28 March 2017

सोच यही है कि तुम अक्षम हो

गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा मन की बात में विकलांगजनों के लिए दिव्यांगजन शब्द प्रयोग में लाने की बात कही गई थी. इसके समर्थन में बहुतायत लोग आये थे साथ ही साथ इसके विरोध में भी कई जगह से आवाजें उठी थी. हमने भी व्यक्तिगत रूप से पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया था कि अच्छी सोच और सार्थक मानसिकता के परिणामस्वरूप वे ऐसा विचार लाये किन्तु यदि दिव्यांग शब्द बदलने के साथ-साथ वे मानसिकता बदलाव का भी आहवान कर दें तो शायद कुछ और भला हो जाये. बहरहाल वे लगातार अपने कार्यों से नए-नए बदलावों का संकेत दे रहे हैं किन्तु उनके कार्यों से लोगों की मानसिकता में बदलाव आता दिख नहीं रहा है. उनके स्वच्छता अभियान को पूर्वाग्रह से देखते हुए विरोध भी किया गया. इसको स्वीकारते हुए कि सफाई सभी के लिए अत्यावश्यक है, अनिवार्य है लोगों का गंदगी करना लगातार जारी है. बदलाव की बयार तभी अपना असर दिखाती है जबकि उसके साथ मानसिकता में परिवर्तन आये. कुछ ऐसा ही दिव्यांग शब्द को लेकर सामने आया. प्रधानमंत्री जी के आहवान पर मीडिया ने, विभागों ने, सरकारों ने, प्रशासन ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. मंत्रालयों में भी दिव्यांगजन का इस्तेमाल किया जाने लगा किन्तु मानसिकता में परिवर्तन तनिक भी न दिखाई दिया.


वैसे समाज में आये दिन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को अलग-अलग तरह से अलग-अलग अनुभवों से गुजरना पड़ता है. कहीं उनके साथ दयाभाव जैसा बोध कराया जाता है तो कहीं उन पर एहसान किये जाने जैसी मानसिकता दिखाई देती है. इसके साथ-साथ कहीं-कहीं वे दुर्व्यवहार का शिकार भी बनते हैं. शाब्दिक रूप से हिंसा का शिकार होने के साथ-साथ वे शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा का शिकार भी बनते दिख जाते हैं. इसमें कहीं से वे लोग भी पीछे नहीं हैं जो शिक्षित हैं, रोजगार में हैं, व्यवसाय में हैं. ऐसे लोग भी अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते आये दिन भेदभाव का, नकारात्मकता का शिकार बनते हैं. समाज के रोज के ऐसे कई-कई उदाहरणों से इतर अभी हाल में ही केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का बयान न केवल निंदनीय है बल्कि शर्मनाक भी है. उनका ये कहना कि सौ लंगड़े मिलकर भी एक पहलवान नहीं बन सकते, को वे भले ही कहावत का नाम देकर विकलांगजनों (प्रधानमंत्री के शब्दों में दिव्यांगजनों) के अपमान को कम नहीं करता है. संभव है कि ऐसे बयान के पीछे उनकी मानसिकता दिव्यांगजनों का अपमान करना अथवा तिरस्कार करने की न रही हो किन्तु ये तो स्पष्ट है कि उनकी मानसिकता में दिव्यांगजन नकारात्मक भाव लिए हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो क्या वे ऐसा बयान देते?

देखा जाये तो रामविलास पासवान कोई साधारण अथवा सामान्यजन नहीं हैं. वे विगत कई बार के सांसद रहने के साथ-साथ विगत कई सरकारों में केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं. विगत सरकारों की विकलांगजनों के लिए क्या भूमिका रही हो इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता. अब तो वे वर्तमान केंद्र सरकार में भी मंत्री हैं और सहजता से समझ रहे हैं कि विकलांगों अथवा दिव्यांगों के लिए उनकी सरकार की, उनके प्रधानमंत्री की प्राथमिकतायें क्या हैं. ऐसे में उनके द्वारा ऐसा बयान दिया जाना सिर्फ और सिर्फ उनकी मानसिकता का सूचक है. यदि दिव्यांगों के प्रति उनकी सोच सकारात्मक होती तो वे ऐसा बयान कदापि नहीं देते. उनकी सोच समकक्षों के लिए सही है, उनके प्रति सकारात्मक है तभी उन्होंने गठबंधन पर तंज कसते हुए किसी नेता का नाम नहीं लिया, किसी दल का नाम नहीं लिया. आखिर जब वे सौ लँगड़े कहकर अनजाने ही दिव्यांगजनों का मजाक बना रहे थे, तब वे उसी जगह सौ लालू, सौ राहुल, सौ अखिलेश, सौ नीतीश जैसा भी कुछ कह सकते थे. मगर ऐसा उनके द्वारा नहीं कहा गया क्योंकि उनकी सोच में वर्षों से एक ही भाव गहरे तक भरा बैठा है कि लँगड़े लोग कुछ नहीं कर सकते.


विकलांग की जगह दिव्यांग करने से बेहतर होता कि इसी मानसिकता को बदला जाता. जिसने समाज के बहुतायत वर्गों में गहराई से इस बात को बैठा दिया है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है. समाज से ऐसे उदाहरणों को सामने लाने का काम सरकार को, समाजसेवियों को, शिक्षण संस्थानों को, प्रदेश सरकारों को, जिला प्रशासन को, मीडिया को करना होगा, जिन्होंने अपनी शारीरिक कठिनाई पर विजय प्राप्त करते हुए नए-नए आयाम स्थापित किये हैं. आवश्यक नहीं कि सभी लोग मंत्री बनें, गोल्ड मैडल लायें, पर्वतों की ऊँचाई नापें. एक ऐसा व्यक्ति जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दूसरे आम व्यक्तियों से शारीरिक रूप से भिन्न है यदि वो अपनी इसी कठिनाई पर विजय पाते हुए, अपनी मानसिकता को सशक्त बनाकर, आत्मविश्वास को प्रबल बनाकर दो-चार कदम भी आगे बढ़ता है तो वही समाज के लिए अनुकरणीय होना चाहिए. काश! केन्द्रीय मंत्री महोदय पासवान के बयान से सबक लेते हुए समाज के समूचे अंग जागने का काम करें, जिससे आने वाले समय में दिव्यांगजनों के लिए दिमाग में बसी नकारात्मक भावना दूर हो सके. 

4 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - १६० वर्ष पहले आज भड़की थी प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की ज्वाला में शामिल किया गया है।कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Anita said...

मानसिकता बदलने के लिए ही यह प्रयास किया गया है..

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

मानसिकता की जड़े बहुत गहरी होती है। अपने बच्चों में अच्छे संस्कार देकर ही इससे मुक्ति पाई जा सकती है। बात जब दिव्यांगों, स्त्री या अन्य मानसिक पीड़ित वर्ग की बात हो तो इनके प्रति सोचने की मानसिकता बदली नहीं है क्योंकि हमें किसी ने यह शिक्षा ही नहीं दी की इनको सम्मान दें। अगर हम अपने बच्चों को यह संस्कार दें पाएं तो ही इनके प्रति नजरिया बदल पायेगा एवं इनको समाज में योग्य स्थान भी मिल पायेगा। बहुत ही सूंदर आलेख कुमारेन्द्र जी।

Narendra Agrawal said...

रामविलास पासवान हरामखोर का नाम है जो मोदी लहर में जीत गया और अपने आप को सरकार का ख़ुदा समझ रहा है ।दिव्यांगों के प्रति गलत सोच रखने वाले को बीच चौराहे पर फांसी दे कर लटका देना चाहिए