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07 सितंबर 2026

बच्चों के सपने और मौत के सौदागर

दिल्ली में इमारत का गिरना किसी ढाँचे का गिरना नहीं हुआ बल्कि उन अनगिनत सपनों का विध्वंस हुआ है जो उसमें रहने वाले बच्चों की आँखों में पल रहे थे. इमारत गिरने की इस त्रासद घटना के बाद हम सबके सामने एक गम्भीर और झकझोर देने वाला प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या इस हादसे के बाद भी हम कुछ सीखने की स्थिति में हैं या फिर एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए अपने बच्चों के लिए किसी अन्य बड़े शहर में रहने की व्यवस्था तलाशते रहेंगे? इमारत में रहने वाले बच्चे थे, पढ़ने के लिए आये थे. उनकी आँखों में सपने थे और एक पल में ही वे सब ध्वस्त हो गए. सोच कर देखिये एक पल को कि उसी इमारत में हमारा-आपका बच्चा रहने गया होता? अब ये भी सोचिये कि पिछले कुछ सालों ने अचानक से ये भेड़चाल क्यों दिखाई देने लगी कि सबको बड़े से और बड़े की तरफ दौड़ना है, वो भी अपने जीवन को दाँव पर लगाकर? क्या हमारी यह अंधी दौड़ इतनी कीमती है कि इसके बदले में हम अपने बच्चों की ज़िन्दगी को दाँव पर लगा दें?

 

पिछले कुछ वर्षों में हमारे सामाजिक ताने-बाने और सोच में एक अजीब सी भेड़चाल देखने को मिली है. हर कोई बड़े से बड़े शहर और बड़े से बड़े संस्थान की तरफ भागना चाहता है. यह अंधी दौड़ इस हद तक पहुँच चुकी है कि लोग अपने जीवन को ताक पर रखने से नहीं हिचकिचा रहे हैं. कभी बेहतर शिक्षा के नाम पर, कभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर, कभी नौकरी के लिए की जाने वाली तैयारी के नाम पर हम अपने बच्चों को मशीन बनाते जा रहे हैं. हम उन्हें एक साधारण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देने के बजाय उनको बहुत-बहुत बड़ा आदमी बनने के लिए, सर्वाधिक सफल व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित करने से ज्यादा एक तरह की आग में झोंक रहे हैं. बड़े से बड़े संस्थान में पढ़ाने की सनक, बड़े से बड़े शहर में रहने की जिद ने बच्चों के जीवन को एकआयामी बना दिया है, परिवारों को असंवेदित कर दिया है. कम से कम खर्च में अधिक से अधिक पा लेने की जुगाड़ में वे भविष्य की तरफ नहीं देखते हैं. ऐसे में बच्चे भी, परिवार के द्वारा की जाने वाली अनथक कोशिशों के बीच कम से कम संसाधनों में रहने को, जीवन जीने को मजबूर होते हैं.

 

ऐसा नहीं है कि छोटी जगह के बच्चों को महानगरों में, उच्च स्तरीय संस्थानों में पढ़ने का अवसर नहीं मिलना चाहिए. इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनके प्रतिष्ठित सेवाओं में जाने का अधिकार नहीं, उनके लिए तैयारी करने का विकल्प नहीं. यहाँ भाव यह है कि आखिर इसके लिए हमारे बच्चे ही क्यों असमय काल का शिकार बनें? बहुधा होता यही है कि अभिभावक कहीं पीजी के नाम पर, कहीं हॉस्टल के नाम पर अपने बच्चों को किन हाथों में, किस सुरक्षा व्यवस्था में, किस भोजन व्यवस्था के बीच छोड़ आते हैं, उन्हें खुद पता नहीं होता है. उनका बच्चा कितना सुरक्षित है, उसकी जान कितनी सुरक्षित है इसके प्रति बहुत ज्यादा खोजबीन से ज्यादा प्राथमिकता इस बात की रहती है कि कम से कम व्यय से अधिक से अधिक सुविधाओं को बटोर लिया जाये. यहीं आकर हम माता-पिता ही अपने बच्चों के जीवन का सौदा कर आते हैं. इस सौदे में हमें सिर्फ बच्चों का सफल परिणाम चाहिए होता है. हम उसकी तैयारी के बारे में जानकारी लेते हैं, कोचिंग की जानकारी लेते हैं, उसकी परीक्षा के बारे में पूछते हैं, उसके परिणामों की चर्चा कर लेते हैं मगर कभी उसके स्वास्थ्य के बारे में, उसकी जीवन-शैली के बारे में, उसकी सुरक्षा के बारे में चर्चा भी नहीं करते हैं. विगत वर्षों में कभी बिल्डिंग में आग लगने के कारण, कभी बेसमेंट में किसी आपदा के कारण बच्चों की जान चली गई तो कभी अत्यधिक मानसिक दबाव के चलते भी हमारे-आपके बच्चों ने मौत का रास्ता अपना लिया. सोचने वाली बात है कि आखिर जरा सी भेड़चाल में नुकसान किसका हुआ?

 

हमें यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि शिक्षा के इस दौर में हमसे, आपसे और हमारे बच्चों से एक बड़ा व्यापार किया जा रहा है. कोचिंग माफिया, हॉस्टल संचालक और महानगरों के भू-माफिया इस व्यवस्था से अकूत धन कमा रहे हैं, भारी-भरकम मुनाफा ले रहे हैं. उन्हें हमारे बच्चों की जान की कोई परवाह नहीं है. ऐसी किसी भी आपातकालीन या त्रासद स्थिति में जब हादसे होते हैं तो ये तथाकथित बड़े संस्थान और व्यवस्था के व्यापारी रिश्वत और रसूख के सहारे आसानी से बच निकल जाते हैं. अंततः सब कुछ खोने वालों में सिर्फ और सिर्फ हम और आप होते हैं. जो बच्चे हमने खो दिए या जो युवा इस अंधी व्यवस्था की भेंट चढ़ गए उनकी अमूल्य जान की भरपाई दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती.

 

यह समय केवल आँसू बहाने का नहीं, दोषारोपण करने का भी नहीं बल्कि गहरे आत्मसंज्ञान का है. क्या हम अपने बच्चों को इसलिए महानगरों की इन खौफनाक गलियों में भेजते हैं कि वे किसी लापरवाही की भेंट चढ़ जाएँ? क्या सफलता का पैमाना सिर्फ बहुमंजिला इमारतों में दम तोड़ते सपने होने चाहिए? यदि हमने अब भी बच्चों की जान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी तो ऐसे हादसों पर लगाम लगने वाली नहीं है. सपनों के व्यापारी अपना व्यापार करते रहेंगे और हम-आप उनके स्वप्न-जाल में फँसकर उनका शिकार बनते रहेंगे.  

 

22 जून 2026

बच्चों के जीवन से खिलवाड़ बंद हो

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता  जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसी हर दुर्घटना के बाद दोषियों को चिन्हित किया जाने लगता है; सम्बंधित को गैर-कानूनी बताया जाने लगता है; अधिकारियों की अक्षमता की पहचान की जाने लगती है मगर आगे के लिए हम कोई सबक नहीं लेते हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सभी ने यह मान लिया है कि समाज में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ तंत्र ही दोषी है, व्यवस्था ही जिम्मेदार है. बच्चों से सम्बंधित किसी भी दुर्घटना के बाद भी अभिभावकों में किसी भी तरह की सजगता उपजती नहीं दिखती है, ऐसा क्यों?   

 

यदि इसी आगजनी की बात करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान की स्थिति का आकलन कर लेते? महत्त्वाकांक्षा की आड़ में हमने अपनी ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है. उनके उज्जवल भविष्य बनाने के लिए कोचिंग सेंटर्स को एकमात्र उपाय मानते हुए हम सभी एक तरह की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम रकम चुकाना ही उनका कर्तव्य बन गया है. कोचिंग में प्रवेश के नाम पर बच्चों को वहाँ भेजना भी एकमात्र उद्देश्य रह गया है. एकबारगी भी संभवतः किसी अभिभावक द्वारा कोचिंग संचालकों से वहाँ के सुरक्षा मानकों को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता है. कोचिंग में सुरक्षा सम्बन्धी क्या उपाय किये गए हैं, इस बारे में भी कोई पूछताछ नहीं करने की मानसिकता बनी हुई है. दिमाग में एक विचार गहराई से बिठा लिया गया है कि कोचिंग संचालक से ज्यादा सवाल-जवाब उनके बच्चे को वहाँ से बाहर का रास्ता दिखा देगा. ऐसी सोच के चलते लोग अकारण ही बच्चों को असुरक्षित माहौल में धकेल देते हैं.

 


आज जिस तरह का माहौल चारों तरफ दिखता है
, उसमें बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं, आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? कोचिंग सेंटर में, किसी संस्था में प्रवेश करवा देना, मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती है. यह समझना चाहिए कि बच्चे आपके ही हैं, कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं, कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं, तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.

 

शासन-प्रशासन को, व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है; हम-आपके हाथ में नहीं है कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये. लखनऊ कोचिंग की आज की दुर्घटना और इससे पहले भी हुई अनेकानेक दुर्घटनाओं से हम सबको ही सबक सीखने की आवश्यकता है. इन दुर्घटनाओं के बाद कम से कम हम लोग ही जागें क्योंकि तंत्र तो फिर सो जायेगा. अपने बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनायें. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की, संयम से उससे निपटने की राह बनाने की तरकीब सिखाएँ. असामान्य स्थिति में न केवल स्वयं को बचाने की बल्कि अपने साथियों को भी निकालने की कला सिखानी होगी. समय बहुत ही निरंकुश है और उसकी आपदाओं से बचने का रास्ता हमें ही बनाना होगा, अपने बच्चों को सिखाना होगा.

 

ऐसी किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ व्यवस्था को दोषी बता देना कहीं न कहीं हम लोगों का अपने आपको दोष-मुक्त करने जैसा है. यह घटना कोई पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें हमारे नौनिहालों ने असमय मौत को गले लगा लिया. कम से कम अब तो हम लोगों को जागना होगा. प्रशासन के बजाय, व्यवस्था के बजाय हम लोगों को ही सजग-सचेत होना पड़ेगा. तंत्र तो अपनी खाना-पूरी करके फिर से अपनी उसी चाल में, उसी ढर्रे पर लग जायेगा मगर हम लोगों को अपने बच्चों के जीवन को, उन्के भविष्य को बचाने के लिए जागना ही होगा. 

22 अप्रैल 2026

बाईस को हुए इक्कीस

कभी अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना था कि समय पंख लगाकर उड़ता है. ऐसा होता हुआ अब समझ में भी आता है. पता नहीं आप लोगों को ऐसा महसूस होता है नहीं पर हमें तो लगता है कि जैसे समय वाकई उड़ता है. वर्तमान में खड़े होकर अतीत की किसी भी घटना को याद किया जाये तो लगता है जैसे कल की ही बात है मगर जब समय का आकलन किया जाता है तो समझ आता है कि बहुत-बहुत समय गुजर गया है. ऐसा न केवल सुखद घटनाओं के सन्दर्भ में होता है बल्कि दुखद घटनाओं के सन्दर्भ में भी होता है.

 

अपने जीवन की बहुत सी न भुलाये जाने वाली घटनाओं में एक घटना आज, 22 अप्रैल को घटित हुई थी. आज पलट कर उस दिन को याद किया तो समझ आया कि ये कल की घटना नहीं बल्कि 21 वर्ष पुरानी बात है. चूँकि इस पर हमें आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पहले दिन से लेकर आजतक एक पल को भी उस घटना को भुला नहीं सके हैं. भुलाना चाहते तो भी न भुला पाते, आखिर वो घटना महज एक घटना नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ गई घटना थी. सुबह उठने से लेकर देर रात सोने तक एक-एक पल, एक-एक कदम, एक-एक काम उस घटना से जुड़ा रहता है, उस घटना को जीवित बनाये रखता है. ऐसी स्थिति में उस दिन को, उस घटना को भुलाया जाना सम्भव ही नहीं.

 



बहरहाल, जीवन की साँस, धड़कन की तरह हमारी ज़िन्दगी से जुड़ चुकी वह घटना आज पूर्ण रूप से बालिग़ हो गई है. 21 वर्ष की समयावधि पलक झपकते नहीं गुजरी है बल्कि इन 21 वर्षों के गुजरने ने बहुत बड़ी कीमत वसूली है, बहुत सारा दर्द दिया है, बहुत सारा कष्ट दिखाया है. बावजूद इसके चलना जारी है, समय का पूरे उत्साह से गुजरना बना हुआ है. शौक जिंदा है, एहसास जिंदा है.


20 दिसंबर 2025

ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष जल्द ही आपके साथ होगा

वर्ष 2025 भी जाने की तैयारी कर रहा है. जितने दिन इस अंतिम महीने में निकल गए हैं, अब उतने दिन भी शेष नहीं बचे हैं. समय की गति के अनुसार आना और जाना लगा ही रहना है. कल को इसी वर्ष का स्वागत किया था, अब इसी को विदा करने का समय आ गया है. कुछ ऐसा ही आने वाले वर्ष 2026 के साथ भी होगा. इन आते-जाते वर्षों के स्वागत और विदाई के बीच याद बस यही रह जाता है कि उस एक वर्ष में हम सबने क्या किया? क्या पाया, क्या खोया? क्या सुखद रहा, क्या दुखद रहा?


आप सभी सुधिजनों को याद होगा कि वर्ष 2019 में आत्मकथा ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी’ आपके बीच हमारी बातों को लेकर उपस्थित हुई थी. उसी समय हमारे शुभेच्छुजनों ने प्रेरित किया था कि वर्ष 2005 में हुई दुर्घटना के बाद की अपनी जीवन-यात्रा को भी एकसूत्र में पिरोकर प्रकाशित करवाया जाये. विचार तो था कि वर्ष 2020 में इसे भी ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद’ के रूप में प्रकाशित करवाया जायेगा. अक्सर ऐसा होता है कि सोचा कुछ जाता है और हो कुछ जाता है, हमारे साथ भी यही हुआ. ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष करने बैठे तो हाथों ने काँपना शुरू कर दिया, आँखों ने नम होना शुरू कर दिया, दर्द ने अपना अलग रूप दिखाना शुरू कर दिया. इन सबके बीच कुछ दुखद घटनाओं ने हिला दिया और ज़िन्दगी जिन्दाबाद को बीच में रोक देना पड़ा. यद्यपि समय के दिए गए आघातों से उबरते हुए ज़िन्दगी जिन्दाबाद को ब्लॉग पर कहानी के रूप में लिखते रहे.

 



इसी लेखन को एडिट करके, पुस्तक के रूप में संयोजित करके इस जाते हुए वर्ष 2025 में आप सबके बीच लाने का मन बना लिया है. जल्दी ही ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद’ को आप सब अपने बीच पाएँगे. ‘कुछ सच्ची कुछ झूठी’ की तरह आप सबका स्नेह ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद’ को भी मिलेगा, ऐसा विश्वास है.


11 जुलाई 2025

गूगल अर्थ पर एक क्लिक ने खोल दी मौत की गुत्थी

गूगल अर्थ पर एक क्लिक ने खोल दी मौत की गुत्थी।

1997 की एक रात। फ्लोरिडा का रहने वाला 40 वर्षीय विलियम मोल्ड्ट (William Moldt) एक नाइटक्लब से अपने घर लौट रहा था। रात करीब 9:30 बजे उसने अपनी गर्लफ्रेंड को कॉल करके बताया कि वह घर के लिए निकल चुका है। लेकिन वह कभी घर नहीं पहुँचा। न कोई सुराग, न कोई चश्मदीद। बस एक रहस्यमय गुमशुदगी, जो अगले दो दशकों तक बिना जवाब के रह गई।

 

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

2019: गूगल अर्थ पर एक क्लिक और खुलता है 22 साल पुराना राज़

2019 में एक व्यक्ति जो पहले उस इलाके में रहता था, गूगल अर्थ पर अपने पुराने मोहल्ले को देख रहा था। वह यूँ ही नज़ारे देख रहा था, ज़ूम इन कर रहा था, जब उसकी नज़र एक तालाब पर पड़ी — और फिर, वह ठिठक गया। पानी के अंदर कुछ अजीब-सा था। वह किसी कार की आकृति लग रही थी।

 



शक होने पर उसने यह तस्वीर स्थानीय लोगों को दिखाई। फिर अधिकारियों को खबर दी गई। पुलिस मौके पर पहुँची और गोताखोरों की मदद से उस तालाब से एक पुरानी कार को बाहर निकाला गया। कार के भीतर मानव अवशेष मिले। जब डीएनए परीक्षण हुआ, तो सच्चाई सामने आई — वो विलियम मोल्ड की ही लाश थी।

 

वो तालाब, जो कभी सुनसान था। जिस तालाब में कार मिली, वह एक रिहायशी इलाक़े के पीछे था। लेकिन जब मोल्ड गायब हुआ था, उस समय वहाँ कोई कॉलोनी नहीं बनी थी। यानी वह इलाका सुनसान और विकास से दूर था। समय के साथ वहाँ मकान बन गए, सड़कें आ गईं, पर तालाब वहीं का वहीं रहा — और उसके भीतर दफन था एक लापता आदमी का राज।

 

गूगल अर्थ की तस्वीरों में 'वो कार' सालों से दिख रही थी

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वो कार, जिसमें मोल्ड की लाश मिली, गूगल अर्थ की सैटेलाइट इमेज में कई सालों से दिखाई दे रही थी। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। न कोई ज़ूम इन किया, न किसी को शक हुआ — जब तक कि वो एक व्यक्ति यूँ ही नज़ारे देखने नहीं बैठा।

 

एक अनजाने क्लिक ने 22 साल का रहस्य सुलझा दिया

कभी-कभी एक छोटी-सी नज़र, एक छोटी-सी खोज, एक गूगल अर्थ पर किया गया ज़ूम — वो कर दिखाता है जो सालों की पुलिस जांच नहीं कर पाती। विलियम मोल्ड का परिवार आज जवाबों के साथ जी सकता है, लेकिन यह कहानी हमें यह भी बताती है कि कितने रहस्य हमारे आसपास ही छिपे होते हैं — बस उन्हें देखने वाली नज़र चाहिए।


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उक्त जानकारी फेसबुक की एक पोस्ट से ज्यों की त्यों कॉपी है. इसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है. 

16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


13 जून 2025

ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट

मृत्यु अटल सत्य है, जो सम्बंधित व्यक्ति के परिजनों को दुःख-आँसू ही देती है लेकिन अहमदाबाद में 12 जून 2025 को हुई हवाई जहाज दुर्घटना दुखद तो है ही, झकझोरने वाली भी है. इस दुर्घटना से सम्बंधित चित्र, वीडियो, दिवंगत हो गए लोगों के परिजनों के आँसू देखकर मन विचलित है. इनको देखकर जीवन-मृत्यु को संचालित करने वाली शक्ति से इतनी ही प्रार्थना है कि इस दुर्घटना जैसी मृत्यु किसी के जीवन में न लिखे. कारण यह नहीं कि यह दुर्घटना भयावह थी बल्कि इसलिए क्योंकि इस दुर्घटना में हमेशा को चले जाने वाला व्यक्ति वास्तविक में हमेशा को ही चला गया.

 

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह व्यक्ति सदा-सदा को चला जाता है, उसे फिर कभी वापस नहीं आना होता है. इस दुर्घटना में भी मृतकों को कभी वापस नहीं आना है मगर उनके परिजनों के हिस्से में भी न भुलाया जाने वाला दर्द सदा-सदा को आ गया है. उस पल की कल्पना करके ही आँखें नम हो जा रहीं जबकि हँसकर परिवार वालों ने अपनों को विदा किया होगा. एक पल को भी किसी को आभास भी नहीं हुआ होगा कि वे उनको अंतिम विदाई दे रहे हैं. हँसते-मुस्कुराते विदा करते लोगों से फिर मिल पाना सम्भव न होगा, उनको कुछ पलों बाद पहचान पाना भी सम्भव न होगा.

 



सामान्य मृत्यु की स्थिति में परिजन साथ होते हैं. आँखों में दुःख होने के साथ-साथ एक संतोष का भाव होता है. अंतिम संस्कार को पावन कृत्य के रूप में स्वीकार्य मानने के पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि परिजन अपने जाने वाले सम्बंधित व्यक्ति को संतोषी भाव से मुक्त करें, उसे अनंत यात्रा के लिए प्रस्थान करने दें. इस हवाई जहाज दुर्घटना में किसी को भी एक पल के लिए झूठे भी ख्याल नहीं आया होगा कि ये उसकी अंतिम यात्रा है. किसी के परिवार वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि वे अपने प्रिय को अंतिम यात्रा के लिए हँसते हुए विदा कर रहे हैं. आँखों में कितने सपने होंगे. दिल में कितनी खुशियाँ होंगी. भविष्य के लिए बहुत सारी आशाएँ सजा रखी होंगी. सबकुछ एक झटके में स्वाहा हो गया.

 

परिवार वाले दूर जाते परिजन का हाथ थाम कर उससे कुछ कह न सके. हमेशा के लिए सबसे दूर जाता व्यक्ति आँखों में संतोष लेकर नहीं जा सका. पता नहीं उस चले गए व्यक्ति की अपने ही किसी परिजन से लम्बे समय से मुलाकात न हुई होगी. न जाने कितने परिजनों, मित्रों, सहयोगियों से अगली यात्रा में आकर मिलने का वादा किया होगा. न जाने कितने परिजनों ने अगली बार अपने घर आने का न्यौता दिया होगा. न जाने क्या-क्या, बहुत कुछ आपस में तय किया गया होगा, निर्धारित किया गया होगा मगर नियति को कुछ और ही निर्धारित करना था. उसने सब एक झटके में निर्धारित करके सबकी आँखों के सपने छीन लिए, परिवार की खुशियाँ मिटा दीं, भविष्य की आशाओं पर पानी फेर दिया.

 

जाने वाला तो चला ही गया, शेष रह गया परिजनों के हिस्से में आया दुःख, आँसू, खाली हाथ, अफ़सोस और ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट.




28 सितंबर 2024

ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता

ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता के सन्दर्भ में अक्सर विचार करते हैं, शासन-प्रशासन के प्रयासों को देखते हैं. इसे कम से कम अब सही ढंग से समझने की कोशिश होनी चाहिए. हमारा सन्दर्भ है कि यदि एक बालिग व्यक्ति किसी दो-पहिया या चार-पहिया वाहन को अथवा उससे बड़े वाहन को चला लेता है तो फिर उसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस लेने की बाध्यता क्यों? अपने देश में बहुतायत में ड्राइविंग लाइसेंस किसी भी स्थिति में व्यक्ति को कुछ सिखाते नहीं. न वाहन चलाना, न ट्रेफिक के नियम, न सड़क के नियम. यदि मान भी लिया जाये कि ड्राइविंग लाइसेंस देने से पहले वो सबकुछ सिखाया जाता है जो एक वाहन चालक के लिए आवश्यक है तब भी सड़क पर सबसे ज्यादा दुर्घटना उन्हीं के द्वारा होती हैं जो ड्राइविंग लाइसेंस धारक हैं.

 

यहाँ दो बातें ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन चालन के सन्दर्भ में याद रखनी चाहिए कि ड्राइविंग लाइसेंस की अहमियत यदि सिर्फ व्यक्ति की पहचान तक है तो फिर वर्तमान में बहुत से प्रमाण व्यक्ति की पहचान के हैं. आधार कार्ड इसमें सबसे आगे दिख रहा है. अब आगे बढिए, यदि सड़क पर किसी व्यक्ति द्वारा कोई दुर्घटना की जाती है या फिर उससे हो जाती है तो उससे सम्बंधित कई बिंदु हैं जो व्यक्ति की पहचान सिद्ध करते हैं. एक तो वह वाहन पंजीकृत होगा. उसका नंबर होगा. उसके आधार पर संदर्भित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है.

 

दुर्घटना वाली स्थिति में व्यक्ति तीन तरह से मिल सकता है. घायल, मृत या फिर दुर्घटना स्थल से फरार. यदि व्यक्ति घायल है तो उसकी पहचान के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं अपनी पहचान सिद्ध करेगा. यदि व्यक्ति मृत है तो फिर उसके पास से मिले दस्तावेजों के आधार पर उसकी पहचान की जाएगी. इसमें आधार कार्ड या कोई अन्य पहचान पत्र काम करेगा. इसके साथ-साथ यदि व्यक्ति फरार है तो फिर सम्बंधित वाहन का पंजीकरण, उसका नंबर सम्बंधित व्यक्ति तक पहुँचा देगा. अब यदि वाहन और व्यक्ति दोनों ही फरार हैं तो फिर ड्राइविंग लाइसेंस क्या चूं-चूं बोलेगा?

 

विगत कई सालों का व्यक्तिगत अनुभव है कि ड्राइविंग लाइसेंस के नाम पर व्यक्ति का शोषण किया जा रहा है. इस माध्यम से दलाली पनप रही है, रिश्वतखोरी को बढ़ावा मिल रहा है. अनाप-शनाप तरीके से, मनमाफिक ढंग से अधिकारियों, दलालों की मिलीभगत से ड्राइविंग लाइसेंस के नाम पर भ्रष्टाचार चरम पर है. सोचियेगा, ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता क्यों जबकि दुर्घटनाएँ तो लाइसेंस वाले भी कर रहे हैं?


22 अप्रैल 2024

भुलाए न भूले जो तारीख

समय गुजरता रहता है. दिन, महीने, साल भी गुजरते जाते हैं. इनके साथ-साथ तारीखें भी गुजरती जाती हैं मगर कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो गुजरने के बाद भी अपनी जगह पर रुकी रहती हैं. ऐसा नहीं कि ये तारीखें दिन, महीने, साल के साथ आगे नहीं बढ़तीं, ये भी आगे बढ़ती हैं मगर इन तारीखों में मिले निशान ज्यों के त्यों बने रहते हैं, जिसके कारण ऐसा लगता है कि ये तारीख ज्यों की त्यों अपनी जगह पर रुकी हुई है. लगभग सभी के जीवन में ऐसी कोई न कोई तारीख होती होगी, काश! ऐसी कोई तारीख किसी के जीवन में न आये जो हर पल, हर क्षण अपने होने का दुखद एहसास करवाती रहे. तमाम सारी दुखद तारीखों के बीच एक ऐसी ही दुखद तारीख हमारे लिए 22 अप्रैल है. ये एक ऐसी तारीख है जिसे चाह कर भी न तो हम भुला पा रहे हैं और निश्चित रूप से ताउम्र हमारे अभिन्न में इस तारीख को भुला सकेगा.

 



इस तारीख में जो होना था वो तो हो ही गया मगर इसे न भूल पाने का कारण इस तारीख को मिले वे निशान, वे ज़ख्म हैं जो हर पल साथ हैं, सोते-जागते अपना एहसास कराते हैं. एक दुर्घटना के बाद जो ज़ख्म, जो निशान, जो दर्द मिला उसके बाद बहुत से अपनों-परायों ने सांत्वना देने के लिए, हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा कि समय के साथ इसे भूलने की कोशिश करो. अपने आपको काम में व्यस्त करके इस दुर्घटना के ज़ख्म को, निशान को भूलने का प्रयास करो. चूँकि अपने विश्वास, अपनी शक्ति पर विश्वास अखंड है तो सोचा कि एक बार ऐसी कोशिश करने में क्या समस्या है. आखिर जब खुद को मौत के मुँह के सामने खड़ा पाकर भी वापस लाने में किसी तरह की समस्या हमने खुद में महसूस नहीं की तो उस दुर्घटना के ज़ख्म को, दर्द को भुलाने में क्या समस्या? यही सोचकर पिछले कुछ सालों में लगातार प्रयास किया कि इस दर्द को भुला सकें मगर लाख चाहने के बाद भी इसे भुलाना संभव न हुआ.

 

यदि किसी एक दिन के आरम्भ को सुबह से जोड़कर देखें तो आखिर इस ज़ख्म को कैसे भुला दें जबकि नींद खुलने के बाद अपने दोनों पैरों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बीस-पच्चीस मिनट तक उनकी मालिश करनी होती है? कैसे भुला दें अपनी शारीरिक अक्षमता को जबकि स्वयं को खड़ा करने के लिए एक कृत्रिम पैर की आवश्यकता पड़ती है? कृत्रिम पैर के सहारे दोनों पैरों के दर्द को खुद में पीते हुए दैनिक कर्म संपन्न किये जाते हैं, इसे कैसे भूला जा सकता है? घर से बाहर जाने के लिए तैयार होने के पहले दाहिने पैर के क्षतिग्रस्त पंजे पर पट्टी के बाँधने का अनिवार्य कृत्य करना कैसे भुला देगा कि बिना इस पट्टी के चलना संभव नहीं? रात को सोने की कोशिश में बार-बार पंजे को इधर-उधर टकराने से बचाने का काम करते हुए नींद भी लेना, ऐसी कोशिश में कैसे भूल जाएँ 22 अप्रैल को? 2005 में हुई दुर्घटना के बाद से आज इस पोस्ट के लिखे जाने तक एक पल, एक क्षण ऐसा नहीं गुजरा जबकि दाहिने पंजे में, पैर में दर्द न हुआ हो तब कैसे भूल जाएँ इस दर्द को? अपने काम के दौरान, तमाम सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, अकादमिक गतिविधियों के दौरान बाँए कृत्रिम पैर द्वारा दिए जा रहे कष्ट को सहते हुए कैसे भूल जाएँ कि हमारा एक पैर नहीं है?

 



कई बार लगता है कि बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में कहना बहुत आसान होता है मगर उस कहे को व्यावहारिक रूप देना बहुत कठिन होता है, लगभग असंभव होता है. ऐसा ही कुछ असंभव सा अब हमारे साथ जुड़ा हुआ है. ऐसा ही आजीवन साथ  रहने वाले दर्द हमारे साथ है. हमारे शरीर का अंग न होने के बाद भी शरीर का अंग बने कृत्रिम पैर के साथ पूरे जीवन भागदौड़ करनी है. किसी समय मैदान पर दस हजार मीटर की दौड़ लगाने वाले एथलीट का एक कदम अब बिना छड़ी के नहीं उठता है. ऐसी तमाम स्थितियों को, दिक्कतों कि साथ लेकर एक-एक पल गुजारते समय कैसे भुलाया जा सकता है इस तारीख को? बस आज इस तारीख को याद करते हुए शाम गुजर गई, रात गुजरने वाली है. दर्द जो हमेशा साथ रहना है, उसके लिए क्या रोना? जो ज़ख्म ज़िन्दगी भर के लिए यारी निभाने आया है उसे कैसे भुलाया जाये? ये भी उन्हीं मित्रों, रिश्तेदारों की तरह हैं जिनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और जिनसे पीछा छुड़ाया भी नहीं जा सकता. 


 

08 दिसंबर 2021

दुर्घटना या साजिश : देश ने खोया बहुत कुछ है


ये चित्र अपने आपमें बहुत कुछ कहता है. भारत के पहले रक्षा प्रमुख या चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) बिपिन रावत जी का एक हैलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया. उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सहित कुल तेरह लोगों का इस दुर्घटना में निधन हुआ. यह चित्र रावत जी सहित उन सभी लोगों के प्रति श्रद्धा-सुमन है जो उस दुर्घटना में शहीद हो गए.


8 दिसम्बर 2021 को जनरल रावत, उनकी पत्नी और उनके निजी स्टाफ़ के अन्य सदस्यों समेत कुल 10 यात्री और चालक दल के 4 सदस्य भारतीय वायुसेना के मिल एमआई-17 हैलिकॉप्टर पर सवार थे. यह हैलीकॉप्टर इन सभी को लेकर सुलुरु वायुसेना हवाई अड्डे से वेलिंगटन स्थित रक्षा सेवा स्टाफ़ कॉलेज जा रहा था, जहाँ जनरल रावत को व्याख्यान देना था. स्थानीय समय अनुसार अपराह्न 12:10 बजे के आसपास, नीलगिरि जिले के कुन्नूर तालुके के बांदीशोला ग्राम पंचायत में स्थित एक निजी चाय बागान की आवासीय कॉलोनी के समीप यह हैलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया. दुर्घटना का स्थान उस जगह से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर था जहाँ हेलिकॉप्टर को उतरना था. जनरल रावत  और उनकी पत्नी समेत अन्य 11 के निधन की पुष्टि बाद में भारतीय वायुसेना द्वारा की गयी. भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस दुर्घटना में एकमात्र जीवित बचने वाले व्यक्ति हैं. हैलीकॉप्टर एक सामान्य दुर्घटना का शिकार हुआ अथवा यह एक साजिश थी, इस बारे में तो बाद में ही पता चल सकेगा किन्तु इस दुर्घटना से देश को अवश्य ही अपूरणीय क्षति हुई है.


सभी दिवंगत सदस्यों को नमन. 

 

22 अप्रैल 2021

वो घटना भी हो गई बाली उमर की

­­ज़िन्दगी है तो उसके साथ बहुत सी यादें भी जुड़ जाती हैं. इन जुड़ती यादों में बहुत सी अच्छी यादें होती हैं और बहुत सी बुरी भी. इन यादों के अच्छे-बुरे स्वभाव के चलते मन उदास भी रहता है तो मन में उल्लास भी बना रहता है. फ़िलहाल जीवन है तो जीवन से जुड़े अच्छे-बुरे पलों से सामना करते ही रहना होगा. इनसे चाहकर भी कोई इन्सान बचा नहीं रह सकता है.


अपने जीवन की तमाम सारी अच्छी बुरी यादों के बीच आज का दिन पिछले सोलह सालों में भुला नहीं सके हैं, चाह कर भी भुला नहीं सके हैं. सामान्य गति से दौड़ते-चलते जीवन में अचानक से एक स्पीड ब्रेकर लग गया था. अब उस दिन के बारे में, उस दिन की घटना के बारे में कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं क्योंकि हमारे साथ के सभी लोगों को उस दिन के बारे में, उस घटना के बारे में सब मालूम है. जिन मित्रों को नहीं मालूम है उनको धीरे-धीरे सब जानकारी होती रहेगी.


फिलहाल तो इतना ही कि उस दिन की घटना सोलह बरस की बाली उमर को छू चुकी है. दिनों दिन वो याद जवान होती रहती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि उस दिन मिला दर्द आज तक एक पल को न ही कम हुआ है और न ही गायब हुआ है. बस सब चल रहा है, अपनी गति से पल रहा है. उस दिन की यादें, उस दिन का दर्द, उस शाम का मंजर, सड़क पर दौड़ती कार, सबको तसल्ली देते-देते टूटती-जुड़ती साँसें, अपनों का साथ, गैरों का अपनापन.... बहुत-बहुत कुछ है जो आज बाली उमर के बिंदु को छू गया.


हमारा दिल तो पहले ही बाली उमर का शिकार था, अब वे घटनाएँ, वो दिन भी इसकी गिरफ्त में आ गया.




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वंदेमातरम्

24 नवंबर 2020

न खुद डरिए, न औरों को डराइए

रोज ही आपको सड़क दुर्घटनाओं की खबर पढ़ने को मिलती होगी, दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने की भी खबरें मिलती होंगीं, हो सकता है कि आप, आपके परिजन, परिचित, सहयोगी आदि कभी बाइक, कार आदि दुर्घटना के शिकार हुए हों, दुर्भाग्य से आपके बीच का कोई सदस्य दुर्घटना में आपने हमेशा-हमेशा को खो दिया हो, तो 

क्या ऐसे किसी हादसे के बाद से आपने यात्रा करना बंद कर दिया?

क्या आपने बाइक, कार आदि पर बैठना बंद कर दिया?

दुर्घटना न हो तो क्या इसके लिए आपने बाइक, कार आदि चलाना छोड़ दिया?

दुर्घटना की आशंका के चलते क्या आपने घर से निकलना ही बंद कर दिया?

क्या और लोगों को आप बाइक, कार दुर्घटनाओं के आँकड़े दिखाकर डराते हैं?

क्या अपने परिचितों में दुर्घटनाओं की भयावहता के बारे में  डर पैदा करते हैं?

क्या आप अपनी सामान्य बातचीत में दुर्घटनाओं की बातें ही करते हैं?


संभव है आप कहेंगे कि ऐसा नहीं करते, तो ऐसा कोरोना को लेकर क्यों कर रहे हैं?


दुर्घटनाएँ देखकर, अपनों के साथ हुए हादसे देखकर, अपने किसी परिचित को इसमें खो देने के बाद आपने ये सब बंद न किया, बस सावधानी बढ़ा दी।


अब आप सुरक्षित यात्रा करने लगे होंगे। हो सकता है कि रफ्तार से बाइक, कार चलानी बंद कर दी हो। बस ऐसे ही सावधान रहिए, सावधानी बरतिए। अनावश्यक न डरिए, न दूसरों को डराइए।



29 मार्च 2020

वो दौर भी निकल गया, ये दौर भी निकल जायेगा

21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा हुई तो बहुत से लोगों को लगा कि उनको घर में कैद कर दिया गया है. प्रधानमंत्री के शब्द कुछ ऐसे थे भी कि लोगों ने इसे एक तरह का कर्फ्यू ही समझा. समझना भी चाहिए था. खैर, चर्चा इसकी नहीं. लॉकडाउन का कौन, कितना, किस तरह से पालन कर रहा, यह उसकी मानसिकता का परिचायक है. मंगलवार की रात आठ बजे लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद से अभी तक इस पोस्ट को लिखने तक हमारा अपने घर के दरवाजे पर भी निकलना नहीं हुआ. आज, दोपहर महज आधा-एक मिनट को उस समय निकलना हुआ जबकि हमारे बड़े भाई समान मित्र, जनपद के रंगकर्मी और समाजसेवी प्रभात तिवारी अपने प्रयासों से कीटनाशक का छिड़काव करने हमारे मोहल्ले आये थे. इसके अलावा पिछले पाँच दिन या कहें कि रविवार के एक दिनी जनता कर्फ्यू के बाद से हमने अपने घर की देहरी को भी नहीं छुआ.

घर में खुद को बंद करने की स्थिति एक हमारी अकेले नहीं वरन हमारे कई मित्रों की है. इसमें कुछ मित्र तो ऐसे हैं जो सामान्य दिनों में चौबीस घंटे के लगभग पंद्रह बीस घंटे घूमने का काम ही करते हैं. हमको भी इससे अलग नहीं गिना जा सकता है. अपने कॉलेज समय के बाद का बहुतायत समय शहर में घूमते-टहलते, काम करते, गोष्ठियों, बैठकों आदि में बीतता है. बहुत सा समय दोस्तों के साथ बैठकी में, अपने फोटोग्राफी के शौक को पूरा करने में निकलता है. ऐसे सभी मित्रों को, हमारे घरवालों को, जान-पहचान वालों को जो हमारी इस आदत को जानते हैं, आश्चर्य हो रहा है कि हम पिछले कई दिन से घर के बाहर भी न निकले. हमारे अपने हिसाब से यह हमारे लिए कोई आश्चर्य का मामला नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी एक लम्बी कसरत हम कोई डेढ़ दशक पहले कर चुके हैं. अब ये बात शायद आप सबके लिए आश्चर्य की हो मगर यह सत्य है.


वर्ष 2005 की अप्रैल में ट्रेन दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो जाने के बाद पूरे एक वर्ष तक पलंग पर ही पड़े रहे थे. पहला एक महीना अस्पताल के पलंग पर, वहीं के कमरे के भीतर जहाँ कि यदा-कदा ही बाहर की रौशनी देखने को मिलती थी, कमरे की खिड़की के सहारे ही. इसके बाद दो महीने कानपुर में अपने मामा जी के यहाँ रहना हुआ. हॉस्पिटल से मामा के घर तक जाने की यात्रा में पूरे एक महीने के बाद सूर्य की रौशनी देखे को मिली थी. दिन ऐसे चमकता हुआ लग रहा था जैसे कई-कई सूरज चमक रहे हों. मामा के घर आने के बाद बाहर की रौशनी नियमित रूप से देखने को मिलती रही मगर कहीं आना-जाना नहीं होता था. कभी-कभी जब बाहर निकलना हुआ तो वह भी अपने इलाज के सन्दर्भ में. इसके पश्चात् उरई लौटने के बाद कमरे के बिस्तर पर शेष समय गुजरा. हालाँकि इस दौरान घर के आँगन में, कभी किसी के मिलने आने पर बैठक में जाना व्हीलचेयर की सहायता से हो जाया करता था. बीच में एक-दो साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सहभागिता करने के लिए छोटे भाइयों की सहायता से अवश्य ही निकलना हुआ मगर वह भी न निकलने जैसा ही कहा जायेगा. दिसम्बर में उसी स्थिति में गाँधी महाविद्यालय में मानदेय प्रवक्ता के रूप में  कार्यभार ग्रहण करने पर अवश्य ही कभी-कभी निकलना होने लगा.

उस समय हमको मोबाइल से प्रतिबंधित कर दिया गया था. मोबाइल पर बहुत सीमित बात करवाई जाती थी. इंटरनेट आज के जैसा न तो तेज था और न ही मुफ्त जैसा था. इसके अलावा उस समय हमारे पास कम्प्यूटर भी नहीं था न ही लैपटॉप. सो जाहिर सी बात है कि ब्रॉडबैंड या इंटरनेट जैसा भी कुछ होने का सवाल नहीं था. टीवी देखने की बहुत ज्यादा आदत या कहें शौक न होने के कारण उसे देखना भी नहीं होता था. थोड़ी देर देखना भी सिरदर्द को पैदा कर देता था. लिखने-पढ़ने का शौक भी बहुत दिनों तक पूरा नहीं हो पाया था. चोट के चलते उँगलियाँ, कलाई बुरी तरह दर्द करती थी. पेन पकड़ना संभव ही नहीं हो पाता था. ऐसी स्थिति देखकर खुद में विचार करते कि आगे लिखना संभव हो भी पायेगा या नहीं? कुछ ऐसी हालत पढ़ने को लेकर भी थी. किसी भी किताब के दो-चार पेज पढ़ने के बाद ही सिर चकराने लगता था. आँखों से पानी आने लगता था. कुछ महीनों के प्रयासों के बाद कलम पकड़ पाना, लिख पाना संभव हुआ. लिखना संभव तो हो गया मगर बहुत से अक्षरों का स्वरूप बदल गया. हस्तलिपि में भी कुछ परिवर्तन हो गया. आज डेढ़ दशक बाद भी बहुत देर लिखने से कलाई, उँगलियाँ दर्द करने लगती हैं.




आज पाँच-सात दिन घर में बैठे-बैठे हो गए. लिखने-पढ़ने के साथ-साथ स्केचिंग के पुराने शौक को जिन्दा किया. फोटोग्राफी के शौक को अब कमरे के सीमित क्षेत्र में घरेलू सामानों के साथ पूरा किया जा रहा है. बिटिया रानी के साथ उनके पौधों, गमलों के साथ कुछ समय बिताया. यदा-कदा घर को सेनेटाइज करने का काम भी निपटा लिया जाता है. आज मोबाइल भी हाथ में है लैपटॉप भी साथ में है. इंटरनेट स्पीड के साथ है. ब्रॉडबैंड भी काम कर रहा है. तमाम सोशल मीडिया मंच सक्रियता को गति दिए हैं. तमाम सारे मोबाइल एप मनोरंजन का माध्यम बने हैं. अपने परिजनों, मित्रों, परिचितों से लगातार संपर्क बना हुआ है. इन सबके कारण धैर्य, संयम बना हुआ है. बोरियत जैसी अवश्य होती है मगर अपने ही पुराने दिन याद करते ही वह भी दूर हो जाती है. उन दिनों की याद करते हैं तो आत्मविश्वास, आत्मबल बढ़ जाता है. दिल-दिमाग, मन-मष्तिष्क इसी विश्वास के सहारे आगे बढ़ते हैं और कहते हैं कि जब वो दौर गुजर गया तो ये दौर भी गुजर जाएगा.   



























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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 जनवरी 2020

ज़िन्दगी जिन्दाबाद - अपनी कहानी का एक और घोष

अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थिक दृष्टि के रूप से यह कहाँ ठहरती है, कह नहीं सकते मगर हमारे तमाम चाहने वालों ने इसे हाथों-हाथ लिया है. जैसा कि इस पुस्तक में उल्लेख भी किया है, वही यहाँ भी करना अपेक्षित महसूस होता है कि तीस साल गुजारने के बाद अचानक ही लगा था कि अपनी कहानी लोगों के सामने लाना चाहिए. उस सोच के साथ खुद से ही एक प्रश्न किया कि आखिर लोग क्यों हमारे जीवन को समझना-जानना-पढ़ना चाहेंगे? इसी प्रश्न के बाद एक दशक और गुजार दिए. चालीस वर्ष की उम्र होने के बाद इस प्रश्न का उत्तर खुद ही दिया कि अपनी कहानी लोगों को आदर्श के लिए नहीं, लोगों को प्रवचन देने के लिए नहीं, लोगों के कुछ बताने के लिए नहीं वरन हमने अपने इन चालीस वर्षों को किस तरह से देखा है, उस रूप में पेश करने का माध्यम मात्र है.



जब अपने आपको ही प्रश्न का उत्तर मिल गया तो लगा कि अब कुछ सच्ची कुछ झूठी लिखा जाना ही चाहिए. लिखने के दौरान खुद से ही लड़ना-जूझना होता रहा. क्या लिखना है, क्या छोड़ना है समझ न आता. एक घटना को लिखते तो उससे सम्बंधित दूसरी घटना याद आ जाती. बहरहाल, अपने आपसे लड़ते-जूझते कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हुआ. परिजनों का, गुरुजनों का आशीर्वाद-प्यार मिला. दोस्तों का, सहयोगियों का स्नेह मिला. पाठकों का आशीर्वाद मिला. बहुत सारी प्रतिक्रियाओं का आना हुआ. ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में प्रोत्साहन ही दिया गया. इसे अपने आपमें हिम्मत का काम बताया गया कि महज चालीस वर्ष में आत्मकथा लिखने का जोखिम उठा लिया. इसी क्रम में हमारे गुरुजी डॉ० दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी का फोन भी आया. उनका आशीर्वाद हमारे शोध-कार्य से लेकर आज तक बना हुआ है. उनके द्वारा भी पुस्तक को पढ़ा गया. इसी क्रम में उन्होंने आशीर्वाद देते हुए अपेक्षा व्यक्त की कि इसके आगे की कहानी का उनको इंतजार है. उन्होंने हमारी ट्रेन दुर्घटना और उसके बाद की हमारी दिनचर्या, क्रियाकलाप, कार्यों आदि को लेकर एक और पुस्तक का स्नेहिल निर्देश जैसा दिया. 

ये भी हमारे जीवन में लिखा था. वर्ष 2005 तमाम सारी दिक्कतों, दुखों के साथ हमारे लिए शारीरिक कष्ट लेकर आया था. एक ट्रेन दुर्घटना में अपना बायाँ पैर गँवा दिया था तथा दाहिना पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. दुर्घटना के बाद से आज तक के डेढ़ दशक बाद भी दाहिने पैर में दर्द को एक सेकेण्ड को भी राहत नहीं है. अपनी दुर्घटना के बाद के चार-पाँच वर्ष के दौरान जिस तरह का व्यवहार समाज से, अपनों से, गैरों से देखने को मिला उसने मन में उसकी अभिव्यक्ति का रास्ता बना दिया था. सोचते थे कि अपनी कहानी लिखने के पहले दुर्घटना के बारे में, उसके बाद जिस तरह का वातावरण अपने आसपास देखा, उसे लिखा जाये. ऐसी सोच के साथ लगता था कि आखिर समाज हमारे दर्द को क्यों पढ़ना चाहेगा? उसे आखिर हमारे दर्द से क्या मिलेगा? अब जबकि हमारी दुर्घटना को डेढ़ दशक होने को आये हैं, उसके बाद तमाम सारे काम ज्यों के त्यों चल रहे हैं तब लग रहा है कि अपने जीवन को उन लोगों के लिए अवश्य एक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो अपने जीवन से निराश हैं. इसमें भी हमारे शुभेच्छुजनों का स्नेह शामिल है.


नया वर्ष 2020 आरम्भ हो चुका है. कुछ सच्ची कुछ झूठी हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, जो विगत वर्ष आप सबके सामने आया. अब इस वर्ष अपनी दुर्घटना के बाद के एक दशक को, उस दौर में बीती अच्छी-बुरी घटनाओं को, अपने गिरने-उठने को, लोगों के पास आने-दूर जाने की घटनाओं को प्रस्तुत किये जाने का विचार है. इसमें भी कोशिश यही रहेगी कि अपने दुःख का, अपनी समस्या का रोना न रोया जाये बल्कि कुछ दुखी लोगों को हंसाने की कोशिश की जाये. आखिर ज़िन्दगी हँसने के लिए ही है. ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में जल्द ही हमारी ज़िन्दगी का एक और पक्ष आपके सामने होगा. संभव है कि पुस्तकाकार रूप में आने के पहले आपके सामने उसका नेट संस्करण उपस्थित रहे. शेष तो समय के गर्भ में है, हाँ, ये निश्चित है कि इस वर्ष के अंत तक ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष आप भी हमारे साथ कर रहे होंगे.

18 दिसंबर 2019

आतंकियों के नए हथियारों से सचेत रहने की आवश्यकता

ये  आवश्यक नहीं कि आप अथवा आपका शहर आतंकिओं के निशाने पर हो और वहाँ किसी तरह का बम धमाका हो, किसी तरह की गोलीबारी हो. बिना इसके भी आतंकी अथवा उनके स्लीपर सेल अपना काम करने के लिए नए-नए रास्ते तलाशने लगे हैं. इसे किसी तरह का आकलन अथवा अनुमान मान कर अनदेखा करने की आवश्यकता नहीं है. आतंकियों द्वारा अब ऐसा किया जा रहा है. अभी हाल ही में वाराणसी से संचालित विशाल भारत संस्थान प्रमुख और अनाज बैंक के संस्थापक डॉ० राजीव श्रीवास्तव इसी तरह के एक हमले में घायल हो गए हैं. राजीव श्रीवास्तव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केन्द्रीय पदाधिकारी और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के प्रमुख इन्द्रेश कुमार जी के शिष्य होने के साथ-साथ अत्यंत नजदीकी हैं. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि प्रशासन की तरफ से मुख्य रूप से समूचे घटनाक्रम का संज्ञान लिया गया. 


जांच के बाद स्पष्ट हुआ कि एक एक निजी कार्यक्रम से वापस आते समय राजीव श्रीवास्तव की बाइक में एक जीप द्वारा टक्कर मारी गई. अपने आपमें सजग और चैतन्य रहने वाले राजीव जी इस टक्कर पर संभल गए मगर उन्हें किसी आतंकी हमले का अंदेशा नहीं था. वे इसे महज एक सड़क की सामान्य घटना समझ अपने गंतव्य के लिए चलते रहे. इसी बीच उसी जीप ने एक बार फिर उनको टक्कर मार दी. इस बार टक्कर कुछ तेज रही और किसी अनहोनी से परे राजीव जी बजाय संभल पाने के दुर्घटना का शिकार हो गए. उन पर हुए इस हमले में उनकी जान तो बच गई मगर उनका दाहिना पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया.


राजीव जी पर हुए हमले के बाद जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो कुछ पुरानी दुर्घटनाओं का तारतम्य बैठाने का प्रयास किया गया. कुछ दिनों पूर्व संघ के मोहन भागवत जी की कार भी एक ट्रक दुर्घटना का शिकार हुई थी. इसी तरह से कुछ संघ पदाधिकारी भी आये दिन सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं. प्रशासन की गुप्त सूचनाओं और जानकारियों से ऐसा मालूम हुआ है कि मजबूर मुस्लिम बच्चों की परवरिश करने के साथ-साथ तीन तलाक मुद्दे, धारा 370, राम जन्मभूमि मंदिर, नागरिकता संशोधन, जनसँख्या कानून आदि पर सक्रिय रूप से कार्य करने के कारण राजीव श्रीवास्तव विगत काफी समय से कट्टरपंथियों के निशाने पर थे. उनके पहले उनके संस्थान की एक मुस्लिम महिला सदस्य को भी काफी लम्बे समय से मुस्लिम कट्टरपंथियों की धमकियाँ मिलती रही हैं. इन सबसे बिना भयभीत हुए राजीव जी और उनके सभी सदस्य लगातार मुस्लिम हितों के लिए कार्य करते आ रहे हैं.

अब जबकि इस मामले में स्पष्ट हो चुका है कि आतंकियों द्वारा इस तरह की दुर्घटनाओं को अपना हथियार बना लिया गया है जहाँ न किसी तरह का धमाका होना है, न किसी तरह की गोलीबारी. ऐसी दुर्घटनाओं को शासन-प्रशासन द्वारा भी महज सड़क दुर्घटना मान कर लगभग भुला दिया जाता है. चूँकि राजीव श्रीवास्तव का मामला कहीं न कहीं हाई प्रोफाइल मामला बन गया और उसकी जांच के बाद से इस तरह के संकेत भी मिल गए. ऐसे में सभी नागरिकों को सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है. किसी भी दुर्घटना अथवा अन्य तरीके की ऐसी घटनाओं को महज संयोग समझकर विस्मृत करने की आवश्यकता नहीं है. सभी जिम्मेवार नागरिकों को सजग रहने की जरूरत है और प्रशासन का सहयोग करने की आवश्यकता है. एक-एक व्यक्ति के जागने से ही आतंकियों के हौसलों को तोड़ा जा सकता है.


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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
मीडिया प्रभारी/प्रवक्ता - विशाल भारत संस्थान

30 सितंबर 2019

वाहन चालकों के अलावा भी बहुत सी जानें कीमती हैं साहब!


शासन-प्रशासन इस समय इस चिंता में हैं कि कैसे वाहन चालकों की जान बचाई जाये. ऐसा पढ़कर आपको आश्चर्य लगेगा. लगना भी चाहिए क्योंकि बात ही ऐसी है. पिछले दिनों वाहन सम्बन्धी अधिनियम में जबरदस्त बदलाव करते हुए जुर्माने को कई-कई गुना बढ़ाया गया. कई प्रदेशों से अचानक से बड़ी-बड़ी धनराशि वाले चालानों के काटे जाने की खबरें आनी शुरू हो गईं. वाहनों के कागजातों को सही रखने, पूर्ण रखने के सम्बन्ध में जितना जोर दिया गया, उससे कहीं अधिक जोर दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट पहनने पर, कार चालक के सीट बेल्ट लगाने पर दिया गया. मंत्री स्तर से ऐसे बयान भी आये कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ही जुर्माने को बढ़ाया गया है. समझ नहीं आया कि शासन-प्रशासन को सिर्फ वाहन चालकों की जान की ही चिंता क्यों है? सरकार की प्राथमिकता में अन्य नागरिकों की जान की सुरक्षा इस प्राथमिकता में क्यों नहीं है, जिस प्राथमिकता में वाहन चालकों की है? स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा, जान-माल सुरक्षा के प्रति अभी भी लापरवाही दिखाई दे रही है. 

बहरहाल, सरकार क्या विचार कर रही है, क्या कदम उठा रही है इस पर चर्चा करना अभी इस पोस्ट का अभीष्ट नहीं है. इस पोस्ट का मंतव्य महज इतना दिखाना है कि जिम्मेवार प्रशासन भी अपने कदमों को उसी स्थिति तक उठाता है जितना कि उसे आदेशित किया जाता है. कहते हैं न कि ‘जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना’ कुछ ऐसा ही रवैया प्रशासन का रहता है या कहें कि अभी वर्तमान में ऐसा बना हुआ है. जबसे मोटर अधिनियम में बड़े बदलाव हुए हैं, प्रशासन पूरी तत्परता से, तन्मयता से दोपहिया वाहन चालकों के हेलमेट को पकड़ने में लगा है. जो बिना हेलमेट पकड़ में आये उनको चालान पकड़ा दिया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे एकमात्र उसी व्यक्ति की जान कीमती है जो दोपहिया वाहन चला रहा है. ऐसा सभी जगहों की तरह से जनपद जालौन में भी हो रहा है. जिला मुख्यालय उरई में ऐसी तत्परता कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही है.


इसी तत्परता के बीच उरई में एक ऐसी सड़क पर, जहाँ दिन में कई बार जिला प्रशासन का, अधिकारियों का निकलना होता है, असुरक्षा विगत कई वर्षों से बनी हुई है. शहर के बीचों-बीच बने एक प्रसिद्द मंशापूर्ण हनुमान मंदिर के पास कुछ ऐसी स्थिति बनी हुई है. शहर की मुख्य सड़क और मंदिर को जाने वाली सड़क आपस में मिली हुई है मगर दोनों के बीच कई फीट का फासला (ऊँचाई) है. मुख्य सड़क और मंदिर वाली सड़क के बीच के अंतर को एक तिरछी स्थिति से पाटने की कोशिश की गई है. इस सड़क पर पूरे दिन काफी आवाजाही रहती है. इसका कारण एक तो इसका जनपद जालौन और उसके आगे अन्य मुख्य नगरों को मिलाना है. इसी सड़क पर आगे चलकर परिवहन विभाग का बस स्टैंड भी बना हुआ है, जहाँ उत्तर प्रदेश परिवहन की सभी बसों का जाना होता है. इसके साथ-साथ इसी सड़क पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, आवास होने के साथ-साथ सभी मुख्य अधिकारियों के कार्यालय और आवासों के बने होने से भी आवाजाही बराबर बनी रहती है. दक्षिणमुखी  हनुमान जी का मंदिर होने के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच इस मंदिर की विशेष महत्ता है. इस कारण से मंगलवार और शनिवार को यहाँ विशेष रूप से भीड़ हुआ करती है. इसके बाद भी प्रशासन द्वारा कभी भी यहाँ पर किसी तरह की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे किसी अनहोनी की स्थिति में सड़क से वाहन या पैदल नागरिक को फिसल कर मंदिर वाली सड़क गिरने से रोका जा सके.


सोचने वाली बात है कि सड़क की व्यस्त आवाजाही के बीच छोटे-बड़े वाहनों का निकलना, परिवहन विभाग की बसों की नियमित आवाजाही के चलते यहाँ वाहन चालक और पैदल यात्री असुरक्षित ही हैं. यह तो सौभाग्य है लोगों का कि छुटपुट घटनाओं के अलावा यहाँ अभी तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है. लगता है प्रशासन अभी किसी बड़ी दुर्घटना के इंतजार में है. तब तक बिना हेलमेट वालों को पकड़ कर उनकी जान की सुरक्षा में व्यस्त रहा जाये.  




18 अगस्त 2019

मृत्यु और गुमनामी की रहस्यगाथा में समाया विराट व्यक्तित्व


कहते हैं कि जो आया है वो जायेगा ही मगर कोई आने वाला बजाय जाने के विलुप्त ही हो जाये तो? क्या ऐसा भी हो सकता है कि आने वाला विलुप्त हो जाये? यदि ऐसा होता भी है तो वह विलुप्त क्यों हुआ? यदि खुद अपनी मर्जी से विलुप्त नहीं हुआ तो फिर किसने विलुप्त करवाया? उसके खुद विलुप्त होने में, किसी के द्वारा विलुप्त करवाए जाने में लाभ किसका? विश्व की तमाम रहस्यगाथाओं से ज्यादा बड़ी और रहस्यमयी गाथा नेता जी के विलुप्त होने की गाथा है. यह रहस्यमयी इसलिए भी है कि नेता जी का व्यक्तित्व जितना विराट और चुम्बकीय रहा है, उसी अनुपात में या कहें उससे भी अधिक जनमानस के बीच उनकी गाथा तैरती रही है, आज के दिन यानि 18 अगस्त 1945 को उनके गायब हो जाने की. कोई कुछ भी कहे मगर तमाम सारे घटनाक्रम, अनेक तथ्य इशारा इस तरफ करते हैं कि आज के दिन हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी.


दरअसल आज़ादी के आन्दोलन में सुभाषचंद्र बोस ब्रिटिश हुक्मरानों की आंख की किरकिरी बने रहे, साथ ही तत्कालीन कांग्रेस के लिए भी, गाँधी-नेहरू के लिए विरोधी रूप में प्रचारित रहे सो उनके हिस्से में केवल उपेक्षा, अपमान और विलुप्तता ही आई. उनकी मृत्यु को जिस विमान दुर्घटना में हुआ प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना ताइवान में हुई ही नहीं. इसका ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि 03 सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. यहां यह गौर करने वाली बात है कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था.

नेता जी के निजी गनर रहे जगराम भी दावा करते रहे हैं कि अगर विमान हादसे में नेताजी की मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान ज़िंदा कैसे बच जाते? क्योंकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे. रूस के इस घटनाक्रम में शामिल होने की चर्चा करते हुए डॉ० सुब्रह्मण्यम स्वामी दावा करते रहे हैं कि नेताजी की हत्या नेहरू के कहने पर रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन ने करवा दी थी. डॉ० स्वामी के मुताबिक़, मेरठ निवासी श्यामलाल नेहरू के स्टेनो थे. नेताजी की मौत की ख़बर के पब्लिक होने के पहले नेहरू ने उन्हें आसिफ अली के घर बुला कर एक पत्र टाइप करावाया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली को लिखा था कि उनका वॉर क्रिमिनल रूस के क़ब्ज़े में है. नेता जी की मौत के रहस्य पर क़िताबें लिखने वाले और मिशन नेताजी के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने कुछ साल पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और कांग्रेस का एक बंगाली नेता दोनों नहीं चाहते थे कि नेताजी के बारे में रहस्यों से परदा हटे. उन्होंने कड़ी मेहनत से लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से 05 सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था.

ऐसी चर्चाएँ बराबर बनी रहीं कि नेता जी रूस चले गए जहाँ से बाद में उनको भारत आने का सुरक्षित रास्ता प्रदान किया गया. भारत में उनके प्रवास की सर्वाधिक चर्चा फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के रूप में रही हैं. यद्यपि बहुत से लोगों का मानना है कि नेता जी का व्यक्तित्व जिस तरह का था वैसे में संभव नहीं कि वे गुमनामी में अपना जीवन व्यतीत कर देते. इसके बाद भी सम्बंधित व्यक्ति को लेकर लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. इसके पीछे लोग कई कारण गिनाते हैं. लोगों का कहना है कि अपने आसपास गोपनीयता बनाकर रहने वाला यह व्यक्ति कौन था? अगर यह व्यक्ति एक साधारण संत था तब वह फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलता था? उनके पास दुनिया भर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं, साहित्य, सिगार कहाँ से आती थी? यदि वह व्यक्ति नेता जी नहीं तो उसके पास नेताजी से जुड़ी चीजें कैसे आईं? गुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार सैन्य संरक्षित क्षेत्र में क्यों हुआ? उनकी मृत्यु के बाद पूरा प्रशासनिक अमला, लोकल इंटेलीजेंस यूनिट समेत दूसरे लोग क्यों सक्रिय रहे? जब लोगों ने और समाचार पत्रों ने उनके नेता जी होने का दावा किया तो प्रशासन ने इसका खंडन क्यों नहीं किया? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो नेता जी के रहस्य को और गहरा देते हैं. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया.

गुमनामी बाबा के सामानों से मिला नेता जी का चित्र 

लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए 31 जनवरी, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें. 

लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-
1945 में एक प्लेन क्रैश में मारे गए नेताजी की मृत्यु के संदर्भ में विभिन्न इतिहासकारों और पत्रकारों की खोजबीन को खंगालने के बाद निष्कर्ष निकला है कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मृत्यु हुई या नहीं, इस बारे में निश्चित राय कायम नहीं की जा सकती, पर यह तथ्य निर्विवाद और सर्वविदित है कि नेताजी स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सभी के दिल में आजादी का जज्बा भर दिया था.
ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए. 

नेता जी की मृत्यु की जांच से सम्बंधित बने आयोगों की अपनी-अपनी रिपोर्ट्स रही हैं. जिस तरह का रहस्य, जिस तरह की गोपनीयता नेता जी की मृत्यु को लेकर बनाई जाती रही है, वैसी ही गुमनामी बाबा के निधन और उनके अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई. यह सब इस रहस्य को और गहरा करता है. अंतिम सत्य क्या है यह तो उसी सत्य को भोगने वाला ही जानता है मगर एक सत्य यह है कि जनमानस को विश्वास है कि नेता जी की मृत्यु आज के दिन बताई जाने वाली तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. उनकी मौत का रहस्य अभी भी रहस्य है. जब तक यह रहस्य उजागर नहीं होता तब तक उनकी मौत को स्वीकारना नेता जी के अस्तित्व को, उनकी विराटता को नकारना ही होगा. आज के दिन वे विलुप्त हुए हैं, मृत नहीं और यह भी अपने आपमें परम सत्य है कि विलुप्त होने वाले मरते नहीं वरन अमरत्व को प्राप्त कर जाते हैं. महाकाल बन जाते हैं.
जय हिन्द