नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.
यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है.
यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें
लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर
स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों
निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता
कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में
खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम
के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी
मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या
कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति
किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए
उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?
वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित
पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं.
इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही
बात न करें, सिर्फ किसी
कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का
बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में
शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत
फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर
नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.
मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल
पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों
में, कार्यक्रमों में
उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में
आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान
फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से
बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे
गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल
के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में
इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह
स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि
सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.
मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों
में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह
नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि
मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए
क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना
महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता
आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का
बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी
गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट
से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने
आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे
हैं.
नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को
देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में
जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत
हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के
साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर
वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे
अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

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