03 January 2020

ज़िन्दगी जिन्दाबाद - अपनी कहानी का एक और घोष

अपनी उम्र के चार दशक गुजारने के बाद आत्मकथा लिखना हुआ. इसमें अपने जीवन के चालीस वर्षों की वह कहानी प्रस्तुत की गई जिसे हमने अपनी दृष्टि से देखा और महसूस किया. कुछ सच्ची कुछ झूठी के रूप में आत्मकथा कम अपनी जीवन-दृष्टि ही सामने आई. व्यावसायिक रूप से, प्रकाशन की आर्थिक दृष्टि के रूप से यह कहाँ ठहरती है, कह नहीं सकते मगर हमारे तमाम चाहने वालों ने इसे हाथों-हाथ लिया है. जैसा कि इस पुस्तक में उल्लेख भी किया है, वही यहाँ भी करना अपेक्षित महसूस होता है कि तीस साल गुजारने के बाद अचानक ही लगा था कि अपनी कहानी लोगों के सामने लाना चाहिए. उस सोच के साथ खुद से ही एक प्रश्न किया कि आखिर लोग क्यों हमारे जीवन को समझना-जानना-पढ़ना चाहेंगे? इसी प्रश्न के बाद एक दशक और गुजार दिए. चालीस वर्ष की उम्र होने के बाद इस प्रश्न का उत्तर खुद ही दिया कि अपनी कहानी लोगों को आदर्श के लिए नहीं, लोगों को प्रवचन देने के लिए नहीं, लोगों के कुछ बताने के लिए नहीं वरन हमने अपने इन चालीस वर्षों को किस तरह से देखा है, उस रूप में पेश करने का माध्यम मात्र है.



जब अपने आपको ही प्रश्न का उत्तर मिल गया तो लगा कि अब कुछ सच्ची कुछ झूठी लिखा जाना ही चाहिए. लिखने के दौरान खुद से ही लड़ना-जूझना होता रहा. क्या लिखना है, क्या छोड़ना है समझ न आता. एक घटना को लिखते तो उससे सम्बंधित दूसरी घटना याद आ जाती. बहरहाल, अपने आपसे लड़ते-जूझते कुछ सच्ची कुछ झूठी का प्रकाशन हुआ. परिजनों का, गुरुजनों का आशीर्वाद-प्यार मिला. दोस्तों का, सहयोगियों का स्नेह मिला. पाठकों का आशीर्वाद मिला. बहुत सारी प्रतिक्रियाओं का आना हुआ. ज्यादातर प्रतिक्रियाओं में प्रोत्साहन ही दिया गया. इसे अपने आपमें हिम्मत का काम बताया गया कि महज चालीस वर्ष में आत्मकथा लिखने का जोखिम उठा लिया. इसी क्रम में हमारे गुरुजी डॉ० दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी का फोन भी आया. उनका आशीर्वाद हमारे शोध-कार्य से लेकर आज तक बना हुआ है. उनके द्वारा भी पुस्तक को पढ़ा गया. इसी क्रम में उन्होंने आशीर्वाद देते हुए अपेक्षा व्यक्त की कि इसके आगे की कहानी का उनको इंतजार है. उन्होंने हमारी ट्रेन दुर्घटना और उसके बाद की हमारी दिनचर्या, क्रियाकलाप, कार्यों आदि को लेकर एक और पुस्तक का स्नेहिल निर्देश जैसा दिया. 

ये भी हमारे जीवन में लिखा था. वर्ष 2005 तमाम सारी दिक्कतों, दुखों के साथ हमारे लिए शारीरिक कष्ट लेकर आया था. एक ट्रेन दुर्घटना में अपना बायाँ पैर गँवा दिया था तथा दाहिना पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. दुर्घटना के बाद से आज तक के डेढ़ दशक बाद भी दाहिने पैर में दर्द को एक सेकेण्ड को भी राहत नहीं है. अपनी दुर्घटना के बाद के चार-पाँच वर्ष के दौरान जिस तरह का व्यवहार समाज से, अपनों से, गैरों से देखने को मिला उसने मन में उसकी अभिव्यक्ति का रास्ता बना दिया था. सोचते थे कि अपनी कहानी लिखने के पहले दुर्घटना के बारे में, उसके बाद जिस तरह का वातावरण अपने आसपास देखा, उसे लिखा जाये. ऐसी सोच के साथ लगता था कि आखिर समाज हमारे दर्द को क्यों पढ़ना चाहेगा? उसे आखिर हमारे दर्द से क्या मिलेगा? अब जबकि हमारी दुर्घटना को डेढ़ दशक होने को आये हैं, उसके बाद तमाम सारे काम ज्यों के त्यों चल रहे हैं तब लग रहा है कि अपने जीवन को उन लोगों के लिए अवश्य एक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो अपने जीवन से निराश हैं. इसमें भी हमारे शुभेच्छुजनों का स्नेह शामिल है.


नया वर्ष 2020 आरम्भ हो चुका है. कुछ सच्ची कुछ झूठी हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट था, जो विगत वर्ष आप सबके सामने आया. अब इस वर्ष अपनी दुर्घटना के बाद के एक दशक को, उस दौर में बीती अच्छी-बुरी घटनाओं को, अपने गिरने-उठने को, लोगों के पास आने-दूर जाने की घटनाओं को प्रस्तुत किये जाने का विचार है. इसमें भी कोशिश यही रहेगी कि अपने दुःख का, अपनी समस्या का रोना न रोया जाये बल्कि कुछ दुखी लोगों को हंसाने की कोशिश की जाये. आखिर ज़िन्दगी हँसने के लिए ही है. ज़िन्दगी जिन्दाबाद के रूप में जल्द ही हमारी ज़िन्दगी का एक और पक्ष आपके सामने होगा. संभव है कि पुस्तकाकार रूप में आने के पहले आपके सामने उसका नेट संस्करण उपस्थित रहे. शेष तो समय के गर्भ में है, हाँ, ये निश्चित है कि इस वर्ष के अंत तक ज़िन्दगी जिन्दाबाद का घोष आप भी हमारे साथ कर रहे होंगे.

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