15 अक्टूबर 2026

अकेले में सामाजिक तो सार्वजनिक स्थल पर असामाजिक क्यों?

आजकल एक ट्रेंड बन गया है सोशल मीडिया पर, अनावश्यक बहस करना.


इस समय गरबा, परिधान पर दोनों तरफ से बहस छिड़ी हुई है. कोई पीठ पर सवार है तो कोई सिर पर लदा जा रहा है. ठीक है, देह आपकी है, परिधान आपका है पर समाज सबका है, सामाजिकता सबकी है. यहाँ धर्म, त्यौहार, मनोरंजन, नृत्य आदि को एक पल के लिए किनारे रख दीजिये. अब जरा सा पीठ से उतर कर, देह से निकल कर, धर्म से किनारे हुते हुए विचार करिए कि जब आप (हाँ, दोनों तरफ के लोग ही) अपने घर पर निपट अकेले होते हैं, परिवार का कोई भी सदस्य नहीं होता है, कोई दोस्त भी साथ नहीं होता है तब क्या आप अपने भीतर बसे समाज को, अपने अन्दर की सामाजिकता को छोड़ देते हैं?


नहीं समझे? समझेंगे कैसे, आखिर इस स्तर तक समझदार अभी हुए कहाँ हो. अन्दर की सामाजिकता, अपने भीतर के समाज से हमारा तात्पर्य यह है कि घर पर निपट अकेले होने के बाद भी आप सामाजिक बने रहते हैं.


=> आप फ्रिज में अपने जूते उतार कर नहीं रखते हैं. आखिर कौन देख रहा, रख लेते.


=> आप अपनी रसोई में नहाने लगते हैं? नहीं न. आखिर कोई है ही नहीं टोकने-देखने वाला तो नहाने लगा करिए.


=> खाना खाने के लिए बर्तनों का ही उपयोग करते हैं. काहे नहीं सारा भोजन जमीन में परस कर खाने लगते हैं? बर्तन धोने का चक्कर ही ख़त्म होता.


=> सोने के लिए बाथरूम में तो बिस्तर नहीं लगाते. काहे नहीं लगाते? बाथरूम में ही सो लेते.


=> कोई है नहीं घर में, कोई देखने वाला भी नहीं है, खिड़की-दरवाजे आदि सब बंद हैं, इसके बाद भी घर में बिना कपड़ों के, नग्नावस्था में तो घूमते नहीं रहते.


घर में निपट अकेले होने के बाद भी आप सारे के सारे काम विशुद्ध सामाजिकता का ध्यान रखते हुए करते हैं. सोचिये, जब आप एकदम अकेले हैं तब भी सामाजिकता का ध्यान रखते हैं, खुद को अनुशासित रखते हैं. ऐसी मानसिकता के बाद तब क्या हो जाता है जबकि सार्वजनिक रूप से किसी कार्यक्रम में शामिल होते हैं? किसी आयोजन का हिस्सा बनते हैं?


सब अपने मन का कर रहे हैं, अच्छा है. बस एक बार जहाँ भी आप हैं, उसे भी अपना घर मानकर चलिए और अपना व्यवहार करिए और सोचिये कि क्या सही है, क्या गलत है.

 


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