कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने
का भान होता है.
चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण
की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा
तो रखा जायेगा,
अन्यथा कबाड़ी के
हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले;
परिजनों के पत्र,
उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934
में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के
बगल में जो पुरानी इमारत है,
उस
समय वहीं राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर
में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार
की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला,
बाबा जी,
उसके बाद हमारे चाचा
जी और मामा जी,
तथा उसके बाद हम
और हमसे छोटा भाई.
इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र
है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक
व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र
का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे
बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.
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