्फ मंदिर के सन्दर्भ में ही क्यों? ऐसा किसी मस्जिद के लिए क्यों नहीं दिखाई देता? क्या वहाँ ऐसा करना समानता की बात करना न होगा? असल में ऐसे मामलों में बहुत गहराई से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सिर्फ एक मंदिर प्रकरण से नहीं वरन तमाम सारे और प्रकरणों को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाना आवश्यक है जबकि ऐसे कदमों के द्वारा प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुत्व पर, हिन्दू धर्म पर, उसके रीति-रिवाजों पर चोट करने का प्रयास किया गया है. ऐसा ही कुछ मंदिर मुद्दे पर हुआ है.

अब जबकि दो महिलाओं ने मंदिर में अपने चरण घुसा ही दिए हैं, तब यह देखना है कि वे कहाँ-कहाँ तक अपने पैर घुसा पाने में सफल होती हैं. सिर्फ एक मंदिर ही नहीं अनेकानेक ऐसी जगहें हैं जहाँ आज भी महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है. महिला सशक्तिकरण के दौर में एक और सशक्त कदम का इंतजार रहेगा.

15 मार्च 2018

रूढ़ियों को दरकिनार कर उड़ाया हवाई जहाज


आज, 15 मार्च को उस महिला की पुण्यतिथि है, जिसने तमाम रूढ़ियों को, अमान्य परम्पराओं को तोड़ते हुए इतिहास रचा था. ऐसा उन्होंने उस समय किया था जबकि हमारा देश आज़ाद भी नहीं हुआ था. सन 1936 में पहली बार किसी भारतीय महिला ने हवाई जहाज उड़ाया था. जी हाँ, अपने आपमें आश्चर्य का विषय इसलिए भी है क्योंकि तब आज की तरह स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण चारों तरफ गूँज नहीं रहा था. तब सरकारी अथवा गैर-सरकारी संस्था द्वारा बेटियों को बचाने, उनके सशक्तिकरण के कार्य भी नहीं किये जा रहे थे. गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत में ऐसा जीवट का काम करने वाली वह सम्मानीय महिला थी सरला ठकराल. पहली बार भारतीय महिला द्वारा हवाई जहाज उड़ाए जाने के साथ-साथ कुछ और आश्चर्य भी जुड़े थे, वो ये कि सरला ठकराल ने साड़ी पहन कर हवाई जहाज़ उड़ाने का गौरव हासिल किया था. उस समय वह चार साल की एक बेटी की मां भी थीं.


सरला ठकराल का जन्म सन 1914 में नई दिल्ली में हुआ था. उन्होंने 1929 में दिल्ली में फ़्लाइंग क्लब में विमान चलाने का प्रशिक्षण लेकर एक हज़ार घंटे का अनुभव भी प्राप्त किया. दिल्ली के फ़्लाइंग क्लब में ही उनकी मुलाकात पी०डी० शर्मा से हुई, जिनके साथ बाद में उनका विवाह भी हुआ. उनके पति ने ही उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने को प्रोत्साहन दिया. इससे प्रोत्साहित होकर सरला जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगी. इसके बाद सन 1936 में वह ऐतिहासिक पल आ गया जो स्वर्णाक्षरों में आज भी अंकित है. महज 22 साल की सरला ठकराल ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, आँखों पर चश्मा चढ़ाया और जिप्सी मॉथ नामक दो सीटों वाले विमान को अकेले ही आकाश में ले उड़ीं. तत्कालीन समय में विमान उड़ाना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी. इस तरह सरला ठकराल भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं.

सन 1939 में ही एक विमान दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया. इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से जोधपुर क्लब बंद हो गया. सरला ठकराल के माता-पिता ने उनका दूसरा विवाह कर दिया और वे विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गईं. दिल्ली आकार उन्होंने पेंटिंग शुरू की, बाद में वे कपड़े और गहने डिज़ाइन करने लगीं. इस क्षेत्र में भी वे खासी सफल रहीं. अपने जीवन में सफलताओं के कई आयाम छूने वाली सरला ठकराल का 15 मार्च 2008 को निधन हो गया. उनका जीवन प्रेरणा, साहस और आत्मविश्वास की एक अनूठी कहानी है. उनकी ज़िन्दगी का संघर्ष और उसके बाद मिली सफलता महिलाओं के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बनी रहेगी.


ऐसी साहसी और आत्मविश्वास की धनी महिला को श्रद्धासुमन अर्पित हैं.