देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.
संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते
हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़
हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग
रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन
की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन
अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व
सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने
के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे
वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.
यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता
है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता
प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली
स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला,
गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ
एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते
हैं.
बावजूद इसके, कहा जा सकता है
कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके
नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ
नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे
किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.
पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

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