26 अगस्त 2026

कालखण्ड परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाये

"शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम,

समय बिताने के लिए करना है कुछ काम."

इन दो पंक्तियों को बहुत से लोगों ने अपना स्वर दिया होगा बचपन में. इसकी दूसरी पंक्ति को लोग आज भी दोहराते रहते हैं कि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम. इस काम में कभी आ जाता है सनातन धर्म, कभी आ जाते हैं हिन्दू रीति-रिवाज, कभी आ जाती हैं महिलाएँ, कभी आ जाते हैं हिन्दू धार्मिक ग्रंथ, कभी आ जाती है मनुस्मृति.

 


यहाँ एक साधारण सा प्रश्न है जो आए दिन दिमाग़ को दही करता रहता है कि आज से हज़ार
, दो हज़ार साल बाद के समाज में आज की आरक्षण व्यवस्था को लेकर संदेह जताना कितना सही होगा? उस समय ये कहना कितना सही होगा कि हज़ार, दो हज़ार साल पहले के समाज में संविधान नामक ग्रंथ में कितनी अराजक व्यवस्था थी कि एक वर्ग के लोग उच्च अंक पाने के बाद भी बाहर रहते थे और एक दूसरे वर्ग के लोग निगेटिव अंकों के बाद भी प्रवेशित हो जाते थे?

 

जिस कालखण्ड को देखा नहीं गया, जिस समय के मानव-धर्म को समझा नहीं गया, उस दौर के संवैधानिक नियमों का अध्ययन नहीं किया गया तक उस कालखण्ड को, उसके नियमन को, उसके मनीषियों को दोष देना समझ से परे है. प्रत्येक कालखण्ड की अपनी व्यवस्थाएँ रहीं हैं और उनके अनुपालन के लिए ही नियम बनाये जाते रहे हैं. याद करिए कोरोना का दौर जब एक परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे को छूने से बच रहे थे. क्या ये छुआछूत वाला समाज कहा जाएगा?

 

कालखण्ड, परिस्थितियों, समाज का अध्ययन किए बिना पक्ष या विपक्ष में कुछ भी कहना एक प्रकार का पूर्वाग्रह है. ध्यान रखिए, समय बिताने के लिए भले ही कुछ काम करना पड़ा हो मगर फिर अगला काम पहले वाले के अंतिम अक्षर से ही शुरू हुआ है. याद करो उस अंताक्षरी को.

 


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